गुरुवार, 28 मार्च 2024

 अद्भुत प्रतिभाशाली दिवंगत डा.श्रीकांत 

जिचकर की याद में 

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14 सितंबर 1954--2 जून 2004)

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सुरेंद्र किशोर

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सर्वाधिक शिक्षित होने का विश्व रिकाॅर्ड कायम किया था 

डा.जिचकर ने।

वे राजनीति में भी सक्रिय थे।

वहां भी काफी कारगर साबित हुए।

आज पढ़े-लिखे लोगों के लिए राजनीति में कितनी

जगह बच गई है ?

हां, धनवानो-बाहुबलियों आदि के लिए जगह की कोई कमी नहीं

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‘‘बेटा, बड़ा होकर जिचकर की तरह बनना’’

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नागपुर के अभिभावक गण 

अपने बच्चों से कभी यही कहा करते थे।

संभवतः आज भी कहते होंगे !

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आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में,खासकर राजनीति में, कितनी ऐसी हस्तियां मौजूद हैं, जिनकी ओर इंगित करके कोई अभिभावक यह कह सके कि ‘‘बेटा,बड़ा होकर इनके जैसा ही बनना ?’’

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दिल्ली में कितने ऐसे नेता मौजूद हैं जिन्हें कोई पिता अपनी संतान का स्थानीय अभिभावक बनाना पसंद करेगा ?

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राज्य सभा के सदस्य रहे भाजपा नेता

तरुण विजय ने नागपुर के डा. जिचकर के बारे में पांचजन्य (13 जून 2004)में लिखा था--

‘‘विद्वान शिरोमणि यौवन तेज से भरपूर सुदर्शन चेहरा एवं वाणी मेें नूतन ब्राह्मण का परिमर्जित माधुर्य।’’

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पिछड़ी जाति में जन्मे डा.जिचकर ने खुद कहा था कि 

‘‘अब मैं दीक्षित हो गया हूं।

 दीक्षा प्राप्त करने के बाद ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठत्तम परंपरा में सम्मिलित हो गया हूं। 

मैं जन्म से ब्राह्मण नहीं था।

 परंतु घर में अग्नि प्रतिष्ठापित कर अग्निहोत्र धर्म का नियमानुसार पालन कर और अब सोम यज्ञ द्वारा दीक्षित होने के बाद मैं स्वयं को दीक्षित कहने का अधिकारी हो गया हूं।’’

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डा. जिचकर न सिर्फ महाराष्ट्र सरकार के  मंत्री थे बल्कि राज्य सभा के सदस्य भी थे।

वह महाराष्ट्र विधान परिषद के भी सदस्य रहे।

उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर एक बार लोक सभा का चुनाव भी लड़ा था।

पर, वे विफल रहे।

सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया था।

     जिचकर एम.बी.बी.एस. और एम.डी. थे।

 वह एलएल.बी., एलएल.एम. और एम.बी.ए. भी थे।

उन्होंने पत्रकारिता की भी डिग्री ली थी।

दस विषयों में एम.ए. थे।

1973 से 1990 के बीच उन्होंने कुल 20 डिग्रियां लीं।

सारी परीक्षाओं में उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता हासिल की।

उन्हें कई स्वर्ण पदक भी मिले।

वह संस्कृत में डि लिट थे।

 1978 में आई.पी.एस.बने।

 इस्तीफा देने के बाद आई.ए.एस.बने।

1980 में महाराष्ट्र विधान सभा के सदस्य बने। 

मंत्री भी बने।

 उनके पास 14 विभाग थे।

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   डा. जिचकर का नाम लिम्का बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में  भारत के सबसे अधिक योग्य और निपुण व्यक्ति के नाते दर्ज है।

 वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने जीरो बजट की अवधारणा को कार्यरूप दिया था। 

डा. जिचकर को समय -समय पर याद करके नागपुर का  अभिभावक अपने बच्चों से कहता है कि ‘बेटा, बड़ा होकर श्रीकांत जिचकर की तरह बनना। ’

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वह आधुनिक राजनीति में संभवतः एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनको कोई पिता दिल्ली में अपनी संतान का स्थानीय अभिभावक बना सकता था।

    डा. जिचकर ने नागपुर में एक विद्यालय की स्थापना की थी ।

उस स्कूल के बारे में अभिभावकों से अपील करते हुए अखबार में विज्ञापन छपा था, 

‘‘ डा. श्रीकांत जिचकर जिस विद्यालय में अपने बेटे को प्रवेश दिला रहे हैं, क्या आप अपने बच्चों को भी उसी विद्यालय में पढ़ाना चाहेंगे ? ’’

 इस विज्ञापन के छपते ही सैकड़ों अभिभावकों की भीड़ लग गई थी।

यानी, उन्होंने एक ऐसा गुणवत्तापूर्ण स्कूल स्थापित किया था जिसमें उनका बेटा भी पढ़ सके।

   जिचकर नागपुर छात्र संघ के अध्यक्ष भी थे।

 इसके अलावा भी उनके पास डिग्रियां और उपलब्धियां थीं। 

सन् 1983 में दुनिया के दस सर्वाधिक प्रमुख युवा व्यक्तियों की सूची में शामिल होने का सम्मान उन्हें मिला था।

  वह सन 1992 में राज्य सभा के सदस्य चुने गए।

पी.वी.नरसिंह राव उन्हें पसंद करते थे।

राव ने डा. जिचकर को इंदिरा गांधी से मिलवाया था।

डा.जिचकर ने अधिकतर देशों की यात्राएं की थीं।

उनके निजी पुस्तकालय में 52 हजार पुस्तकें थीं।

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वे छायांकन, चित्र कला, रंगकर्म के भी जानकार थे।

 उन्हें संपूर्ण गीता कंठस्थ थी। 

साथ ही, उन्होंने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था।

    खेतिहर परिवार के जिचकर के साथ एक सुविधा अवश्य थी कि पैसे की कमी के कारण उनका कोई काम नहीं रुका।

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    उनमें  और भी अनेक गुण थेे।

पर सबसे बड़ी बात यह थी कि वे राजनीति में भी थे।

 यानी ऐसे लोग राजनीति में आ सकते हैं ,यदि उनके लिए सम्मानपूर्ण जगह बनाई जाए।

 हालांकि आज जितने लोग राजनीति मंे हैं, उनमें से भी अनेक लोग योग्य और कत्र्तव्यनिष्ठ हैं।

 पर, वैसे लोगों की संख्या घटती जा रही है।

   डा. जिचकर जैसी विभूतियों को समय -समय पर याद करके नई पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है।

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28 मार्च 24


मंगलवार, 26 मार्च 2024

     भूली -बिसरी यादें

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       सुरेंद्र किशोर

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यह बात मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्रित्वकाल की है।

स्विस बैंकों पर अमेरिका का भारी दबाव पड़ा।

उस कारण अपने यहां के बैंकों खातों की गोपनीयता से संबंंिधत नियमों में ढील देने का स्विस बैंक ने निर्णय किया।

यानी, खातेदारों के नाम जाहिर करने लगा।

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 इससे घबरा कर भारत सहित दुनिया भर के काला धन वालों ने पास के ही लाइखटेंस्टाइन देश के एल.जी.टी. बैंक की ओर रुख कर लिया।

वह बैंक वहां के राजा के परिवार का है।

 वहां गोपनीयता की गारंटी थी।(ताजा हाल नहीं मालूम।)

    एल.जी.टी. बैंक का एक कम्प्यूटर कर्मचारी हेनरिक कीबर कुछ कारणवश बैंक प्रबंधन से बागी हो गया। 

उसे नौकरी से निकाल दिया गया। 

वह बैंक के सारे गुप्त खातेदारों के नाम पते वाला वाला कम्प्यूटर डिस्क लेकर फरार हो गया। 

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इस तरह दुनिया के अनेक देशों के भ्रष्ट लोगों के गुप्त खातों का विवरण कीबर के पास आ गया।

 उसने उस पूरी सी. डी.की काॅपी को जर्मनी की खुफिया पुलिस को 40 लाख पाउंड में बेच दिया। 

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ब्रिटेन ने सिर्फ अपने देश के गुप्त खातेदारों के नाम उससे लिए। 

इसलिए उसे सिर्फ एक लाख पाउंड में विवरण मिल गया।

जर्मनी भारत सरकार को भारत के लोगों के गुप्त खातों का विवरण मुफ्त देने को तैयार था।

पर,भारत सरकार ने लेने से इनकार कर दिया।

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 अमेरिका, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम और अन्य दूसरे देश कीबर से बारी -बारी से अपने -अपने देश के भ्रष्ट लोगों के गुप्त खातों के विवरण ले गए।  उस विवरण के आधार पर कार्रवाई करने पर सरकारों को टैक्स के रूप में भारी धन राशि मिल गई।

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  कीबर भारत सरकार को भी वह जानकारी बेचने को तैयार था।

इस संबंध में एल.के आडवाणी ने मनमोहन सरकार को पत्र लिखा।

पर, भारत सरकार ने नहीं खरीदा।

इतना ही नहीं,यह भी खबर आई कि मनमोहन सरकार ने जर्मनी सरकार से अनौपचारिक रूप से यह कह दिया कि भारत से संबंधित बैंक खातों को जग जाहिर नहीं किया जाए।

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      याद रहे कि लाइखटेंस्टाइन के उस बैंक में बड़ी संख्या में भारतीयों के भारी मात्रा में काला धन जमा थे।

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21 मार्च 24


 सरदार खुशवंत सिंह की याद में 

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(2 फरवरी 1915--20 मार्च 2014)

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पहले खुशवंत सिंह का एक साप्ताहिक काॅलम पढ़िए।

फिर उनके बारे में कुछ बातें।

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इस काॅलम में ,जो देश के अनेक बड़े बड़े अखबारों में एक साथ छपता था,खुशवंत सिंह ने नेहरू -गांधी के वंशवाद पर लिखा है।

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फलता-फूलता वंशवाद

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भारतीय राजनीति में फैले वंशवाद को राजशाही की धरोहर बता रहे हैं खुशवंत सिंह

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ऐसे देश मंे जहां ग्राम पंचायत या लम्बरदार का बेटा अपने पिता की गद्दी पा लेता है,मुख्य मंत्री का पुत्र या दामाद समझता है कि मुख्य मंत्री पद उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।

इस बात से आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि प्रधान मंत्री के पुत्र,पुत्री ,नाती, पोते पीढ़ियों तक ऐसा ही सोचते रहते हैं।

  हमारा अपना ही उदाहरण है।

कांग्रेस के सभापति के रूप में मोतीलाल नेहरू ने (1928-29 में )बापू गांधी के साथ मिलकर अपने बेटे जवाहरलाल नेहरू को (कांग्रेस अध्यक्ष की)गद्दी पकड़ा दी।

उससे भारत के प्रधान मंत्री पद का उनका रास्ता पक्का हो गया।

 अपनी बारी आने पर जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने कभी कहा था वंशानुगत उत्तराधिकार का सिद्धांत हमारे संसदीय प्रजातंत्र के लिए पूरी तरह से विदेशी है और मैं इसके पूरी तरह से खिलाफ हूं,अपनी पुत्री (इंदिरा गांधी )के कांग्रेस पार्टी का सभापति निर्वाचित होने पर तनिक भी विचलित नहीं हुए।(उल्टे कांग्रेस सांसद महावीर त्यागी को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा कि इंदु का अध्यक्ष बनना मुफीद होगा।--सु.कि.)

अचानक लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु होने पर उन्हें प्रधान मंत्री पद मिलने का रास्ता पक्का हो गया।

 नेहरू शर्महीन कुनबापरस्ती(शब्दों पर ध्यान दीजिए।)में लिप्त हो गये।

उन्होंने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को मास्को,लंदन और वाशिंगटन में राजदूत और बाद में महाराष्ट्र का राज्यपाल बना दिया।

  जनरल कौल ,जिन्होंने चीन के विरूद्ध 1962 के युद्ध में हमारी सेनाओं की कमान संभाली थी,उनके दूर के रिश्तेदार थे।

 इसी प्रकार आई.सी.एस.बी.के.नेहरू को कश्मीर का राज्यपाल और दूसरे पदों के रूप में भारी-भरकम नौकरियां दी गईं।

  इंदिरा गांधी को संवैधानिक मान्यताओं की तनिक भी ंिचंता करने की आवश्यकता नहीं थी।

वह अपने बेटे संजय को भारत का शासक बनाना चाहती थी।

जब हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी तो उनके स्थान पर राजीव गांधी को लाने में उन्हें कोई विचार नहीं करना पड़ा।

अब जबकि संजय,इंदिरा और राजीव नहीं रहे तो हमारे यहां सोनिया और मेनका के रूप में दो विधवाएं हैं जो सर्वोच्च पद पाने की होड़ में लगी हुई हैं।

  सोनिया की संतान प्रियंका और राहुल को मेनका के वरूण के खिलाफ लाया जा रहा है और ये सब केंद्रीय कक्ष में घुसने की प्रतीक्षा में हैं।

 हालांकि हमारे देश का पश्चिमी ढंग से सोचने वाला संभ्रांत वर्ग वंश परम्परा को बढ़ावा देता है।

आम आदमी इन वंशों के उत्तराधिकारियों को ईमानदारी से चुनाव होने पर अपना वोट कभी नहीं देता।यह प्रजातंत्र की उतरन है।मध्ययुगीन और राजशाही की धरोहर है।

खुशवंत सिंह ने इंदर मल्होत्रा की पुस्तक ‘‘डायनेस्टीज आॅफ इंडिया एण्ड बियाण्ड’’को उधृत करते हुए इस देश व पड़ोस के देशों में चल रहे वंशवाद की भी चर्चा की है।

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आज जबकि भारत की राजनीति में वंशवाद खतरे में आ रहा है,वंश से आए कांग्रेस अयोग्य नेतृत्व के कारण डूब रही है,कई दशक पहले के खुशवंत सिंह के इस काॅलम को पढ़ना 

प्रासंगिक है।

इस बीच इस देश के अनेक नेहरू-गांधी के प्रशंसक पत्रकार,इतिहासकार  व पुस्तक लेखक यह लिखते रहे हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने वंशवाद -परिवारवाद को आगे नहीं बढ़ाया।बेखौफ खुशवंत ने अपने काॅलम में उन सबकी कलई खोलकर रख दी।

इमर्जेंसी में संजय गांधी-मेनका गांधी की तारीफ करने के कारण खुशवंत सिंह को कुछ लोग खुशामद सिंह भी कहते थे।पर एक खुशामद सिंह ने ही नेहरू का अच्छी तरह भंडाफोड किया है।

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लेखक हो तो खुशवंत सिंह जैसा--जिसे जब जो ठीक लगा,वह लिखा।उसकी कलम और बुद्धि किसी के यहां गिरवी 

नहीं थी।

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इलेस्टे्रटेड विकली आॅफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रहे खुशवंत सिंह ने कई चर्चित पुस्तकें लिखीं।

99 साल की उम्र पाये।

एक इंटरव्यू में कहा था-

‘‘मेरा जिस्म बूढ़ा है,आंखें बदमाश और दिल अब भी जवां।’’

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इस साहसी सरदार जी ने मुस्लिम नेताओं से अपील की थी कि आप लोग तीन स्थानों अयोध्या,काशी और मथुरा हिन्दुओं को सौंप दीजिए।बदले में हिन्दू पक्ष 3997 मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ दें।पर,यह न होना था और न हुआ।

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25 मार्च 24

       

 


सोमवार, 25 मार्च 2024

 पहले पिछड़े समुदाय के नेता सत्ताधारी  कांग्रेस

से ‘आरक्षण’ मांगते थे।

अब खुद कांग्रेस पिछड़ों के 

नेता से अपने लिए लोक सभा की सीटें 

मांगने को मजबूर है।

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सुरेंद्र किशोर

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लोक सभा,राज्य सभा और बिहार विधान सभा के सदस्य रहे राम अवधेश सिंह अस्सी के दशक में जो बात कहते थे,वह अब सच साबित हो रही है।

 सन 1969 में आरा से विधायक और 1977 में बिक्रमगंज से सांसद रहे दिवंगत सिंह ने मुझसे कहा था कि कांग्रेस सरकार (मंडल आयोग की रपट के आधार पर)पिछड़ों को आरक्षण नहीं दे रही है।

पर,एक दिन ऐसा आएगा कि जब कांग्रेस ही अपने लिए हमसे आरक्षण मांगेगी।

याद रहे कि मंडल आयोग की रपट 1980 में ही आ गई थी।

उसके बाद उस रपट पर तीन बार संसद में विस्तृत चर्चा हुई।

हर बार चर्चा के बाद कांग्रेसी सरकार के गृह मंत्री ने सदन में कहा कि इसे लागू करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

पर,जब 1990 में वी.पी.सिंह की गैर कांग्रेसी सरकार ने इसे लागू किया कि आरक्षण विरोधियों ने कहा कि बिना किसी चर्चा के सिंह ने यह लागू कर दिया।  

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अब सन 2024 में जब लोक सभा का चुनाव सामने है तो कांग्रेस, राजद से अपने लिए तालमेल में जितनी सीटें लड़ने के लिए मांग रही है,राजद उतनी सीटें नहीं दे रहा है।दरअसल कांग्रेस अपनी वास्तविक ताकत के अनुपात में अधिक सीटें मांग रही है।

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आरक्षण एक भावनात्मक मुद्दा भी रहा है।

2018 में संसद में जब 10 प्रतिशत  सवर्ण आरक्षण विधेयक पेश हुआ तो राजद ने उसका विरोध कर दिया।नतीजतन 2019 के लोक सभा चुनाव में राजद को एक भी सीट नहीं मिली।

रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदानंद सिंह जैसे राजद के अच्छे उम्मीदवार भी लोक सभा चुनाव हार गये।

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अब राजद कहता है कि वह ए टू जेड की पार्टी है।पर,देर हो चुकी है।

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राजद नेताओं को जिन बुद्धिजीवियों ने सवर्ण आरक्षण का विरोध करने की सलाह दी,उन लोगों ने राजद को नुकसान पहुंचाया।

उसी तरह जिन बुद्धिजीवियों ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को समय -समय पर मंडल आरक्षण का विरोध करने की सलाह दी,उन लोगों ने कांग्रेस का भारी नुकसान कर दिया।

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याद रहे कि आरक्षण का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद-340 में कर दिया गया है।

मंडल आयोग को जब वी.पी.सिंह सरकार ने लागू किया तो वह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया था।सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में उस पर अपनी मुहर लगा दी।

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कांग्रेस को नरेंद्र मोदी सरकार से सीखना चाहिए।मोदी सरकार सभी जातियों को विश्वास में लेकर चल रही है ।

 उन्हें भरसक सत्ता में हिस्सेदारी भी दे रही है।इसीलिए भाजपा मजबूत होती जा रही है।

इसके अलावा भ्रष्टाचार विरोध और जेहाद विरोध मोदी सरकार का यू.एस.पी. है।

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इन दिनों जांच एजेंसियों से पीड़ित प्रतिपक्ष का मुख्य प्रश्न यह है कि भ्रष्टाचार के विरोध में एकतरफा कार्रवाई क्यों हो रही है ?

यदि यह सच है तो भाजपा विरोधी दल डा.सुब्रह्मण्यम सवामी के दिखाए गए रास्ते पर क्यों नहीं चल रहे हैं ?इसलिए नहीं चल रहे हैं क्योंकि उन्हें भाजपा नेताओं के खिलाफ पोख्ता सबूत नहीं मिल रहे हैं।या कोई और बात है ?

जय ललिता के भ्रष्टाचार,नेशनल हेराल्ड के घोटाले और 2 जी मामले में कार्रवाई शुरू कराने के लिए डा.स्वामी को किसी सरकार से मदद लेने की जरूरत नहीं पड़ी थी।तीनों मामलों में स्वामी को सफलता मिली।

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दिल्ली से एक पत्रकार ने कल मुझसे पूछा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ  कार्रवाई शुरू करने के बाद लालू प्रसाद के वोट पर कितना फर्क पड़ा था।

वे इस बात का पूर्व अनुमान लगाना चाहते हैं कि केजरीवाल के चुनावी भविष्य पर अब कैसा असर पड़ेगा ?

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मैंने उन्हें बताया कि चारा घोटाला मामले में 1997 में पहली बार लालू प्रसाद जेल गये थे।

उससे पहले मंडल आयोग की रपट की पक्षधरता के कारण लालू की पार्टी को 1991 के लोक सभा चुनाव में बिहार में और 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला था।

लालू प्रसाद ने पिछड़ों को सीना तान कर चलना सिखाया था।पिछड़ों के लिए उतना बड़ा काम किसी अन्य नेता ने उससे पहले नहीं किया था।

पर 1997 के बाद यानी सन 2000 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

सजा होने पर और अधिक फर्क आया।

पहली बार चारा घोटाले में लालू प्रसाद को 2013 में सजा हुई।सजा के तत्काल बाद राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा था कि लालू जी को सजा होने के बाद बिहार में जो सहानुभूति लहर चलेगी,उसके बल पर हम बिहार की लोक सभा की सभी 40 सीटें जीत जाएंगे।

पर,इस दावे के विपरीत 2014 के लोक सभा चुनाव में राजद यानी लालू प्रसाद की पार्टी को बिहार में लोक सभा की सिर्फ 4 सीटें मिलीं।

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25 मार्च 24 


 फिर पछताए होत का जब 

चिड़िया चुग जाए खेत ?

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जो लोग सी.ए.ए.और एन.आर.सी.का विरोध कर रहे हैं,उनके 

वास्तविक उद्देश्य व लक्ष्य को जल्द से जल्द समझ लीजिए।

अभी नहीं समझिएगा तो 10-15 साल बाद समझने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। 

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सुरेंद्र किशोर

24 मार्च 24


रविवार, 24 मार्च 2024

 गोपनीयता के आवरण में चुनावी चंदा

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समय के साथ देश में बहुत कुछ बदल गया,लेकिन चुनावी चंदे 

में पारदर्शिता का अभाव जस का तस कायम है

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सुरेंद्र किशोर

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भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

लोकतंत्र की सफलता चुनावी प्रक्रिया में स्वतंत्रता ,पारदर्शिता एवं निष्पक्षता से निर्धारित होती है।

 चूंकि चुनाव एक खर्चीली प्रक्रिया भी है तो इस कारण इसमें चुनावी चंदे की भूमिका अहम हो जाती है।

इसी चंदे से जुड़े चुनावी बांड का मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में छाया हुआ है।

भारत मेें देसी -विदेशी चुनावी चंदे को लेकर  पर्दादारी की परंपरा दशकों पुरानी है।

विदेशी चंदे के बारे में 1967 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण ने लोकसभा यह जानकारी दी थी, ‘इस देश के राजनीतिक दलों को मिले विदेशी चंदे के बारे में भारत के केंद्रीय गुप्तचर विभाग की रपट को प्रकाशित नहीं किया जाएगा,क्योंकि इसके प्रकाशन से अनेक व्यक्तियों और दलों के हितों की हानि होगी।’

 इससे पहले विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने उसके प्रकाशन की मांग की थी।

   इस प्रकार उस समय केंद्र में सत्तारूढ़ इंदिरा गांधी सरकार ने यह परंपरा स्थापित कर दी कि सियासी चंदें के मामले में देश को हानि भले हो जाए,लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए।

वह परंपरा कमोबेश आज भी देश में कायम है।

ऐसे में इस पुरानी मांग पर एक बार फिर गौर करने की जरूरत है कि मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार के जरूरी खर्चे खुद सरकार उठाये।

 1967 के आम चुनाव में सात राज्यों में कांग्रेस हार गई थी।

 तब तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ -साथ ही होते थे। याद रहे कि 1967 में आम चुनाव के कुछ महीनों के भीतर दलबदल के कारण दो अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकारें भी गिर गई थीं।

 उसके बाद वहां भी गैर कांग्रेसी सरकारें गठित हो गई थीं।

चैथे आम चुनाव में लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत कम हो गया था।

यानी, आज का यह तर्क सही नहीं है कि विभिन्नताओं वाले इस देश में लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव अलग -अलग ही होने चाहिए ।

जब साथ चुनाव होने पर भी परिणाम अलग -अलग आते ही थे तो एक बार फिर एक ही साथ चुनाव कराने में नुकसान क्या है ?

असल में इसके लाभ अधिक हैं।

  अतीत की ओर देखें तो 1967 की चुनावी हार पर तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी चिंतित हो उठी थीं।

पहले से ही उन्हें यह अपुष्ट खबर मिल रही थी कि इस चुनाव में विदेशी धन का इस्तेमाल हुआ है।

तब इंदिरा गांधी को ऐसा लगा कि विदेशी धन सिर्फ विपक्षी दलों को मिला।

इंदिरा सरकार ने गुप्तचर विभाग को इसकी जांच का जिम्मा सौंपा।

जांच रपट सरकार को सौंप दी गयी,लेकिन रपट को सरकार ने दबा दिया।

ऐसा इसलिए क्योंकि वह रपट सत्तारूढ़ दल के लिए भी असहज करने वाली थी।

जांच के दौरान इस बात के भी सबूत मिले थे कि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने अमेरिका से तो कुछ दूसरे कांग्रेस नेताओं ने सोवियत संघ से पैसे लिये थे।

इस रपट को बाद में अमरीकी अखबार द न्यूयार्क टाइम्स ने छाप दिया था।

  इस रपट के अनुसार सिर्फ एक राजनीतिक दल को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों ने विदेशी चंदा स्वीकार किया था।

गुप्तचर विभाग की उक्त रपट के अनुसार अमेरीकी गुप्तचर एजेंसी और कम्युनिस्ट दूतावासों ने राजनीतिक दलों को काफी पैसे दिए।

उन दिनों विश्व के दो खेमों के बीच शीत युद्ध जारी था।

कम्युनिस्ट और गैर कम्युनिस्ट देशों ने भारत में अपने -अपने खास समर्थक बना रखे थे।

यह किसी से छिपा नहीं रहा कि उस दौर में एक खेमे का नेतृत्त्व अमेरिका और दूसरे खेमे का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था।

न्यूयार्क टाइम्स की इस सनसनीखेज रपट पर 1967 के प्रारंभ में लोक सभा में बहुत तीखी बहस हुई।

इसके परिणामस्वरूप तमाम भारतीय अखबारों में भी इस खबर को बाद में काफी कवरेज मिला।

जो खबर न्यूयार्क टाइम्स ने ब्रेक की थी, वह खबर भारतीय मीडिया क्यों नहीं ब्रेक कर सका ?

क्या तब भी गोदी मीडिया था ?

इस समय एक तबका गोदी मीडिया का आरोप भारतीय मीडिया को लेकर लगा रहा है,उन्हीं दिनों यह खबर भी आई थी कि इस देश के ही एक बड़े उद्योगपति ने तकरीबन पांच दर्जन सांसदों को अपने ‘पे रोल’ पर रखा हुआ था।

   संसद में स्वतंत्र पार्टी के एक सदस्य ने गृह मंत्री चव्हाण से पूछा कि क्या वह गुप्तचर विभाग की रपट को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाएंगे ताकि राजनीतिक दलों को जनता के बीच सफाई पेश करने का मौका मिल सके ?

 रपट के प्रकाशन से इनकार करते हुए चव्हाण ने यह जरूर कहा था कि केंद्र सरकार चुनाव आयोग की मदद से संतानम समिति के उस सुझाव पर विचार कर रही है जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों को हर संभव स्रोतों से प्राप्त होने वाली धन राशि की जांच की बात कही गई है।

इस देश का दुर्भाग्य ही रहा कि जनता आज भी संतानम समिति की रपट को लागू करने की आस लगाए बैठी है।

  समय के साथ राजनीति में काले धन के इस्तेमाल की खबरें बेहद आम होती गयीं।

कई मामलों में तो स्थिति यह हो गयी है कि चुनाव में बाहुबल से अधिक प्रभावी भूमिका धनबल की होती जा रही है।

कुछ समय पहले एक विधान सभा चुनाव में एक उम्मीदवार को दो हजार रुपए के नोट्स मतदाताओं के बीच बांटते हुए टी.वी.पर दिखाया गया था।

अब तो इस देश के छोटे -छोटे दलों के नेता भी र्चाटर्ड प्लेन से घूम रहे हैं।

चुनाव में काले धन के बढ़ते असर से राजनीति की शुचिता प्रभावित हो रही है।

परिणामस्वरूप राजनीतिक कार्यपालिका भी दूषित हो रही है।

प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में तो क्या ही कहा जाए ?

विशेषज्ञ बताते हैं कि एक स्तर पर भ्रष्टाचार, विकास की गति को अपेक्षित रूप से बढ़ने नहीं दे रहा है।

गुणात्मक एवं टिकाऊ

ढांचा निर्माण की कोई गारंटी नहीं है।

चुनावी चंदा भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत बना हुआ है।इसी को देखते हुए चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए चुनावी बांड की व्यवस्था की गई थी,लेकिन भली मंशा वाली यह योजना राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में अपेक्षित परिणाम न देकर खुद विवादों के घेरे में घिर गई।

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

20 मार्च 24 के दैनिक जागरण और नईदुनिया मे एक साथ प्रकाशित।

      






 भ्रष्टाचार वाद,

परिवार वाद-वंशवाद,

जेहाद वाद और 

बाहुबली वाद 

का भविष्य भी अगला लोक सभा चुनाव रिजल्ट तय कर देगा।

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सुरेंद्र किशोर

24 मार्च 24