मुख्तार अंसारी जैसे नामी-गिरामी व्यक्ति की जब मौत होती है तो देश के पक्ष-विपक्ष के बड़े -बड़े नेतागण अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं।
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मुख्तार अंसारी जैसे नामी-गिरामी व्यक्ति की जब मौत होती है तो देश के पक्ष-विपक्ष के बड़े -बड़े नेतागण अपने असली स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं।
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फोन-शिष्टाचार !
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सुरेंद्र किशोर
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कुछ लोगों की यह शिकायत रहती है कि कुछ लोग हमारा फोन नहीं उठाते।
इसके कई कारण हो सकते हैं।
एक ने कारण बताया--
‘‘मेरे एक करीबी मित्र हैं।
जब भी वे मुझे फोन करते हैं तो आधा घंटा से लेकर डेढ़ घंटे तक फोन नहीं छोड़ते।
इतना समय तो मेरे पास होता नहीं।
उनके जैसा खाए-पिए-अघाए-रिटायर तो हूं नहीं।
इसीलिए नहीं उठाता।
हां,कभी खाली रहता हूं तो जरूर उठाता हूं।
दरअसल फोन पर लंबी बतकही ,मुलाकात का विकल्प तो है नहीं।’’
इस संबंध में मेरी एक बिना मांगी सलाह है।
जिसे आप फोन करते हैं,करना चाहते हैं,उसके बारे में जान लीजिए कि वह कौन सा काम करता है।
और अपने काम में कितने घंटे रोज व्यस्त रहता है।
या कोई काम नहीं करता।
फिर फैसला कीजिए कि उससे कितनी देर फोन पर बात करनी चाहिए।
या फिर एक अन्य उपाय भी है।
व्हाटसैप्प तो अब आम है।
उस पर मैसेज दे दीजिए कि आपसे जरूरी बात करना चाहता हूं।
ऐसा करने पर कोई व्यस्त व्यक्ति भी समय निकाल कर आपसे जरूर बात कर लेगा।
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2 अप्रैल 24
इसलिए हो रहा है अग्निवीर योजना का विरोध !
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सन 2022 में भारत सरकार ने अग्निवीर योजना शुरू की।
इसके तहत चार साल की टंें्रनिंग व सेवा के बाद इनमें से कुछ अग्निवीरों को तो तुरंत सरकारी नौकरी दे देनी है।
बाकी फिलहाल अपने घर लौट जाएंगे और नौकरी की प्रतीक्षा करेंगे।उन्हें सरकार कुछ मिलेगा भी।
सरकारी अनुमान के अनुसार उन्हें भी देर-सबेर सरकारी या गैर सरकारी नौकरी मिल जाएगी।क्योंकि ये प्रशिक्षित हैं।
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पर,इस बीच जब वे अपने घरों में रहेंगे तो उनके परिजन चोर-डकैत ही नहीं बल्कि अन्य तरह के हिंसक तत्वों खास कर जेहादियों से भी खुद को एक हद तक सुरक्षित महसूस करेंगे।
आज इस देश के अधिकतर घरों के लोग हथियार विहीन हैं।सरकारें आग्नेयास्त्र के लाइसेंस देने में उदारता नहीं बरतती जबकि आज कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है।स्थिति और भी गंभीर होने वाली है।
उधर जेहादी व प्रतिबंधित संगठन पी.एफ.आई. कुछ मुस्लिम युवाओं को बरगला कर सेना यानी कातिलों का दस्ता तैयार कर रहा है।
पी.एफ.आई.का लक्ष्य है कि यदि 10 प्रतिशत मुस्लिम युवक तैयार हो जाएं तों उनकी सेना बनाकर सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देना है।
पर,पी.एफ.आई.को भारत के मुस्लिम समुदाय से अब तक इस मामले में निराशा ही मिल रही है।क्योंकि अधिकतर मुस्लिम शांति चाहते हैं।
पर, छिटपुट हिंसा-हंगामे लायक पी.एफ.आई. के पास ताकत तो हो ही गयी है।
शाहीन बाग की घटना इसका उदाहरण है।
प्रतिबंधित पी.एफ.आई.का राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.है जिसने कांग्रेस को मदद करने का निर्णय किया है।कर भी रही है।वह कांग्रेस को अपने से सबसे करीबी मानता है।
उसने कर्नाटका-तेलांगना के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की मदद करके उसें सत्ता में पहंुचाया।
इस उपकार का बदला ???
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इस पृष्ठभूमि में जो लोग अग्निवीर
योजना का विरोध कर रहे हैं ,वे आखिर क्या चाहते हैं ?
वे चाहते हैं कि अधिकतर भारतीय परिवार निहत्था बना रहें। उनके घर में कोई एक भी ऐसा सदस्य उपलब्ध न हो जो हथियारबंद आपराधियों का मुकाबला कर सके ।
याद रहे कि अपनी जान बचाने के लिए हमलावर पर हमला करने का कानूनी अधिकार हर भारतीय नागरिक को हासिल है।
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9 अप्रैल 24
एक वृक्ष सौ पुत्रों के समान
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सुरेंद्र किशोर
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8 अप्रैल, 2024 के दैनिक जागरण,पटना के अनुसार मिशन हरियाली ,नूर सराय ने रविवार को संजय गांधी जैविक उद्यान (पटना)के गेट संख्या दो के पास मार्निंग वाकरों के बीच अमरूद के पौधों का वितरण किया।
इस मौके पर पौध रोपण के प्रति जागरूकता अभियान भी चलाया गया।
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ऐसी खबर उत्साह वर्धक होती हैं।
इस पर मुझे अपना आवासीय परिसर के वृक्ष याद आ गये।
पटना एम्स के पास के कोरजी गांव में मैं सन 2015 से रहा हूं।
अपने आवासीय परिसर में मैंने पौधरोपण किये।
11 पौधे अब तक वृक्ष बन चुके हैं।
उनमें आम,
अमरूद,
तेजपत्ता,
दालचीनी,
नीम,
मोहगनी शामिल हैं।
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वृक्ष को हमारे शास्त्रों में पुत्र की संज्ञा दी गयी है।
कहा गया है कि एक वृक्ष सौ पुत्रों के समान होता है।
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(जाहिर है कि कई बार कोई पुत्र, कुपुत्र हो सकता है।
किंतु फलदार वृक्ष
आपका साथ देते हैं।)
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9 अप्रैल 24
देश की हिन्दी पत्रकारिता की मुख्य धारा से जिन्होंने मुझे पहली बार जोड़ा,वह एन.के.सिंह आज मेरे घर आए थेे
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सुरेंद्र किशोर
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करीब 47 साल पहले की बात है।
तब मैं सक्रिय राजनीति -सह -समाजवादी पत्रकारिता के जीवन से निकलकर मुख्य धारा की पेशेवर पत्रकारिता में प्रवेश करना चाहता था।
इन्दौर के प्रतिष्ठित अखबार ‘नईदुनिया’ से मुझे जुड़ने में मदद करके एन.के. सिंह ने मुझे इस क्षेत्र में उड़ान भरने का बहुत बड़ा आधार दे दिया।
मैं उनका इसके लिए आभारी रहा हूं।
तब राजेंद्र माथुर नईदुनिया के संपादक थे।
उन्हीं दिनों इन्दौर से दिल्ली लौटकर साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा था कि देश का सर्वोत्तम हिन्दी अखबार इन्दौर से निकलता है।
सन 1977 में मैं बिहार से नईदुनिया के लिए लिखने लगा था।यह क्रम 1983 तक चला।
सन 1983 में मैंने जनसत्ता ज्वाइन किया।
याद रहे कि तब सुसंपादित अखबार नईदुनिया दिल्ली के अनेक बड़े संपादक, ,पत्रकार व बुिद्धजीवी पढ़ते थे।
मेरी रपटों पर उनमें से अनेक का ध्यान गया जिसका मेरे कैरियर में लाभ मिला।
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एन.के.सिंह ने मुझे यह भी बताया था कि आप जो दैनिक अखबार खरीदते हैं,उनमें से अच्छी रपटों व लेखों को काट कर विषयवार लिफाफों में रखते जाइए।
वे बाद में काम आएंगे।मैंने वह काम किया और मुझे रपट और लेख लिखने के क्रम में वे बड़े काम के होते हैं।उससे तथ्यात्मक गलतियां होने की आशंका कम हो जाती है।वैसे सैकड़ों लिफाफे आज मेरे पास हैं तो उसके पीछे एन.के.सिंह का ही मार्गदर्शन रहा।
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एन.के सिंह इन दिनों चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए बिहार के दौरे पर हैं।वे संभवतः हर चुनाव क्षेत्र में जाएंगे।
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आज उनके साथ बड़े पत्रकार व मेरे मित्र कन्हैया भेलाड़ी और स्वयं प्रकाश भी मेरे घर आयेे।
बहुत सारी बातें हुईं।
वैसे तो एन.के.सिंह यानी नरेंद्र कुमार सिंह बिहार के खगड़िया जिले के मूल निवासी हैं,पर अब भोपाल में बस गये हैं।
वे इंडियन एक्सपे्रस, इंडिया टूूडे और दैनिक भास्कर में बड़े पदों पर रहे।
श्री सिंह अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखते थे।
देश-समाज-राजनीति की पूरी समझ है। अखबार पढ़ने वाला पूरा देश उन्हें जानता है।
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जाहिर है कि मुझे उनसे यह सुनकर अच्छा लगा कि --‘‘मैं चाहता था कि आपसे मिलकर ही आपको बधाई दूं।’’
इतना ही लिख देने से आप जान गये होंगे कि वे मुझे किस बात पर बधाई दे रहे थे।
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एन.के.सिहं की बिहार से लोस चुनाव पर रिर्पोंटिंग पठनीय होगी।
सटीक और वस्तुपरक रिपोर्टिंग करते हैं।
मुझे भी उनकी रपटों का इंतजार रहेगा।
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7 अप्रैल 24
मेरे गांव का एक दीवानी मुकदमा सन 1932 मेें शुरू हुआ।
मात्र आठ कड़ी जमीन के अतिक्रमण का केस था।
सन 1947 तक उसमें कोेई अंतिम निर्णय नहीं हुआ।
यानी, अंग्रेजों के राज में भी दीवानी मुकदमे कछुए की गति से चलते थे।
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आजादी के बाद भी सन 1969 तक वह केस चलता रहा।
अंत होने का नाम नहीं ले रहा था।
दोनों पक्षों का मुझ पर विश्वास था।
मैंने हस्तक्षेप किया।
सुलह हो गयी।
पर,आप कल्पना कीजिए कि 37 साल में लोअर कोर्ट से केस हाईकोर्ट और हाईकोर्ट से केस फिर लोअर कोर्ट जाता रहा।
कल्पना कीजिए कि दोनांे पक्षों को कितना खर्च करना पड़ा होगा !
शारीरिक तौर से भी कितनी दौड़ धूप करनी पड़ी होगी।
उन परिवारों का विकास कितना बाधित हुआ होगा !!
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इस घटना से कैसी शिक्षा मिलती है ?
यही कि गैर जरूरी खर्चे रोककर उस पैसे से परिवार को विकसित करके बाल -बच्चों को शिक्षित व आर्थिक रूप से ताकतवर बनाना हो तो कोर्ट-कचहरी जाने की जगह आपसी समझौते से ही मामले का निपटारा कर लेना चाहिए।
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सुरेंद्र किशोर
6 अप्रैल 24
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जिन्हें मूत्र चिकित्सा का नाम सुनकर ही
घिन आती है,वे इस पोस्ट को कृपया न पढ़ें
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हा,ं जिन्होंने अपने कैंसरग्रस्त परिजन को
अंतिम समय में असहनीय दर्द से कराहते हुए देखा है,
वे तो जरूर पढ़ें।
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सुरेंद्र किशोर
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सन 2022 में भारत में करीब 9 लाख लोगों की कैंसर से मृत्यु हुई।
उस साल करीब 14 लाख नये कैंसर मरीजों का पता चला था।
एक अध्ययन के अनुसार इस देश में करीब 10 प्रतिशत लोग कैंसर से ग्रस्त हैं।सबसे खराब स्थिति पंजाब की है
जहां देश में सर्वाधिक मात्रा में खेतों में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाएं डाली जाती है।
निगरानी के लिए तैनात भ्रष्ट सरकारी कर्मियों की जानबूझकर अनदेखी के कारण बिहार सहित
देश में बड़े पैमाने पर ऐसे खाद्य और भोज्य पदार्थ बेचे जा रहे हैं जो कैंसर कारक हैं।
कैंसर के शर्तिया इलाज के लिए दवा का आविष्कार अभी नहीं हुआ हैं।हालांकि हाल में यह पता चला है कि वैज्ञानिकों को जल्द ही सफलता मिलने की उम्मीद भी बंधी है।
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पर,जब तक वह उपलब्धि हासिल नहीं होती है, तब तक हमें इसकी एक उपलब्ध ‘‘शत्र्तिया’’ दवा के बारे में जान लेना चाहिए।
वह है स्वमूत्र चिकित्सा।
यदि कैंसर, लीवर में न हो और प्रारंभिक स्टेज में हो तो इसे आजमाना चाहिए।
वैसे आखिरी स्टेज वाले भी इससे ठीक हुए हैं।ं
मैं इस संबंध में कुछ लोगों के निजी अनुभव बताता हूं।
मोरारजी देसाई ने जिज्ञासा करने पर मुझे पत्र लिखकर उस पुस्तक का नाम सुझाया था जिसकी भूमिका उन्होंने लिखी है।मैंने उसे मंगाया है।
पूर्व प्रधान मंत्री खुद नियमित रूप से स्वमूत्र पान करते थे।अनेक चिट्ठयों के जरिए उन्होंने मुझे उसके फायदे बताए थे।मुझसे गलती यह हुई कि उस पर एक लेख बना कर मैंने गोरखपुर के प्राकृतिक चिकित्सालय ‘‘आरोग्य मंदिर’’ को भेज दिया--साथ में चिट्ठियों को भी भेज दिया था।
यदि लेख नहीं छपा तो उसका कारण है।
वहां के मशहूर प्राकृतिक चिकित्सक डा.बिठ्ठलदास मोदी स्वमूत्र चिकित्सा के खिलाफ थे।पर,मैंने यह उम्मीद की थी कि न छापने पर मोरारजी वाली चिट्ठियां मुझे लौट आएंगी।पर नहीं आईं।उन दिनों फोटोकाॅपी की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
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इस मूत्र चिकित्सा के जरिए मौत के मुंह से निकल आए डा.केशव प्रसाद सिंह से मैं 1997 में आरा के जयप्रकाश नगर जाकर मिला था।उससे पहले डा.सिंह पर टाइम्स आॅफ इंडिया में छपी रपट मैंने पढ़ी थी।
उन पर मैंने जनसत्ता में रिपोर्ट भी लिखा था जिसकी स्कैन काॅपी इस पोस्ट के साथ दी जा रही है।
एच.डी.जैन काॅलेज के राजनीति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे डा.सिंह ने मुझे बताया था कि ‘‘बंबई के टाटा स्मारक अस्पताल के डा.जस्सावाला ने मुझे लाइलाज घोषित कर दिया था।मुझे गले का कैंसर था।पर मैंने जब स्वमूत्र पान शुरू किया और तेजी से सुधार होने लगा तो डा.जस्सावाला ने देखकर कहा कि ‘‘इसे सिर्फ चमत्कार ही कहा जा सकता है।’’
केशव बाबू स्वस्थ होकर बाद में खुद लोगों की स्वमूत्र चिकित्सा करने लगे थे।मंैं एक मरीज लेकर उनके यहां गया था।मेरे साथ पत्रकार श्रीकांत भी थे।
मेरे मरीज को भी लाभ हुआ था।
पर चूंकि मेरे छोटे भाई के मर्ज की पहचान आखिरी समय में
हुई थी,इसलिए उसे बचाया न जा सका।
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वैसे तो कैंसर के कई कारण हैं,पर मेरी समझ से मुख्य कारण
खाद्य और भोज्य पदार्थों में बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद और रासायनिक कीटनाशक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल है।
मिलावटखोरी पर कोई नियंत्रण नहीं।दूध का इस देश में जितना उत्पादन होता है,उससे करीब दुगनी आपूर्ति हो रही है।पर शासन सोया हुआ है।
कैंसर हमारी हरित क्रांति की भी देन है जिसे हमारे अदूरदर्शी शासकों ने तब शुरू किया था जब अमेरिका जैविक खेती की ओर लौट रहा था।
जब मैं छोटा था और गांव में रहता था तो हमारे चुनाव
क्षेत्रं गड़खा के प्रतिनिधि गांधीवादी जगलाल चैधरी हमारे दरवाजे पर भी आते थे।वे हमारे अभिभावक को आगाह करते थे कि आपलोग गोबर का ही खाद खेतों में डालिए।रासायनिक खाद से बहुत नुकसान होने वाला है।
पर भला कौन मानने वाला था !पैदावार जो बढ़ गयी थी।
उससे पहले गोबर खाद से उपजाये गये छोटे दाने वाले गेहूं की रोटी मैंने खाई है।
वह ‘‘सवाद’’और पौष्टिकता अब कहां ?
हां,पूर्व राज्य सभा सदस्य आर.के.सिंहा का मैं शुक्रगुजार हूं जो कोइलवर के पास जैविक खेती कराते हैं और उपभोक्ताओं तक पहुंचावाते हैं।इस तरह कुछ लोगों तक कैंसर पहुंचने से रोकते
हैं।
जैविक उत्पाद महंगा तो जरूर पड़ता है।किंतु कैंसर के इलाज में जो भारी खर्च आता है,उसके मुकाबले कुछ भी नहीं है।साथ ही, गत साल मेरे छोटे भाई जैसे बहुमूल्य ‘सवांग’ को कैंसर ने लील लिया।उसकी क्षतिपूतर््िा असंभव है।ऐसे अनेक उदाहरण है।पंजाब के
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रोज रात नौ बजे पंजाब के भटिंडा स्टेशन से ‘‘कैंसर ट्रेन’’(लोगों द्वारा यही नाम दिया गया है उस टे्रन का) खुलती है और सुबह छह बजे राजस्थान के बिकानेर पहुंचती है।इस ट्रेन में रोज करीब सौ कैंसर मरीज होते हैं।
बिकानेर के आचार्य तुलसी रिजनल कैंसर अस्पताल और रिसर्च सेंट्रल है।पंजाब सरकार कभी इस बात की जांच नहीं कराती कि जरूरत से अधिक खेतों में रासायनिक खाद क्यों दी जाती है।इसलिए नहीं कराती क्योंकि वह अढ़तियों और मंडी के दलालों के प्रभाव में रहती है।उनका इसमें निहित स्वार्थ है।
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