रविवार, 27 अगस्त 2023

 बांग्ला देश युद्ध और चंद्रायण-3 अभियान 

के दौरान इंदिरा और मोदी का फर्क

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सुरेंद्र किशोर

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बांग्ला देश युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने क्या किया ?

चंद्रायण -3 के सफल अभियान के बाद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या किया ?

इन दोनों घटनाओं में फर्क आपको इंदिरा और मोदी का अंतर बता देंगे।

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नरेंद्र मोदी बेंगलुरू पहुंच कर इसरो के वैज्ञानिकों से कहा कि ‘‘मैं जल्द से जल्द आपके दर्शन कर आपको नमन करना चाहता था।’’

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दूसरी ओर, बांग्ला देश विजय के बाद तीन दिग्गजों में श्रेय लेने की होड़ मच गयी थी।

प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री उस विजय के लिए सेना प्रमुख मानेक शाॅ को तनिक भी श्रेय देने को तैयार नहीं हुए।

इंदिरा गांधी को उनकी पार्टी ने ‘दुर्गा’ की उपाधि दे दी।साथ ही, इंदिरा सरकार ने इंदिरा गांधी को भारत रत्न दे दिया।

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जनरल मानेक शाॅ को कुछ नहीं मिला तो वे नाराज हुए।बाद में उन्हें फिल्ड मार्शल बनाकर संतुष्ट करना पड़ा।

हां,रक्षा मंत्री जगजीवन राम तो असंतुष्ट ही रहे।

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पूरी कहानी

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 बांग्ला देश को लेकर भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय का श्रेय देने के सवाल पर तब के तीन महा रथियों के बीच अच्छी -खासी खींचतान चली थी।

आंध्र प्रदेश से एक कांग्रेसी सासंद ने प्रधान मंत्री को ‘दुर्गा’ कहा था। अधिकतर सत्ताधारी नेता गण तो पूरा श्रेय तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को ही दे रहे थे।

 पर रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख मानेक शाॅ इसे मानने को तैयार नहीं थे।

युद्ध में विजय के बाद जब इंदिरा गांधी को ‘भारत रत्न’ से अलंकृत  किया गया तो सेना में प्रतिक्रिया हुई।

उसे शांत करने के लिए सेना प्रमुख सैम मानिक शाॅ को ‘फील्ड मार्शल’ का ओहदा दिया गया।

  बंाग्ला देश युद्ध के बाद एक खेमे की ओर से यह सवाल भी उठाया गया  कि सन 1962 में  चीन से शर्मनाक पराजय के लिए इस देश के रक्षा मंत्री वी.के.कृष्ण मेनन जिम्मेदार थे,प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं, तो

 पाकिस्तान पर जीत के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को श्रेय क्यों दिया जाना चाहिए ?

 उधर रक्षा मंत्री जगजीवन राम कुछ कारणवश मानिक शाॅ से नाराज रहा करते थे। 

 अब इस संबंध में तत्कालीन रक्षा मंत्री जग जीवन राम ने 1977 में कहा था कि 

 ‘‘1971 के युद्ध में भारत की विजय का बड़ा कारण यह था कि सेना के तीनों अंगों का सही और परस्पर पूरक सह कार्य और रक्षा सामग्री के उत्पादन से लेकर हर मोर्चे पर मेरा स्वयं जाकर सेना का हौसला बढ़ाना।

इसके अतिरिक्त निदेशन में सामंजस्य होना भी एक महत्व की बात थी।’’

इसके विपरीत बांग्ला देश युद्ध के समय भारतीय सेनाध्यक्ष   मानिक  शाॅ ने सन 1974 में लंदन में साफ- साफ कह दिया था कि ‘‘अगर मैं उस युद्ध में पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष होता तो विजय पाकिस्तान की ही होती।’’

  मानिक  शाॅ की इस गर्वोक्ति पर  जगजीवन राम की टिप्पणी महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने कहा कि ‘‘मैं शाॅ को नकली फील्ड मार्शल मानता हूं।वह इस योग्य नहीं थे।’’

जगजीवन राम को युद्ध के लिए अपनी तैयारी पर पूरा विश्वास था।उन्होंने कहा कि ‘‘उस युद्ध को तो जीता ही जाना था भले ही जनरल कोई और होता। क्योंकि हमने तैयारी ही इतनी अधिक कर ली थी।’’

  उनकी यह भी राय थी कि यदि किन्हीं प्रकार के दबाव में आकर किसी को फील्ड मार्शल बना दिया जाए ,तोभी वह नकली फील्ड मार्शल ही होगा।

मानेक शाॅ पैरवी और खुशामद से फील्ड मार्शल बने थे।

जगजीवन बाबू की स्पष्ट राय थी कि उस समय जो भी सेनाध्यक्ष होता, वही युद्ध जीतता भले ही वह इस योग्य नहीं होता।

   उन्होंने यह भी कहा कि प्रजातांत्रिक प्रणाली में जिस ढंग से निर्णय किये जाते हैं,उसके अंतर्गत विजय का श्रेय किसी व्यक्ति विशेष को नहीं दिया जा सकता।

   लगता है कि जगजीवन बाबू इस बात से सहमत नहीं थे कि बंाग्ला देश युद्ध में विजय का सारा श्रेय इंदिरा गांधी को दिया जाए।

  मानेक शाॅ के बारे में बात होने पर जगजीवन राम तीखे हो जाते थे।

 उन्होंने  कहा था कि वे तीनों सेना प्रमुखों में से खुद को सर्वोच्च दिखाने की कोशिश करते 

थे,लेकिन हो नहीं सके।

  नीति निर्धारण समिति की बैठकों मंे कई बार मानेक शाॅ अन्य दोनों सेनाध्यक्षों की बातों का विरोध करते थे ।

 उनके बीच खुद को सर्वोच्च दिखाने की कोशिश करते थे।पर,हम इस मान्यता के नहीं रहे कि तीनों सेनाओं का एक अध्यक्ष हो।

  यह पूछे जाने पर कि क्या कभी आपसे उनका नीतिगत मतभेद रहा ,उन्होंने कहा कि ऐसा साहस वह नहीं कर सकते थे।

वैसे उनकी ख्वाहिश मनमानी करने की भी रहती थी,पर वे कर नहीं सकते थे। 

मानेक शाॅ की राय भी कुछ नेताओं के बारे में बहुत खराब थी।

मानेक शाॅ ने एक बार कहा था कि ‘‘मुझे शक है कि उस नेता को मोर्टार और मोटर के बीच के फर्क का पता तक नहीं होगा जिसे देश का रक्षा मंत्री बना दिया जाता है।’’

  मानिक शाॅ बांग्ला देश युद्ध में विजय का श्रेय भी  प्रधान मंत्री या रक्षा मंत्री देने के बदले खुद ही लेना चाहते थे। 

 मानिक शाॅ ने बाद मेें कहा कि भारतीय फौज की जीत का खांका मैंने खींचा था।

याद रहे कि मानिक शाॅ पांच युद्धों में हिस्सा ले चुके थे।मानिक शाॅ ने बंगला देश संकट के शुरूआती दौर में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में  प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से साफ -साफ कह दिया था कि हमारी सेना अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं है।प्रधान मंत्री को यह बुरा लगा था।

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27 अगस्त 23

    


बुधवार, 23 अगस्त 2023

 कितने दूरदर्शी थे आजादी के तत्काल 

बाद वाले हमारे हुक्मरान ?

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सुरेंद्र किशोर

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पीपल 

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  पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां हर पांच सौ मीटर की दूरी पर पीपल का एक वृक्ष हो, आॅक्सीजन की वहां कोई कमी नहीं रहेगी।

स्कंद पुराण में एक श्लोक है जिसका अर्थ है--

‘‘एक पीपल, एक नीम, एक वट वृक्ष ,दस इमली, तीन खैर, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम का वृक्ष लगाने वालों को नरक का मुंह नहीं देखना पड़ता है।’’

  ध्यान दीजिए, यहां भी पहला नाम पीपल का ही है।

 यदि आजादी के तत्काल बाद से ही केंद्र व राज्य सरकारें पीपल का पौधरोपण करवातीं तो हमारे यहां पर्यावरण असंतुलन की समस्या ही नहीं रहती।

  कुछ ही साल पहले बिहार सरकार ने अपने साधनों से पीपल के पौधे लगवाने शुरू किए हैं।

यहां भी सरकारी स्तर से पहले यह काम नहीं होता था।

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इसी गुण के कारण परंपरागत विवेक वाले इस देश के लोग पीपल की पूजा करते रहे।

आजादी के तत्काल बाद वाली सरकारों ने संभवतः यह सोचा होगा कि सरकारी खर्चे पर जगह -जगह पीपल वृक्ष यानी पूजा स्थल बनाना धर्म निरपेक्षता के खिलाफ काम होगा।

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गंगा नदी

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गंगा नदी में ऐसे औषधीय और बैक्टेरिया रोधी गुण हैं जो दुनिया की किसी अन्य नदी के जल में नहीं है।

इसीलिए लोग गंगा को मां कहते हैं।

सन 1955-56 में मैं गांव से अपने परिजन के साथ दिघवारा के पास गंगा स्नान करने जाता था।

नदी में घुटना भर पानी में भी मेरे पैर की अंगुलियां साफ-साफ नजर आती थी।

यानी,तब तक पानी इतना स्वच्छ और निर्मल था।

विदेशी शासकों ने भी गंगा को प्रदूषित नहीं किया था। 

कहीं मैंने पढ़ा था कि बादशाह अकबर गंगा नदी का पानी ही मंगवाकर रोज पीता था।

पर,आजादी के बाद की सरकार ने तरह -तरह के ‘उपायों’ से गंगा नदी को इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब तो कई जगह उसे छूने से भी रोग पनपने का खतरा है।

गंगा को स्वच्छ करने वाले अब तक के सारे सरकारी उपाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।

यदि आजादी के तत्काल बाद की सरकार गंगा की स्वच्छता-निर्मलता-अविरलता बनाए रखने की कोशिश करती तो उसकी धर्म निरपेक्षा छवि को शायद नुकसान पहुंचता।

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गाय

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देसी गाय के दूध में औषधीय गुण है जो हाइब्रिड गायों में नहीं है।

गाय की इसीलिए पूजा होती है।

बचपन में मैंने देखा है कि जब मेरे घर की गाय मरती थी तो 

मेरी मां उसी तरह रोती थी तानो परिवार का कोई सदस्य मर गया हो।  

पर,ऐसी स्थिति पैदा कर दी गयी कि देसी गाय की संख्या कम होने लगी।

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जैविक खाद

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मैं बचपन में गोबर खाद से उपजाए गए गेहूं के छोटे -छोटे दानों से बनी रोटी खाता था।

उस रोटी में जो  मिठास थी,वह बाद की ‘हरित क्रांति’ वाले गेहूं में तो कत्तई नहीं।

उधर रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं से मिट्टी भी खराब हो रही है।

साथ ही, उसके जरिए उपजे अनाज और आलू वगैरह में आर्सेनिक पाया जाने लगा है।

पंजाब में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का सर्वाधिक इस्तेमाल होता है।

वहां की मिट्टी खराब हो रही है।भूजल आर्सेनिक युक्त हो रहा है।

काफी पहले मैंने इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ा था कि रासायनिक खाद-दवां के दुष्प्रभाव से अनेक लोग गांव छोड़ रहे है।अखबार के संवाददाता ने पंजाब के कुछ गांवों का भ्रमण कर रिर्पोटिंग की थी।

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भटिंडा-बिकानेर ट्रेन को बोलचाल में ‘कैंसर मेल’ कहा जाने लगा है।उस ट्रेन में 40 प्रतिशत कैंसर मरीज होते हैं।

बिकानेर में आचार्य तुलसी के नाम पर एक कैसर अस्पताल है जिसमें मुफ्त चिकित्सा होती है।

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पूरे देश में अब जैविक खेती की होड़ शुरू हुई है।

पर,मांग के अनुपात में आपूर्ति बहुत कम है।

साथ ही, जैविक उत्पाद काफी महंगा है।

सरकारों को चाहिए कि वे उस पर सब्सिडी दें।

जिसने दर्द दिया,वही तो दवा देगा !! 

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23 अगस्त 23

 




 


सोमवार, 21 अगस्त 2023

 हर चुनाव में दलों व उम्मीदवारों की ही नहीं,

बल्कि मीडिया की भी परीक्षा हो जाती है

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश में हर चुनाव के समय मीडियाकमियों की भी अघोषित परीक्षा हो जाती है।

लोगबाग जान जाते हैं कि कौन कितना निष्पक्ष है और कौन नहीं है।

अगले कुछ महीनों तक देश में चुनाव का ही गर्मागर्म माहौल रहेगा।

इसमें मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ी हुई रहेगी।

उम्मीद है कि मीडिया का अधिकांश इस परीक्षा में खरा उतरेगा।

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मीडिया के किसी अभियान का चुनाव नतीजे पर निर्णायक असर नहीं पड़ता,ऐसा मैंने पिछले कई दशकों से देखा-समझा है।

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कुछ कारणवश सन 1971 के लोक सभा चुनाव के समय अपवादों को छोड़कर मीडिया का अधिकांश 

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ था।

इसके बावजूद इंदिरा गांधी की पार्टी जीत गयी।

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1977 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले तक मीडिया इंदिरा गांधी के पक्ष में था।

यूं कहिए कि इमरजेंसी के कारण उसका गला दबा दिया गया था।

चुनाव की घोषणा के बाद कुछ खुलापन आया।

पर,इमरजेंसी के आतंक का असर फिर भी मीडिया पर था।

इसके बावजूद इंदिरा गांधी का पार्टी बुरी तरह हार कर सत्ता से बाहर हो गयी।

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सन 1995 के बिहार विधान सभा के चुनाव के समय बिहार क्या देश का मीडिया मुख्य मंत्री लालू प्रसाद के सख्त खिलाफ था।

मंडल आरक्षण का भी असर था।

जहां तक मुझे याद है कि सिर्फ सुरेंद्र प्रताप ंिसंह ने द टेलिग्राफ में साफ-साफ लिखा कि लालू प्रसाद दुबारा सत्ता में आ रहे हैं।

आए भी।

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जब मीडिया का जब चुनाव नतीजे पर सीमित असर है तो काहे को अपनी साख को दंाव पर लगाया जाए !!!

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पैसे,जाति,विचार धारा तथा अन्य दृश्य-अदृश्य बंधनों के हाथों कुछ मजबूर लोगों को छोड़कर मीडिया के बाकी लोग यानी अधिकांश भरसक अगले चुनाव की वस्तुपरक रिपोर्टिंग करके अपनी साख बढ़ाएं या कायम रखें,मेरी तो यही सलाह रहेगी।

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सन 1984 के लोक सभा चुनाव के समय एक राष्ट्रीय अखबार के कर्ताधर्ता ने अपने संवादाताओं को यह संदेश भिजवा दिया कि कांगेस को 

हरवा दो।

यानी,ऐसी रिपोर्टिंग करो कि लगे कि कांग्रेस जीतने वाली नहीं है।

पर,कांग्रेस की अभूतपूर्व जीत हो गयी।

दूसरी ओर, वह अखबार ही हार गया।

उसका प्रसार इतना घटने लगा कि 

फिर वह उठ नहीं सका।

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20 अगस्त 23


रविवार, 20 अगस्त 2023

 अभियान चले अति-भोजन के खिलाफ

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सुरेंद्र किशोर

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मैंने अनेक लोगों को अति भोजन और अनुचित भोजन करके असमय

बीमार होकर मरते देखा है।

इससे न सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यवस्था पर बोझ बढ़ता है बल्कि 

जो परिवार असमय अपना प्रिय खो देता है,उसकी स्थिति भी खराब हो जाती है।

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हमारे ऋषि -मुनियों ने इस संबंध में सूत्र दे रखा है-

गांव में हमारे बड़े-बुजुर्ग इसे यदाकदा दुहराते थे।

पर,एकल परिवार के इस युग में बुजुर्ग तो पुराने रेडियो सेट की तरह एक कोने में रख दिए गए हैं।

नयी पीढ़ी खुद को बहुत ‘समझदार’ समझती है।उसे किसी की सलाह की कोई जरुरत नहीं।

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ऐसे में सरकारें ही यह काम करें।

सरकार ने स्वच्छता अभियान चलाया।

लोगों से यह भी अपील की कि वे खुले में शौच न जाएं।आदि आदि।

उसी तरह अति भोजन के खिलाफ वे अभियान चलाएं।

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हित् भुक्

मित भुक्

ऋत भूक् 

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यानी, जो व्यक्ति शरीर के लिए हितकारी भोजन ले,

भूख से कम खाए और

मौसम के अनुसार ही भोजन करे ,

वह व्यक्ति ही नीरोग रह सकता है।

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इस देश के कई लोकप्रिय नेताओं ने मांस-मदिरा आदि(आदि को लेकर आप अपने अनुमान के घोड़े दौड़ा सकते हैं।) के चक्कर में खुद के स्वास्थ्य को बर्बाद कर लिया।

यह भी नहीं सोचा कि उसके न रहने पर उसके प्रशंसकों-समर्थकों की क्या हालत होगी।

20 अगस्त 23

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पुनश्चः,

मैंने कई मीडिया कर्मियों से कहा कि आप नब्बे साल से अधिक उम्र के लोगों का इंटरव्यू करिए।

उनसे पूछिए कि वे किस तरह का संयम रखते हैं।

यदि उनके भोजन आदि का प्रचार हो तो वह जनहित में होगा। क्योंकि उससे जो प्रेरणा लेना चाहेगा,वह लेकर खुद भी स्वस्थ और दीर्घायु रह सकेगा।

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पर,आज के युग में कौन किसकी सलाह मानता-सुनता है !!! 


बुधवार, 16 अगस्त 2023

 किसी बेहतर छवि के नेता को ‘‘इंडिया’’ 

का संयोजक बनाने में हिचक क्यों ?

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इसका कारण कई लोग बताने लगे हंै

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सुरेंद्र किशोर

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क्या भाजपा विरोधी दलों को सन 2024 के चुनाव के बाद ऐसा प्रधान मंत्री चाहिए जो सरकार बनते ही भ्रष्टाचार के सारे मुकदमे उठवा ले ?

याद रहे कि भाजपा विरोधी 8 दलों के 32 नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार

 के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।  

उनमें से किसी को अदालत से राहत नहीं मिल रही है।

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कांग्रेस समर्थन वापस लेने के लिए मजबूर हो गयी थी जब प्रधान मंत्री चरण सिंह (1979)और प्रधान मंत्री चंद्र शेखर(1990) ने गांधी परिवार के विरुद्ध जारी  मुकदमे वापस लेने से इनकार कर दिया था

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कहीं प्रधान मंत्री बनने के बाद कोई ईमानदार नेता ‘‘चरण सिंह और चंद्र

शेखर की कहानी’’ दुहराने लगे तो क्या होगा ?

इसलिए लगता है कि ‘‘इंडिया’’ को या तो कोई दूसरा मनमोहन सिंह चाहिए जिन्होंने अपने शासन काल में लाखों करोड़ रुपए के घोटाले होने दिए थे।

या फिर खुद इंदिरा गांधी की तरह कोई ‘‘आयरन हस्ती’’ चाहिए जिन्होंने मुकदमे के परिणाम से बचने के लिए 1975 में इमरजेंसी लगा दी थी।

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मोदी विरोधी यानी एन.डी.ए.विरोधी गठबंधन ‘‘इंडिया’’ यह योजना बना रहा है कि वह 450 लोक सभा क्षेत्रों में राजग के खिलाफ कोई एक ही उम्मीदवार उतारेगा।

 इससे राजग की गत चुनाव की अपेक्षा इस बार सौ सीटें कम हो जाएंगी।

फिर तो ‘‘इंडिया’’ की सरकार बन जाएगी।

सारे आपसी मतभेद और पुराने शिकवे शिकायत भुलाकर राजग विरोधी दलों ने मुख्यतःएक ही उद्देश्य से ‘इंडिया’का गठन किया है।

बड़े -बडे़ प्रतिपक्षी नेताओं को उन गंभीर प्रकृति के मुकदमों में होने वाली सजा से बचाना है।

यदि मोदी तीसरी बार सत्ता में आ गए तो उन नेताओं के कैरियर पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।बची-खुची संपति भी जब्त हो जाएगी।

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पर,इंडिया के सामने यक्ष प्रश्न है कि किस ऐसे ‘‘अति साहसी’’ नेता को प्रधान मंत्री बनाया जाए जो जरुरत पड़े तो देश में एक बार फिर इमरजेंसी लगा कर भी हमें मुकदमों से बचा ले।

इस पृष्ठभूमि में ‘‘इंडिया’’ के वैसे नेता का भविष्य अनिश्चित हो गया है जो ऐसे मामले में ‘‘कम साहसी’’ रहे हैं।

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ऊपर लिखी बातें गठबंधन ‘‘इंडिया’’

के सूत्रों से मिली जानकारियों या काॅमन सेंस के आधार पर लिखी गयी हैं।

चुनाव में जाने वाला कोई भी गठबंधन यह नहीं कहता कि हम सत्ता में नहीं आएंगे।

उसी तरह राजग कैसे कहेगा कि हम सत्ता से इस बार दूर हो जाएंगे जबकि उसके पास नरेंद्र मोदी जैसे अत्यंत लोक्िरपय नेता हंै।

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हाल के जनमत संग्रहों के नतीजे तो मोदी के ही पक्ष में हैं।

आज कल जनमत संग्रह के नतीजे आम तौर पर सही ही साबित होते रहे हैं।

पर, अभी तो अगले कई महीनों में पता नहीं क्या-क्या होने वाला है और उसका किस गठबंधन पर कैसा नतीजा होने वाला है।

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16 अगस्त 23

   


सोमवार, 14 अगस्त 2023

  रणदीप सुरजेवाला के ताजा बोल इंदिरा 

 गांधी की इमरजेंसी मानसिकता का ही विस्तार

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सुरेंद्र किशोर

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आज करोड़ों लोगों को राक्षसी प्रवृति वाला बताने

और आपातकाल में लाख से अधिक लोगों को जेलों 

में बंद कर देने में कितना फर्क है ?

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तब की प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने तब के अपने राजनीतिक विरोधियों को विघटनकारी कहा था।

सुरजेवाला राक्षसी प्रवृति वाला बता रहे हैं।

राक्षसी प्रवृति वाले अधिक सजा के हकदार है या विघटनकारी ? 

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5 सितंबर, 1918 को रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि ‘‘कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके खून में ब्राह्मण समाज का डी.एन.ए.है।’’

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चूंकि खुद सुरजेवाला ब्राह्मण समाज से आते हें,इसलिए वे समझते हैं कि उन्हें श्राप या वरदान देने का पूरा अधिकार है। 

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14 अगस्त, 23 को उसी कुरुक्षेत्र की धरती से रणदीप सुरजेवाला ने जन सभा में उन लोगों को श्राप दिया जो भाजपा के समर्थक हैं या मतदाता हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा के समर्थक और मतदाता राक्षसी प्रवृति के हैं।

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ब्राह्मण डी.एन.ए.वाले बयान पर कांग्रेस हाईकमान ने सुरजेवाला के खिलाफ कुछ नहीं कहा।

दरअसल सुरजेवाला हाईकमान के बहुत करीबी हैं।माना जाता है कि वे हाईकमान की इच्छा को ही अभिव्यक्त करते रहते हैं।

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अभी तो सुरजेवाला का दल केंद्र की सत्ता में नहीं हैं।

जिस दिन उनकी पार्टी कांग्रेस, केंद्र में सत्ता में आ जाएगी तो राक्षसी प्रवृति वाले लोगों को वह क्या दंड देगी ?

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1975-77 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने क्या दंड दिया था ?

एक लाख से अधिक लोगों को अदालती सुनवाई की सुविधा से वंचित करके जेलों में डाल दिया था।

 पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में परिवर्तित कर दिया था।

25 जून 1975 को इमर्जेंसी की घोषणा के साथ इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि देश में ‘‘विधटनकारी तत्व पूर्ण रूप से सक्रिय हैं।साम्प्रदायिक भावनाएं उभारी जा रही है।’’

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उसी इमरजेंसी वाली प्रवृति से प्रेरित होकर सुरजेवाला ने आज कहा है कि भाजपा के वोटर और समर्थक राक्षसी प्रवृति के हंै।

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भाजपा के वोटरों और समर्थकों की संख्या करोड़ों में है।क्या इतने अधिक लोग आज राक्षसी प्रवृति के हैं ?

प्राचीन ग्रंथों के राक्षस जो -जो काम करते थे ,क्या वही सब काम आज भाजपा के करोड़ों वोटर और समर्थक कर रहे हैं ?

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इंदिरा गांधी ने 1975 में जिन्हें विघटनकारी कहा था ,उनकी संख्या कितनी थी जो पुलिस-सेना आदि के कंट्रेाल में नहीं आ सकते थे ?

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दरअसल दोनों अवसरों पर मूल कारण दूसरे रहे।

  बहाना कुछ और बनाया गया।

1975 में इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो जजमेंट आया था ,उससे पार पाने के लिए इमरजेंसी लगाना उनके लिए जरूरी हो गया था।

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आज सोनिया-राहुल-राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जो गंभीर मुकदमे चल रहे हैं,उनसे निजात पाना सामान्य दिनों में असंभव काम है।

क्योंकि कोर्ट एक हद से अधिक इस परिवार की मदद नहीं कर सकता है।

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क्या सुरजेवाला को यह लगता है कि उनका ‘इंडिया’ गठबंधन 2024 के लोकसभा के चुनाव में जीत कर केंद्र की सत्ता में आ जाएगा ?

क्या भावी कांग्रेस नीत सरकार इमरजेंसी जैसा कोई काम करेगी जो काम इंदिरा गांधी ने 1975 में किया था ?

इंमरजंेसी लगाने से कई महीने पहले इंदिरा गांधी ने जेपी पर ऐसा आरोप लगाया था जिस तरह का आरोप उस संत के खिलाफ उससे पहले या बाद में किसी ने नहीं लगाया था।

यानी, इंदिरा जी का उद्देश्य था कि जेपी और उनके समर्थकों को पहले बदनाम कर दिया जाए और बाद में इमरजेंसी लगा दी जाए।

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क्या सुरजेवाला भाजपा समर्थकों को राक्षस कह कर उसी उद्देश्य से पहले से ही उन्हें बदनाम कर रहे हैं ?

इंदिरा गांधी के शब्द विधटनकारी से अधिक कड़ा शब्द राक्षसी प्रवृति है।

इंदिरा गाधी के खिलाफ 1975 वाला जजमेंट जितना नुकसानदेह था,उससे अधिक नुकसान देह उन मुकदमों के फाइनल नतीजे होंगे जो सोनिया-राहुल-वाड्रा पर चल रहे हैं।

इसलिए शब्द भी उसी अनुपात में अधिक कटु हंै।

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14 अगस्त 23

  

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शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

 भूली-बिसरी यादें 

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15 अप्रैल, 1980 को सीताराम केसरी के साथ 

कांग्रेस सांसद संजय गांधी पटना में थे 

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दैनिक ‘आज’ के लिए मैंने उनके पत्रकार सम्मेलन 

की रिपोर्टिंग भेंटवार्ता की तरह की थी !

यानी लीक से थोड़ा हटकर।

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सुरेंद्र किशोर

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चर्चित कांग्रेस नेता संजय गांधी ने उस दिन अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था कि ‘‘जार्ज फर्नांडिस को पुल उड़ाने के अलावा और क्या आता है ?’’

(याद रहे कि इमरजेंसी में जार्ज और उनके साथियों के खिलाफ यह केस चलाया गया था कि वे डायनामाइट से पुल उड़ा रहे थे।)

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सन 1980 के लोक सभा चुनाव के बाद इंदिरा गांधी सत्ता में आ चुकी थीं।

बिहार में विधान सभा का चुनाव होने वाला था।

संजय गांधी राज्यों का दौरा कर रहे थे।कांग्रेस के पक्ष में हवा थी।

इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस के वे सर्वाधिक ताकवर नेता थे।

मुख्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री स्तर के नेता उनके लिए कुर्सी उठाकर लाते थे तो कोई उनकी चच्पल उठाकर उनके पांव तक पहुंचाता था।

उनके प्रेस कांफे्रंस को कवर करना भी अपने आप में एक अलग ढंग का अनुभव होता था।

मेरेे लिए तो विशेष अनुभव था क्योंकि बड़ौदा डायनामाइट केस में मुझे भी सी.बी.आई.खोज रही थी।हालंाकि जनता पार्टी के शासन काल में उस केस को उठा लिया गया था।

खैर,पत्रकार सम्मेलन में उनसे हुई बतचीत का पूरा विवरण यहां प्रस्तुत है--

याद रहे कि सवाल -जवाब के रूप में लिखे मेरे विवरण के छपने के बाद कोई खंडन नहीं आया था।

 उसे लिखने में मुझे विश्ेाष सावधानी और एकाग्रता रखनी पड़ी थी।

क्योंकि मैं शाॅर्ट हैंड राइंिटग नहीं जानता था।

उन दिनों मैंने अन्य बड़े नेताओं के प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिग भी इसी तर्ज पर की थी।लोगों से सराहना मिली थी।

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प्रश्न-आपकी बिहार यात्रा कैसी रही ?

संजय गांधी--बहुत अच्छी। 

प्रश्न--कल (पटना)हवाई अड्डे पर जो उपद्रव हुए ,उनमें किन लोगों का हाथ हो सकता है ?

संजय गांधी-कोई ऐसे वैसे लोग नहीं थे।

भीड़ बहुत थी।

इसलिए अनियंत्रित हो गयी।

प्रश्न-प्रधान मंत्री पर हमले के पीछे किनका हाथ था ?

सं.गां.--मैं तो दिल्ली में नहीं था।

जांच चल रही है।

निराश लोगों का ही यह काम हो सकता है।

प्रश्न-विधान सभा के चुनाव मं इंदिरा कांग्रेस का क्या भविष्य है ?

संगां-बहुत अच्छा।

प्रश्न-चुनाव में किस तरह के लोगों को टिकट मिलेगा ?

सं.गां.-पिछले तीन वषो्रं में जो लोग पूर्ण वफादारी से पार्टी के साथ रहे हैं,जो जेल गये है,और  जिनकी जीत की संभावना होगी।

 जो लोग इस अवधि में हमारा विरोध करते रहे हैं,उन्हें टिकट नहीं मिलेगा।

प्रश्न-क्या विधायक दल को नेता कोई बाहरी व्यक्ति भी हो कसता है ?

सं.गां.-इसके लिए कानून में कोई पाबंदी नहीं है।

कर्पूरी जी और श्री रामनरेश यादव तो बाहरी व्यक्ति ही थे।(यानी लोक सभा के सदस्य थे।)

प्रश्न-कुछ लोग कहते हैं कि सरकार को चलाने में आपकी सक्रिय भूमिका है।

सं.गंा.-कौन कहता है ?

उसका नाम तो बताएं।

सिर्फ अखबार वाले कहते हैं।

प्रश्न-जार्ज फर्नांउिस कहते हैं।

सं.गां.-उन्हें पुल उड़ाने के अलावा और क्या आता हे ?

वे सरकार चलाना क्या जानें ?

प्रश्न-आप संगठन का ही काम देखेंगे या सरकार में भी शामिल होंगे ?

सं.गां.-क्या यह मेरी इच्छा पर निर्भर है ?

प्रश्न-आॅफर मिले तो  ?

सं.गां.-कौन आॅफर दे रहा है ?

प्रश्न-प्रधान मंत्री !

सं.गां.-उनसे पूछिए।

प्रश्न- क्या असम आंदोलन में विदेशी शक्तियां सक्रिय हैं ?

सं.गां--जैसे ही 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी,विदेशी ताकतों की बन आई।

किंतु अब वे असुविधा महसूस कर रहे हैं,अतः उपद्रव मचा रहे हैं।

विदेशी शक्तियां भारत को मजबूत देखना नहीं चाहतीं।

इसलिए वे देश में आर्थिंक संकट पैदा करना चाहती हैं।

किंतु भारत सरकार समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कृतसंकल्प है।

इस दिशा में प्रयास जारी हैं।

आशा है,जल्दी ही कोई समाधान नहीं निकल आएंगा।

 प्रश्न-क्या आप असम जाएंगे ?

सं.गां.-यदि मेरे जाने से समस्या का समाधान हो सके तो मैं जाऊंगा।

 प्रश्न-क्या नशाबंदी समाप्त होनी चाहिए ?

सं.गां.-मैं नशाबंदी के विरुद्ध हूं।इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है।

क्योंकि इसे पूर्णतः लगू नहीं किया जा सकता।

प्रश्न-क्या आप पांच सूत्री कार्यक्रम को पुनः चलाना चाहते हैं ?

सं.गां.-हां,किंतु परिवार नियोजन को छोड़कर।

क्योंकि मैंने यह अनुभव किया कि देश की जनता परिवार नियोजन नहीं चाहती,जबकि इसके बिना देश की समस्याओं का समाध्धान नहीं होगा।

प्रश्न-क्या आप परिवार नियोजन की जरूरत समझते हें ?

सं.गां.-हमने परिवार नियोजन करा लिया है।

प्रश्न-क्या आप मारुति कारखाने को पुनर्जीवित करना चाहते हैं ?

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इस इंटरव्यू को दुबारा पढ़ने और आज राहुल गांधी के बातों को सुनने से यह लगता है कि संजय गांधी सुलझे हुए विचार के नेता थे।राहुल गांधी उनके सामने नहीं टिकते। 

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