रविवार, 17 सितंबर 2023

   अब समझ में आया  कि प्रधान मंत्री प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते ?!!!

     ..................................................

       सुरेंद्र किशोर

     ........................................   

जो नेता लोग लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते,पत्रकारों का सामना क्यों नहीं करते,वही लोग आज 14 टी.वी.एंकरों का सामना करने से भाग रहे हैं।

ऐसा क्यों भाई ?

.................................

ठीक है।

कोई बात नहीं।

उनका सामना मत कीजिए।

आपको यदि कुछ खास एंकरों के बहिष्कार का अधिकार है,

तो उसी तरह किसी प्रधान मंत्री को भी प्रेस कांफ्रंेस नहीं करने का अधिकार है।

.............................

उम्मीद है कि अब आप यह सवाल नहीं करेंगे कि मोदी प्रेस कांफे्रंस क्यों नहीं करते।

....................................

एक भूली-बिसरी याद

.............................

अस्सी के दशक की बात है।

पूर्व प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई पटना आए थे।

उनका सत्येंद्र नारायण सिंह के आवास पर प्रेस कांफ्रंेस था।

मैं भी उसमें शामिल था।

एक वरिष्ठ संवाददाता से मोरारजी भाई का संवाद की जगह ‘विवाद’ हो गया।

देसाई जी ने तुनक कर कहा कि 

‘‘मैंने जीवन में कभी पत्रकार सम्मेलन नहीं बुलाया।’’

...........................

बाद में पता चला कि सत्येंद्र बाबू के यहां से पत्रकारों को निमंत्रण चला गया था।

संभव है कि मोरारजी भाई को कहा गया होगा कि प्रेस वाले आ रहे हैं,बात कर लीजिए।

उससे पार्टी का थोड़ा प्रचार हो जाएगा।

................................

16 सितंबर 23   


शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

     भारत रत्न के हकदार कर्पूरी ठाकुर

        .........................................  

         सुरेंद्र किशोर

          ...............................

24 जनवरी, 2024 को जननायक कर्पूरी ठाकुर की 101 वीं जन्म जयंती के अवसर पर पटना में समारोह होगा।

उस अवसर पर उनकी संक्षिप्त जीवनी का लोकार्पण होगा।

संपादक द्वय रमाशंकर सिंह और के.सी.त्यागी इस काम मंे लगे हुए हैं। 

यदि इस अवसर पर नरेंद्र मोदी सरकार उन्हें ‘भारत रत्न’सम्मान से सम्मानित करे तो वह सर्वथा उचित होगा।

 मेरी धारणा है कि नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पद्म सम्मान उन्हें ही दिए जा रहे हैं जो इसके असली हकदार हैं।

(बहुत पहले सरदार खुशवंत सिंह ने कहा था कि मैं यह बात नहीं समझ पाता हूं कि पद्म सम्मान देने का आधार या मापदंड क्या होता है !’’)

सन 2019 के बाद भारत रत्न सम्मान किसी को नहीं मिला है।

मोदी सरकार यदि इस सम्मान के लिए महान हस्तियों का कोई तुलनात्मक अध्ययन कराएगी तो मेरा विश्वास है कि कर्पूरी ठाकुर का नाम भारी पड़ेगा।

.........................

कर्पूरी जी ‘भारत रत्न’ के हकदार है, यह बात कहने का मेरे पास ठोस आधार है।

समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में मैं सन 1972-73 में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

करीब डेढ़ साल तक रात-दिन जिस व्यक्ति के साथ आप रहेंगे,उसके बारे में आप लगभग सब कुछ जान जाएंगे।

बाद के वर्षों में भी मैंने कर्पूरी जी को एक पत्रकार की हैसियत से देखा-परखा।

  उन मिले-जुले अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि कर्पूरी ठाकुर जैसा नेता मैंने नहीं देखा।

होंगे,पर,मैंने नहीं देखा।

हर व्यक्ति में कुछ कमियां होती हैं तो कुछ खूबियां भी।

यह बात हम पर, आप पर  और कर्पूरी ठाकुर पर भी लागू होती है।

पर, सारी बातों पर विचार करने के बाद भी मेरी यही धारणा बनी है कि ‘‘कर्पूरी जैसा कोई नहीं।’’

.................................

15 सितंबर 23

 ............................

पुनश्चः

कुछ महीने पहले दक्षिण भारत के एक व्यक्ति ने मुुझे फोन किया था।

उन्होंने पूछा कि क्या कर्पूरी

ठाकुर के जीवन पर अंग्रेजी में कोई सामग्री उपलब्ध है ?

मैंने कहा कि मुझे तो नहीं मालूम।

यदि देश के समर्थ व्यक्तित्व रमाश्ंाकर सिंह इस कमी को पूरा कर दें तो वह भी एक सार्थक काम होगा।   


 ‘‘मोदी की गोदी मीडिया’’का बहिष्कार तो ठीक है,पर,

‘‘इंडिया’’ की ‘‘कंधा मीडिया’’ कितना कमाल करेगी ?

.............................................

सुरेंद्र किशोर 

----- 

कांग्रेसनीत ‘इंडी’ गठबंधन ने 14 टी.वी.न्यूज एंकरों के बहिष्कार का निर्णय किया है।

यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।

शम्भूनाथ शुक्ल ने विनोदवश ठीक ही लिखा है कि 

‘‘अब पता चला कि गोदी मीडिया सिर्फ 14 हैं।’’

वैसे इंडी गठबंधन अगली किसी बैठक में यह भी तय कर सकता है कि उसके प्रेस कांफ्रंेस में प्रिंट मीडिया के किन -किन संवाददाताओं को न बुलाया जाए।

यह भी उनका अधिकार है।

जिन्हें न बुलाइएगा,उनको छोड़कर बाकी प्रिंट पत्रकारों पर आप गोदी मीडिया की तोहमत नहीं लगा पाएंगे। 

.............................

खैर, मनाइए कि केंद्र में कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार अभी नहीं है।

और, अभी इमरजेंसी भी लागू नहीं है।(बाद में भी नहीं लागू होगी,उसकी कोई गारंटी नहीं।)

अन्यथा, न जाने कितने पत्रकार जेलों में होते,कितने पत्रकारों की सरकारी मान्यता रद हो जाती और न जाने कितने प्रकाशनों को जबरन बंद करा दिया गया होता।

क्योंकि एक राजनीतिक समूह का आज कुछ पत्रकारों पर गुस्सा उतना ही प्रबल है जितना इंदिरा कांग्रेस का आपातकाल में था।  

.......................

कांग्रेस की इमरजेंसी वाली मानसिकता अब भी कायम है।

वह मानसिकता क्या है ?

यही कि प्रथम परिवार कभी गलत नंहीं होता।

यह भी कि प्रथम परिवार किसी भी कानून से ऊपर है।

अब तो प्रथम परिवार व उनके के सहयोगी दल भी खुद को ‘इंडिया’ यानी देश का पर्यायवाची बता रहे हैं।

मोदी विरोधी गठबंधन का इंडिया नाम इसी मानसिकता के तहत पड़ा है।

याद करा दूं ,आपातकाल में कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरूआ ने कहा था 

‘‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा।’’

बरूआ जी ने तो एक अन्य अवसर पर यह भी कहा था कि ‘‘संजय गांधी हमारे नए शंकराचार्य और विवेकानंद हैं।’’

(जुलाई 1975)

................................

इमरजेंसी सिर्फ इसीलिए लगा दी गयी थी क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रथम परिवार को कानून से ऊपर समझने से इनकार कर दिया था।

यानी,चुनावी भ्रष्टाचरण के आरोप में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता रद कर दी थी।

प्रधान मंत्री बने रहते हुए उस सदस्यता को फिर से पा लेने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून को ही बदल देना प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने जरूरी समझा था।

बिना इमरजेंसी लगाये,

बिना जेपी सहित हजारों नेताओं -कार्यकर्ताओं को जेलों में  ठंूसे,

बिना पे्रस पर कठोर सेंसर लगाए और 

बिना सुप्रीम कोर्ट को पूरी तरह काबू में किए यह संभव नहीं था।

आपातकाल (1975-77)में संसद ने जन प्रतिनिधित्व कानून की उन दो धाराओं को आवश्यकतानुसार बदल दिया जिनके तहत इंदिरा गांधी की सदस्यता गयी थी।

उन संशोधनों को पिछली तारीख से लागू कर दिया गया।

सामान्यतः कोई कानून पिछली तारीख से लागू नहीं होता।पर,उस पर भी सुप्रीम कोर्ट का ‘सुप्रीम मौन’ रहा।

याद रहे कि एटाॅर्नी जनरल नीरेन डे ने तब सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हमने जनता के जीने का अधिकार भी स्थगित कर दिया है।उस पर भी सुप्रीम कोर्ट मौन रहा था तब।हमने कैसे बर्बर काल खंड देखे हैं,उसकी कल्पना आज की पीढ़ी को नहीं है।  

...............................

इमरजेंसी में इंदिरा सरकार ने देश भर के 253 पत्रकारों को भी आंतरिक सुरक्षा कानून,भारतीय रक्षा कानून तथा अन्य दफाओं में गिरफ्तार करके जेलों में ठूंस दिया।

उनमें मध्य प्रदेश के 59 और बिहार के 12 पत्रकार शामिल थे।

मेरे जैसे कुछ पत्रकार अपनी फरारी में अपार कष्ट झेल रहे थेे। मेरे जैसे फरार लोगों को कोई शरण देने को भी तैयार नहीं था,मदद की बात कौन कहे !

अंग्रेजों की अपेक्षा तब अधिक क्रूर शासन इस देश ने देखा था।

जेल में बंद नेताओं से अदालत

में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाने का भी अधिकर छीन लिया गया था।

इतनी कड़ाई अंग्रेजों ने भी नहीं की थी।

जेपी ने इंदिरा सरकार से कहा था कि वह मेरे साथ राजनीतिक सह बंदी रखने की व्यवस्था कर दीजिए।यह मांग भी नहीं मानी गयी।जबकि अंग्रेजों ने 1942 में जेल में लोहिया को जेपी के साथ रहने की अनुमति दे दी थी।

...............................

इनके अलावा आपातकाल में देश-विदेश के 50 पत्रकारों की सरकारी मान्यता रद कर दी गयी थी।

जिन पत्रकारों की मान्यता रद कर दी गयी ,उनमें हिन्दुस्तान टाइम्स,टाइम्स आॅफ इंडिया,न्यूज एजेंसी ‘समाचार’,जर्मन रेडियो,न्यूजवीक,बी.बी.सी. सहित अनेक प्रतिष्ठित देशी-विदेशी समाचार संगठनों के पत्रकार शामिल थे।

.................................

बाद में भी उसी प्रवृति के तहत मीडिया को कंट्रोल करने के लिए बिहार की डा.मिश्र सरकार और बाद में राजीव गांधी सरकार ने दमनात्मक प्रेस बिल लाया था।

जन दबाव के कारण वापस करना पड़ा।

...........................

यह सब इस बात के बावजूद हुआ कि मीडिया का किसी को चुनाव जिताने और हराने में शायद ही कोई निर्णायक रोल होता है।

सन 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव से ठीक पहले अधिकांश मीडिया लालू प्रसाद के खिलाफ था।

जहां तक मुझे याद है, सिर्फ सुरेंद्र प्रताप सिंह ने द टेलिग्राफ में साफ -साफ यह लिखा था कि लालू प्रसाद बहुमत के साथ विजयी होंगे।

वही हुआ भी।मीडिया के खिलाफ रहने का कोई प्रतिकूल असर लालू पर नहीं पड़ा।

............................

सन 1971 में मुख्य धारा का प्रेस तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ था।

फिर भी 1971 के लोक सभा चुनाव में इंदिरा गांधी को पूर्ण बहुमत मिल गया।

पर,1977 में जब चुनाव हुआ तब मीडिया इमरजेंसी के सरकारी आतंक की छाया में दबा हुआ था।

इमरजेंसी के अभूतपूर्व-लोमहर्षक अत्याचारों की कोई चर्चा मीडिया में चुनाव के दौरान नहीं हुई थी।

इंदिरा गांधी ने उसे पालतू जो बना लिया था।

फिर भी 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी बुरी तरह हारकर केंद्र की सत्ता से बाहर हो गयी।

..........................

और अंत में

---

इंडी गठबंधन ने जिन 14 टी.वी एंकरों को ‘मोदी की गोदी मीडिया’ माना,उन्हें बायकाॅट कर दिया।

पर,मीडिया के जिस हिस्से को ‘‘इंडिया’ की कंधा मीडिया’’ कई लोग मानते हैं,उनका साथ लेकर आप कितनी बड़ी चुनावी सफलता हासिल कर पाएंगे ?

..........................    


 जब -जब चुनाव करीब आता है तो 

कांग्रेस, भाजपा से सवाल पूछती है कि आप 

लोग बहुत हल्ला कर रहे थे,पर बोफोर्स मामले 

में क्या हुआ ?!!

.................................

एक बार फिर चुनाव करीब है 

यहां पढ़िए-

बोफोर्स मामले में यह सब हुआ।

...............................

सुरेंद्र किशोर

.......................

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जे.डी.कपूर ने 4 फरवरी 2004 को 

बोफोर्स मामले में राजीव गांधी और बोफोर्स दलाल को क्लीन चिट दे दी।

  दिल्ली की तब की शीला दीक्षित सरकार ने रिटायर होने के तत्काल बाद जस्टिस जे.डी.कपूर को 14 जुलाई 2004 को दिल्ली उपभोक्ता आयोग का अध्यक्ष बना दिया।

................................

(अससी के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने एक कांग्रेसी मुख्य मंत्री को भ्रष्टाचार के मामले में क्लिन चिट दे दी थी।

उस जज को कांग्रेस ने तुरंत राज्य सभा में भेज दिया।

उस मुख्य मंत्री पर चेक से घूस लेने का आरोप प्रमाणित था।)

........................................

उधर बाफोर्स मामले में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति तक नहीं दी।

 जबकि सी.बी.आई.के निदेशक एस.के. शर्मा ने कानूनी सलाह लेने के बाद 24 अप्रैल 2004 को ही अपनी यह राय दे दी थी कि अपील की जानी चाहिए।अपील का केस बनता है। 

पर,अपील के लिए समय रहने के बावजूद अज्ञात कारणों से वाजपेयी सरकार ने अपील की अनुमति नहीं दी।

 अटल बिहारी वाजपेयी सरकार 21 मई, 2004 तक सत्ता में रही।

ऐसी ही कमजोरियां दिखाने के कारण अटल सरकार 2004 के चुनाव के बाद सत्ता में नहीं आ सकी।

नरेंद्र मोदी ऐसी कमजोरी नहीं दिखाते,इसलिए दुबारा सत्ता में आए।

तीसरी बार नहीं ही आएंगे,ऐसी कोई गारंटी नहीं। 

दरअसल इस देश में जब भी कोई सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ निर्ममता दिखाती है तो उससे अधिकतर आम जनता खुश हो जाती है। 

............................ 

12 सितंबर 23 


शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

 


नगरों की सघन आबादी को छितराये बिना जाम से मुक्ति नहीं

.......................................

सुरेंद्र किशोर

.............................

 खुशखबरी है कि पटना विश्व विद्यालय के साउथ कैंपस के निर्माण के लिए मास्टर प्लान तैयार हो गया है।

इससे अशोक राज पथ पर से आबादी का बोझ कुछ कम होगा।

यदि कुछ महा विद्यालयों को भी कहीं और स्थानांतरित करने की गुंजाइश हो तो उस पर भी विचार होना चाहिए।

जेपी गंगा पथ के बन जाने से भी राहत मिली है।

दरअसल परेशानी का कारण यह है कि एक ही रोड पर कई महत्वपूर्ण संस्थान स्थापित कर दिए जाते हैं।

ऐसा राज्य के अन्य नगरों में भी हुआ है।

पटना के अशोक राजपथ पर पटना विश्व विद्यालय,पटना मेडिकल काॅलेज व अस्पताल, जिला कचहरी तथा कलक्टरी अवस्थित है।

इनमें से कुछ संस्थानों को मुख्य शहर से बाहर भेजा जाना चाहिए।

इधर एक और अच्छी खबर आई है।

पटना के हड़ताली मोड़ के पास के पुराने सरकारी आवासों को तोड़ कर वहां बहुमंजिली इमारतें बनेंगी।

 उस सिलसिले में एक बात पर खास तौर पर ध्यान देने की जरुरत है।

नव निर्मित इमारतों में रहने वालों के लिए पार्क और खेल मैदान बने तो लोगों को राहत मिलेगी।

बिहार के अन्य नगरों को भी छितरा देने की जरूरत है ताकि मुख्य नगर दिन भर जाम से परेशान न रहंे।   

..................................

विश्वविद्यालयों पर द्वैध शासन

............................

 समय आ गया है कि अब देश के विश्व विद्यालयों पर जारी द्वैध शासन को समाप्त कर दिया जाए।

क्योंकि द्वैध शासन के कारण राज्यपालों व राज्य सरकारों के बीच आए दिन अशोभनीय 

वाद-विवाद होते रहते हंै।

जानकार लोग बताते हैं कि बेहतर यही होगा कि विश्वविद्यालय या तो पूरी तरह राज्य सरकार के नियंत्रण में रहंे या फिर पूरी तरह केंद्र सरकार के कंट्रोल में।

इससे विश्व विद्यालय शिक्षा की विफलताओं को लेकर एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा देने का किसी पक्ष को मौका नहीं मिलेगा।

राज्यपाल-कुलपति  विवाद के पीछे शिक्षा से अधिक दलीय राजनीति होती है।

आजादी के बाद के शुरूआती वर्षों में एक ही दल की सरकारें दोनों जगह होती थीं, इसलिए आपसी विवाद नहीं होता था।

पर,बदली हुई स्थिति में इस समस्या पर अलग ढंग से विचार करने की जरुरत है।

.......................................

प्रवक्ताओं की जानकारी

..................................

संसद के विशेष सत्र को लेकर सोनिया गांधी ने प्रधान मंत्री को पत्र लिखा।

एक टी.वी.डिबेट में भाजपा प्रवक्ता ने यह सवाल उठाया कि वह तो किसी पद पर हैं नहीं।फिर उन्होंने किस हैसियत से पत्र लिखा ?

कांग्रेस प्रवक्ता  ने उनका ज्ञान वर्धन करते हुए कहा कि वह कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष हैं।

  इस पर भाजपा प्रवक्ता चुप हो गये।

भ्रष्टाचार के हाल के वर्षों के आरोपों की चर्चा होती है तो कांग्रेस के प्रवक्ता गण आए दिन यह कहा करते हैं कि बोफोर्स घोटाले का 

क्या हुआ ?

2 -जी घोटाले का क्या हुआ ?

इन घोटालों की प्रतिपक्ष ने बड़ी चर्चा की थी।

उस पर गैर कांग्रेसी दलों के प्रवक्ता चुप हो जाते हैं।

क्यांेकि वे नहीं जानते कि 2 -जी घोटाला संबंधित मुकदमा अब भी दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन है।

वे यह भी नहीं जानते कि बोफोर्स घोटाला मामले में एक दलाल के मुम्बई स्थित फ्लैट को आयकर महकमा नीलाम कर चुका है।क्योंकि

बोफोर्स दलाली के पैसों पर  आयकर विभाग का टैक्स बनता था।

यानी, प्रवक्ताओं को बहस के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत है।

.............................

टिकटार्थी को टका सा जवाब

............................

हर आम चुनाव से ठीक पहले दल बदल की घटनाएं बढ़ जाती है।

अपवादों को छोड़कर आम तौर टिकटार्थी ही अधिक

दल बदल करते हैं।

सन 2024 के लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बिहार के भी ‘मौसमी पक्षी’ सक्रिय हो गये हैं।

पर,दलों को चाहिए कि वे इसमें सावधानी बरतें।

क्योंकि दल में आने के बाद जब उन्हें टिकट नहीं मिलेगा तो वे तरह -तरह के आरोप लगाते हुए आपके दल से इस्तीफा दे देंगे।उनमें कुछ आरोप बहुत घटिया और मानहानिकारक भी हो सकते हंै।

कई साल पहले मैं एक दल के प्रादेशिक अध्यक्ष के पास बैठा हुआ था।

 एक नेता आए। कहा कि आपके दल में शमिल होना चाहता हूं।

प्रदेश अध्यक्ष ने और कोई बात किए बिना पूछ दिया,‘‘आप किस क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते हैं ?’’

आगंतुक ने क्षेत्र का नाम बता दिया।अध्यक्ष जी ने कहा कि वह सीट किसी अन्य नेता के लिए रिजर्व है।आगंतुक उठकर चले गये।

बाद में अध्यक्ष जी ने कहा कि पहले ही बात साफ हो जानी चाहिए अन्यथा टिकट नहीं मिलने पर यही व्यक्ति हमारी पार्टी को न जाने क्या -क्या कहेंगे ।

अन्य दल उस प्रदेश अध्यक्ष की सावधानी की खबर से लाभ उठा सकते हैं।   

...............................

और अंत में 

.........................

अगले लोक सभा चुनाव के अब बहुत दिन नहीं हैं।

अच्छा है कि उम्मीदवारों के चयन व सीटों के तालमेल पर विचार -विमर्श शुरू हो चुका है।

गैर राजनीतिक हलकों में एक बात कही जा रही है। वह यह कि जो राजनीतिक दल अपने जितने अधिक निवर्तमान सांसदों के टिकट काटेगा,उस दल के विजयी होने की पहले से बेहतर संभावना बनेगी।

........................

काॅलम ‘यदाकदा’

प्रभात खबर

बिहार संस्करण

8 सितंबर 23



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

 जो दल  देश,काल,पात्र की वास्तविक समस्याओं और जरूरतों 

को समझ कर उनके हल के लिए गंभीर प्रयास नहीं 

करेगा,वह इस देश में टिकाऊ नहीं होगा

...................................

सुरेंद्र किशोर

...............................

जयप्रकाश नारायण,डा.राम मनोहर लोहिया,सोवियत संघ और चीन !

फिलहाल आज इन्हीं की चर्चा करूंगा।

चारों ने देश,काल, पात्र की जरूरतों के अनुसार अपनी नीतियां-रणनीतियां बदली हैं।

चारों अपने -अपने उद्देश्यों में काफी हद तक सफल रहे।

......................................

पर,सवाल है कि जेपी,लोहिया,सोवियत संघ और चीन के भारतीय प्रशंसकों ने उनसे कितना कुछ सीखा ?

मुझे लगता है कि नहीं सीखा।

इसीलिए आज वे पूरे देश के स्तर पर निर्णायक नहीं है।

बल्कि इस देश की राजनीति में अभी तो भाजपा निर्णायक है।

कल क्या होगा,मैं उसकी भविष्यवाणी कैसे कर दूं ?

भविष्य जानता भी हूं,फिर भी नहीं करूंगा।

..........................................

जेपी से बात शुरू करता हूं।

जेपी पहले माक्र्सवादी थे।

समझते थे कि उसी से मानवता खास कर भारतीयों का कल्याण होगा।

पर,उन्होंने जब महसूस किया कि भारत की मिट्टी के लिए वह अनुकूल नहीं है तो वे पहले कांग्रेस और बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े।

प्रथम चुनाव के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास लेकर सर्वाेदय-भूदान ज्वाइन किया।

पर,जब सत्तर के दशक में उन्होंने महसूस किया कि इंदिरा गांधी की एकाधिकारवादी सरकार देश के लिए ठीक नहीं है तो छात्रों-युवकों के आंदोलन को सफल नेतृत्व दिया।

ऐसी आंधी चलाई कि पहली बार केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार टूट गया।

 जो कुछ तब की जनता चाहती थी,जेपी उस चाह के स्वर बने।

    क्या जेपी के आज के प्रशंसक-समर्थकगण आम जनता की वास्तविक चाह और जरूरतों की पहचान कर पा रहे हैं ?

लगता तो नहीं है।

वैसे इस सवाल का पक्का जवाब सन 2024 का लोस चुनाव रिजल्ट दे देगा।

कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति कहेगा कि सन 1977 की केंद्र की मोरारजी देसाई सरकार, पिछली कांग्रेस सरकार से बेहतर थी।

1977 में बिहार में बनी कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली जनता सरकार पिछली कांग्रेसी सरकार से बेहतर थी।

यदि जेपी अपनी पुरानी ही विचार धारा व कार्य प्रक्रिया से जुड़े रह जाते तो वह परिवर्तन नहीं करा पाते जैसा उन्होंने सन 1977 के ऐतिहासिक क्षणों  में करा दिया।

कल्पना कीजिए कि तब के एक तानाशाह के सामने जेपी जैसे संत नहीं उठ खड़े होते तो इस देश का क्या होता ?

.....................................

अब डा.राम मनोहर लोहिया पर आते हैं।

डा.लोहिया पहले खुद अपनी सोशलिस्ट पार्टी वर्षों तक अकेले चलाते रहे।

सोपा और बाद की संसोपा तब सिद्धांत के पक्के लोगों की जमात थी जब तक लोहिया जीवित थे।

पर,अपने जीवनकाल में ही जब लोहिया ने यह महसूस किया कि अकेले हमारी पार्टी कुछ खास नहीं कर सकती,तो उन्होंने गैर कांग्रेसी दलों से तालमेल और गठबंधन की कोशिश शुरू की।

लोहिया के सहयोगी जार्ज फर्नांडिस कम्युनिस्टों से तालमेल के सख्त खिलाफ थे।

उन्होंने लोहिया से कहा कि यदि उनसे तालमेल करोगे तो अपना मुंह काला करा कर लौटोगे।

लोहिया ने जवाब दिया--यदि नहीं करोगे तो मुंह डबल काला होगा।

एक हद तक तालमेल हुआ और सन 1967 के चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी।

कांग्रेस जो खुद को अजेय समझती थी और अहंकारी हो चुकी थी,उसका मद लोहिया ने तोड़ दिया।

लोहिया का ही करिश्मा था कि 1967 के बिहार व उत्तर प्रदेश सरकारों में 

जनसंघ और सी.पी.आई.के मंत्री एक साथ मिलकर काम कर रहे थे।

....................................... 

सोवियत क्रांति में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की युगांतरकारी उपलब्धि थीं।

उसने समानतावादी समाज बनाने की कोशिश की।

एक हद तक वे सफल भी हो गये।

पर,कई बार होता यह है कि पिछली दवाएं अनंत काल तक कारगर नहीं रहतीं।

वैसे में होश्शियार लोग दवाएं बदल लेते हैं।

रूस ही नहीं, चीन में भी यही हुआ।दवाएं बदली गयीं।

चीन में जब पूंजीवाद आया तो वहां की सरकार से सवाल पूछा गया।

उसने जवाब दिया कि हम समाजवाद की रक्षा के लिए पूंजीवाद अपना रहे हैं।

चीन ने एक काम और किया।उइगर के जेहादी मुसलमानों का उसने ऐसा दमन किया जैसा भारत के कम्युनिस्ट सोच भी नहीं सकते।

भारत के कम्युनिस्ट दल तो पश्चिम बंगाल व केरल में जेहादियों का विरोध करने का नाम तक नहीं लेते।बल्कि उन्हें वोट के लिए बढ़ावा देते हैं।

नतीजतन उन राज्यों में भी भाजपा जड़ें जमाने लगी है।

..............................

काश ! भारत के सोवियत पक्षी कम्युनिस्ट, पहले के सोवियत संघ व बाद के रूस से तथा चीन पंथी कम्युनिस्ट चीन में आए परिवर्तनों से शिक्षा लेते तो उन दलों का यह हाल नहीं होता जो आज है।

.................................

उसी तरह जेपी-लोहिया के आज के शिष्य समाजवादी के बदले व्यवहारवादी हो चुके हैं।

  इस देश के कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों से पूछिए कि इस देश की तीन सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्याएं कौन सी है ?

वे वही बताएंगे जो बताते रहे हैं,उनमें असली तीन समस्याएं शामिल नहीं होंगी ं।

नतीजतन उनके भविष्य की कल्पना कर लीजिए। 

भारत जैसे एक गरीब देश के लिए सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट एक समय जरूरी माने गये थे।

आज भी जरूरी होनी चाहिए थी।

पर,समस्याओं की पहचान व उसके उपाय में वे विफल रहे।जबकि इन दो संगठनों में एक से एक ईमानदार और निःस्वार्थी नेता व कार्यकर्ता रहे हैं।

..............................

एक रोचक उदाहरण के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा।

सन 1977 के चुनाव अभियान के दौरान जनता पार्टी के नेता -कार्यकर्ता गण इमरजेंसी के अत्याचारों और इंदिरा गांधी की तानाशाही की बातें अपनी चुनाव सभाओं में करते थे।

पर,दूसरी ओर ,सी.पी.आई.अक्सर अपनी चुनाव सभाओं में यह भी कहती थी कि दियो गार्सिया द्वीप में अमेरिका सैनिक अड्डा बना रहा है, उससे भारत को खतरा है।

  1977 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सी.पी.आई.की भी भारी पराजय हुई।

उसके बाद बिहार सी.पी आई की बैठक में एक जूनियर कामरेड ने अपने बड़े नेता पूछा--‘‘कामरेड,आजकल दियागो गार्सिया का क्या हाल है ?’’

बेचारे चुप रहे गये।

यह प्रकरण मुझे दैनिक ‘जनशक्ति’पटना के तेज-तर्रार संवाददाता शिवनारायण सिंह ने बताई थी।

बाद में वे दैनिक आर्यावर्त से जुड़े और हम पत्रकारों के नेता भी थे।

........................................

कहानी का मोरल

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

जब तक राजनीतिक दल व उनके नेता देश, काल, पात्र की वास्तविक जरूरतों-समस्याओं को समझ कर उनके समाधान का रास्ता नहीं ढूंढेंगे ,तब तक 

 .........थोड़ा कहना,बहुत समझना !!!

...............................

7 सितंबर 23


बुधवार, 6 सितंबर 2023

 


भारतीय संविधान की मूल प्रति के हिन्दी संस्करण

 की प्रस्तावना में ‘‘इंडिया’’शब्द  क्यों नहीं ?

...............................

--सुरेंद्र किशोर

................................

भारत के संविधान की मूल प्रति मेरे निजी पुस्तकालय में उपलब्ध है।

हिन्दी और अंग्रेजी दोनों संस्करण मैंने एक बार फिर देखे।

प्रस्तावना पढ़ी।

 अंग्रेजी संस्करण की प्रस्तावना में भारत शब्द नहीं है।

हिन्दी संस्करण की प्रस्तावना में इंडिया शब्द नहीं है।

ऐसी असंगति क्यों ?!!

बी.बी.सी.वाले डा.विजय राणा बताते हैं कि संविधान के किसी भी भाषाई संस्करण में इंडिया शब्द नहीं है।

जाहिर है कि यह फैसला तो संविधान सभा का ही है।

..................................

भारत तो देसी नाम है।

प्राचीन है।

परंपरागत है।

भारत शब्द हमारे प्राचीन ग्रंथ में भी मिलता है।

इंडिया तो अंग्रेजों का दिया हुआ नाम है।

वह गुलामी की निशानी है।

आजादी के बाद की हमारी सरकारों ने बारी -बारी से नई 

दिल्ली की उन सड़कों के वे नाम बदल दिए जो गुलामी की निशानी थे।

पता नहीं संविधान से इंडिया शब्द को क्यों नहीं बदला ?

नहीं बदला तो यह काम मौजूदा सरकार कर रही है।

..........................

आजादी के बाद नई दिल्ली की जिन सड़कों के नाम बारी -बारी से बदल दिए गए,उनके नये-पुराने नाम यहां दिए जा रहे हैं--

1.-किंग्स वे--राजपथ

 2.-कुतुब रोड--श्री अरविंद मार्ग

3.-क्लाइव रोड--त्यागराज मार्ग

4.-लिटिन रोड--काॅपरनिकस मार्ग

5-किंग एडवर्ड रोड--मौलाना आजाद रोड

6.-विक्टोरिया रोड--राजेंद्र प्रसाद रोड

7.-हेस्टिंग्स रोड--कृष्ण मेनन मार्ग

8.-इम्पीरियल रोड--जनपथ

9.-कैंटोनमेंट रोड--बाबा खड़ग सिंह रोड

10.-क्वीन मेरिज एवेन्यू --पंडित पंत मार्ग

11-एलनबाई रोड--डा.बिशम्बर दास मार्ग

12.-बेयर्ड रोड--बंगला साहिब मार्ग

13.-मार्किट रोड--भाई वीर सिंह मार्ग

14-इबटसन रोड--रामकृष्ण आश्रम मार्ग

15.-लोअर रिज रोड--मन्दिर मार्ग

16.-वेजले  रोड--जाकिर हुसैन मार्ग

17.-लेडी हार्डिंग रोड--शहीद भगत सिंह रोड

18.-बेअर्ड रोड--गुरुद्वारा बंगला साहिब रोड 

19.-सर्कुलर रोड--जवाहरलाल नेहरू मार्ग

20.-राऊज एवेन्यू --दीन दयाल उपाध्याय मार्ग

21.-ओल्ड मिल्स रोड--रफी मार्ग 

22.-अलबुकर रोड--तीस जनवरी मार्ग

23.-साऊथ एंड रोड--राजेश पायलट मार्ग 

24.-हार्डिंग एवेन्यू--तिलक मार्ग

25.-कर्जन रोड--कस्तूराबा गांधी मार्ग

...................

इसके बाद मद्रास,बंबई और कलकत्ता सहित 19 नगरों के नाम बदले गये।

ऐसा क्यों हुआ ?

ऊपर के नाम बदलने जरूरी थे तो उसी तर्क के आधार पर इंडिया दैट इज भारत को भारत करना भी जरूरी था।जरूरी है।

..............................

6 सितंबर 23