सोमवार, 7 अगस्त 2023

   आइडिया आॅफ इंडिया !

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  सीमा पर बाड़ लगाने से कभी इस 

  देश की छवि खराब होती थी !

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 --सुरेंद्र किशोर--

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   आजादी के बाद के हमारे हुक्मरानों ने 

ही इस देश को ‘धर्मशाला’ बनाना शुरू कर दिया था।

  अब बी.एस.एफ. के सशक्तीकरण का विरोध हो रहा है।

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    जिस देश के कुछ राजनीतिक दलों के लिए घुसपैठिए ‘वोट बैंक’ हों वहां वही होगा जो आज हो रहा है।

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 कई साल पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर मैं डिबेट 

सुन रहा था।

बांग्ला देशी घुसपैठियों पर चर्चा थी।

  एक तरफ सन 1958 बैच के भारतीय विदेश सेवा के एक अफसर थे।

 दूसरी ओर, शिव सेना के राज्य सभा सदस्य थे।

 उस अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में हमारे देश की छवि खराब होगी।’’

  उस पर शिवसेना नेता ने उनसे सवाल किया,

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या बांग्ला देश के  ?

बेचारे अफसर साहब कोई जवाब नहीं दे सके।

वे बेचारे आखिर क्या बोलते ?

वैसे भी वे व्यवहार में शालीन व्यक्ति हैं। 

आजादी के तत्काल बाद के हमारे हुक्मरानों ने उन जैसे अफसरों को यही निदेश दे रखा होगा।यही आदेश कि वे बाड़ लगाने का विरोध करें।

यही तो था ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया का एक नमूना ।’’

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अगस्त 23

   

   


    अपने ही नियमों का पालन 

   करे फिल्म सेंसर बोर्ड

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    सुरेंद्र किशोर

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भाजपा के पूर्व राज्य सभा सदस्य आर.के. सिन्हा ने फिल्म सेंसर बोर्ड के काम काज पर सवाल उठाया है।

आज के दैनिक ‘आज’ में छपे अपने लेख में सिन्हा ने जो मुद्दे उठाए गए हैं,उन पर केंद्र सरकार  को ध्यान देना चाहिए।

केंद्र सरकार आम तौर पर कुल मिलाकर अच्छा काम कर रही है।

किंतु मुझे भी इस बात पर आश्चर्य होता है कि सेंसर बोर्ड से उनके ही नियमों का पालन क्यों नहीं करवा पा रही है !

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 

‘‘सन 2014 से नरेंद्र मोदी के देश का प्रधान मंत्री बनने की अवधि को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल के रूप में जाना जाएगा।’’

  गृह मंत्री की बात आंशिक रूप से ही सही है।

क्योंकि इस देश की फिल्मी दुनिया पर मोदी का कोई वैसा असर नहीं है।

 मैं फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड की चर्चा करूंगा।

  लगता है कि कि उस बोर्ड पर मोदी सरकार का तनिक भी सकारात्मक असर नहीं है।

इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं।

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मैंने पहली बार सन 1961 में फिल्म देखी थी।

जवाहरलाल नेहरू-लाल बहादुर शास्त्री के शासन काल में ऐसी शालीन

और गरिमायुक्त फिल्म बनती थीं जिन्हें आप परिवार के साथ देख सकते थे।

  उसके बाद सत्तर के दशक में गिरावट शुरू हो गई।

सेक्स-हिंसा प्रधान फिल्में बनने लगीं।

भोजपुरी फिल्मों का तो आज और भी बुरा हाल है।

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नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में सेंसर बोर्ड को सुधारने की कोशिश हुई थी।पर,सुधार नहीं हुआ।

लगता है कि मोदी सरकार ने हथियार डाल दिए।

क्या मुम्बई का फिल्मी जगत भारत में ही है न !!!

सेंसर बोर्ड का सिने मेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत गठन हुआ था।

बोर्ड एक वैधानिक संस्था है।

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पचास और साठ के दशकों में बोर्ड के नियमों का पालन करते हुए ही फिल्में बनती थीं 

और उन्हें प्रमाण पत्र मिलते थे।

बहुत पहले मैंने प्रमाण पत्र देने के नियम पढ़े थे।

पूरा तो याद नहीं।

किंतु आज जो फिल्में बन रही हैं,उनमें से शायद ही कोई फिल्म नियम की कसौटियों पर वे खरी उतरती हों।

जहां तक मेरी जानकारी है,सेंसर के नियम बदले नहीं गए हैं।

(नियम गुगल पर उपलब्ध हैं।)हां कभी -कभी एक बात जरूर हो गई लगती है ।

वह यह कि मुम्बई के फिल्म जगत का अधिकांश इस देश की मूल स्थापनाओं को नष्ट-भष्ट करने वाली देसी-विदेशी  ताकतों के हाथों चला गया है।

अपवादस्वरूप ही अब अच्छी फिल्में बन रही हैं।

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इस बीच कुछ साल पहले एक फिल्ल्मी हस्ती आदिल हुसेन ने कहा था कि 

‘‘साठ के दशक में अच्छी फिल्में बना करती थीं।

फिल्मकारों की जिम्मेदारी है कि वे अब भी अच्छी फिल्में दें।’’

  आर्ट सिनेमा,बाॅलीवुड मेनस्ट्रीम सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले आदिल ने कहा  कि ‘‘फिल्मकार यह बहाना न बनाएं कि हम दर्शकों की पसंद की फिल्में बना रहे हैं।’’

आदिल का तो आरोप है कि दर्शकों का मूड हम फिल्म मेकर्स ने ही बदला है।

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  इधर मेरा मानना है कि फिल्मकार सेंसर के उन नियमों का पालन भर करें जो नियम नेहरू के कार्यकाल में बने थे।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करे कि सेंसर बोर्ड में नियम पसंद,ईमानदार व निडर लोग ही रखें जाएं। 

‘‘नदिया के पार’’ और ‘‘बागवान’’ जैसी फिल्मों से कहां किसी को एतराज होता है !

 क्या यह उम्मीद की जाए कि कम से कम भाजपा की केंद्र सरकार 

अश्लीलता और अन्य तरह के भटकावों के इस प्रदूषण को रोकने की कोशिश करेगी ?

याद रहे कि यह प्रदूषण पीढ़ियों को बर्बाद कर रहा है।

यदि ऐसा ही जारी रहा कि अमित शाह की सदिच्छा मिट्टी में मिल जाएगी।

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6 अगस्त 23.



 


रविवार, 6 अगस्त 2023

  समस्याग्रस्त मणिपुर की 

एक कहानी यह भी !

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1951 में मणिपुर में 11.84 प्रतिशत ईसाई थे।

2011 में यह संख्या बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गयी।

आज वह जनसंख्या कितनी है,उसका अनुमान लगा लीजिए।

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सांसदों के दल ने वहां से लौट कर यह सूचना लोगों को दी ?

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सुरेंद्र किशोर

1 अगस्त 23 


   नूह से घुसपैठियों की 200 झोपड़ियों को उजाड़ा गया।

  बांग्लादेशियों-रोहिग्याओं की अबाध घुसपैठ जारी रही 

  तो हर प्रदेश में ऐसी पुलिसिया कार्रवाई करनी पड़ेगी

   यह इस देश पर भीषण हमला है जिसमें 

  वोट लोलुप नेतागण ‘बाहरी -भीतरी दुश्मनों के मददगार हैं

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      सुरेंद्र किशोर

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हरियाणा के नूह से अवैध घुसपैठियों की करीब दो सौ झोपड़ियों को शासन ने विरोध के बीच कुछ घंटे पहले उजाड़ दिया।

हाल के साम्प्रदायिक उत्पातों में इन घुसपैठियों का बड़ा हाथ था।

  घुसपैठ की यह समस्या सिर्फ हरियाणा व दिल्ली में ही नहीं है,,बल्कि पूरे देश में है।

  बढ़ती जा रही है।

जिस तरह के साम्प्रदायिक उपद्रव हाल में हरियाणा में हुए,उसी तरह के उत्पातों की झड़ी लग जाएगी,यदि केंद्र सरकार जल्द कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी।

सन 2021 में ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीमाओं की किलेबंदी अगले साल तक हो जाएगी।

पर,कई कारणों से यह काम अधूरा है।

  सर्वाधिक घुसपैठ पश्चिम बंगाल की सीमा से हो रही है और उस काम में ममता बनर्जी की सरकार सहायक है।

  सीमा पर तैनात केंद्रीय सुरक्षा बल भी क्यों लगभग विफल साबित हो रहा है,इसकी जांच केंद्र सरकार कराए।

  कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि सीमा पर बाड़ लगाने के लिए ममता सरकार जमीन अधिग्रहण नहीं कर रही है।

क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए यह कारण पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए, यदि सचमुच भूमि अधिग्रहण में सहयोग नहीं दे रही है ?

वैसे कारण और भी हैं।

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14 जुलाई, 2004 को तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को बताया था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की संख्या 57 लाख है।

आज तो यह संख्या बहुत बढ़ चुकी है।

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 दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने 4 अगस्त, 2005 को लोक सभा में यह आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने 40 लाख बांग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों को अवैध ढंग से पश्चिम बंगाल में मतदाता बना दिया है।

  ममता ने सदन में इस पर तुरंत चर्चा की मांग की।

जब उसकी इजाजत नहीं मिली तो ममता ने लोक सभा की सदस्यता से सदन में ही इस्तीफा दे देने की घोषणा कर दी।

उससे पहले इस समस्या पर ममता सदन में ही रो पड़ी थीं।

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पर, जब ममता बनर्जी मुख्य मंत्री बनीं और वही अवैध  घुसपैठी मतदातागण ममता के दल को वोट देने लगे तो वह उनके पक्ष में चट्टान की तरह खड़ी हो गईं हैं।नोबल विजेता अमत्र्य सेन ममता बनर्जी को प्रधान मंत्री बनते देखना चाहते हैं।यदि बन गयीं तो इस देश का क्या होगा ?

 मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कहा कि यदि घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई होगी तो खून की नदियां बहेंगीं।

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लगातार जारी घुसपैठ के कारण आजादी के बाद 

पूर्वी पाक-बांग्ला देश से सटे भारतीय इलाकों के कई जिलों 

की आबादी का सामाजिक अनुपात पूरी तरह बदल चुका है।

बदलता जा रहा है।

 उन राज्यों में आंतरिक-बाह्य सुरक्षा की भारी समस्या भी उत्पन्न हो चुकी है।गंभीर होती जा रही है।बिहार-झारखंड में भी समस्या बढ़ रही है।

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इस समस्या की जड़ में आजादी के तत्काल बाद की केंद्र सरकार का अदूरदर्शी रवैया रहा है।

  कुछ दशक पहले की बात है।

एक निजी टी.वी.चैनल पर घुसपैठ की समस्या पर चर्चा चल रही थी।

इस देश के विदेश सचिव पद पर रहे एक रिटायर आई.एफ.एस.अफसर ने कहा कि 

‘‘यदि हम बांग्ला देश सीमा पर बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।’’

(मैं भी वह डिबेट सुन रहा था।)

इस पर शिव सेना के एक राज्य सभा सदस्य ने उस पूर्व सचिव से पूछा कि 

‘‘आप भारत के विदेश सचिव थे या

 बांग्ला देश के ?’’

वे चुप रह गए।

बेचारे उस शालीन पूर्व विदेश सचिव का भला क्या कसूर ?

नेहरू युग में विदेश सेवा में आए थे।

वे जवाहरलाल नेहरू के ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ नीति के तहत ही तो बोल रहे थे।

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5 अगस्त 23



 

 


शनिवार, 29 जुलाई 2023

  बिहार में ही क्यों,पूरे देश में जातिवाद है,

पर, इस राज्य के रिश्वत खोर और दहेज 

दानव कभी जातिवाद नहीं करते  

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      --सुरेंद्र किशोर--

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कुछ लोग कहते हैं कि बिहार में बहुत जातिवाद है।

किंतु मेरा मानना है कि रिश्वत-खोरी और दहेज-खोरी 

के क्षेत्रों में कोई जातिवाद नहीं है।

(हां,उत्तर बिहार के कतिपय समाजिक समूह में दहेज का प्रचलन नहीं रहा है।क्या अब भी वही स्थिति है ?मुझे नहीं मालूम।कोई बताए।)

सरकारी दफ्तरों के ‘‘आदतन भ्रष्ट रिश्वतखोर’’ अपनी जाति को भी नहीं बख्शते।

वे तुरंत कह देते हैं कि ‘‘अरे यार,मुझे ऊपर भी तो पहुंचाना पड़ता है।’’

ऐसा है तांे फिर भैया,अपना हिस्सा तो छोड़ दो।

इस पर वे कहते हैं कि हमारे भी तो बाल-बच्चे हैं।

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दहेज दानव तो और अधिक क्रूर होते हैं।वह तो जाति के भीतर का ही मामला है। 

कुछ सरकारी कामों को तो आप टाल भी सकते हैं।

पर,बिटिया की शादी 

तो नहीं टल सकती।

मेरी पांच बहनों की शादियों में बारी-बारीे से औसतन पांच बीघे जमीन बिक गयी थी।

हमारे पास तो बेचने के लिए जमीन थी और है भी ,तो काम चल गया,अब भी मेरा कोई बड़ा काम जमीन बेच कर ही होता है।

पर, जिनके पास साधन सीमित हैं,वे तो उस  क्षण को कोसते होंगे जिस क्षण उनके यहां बिटिया पैदा हुई थी।  

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के बारे में एक बात सुनी थी।

बात अपुष्ट है,इसलिए 

जो अधिक जानकार हों,वे मुझे बताएं।मैं खुद को सुधार लूंगा।

उनकी कन्या की शादी होनी थी।

उन्हीें दिनों उन्हें सवा लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।

जिस लड़के वाले के यहां राष्ट्रकवि जाते थे,उसकी नजर उस सवा लाख पर ही लगी होती थी।

पता नहीं, संवेदनशील दिनकर जी ने कैसे चीजों को संभाला होगा !

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दिनकर जी पर आज उनके स्वजातीय सहित पूरा समाज -देश गर्व करता है।

करना भी चाहिए।

पर,उस पीड़ा के दौर से किसने उनको बाहर किया होगा,इस पर मैं अपनी कल्पना के घोड़े ही दौड़ा सकता हूं।

(आज भी जो अत्यंत थोड़े से लोगों का जो ईमानदारी की कमाई पर किसी तरह जीवित हैं, कितने लोग ध्यान रखते हैं ?)

मेरे फेसबुक मित्र डा.रामवचन राय इस संबंध में दिनकर जी पर बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं।

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आज की पीढ़ी के एक ‘अर्धाक्षर’ (साक्षर और निरक्षर के बीच का यह शब्द कैसा रहेगा !)पत्रकार ने दिनकर के बारे में हाल में कहीं लिख दिया कि ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ लिखने के बाद जब प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू नाराज हो गये तो दिनकर जेपी के साथ हो लिए।

अरे अर्ध ज्ञानी जी महाराज, आजादी के हीरो जेपी पर दिनकर ने प्रारंभिक दिनों में ही कविता लिख दी थी।

जब डा.लोहिया ने दिनकर से कहा कि जेपी पर तुमने लिखा,मुझ पर लिखो।

दिनकर का जवाब था-जेपी ने मुझे जितना प्रभावित किया,उतना आप भी प्रभावित कर देंगे तो मैं लिख दूंगा।

खैर,लगे हाथ यह भी बता दूं कि जेपी की चिट्ठी पर ही नेहरू जी ने दिनकर जी को पहली बार राज्य सभा का सदस्य बनाया था।

दूसरी और तीसरी बार भी बने।

चैथी बार नहीं बने।

चीनी आक्रमण के बाद यदि दिनकर ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’’ नहीं लिखते तो आगंे भी वे राज्य सभा में होते।

पर,दिनकर सहित उन दिनों की कई हस्तियों के लिए देश पहले था, पद बाद में।

  राजनीति में तब आज जैसा कलियुग नहीं आया था।अपवादों को छोड़कर आज के इस युग को राजनीति के कलियुग के बदले ‘‘दुर्योधन युग’’ ही कहना शायद बेहतर  होगा।

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 29 जुलाई 23  

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(यह पोस्ट उन पर लागू नहीं होता है जो आज के दौर में भी दहेज या रिश्वत नहीं लेते और अपनी -अपनी जगह में के.के.पाठक की तरह ही निडर और कर्तव्यनिष्ठ बने हुए हैं।) 


 


बुधवार, 26 जुलाई 2023

 एक अनुमान के अनुसार इस देश में करीब 14 लाख 

करोड़ रुपए का काला धन हर साल पैदा हो रहा है

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     --सुरेंद्र किशोर--

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एक मोटे अनुमान के अनुसार इस देश की केंद्र और राज्य सरकारों के कुल सालाना बजट करीब 70 लाख करोड़ रुपए के होतेे हैं।

   अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर सरकारी कामों में कमीशन या घूसखोरी की दर आम तौर पर औसतन 20 प्रतिशत है।

यानी, 14 लाख करोड़ रुपए का काला धन हर साल पैदा हो रहा है।

ये 14 लाख करोड़ रुपए किन -किन लोगों की जेबों में

जाते हैं, जरा आप भी मेरी जानकारी बढ़ाइएगा।

इतने पैसों का कितना उपयोग देशहित में होता है और कितना राष्ट्रद्रोह के काम में ?

इनमें से कितने पैसे हवाला के जरिए या दूसरे उपायों से विदेशों में भेज दिए जाते हैं ?

(इस देश के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री पर यह आरोप है कि उसने छह देशों में डेढ़ लाख करोड़ रुपयों की निजी संपत्ति बनाई है।इ.डी. उसकी जांच कर रही है।)

  हर साल करीब एक लाख लोग भारत की नागरिकता छोड़कर विदेशों में बस रहे हैं।

उन में से कितने लोगों ने इस देश को लूटने के बाद विदेश में बसने का निर्णय किया है ?

भारत में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है।

हमारे संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में यह लिखा गया है कि लोगों के बीच आर्थिक विषमता कम करने की शासन कोशिश करेगा।

आदि ...आदि 

और, कोई बात हो तो बताइए।

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नोट-बगोदर के माले विधायक दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह वहां के सरकारी अफसरों से घूस लौटवाने का अभियान चलाते रहते थे।वे कभी चुनाव नहीं हारे।

महेंद्र जी जन दबाव से घूस वापस करा भी देते थे जो आम जनता से लिए गए होते थे।

जब वे बिहार विधान सभा में बोलते थे तो सभी पक्षों के लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे।

  आज के ‘भ्रष्ट युग’ में भी यदि कोई राजनीतिक संगठन अंचल स्तर से राज्य स्तर तक के भ्रष्ट अफसरों आदि पर जन दबाव डाल कर घूस वापस कराने का सत्याग्रह करे तो वह राजनीतिक दल थोड़े ही दिनों में काफी लोकप्रिय हो जाएगा।पर,समस्या यही है कि आज महेंद्र सिंह जैसा कार्यकर्ता या नेता ढूंढ़ना बहुत मुश्किल काम है।

  याद रहे कि आज घूस के बिना सरकारी दफ्तरों में कहीं कोई काम नहीं हो रहा है,अपवादों की बात और है।

एक तरफ सरकारी पैसों की भारी लूट है और दूसरी तरफ अधिकतर सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। 

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25 जुलाई 23 

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  जाली कागजात के आधार पर ताज महल और लाल किले तक को बेच देने वाला नटवर लाल एक बार खुद ठगी का शिकार बन गया था

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सुरेंद्र किशोर

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करीब चार सौ लोगों को बारी -बारी से ठगने वाला नटवर लाल सत्तर के दशक में खुद ठगी का शिकार बन गया था।

  दशकों के उसके आपराधिक जीवन में उसने ताज महल और लाल किले तक को बेच डाला था।

संसद भवन को बेचने के लिए तो उसने राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद का नकली हस्ताक्षर कर दिया था।

  यह संयोग ही था कि डा.प्रसाद और नटवरलाल दोनों बिहार के अविभाजित सारण जिले के जिरादेई के मूल निवासी थे।अब जिरादेई सिवान जिले में है।

राजेंद्र बाबू के छात्र जीवन में एक परीक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका में लिख दिया था कि परीक्षार्थी यानी राजेन्द्र प्रसाद परीक्षक से भी अधिक ज्ञानवान  है।

  उधर नटवरलाल शब्द, संज्ञा से सर्वनाम बन चुका है।

 मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल के जयपुर में ठगे जाने की कहानी शकील अख्तर ने लिखी है।

  सन 1970 में नटवरलाल जयपुर केंद्रीय जेल का ‘मेहमान’ था।

उस समय उसकी उम्र 55 साल थी।

नटवर जब जेल लाया गया,उस समय उसके पास दो महंगे सूट थे।

जेल नियम के अनुसार दोनों सूट जेल में जमा कर लिए गए।

एक दिन एक जेल अधिकारी नटवर लाल का शानदार बंद गले का सूट

पहनकर नटवर से मिलने पहुंच गया।

अपना सूट दूसरे के शरीर पर देखकर नटवर चैंका।

उसने कहा कि यह तो मेरा सूट है,आपने कैसे पहन लिया ?

यह तो जेल में जमा रहना चाहिए।

जेल अधिकारी ने कहा कि आप तो इस सूट को वापस ले चुके हैं।

आपने हमारे रजिस्टर में इसे वापस करने के दस्तखत किये हैं।

नटवर बड़ा भन्नाया।

उसने सख्ती से कहा कि मैंने तो इसे वापस लिया ही नहीं।

जेल अधिकारी ने बड़े इत्मीनान से उसे जेल का  इंट्री रजिस्टर लाकर दिखा दिया।

  वहां वाकई दोनों सूट वापस लेने के लिए नटवरलाल के दस्तखत मौजूद थे।

एकदम असली दस्तखत।

ठग सम्राट बुरी तरह चैंेक गया।

यह नटवर की कल्पना से परे था।

जयपुर के उस जेल अफसर ने नटवरलाल को कांगजों में ही उसे मात दे दी थी।

जेल अफसर ने इस घटना का मजा लेते हुए बताया कि हमारे जेल में आने वाले हर कैदी की एंट्री के लिए एक रजिस्टर होता है।

उसमें हम उससे संबंधित जानकारियां दर्ज करते हैं।

उसी में कैदी के साथ जो सामान होता है,उसे जमा करके लिखा जाता है।

 उसमें दो सूट जमा थे।

एक बार पेशी की तारीख पर नटवर लाल बाहर गया था।

जाते समय वह अपना एक सूट ले गया।

 उस सूट की प्राप्ति के दस्तखत उसने किए थे।

 ठीक उसके नीचे उसका दूसरा सूट दर्ज था।

जेल अधिकारी ने कहा कि मैंने किया यह कि नटवर लाल ने जो एक सूट की प्राप्ति के दस्तखत किए थे उस दस्तखत के आगे एक कोष्ठक बना दिया।

अब वह दस्तखत दोनों सूटों की प्राप्ति के लिए हो गया।

पहली नजर में सीधे-सादे सामान्य से दिखने वाले नटवरलाल को जयपुर जेल में कड़े बंदोबस्त के साथ रखा गया था।

  जेलों से अक्सर भाग जाने का उसका इतिहास था।

इसलिए नटवर को फांसी की कोठरी नंबर दो में रखा गया था।

 पर,यह नटवर को मंजूर नहीं था।

उसने जयपुर के सेशन कोर्ट में अपील की।उसकी अपील अलग कोठरी में बंद किए जाने के खिलाफ थी।

वकालत की पढ़ाई कर चुका नटवर ने कहा कि उसे ‘कंडम सेल’ में रखा गया है,जो नियम के खिलाफ है।

जेल अधिकारी इस अपील के बाद परेशानी में पड़ गये।

जेल अधिकारी चाहते थे कि उसकी अपील मंजूर न हो।अन्यथा उसके लिए विशेष सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

 क्योंकि नटवर लाल बेहद शातिर था।वह बात करने में उस्ताद था।

किसी को भी वह जल्दी ही प्रभावित कर लेता था।

जेल शासन ने कोर्ट में ऐसी बहस की कि नटवर की अपील खारिज हो गयी।

नटवर लाल की कहानी अद्भुत है।

अब तो वह दंत कथाओं का पात्र बन चुका है।

सन 1912 में जन्मे नटवरलाल के बारे में नटवर लाल के भाई ने सन 2009 में कोर्ट में यह हलफनामा दिया कि नटवर लाल की मृत्यु 13 साल पहले हो चुकी है।

  याद रहे कि अदालत के आदेश से पुलिस 24 जून 1996 को नटवर लाल को कानपुर जेल से इलाज के लिए दिल्ली ले गई।लौटते समय यानी 25 जून को दिल्ली स्टेशन पर से संतरियों को चकमा देकर नटवरलाल फरार हो गया।उस समय उसकी उम्र 84 साल थी।उसके बाद वह कहीं नहीं देखा गया।

वैसे तो नटवर लाल ने वाराणसी से ठगी की शुरूआत की थी।पर,उसके खिलाफ आठ राज्यों में 100 मुकदमे दायर हुए थे।

उसके 52 छद्म नाम थे।

उसे कुल मिलाकर 113 वर्षों की सजा हो चुकी थी।

उसके खिलाफ सबसे चर्चित मामला

दिल्ली की कुछ मश्हूर इमारतों को बेच देने का था।

उसने अफसर बन कर विदेशियों को  ताज महल,लाल किला,राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को बेच दिया।उसके लिए उसने जाली कागजात तैयार कर लिए थे।

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19 जुलाई 23