गुरुवार, 20 जुलाई 2023

    2024 लोक सभा चुनाव का महत्व

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वैसे तो हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है।

पर,अगला लोस चुनाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा।

पहले के चुनाव मुख्यतः लोगों के जीवन को प्रभावित करते रहे।

सन 2024 का लोक सभा नतीजा इस देश के जीवन को प्रभावित करेगा।

अब इस मुद्दे पर इससे अधिक लिखना अभी ठीक नहीं होगा।

इस पोस्ट के महत्व का पता सन 2025 में चल जाएगा।

            -- सुरेंद्र किशोर

           20 जुलाई 23


  देश में जातीय जन गणना का संकल्प,

 यानी, नवगठित ‘इंडिया’ की सकारात्मक पहल

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सुरेंद्र किशोर

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नव गठित ‘‘इंडिया’’ ने अपने ‘बंगलुरू संकल्प’ में कहा है कि हम जातीय जन गणना कराएंगे और अल्पसंख्यकांें के खिलाफ घृणा के माहौल का मुकाबला करेंगे।

  सवाल है कि सिर्फ जातीय जन गणना करांएगे या उसे प्रकाशित भी करेंगे ?

मनमोहन सिंह सरकार ने तो सन 2011 में जातीय जन गणना भी करवाई थी ,किंतु लगातार मांग के बावजूद उसे कभी प्रकाशित नहीं किया।

खैर,संभवतः ‘‘इंडिया’’ पर नीतीश कुमार-लालू प्रसाद जैसे नेताओं के प्रभाव के कारण ही यह नया दलीय गठबंधन, जातीय जन गणना को तैयार हुआ है।

इससे आरक्षण के दायरे में आने वाले सामाजिक समूह के वोट को कुछ और प्रभावित करने का ‘‘इंडिया’’ को अवसर मिल सकता है।

याद रहे कि बाफोर्स घोटालेबाजों बेशर्म के बचाव और मंडल आरक्षण पर ढुलमुल रवैऐ के कारण ही कांग्रेस के पतन की शुरूआत हुई थी।

उसके बाद कांग्रेस को कभी पूर्ण बहुमत लोक सभा में नहीं मिला।

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पर,‘‘इंडिया’’ के संकल्प में स्वाभाविक रूप से देश की दो भीषण समस्याओं की

कोई चर्चा नहीं है,गंभीर चर्चा कौन कहे।

इसलिए नहीं है क्योंकि अधिकतर तथाकथित सेक्युलर दलों का उसमें निहित स्वार्थ है। 

1.-सन 2047 तक हथियारों के बल पर भारत को इस्लामिक देश बना देने के पी.एफ.आई.के संकल्प की कोई चर्चा नवगठित ‘इंडिया’के संकल्प में नहीं है तो लोग सवाल पूछेंगे कि क्यों नहीं है ?

याद रहे कि सन 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पूरे देश में बाहरी-भीतरी तत्व लगातार भारी हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं।

बड़ी संख्या में उनके स्लीपर सेल सक्रिय हैं।ये सब बातें मीडिया में लगातार आती रहती हैं।

 किंतु इस देश का दुर्भाग्य है कि ‘‘60 प्रतिशत वोट कंट्रोंल करने’’ का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के लिए यह कोई समस्या ही नहीं है।

बल्कि उनके लिए तो वह वोट की संपत्ति है।ऐसा अभागा देश दुनिया में और कोई भी नहीं है।

2.-भीषण भ्रष्टाचार से ‘‘इंडिया’’ वाले कैसे निपटेंगे,इसकी भी चर्चा नहीं है।

इस पर किसी ने ठीक ही कहा

 है कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या ?

स्वाभाविक ही है कि भ्रष्टाचार व जेहाद पीड़ित देशवासियों से दोस्ती करने का कोई इरादा ‘‘इंडिया’’ के पास नहीं है।

बड़ी संख्या में घुसपैठियों और जबरन धर्म परिवर्तन

के कारण देश के जिले के जिले और गांव के गांव एक -एक करके हिन्दू बहुल से मुस्लिम बहुल होते जा रहे हैं।बंगाल व केरल की सबेस खराब स्थिति है।

इसके बावजूद ‘‘इंडिया’’ का संकल्प है कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और घृणा अभियान का मुकाबला करेगा।

मानो हिंसा और घृणा का लक्ष्य एक ही ओर है।

करना ही है तो दोनों तरफ की हिंसा व घृणा का मुकाबला करो।उससे भाजपा कमजोर होगी।

किंतु ‘‘इंडिया’’में शामिल दलों के इस पर लगातार एकतरफा रवैये,खास कर चुप्पी या समर्थन से भाजपा मजबूत होती जा रही है और आगे भी होगी।उसके मजबूत होते जाने का लक्षण यह है कि अधिकतर दल बदल का लाभ भाजपा को ही मिल रहा है।मौसमी पक्षी यानी दल बदलू हवा का रुख अच्छी तरह पहचानते हैं।

सन 2014 के लोक सभा चुनाव में कंांग्रेस की भारी हार के बाद ए.के. एंटोनी कमेटी ने पार्टी से कहा था कि जनता को लगा कि कांग्रेस, अल्पसंख्यकों की ओर झुकी हुई है,इसलिए हम चुनाव हारे।

पर,कांग्रेस नेतृत्व ने अपना रवैया अब भी नहीं बदला।अब तो उसका इस मामले में और भी बुरा हाल है।ऐसा न हो कि उसका खामियाजा ‘‘इंडिया’’ में शामिल अन्य दों को भी भुगतना पड़े।सामाजिक समीकरण ही यदि सब कुछ होता तो गत साल आजम गढ़ व रामपुर लोक सभा उप चुनाव सपा नहीं हारती। 

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 हिंसंा और जेहाद की सबसे बड़ी ताकत पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई.के समर्थक मतदाताओं की मदद से हीे तो कांग्रेस ने हाल में कर्नाटका विधान सभा चुनाव जीता है।

उस उपकार का बदला देना ही होगा अन्यथा आगे के चुनावों में ‘‘इंडिया’’ को दिक्कत होगी।

उधर इंडिया से जुड़ी ममता बनर्जी और उनकी सरकार की मदद से रोज ही सैकड़ों बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए इस देश में नाजायज तरीके से प्रवेश कर पूरे देश में फैल रहे हैं जिनमें से अनेक जेहाद के लश्कर भी बन रहे हैं।

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दरअसल लगता है कि इन दो क्षेत्रों को यानी भ्रष्टाचार व जेहाद को‘‘इंडिया’’ ने जाने-अनजाने ‘‘भारत’’ यानी भारतीय जनता पार्टी के लिए खुला छोड़ दिया है।

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20 जुलाई 23     


बुधवार, 19 जुलाई 2023

 यह तो सुप्रीम कोर्ट पर ही निर्भर करेगा कि मानहानि केस को लेकर वह राहुल गांधी के मामले में क्या फैसला करता है।

उसका जो भी निर्णय होगा,सबको मानना ही पड़ेगा।

पर,कैसे निर्णय का चुनावी राजनीति पर कैसा असर पड़ेगा,इसका अनुमान तो हम लगा ही सकते हैं।

यानी, दोषमुक्त होने पर अगला चुनाव ‘‘मोदी बनाम राहुल’’ हो सकता है,यदि प्रधान मंत्री पद के लिए कोई उम्मीदवार ‘‘इंडिया’’इस बीच घोषित न करे।

तब अनेक द्विविधाग्रस्त मतदाताओं को निर्णय करने में आसानी हो जाएगी।

कैसे आसानी होगी,यह समझने के लिए दिमाग पर बहुत जोर डालने की जरूरत नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

जुलाई 23

  

 


  आश्चर्य नहीं कि एक राजनीतिक गठबंधन का नाम 

  इस देश के नाम पर करने का तय हुआ

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कांग्रेस में आज भी जारी है (देवकांत)‘‘बरुआ-गिरी’’

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       --सुरेंद्र किशोर--

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सन 1976 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरूआ ने नारा गढ़ा था-

‘‘इंदिरा ही इंडिया है और इंडिया ही इंदिरा ।’’

उसके बाद बरुआ जी का नाम चापलूसी का पर्यायवाची बन गया--यानी बरुआ-गिरी।

तब देश में आपातकाल के काले दिन थे।

    मौजूदा कांग्रेस ने तो एक गठबंधन का ही नाम इंडिया रखा है।

आपातकाल में तो एक व्यक्ति को देश का पर्यायवाची बना दिया गया था।उससे पहले बांग्ला देश युद्ध के तत्काल बाद दक्षिण भारत के एक कांग्रेसी सांसद ने (गलती से मीडिया ने इसका ‘श्रेय’ अटल बिहारी वाजपेयी को दे दिया था।)संसद में इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था।

क्या किसी पुरुष प्रधान मंत्री के कार्यकाल में देश युद्ध जीतेगा तो उस प्रधान मंत्री को राम,कृष्ण या शिव कहा जाएगा ?

ऐसे चापलूसों से भरी कांग्रेस पार्टी को सन 1977 के लोक सभा चुनाव में जनता ने सत्ता से बेदखल कर दिया।

  पता नहीं,सन 2024 के चुनाव में क्या होगा ?

दरअसल नेहरू-गांधी परिवार की पुरानी प्रवृति रही है कि अपने परिवार को ही देश मान लिया जाए।

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1972 में डी.के. बरुआ बिहार के राज्यपाल थे।

एक दिन मैं कर्पूरी ठाकुर के साथ राज भवन गया। 

कर्पूरी जी तो राज्यपाल से मिलने ऊपरी मंजिल पर चले गये।मैं नीचे प्रतीक्षा करने लगा।काफी देर के बाद कर्पूरी जी लौटे।

वे मिलकर अभिभूत थे।

बोले कि बरुआ साहब नेता के साथ- साथ बहुत बड़े बुद्धिजीवी भी हैं।

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बाद के वर्षों में पद पाने व बनाए रखने के लिए बड़़े -बड़े बुद्धिजीवियों को सत्ताधारी नेताओं की चापलूसी करते मैंने देखा है।

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पर,ऐसे लोग कई शीर्ष नेताओं को अंततः डूबो देते हैं।उनके डूबने के बाद वे खुद अपना ‘‘दरबार’’ बदल लेते हैं।

इंदिरा जी के जीवन काल में एक बार एक ने लिखा था कि इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में एक ही पुरुष हैं और बाकी सब महिलाएं हैं।

आज भी कांग्रेस की हालत कोई भिन्न नहीं है।

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मेरे फेसबुक वाॅल से

19 जुलाई 23


शनिवार, 15 जुलाई 2023

 डा.लोहिया की जाति नीति पर रघु ठाकुर संपादित 

पुस्तक ‘जाति प्रथा’ का 16 जुलाई को पटना में लोकार्पण

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उस ‘जाति नीति’ को सही ढंग से समझने के लिए 

रघु ठाकुर संपादित पुस्तक श्रेष्ठ माध्यम

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1962 में ही डा.राममनोहर लोहिया ने यह कह दिया था कि 

औरतों को ऊंची जातियों में नहीं गिनना चाहिए।

यानी, डा.लोहिया ऊंची जातियों की औरतों को भी पिछड़ा ही मानते थे और उनके लिए भी विशेष अवसर का प्रावधान चाहते थे।

  याद रहे कि डा.लोहिया ने विशेष अवसर का नारा दिया था।

वे कहते थे--‘‘पिछड़े पावें सौ में साठ।’’

उन्हीं के सिद्धांत को मानते हुए सन 1978 में तब के बिहार के मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था।

उसमें हर जाति की महिलाओं के लिए 3 प्रतिशत स्थान दिया गया था। 

 पर, सवर्णों की महिलाओं के लिए भी विशेष अवसर देने के हिमायती डा.लोहिया के बारे में कुछ लोगों ने यह बात फैलाई कि वे सवर्णों के खिलाफ थे।

हालांकि वह कुप्रचार बहुत चला नहीं।

यह संयोग नहीं था कि बारी -बारीे से लोहिया के जितने भी निजी सचिव रहे,लगभग सभी ब्राह्मण थे।

रघु ठाकुर ने राममनोहर लोहिया पर जिस पुस्तक को संपादित किया है,उससे डा.लोहिया के बारे में इस मुद्दे पर हुए कुप्रचार का खंडन होता है।

  इस पुस्तक में एक अध्याय है जिसका शीर्षक है--‘‘विशेष अवसर क्यों ?’’

उसमें इस संबंध में लोहिया के भाषण को प्रकाशित किया गया है।

उसमें डा.लोहिया साफ-साफ कहते हैं कि 

‘‘नीति के अनुसार औरतों को ऊंची जातियों में नहीं गिनना चाहिए।’’

प्रख्यात गांधीवादी ,समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर देश में समता मूलक समाज की संरचना के लिए समर्पित हैं।

ठाकुर जी ने डा.लोहिया के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात किया है।

इसलिए स्वाभाविक है कि रघु ठाकुर संपादित पुस्तक पर पूरा भरोसा 

किया जाएगा।

मैं दशकों से रघु ठाकुर को जानता हूं।मैंने कभी उन्हें अपने विचारों से डिगते हुए न देखा और न सुना।

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14 जुलाई 23

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नोट-पुस्तक ‘‘जाति प्रथा’’ का लोकार्पण पटना के बोरिंग रोड स्थित गोल्डन फ्लेवर बेंक्वेट हाॅल में 16 जुलाई को पूर्वान्ह 11 बजे आयोजित समारोह में होगा।

प्रतीक्षा में --विश्वजीत दीपांकर

मो.-8603106371

  6299924250

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शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

 


  कायम हैं आपातकाल वाली प्रवृतियां 

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     सुरेंद्र किशोर

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 आज भी अनेक नेता यह चाहते हैं कि उन 

 कानूनों को नरम कर दिया जाए,जो उनके आड़े आ रहे हैं।  

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     जिन इंदिरा गांधी ने 1975-77 के दौरान देश पर आपातकाल थोपा था,वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं ,बल्कि राजनीति की एक खास प्रवृति का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।

चूंकि राजनीति के बड़े हिस्से में वह प्रवृति आज भी जीवित है,इसीलिए लोगों को वैसी प्रवृति से आगाह किया जाना आवश्यक है।

   आपातकाल-पीड़ित लोग छिटपुट हर साल उसे याद करते हैं,

 लेकिन अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार कुछ नेता और दल उसका संस्मरण करना छोड़ भी देते हैं।

वे आपातकाल को अपने ढंग से परिभाषित करने लगते हैं जबकि जून, 1975 में आपातकाल लगाकर  पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में बदल दिया गया था। 

  आपातकाल के बारे में नयी पीढ़ी को सब कुछ परिचित कराने की जरूरत है।

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला सिर्फ इसलिए कर 

लिया था क्योंकि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोक सभा की उनकी सदस्यता रद कर दी ।

जन प्रतिनिधित्व कानून की जिन धाराओं के

तहत उनकी सदस्यता रद की गई, उन धाराओं को ही बदल देने का इंदिरा गांधी ने निर्णय कर लिया।

उनका आकलन था कि बिना आपातकाल लगाए यह संभव नहीं है।

  आज भी भ्रष्टाचार तथा अन्य आरोपों में मुकदमे झेल रहे अनेक नेतागण यह चाहते हैं कि उन्हें बचाने के लिए सरकार को पलट दिया जाना चाहिए।

या फिर उन कानूनों को नरम दिया जाना चाहिए जो उनके कारनामों के आड़े  आ रहे हैं।

 यदा कदा राष्ट्रद्रोही गतिविधियों में शामिल लोगों की मदद करने वाले आवाज उठाते रहते हैं कि राजद्रोह कानून को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

यह आपातकाल वाली प्रवृति  है ।

  तब इंदिरा सरकार ने जयप्रकाश नारायण सहित करीब एक लाख राजनीतिक नेताओं, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को  

जेलों में ठंूस दिया था।

लोक सभा की सदस्यता बचती, तभी इंदिरा गांधी की गद्दी बच पाती,

  क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें अगले छह साल तक चुनाव लड़ने से रोक दिया था।

 इंदिरा सरकार ने आपातकाल में न सिर्फ आम लोगों के मौलिक अधिकारों को भी निलंबित कर दिया था, बल्कि कड़ी प्रेस  सेंसरशिप भी लगा दी  थी।

प्रतिपक्ष की सारी गतिविधियां ठप कर दी गई थीं।

   अटार्नी जनरल नीरेन डे ने तब सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि जीवन का अधिकार अभी स्थगित है।

  ं अपने एकछत्र शासन के लिए इंदिरा गांधी ने कुछ संवैधानिक संशोधन भी संसद से करवाये । 

उन चुनाव कानूनों को भी बदलवा दिया गया जिनके उलंघन के कारण उनकी सदस्यता गई थी।

 1971 में हुए लोक सभा चुनाव में एक सरकारी सेवक यशपाल कपूर इंदिरा गांधी के चुनाव एजेंट थे।

 सरकारी सेवा से अपना इस्तीफा मंजूर कराए बिना कोई व्यक्ति चुनाव एजेंट नहीं बन सकता था।

 रायबरेली में स्थानीय प्रशासन ने इंदिरा की चुनाव सभा के लिए सरकारी खर्चे पर मंच तैयार किया था।

इन दोनों मामलों को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जगमोहन लाल सिंहा ने चुनाव कदाचार माना और इंदिरा गांधी का चुनाव रदद कर दिया।

  आपातकाल में जन प्रतिनिधित्व कानून की संबंधित धाराओं में  यह परिवत्र्तन कर दिया गया कि सरकारी कर्मी का इस्तीफा सरकारी गजट में प्रकाशित हो जाना काफी है।

किसी सरकार के लिए पिछली तारीख के सरकारी गजट में कुछ भी छपवा देना आसान काम है।यशपाल कपूर का इस्तीफा जनवरी, 1971 के गजट में छपवा दिया गया।

 सरकारी मदद से चुनावी सभा मंच बनाने के मामले में भी कानून में इस तरह से संशोधन कर दिया गया ताकि इंदिरा गांधी के खिलाफ दिया गया कोर्ट का निर्णय निष्प्रभावी हो जाए।

  आपातकाल के दौरान किये गये संविधान संशोधनों में 42 वें संशोधन के जरिए इंदिरा शासन ने इस देश के लोकतंत्र को अस्थायी रुप से ही सही,पर उसे पूरी तरह मटियामेट  कर दिया।

इस संशोधन के जरिए यह संवैधानिक प्रावधान किया गया कि संविधान को संशोधित करने का संसद का अधिकार असीमित है।

संसद संविधान में कुछ भी जोड़ या घटा सकती है और ससंद के इस कदम  को किसी कोर्ट में चुनौती भी नहीं दी सकती।

यह एकाधिकारवादी प्रवृति थी।

    शुक्र है कि सन 1977 के आम चुनाव के बाद केंद्र में मोरारजी देसाई की गैर कांग्रेसी सरकार बन गई ।

उसने आपातकाल में संविधान व कानून  के साथ की गई कई ज्यादतियों को  रद कर दिया। 

    2011 में सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि 1976 में इस अदालत द्वारा दिया गया वह फैसला सही नहीं था जो ,मौलिक अधिकार के हनन को लेकर था।

आज इस देश के अनेक दलों के दर्जनों नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे है।

उनमें से कुछ आरोपित हैं।कुछ सजायाफ्ता हैं।कुछ जमानत पर हैं।

  इन  नेताओं की ओर से एक ही बात कही जाती है कि हमारे खिलाफ बदले की भावना के तहत मुकदमे दर्ज किए गए,जबकि अदालतें उन्हें कोई राहत नहीं दे रही हैं।

   कुछ नेता यह भी कहा करते हैं कि हमें जनता ने जिताया है और जब हमें जनता ने जिता दिया तो हम अपराधी कैसे ?

ऐसे लोग एक तरह से यह कह रहे हैं कि जो कानून हमारे अपकर्मों में आड़े आ रहे हैं,उन्हें बदल दो।

  और सरकार हमारे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए,उसे पलट दो।

इसी के तहत ईडी के नियम बदलवाने की कोशिश होती है

  और सी.बी.आई. को जांच करने से रोका जाता है।



ऐसे नेता इन दिनों एकजुट होकर मोदी सरकार को अगले चुनाव में पराजित करना चाहते हैं।

  वैसे तो इसकी उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आती ,किंतु कल्पना कर लीजिए कि मोदी सरकार हट जाती है तो क्या होगा ?

  क्या मुकदमे झेल रहे नेता कोई वैसी कोशिश नहीं करेंगे जैसी कोशिश करके इंदिरा ने अपनी लोक सभा सदस्यता बचा ली थी ?

यह काम तो मुश्किल है,पर,उनका हौसला तो वही है।

क्या यह आपातकाल वाली प्रवृति नहीं है ?

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दैनिक जागरण--28 जून, 23

 


गुरुवार, 6 जुलाई 2023

 अपवादों को छोड़कर !

इस देश की राजनीति का अधिकांश त्रिदोष-ग्रस्त हो चुका है।

यदि इस त्रिदोष का समय रहते इलाज नहीं हुआ तो एक दिन लोकतंत्र 

का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

आज के लोगों के वंशजों का भविष्य भी भारी खतरे में पड़ जाएगा।

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1.-भीषण भ्रष्टाचार

2.-बेेशर्म परिवारवाद-वंशवाद

3.-वोट के लिए जेहादियों का परोक्ष-प्रत्यक्ष समर्थन

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ऐसी ही स्थिति में किसी देश में तानाशाह पैदा होता है या गृह युद्ध होता है।

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इन दोनों आशंकाओं से इस देश को आखिर कौन बचाएगा ?

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एक पुराना दृश्य

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कुछ दशक पहलंे बिहार के एक बड़े नेता इस कारण ‘शहीद’ हो गए क्योंकि  उन्होंने अपने पुत्र को  

एम.एल.सी.नहीं बनाने की जिद नहीं छोड़ी।

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विपरीत दृश्य

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उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मंत्री व प्रमुख नेता चाहते हुए भी भाजपा में इसलिए नहीं 

शामिल हो सके क्योंकि भाजपा ने उनसे कहा कि टिकट या तो पिता को मिलेगा या पुत्र को।

पर, उन्हें तो दोनों को टिकट चाहिए।

बिहार नेता की तरह पुत्र के कारण वे ‘शहीद’ नहीं होना चाहते थे।

परिवारवाद-वंशवाद  इस तरह प्रभावित कर रहा है राजनीति की दशा-दिशा को।

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आंध्र प्रदेश के कभी के महाबली नेता व मुख्य मंत्री रहे एन.टी.रामाराव अपनी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को अपनी पार्टी का उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे।

 किंतु उनका दामाद चंद्रबाबू नायडु ने उनकी पूरी पार्टी का ‘अपहरण’ कर लिया। क्योंकि पार्टी व राज्य के अधिकतर लोग इस मामले में एन.टी.आर.के खिलाफ हो चुके थे।यानी पत्नी वाद ने एन.टी.आर.की राजनीति बर्बाद कर दी।

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परिवारवाद पर आए दिन खूब भ्रम फैलाया जाता है।

शरद पवार ने अपनी पुत्री को अपना उत्तराधिकारी बनाने के चक्कर में अपने अधिकतर विधायकों को खो दिया।

इसे वंशवाद -परिवारवाद कहते हैं।

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कांग्रेस सहित ऐसे कई दल हैं जिन्हें कोई न कोई परिवार कंट्रोल करता हैै।

‘‘पार्टी में परिवार’’ और 

‘‘परिवार में पार्टी’’ 

का अंतर समझिए। 

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भाजपा ने गत उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के साथ एक नियम बनाया--एक परिवार एक ही टिकट।

हालंाकि यह नियम भी क्यों ?

टिकट का आधार परिवार के बदले पार्टी के लिए कार्यकर्ता का योगदान बने।

हां,यदि किसी नेता के परिवार का सदस्य सचमुच अच्छा कार्यकर्ता रहा है तो उसे वंचित भी नहीं किया जाना चाहिए। 

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दूसरी तरफ अतिवाद

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दूसरी ओर, एक राजनीतिक दल को कंट्रोल करने वाले एक परिवार के तीन दर्जन से अधिक सदस्य किसी न किसी पद पर थे जब वह दल सत्ता में था।

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किसीे दल के सुप्रीमो के परिवार का कोई सदस्य यदि किसी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाए तो उसे बचाने के लिए सुप्रीमो को सत्ता विरोध की अपनी पिछली लाइन को नरम कर देना पड़ता है।

ताजा उदाहरण मायावती और के.चंद्रशेखर राव का हैं।

परिवारवाद की यह कमजोरी है।

नवीन पटनायक इस मामले में सौभाग्यशाली हैं।

उन्होंने अपनी बहन से कहा था कि अमेरिका से आकर हमारे काम में हाथ बंटाइए।

बहन ने साफ -साफ यह कह दिया कि राजनीति में हमारी कोई रूचि नहीं है।

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त्रिदोष की कहानियां अनंत हैं।

लिखने-पढ़ने वालों का यह कत्र्तव्य बनता है कि खतरा उठाकर भी ऐसी कहानियां लिखें।

लोगों को समय रहते हकीकत से आगाह करें।

अन्यथा,

उनके आने वाले वंशजों की धन,धर्म और धरती खतरे में पड़ जाएगी।

क्योंकि इन मुद्दों पर भारी कंफ्यूजन फैलाने वाले निहितस्वार्थी नेताआंे व बुद्धिजीवियों की बड़ी जमात आज अत्यंत सक्रिय है।

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सुरेंद्र किशोर

6 जुलाई 23