बुधवार, 17 अप्रैल 2024

 16 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा --

‘‘बैलेट से चुनाव में क्या होता था,आप भूल गए होंगे पर हमें याद है।’’

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सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट की बात की पुष्टि करेगी सन 1999 की यह खबर।

(हिन्दुस्तान में छपी उस खबर की स्कैन काॅपी यहां दी जा रही है।)

वैसे यह तो एक नमूना मात्र है।

उन दिनों जब भी मतदान होता था,दूसरे दिन अखबारों में ऐसी ही भयावह खबरें छपती थीं।

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26 सितंबर, 1999 के दैनिक हिन्दुस्तान,पटना के पहले पेज पर छपी खबर का शीर्षक है--

‘‘जमकर बूथ कब्जा और मत पत्रों की लूट के बीच नौ मरे’’

बिहार के 19 संसदीय क्षेत्रों में हुए दूसरे चरण के मतदान में हिंसा की घटना पहले चरण के मुकाबले कम रही।

लेकिन बूथ कब्जा ,मत पत्रों की छपाई(यानी बैलेट पेपर्स छीन कर उन पर अपनी पसंद की पार्टी के पक्ष में ठप्पे लगाने की घटनाएं )की खबरें प्राय सभी स्थानों से प्राप्त हुई है।’’

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जाहिर है कि मतपत्रों के जरिए मतदान की उस व्यवस्था के कारण ही इतने बड़े पैमाने पर धांधली हुआ करती थी।

ऐसी ही धांधलियों को रोकने के लिए ही इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के जरिए मतदान का प्रावधान शुरू किया गया।

उसके बाद कितना फर्क आया है,यह बताने की जरूरत नहीं।

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पर,अब कई दल यह मांग कर रहे हैं कि फिर से मतपत्रों के जरिए ही मतदान हो।

जाहिर है कि इस मांग के पीछे की मंशा क्या है।

वे फिर से उन्हीं धांधलियों को दुहरा कर चुनाव जीतना चाहते हैं।

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा कर शांतिप्रिय मतदाताओं के पक्ष में निर्णय किया है।

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17 अप्रैल 24


 संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा के लिए 

संविधान में संशोधन !

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संविधान के अनुच्छेद-356 की प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए यह जरूरी है कि राष्ट्रपति शासन की संपुष्टि राज्य सभा से भी कराने की बाध्यता न रहे

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश के किसी प्रदेश में यदि संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए ,तो क्या होगा ?

 यदि केंद्रीय मंत्रिमंडल को संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल नहीं हैं तो केंद्र सरकार  

संबंधित राज्य में चाहते हुए भी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं कर सकती।

यानी, संविधान के अनुच्छेद-356 की मौजूदगी के बावजूद एक बड़े भूभाग में संविधान निरर्थक साबित होगा।

यानी वहां अराजकता छा जाएगी।

अपने देश के कुछ राज्यों में ऐसी नौबत आने वाली है।

एक हद तक आ भी चुकी है।मौजूदा मोदी सरकार को राज्य सभा में बहुमत हासिल नहीं है।

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संभवतः संविधान निर्माताओं ने इस बात की कल्पना ही नहीं की थी कि इस देश में ऐसा समय भी आएगा जब किसी दल को लोक सभा में तो बहुमत रहेगा ,उसकी सरकार रहेगी,पर राज्य सभा में वह अल्पमत में रहेगा।

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सन 1999 में केंद्र सरकार ने बिहार में राष्ट्रपति लागू कर दिया।पर, राज्य सभा से उसका अनुमोदन नहीं हुआ तो राज्य मंत्रिमंडल पुनर्जीवित हो उठा।

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निदान क्या है ?

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राष्ट्रहित के महत्वपूर्ण मामले को लेकर कोई निर्णय हो तो उसका अनुमोदन राज्य सभा से प्राप्त करने की बाध्यता समाप्त कर दी जानी चाहिए।

इस देश के जिन राज्यों में विधान परिषदें नहीं हैं ,वहां भी काम तो चल ही रहा है।

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इसके लिए संविधान में संशोधन एक न एक दिन करना ही पड़ेगा ताकि संविधान के अनुच्छेद-356 को निरर्थक न होने दिया जाये।

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16 अप्रैल 24


सोमवार, 15 अप्रैल 2024

 


मेरे लिए राष्ट्रीय स्तर के एक सम्मान की घोषणा से तहे दिल से खुश होने वालों में नेत्र रोग विशेषज्ञ व मेरे करीबी रिश्तेदार डा.सुनील कुमार सिंह प्रमुख हैं।

  सौभाग्यवश आज डाक्टर साहब से मुलाकात हुई।

वे अत्यंत व्यस्त व सफल चिकित्सक हैं।

उनसे अनेक बातें हुईं।

किदवईपुरी,पटना के संजीवनी नेत्र चिकित्सालय एवं शोध संस्थान के संचालक डा.सिंह समाजसेवा में भी रूचि लेते हैं।

 डा.साहब से मैंने अपने पुश्तैनी गांव के बाजार (भरहा पुर-खानपुर बाजार,दरियापुर,सारण)के विकास की संभावना के बारे में बातचीत की।

मैंने उन्हें बताया कि उस प्रस्तावित न्यू पटना इलाके में अच्छे स्कूल और विश्वसनीय अस्पताल की काफी गुंजाइश है। 

उन्होंने कुछ बहुमूल्य सुझाव दिये।

इस पर आगे भी उनसे बातचीत होगी।

--सुरेंद्र किशोर

14 अप्रेल 24

 

  

 


शनिवार, 13 अप्रैल 2024

   एक परिवार से एक ही टिकट

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सुरेंद्र किशोर

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करीब दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधान 

सभा का चुनाव हुआ।

उस चुनाव में भाजपा नेतृत्व ने किसी ऐसे भाजपा नेता के परिजन को टिकट नहीं दिया जो नेता खुद पहले से किसी न किसी सदन के सदस्य थे।

  इस तरह कई के टिकट कट गये।

पार्टी में असंतोष फैला तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जिन्हें टिकट नहीं मिला है,उस फैसले के लिए मैं जिम्मेदार हूं।

यानी, किसी और पर गुस्सा मत कीजिए।

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किसी ने सवाल किया--राजनाथ सिंह के पुत्र को तो टिकट मिल गया।

जवाब आया कि इस नियम के लागू होने से पहले से जो विधायक थे,उन्हें अपवाद माना गया।

वैसे यदि अपवाद न माना जाता तो बेहतर होता।

पर, इतना तो मानिएगा कि परिवारवाद-वंशवाद के राजनीतिक समुद्र में इस देश में टापू की तरह एक पार्टी ऐसी भी मौजूद है जो अब एक परिवार से एक ही व्यक्ति को सदन मंे पहुंचा रही है।चाहे कोई खुश रहे या नाराज ! 

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यदि भाजपा कभी अपने ही इस नियम को तोड़े तो जरूर लोगों को बताइएगा।

क्योंकि नियम बनाना तो आसान है,पर उस पर कायम रहना बड़ा मुश्किल है।

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इस नियम को आज कितने अन्य दल अपनाने को तैयार हैं ?

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इसके विपरीत इस देश में ऐसे-ऐसे  परिवारवादी -वंशवादी राजनीतिक दल हैं जिनके सुप्रीमो के परिवार का जो भी सदस्य सदन में जाना चाहता है,उसके लिए राह बना दी जाती है।

इस परिवारवाद के कारण ही कांग्रेस की हालत आज सबसे खराब है।

ऐसे अन्य दलों का भी देर -सबेर वही हश्र होने वाला है।

समय रहते अपने राजनीतिक विरोधी से कम से कम एक सबक तो सीख लो। 

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13 अप्रैल 24

   


 13 अप्रैल 1919

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जालियांवाला बाग नर संहार से क्षुब्ध जवाहरलाल 

नेहरू अपना आरामदायक जीवन त्याग कर 

आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे 

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सुरेंद्र किशोर

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    जालियांवाला बाग नर संहार ने नेहरू परिवार की जीवन-शैली बदल दी थी।

 वह परिवार अंग्रेजों के खिलाफ अभियान में शामिल हो गया।

13 अप्रैल, 1919 को अंग्रेजों ने 319 लोगों को मार डाला था।

यह संख्या सरकारी है।गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार मृतकों की संख्या इससे अधिक थी।

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  रौलट एक्ट के विरोध में गांधी के उठ खड़ा होने की खबर समाचार पत्रों में पढ़कर युवा जवाहर लाल नेहरू जरूर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होना चाहते थे।पर, उनके पिता मोतीलाल नेहरू का तब इस बात पर विश्वास नहीं था कि मुट्ठी भर लोगों के जेल चले जाने से देश का कोई भला हो सकता है।

    उधर जवाहर लाल, महात्मा गांधी के साथ जुड़ने को उतावले थे।

इस सवाल पर मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू के बीच अक्सर बहस होती थी।

 जवाहर लाल की बहन कृष्णा हठी सिंग ने लिखा है कि ‘‘इससे हमारे घर की शांति ही भंग हो गई थी।’’

 अपनी पुस्तक ‘इंदु से प्रधान मंत्री’ में कृष्णा ने लिखा है कि ‘‘हर स्थिति में से रास्ता निकालने में कुशल मेरे पिता जी ने आखिर इसका हल भी खोज ही लिया।उन्होंने गांधी जी को ही इलाहाबाद बुलाया।इस तरह गांधी जी हमारे यहां पहली बार आए,और तब उनका और नेहरू परिवार का पारस्परिक स्नेह क्रमशः गाढ़ा होता गया।’’

    ‘लंबी चर्चाओं के दौरान पिता जी और गांधी जी ने भारत की समस्याओं के अपने -अपने हल प्रस्तुत किए।लेकिन उनकी चर्चा जवाहर पर केंद्रित हो गई।क्योंकि पिता जी किसी ऐसे अकाट्य तर्क की खोज में थे जिससे जवाहर को सत्याग्रह सभा में शामिल होने से रोका जा सके। 

गांधी जी बिलकुल ही नहीं चाहते थे कि इस सवाल को लेकर पिता-पुत्र में मन मुटाव हो, इसलिए वह पिता जी की इस राय से सहमत हो गए कि जवाहर लाल को जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए। 

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लेकिन गांधी जी की यह सलाह बेकार ही साबित हुई। क्योंकि घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिससे सब कुछ गड़बड़ा गया। वह लोमहर्षक घटना थी पंजाब के एक शहर अमृतसर में निहत्थे लोगों पर गोरी हुकूमत का खूनी हमला।’

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उसके बाद जवाहरलाल नेहरू आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

सत्ता पाने के बाद नेहरू ने देश का कितना भला किया या नहीं किया,यह इस लेख का विषय नहीं है।

पर 1919 में तो उन्होंने अपने भविष्य की परवाह नहीं ही की थी।

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    इस पृष्ठभूमि में आज की राजनीति पर गौर कीजिए।

कैसे -कैसे लोग राजनीतिक दलों में शामिल किये जा रहे हैं ?

कैसे- कैसे नेता चुनावी टिकट पा रहे हैं ?

टिकट कटने के बाद किस तरह अधिकतर नेता बिन जल मछली की तरह छटपटाने लग रहे हैं !

अपवादों को छोड़कर आज, सेवा के लिए नहीं बल्कि मेवा के लिए लोग राजनीति में जा रहे हैं।ऐसे लोगों से देश का कैसे भला होगा ?

जबकि आज देश के समक्ष कम चुनौतियां नहीं हैं।

देसी-विदेशी शक्तियां इस देश को तोड़ने के लिए दिन -रात काम कर रही हैं।वे हथियारबंद दस्ते तैयार कर रहे हैं।कई राजनीतिक नेता गण उन राष्ट्रविरोधियों का बेशर्मी से साथ दे रहे हैं।

ऐसे में यह अधिक जरूरी है कि राजनीति में अधिक से अधिक वैसे लोगों को लाया जाए, तरजीह दी जाएं जो बिकाउ न हों।

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13 अप्रैल 24


गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

 समानता के अधिकार के खिलाफ

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जेल मंे रह कर भी कोई व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है,मंत्री 

बने रह सकता है किंतु मतदान नहीं कर सकता

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सुरेंद्र किशोर

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जेल में रह कर भी कोई व्यक्ति 

चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल कर सकता है।

मंत्री रहते जेल गया तो भी वह उस पद पर बने रह सकता है।ताजा उदाहरण मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल का है।

किंतु कोई विचाराधीन कैदी मतदान तक नहीं कर सकता।

यदि कोई सरकारी सेवक 48 घंटे से अधिक जेल में रह जाए तो उसे निलंबित होना पड़ेगा।

पर,यह बात किसी प्रधान मंत्री,मुख्य मंत्री या मंत्री पर लागू नहीं है।

 यह तो सरासर नाइंसाफी है।

यह हमारे लोकतंत्र की यह विडंबना है।

दरअसल संविधान निर्माताओं ने इस बात की पूर्व कल्पना ही नहीं की थी कि एक दिन हमारे देश में कई जन प्रतिनिधि या मंत्री या मुख्य मंत्री इतने बेशर्म हो जाएंगे।इसीलिए इस संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया।

  इस देश में कई बार कुछ सांसद और विधायक यह मांग उठा चुके हैं कि उनके वेतन क्रमशः कैबिनेट सेक्रेट्री और मुख्य सचिव से अधिक होना चाहिए।

क्योंकि ‘‘वारंट आॅफ प्रेसिडेंस’’ में उनका स्थान ऊपर है।

किंतु दूसरी ओर वे चाहते हैं कि वैसे नियम उन पर लागू नहीं होना चाहिए जो उनके हितों के प्रतिकूल हांे।

यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो तो उसे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती है।

किंतु अनेक आपराधिक मुकदमों के रहते हुए भी कोई आदतन अपराधी व्यक्ति संसद या विधायिका की सदस्यता के लिए आसानी से उम्मीदवार बन सकता है।

सवाल है कि ब्यूरोक्रेसी की कुर्सी अधिक पवित्र होनी चाहिए या जन प्रतिनिधियों की ?

  सन 2013 में मनमोहन सरकार ने एक अध्यादेश तैयार करके राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के यहां भेज दिया था।

उस अध्यादेश के लागू हो जाने के बाद वैसे जन प्रतिनिधियों की सदस्यता भी नहीं जाती जिन्हें दो साल या उससे अधिक की अदालती सजा हुई हो।

  उस अध्यादेश का विरोध करते हुए 

राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफं्रेस में उस अध्यादेश की प्रति को सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया।

उसके बाद मनमोहन सरकार की ध्वनि बदल गई।

अध्यादेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

कई लोग कहते हैं कि यदि कांग्रेस में परिवारवाद है तो भाजपा तथा कुछ अन्य दलों में भी तो है !

क्या आज किसी शीर्ष भाजपा नेता के परिवार का कोई युवक मोदी सरकार के किसी अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से फाड़ देगा और मोदी सरकार उस अध्यादेश को वापस ले लेगी ?

‘‘परिवार में पार्टी’’ और ‘‘पार्टी में परिवार’’ का अंतर समझिए।

जिन सजायाफ्ता सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए 2013 में वह अध्यादेश तैयार कर राष्ट्रपति को भेजा गया था,उनकी सदस्यता चली गई।

  सवाल है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को दो साल की सजा हो जाए तो उसकी भी नौकरी बचाने का विचार मनमोहन सरकार कर रही थी ?

कत्तई नहीं।

वह प्रस्तावित मेहरबानी सिर्फ सजायाफ्ता नेताओं के लिए थी।

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11 अप्रैल 24

  





 नरेंद्र मोदी सरकार के किसी मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत खोजकर कोर्ट में केस क्यों नहीं कर पा रहे हैं डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी या कपिल सिब्बल ?

जबकि, अदमनीय स्वामी जी

इन दिनों मोदी सरकार के सख्त विरोधी हैं।

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डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने तो जयललिता,ए.राजा-कोनीमोझी

 --नेशनल हेराल्ड मामलों में किसी सरकार की मदद के बिना ही कोर्ट में केस करके सफलता पा ली।वैसा करके स्वामी ने देश का भला किया था।

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सुरेंद्र किशोर

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अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र सरकार दिल्ली से 100 पैसे भेजती है किंतु जनता तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। यानी 85 पैसे

बिचैलिये खा जाते हैं।

राजीव गांधी ने तब सत्ता के दलालों के खिलाफ अभियान चलाने की जरूरत बताई थी।पर,बाद में वे खुद ही बोफोर्स घोटाले में फंस गये।  

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अब आप ही अनुमान लगाइए कि सौ पैसे को घिस कर 15 पैसे बना देने के लिए प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू,लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी में से कौन कितना जिम्मेदार थे ?नेहरू सरकार ने आजादी के तत्काल बाद ही जीप घोटाले से शुरूआत करके घोटालों की नींव डाल दी थी।जीप घोटाले को कार्य रूप देने वाले कृष्ण मेनन को नेहरू ने मंत्री बना कर प्रमोशन दे दिया था।

याद रहे कि नेहरू के शासनकाल में ही यानी  

सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस  अध्यक्ष डी.संजीवैया ने इन्दौर के अपने भाषण में यह कहा था कि ‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’’

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘‘झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’  

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यह अकारण नहीं है कि आजादी के 22 साल बाद भी सन 1969 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देना पड़ा था।

  यदि सौ सरकारी पैसों में से कम से कम 80 पैसे भी सरजमीन पर खर्च हुए होेते तो 22 साल की आजादी के बाद भी गरीबी बनी नहीं रहती जिसे हटाने के नाम पर इंदिरा गांधी पर जनता से सन 1971 के लोक सभा चुनाव में 

वोट ले लिये ?

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एक खबर के अनुसार मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्रित्व काल में कुल मिलाकर करीब 16 लाख करोड़ रुपए के घोटाले हुए।

उस मंत्रिमंडल के सिर्फ एक सदस्य पर आरोप है कि उसने भ्रष्टाचार से कमाये पैसों से छह देशों में अपने व परिवार के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपए की निजी संपत्ति खरीदी।वह पूर्व मंत्री अभी जमानत पर है।

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इधर 30 दिसंबर 23 को एक अखबार ने यह खबर दी कि मोदी सरकार के 10 वर्षों में प्रत्यक्ष कर संग्रह बढ़कर तीन गुना होने की उम्मीद है।याद रहे कि मोदी राज में भी सरकारी भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है,पर कम जरूर हुआ है।उसी कारण राजस्व बढ़ रहा है। 

इस बीच मोदी सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप के सबूत अब तक न तोे कपिल सिब्बल को मिले और न ही डा.स्वामी को।

इसीलिए वे प्रधान मंत्री या किसी मौजूदा केंद्रीय मंत्री के खिलाफ कोर्ट नहीं जा सके हैं।

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राहुल गांधी यानी कांग्रेस को ‘न्याय योजना’ का गुरु मंत्र देने वाले नोबल विजेता भ्रष्टाचार का किस तरह पक्ष लेते हैं उसका प्रमाण नीचे दिया जा रहा है।-- 

‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

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--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर 2019

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शासन में भ्रष्टाचार घटने से

कर संग्रह बढ़ जाता है।

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नब्बे के दशक में बिहार सरकार का राजस्व लगभग मात्र दो हजार करोड़ रुपए था जबकि उन्हीें दिनों आंध्र सरकार को कर राजस्व से करीब 6 हजार करोड़ रुपए मिलते थे।

विकास व कल्याण योजनाएं इन्हीं पैसों से ही तो चलते हैं।राज्यों को आम तौर पर अपने राजस्व के अनुपात में ही केंद्रीय सहायता मिलती है। 

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11 अप्रैल 24