सोमवार, 6 मार्च 2023

 सारण जिले, खास कर दिघवारा और

आसपास के इलाकों के लिए दैनिक 

भास्कर ने दी है विशेष खुश खबरी

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सुरेंद्र किशोर

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शेरपुर -दिघवारा सिक्स लेन ब्रिज निर्माण का खुला टेंडर

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पटना के शेरपुर और सारण जिले के दिघवारा के बीच सिक्स 

लेन ब्रिज के निर्माण के लिए एजेंसी अगले सात दिन में तय हो जाएगी। 

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इस मेगा ब्रिज के ढाई-तीन साल में बन कर तैयार हो जाने की उम्मीद की जा रही है।

हालांकि तय समय पर कोई ब्रिज इस देश में शायद ही बन पाता है।

बिल्डर्स-डेवलपर्स सूत्रों के अनुसार इस पुल के निर्माण का काम शुरू होते ही सारण जिले के दिघवारा और आसपास के इलाकांे में निर्माण-विकास की गतिविधियां शुरू हो जाने की उम्मीद है।उससे पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा।वह इलाका न्यू पटना बनेगा।

हां,विकास -निर्माण की गतिविधियां इस बात पर भी निर्भर करंेगीं कि तब तक उस इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति कैसी रहती है।

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‘‘डबल इंजन की सरकार -व्यवस्था’’ पर व्यवधान आ जाने के बावजूद इस मेगा पुल निर्माण योजना पर फिलहाल कोई विपरीत असर पड़ता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

क्योंकि मुख्य मंत्री नीतीश कुमार पिछड़े जिले सारण को विकसित करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं।

दूसरी ओर, सारण से भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूढी भी इस पुल के मामले में विशेष सक्रिय रहे हैं।

उम्मीद है कि आगे भी व्यापक जनहित में ऐसा ही आपसी सहयोग कायम रहेगा।

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5 मार्च 23 

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पुनश्चः

इसमें मेरी इतनी अधिक दिलचस्पी का कारण बता दूं।

सारण जिला मेरा पुश्तैनी जिला है।

दिघवारा में मेरी स्कूलिंग हुई है।

 दरियापुर अंचल स्थित मेरे गांव भरहापुर(मटिहान पंचायत) में सन 2009 में ही बिजली पहुंच सकी।

दिघवारा-भेल्दी ग्रामीण सड़क को ,जो मेरे गांव की ओर जाती है,मेरे ही आग्रह पर नीतीश कुमार ने स्टेट हाईवे में परिणत किया।यह हाईवे भेल्दी से आगे भी जाता है।

अब मेरी इच्छा है कि अपने जीवन काल में ही मैं शेरपुर-दिघवारा ब्रिज पर सवार होकर पटना से गांव जाऊं।

  पता नहीं,यह इच्छा पूरी हो पाएगी या नहीं।

आज भी अपने गांव से मेरा जीवंत संपर्क है।

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5 मार्च 23


 पैसे की भूख ने भ्रष्टाचार को कैंसर 

की तरह पनपने में मदद की है।

         ---सुप्रीम कोर्ट

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 इस कैंसर को खत्म करने का एक बड़ा

 उपाय खुद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निकलेगा

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सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पैसे की भूख ने भ्रष्टाचार को कैंसर 

की तरह पनपने में मदद की है।

अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के तहत स्थापित अदालतों 

का देश के लोगों के प्रति कर्तव्य है कि वे दिखाएं कि भ्रष्टाचार 

को कत्तई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जस्टिस एस.रवीन्द्र भट्ट और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने 

यह बात कही है।

अदालत ने यह भी कहा है कि भ्रष्टाचार प्रगति में बाधक है।

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अदालत ने बहुत अच्छी बात कही है।

पर भ्रष्टाचार के कारण एक अन्य बुराई की ओर संभवतः 

अदालत का ध्यान नहीं है।वह यह है कि भ्रष्टाचार के 

कारण भी इस देश में राष्ट्र विरोधी शक्तियां दिन प्रति दिन 

मजबूत होती जा रही हैं।

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इस कैंसर सदृश्य भ्रष्टाचार को कम करने,रोकने या फिर खत्म 

करने में हमारी सबसे बड़ी अदालत बड़ी भूमिका निभा सकती है।

1.-सुप्रीम कोर्ट अपने 22 मई 2010 के फैसले पर पुनर्विचार करे।

   साथ ही, उसे बदल दे।

  उस फैसले में कहा गया है कि आरोपी की सहमति के बिना 

किसी पर नार्को,पाॅलि ग्राफिक और ब्रेन मैपिंग टेस्ट नहीं हो सकता।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

2.-साथ ही, सुप्रीम कोर्ट यह भी निर्णय करे कि ऐसे टेस्ट के नतीजे अदालतों में मान्य होंगे।

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यदि सचमुच सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार को कैंसर मानता है तो वह ये

 दो काम करके देखे।

काफी फर्क पड़ेगा।

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4 मार्च 23

 


शनिवार, 4 मार्च 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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सावधानियां बरती जाएं तो महा गठबंधन का ही भारी रहेगा पलड़ा

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बिहार में राजग की अपेक्षा, महा गठबंधन का पलड़ा फिलहाल भारी नजर आ रहा है।

सन 2024 के लोक सभा चुनाव तक भी भारी ही रहने की उम्मीद है बशत्र्ते महा गठबंधन के नेताओं और बिहार सरकार की ओर से कुछ सवधानियां बरती जाएं।

इसे आप कुछ लोगों की ‘धारणा’ कहें या हकीकत ,किंतु यह सच है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत आज सही नहीं है।

  साथ ही, महा गठबंधन के कुछ नेतागण रामचरित मानस और भारतीय सेना पर सवाल उठा कर भाजपा को जाने-अनजाने मजबूत बना रहे हैं।

 गत साल जून में उत्तर प्रदेश के आजम गढ़ और राम पुर में लोक सभा के उप चुनाव हुए थे।

 मुसलमान-यादव बहुल दोनों क्षेत्र समाजवादी पार्टी के गढ़ माने जाते थे।

पर, उप चुनाव में दोनों सीटों पर भाजपा जीत गई।

क्योंकि सन 2017 में सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति को काफी हद तक सुधार दिया।

  बिहार में भी नीतीश कुमार के प्रारंभिक शासन काल में कानून -व्यवस्था की स्थिति काफी अच्छी थी।हालांकि तब न तो बिहार में कहीं बुलडोजर चला था और न ही पुलिस की गाड़ियां पलटी थीं।

नतीजतन सन 2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में राजग को भारी बहुमत मिल गया था।

यदि आज भी बिहार में कानून -व्यवस्था की स्थिति सन 2005-10 जैसी बना दी  जाए तो इस राज्य में सचमुच राजग को कोई खास चुनावी सफलता नहीं मिलेगी।

हां, अब बिहार में जहां बुलडोजर चलाने की जरूरत हो, तो अनेक लोग यह चाहते हैं कि वह भी चलना ही चाहिए।

पर, क्या ऐसा हो पाएगा ?

यह तो महा गठबंधन के नेताओं की इच्छा शक्ति पर निर्भर करेगा।  

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कहां खो गया लोहिया नगर

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लोहियावादियों के राज में लोहिया नगर कहीं खो गया।

सन 1967 में पटना के दक्षिणी हिस्से में लोहिया नगर बसाया गया था।

लोहिया नगर करीब नौ सौ एकड़ में फैला हुआ था।

केंद्र सरकार ने वहां जो पोस्ट आॅफिस स्थापित किया,उसके बोर्ड पर भी लोहिया नगर लिखा हुआ है।

 डा.राम मनोहर लोहिया की मूर्ति उसी मुहल्ले में लगाई गई।

पर, पुलिस थाने के साइनबोर्ड पर उस मुहल्ले का

नाम कंकड़बाग लिखा हुआ है।

कंकड़बाग उस इलाके का पुराना नाम है।

इन पंक्तियों का लेखक करीब 20 साल तक लोहिया नगर में रहा था।

उन दिनों लोगबाग उसे लोहिया नगर ही कहते थे।

पर, अब सब कंकड़बाग कहते हैं। अच्छी-बुरी घटना लोहिया नगर में घटती है तो  अखबारों में उसका विवरण कंकड़बाग के नाम से छपता है।क्योंकि पुलिस और सार्वजनिक कार्यकर्ता कंकड़बाग ही मीडिया को बताते हैं। 

 यदि लोहिया नगर के प्रवेश और निकास द्वारों पर लोहिया नगर नाम के बड़े-बड़े बोर्ड लग जाएं तो नई पीढ़ी भी जान पाएगी कि लोहिया नाम के एक स्वतंत्रता सेनानी हुआ करते थे जिन्हें बिहार बहुत पसंद था।

डा.लोहिया ने सन 1966-67 में जो गैर कांगे्रसवाद चलाया,उसको सबसे अधिक समर्थन तब के बिहार से ही मिला था।

सन 1990 से आज तक उन लोगों की ही बिहार में सरकार रही है जो लोहिया का नाम लेते हैं।फिर भी लोहियानगर गुम हो गया ! आश्चर्य है।  

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 भूली-बिसरी यादें

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   डा.बी.आर.आम्बेडकर ने सन 1937 में कहा था कि इस देश के मंत्रियों को पर्याप्त वेतन मिलना चाहिए।क्योंकि तभी प्रतिभाएं इस पद के लिए सामने आएंगी।

  आम्बेडकर ने यह बात बम्बई विधान सभा में कही थी। वे बम्बई विधान सभा के सदस्य थे।

  यह हमेशा ही विवादास्पद मुद्दा रहा है कि इस गरीब देश में मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए कितना वेतन तय किया जाना चाहिए।

याद रहे कि विधायक और सांसद ही अपने तथा मंत्रियों के लिए वेतन -भत्ता का निर्धारण करते हैं।

विधायिका में पेश तत्संबंधी विधेयक के जरिए यह तय होता है।

    इस विषय में एक पक्ष यह कहता है कि भारत के आम लोगों की औसत आय के अनुपात में ही जन प्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते भी तय होने चाहिए।दूसरा पक्ष यह कहता है कि काम और पद की जरूरतों के अनुसार वेतन तय होने चाहिए।

वैसे आज की स्थिति में न्यायसंगत बात यही होगी कि दोनों के बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए।

यानी, काम और पद की जरूरतों पर ध्यान रखा जाए।साथ ही, सरकार की आय को भी ध्यान में रखा जाए।

हां,मंत्रियों,सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते तय करने का काम विधायिका न करके कोई विश्वसनीय सरकारी संस्थान करे तो उससे जन प्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

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और अंत में

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अनुभवी लोग बताते हैं कि भूख से थोड़ा कम ही भोजन करना चाहिए।

लेकिन अपने यहां समय -समय पर अति भोजन की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है।

  गत महीने अधिकाधिक मछली खाने की प्रतियोगिता कराई गई।

एक साथ तीन किलोग्राम मछली खाने में सफल हुए मदन कुमार को 10 हजार रुपए का इनाम मिला।

इसी तरह कभी आम खाने की प्रतियोगिता होती है तो कभी दही खाने की।

इनाम के लोभ में कई लोग अधिक खाने का अभ्यास करते रहते हैं।

 क्या कभी इस बात का सर्वेक्षण हुआ है कि अति भोजन का उनका शारीरिक स्वास्थ्य पर कैसा असर पड़ता है ?

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शुक्रवार, 3 मार्च 2023

           कोई सुप्रीम कोर्ट की सुने तब तो !

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      कोई न सुने तो सुप्रीम कोर्ट अब खुद पहल करे

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                   सुरेंद्र किशोर

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   भ्रष्टाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सन 2003 के नवंबर में बड़ी 

पीड़ा के साथ कहा था कि 

‘‘इस देश में भ्रष्टाचार विरोधी कानून विफल साबित हो रहा है।’’

  भारत की सर्वोच्च अदालत ने ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री राॅबर्ट वालपोल(1676-1745) की पंक्तियां दुहराते हुए तब यह भी कहा था कि

 ‘‘हर व्यक्ति बिकाऊ है, इसे भले ही हर व्यक्ति पर लागू नहीं किया जा सकता।

लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह सच्चाई से बहुत अधिक दूर भी नहीं है।’’

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सन 2003 से पहले और बाद में भी न जाने कितनी बार सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह की राय व्यक्त की है।

पर, कोई सुपीम कोर्ट की सुने तब तो !!!

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2 मार्च 23

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पुनश्चः

  गत 24 फरवरी, 23 को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 

‘‘आम आदमी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है।

हर स्तर पर जवाबदेही तय करने की जरूरत है।’’

अदालत ने यह भी कहा कि 

‘‘किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएं तो आप बिना डरे बाहर नहीं आएंगे।’’

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चीजें इतनी बिगड़ चुकी हैं कि चुनाव लड़ने वाला कोई भी सत्ताधारी दल अब ऐसी स्थिति पैदा नहीं कर सकता जिसके तहत आम आदमी बिना डरे या बिना अपमानित हुए या बिना रिश्वत दिए सरकारी आॅफिस से बाहर निकल सके।

हां,खुद सुप्रीम कोर्ट यह काम जरूर कर सकता है।

किस अधिकार से ?

मैं बताता हूं।

संविधान निर्माता दूरदर्शी थे।

इसीलिए उन लोगों ने अनुच्छेद-142 में अद्भुत प्रावधान किया।

वे जानते थे कि एक दिन हमारे यहां के अनेक लोग ऐसे बिगड़ैल बन जाएंगे कि मौजूदा संवैधानिक -कानूनी प्रावधानों के जरिए वे काबू में नहीं आ पाएंगे।

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संविधान के अनुच्छेद-142 में प्रदत्त विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए ही सुप्रीम कोर्ट ने सन 2019 में बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि का मामला सलटा दिया।

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   अनुच्छेद-142 में कहा गया है कि ‘‘उच्चत्तम न्यायालय अपनी अधिकारिता(जूरिडिक्शन) का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश कर सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो और इस प्रकार पारित डिक्री या किया गया आदेश भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र ऐसी रीति से ,जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाए,और जब तक इस निमित इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक,ऐसी रीति से जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा विहित करे, प्रवर्तनीय होगी।’’

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यदि सुप्रीम कोर्ट जल्द ऐसा कुछ नहीं करेगा तो इस देश की तरह -तरह की लालची शक्तियां एक बार फिर इस देश को 

बेच कर खा सकती हैं।

 जिस तरह मध्य युग में और ब्रिटिश काल में आक्रांताओं ने हमारे देश के 

लालची,सत्तालोलुप और फूटपरस्त लोगों का इस्तेमाल करके इस देश को लंबे समय तक गुलाम बना लिया था।

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2 मार्च 23


बुधवार, 1 मार्च 2023

 


कर्पूरी ठाकुर की याद में 

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सुरेंद्र किशोर

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यह 1972-73 की बात है। 

तब कर्पूरी ठाकुर सत्ता में नहीं थे।

फिर भी राज्य के नौजवान उनके पास नौकरी के लिए आते थे।

उन प्रत्याशियों से अक्सर कर्पूरी जी एक बात कहते थे।

मैं आपको नौकरी दिलवाने की गारंटी देता हूं।

पर, मेरी एक शत्र्त हैं।

आप शाॅर्टहैंड और टाइपिंग में पारंगत होकर आ जाइए।

वे कह कर तो जाते थे कि ‘‘जरूर सीख लूंगा।’’

पर, कोई लौटकर नहीं आता था।

क्योंकि उसे सीखने में मेहनत लगती है।

 अनेक मामलों में आज भी यही स्थिति है।

कौशल विकास में रूचि बहुत कम है।

पर, नौकरी चाहिए।

(आज टी.वी.,फ्रीज,मोबाइल,सी.सी.टी.वी.कैमरा आदि मरम्मत करने वालों की कमी है।)

  हर जगह शुद्ध-शुद्ध हिन्दी और अंग्रेजी लिखने वालों की भी कमी होती जा रही है।

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17 फरवरी 23 

  


 


     राजदेव सिंह जैसे अच्छे अफसरों के कारण ही 

     50 के दशक में बिहार में सबसे कम अपराध होते थे

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       --सुरेंद्र किशोर--

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 देश के अन्य राज्यों मंे हुई आपराधिक 

घटनाओं का तुलनात्मक विवरण देते हुए 15 मार्च, 1956 को 

बिहार के तत्कालीन राजस्व मंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय ने 

बिहार विधान सभा में कहा था कि सबसे कम आपराधिक घटनाएं बिहार में हुई हैं।

वे पुलिस बजट पेश कर रहे थे।

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यह जानना प्रासंगिक होगा कि तब कैसे-कैसे अफसर हुआ करते थे

जिन पर कानून-व्यवस्था की जवाबदेही होती थी।

 अब मैं उन दिनों के एक आई.पी.एस.अफसर की कहानी सुनाता हूं।

बिहार काॅडर के आई.पी.एस.अफसर राजदेव सिंह 30 जून 1979 से 24 जनवरी, 1980 तक सी.बी.आई.के निदेशक रहे।

मोरारजी देसाई के प्रधान मंत्रित्व काल में वे निदेशक बने।इंदिरा गांधी ने सत्ता में आते ही उन्हें हटा दिया।

याद रहे कि इंदिरा जी को ऐसे अफसर पसंद नहीं थे।

राजदेव बाबू सारण जिला स्थित मेरे पुश्तैनी गांव से 2 किलोमीटर दूर स्थित गांव मठिया के मूल निवासी थे।जीवन भर ईमानदार बने रहे।

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उनके पड़ोसी राघव प्रसाद सिंह, राजदेव बाबू के मित्र थे।

राघव बाबू दिघवारा से बिहार के सबसे बड़े अखबार ‘आर्यावर्त’ के संवाददाता भी थे। 

कई दशक पहले राघव बाबू के यहां उनके नाम मैंने राजदेव बाबू की एक चिट्ठी देखी थी।

बड़े पद पर पहुंचने के बावजूद राजदेव बाबू को राघव बाबू जैसे मित्रों से किसी जरूरी काम से कभी- कभी कर्ज लेना पड़ता था।

अंतर्देशीय पत्र में राजदेव बाबू ने राघव बाबू  को लिखा था कि मुझे सरकार से पैसा मिलने ही वाला है। मिल जाएगा तो मैं आपको कर्ज लौटा दूंगा।

अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर दरअसल उस जमाने के 

अधिकतर आई.ए.एस.और आई.पी.एस.अफसर ऐसे ही होते थे।

धीरे -धीरे स्थिति बिगडती चली गई।इसके लिए लगभग

सभी पक्ष जिम्मेदार रहे।एक अमेरिकन प्रोफेसर ने

कुछ दशक पहले अपनी किताब में विस्तार से लिखा कि भारत में किस तरह भ्रष्टाचार नेताओं ने ऊपर से नीचे की ओर फैलाया।

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राजदेव बाबू अपने छात्र जीवन में टाॅपर रहे।

हमारे इलाके के गार्जियन अपने लड़कांे से कहा करते थे के राजदेव की तरह बनो।

मैं तो राजदेव बाबू से कभी मिल न सका था,पर,उनके बारे में बचपन से ही अच्छी-अच्छी बातें सुनता रहता था।

दरअसल वे किंवदंति बन चुके थे।

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एक बार मैंने इंडियन एक्सपे्रस के बिहार संवाददाता के. कृपाकरण से उनकी चर्चा की तो उन्होंने कहा कि राजदेव बाबू बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलते थे।

याद रहे कि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे।

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यानी, ऐसे -ऐसे अफसरों के बल पर ही तब बिहार में सुशासन था।

सुना है कि अंग्रेजों के जमाने में डी.एस.पी.और उससे ऊपर के पुलिस अफसर रिश्वत नहीं लेते थे।

आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक भी लगभग वैसा ही रहा।

पर, उसके बाद तो समय बीतने के साथ क्या-क्या नहीं होने लगा !!!

आज क्या -क्या होता रहा है,उसे यहां दुहराने की जरूरत नहीं।

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1 मार्च 23  


 एक किसान परिवार के एक बौद्धिक 

परिवार में बदलने की कहानी

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सुरेंद्र किशोर

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हाल ही में मेरे मित्र उपेंद्र जी(उपेंद्र नारायण सिन्हा,सेवानिवृत उत्पाद अधीक्षक ,झारखंड)

ने मुझे फोन पर बताया कि ‘‘आपका भतीजा कामेश्वर तो झारखंड का बड़ा कवि हो गया है।

किसी कवि सम्मेलन में सबसे अंत में उसका काव्य पाठ होता है।’’

सुनकर खुशी हुई।

कामेश्वर पटना में

मेरे ही साथ रह कर पढ़ा था।

 अब झारखंड पुलिस सेवा से रिटायर होकर रांची में बस गया।

मेरे एक अन्य भतीजे सौरभ कुमार सिंह का हाल ही अपने टी.वी.चैनल पर एक खास विषय पर राजदीप सरदेसाई इंटरव्यू ले रहे थे।मुझे वह दृश्य देखकर गर्व हुआ।

वह भी रांची में ही रहता है।उसके पिता यानी मेरे छोटे भाई नागेंद्र का गत साल निधन हुआ।वह अंग्रेजी की हर नई किताब पढ़ लेता था।अमरीकी कंपनी में कार्यरत उसका पुत्र सुमन उसे किताब उपलब्ध कराता रहता था। 

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  मैं अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट हूं।

मेरा परिवार किसान परिवार रहा है।

एक भतीजा अरूण अब गांव में रह कर खेती-बारी देखता है।बाकी पूरा परिवार बौद्धिक क्षेत्र में है।किसी की लघु कथा (मेरी पैरवी के बिना ही) हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबार में छपती है तो परिवार का  एक अन्य सदस्य अंग्रेजी में तीन पुस्तकों का सह लेखक है।एक सदस्य को जेपी सेनानी की पेंशन मिल रही है।

मैं जो हूं, वह तो आप देख ही रहे हैं।

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गांव में जब मैं रहता था तो मेरे घर में रामचरित मानस,आल्हा और शुकसागर के अलावा कोई पुस्तक नहीं थी।

मेरे गांव में उन दिनांे अखबार जाने का कोई सवाल ही नहीं था।

कोर्स की किताबों के अलावा कुछ पढ़ने के लिए मैं तरस जाता था।

गर्मी के दिनों में अपने दालान में शाम खाट पर लेटकर आकाश निहार कर समय काटता था।

सोचा था कि जब कुछ पैसे होंगे तो एक अपना पुस्तकालय बनाऊंगा।

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आज मेरे पास जो पुस्तकालय है, उसे डा.नामवर सिंह और प्रभाष जोशी ने देखा था।

जोशी जीे ने कहा कि ‘‘मेरी जानकारी के अनुसार ऐसा निजी पुस्तकालय देश के किसी अन्य पत्रकार के पास नहीं है।’’नामवर जी ने कहा कि ‘‘सुरेंद्र जी,आपने हीरा सहेज कर रखा है।’’

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इतना सब मैंने यहां इसलिए लिखा ताकि यह बता सकूं कि यदि इच्छा -शक्ति हो तो एक समान्य किसान परिवार से निकली पहली पीढ़ी भी एक बौद्धिक मुकाम पा सकती है।

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18 फरवरी 23