शनिवार, 11 नवंबर 2023

 भारत के समक्ष इजरायल की

 अपेक्षा अधिक गंभीर खतरा ?

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    सुरेंद्र किशोर

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इस पोस्ट को पढ़कर कुछ लोग नाराज हो सकते हैं।

उसी तरह, जिस तरह सरदार पटेल का, चीन से खतरे से संबंधित, पत्र पढ़कर नेहरू नाराज हुए थे।

पर, 1962 के बाद तो लोकतांत्रिक मिजाज वाले प्रधान मंत्री नेहरू ने अपनी गलती स्वीकारी थी।

खबर आई थी,कहीं फोटो भी देखा था कि इसीलिए उन्होंने 1963 के गणतंत्र दिवस पर सुरक्षा बल के साथ साथ आर.एस.एस.की भी परेड करवाई थी। 

किंतु आज के जेहादियों के समर्थक गैर मुस्लिम नेता-बुद्धिजीवी काफी जिद्दी लगते है।ये नेहरू जो नहीं हैं।

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कल ही गीतकार जावेद अख्तर ने हिन्दू संस्कृति में मौजूद सहिष्णुता की सार्वजनिक रूप से सराहना की।

उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दुओं की वजह से ही इस देश में लोकतंत्र कायम है।

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संकेत हैं कि इजरायल-हमास युद्ध की पुनरावृति भारत में भी देर-सबेर हो सकती है।

इस गलतफहमी में मत रहिए कि वहां युद्ध फलस्तीन की जमीन के लिए है।

बल्कि वह तो बहाना है।

जिस तरह जेहादी पाकिस्तान के लिए कश्मीर बहाना है।

बल्कि हमास तथा उस तरह के जेहादी संगठनों का उद्देश्य दूसरा ही है।

गत 27 अक्तूबर 23 को खूंखार जेहादी संगठन हमास के पूर्व प्रमुख ने केरल के अतिवादी मुसलमानों की एक सभा को  आॅडियो-विजुअल माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘हिन्दुओं का उखाड़ फेंको।’’उन्होंने यदि यह कहा होता कि इजरायल को उखाड़ फेंकने में मदद करो तो बात समझ में आती।

याद रहे कि आज की भारत

सरकार भी फलस्तीन का समर्थन करती है।

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भारत में सक्रिय प्रतिबंधित पी.एफ.आई.ने पहले ही से यह घोषणा कर रखी है कि सन 2047 तक हथियारों के बल पर हम भारत को इस्लामिक देश बना देंगेे।

पाक से भी एक जेहादी

ने हाल में हुंकार भरी है कि इजरायल के बाद हमास का अगला निशाना भारत होगा।

ये सब बातें चुनाव लड़ने वाले वोट लोलुप नेतागण आपको नहीं बताएंगे।

उल्टे वे यह बताएंगे कि अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता से अधिक खतरनाक बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता होती है।इसलिए भाजपा-संघ को उखाड़ फेंकिए।

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अब आप कल्पना कीजिए कि युद्ध

पर इजरायल को रोज-रोज कितना खर्च करना पड़ रहा है।

 रकम सुनकर होश उड़ जाएंगे।गुगुल पर देख लीजिए।

भारत पर यदि बाहर-भीतर के जेहादियों का हमला हुआ तो हमारी सरकार को भी भारी खर्च उठाना पड़ेगा।उसके मुकाबले के लिए हमें और अधिक आर्थिक व हथियारी साधन जुटाने पड़ंेगे। 

हां,यदि सन 2024 में ऐसी सरकार सत्ता में आई जो जेहादियों से लड़ने वाली होगी तो ही भारी खर्च होगा।

यदि जेहादियों के समक्ष सरेंडर करने वाली सरकार चुनी गयी तो वही होगा जैसा 2001 में संसद पर हमले और 2008 में मुम्बई पर हुए जेहादी हमले के बाद हुआ।यानी, हमारी सरकारों ने पलट वार नहीं किया।हां, 2001 की घटना के बाद अटल सरकार ने सेना को सीमा पर भेज दिया था।पाक ने भी अपनी सीमा पर अपने सैनिक भेज दिए थे।पर पता नहीं वाजपेयी सरकार को किसने रोक दिया।

सेना वापस आ गयी।

उस पर भारत के एक बड़े सेक्युलर नेता ने यह बयान दिया था कि भारत सरकार पाकिस्तान को हर्जाना दे।

क्योंकि पाकिस्तान को अपनी सेना को सीमा पर भेजने और बुलाने में भारी खर्च आया है।

ऐसे -ऐसे नेताओं से यह देश जूझ रहा है।किसी अगले हमले के समय भी जूझेगा।  

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किंतु इजरायल की सरकार वैसी कायर नहीं है।

जब जेहादियों ने गत 7 अक्तूबर को इजरायल में घुस कर हमला करके ‘‘भारत के मध्य युग’’ को दुहराया तो इजरायल ने ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ रणनीति के तहत जबर्दस्त जवाबी हमला शुरू कर दिया।विदेशों में बसे इजरायली लड़ने के लिए स्वदेश आ गये हैं।

दूसरी ओर 1971 के युद्ध के समय भारत के एक प्रभावशाली परिवार के पायलट ने तो छुट्टी ले ली थी।

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हमले की स्थिति में भारत को

जो खर्च आएगा,उसके लिए यहां के टैक्स चोरों के खिलाफ और भी सघन व कठोर कार्रवाई की जरूरत है।

देशभक्त लोगों को चाहिए कि वे अपने आसपास के टैक्स चोरों के खिलाफ शासन को गुप्त सूचना देकर 

साधन बढ़ाने में मदद करें ताकि हमें एक बार फिर मध्य युग न देखना पड़े।

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आयकर,ई. डी. और सी.बी.आई..की सक्रियता के कारण हाल के वर्षों में भारत सरकार की आय बढ़ी है।गत साल ई डी ने भ्रष्टों के यहां से एक लाख करोड़ रुपए जब्त किये।   

भारत सरकार का वर्ष 2013-14 में कर राजस्व करीब 11 लाख करोड़ रुपए था।

वह बढ़कर 2023-24 वर्ष में 27 लाख करोड़ रुपए हो जाने का अनुमान है।

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पर,अभी इसमें बहुत अधिक बढोत्तरी की गुंजाइश भी है।

क्योंकि प्रभावशाली भ्रष्ट लोग अब भी अपने धंधे में काफी सक्रिय हैं।वे तो कार्रवाई से बचने के लिए अब गिरोह बना रहे हैं।

अगले लोकसभा चुनाव में वे सोरोज से अधिक सक्रिय होंगे। 

लूट का एक नमूना देखिए।

एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के बारे में पिछले दिनों यह खबर छपी कि उसने छह देशों में करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए की निजी संपत्ति बनाई है।वैसे आरोपी को भी अदालत बार बार लगातार  अंतरिम जमानत देती जा रही है।

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केंद्र सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पिछले दिनों इस स्थिति पर अपनी यह पीड़ा जताई थी कि इस देश की अदालत  सामान्य अपराध और आतंकी अपराध के बीच अंतर नहीं कर पा रही है।

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हमारे देश के पडोसी विभिन्न तरह के हैं।

चीन को हमारी जमीन चाहिए।

पाक और बाहर-भीतर के जेहादियों 

को यहां पूरे देश में इस्लामिक शासन चाहिए।

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पर,भारत और अन्य देशों में अंतर है।

अभी 56 या 57 देशों में मुसलमानों का बहुमत है।

ऐसा आम तौर पर तलवार के बल पर हुआ है।

भारत में भी कभी मुसलमानों का शासन था।

अन्य देशों में 20 या 25 साल में ही मुसलमानों का बहुमत हो गया।

पर,भारत में मान सिंहों और जयचंदों की मौजूदगी के बावजूद 

यहां एक तिहाई आबादी को ही मुसलमान बनाया जा सका।

मान सिंह और जयचंद तो राजा थे,इसलिए उनकी अधिक चर्चा होती रही है।

मध्य युग में हिन्दू आबादी का एक हिस्सा ने भी मुसलमान शासकों का साथ दिया था।

आज जेहादियों का साथ देने वालों की संख्या तब से अधिक है।

क्योंकि अब तो चुनाव के लिए वोट भी चाहिए।

आज खतरा बड़ा है।मैंने अपना कर्तव्य समझा कि कुछ बातें आपसे शेयर करूं।ऐसी बातें करने में खतरा भी है।पर,मैंने तो आपातकाल में इससे भी अधिक ‘‘खतरनाक खतरा’’ उठाया था।

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11 नवंबर 23


    दो ही विकल्प

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आतंक को हराओ या आतंक के हाथों हार जाओ

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘आतंक को यथाशीघ्र समाप्त करो या आतंक के हाथों खुद के ही समाप्त हो जाने की प्रतीक्षा करो।’’

लगता है कि अमेरिका आज इसी नतीजे पर पहुंच चुका है।

यदि आतंक ने अंततः इजरायल पर फतह हासिल कर ली तो आतंक यूरोप की ओर बढ़ेगा।

वहां उसके लिए कभी के ‘‘शरणार्थियों’’ ने भूमिका तैयार कर रखी है।

वहां से आतंक अमेरिका पहुंचेगा।

अमेरिका ‘नाइन-एलेवन’ नहीं भूल सकता !!!

उसके बाद कहां -कहां पहुंचेगा,इसका अनुमान लोगबाग लगा लें।

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नब्बे के दशक में ही अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सेम्युएल 

पी. हंटिग्टन ने लिख दिया था कि ‘‘शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब देशों के बीच नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच संघर्ष होगा।

  उस संघर्ष में चीन इस्लामिक देशों के साथ रहेगा।’’

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सुरेंद्र किशोर

नवंबर 23

  


 उनके जन्म दिन पूर्व उप प्रधान मंत्री एल.के.आडवाणी से मिलने और उन्हें बधाई देने कल प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी,गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह उनके आवास पहुंचे थे।

आडवाणी जी 96 साल के हो गये।

बिहार के स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी नेता रामजीवन सिंह भी 2 नवंबर को 92 साल के हो गये।

पर,समाजवादी धारा के किसी नेता ने उनकी खोज-खबर नहीं ली।

राजनीति से रिटायर होकर रामजीवन बाबू अपने गांव(मंझौल,बेगूसराय)रहते हैं।

मैंने यूं ही लिख दिया।राम जीवन बाबू को इसकी चिंता भी नहीं रहती कि कौन मिलता है और कौन नहीं।

आडवाणी जी के चेहरे पर तो थोड़ी उदासी का एक स्थायी भाव नजर आता है।

पर,महेश जी के वाॅल पर रामजीवन सिंह की तस्वीर जब मैं देखता हूं तो मुझे यह नहीं लगता कि वे इस किसी फिक्र में हैं।

रामजीवन सिंह 1967 में पहली बार विधायक बने थे। तब से वे एकाधिक बार मंत्री और सांसद भी रहे।

जहां तक मुझे याद है,समाजवादी धारा की पार्टी के कभी वे बिहार अध्यक्ष भी थे।

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संघ परिवार और समाजवादी परिवार के नेताओं में यही अंतर हेै।

संध परिवार वाले आम तौर पर अपने लोगों से पारिवारिक जैसा संबंध रखते हैं।अपने लोगों के घर जाते रहते हैं।

पर,मैंने कुछ दशकों से देखा है,अपवादों को छोड़ कर सत्ता में आने के बाद अधिकतर समाजवादी ‘साहब’ बन जाते हैं।हालांकि सब एक जैसे नहीं होते।पर अपवादों से तो देश नही चलता न ही कोई संगठन।

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सुरेंद्र किशोर

नवंबर 23


सोमवार, 6 नवंबर 2023

 जब आजादी के बाद से ही सरकारी धन की लूट शुरू हो गयी तो 

80 करोड़ लोगों को आज भी मुफ्त अनाज देने की मजबूरी रहेगी ही।

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1985 में प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम 100 पैसे दिल्ली से भेजते हैं और उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।

बीच के प्रधान मंत्रियों के नामों को याद कर लीजिए।

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ्त राशन योजना की अवधि का विस्तार किया तो कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह विस्तार आर्थिक संकट का संकेत है।

जयराम ने सही कहा।

पर,यह संकट शुरू किसने किया ?

किसने इसे बढ़ाया ?

जाहिर है कि आजादी के तत्काल बाद की सरकारों ने ही।

कारण--भीषण सरकारी भ्रष्टाचार।

जब सरकारी संसाधनों की भारी लूट हो जाएगी तो सामान्य विकास के लिए पैसे कहां से आएंगे ?

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नमूना-एक

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   संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘राज्य अपनी नीति इस प्रकार संचालित करेगा कि सुनिश्चित रूप से आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन 

और उत्पादन के साधनों का सर्व साधारण के लिए अहितकारी केंद्रीकरण न हो।’

पर, ऐसा हुआ क्या ?

नहीं हुआ।

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नमूना -दो 

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  संविधान के पालन के बदले जो कुछ हुआ, वह जल्द ही एक बड़े नेता की जुबान से सामने आ गया।

सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस  अध्यक्ष डी.संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा  कि 

‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने  यह भी कहा था कि ‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’

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नमूना-तीन

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1971 के बाद तो सरकारी पैसों की लूट की गति तेज हो गयी।

अपवादों को छोड़कर सरकारों में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया।

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने तब दो

बातें कहीं थीं।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार तो वल्र्ड फेनोमेना है।सिर्फ भारत में ही थोड़े ही है।

उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘मेरे पिता संत थे ,पर मैं पालिटिशियन हूं।’’

याद रहे कि जवाहरलाल नेहरू ने निजी संपत्ति नहीं बनाई।उनकी कुछ दूसरी कमियां थीं जिनसे देश आगे नहीं बढ़ सका।बढ़ा भी तो बहुत ही कम।

नतीजतन हम 1962 में चीन के हाथों बुरी तरह हार गये।

भोजन के लिए पी.एल.-480 के तहत अमरीकी गेहूं पर निर्भर थे।

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नमूना-4

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 सरकारें बदलती गयीं ।सार्वजनिक धन की लूट पर किसी एक दल का एकाधिकार नहीं रहा।ईमानदार नेता और अफसर अपवाद स्वरूप ही इक्के दुक्के नजर आने लगे।

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नमूना-5

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 23 जनवरी, 2018 के एक अखबार का शीर्षक था - 

‘देश में 2017 में जितनी संपत्ति बढ़ी उसका 73 प्रतिशत हिस्सा, यानी 5 लाख करोड़ रुपए सिर्फ 1 प्रतिशत अमीरों के पास पहुंचा।’

अपवादों को छोड़कर जिस देश के राजनीतिक नेता करोड़ों-अरबों कमाएंगे तो उनकी प्रत्यक्ष-परोक्ष मदद से उस देश के व्यापारी अरबों--खरब कमाएंगे ही !

भाड़ में जाए करोड़ों - करोड़ वह जनता जिसे आज भी  पेट को अपनी पीठ से अलग रखने के लिए एक जून का भोजन किसी तरह मिल पाता है !

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नमूना-6

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‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

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--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर 2019

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इस नोबल विजेता ने ही राहुल गांधी को ‘‘न्याय योजना’’ शुरू करने की सलाह दी थी।

  भ्रष्टाचार के समर्थकों के बीच का यह गहरा संबंध देख लीजिए !

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नमूना-7

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आज जब देश के दर्जनों प्रमुख नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के भीषण आरोपों की जांच हो रही है तो कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दल कह रहे हैं कि बदले की भावना यह सब हो रहा है।

यदि सिर्फ ऐसा ही होता तो मांग के बावजूद कांग्रेस की राजस्थान सरकार ने पूर्व मुख्य मंत्री वसुधंरा राजे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच क्यों नहीं कराई ?

दरअसल कांग्रेस चाहती है कि भ्रष्टाचार के मामले में तुम हमें संरक्षण दो,हम तुम्हें संरक्षण देंगे।

2004 में मनमोहन सरकार के गठन के तत्काल बाद राहुल गांधी का बयान आया था-अटल बिहारी सरकार के भ्रष्टाचारों की हम जांच कराएंगे।

क्या किया राहुल ने ?

दरसल उन्हें बता दिया गया होगा कि हमारे बीच समझौता है--बोफोर्स घोटाले में अटल सरकार ने हमें बचा जो लिया था !

नरेंद्र मोदी राज में वह समझौता टूट गया है।

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अंततः मतदाताओं के लिए संदेश -

अगले किसी भी चुनाव में ऐसी ही सरकारें चुनो जो भरपूर टैक्स वसूले।

ईमानदारी से उन पैसों को विकास ,कल्याण और सुरक्षा कार्यों में लगाए।

देख लो आज इजरायल सरकार को अपने देश को जेहादियों से बचाने के लिए युद्ध पर कितना अधिक धन खर्च करना पड़ रहा है।

  भारत को भी एक दिन खर्च करना पड़ सकता है।

  क्योेंकि पी.एफ.आई.ने घोषणा कर रखी है कि सन 2047 तक हमें हथियारों के बल पर भारत को इस्लामिक देश बना देना है।इस जेहादी संगठन पी.एफ.आईग्. को वोट के लिए हमारे कुछ नेतागण या तो मान सिंह की तरह सक्रिय सहयोग कर रहे हैं तो जयचंद की तरह चुप रह कर सहयोग कर रहे हैं।

पी.एफ.आई.ने मुस्लिम देश से पैसे लेकर शाहीनबाग जाम कराया था।

 उधर से चीन हमारे बड़े भूभाग पर कब्जा करना चाहता है। हमको देर- सबेर दोनों देशों यानी चीन-पाक से एक साथ युद्ध करना पड़ सकता है।

साथ ही के भीतर चीनपंथी नेताओं,जेहादपक्षी भारतीयों तथा 

वोट बैंक लोलुप दलों से भी।

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6 नवंबर 23




                   

  

 


   



रविवार, 5 नवंबर 2023

 


सरकार में अधिक वेतन का लोभ छोड़कर कभी अनेक लोगों ने स्वेच्छा से अपेक्षाकृत कम वेतन पर अखबार की नौकरी करना स्वीकार किया था

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार के वरिष्ठ पत्रकार व बिहार विधान परिषद के मनोनीत सदस्य शम्भूनाथ झा ने 27 मई 1989 को दैनिक ‘आर्यावर्त’ में 

लिखा था कि 

‘‘मुझे पत्रकारिता से इतना प्रेम था कि मैट्रिक से एम.ए.तक की परीक्षाओं में बहुत ऊंचा स्थान पाने पर भी मैंने किसी भी सरकारी नौकरी की तलाश नहीं की।

और जब कभी मैंने एक -दो बार इसके बारे में सोचा भी तो तुरंत अपना विचार बदल लिया।

युद्ध (तीसरे विश्व युद्ध)के समय अंग्रेज शासक कुछ अच्छे पत्रकारों को सरकारी नौकरी में लगाना चाहते थे।

मेरे एक साथी श्री विश्वनाथ वर्मा को, जो इंडियन नेशन के सहायक संपादक थे,सरकार ने अपनी सेवा में बुला लिया और उन्हें जन संपर्क विभाग का निदेशक बना दिया।’’

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इस मामले में दिवंगत झा अकेले नहीं थे।

आर्यावर्त-इंडियन नेशन में कई उच्च शिक्षाप्राप्त लोगों ने कम पैसे पर नौकरी स्वीकार की जिन्हें सरकार अधिक पैसे दे सकती थी।क्योंकि उन दिनों उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की काफी कमी थी।

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2 नवंबर 23



गुरुवार, 2 नवंबर 2023

        क्या हुआ जो हमने मध्य युग नहीं देखा !!!

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हमें अब इस बात का कोई अफसोस नहीं होना चाहिए कि हम मध्य युग में पैदा नहीं हुए थे और तब के नजारे नहीं देखे थे।

कि,किस तरह विदेशी आक्रांता हमंे बांट कर विजयी हुए,बांट कर ही  उन लोगों ने सैकड़ों साल तक राज भी किया। 

आज यहां मध्य युग दुहराया जा रहा है।पात्र उसी तरह के हैं सिर्फ उनके नाम बदल गये हैं।

  मध्य युग के पात्रों को याद कर लीजिए और आज के पात्रों से उनकी तुलना कर लीजिए।

आज वाले भारी पड़ेंगे।

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सुरेंद्र किशोर

अक्तूबर 23


 जेठमलानी के कैरियर में उछाल आ गया था नानावती-प्रेम आहूजा केस के साथ 

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इस कांड को लेकर कई किताबें लिखी गयीं और ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ सहित कई फिल्में भी बनीं

          सुरेंद्र किशोर 

दिवंगत राम भूलचंद जेठमलानी ने कहा था कि 

‘‘नानावती -प्रेम आहूजा केस मेरे कैरियर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।’’

यह बात तब की है जब दिवंगत जेठमलानी बंबई में प्रैक्टिस कर रहे थे।

 नौ सेना के कमांडर के.एम.नानावती ने 27 अप्रैल, 1957 को प्रेम आहूजा की गोली मार कर हत्या कर दी थी।

हत्या के बाद नानावती ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया था।

दरअसल प्रेम आहूजा का नानावती की पत्नी सिल्विया से अवैध संबंध था।

जब नानावती ने प्रेम आहूजा के घर जाकर उससे  कहा कि तुम मेरी पत्नी से शादी कर लो तो आहूजा ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। 

वह एक प्लेबाॅय का जीवन जी रहा था।

आहूजा का इनकार सुनकर नानावती ने उसे तीन गोलियां मारीं । उसकी मौत हो गयी।

  नानावती ऊंची पहुंच वाला व्यक्ति  था।वह ब्रिटेन में भारतीय हाई कमिश्नर वी.के.कृष्ण मेनन का रक्षा सहचारी रह चुका था।बाद में उसे उसका लाभ भी मिला।

इस बहु चर्चित घटना को लेकर बाद में कई फिल्में बनीं।

किताबें लिखी गयीं।

रात जेठमलानी अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के शिकार पुर में  14 सितंबर 1923 को  जन्मे थे । गत 8 सितंबर 2019 को उनका निधन हो गया।

एक साथ दो -दो क्लास पास कर लेने के कारण बेजोड़ प्रतिभाशाली जेठमलानी 13 साल की उम्र में ही मैट्रिक पास कर गए थे।

17 साल की उम्र में लाॅ ग्रेजुएट हो गए।

पर, तब  प्रैक्टिस करने  की  न्यूनत्तम उम्र नियमतः 21 साल तय थी। जेठमलानी के लिए उस नियम को बदल कर 18 किया गया।

देश के बंटवारे के बाद जेठ मलानी बंबई आकर प्रैक्टिस करने लगे।

  नानावती-प्रेम आहूजा केस में राम जेठमलानी लोअर कोर्ट के सरकारी वकील यानी पी.पी., सी.एम.त्रिवेदी के सहायक थे।

सरकारी वकील आधे मन से केस लड़ रहे थे।

उसके कई कारण थे।

एक कारण यह भी हो सकता है कि उन दिनों हत्यारे नानावती के साथ जन भावना थी।

हजारों की भीड़ केस की प्रगति जानने के लिए उत्सुक रहती थी।

कुछ अन्य कारणों की चर्चाएं भी बंबई की हवाओं में थीं।

पर जेठमलानी अपना काम पेशेवर ढंग से करना चाहते थे।

कर भी रहे थे।इस बात पर पहले तो दोनों के बीच मतभेद हुआ।

 पी.पी.ने जेठमलानी की सलाहों की उपेक्षा की।

पर बाद में सलाह के लिए वे जेठमलानी पर ही निर्भर हो गये थे।

   इस हत्याकांड से संबंधित मुकदमा लोअर कोर्ट से  होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।तब इस केस की चर्चा पूरे देश में थी।

जेठमलानी इस केस में बाद में हाई कोर्ट में सरकारी वकील यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ के भी सहायक  थे।

चंद्रचूड़ सन 1978 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी बने थे।

 प्रेम आहूजा की हत्या को लेकर आम जन भावना नानावती के साथ थी।इस भावना को उभारने में मीडिया खास कर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ और उसके अदमनीय संपादक आर.के.करंजिया का बड़ा योगदान था। ब्लिट्ज ने नानावती के पक्ष में अभियान चला रखा था।

25 पैसे कीमत वाला साप्ताहिक ब्लिट्ज इस केस की खबरों के कारण दो रुपए में बिकने लगा था।उसका प्रसार भी बहुत बढ़ गया था।जन भावना का असर ग्रेटर बंबई सेशन कोर्ट के ‘जूरी’ सदस्यों पर भी पड़ा।

मुकदमे की सुनवाई के बाद जूरी के 9 में से 8 सदस्यों ने नानावती को दोषमुक्त कर देने की सलाह जज को दे डाली।

  जज ने उसका पालन किया।

नानावती को लोअर कोर्ट से रिहाई मिल गयी।मामला हाईकोर्ट में अपील में गया।

फिर से केस का ट्रायल हुआ।

इस ट्रायल में सरकार के वकील चंद्रचूड़ के साथ -साथ जेठमलानी  की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

वहां नानावती को आजीवन कारावास की सजा हो गयी। 

11 दिसंबर 1961 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा पर अपनी मुहर लगा दी।

साथ ही, इसी केस के साथ जूरी सिस्टम समाप्त कर दिया गया।इस देश का वह आखिरी केस

था जिसमें जूरी की सहायता ली गयी थी।इस केस में जूरी का निर्णय तथ्यों के बदले भावना पर आधारित था।

यानी इस ऐतिहासिक फैसले में राम जेठमलानी का भी महत्वपूर्ण  योगदान माना गया।

इसीलिए जेठमलानी ने कहा कि वह केस उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।

 नानावती तीन साल तक जेल में रहे।

बाद में  महाराष्ट्र की राज्यपाल विजय लक्ष्मी पंडित ने नानावती को माफी दे दी।राज्यपाल के पास यह अधिकार है।

उसके बाद नानावती अपनी पत्नी सिल्विया और बच्चे के साथ कनाडा जा बसे थे।अब तो उनका निधन हो चुका है।

 जेठमलानी ने तो बाद में कई अन्य महत्वपूर्ण केस लड़े।

 वह केंद्रीय मंत्री भी रहे ।दो बार लोक सभा के सदस्य और कई बार राज्य सभा के सदस्य बने।

जेठमलानी की तर्क शक्ति और शैली बेजोड़ थी।

एक बार वे हथियारों मशहूर सौदागर खशोगी के जहाज पर देखे गये थे।उन दिनों जेठमलानी बोफोर्स तोप खरीद घोटाले के खिलाफ अभियान चला रहे थे।

एक पत्रकार ने पूछा कि एक तरफ तो आप हथियार सौदे के घोटाले के खिलाफ अभियान चला रहे हैं,दूसरी ओर हथियारों के कुख्यात सौदागर के जहाज पर देखे जाते हैं ?

इस पर जेठमलानी ने कहा कि मैं बोफोर्स तोप सौदे में घोटाले का सबूत लेने वहां गया था।क्योंकि एक चोर के खिलाफ सबूत दूसरे चारे के पाॅकेट में पाया जाता है।

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15 अक्तूबर 23