सोमवार, 25 जुलाई 2022

 जेल जाने के बावजूद मंत्री ??!!

सुप्रीम कोर्ट इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता ?

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सुरेंद्र किशोर

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महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक जेल जाने के बावजूद मिनिस्टर बने रहे थे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब भी जेल में हैं।

इसके बावजूद वे मंत्री भी हैं।

 पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।फिर भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी दे ही देना चाहिए।कोई मार्ग दर्शन जारी करना चाहिए। 

किंतु जेल में भी कोई मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?  

क्या इसे संविधान की धज्जियां उड़ाया जाना नहीं कहेंगे ?

सुप्रीम कोर्ट के रहते संविधान की धज्जियां उडं़े ?

यदि कोई सरकारी कर्मी जेल चला जाए तो वह तुरंत सेवा से निलंबित हो जाता है।

किंतु नेता जेल जाते ही अपने लिए पहले अस्पताल का इंतजाम कर लेता है।

साथ ही, घटिया व बेशर्म राजनीति के इस दौर में वह मंत्री भी बना रहता है।

   बेचारे लालू यादव और जय ललिता का क्या 

  कसूर था जो उन्हें जेल जाने के लिए मुख्य 

   मंत्री पद छोड़ना पड़ा था ???!!!

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25 जुलाई 22



 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मिलावटों की आशंका कम करने के लिए दवाओं की कीमतंे घटानी जरूरी 

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केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण दवाओं की भारी कीमतों में कमी लाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।कीमतों में सत्तर प्रतिशत कमी का प्रस्ताव है।

यदि सरकार ने अंततः सचमुच ऐसा कोई निर्णय कर लिया तो उससे  दवाओं में मिलावट की आशंका भी कम होगी।

ध्यान रहे कि जो महंगी दवाओं में मिलावट अधिक होती है।

सस्ती दवाओं में मिलावट कम होती है।

क्योंकि सस्ती दवाओं में मिलावट के धंधे में मुनाफा काफी कम होता है।

‘आयुष्मान भारत’ की दवाओं की कीमतें काफी कम हैं।

इसलिए उसमें कोई मिलावट करके भला कोई कितना कमाएगा ?

 पुराने जमाने में सार्वजनिक क्षेत्र के आई.डी.पी.एल. कारखानों में निर्मित अत्यंत सस्ती दवाएं काफी असरदार होती थीं।क्योंकि उनमें मिलावट नहीं होती थी।

पर, जब उसी कम्पोजिशन वाला टेबलेट ब्रांडेड कंपनी भारी कीमत में बेचे तो जाहिर है कि उसमें मिलावट से समाजविरोधी तत्वों को काफी फायदा होगा।

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    ठंडे पेय पदार्थों में कीटनाशक

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दवाआंें के साथ-साथ केंद्र सरकार ठंडे पेय पदाथों में  कीटनाशक दवाओं की भारी मौजूदगी पर भी ध्यान दे।

उससे भी बीमारियां हो रही हैं। 

 कई साल पहले भारत की  संसद में प्रतिपक्षी सदस्य ने सवाल पूछा था कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी अधिक क्यों है ?

इस पर केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।

तब यह सवाल उठा था कि कोल्ड डिं्रक बनाने वाली अमरीकी कंपनी अपने देश में तो कीटनाशक की मौजूदगी के खिलाफ है। किंतु वही कंपनी भारत के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ क्यों करती है ?

पिछली सरकारें भले यह बर्दाश्त करती रहीं।किंतु क्या मौजूदा केंद्र सरकार भी उसी लीक पर चलेगी ?

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छापेमारी में दुस्साहस 

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बालू, पत्थर, कोयले और पशु के काले धंधे में काफी काला धन है।

इस धंधे में लगे माफियाओं को देश भर में शासन के एक हिस्से का गुप्त संरक्षण मिलता रहा है।

जगजाहिर है कि 

इस काम में निचले व मझोले स्तरों के अफसरों की उनसे साठगांठ रहती है।

  इसीलिए धंधेबाज समय -समय पर पुलिसकर्मियों को अपनी गाड़ियों से कुचलते रहे हैं।उन्हें लगता है कि उनका कुछ बिगड़नेवाला नहीं।

इस धंधे को निर्मूल करने की कोशिशें भी होती रहती हैं।पर,वह कभी सफल नहीं होती।

  कोशिश सफल हो,उससे पहले उनकी गाड़ियों से कुचलने वाले अफसरों की जानें कैसे बचाई जाएं ?

इस पर बड़े अफसरों को विशेष तौर पर ध्यान देना होगा।कभी- कभी यह सवाल भी उठता है कि माफियाओं को रोकने के लिए कुछ अफसर अकेले या बहुत कम फोर्स के साथ मैदान में क्यों चले जाते हैं ?

क्या इस संबंध में शासन का कोई खास निदेश नहीं है ?

क्यों वे अफसर अति उत्साही हो जाते हैं ?

या माफियाओं के समक्ष अकेले चले जाने के पीछे उनका उद्देश्य कुछ और होता है ?

इस पर सरकारों को उच्च स्तर पर विचार करके कोई कठोर दिशा निदेश जारी करना चाहिए।

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जेल में फिर भी मंत्री

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नवाब मलिक जब तक जेल में रहे,मिनिस्टर भी बने रहे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब जेल में हैं।इसके बावजूद अब तक ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।

पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।पिछली खबर मिलने तक वे भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी देना चाहिए। किंतु जेल में भी मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?    

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भूली-बिसरी याद

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जस्टिस हंसराज खन्ना सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह के खिलाफ प्रतिपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे।सुप्रीम कोर्ट के चर्चित जज रहे खन्ना साहब ने राष्ट्रपति की भूमिका पर अपनी राय दी थी जो आज भी मौजूं है।

जस्टिस खन्ना ने कहा था कि ‘‘राष्ट्रपति देश का प्रतीक होता है।

उसके आचार-विचार का समाज पर असर पड़ता है।

हालांकि उसे कड़ाई से संविधान के अंतर्गत ही कार्य करना होता है।

परंतु मैं समझता हूं कि इसी सीमा के भीतर वह देश के नैतिक पतन को रोकने में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शासक दल से टकराव की स्थिति पैदा करेगा।

टकराव की तो असल में कोई संभावना ही नहीं है।

खास कर उस स्थिति में ,जबकि राष्ट्रपति देश के नैतिक पर्यावरण को साफ करने के प्रति चिंतित हो।

 अपनी स्थिति की सीमाओं के भीतर ही उसे अपनी सक्रियता तय करनी होगी।’’

   जस्टिस खन्ना की टिप्पणियां न्यायपूर्ण थी।

हाल में  राष्ट्रपति चुनाव हुआ।उसके उम्मीदवार यशवंत सिन्हा तथा कुछ अन्य प्रतिपक्षी नेताओं की टिप्पणियों की जरा जस्टिस खन्ना की टिप्पणियों की तुलना करके देख लें।

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 और अंत में

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जिन राज्यों में एक दलीय शासन है,वहां के मुख्य मंत्री यदि ईमानदार हैं,तो वे अपने मंत्रियों पर चैकस नजर रख सकते हैं।किंतु जहां मिली जुली सरकारें हैं,उन राज्यों के मुख्य मंत्रियों के सामने दिक्कतें हैं।

 ऐसी दिक्कतें कैसे दूर हों ?

इस पर तो संबंधित दलीय हाईकमान को ही विचार करना होगा। 

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कानोंकान 

प्रभात खबर

पटना

25 जुलाई 22


 


शनिवार, 23 जुलाई 2022

       

मुझे लगता है कि ओमप्रकाश राजभर और शिवपाल सिंह यादव जैसे नेताओं की मूल समस्या उनके बेटों की राजनीतिक उच्चाकांक्षाएं हैं।

उन्हें किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द किसी न किसी सदन में भेजने की जल्दीबाजी है।

  देखना है कि बेचारे उन नेता पुत्रों की इच्छी कब पूरी हो पाती है।

 राजभर और शिवपाल जैसी इच्छा रखने वाले नेताओं की इस देश में कोई कमी नहीं है।

पुत्रों की उच्चाकांक्षा पूरी कराने के चक्कर में कई दल धीरे -धीरे बर्बाद होते जा रहे हैं।

पर, यह ऐसी इच्छा है जो मरती ही नहीं।

 हाल में बेचारे शरद यादव की ऐसी ही इच्छा राजद पूरी नहीं कर सका।

देखना है कि राजभर और शिवपाल की इच्छा किस दल से कब पूरी होती है।

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23 जुलाई 22

  

 














शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

 भूली-बिसरी याद

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25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद संजय गांधी के ही कहने पर केंद्र सरकार अनेक फैसले कर रही थी।

  शाह आयोग की रपट में उसका विवरण आया है।

रपट के पेज नं.-21 पर लिखा है, 

‘‘....जब श्री रे (सिद्धार्थ शंकर राय)कमरे के दरवाजे से बाहर जा रहे थे तो वे (केंद्रीय गृह राज्य मंत्री )ओम मेहता से यह सुनकर आश्चर्य चकित हो गए कि अगले दिन (यानी 26 जून 1975 को)उच्च न्यायालयों को बन्द करने के आदेश दे दिए गए है।

सभी समाचार पत्रों को बिजली सप्लाई बन्द करने के भी आदेश दिए गए हैं।’’

   श्री राय इस बात के विरोधी थे।

 वे इस फैसले को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर रद करवाना चाहते थे।

दरअसल यह फैसला संजय गांधी का था जो किसी पद पर नहीं थे।

  इस बीच संजय गांधी ने अत्यंत बदतमीजी और गुस्ताखी से कहा कि आप (यानी श्री राय)नहीं जानते कि देश पर शासन कैसे किया जाता है।

अंततः सिद्धार्थ शंकर राय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्होंने दोनों आदेशों को रद करवाया।दरअसल आपातकाल लगाने की सलाह श्री राय की ही थी।

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आपातकाल में एक विधेयक तैयार किया गया था।

उसमें इस बात का प्रावधान था कि राष्ट्रपति,प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ आजीवन कोई मुकदमा दायर नहीं हो सकता।

पर, किसी ने राजनीतिक कार्यपालिका को समझाया कि ऐसा अनर्थ मत कीजिए।उसके बाद वह उस विधेयक पर काम आगे नहीं बढ़ा।

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22 जुलाई 22 


गुरुवार, 21 जुलाई 2022

 अपनी मदद खुद कीजिए।

कार्बाइड युक्त आम से अपने लीवर, किडनी और 

दिल को बचाइए

शासन आपकी मदद इस बार भी नहीं करेगा

विधान मंडल में भी कोई प्रतिपक्षी इस पर हंगामा नहीं करेगा

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सुरेंद्र किशोर 

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कच्चा आम खरीद कर उसे घर में ही पकाइए ।

पकाइए,यानी स्वाभाविक रूप से उसे पकने दीजिए।

उसे ही खाइए अन्यथा बाजार से लाए गए पके 

आम से आपके दिल, किडनी और लीवर को गंभीर 

खतरा है।

  जानकार लोग लगातार चेतावनी देते रहे हैं।

अब भी चेत जाइए।

सरकार आपको ‘‘कार्बाइड माफिया’’ से नहीं बचाएगी।

सरकार के अंग तो रिश्वत वसूलने में व्यस्त रहते हैं।

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इस साल भी मैंने अपने घर में स्वाभाविक रूप से पके आम खाए।

बाद में कई बार विभिन्न बाजारों से पके आम मंगवाए।

पके आम में मैंने बड़ी मात्रा में कार्बाइड पाया।

आम को मीठा के बदले 

तीता पाया।

खाने में एक ही दिन देर से कार्बाइड युक्त आम सड़ने लगे।

दुर्गंध भी था।

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कार्बाइड युक्त आम के जानलेवा जहर से आपको 

बचाने की हर बार सरकार वादा करती है।

पर कभी बचाती नहीं। 

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इसलिए अपनी मदद खुद कीजिए।

याद रहे ,जानलेवा कार्बाइड सिर्फ आम में ही नहीं है।

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20 जुलाई 22.



 ख्चाहिशों का मोहल्ला बहुत बड़ा होता है।

बेहतर है, हम जरूरतों की गली में मुड़ जाएं

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समय से पहले और तकदीर से ज्यादा कभी 

किसी को कुछ नहीं मिलता

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पिछले कुछ दशकों में मैंने अनेक पदाकांक्षी राजनीतिक कर्मियों को पदतृष्णा की पूर्ति के अभाव में कलटते-कलपते और पद-दाताओं को गरियाते देखा-सुना है।

उनमें से कई गुजर गए।

कई अन्य अब भी मृगतृष्णा के पीछे हैं।

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दरअसल आप कितने महत्वपूर्ण हैं,यह तो आप जानते हैं।

किंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘‘पद-दाताओं’ की नजर में कुल मिलाकर आपकी कितनी उपयोगिता है।

उसके ‘स्केल’ पर आप का स्थान कितना ऊंचा या नीचा है।

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कुछ न पाने का अफसोस क्यों ?

राजनीति के अलावा भी बहुत से क्षेत्र हंै जहां जाकर आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं,जन सेवा कर सकते हैं।

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मेरी बातें उन पर लागू नहीं होतीं जो अपने अपार पैसों के 

बल पर जीवन में कुछ भी हासिल कर लते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

21 जुलाई 22


मंगलवार, 19 जुलाई 2022

 


इंटेलिजेंस ब्यूरो की ही तरह ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी 

कार्य कुशल बनाने की जरूरत 

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य पुलिस के स्पेशल ब्रांच की सतर्कता और गुणवत्ता में भारी फर्क है।

देश-प्रदेश के समक्ष उपस्थित मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए 

राज्य पुलिस के ‘स्पेशल ब्रांच’ को भी आई.बी.की तरह ही दक्ष  बनाने की आज सख्त जरूरत है। 

 दोनों संगठनों की कार्य क्षमता में फर्क का सबसे बड़ा कारण यह बताया जाता है कि इन संगठनों को उपलब्ध साधनों में भी काफी फर्क है।जबकि, काम लगभग एक जैसे करने होते हैं।

  इस फर्क को शीघ्र कम करने की जरूरत है।

यह भी देखने की जरूरत है कि जितने साधन स्पेशल ब्रांच  को उपलब्ध हैं,वह सही जगह ही खर्च हो।

  आई.बी. का काॅडर प्रबंधन बेहतर है।

 आई.बी.के लिए अलग से बहाली होती है।उन्हें समुचित प्रशिक्षण दिया जाता है।

 कई कारणों से आई.बी.की विश्वसनीयता अधिक है।

 इसीलिए कई बार बिहार में हुई किसी बड़ी घटना की खबर आई.बी.को पहले मिल जाती है और स्पेशल ब्रांच को बाद मंे।

कई बार तो स्पेशल ब्रांच को मिलती ही नहीं।

अस्सी और नब्बे के दशकों में एक संवाददाता के रूप में मेरा भी यही अनुभव रहा।

उन दिनों बिहार में आए दिन नर संहार हो रहे थे।

 हाल ही में पटना के पास के फुलवारीशरीफ में जारी देश विरोधी गतिविधियों की जानकारी आई.बी.ने बिहार पुलिस को दी। 

उसके बाद ही बिहार पुलिस कार्रवाई कर सकी।

हालांकि इस बात की सराहना होनी चाहिए कि बिहार पुलिस इस मामले में अब पेशेवर ढंग से काम कर रही है।

  वह दिन कब आएगा जब बिहार पुलिस का स्पेशल ब्रांच कार्य कुशलता मंे आई.बी. की बराबरी कर पाएगा ?

 इसके लिए यह जरूरी होगा कि बिहार सरकार स्पेशल ब्रांच को सचमुच ‘स्पेशल’ बनाने के लिए कुछ खास प्रयास करे।

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चैकसी की नियमित जांच जरूरी 

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पिछले दिनों दिल्ली पुलिस के विशेष कोषांग ने दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाकों में 30 डमी बम रख दिए थे।

उसे यह देखना था कि पुलिस

कितनी सतर्क रहती है।

इन में से सिर्फ 12 बमों का ही पता लग सका।

दिल्ली पुलिस,प्रायवेट सुरक्षा गार्ड और आम जन की नजरें सिर्फ  12 बमों पर ही पड़ीं।

यदि बम असली होते तो बाकी 18 जगहों में भी विस्फोट हो चुके होते। 

 दिल्ली का जब यह हाल है तो राज्यों की राजधानियों में सतर्कता का क्या हाल होगा ,उसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

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पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं

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बिहार सरकार ने अपने अधिकारियों को यह आदेश दिया 

है कि आम लोगों से मिले आवेदन पत्रों की पावती पर अब लघु हस्ताक्षर नहीं चलेगा।

इतना ही नहीं, पूरे हस्ताक्षर के साथ पावती देने से इनकार करने वाले सरकारी कर्मियों 

के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

  डाक से आए आवेदनों की पावती डाक से ही भेजी जाएगी।

     बिहार सरकार यदि अपने इस आदेश को लागू कराने में सफल हो गई तो इससे पीड़ित लोगों को भारी राहत मिलेगी।

 पर, समस्या सिर्फ पावती न मिलने की ही नहीं है।

मुख्य सवाल यह है कि सरकारी कार्यालयों में 

उन लोगों के आवेदन पत्रों का क्या हश्र होता है जो संबंधित कर्मियों को खुश करने की स्थिति में नहीं होते ?

  बिहार सरकार के समक्ष,देश की अन्य सरकारांे के समक्ष भी, हमेशा से ही यह बड़ी चुनौती रही है कि कैसे जनता को रिश्वतखोरी से राहत दिलाई जा सके।

  इन दिनों भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जितने बड़े पैमाने पर बिहार में कार्रवाइयां हो रही हैं,उतने बड़े पैमाने पर पहले कभी नहीं हुई।इसके बावजूद बिहार के सरकारी कार्यालयों में रिश्वतखेारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।क्या इसलिए कि रिश्वतखोर अब भी यह समझ रहे हैं कि ‘‘मारने वालों से अधिक ताकतवर अंततः बचाने वाला होता है ?’’

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समयबद्ध निपटारे का बंधन

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कल्पना कीजिए कि एक  किसान दशकों से अपनी दस बीघे जमीन की मालगुजारी  रसीद कटवाता रहा था।

 अब कर्मचारी कहता है कि आपको आठ बीघे जमीन की ही रसीद कटेगी।जबकि दस बीघा जमीन हमेशा उसके शांतिपूर्ण कब्जे में रही है।

संबंधित आॅफिस में उसे यह बताया जाता है कि आठ बीघे को पहले जैसा दस बीघा बनाने के लिए अब आपको 50 हजार रुपए देने पड़ेंगे।

वह इतना पैसा देने की स्थिति में नहीं है।

  यदि इस संबंध में किसान कोई आवेदन पत्र देकर सवाल पूछता है कि है तो अब

पूरे दस्तखत के साथ पावती रसीद तो उसे मिल सकेगी ।

किंतु उसे उसके सवाल का जवाब भी तीन महीने के भीतर मिल जाए कि उसका दो बीघा कम क्यों हो गया ?

  यदि तीन महीने में जवाब नहीं मिलता है तो वह कहां दौड़ेगा ?

उसके लिए और ऐसे अन्य पीड़ितों के लिए अंचल कार्यालयों 

में समय- समय पर जिले के  उच्च अफसरों के शिविर लगे।

 उसमें यह फैसला हो कि दो बीघा कम करने का दोषी कौन है ? 

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और अंत में 

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 फुलवारीशरीफ में खतरनाक और देश विरोधी आतंकी संरचना यानी टेरर माड्यूल का हाल ही में पता चला है।

इस ‘टेरर माड्यूल’के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों की क्या राय हैं ?

उधर अधिकतर निरपेक्ष जनता की इस मोड्यूल पर क्या राय है ?

क्या अधिकतर जनता की राय और राजनीतिक दलों की राय  के बीच कोई आपसी तालमेल है ?

यदि हां,तब तो ठीक है।

यदि नहीं तो कुछ दलों को  अपने चुनावी भविष्य की चिंता अभी से कर लेनी चाहिए।

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18 जुलाई 22 के

दैनिक प्रभात खबर,

(पटना) में प्रकाशित