शुक्रवार, 22 मार्च 2024

 कहां से चलकर कहां पहुंचे केजरीवाल !!!

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सुरेंद्र किशोर

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आज की ताजा खबर

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दिल्ली के सी.एम.केजरीवाल मनी लांड्रिग मामले में गिरफ्तार

21 मार्च 202

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पहले की खबरों की सूची

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भ्रष्टाचार पर समझौता नहीं।

मैं इससे लड़ने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी दांव पर लगा दूंगा--केजरीवाल

---राष्ट्रीय सहारा-6 जनवरी 2013

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दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी आम आदमी सरीखी जीवन शैली के लिए मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं।

------दैनिक हिन्दुस्तान--5 जनवरी 2014

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हां, मैं अराजक हूं,जरूरत पड़ी तो गणतंत्र दिवस परेड भी नहीं होने दूंगा--मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल

----दैनिक भास्कर

21 जनवरी 2014

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32 घंटे बाद दिल्ली की सड़क से केजरीवाल का धरना खत्म

----22 जनवरी 2014--दैनिक भास्कर

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राजनीति की आइटम गर्ल है ‘आप’

देश को दांव पर लगाकर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हासिल करने में लग गई है आम आदमी पार्टी

--चेतन भगत के लेख का शीर्षक

--दैनिक भास्कर--22 जनवरी 2014

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1984 के सिख दंगों की जांच एस आई टी से हो--केजरीवाल

   30 जनवरी 2014

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आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्य कारिणी

आम चुनाव में क्रांति का एलान

केजरीवाल ने बनायी भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट

लिस्ट में राहुल गांधी और 11 केंद्रीय मंत्रियों के नाम हैं।

-----प्रभात खबर--1 फरवरी 2014

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हां,मैं राजनीतिक क्रांतिकारी हूं

--केजरीवाल

---सहारा-10 फरवरी 2014

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देश के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो दे दूंगा

----केजरीवाल

--प्रभात खबर-15 फरवरी 2014

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फंड के लिए मफलरमैन के साथ सेल्फी

---22 दिसंबर 2014

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घूसखोरी खत्म करना प्राथमिकता

--अरविंद केजरीवाल

---प्रभात खबर--11 फरवरी 2015

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मुझे एक साल से निशाना बनाया जा रहा था

-केजरीवाल

--30 मार्च 2015

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गुरुवार, 21 मार्च 2024

 आज का वह ऐतिहासिक दिन

जब आपातकाल हटा 

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21 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी सरकार ने जाते-जाते 

इमर्जेंसी हटा ली।

जिन लोगों पर इमर्जेंसी का कहर नहीं ढहा और जिन 

सजग पाठकों ने सेंसर का जहर पान नहीं किया,उन्हें इमर्जेंसी के हटने से मिली राहत के सुखद अनुभव का अनुमान नहीं।

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बस एक लाइन में यह समझ लीजिए कि इंदिरा गांधी की सरकार के एटाॅर्नी जनरल ने तब सुप्रीम कोर्ट ने यह कह दिया था कि 

‘‘आज यदि शासन किसी नागरिक की जान भी ले ले,तौभी  उसके खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।

क्योंकि संविधान में मिले जीने के अधिकार के साथ-साथ सभी मौलिक अधिकार स्थगित कर दिये गये हैं।सुप्रीम कोर्ट ने अनुशासित बालक की तरह इंदिरा सरकार के उस आदेश पर अपनी मुहर लगा दी थी।

जबकि अंग्रेजों के राज में भी पुलिस की गोली से निर्दोष व्यक्ति की हत्या के खिलाफ अदालत की शरण ली जा सकती थी।आज तो इस देश में किसी जेहादी आतंकवादी के लिए भी सुप्रीम कोर्ट आधी रात में भी खुल जाता है।

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इमर्जेंसी में इस देश का क्या हाल था,खुद मैंने उसे देखा,झेला और महसूस किया था।मैं खुद तब मेघालय में भूमिगत था।

लगता था कि ये अंधेरी रातें कभी समाप्त ही नहीं होंगी।

पर,मेरी बात पर मत जाइए।

अभी नेहरू-इंदिरा के दोस्त देश सोवियत संघ के एक अखबार ने क्या लिखा था-उसे यहां पढ़ लीजिए।

तब दैनिक अखबार ‘‘इजवेस्तियां’’ने लिखा था कि 

‘‘आपात् स्थिति के दौरान सत्ता का दुरुपयोग और लोगों पर ज्यादतियां श्रीमती गांधी के पतन का कारण बनी।’’

मोरारजी देसाई सरकार के गठन के बाद जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि

‘‘नयी सरकार का पहला काम यह होना चाहिए कि पिछले कुछ वर्षों में जनता के मन में जो भय पैदा कर दिया गया है,उसे हटाया जाये।

 सरकार लोगों को इस बात की पूरी आजादी दे कि उन्हें जो भी कहना हो, वे कहें।

लोग महसूस करें कि यह उन्हीं की सरकार है।’’

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 25 जून, 1975 को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर दमघोंटू इमर्जेंसी इसलिए लगाई क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली लोक सभा क्षेत्र से इंदिरा गांधी का चुनाव रद कर दिया था।

1971 के चुनाव के दौरान श्रीमती गांधी पर जन प्रतिनिधित्व कानून की दो धाराओं के उलंघन का आरोप साबित हो गया था।

चूंकि उन धाराओं को इंदिरा जी के खिलाफ केस की जरूरत के अनुसार संसद से बदलवा कर उन्हें पिछली तारीख से लागू करवाने का काम इमर्जेंसी लगाकर और सारे प्रतिपक्षी नेताओं को जेलांे में ठूंस कर ही किया जा सकता था।

इसलिए पूरे देश को एक विशाल कारागार बना दिया गया।

तब का सुप्रीम कोर्ट इतना आाज्ञाकारी हो चुका था कि उसने 

जन प्रतिनिधित्व कानून में उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करना भी मंजूर कर लिया ताकि इंदिरा जी की लोस सभा की सदस्यता बरकरार रह जाये।यही हुआ भी।

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21 मार्च 24      


सोमवार, 18 मार्च 2024

 मोदी है तो मुमकिन है

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सांसद फंड की समाप्ति के बिना भ्रष्टाचार 

को काबू में लाना असंभव

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समाप्ति का यह काम नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं।

अटल जी और मनमोहन जी तो चाहते हुए भी इसे 

समाप्त नहीं कर सके थे

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सुरेंद्र किशोर

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  मेरा मानना है कि सांसद क्षेत्र विकास फंड सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार का ‘‘रावणी अमृत कुंड’’ है।

  इस फंड के प्रावधान की समाप्ति के बिना शासन व राजनीति से भ्रष्टाचार की समाप्ति कौन कहें,इसे कम करने की भी कल्पना नहीं की जा सकती।

  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी आज इतने लोकप्रिय और ताकतवर हैं कि वे ही इस फंड को समाप्त कर सकते हैं।

अभी लोहा गर्म है।

वैसे भी यह जन कल्याण का काम है।

नब्बे के दशक में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने के लिए ही इस फंड को शुरू किया गया था। 

खबर मिली थी कि कुछ साल पहले मोदी जी ने इस फंड की समाप्ति को लेकर सांसदों से राय मांगी थी।

पता चला कि सिर्फ 3 सांसदों ने इसकी समाप्ति के पक्ष में राय दी।इसकी ‘ताकत’ तो देखिए !!

अटल बिहारी वाजपेयी जी ,मनमोहन सिंह जी प्रधान मंत्री थे तो वे चाहते हुए भी इसे समाप्त नहीं कर सके थे।

पर मोदी दूसरी ही मिट्टी के बने हैं।मोदी लुंजपुंज नेता नहीं है।

मोदी है तो यह असंभव सा दिखने वाला यह काम भी 

मुमकिन है।इसके बड़े फायदे हैं।किसी अन्य एक काम से इतना फायदा नहीं।

लोक सभा के भाजपा उम्मीदवारों को, जो अपनी जीत के लिए आज मोदी पर ही निर्भर हैं, ‘‘चुनावी टिकट’’ देते समय ही भाजपा नेतृत्व उनसे यह लिखवा लें या उन्हें साफ -साफ कह दे कि नयी लोक सभा के कार्यकाल शुरू होते ही सांसद फंड बंद हो जाएगा।अन्य किसी दल से ऐसी उम्मीद नहीं की सकती।

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अब नहीं तो कभी नहीं मोदी जी !!

सांसद फंड में कमीशनखोरी और न खाएंगे और न खाने देंगे --दोनों बातें एक साथ कैसे चलेंगी ? !!

सांसद शब्द बड़ा पवित्र शब्द है,इसकी गरिमा बढ़ाने का काम तुरंत शुरू हो जाना चाहिए।

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18 मार्च 24 


 पाक,अफगानिस्तान और

बांग्ला देश से पीड़ित होकर 

भारत में शरण लिए गैर मुस्लिम 

शरणार्थियों के बारे में

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सुरेंद्र किशोर

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सी.ए.ए.के तहत उन्हें बारी -बारी से भारत की नागरिकता दी जा रही है।

उन्हें इस देश की अधिकतर सरकारें (ध्यान रहे,सब नहीं।)

तो मदद करेंगी ही।

साथ ही, देश के व्यापारी और उद्योगपति गण भी ‘‘कंपनी सामाजिक उत्तरदायित्व’’ यानी सी.एस.आर, के तहत उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें मदद करें।

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याद रहे कि इस देश की कंपनियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने नेट मुनाफे में से 2 प्रतिशत सी.एस.आर.के तहत खर्च करें।करते भी रहें हैं।पर,यह नई जिम्मेदारी उठाकर उन्हें भी संतोष होगा।

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        दूरदर्शी सलाहकार जरूरी 

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दूरदर्शी सलाहकारों की कमी के कारण ही नीतीश कुमार ने बारी -बारी से दो बार राजग छोड़ दिय़ा था।

  इस बार जब नीतीश जी राजग में लौटे तो उन्होंने प्रधान मंत्री को सार्वजनिक रूप से यह आश्वासन दिया कि अब आपका साथ हम नहीं छोडे़ंगे।

नीतीश जी ने अच्छा किया।

अपने लिए भी और अपने समर्थकों-प्रशंसकों के लिए भी अच्छा किया।

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पर,लगता है कि पशुपति जी पारस के आसपास भी दूरदर्शी सलाहकारों की कमी है।

पारस जी को यह समझ लेना चाहिए कि राम बिलास पासवान जी का वोट बैंक अब चिराग के साथ है, आपके साथ नहीं।

इस संबंध में भाजपा नेतृत्व को सही जानकारी मिली है।

बाल ठाकरे के भतीजा उनके उतराधिकारी नहीं बने।

मुलायम जी के भाई नहीं बन सके।

लालू जी के साला नहीं बने और करूणनिधि के पुत्र ही उनके उत्तराधिकारी बने न कि कोई मारन जी।

वैसे चिराग जी के साथ दिक्कत यह है कि लगता है कि वे थोड़ा ‘जल्दीबाजी’ में हैं।सन 2020 के विधान सभा चुनाव में उनकी भूमिका से यही पता चला।आगे भी ऐसी ‘‘जल्दीबाजी’’ रहेगी तो उनके कैरियर के लिए ठीक नहीं रहेगा।

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केंद्र सरकार का पारस जी और पिं्रसराज के लिए फिलहाल  आॅफर सम्मानजनक है।

हाजीपुर से चुनाव लड़कर यदि हार जाइएगा तो केंद्र सरकार दोबारा आपको वह आॅफर नहीं देगी।

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16 मार्च 24


 रिटायर होने के बाद ‘‘चलो गांव की ओर’’

--यदि गांवों में आपके पास जमीन है।

हां, बिहार सरकार को भी चाहिए कि वह शहरों पर से बोझ घटाने के लिए कानून -व्यवस्था यू.पी. के स्तर पर लाए।

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सुरेंद्र किशोर

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दिल्ली का वायु प्रदूषण निवासियों की जीवन प्रत्याशा में करीब 12 साल की कमी कर रहा है।

  उसी तरह पटना का वायु प्रदूषण 10 साल आयु घटा रहा है।

मेरा आकलन है कि चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार न तो परीक्षाओं में नकल या प्रश्न प्रत्र लीक की समस्या पर काबू पा सकती है और न ही प्रदूषण को कम कर सकती है।

हां,मोदी सरकार और नीतीश सरकार ने भ्रष्टाचार कम करके 

सरकारी राजस्व जरूर बढ़ा दिया जिससे अच्छी सड़ंकंे बन रही हैं।बिजली गांवों तक पहुंच गयी।

पटना में फ्लाई ओवर व बेहतर सड़कों से लोग खुश है।हां,जाम की समस्या को काबू करने में बिहार सरकार हांफ रही है।विफल है।

क्योंकि अधिकतर घूसखोर पुलिसकर्मियों व निगम कमियों पर राज्य सरकार का कोई कंट्रोल ही नहीं है।मध्य पटना में भी घूस लेकर बीच सड़क पर दुकानें सजवाई जाती हैं।

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जीने की समस्या का भी यदि समाधान नहीं हो रहा हैं तो इस बीच क्या किया जाये ?! 

‘‘बाईपास’’की तलाश कीजिए ।

मैंने तलाश कर ली है।

चलो गंाव की ओर।

अन्यथा, कैंसर और वायु प्रदूषण से घुट- घुट कर मरिए।

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मैं इन दिनों अपने पुश्तैनी गांव में भी अपना एक बसेरा बनाना चाहता हूं।

देखें सफल होता हूं या नहीं।

इसके लिए मैं

अक्सर गांव जा रहा हूं।

आज भी गया था।

जाने में करीब डेढ़ घंटे और आने में उतना ही समय लगा।

शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल बन जाने पर करीब पौन घंटा लगेगा।

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बेहतर सड़कों व फ्लाई ओवर  के कारण गति बढ़ी है।

मेरे गांव से किसी मरीज को अब एक से डेढ़ घंटे में ही पटना एम्स पहुंचाया जा सकता है।

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बिजली की आपूर्ति तो अब गांव -गांव अबाध है।मेरे गांव में भी बिजली नीतीश सरकार के आने के बाद ही 2009 में गयी। 

पर,पेय जल का प्रबंध आपको खुद करना पड़ेगा।क्योंकि अपवादों को छोड़कर बिहार में सरकारी नल जल योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है।

’’’’’’’’’’’’’’’’

गांव में रहने पर आप जैविक खेती कर-करा सकते हैं।

क्योंकि अपवादों को छोड़कर नगरों में मिलने वाले दूध से लेकर आलू तक कैंसर कारक है।

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17 मार्च 24   

 


बुधवार, 6 मार्च 2024

 यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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 बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए कारगर थानेदार जरूरी

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नीतीश सरकार ने बेहतर विधि-व्यवस्था के लिए हाल में अनेक ठोस कदम उठाए हैं।

राज्य सरकार की मंशा अपराधियों पर करारा प्रहार करने की है।न सिर्फ कानून कड़े किए जा रहे हैं बल्कि पुलिस को नये अधिकारों से लैस किया जा रहा है।

साथ ही,                                                                                               पुलिस तंत्र को बेहतर साधन भी मुहैया कराएं जा रहे हैं।

पर,इसके साथ ही,एक और तत्व पर गौर करने की सख्त जरूरत है।

वह है थानेदारों की तैनाती में पारदर्शिता लाने की जरूरत।

जब तक पेशेवर आधार पर थानेदारों की तैनाती नहीं होगी,तब तक कोई अन्य उपाय काम नहीं आएगा।

पेशेवर और गैर पेशेवर तरीकों के अंतर के विस्तार में जाने की यहां कोई जरूरत नहीं है।

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भूली बिसरी याद

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संविधान सभा के अध्यक्ष डा.राजेंद्र प्रसाद ने 26 नवंबर 1949 को कहा था कि 

‘‘जिन व्यक्तियों का निर्वाचन किया जाता है यदि वे योग्य,चरित्रवान और ईमानदार हैं तो वे एक दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम संविधान बना सकेंगे।

यदि उनमें इन गुणों का अभाव होगा तो यह संविधान देश की सहायता नहीं कर सकेगा।

आखिर संविधान एक यंत्र के समान एक निष्प्राण वस्तु ही तो है।

उसके प्राण तो वे लोग हैं जो उस पर नियंत्रण रखते हैं और उसका प्रवर्तन करते हैं ।

 देश को आज एक ऐसे ईमानदार लोगों के वर्ग से अधिक किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है जो अपने सामने देश के हित को रखे।’’

डा.प्रसाद ने जो बातें संविधान के बारे में कही थी,वह बात इस देश के नये-पुराने कानूनों पर भी लागू होती हैं।

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दाखिल खारिज और सेवांत लाभ

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सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में दाखिल-खारिज के करीब पौने आठ लाख मामले में लंबित हैं।

दाखिल-खारिज के मामलों के समाधान के लिए जमीन मालिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसके कई कारण हैं।

पर,मुख्य कारण लाल फीताशाही है।

 समस्या सरकारी सेवकों के सेवांत लाभ के समय पर भुगतान को लेकर भी सामने आती है।

लाखों लोगों की इन कठिनाइयों का यदि बिहार सरकार समाधान करा दे तो सरकार की वाहवाही होगी।

पर,भुक्तभोगी बताते हैं कि ये काम हिमालय पहाड़ पर चढ़ने की तरह का ही कठिन काम है।

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सांसद-विधायक फंड की निगरानी 

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सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि सांसदों-विधायकों की निगरानी के लिए हम उनके शरीर पर चिप नहीं लगा सकते।

अदालत ने संबंधित याचिकाकर्ताओं को फटकारा भी ।अच्छा किया।

उनकी मांग ही गलत थी।

याचिकाकर्ता जन प्रतिनिधियों की सतत निगरानी की मांग कर रहे थे।मांग की गई थी कि सांसदों-विधायकों की गतिविधियों की 24 घंटे डिजिटल माध्यम से निगरानी के लिए अदालत केंद्र सरकार को निदेश दे।ऐसी मांग याचिकाकर्ता के दिमागी दिवालियापन की ही निशानी है।

पर, सरकार को एक काम करना चाहिए।

सांसद-विधायक फंड के सदुपयोग को सुनिश्चित करने की व्यवस्था करनी चाहिए।

इससे जन प्रतिनिधियों का जनता में सम्मान और भी बढ़ जाएगा।


सबक सिखाने वाली घटना

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भोजपुरी फिल्म अभिनेता पवन सिंह

चुनाव टिकट वापसी प्रकरण ने फिल्मी जगत को अच्छी-खासी सीख दे दी है।

भोजपुरी फिल्मों के गीतों ओर संवादों में अश्लीलता की शिकायतें वर्षों से मिलती रही है।

पर,कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया।

पवन सिंह के अश्लील गानों का पश्चिम बंगाल में ऐसा विरोध हुआ कि 

उनका चुनाव टिकट कट गया।

भाजपा ने उन्हें आसनसोल से उम्मीदवार बनाया था।

अब राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले कोई अन्य फिल्म अभिनेता अश्लीलता से दूर ही रहेंगे,ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

वैसे दोष सिर्फ पवन सिंह जैसे अभिनेताओं का ही नहीं है।

 कसूर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का है।बोर्ड फिल्मों में गैर जरूरी हिंसा

और अश्लीलता को रोकने में अघोषित कारणों से विफल रहा है।

अब आप शायद ही ऐसी फिल्म पाएंगे जिसे आप परिवार के साथ बैठकर  देख सकें।

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सरकार की पहल सराहनीय

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इस बीच यह खबर आई है कि केंद्र सरकार फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया का कायाकल्प करने जा रही है।

इस संबंध में सलाह मांगी गयी।

 नियम बदले जाने हैं।

बोर्ड में अब अधिक महिलाएं रखी जाएंगी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि नये नियम कड़े होंगे।पर,यह देखना होगा कि 

उन नियमों का पालन कितना हो रहा है।

प्रमाणन के पुराने नियम मैंने पढ़े हैं।

वे भी ठीकठाक ही हैं।पर लागू करने वालों ने उन्हें अघोषित कारणों से आम तौर पर लागू नहीं करते।

मैंने 1961 में पहली बार हिन्दी फिल्म देखी थी।गिरावट की रफ्तार भी मैंने देखी है।

यदि पुराने नियम ठीक से लागू हों तो ‘‘नदिया के पार’’ और ‘‘बागवान’’ जैसी फिल्मों को ही प्रमाण पत्र मिल सकते हैं।

पर,हो रहा है बिलकुल उल्टा।सन 2014 में घूसखोरी के आरोप में सेंसर बोर्ड के सी.ई.ओ.गिरफ्तार भी हुए थे।

फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।सेंसर बोर्ड आम तौर पर असेंसर बोर्ड ही बना

रहा।उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार की नई पहल कारगर होगी। 

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और अंत में

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बिहार सरकार को भी पुलिस कमीश्नरी सिस्टम की स्थापना पर विचार करना चाहिए।संभव है कि उसकी स्थापना से कम से कम बड़े नगरों में कानून-व्यवस्था ठीक करने में आसानी हो।देश के कई राज्यों में यह सिस्टम सफलतापूर्वक काम कर रहा है।

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प्रभात खबर बिहार संस्करण 

4 मार्च 2024

 

 




















































































यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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 बेहतर कानून-व्यवस्था के लिए कारगर थानेदार जरूरी

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नीतीश सरकार ने बेहतर विधि-व्यवस्था के लिए हाल में अनेक ठोस कदम उठाए हैं।

राज्य सरकार की मंशा अपराधियों पर करारा प्रहार करने की है।न सिर्फ कानून कड़े किए जा रहे हैं बल्कि पुलिस को नये अधिकारों से लैस किया जा रहा है।

साथ ही,                                                                                               पुलिस तंत्र को बेहतर साधन भी मुहैया कराएं जा रहे हैं।

पर,इसके साथ ही,एक और तत्व पर गौर करने की सख्त जरूरत है।

वह है थानेदारों की तैनाती में पारदर्शिता लाने की जरूरत।

जब तक पेशेवर आधार पर थानेदारों की तैनाती नहीं होगी,तब तक कोई अन्य उपाय काम नहीं आएगा।

पेशेवर और गैर पेशेवर तरीकों के अंतर के विस्तार में जाने की यहां कोई जरूरत नहीं है।

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भूली बिसरी याद

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संविधान सभा के अध्यक्ष डा.राजेंद्र प्रसाद ने 26 नवंबर 1949 को कहा था कि 

‘‘जिन व्यक्तियों का निर्वाचन किया जाता है यदि वे योग्य,चरित्रवान और ईमानदार हैं तो वे एक दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम संविधान बना सकेंगे।

यदि उनमें इन गुणों का अभाव होगा तो यह संविधान देश की सहायता नहीं कर सकेगा।

आखिर संविधान एक यंत्र के समान एक निष्प्राण वस्तु ही तो है।

उसके प्राण तो वे लोग हैं जो उस पर नियंत्रण रखते हैं और उसका प्रवर्तन करते हैं ।

 देश को आज एक ऐसे ईमानदार लोगों के वर्ग से अधिक किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है जो अपने सामने देश के हित को रखे।’’

डा.प्रसाद ने जो बातें संविधान के बारे में कही थी,वह बात इस देश के नये-पुराने कानूनों पर भी लागू होती हैं।

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दाखिल खारिज और सेवांत लाभ

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सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में दाखिल-खारिज के करीब पौने आठ लाख मामले में लंबित हैं।

दाखिल-खारिज के मामलों के समाधान के लिए जमीन मालिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसके कई कारण हैं।

पर,मुख्य कारण लाल फीताशाही है।

 समस्या सरकारी सेवकों के सेवांत लाभ के समय पर भुगतान को लेकर भी सामने आती है।

लाखों लोगों की इन कठिनाइयों का यदि बिहार सरकार समाधान करा दे तो सरकार की वाहवाही होगी।

पर,भुक्तभोगी बताते हैं कि ये काम हिमालय पहाड़ पर चढ़ने की तरह का ही कठिन काम है।

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सांसद-विधायक फंड की निगरानी 

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सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि सांसदों-विधायकों की निगरानी के लिए हम उनके शरीर पर चिप नहीं लगा सकते।

अदालत ने संबंधित याचिकाकर्ताओं को फटकारा भी ।अच्छा किया।

उनकी मांग ही गलत थी।

याचिकाकर्ता जन प्रतिनिधियों की सतत निगरानी की मांग कर रहे थे।मांग की गई थी कि सांसदों-विधायकों की गतिविधियों की 24 घंटे डिजिटल माध्यम से निगरानी के लिए अदालत केंद्र सरकार को निदेश दे।ऐसी मांग याचिकाकर्ता के दिमागी दिवालियापन की ही निशानी है।

पर, सरकार को एक काम करना चाहिए।

सांसद-विधायक फंड के सदुपयोग को सुनिश्चित करने की व्यवस्था करनी चाहिए।

इससे जन प्रतिनिधियों का जनता में सम्मान और भी बढ़ जाएगा।


सबक सिखाने वाली घटना

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भोजपुरी फिल्म अभिनेता पवन सिंह

चुनाव टिकट वापसी प्रकरण ने फिल्मी जगत को अच्छी-खासी सीख दे दी है।

भोजपुरी फिल्मों के गीतों ओर संवादों में अश्लीलता की शिकायतें वर्षों से मिलती रही है।

पर,कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया।

पवन सिंह के अश्लील गानों का पश्चिम बंगाल में ऐसा विरोध हुआ कि 

उनका चुनाव टिकट कट गया।

भाजपा ने उन्हें आसनसोल से उम्मीदवार बनाया था।

अब राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले कोई अन्य फिल्म अभिनेता अश्लीलता से दूर ही रहेंगे,ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

वैसे दोष सिर्फ पवन सिंह जैसे अभिनेताओं का ही नहीं है।

 कसूर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का है।बोर्ड फिल्मों में गैर जरूरी हिंसा

और अश्लीलता को रोकने में अघोषित कारणों से विफल रहा है।

अब आप शायद ही ऐसी फिल्म पाएंगे जिसे आप परिवार के साथ बैठकर  देख सकें।

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सरकार की पहल सराहनीय

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इस बीच यह खबर आई है कि केंद्र सरकार फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया का कायाकल्प करने जा रही है।

इस संबंध में सलाह मांगी गयी।

 नियम बदले जाने हैं।

बोर्ड में अब अधिक महिलाएं रखी जाएंगी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि नये नियम कड़े होंगे।पर,यह देखना होगा कि 

उन नियमों का पालन कितना हो रहा है।

प्रमाणन के पुराने नियम मैंने पढ़े हैं।

वे भी ठीकठाक ही हैं।पर लागू करने वालों ने उन्हें अघोषित कारणों से आम तौर पर लागू नहीं करते।

मैंने 1961 में पहली बार हिन्दी फिल्म देखी थी।गिरावट की रफ्तार भी मैंने देखी है।

यदि पुराने नियम ठीक से लागू हों तो ‘‘नदिया के पार’’ और ‘‘बागवान’’ जैसी फिल्मों को ही प्रमाण पत्र मिल सकते हैं।

पर,हो रहा है बिलकुल उल्टा।सन 2014 में घूसखोरी के आरोप में सेंसर बोर्ड के सी.ई.ओ.गिरफ्तार भी हुए थे।

फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा।सेंसर बोर्ड आम तौर पर असेंसर बोर्ड ही बना

रहा।उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार की नई पहल कारगर होगी। 

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और अंत में

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बिहार सरकार को भी पुलिस कमीश्नरी सिस्टम की स्थापना पर विचार करना चाहिए।संभव है कि उसकी स्थापना से कम से कम बड़े नगरों में कानून-व्यवस्था ठीक करने में आसानी हो।देश के कई राज्यों में यह सिस्टम सफलतापूर्वक काम कर रहा है।

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प्रभात खबर बिहार संस्करण 

4 मार्च 2024