शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

   इस देश के एक राज्य में एक ऐसे नेता भी मुख्य मंत्री हुए हैं जिन्हें छात्र जीवन में मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती होना पड़ा था।

उनके अभिभावक ने उनके इलाज के लिए वहां भर्ती किया था।

बाद में वे ठीक हो गए और मुख्य मंत्री तक बने।

हालंाकि तब भी कभी- कभी उनकी उलटी-सीधी बातों से यह लग जाता था कि शायद कभी वे ‘बीमार’ रह चुके होंगे।

 इसी देश के एक राज्य में एक ऐसे आई.पी.एस.अफसर राज्य के पुलिस प्रमुख बने थे जिन्हें अपने सेवा काल में भी यदाकदा मानसिक आरोग्यशाला जाना पड़ता था।

 पर,पुलिस प्रमुख तो बने ही ।

इसलिए उन लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं जिनके दिमाग में हर बार सुलझे हुए विचार नहीं आते।

 किसी को बताए बिना देश या विदेश के किसी अच्छे मानसिक आरोग्यशाला में वे अपना इलाज ठीक ढंग से करा लें।

ठीक हो जाएं।

फिर तो वे बड़े से बड़ा पद पर बैठ ही सकते हैं।

---सुरेंद्र किशोर

13 जनवरी 23




     आज का चिंतन

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 देश की राजनीति,कल,आज और कल !!

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       --सुरेंद्र किशोर-

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   सन 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत के क्या-क्या कारण बने थे ?

उसके लिए कौन से तत्व जिम्मेदार थे ?

मेरी समझ से उस जीत में यू.पी.ए.सरकार की खामियों का योगदान 60 प्रतिशत था।

 जीत में 40 प्रतिशत ही योगदान नरेंद्र मोदी व राजग की खूबियों का था।

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2019 लोस चुनाव में भी स्थिति लगभग वही बनी रही।

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आज भी लगभग वही स्थिति है जबकि 2024 का चुनाव कुछ ही महीने दूर है।

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अगले कुछ महीनों में मोदी विरोधी दलों ने यदि अपना चाल,चरित्र और चिंतन नहीं बदला तो सन 2024 में भी वही रिजल्ट आने वाला है।

रवैया कैसे बदला जा सकता है,उस पर फिर कभी बाद में लिखूंगा।

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लेकिन यदि मोदी सन 2024 में फिर सत्ता में आ गए तो प्रतिपक्ष का क्या होगा ?

खास कर उन छोटे -बड़े दर्जनों प्रतिपक्षी नेताओं का क्या होगा जिन पर देश की विभिन्न अदालतों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं ?

  2024 चुनाव से पहले कई अन्य प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे शुरू हो सकते हैं।

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यदि मोदी की 2024 में भी विजय हुई तो 2024 और 2029 के बीच क्या -क्या होगा ?

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  प्रतिपक्षी दलों के अधिकतर नेताओं के खिलाफ मुकदमों में कम से कम लोअर कोर्ट्स से तो फैसले आ ही चुके होंगे।

सबूत देखने के बाद उन नेताओं को इन दिनों अदालतंे कोई खास राहत नहीं दे रही हैं।

इसलिए अंतिम नतीजों का भी अनुमान लगा लें।

बड़े नेताओं को बड़ी सजाएं ही हांेगी !

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यह भी अनुमान लगा लें कि 2024 और 2029 के बीच कितने प्रतिपक्षी नेतागण जेलों में होंगे और कितने बाहर ?

फिर देश का राजनीतिक दृश्य कैसा होगा ?

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31 दिसंबर 22

  


   


      बिहार के शिक्षा मंत्री ने भाजपा 

    को दे दिया उसके अनुकूल मुद्दा

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     सुरेंद्र किशोर

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यदि बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्र शेखर जी सन 2024 के लोक सभा चुनाव तक अपने पद पर बने रह गए तो भाजपा को एक अच्छा-खासा चुनावी मुद्दा उपलब्ध रहेगा।ऐसा मुद्दा भाजपा के लिए अनुकूल होता है।

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2014 में जब मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई तो भाजपा के कई बड़बोले सांसद व मंत्री ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ देने लगे जिस तरह का संदेश चंद्रशेखर दे रहे हैं।

पर नरेंद्र मोदी ने अपने दल के नेताओं से सार्वजनिक रूप से अपील की कि आप राष्ट्र के नाम संदेश देने के बदले अपने काम करें।

फिर भी कई भाजपा नेता संदेश देते रहे।

इस तरह वे भाजपा विरोधी दलों को मुद्दा थमाते रहे।

वैसे सबसे अधिक ऐसे ‘‘संदेश’’ जीतनराम मांझी ने दिए थे जब वे मुख्य मंत्री बने थे।

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1977 के बिहार मंत्रिमंडल के एक सदस्य के यहां मैं गया था।

पुराने परिचित थे।

उन्होंने करीब दो घंटे तक मुझसे बातचीत की। 

अपने विभाग की बात छोड़कर देश-दुनिया की ही बातें वे करते रहे।

 मंत्री बनने के बाद वे ‘चिंतक’ बन गए थे।उसके बाद वे कभी चुनाव नहीं जीत सके।

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  12 जनवरी 23 


 इस देश के कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए प्रज्ञा सिंह ठाकुर के ‘कुबोल’ कोई समस्या नहीं।

नेताओं और बुद्धिजीवियों के दूसरे हिस्से के लिए ‘‘गजवा ए हिन्द’’ कोई समस्या नहीं।

  जबकि, देश की एकता,लोकतांंित्रक-व्यवस्था और सुख -शांति के लिए हर नागरिक को इन दोनों तरह की प्रवृतियों  के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए।

  पर, वोट बैंक की राजनीति जो न कराए !!

इसे इस देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे।

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7 जनवरी 23  


   राष्ट्रपति वेंकटरमण ने डा.लोहिया के तैल चित्र 

  का अनावरण करने से इनकार कर दिया था

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    सुरेंद्र किशोर

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वीर सावरकर की बात तो अभी छोड़ ही दीजिए।

मैं डा.राम मनोहर लोहिया की बात करता हूं।

लोहिया ने कभी ब्रिटिश सत्ता को माफीनामा नहीं लिखा।

फिर भी ‘‘इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया’’ की धारणा पालने वाली कांग्रेस के नेता रहे आर.वंेकटरमण जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने संसद के सेंट्रल हाॅल में लोहिया के तैल चित्र का अनावरण करने से साफ इनकार कर दिया था।

बाद में प्रधान मंत्री चंद्रशेखर ने लोहिया के उस चित्र का अनावरण किया।

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तब वेंकट रमण को मधु लिमये ने इसके विरोध स्वरूप एक लंबा व कड़ा पत्र लिखा था।

वह पूरा पत्र कलकत्ता से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘संडे’ में छपा था।मैंने भी उसे पढ़ा था।

उस अंक को मैं अपनी लाइबे्ररी में खोज रहा हूं।मिल जाएगा तो उससे भी उधृत करते हुए कुछ बातें भी लिखूंगा।

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 आजादी की लड़ाई के दिनों जवाहर लाल नेहरू जब कांग्रेस अध्यक्ष बने तो उन्होंने पार्टी का ‘विदेशी मामलों का प्रभाग’ बनाया था।नेहरू ने लोहिया को उसका सचिव मनोनीत किया।

 नेहरू के प्रधान मंत्री बनने के बाद एक बार लोहिया दिल्ली ़ जेल भेज दिए गए थे।

आमों का मौसम था।

नेहरू जी इंदिरा गांधी के साथ एक दिन भोजन के टेबल पर थे।

 उन्होंने पूछा, ‘‘इन्दु,लोहिया को तो आम नहीं मिला होगा।

उसे आम भिजवाना चाहिए।’’

उस पर नेहरू के सचिव एम.ओ.मथाई आम लेकर जेल गए थे।

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लगता है कि बाद के वर्षों में कांग्रेस में ऐसी प्रवृति पैदा कर दी गई जो रही कि कुछ खास नेताओं के अलावा किसी अन्य को आजादी की लड़ाई का श्रेय नहीं दिया जाए।

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 13 जनवरी 23

    


मंगलवार, 10 जनवरी 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मार्केट काॅम्प्लेक्स के भू तल को पार्किंग के लिए खाली कराने की जरूरत

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यह समस्या बिहार के लगभग सभी नगरों की है।

पटना में तो कुछ अधिक ही गंभीर हैै।

 नगर की मुख्य सड़कों पर अधिकतर बहुमंजिले मार्केट काॅम्प्लेक्स के मालिकों ने पार्किंग की जगह नहीं छोड़ी है।

शासन द्वारा पास नक्शों में तो पार्किंग का प्रावधान रहता है।

पर,सरजमीन पर वह गायब पाया जाता है।

उस पार्किंग स्थल पर भी दुकानें खोल दी जाती हैं।

इन सब बातों पर नजर रखने वाले अधिकतर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की रूचि दूसरे ही कामों में रहती है।

मार्केट के पार्किंग स्थल पर दुकानें रहेंगी तो ग्राहक अपने वाहन मुख्य सड़कों पर ही तो पार्क करेंगे।

 रोड जाम का वह बड़ा कारण होता है।

अस्सी के दशक में बिहार सरकार ने पटना के मजहरूल पथ पर एक होटल के नीचे पार्किंग स्थल बनवाया था।

पर, उसके बाद निहितस्वार्थियों के दबाव में आकर शासन ने अपने हाथ रोक दिए थे।

जनहित में मौजूदा शासन तंत्र यह काम एक बार फिर करे।  

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अवैध कब्जेदारों के मददगार

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भू माफिया ने पटना के दीघा स्थित सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन ‘लूट’ ली।

इस काम में उन्हें शासन के पथभ्रष्ट तत्वांे से पूरी मदद मिली।

 इसी तरह का ताजा मामला उत्तराखंड के हलद्वानी का है।

वहां रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर दशकों से अतिक्रमण होता रहा।

फिर भी तंत्र का शीर्ष नेतृत्व तक सोया रहा।

तंत्र के निचले हिस्से ने कानून तोड़कों की मदद की।कुछ नेताआंे ने भी अतिक्रमण करवाया। 

शासन के एक हिस्से ने वहां उस जमीन पर मंदिर,मस्जिद,स्कूल, अस्पताल ,मकान, बैंक आदि बनने दिए।

 पूरे देश में रेलवे की करीब आठ सौ एकड़ जमीन अवैध कब्जे में है।

अवैध कब्जे का एक शर्मनाक पक्ष है ।

 भ्रष्ट तंत्र की मदद से अवैध जमीन पर लोगबाग आसानी से आवास के अलावा मंदिर,मस्जिद,अस्पताल स्कूल बनवा लेते हैं।

साथ ही, सरकारी खर्चे पर शासन की अनुमति से  बिजली,सड़क और जालपूर्ति की भी व्यवस्था हो जाती  है।

ऐसी जमीन पर अवैध कब्जेदारों की इस तरह मदद करने वाले सरकारी तंत्र के अफसरों -कर्मचारियों की बर्खास्तगी का कानून बनाया जाना चाहिए।

जब तक ऐसा नहीं होगा,तब तक सरकारी जमीन हड़पने का काम इस देश में अनंत काल तक चलता रहेगा।   

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चुनाव का एक गणित 

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सन 2016 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में 

 कांग्रेस और सी.पी.एम. ने मिलकर तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला किया।

कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं।

पर,सी.पी.एम.को सिर्फ 26 सीटें।जबकि, सी.पी.एम.वहां कांग्रेस से बडी पार्टी मानी जाती थी।

आखिर  ऐसा क्यों हुआ ?

एक जानकार व्यक्ति ने बताया कि सी.पी.एम.के समर्थकों ने तो कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट दे दिए।

किंतु कांग्रेस के बहुत सारे समर्थकों ने सी.पी.एम. उम्मीदवारों को वोट नहीं दिए।क्योंकि वाम मोरचा के शासन काल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों के साथ वाम मोरचा का अच्छा व्यवहार नहीं था।

  ऐसा ही कुछ सन 2019 में उत्तर प्रदेश में हुआ।लोक सभा चुनाव में बसपा और सपा ने तालमेल करके चुनाव लड़ा।

सपा को सिर्फ 5 सीटें मिलीं जबकि बसपा को दस सीटें मिल गईं।

वहां भी वही कहानी थी।

सपा के शासन काल में बसपा के अनेक लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

  इसलिए अगले किसी चुनाव में आपसी तालमेल करने से पहले संबंधित दल इस बात का पता लगा लें कि उन दलों का सरजमीन पर पहले से कैसा आपसी संबंध रहा है। 

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   ़भूली -बिसरी याद

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 बात तब की है जब कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री और जगजीवन राम केंद्र में मंत्री थे।

पटना में भोजपुरी सम्मेलन हो रहा था। 

दोनों नेता मंच पर थे।

जगजीवन बाबू भोजपुरी में भी बहुत प्रभावशाली भाषण करते थे।

उनके पास भोजपुरी शब्दों का अपार खजाना था।

उन्होंने भोजपुर इलाके की बोली में मर्दागनी और मिजाज में बहादुरी  की विस्तार से चर्चा की।

 खूब तालियां बटोरीं।

साथ ही, उन्होंने बिहार की कुछ अन्य स्थानीय भाषाओं से भोजपुरी की तुलना भी कर दी थी।

खुद कर्पूरी ठाकुर मैथिली भाषी क्षेत्र से आते थे।

 मैथिली प्रेमी कर्पूरी ठाकुर को यह तुलना अच्छी नहीं लगी।

उन्होंने अपने भाषण में अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि यदि भोजपुरी लोगों में इतना ही दम खम है तो भोजपुरी भाषी ‘बाबूजी’ केंद्र की सरकार में अपना थोड़ा दम खम दिखाकर इस गरीब इलाके को उसका वाजिब हक क्यों नहीं दिलवाते ? जगजीवन राम को ‘बाबू जी’ कहा जाता था।यानी, बिहार में सरकार चला रहे कर्पूरी ठाकुर को तभी यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आर्थिक मदद के मामले में बिहार के साथ केंद्र भेदभाव करता रहा है।

इस राज्य के पिछड़ापन का यह एक बड़ा कारण रहा है।याद रहे कि तब केंद्र में भी जनता पार्टी की सरकार थी जिस दल के कर्पूरी ठाकुर थे।

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और अंत में

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भरोसेमंद सूत्रों से यह जानकारी मिली है कि बिहार के नए डी.जी.पी.भट्टी साहब पर राजनीतिक कार्यपालिका या कहीं और से उनके काम में कोई नाजायज  हस्तक्षेप नहीं है।

खुद डी.जी.पी.एक कर्तव्यनिष्ठ अफसर रहे हैं।

इस परिस्थिति में बिहार के शांतिप्रिय लोगों में यह उम्मीद बंधती है कि उन्हें अपराधियों से भयग्रस्त होने की अब कोई जरूरत नहीं है। 

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प्रभात खबर,पटना

9 जनवरी 23



     नफरती बोल की अलग-अलग परिभाषाएं

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       सुरेंद्र किशोर

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अकबरुद्दीन ओवैसी ने भड़काऊ बयान दिया था कि 

हम 25 करोड़, तुम 100 करोड़ ,15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो तो पता चल जाएगा कि कौन कितना ताकतवर है।

इसके बाद भी कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।

अगर यही अमेरिका में बोला होता तो उसे सजा दी जाती।

    ---कल्पना श्रीवास्तव,वकील

  राष्ट्रीय सहारा,पटना संस्करण

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सांसद सह बैरिस्टर असदुद्दीन ओवेसी के छोटे भाई अकबरुद्दीन का यह भाषण टी.वी.चैनलों पर तब पूरी दुनिया ने देखा-सुना था।

इसके बावजूद तेलांगना के मुख्य मंत्री के. चंद्रशेखर राव की पुलिस को कोर्ट में पेश करने के लिए अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला।

  याद रहे कि ओवैसी की पार्टी और चंद्रशेखर राव की पार्टी में गाढ़ी देास्ती है।

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चंद्र शेखर राव प्रधान मंत्री पद के गंभीर उम्मीदवार हैं।

यदि चंद्रशेखर राव प्रधान मंत्री बन गए तो जो काम ओवैसी बंधु हैदराबाद में कर रहे हैं,वह काम वे पूरे देश में करेंगे।

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वैसे भी सिर्फ चंद्रशेखर राव को दोष क्यों दिया जाए ?

मुस्लिम वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर राष्ट्रद्रोहियों की मदद करने वाले इस देश के किसी भी तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल ने अकबरुद्दीन की उस साम्प्रदायिक धमकी की निन्दा नहीं की थी।किसी ने की थी तो बताइए।मैं खुद को सुधार लूंगा।बात -बात में जहर उगलने वाले सिनियर 

ओवैसी से पत्रकारों ने जब -जब उनके अनुज की करतूत के बारे में पूछा तो बैरिस्टर साहब ने कहा कि मामला कोर्ट में है।वे जानते थे कि कोर्ट में कुछ होने वाला नहीं है।  

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कांग्रेस के राहुल गांधी के कथित ‘‘नफरती बोल’’ के दायरे में अकबरुद्दीन का कुबोल कभी शामिल नहीं रहा है।

  सिर्फ प्रज्ञा सिंह ठाकुर का कुबोल राहुल गांधी के लिए नफरती बोल है।

अकबरुद्दीन के बोल राहुल के लिए मुहब्बत के बोल हैं।

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याद रहे कि अकबरुद्दीन अन्य अवसरों पर भी जन सभाओं में हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं।

सेक्युलर दलों के ऐसे ही दोहरे मापदंड का चुनावी लाभ भाजपा को मिलता रहा है।

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न्यायसंगत बात तो यह है कि भोपाल से भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अकबरुद्दीन की समान रूप से आलोचना की जानी चाहिए।

दोनों को अदालतांे से यथासंभव कठोर सजा दिलवाई जानी चाहिए।पता नही,ं इस देश में इस तरह की संतुलित कार्रवाई 

कब होगी !!

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10 जनवरी 23