सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

 भारतीय राजनीति का सफर-जनसेवा से 

‘व्यापार’ होते हुए ‘उद्योग’ तक का !!

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(अपवाद स्वरूप अब भी राजनीति में सेवा भाव वाले नेता-कार्यकर्ता मौजूद हैं, पर उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही है।अपवादों से देश नहीं चलता।)

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सुरेंद्र किशोर

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1.-राजनीति पहले सेवा थी।

2.-प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान करके इसे नौकरी की श्रेणी में ला खड़ा किया।

3.-नब्बे के दशक में प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव ने

सांसद फंड का प्रावधान करके इस राजनीति को ‘व्यापार’ बना दिया।

4.-अब जब पता चलता है कि इस देश-प्रदेश के कुछ बड़े नेताओं के पास अरबों की संपत्ति है,जबकि पहले वे साइकिल के लिए भी तरसते थे,उन्होंने कभी कोई व्यापार भी नहीं किया,तो राजनीति को उद्योग मान लेने मेें अब किसको एतराज हो सकता है ?

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मौजूदा बिहार विधान सभा चुनाव में बहुत बड़ी अकल्पनीय राशि लेकर टिकट बेचने की जो चर्चा आम है,उससे तो यही लगता है कि अपवादों को छोड़ कर लोग टिकट वैसे ही पा रहे हैं जैसे कोई डीलर कार बेचने का डीलरशिप हासिल करता है।

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और अंत में

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मैं सन 1972-73 में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।

उन्हें विधायक के रूप में वेतन मद में मासिक 300 रुपए मिलते थे।

कमेटी की बैठक होने पर प्रति बैठक 15 रुपये भत्ता।

महीने में अधिकत्तम 4 बैठकें ही होती थीं।यानी 60 रुपए।

कर्पूरी जी की पत्नी ने एक बार मुझसे कहा कि ठाकुर जी से कहिए कि एक ही बार महीने भर का राशन खरीद कर घर में रख दिया करें।

कर्पूरी जी का जवाब था--‘‘सुरेंद्र जी,उन लोगों से कहिए कि वे जाकर पितौंझिया (यानी कर्पूरी जी के पुश्तैनी गांव )जाकर रहें।’’यानी, कर्पूरी जी की जायज आय पटना में परिवार रखकर उसका पालन-पोषण करने लायक नहीं थी।जबकि उससे पहले कर्पूरी जी मुख्य मंत्री रह चुके थे।

फिर भी कर्पूरी जी ने कभी सरकार से यह मांग नहीं की कि विधायकों का वेतन बढ़ना चाहिए।

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मेरे देखते -देखते क्या से क्या हो गया !!

जन सुराज पार्टी के मुखिया का चुनावी खर्च अरबों में है।यह उनकी ही स्वीकृति है।

आज विधायकों और सांसदों को वेतन आदि के रूप में कितने रुपए मिलते हंै ,उसका विस्तृत विवरण दैनिक जागरण (18 अक्तूबर 25)ने छापा है।

डा.आम्बेडकर कहते थे कि सांसदों-विधायकों को समुचित वेतन मिलना चाहिए।पर सवाल है कि समुचित का अर्थ कितना होता है ?

राजनीति को इतना महंगा बनाकर साधनहीन व स्वाभिमानी लोगों को लोकतंत्र से दूर रखने की जाने- अनजाने साजिश तो नहीं हो रही है ?

जितने बड़े पैमाने पर इन दिनों नेताओं के परिजनों को टिकट दिये जा रहे हैं,उससे सवाल उठता है कि आजादी से पहले देश में जो 565 रजवाडे थे,उस स्थिति में और आज के लोकतंत्र में क्या व कितना फर्क रह गया है ?

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19 अक्तूबर 25


  

 


शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

 जेपी जन्म दिन-11 अक्तूबर

लोहिया पुण्य तिथि-12 अक्तूबर

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जेपी-लोहिया इसलिए सफल हुए क्योंकि

उन दोनों ने देश-काल-पात्र की जरूरतों 

के अनुसार अपनी नीति-रणनीति तय की

पुरानी बातों की बंदरमूठ नहीं पकडी 

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सुरेंद्र किशोर

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डा.राम मनोहर लोहिया ने सन 1967 में देश की सत्ता पर से कांग्रेस का एकाधिकार तोड दिय़ा।

प्रतिपक्षी दलों को एकजुट कर लेने में उनकी सफलता के कारण ही सन 1967 में 9 राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं।उससे पहले लोहिया के कुछ प्रमुख साथी कम्युनिस्टों और भारतीय जनसंघ के साथ समाजवादियों की एकजुटता के खिलाफ थे।पर लोहिया नहीं माने।

लोक नायक जयप्रकाश नारायण ने सन 1977 में केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार तोड़ा।

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जेपी -लोहिया इस मामले में सफल इसलिए हो सके क्योंकि उन महान व दूरदर्शी नेताओं ने देश के व्यापक हित के बारे में सोचा और जो दल साथ आ सकते थे ,उन्हें साथ लिया।दोनों नेताओं में से किसी ने यह नहीं कहा कि भारतीय जनसंघ अछूत है।

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डा.लोहिया ने कहा था कि कांग्रेस को हटाने के लिए हम शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं।क्योंकि वे कांग्रेस को बड़ा शैतान मानते थे।

इमर्जेंसी तो बाद में लगी,सन 1971 में लोक सभा के चुनाव के तत्काल बाद से ही जब प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी एकाधिकारवादी प्रवृति के तहत शासन  शुरू किया तो जेपी ने इंडियन एक्सपे्रस में लेख लिख कर उनका विरोध प्रारंभ कर दिया।तभी से इंदिरा जेपी पर खफा थी।

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ध्यान रहे कि लोहिया और जेपी अपने लिए सत्ता नहीं चाहते थे।इसीलिए लोगों ने उन पर भरोसा किया।

ये दोनों चाहते तो जवाहरलाल नेहरू, जेपी और लोहिया को अपनी सत्ता में शामिल कर सकते थे।

डा.लोहिया सन 1936 में कांग्रेस के विदेश विभाग के प्रधान बनाये गये थे जब जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे।

आजादी के बाद जेपी को नेहरू ने सरकार चलाने में मदद देने के लिए आमंत्रित किया था।पर,जेपी ने उन्हें 

समाजवादी कार्यक्रम की एक लंबी सूची थमा दी।नेहरू ने जब उसे लागू करने में असमर्थता दिखाई तो जेपी कांग्रेस से अलग ही रहे।

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आज देश की समस्याएं

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मेरी समझ से आज देश के सामने दो 

सबसे बड़ी समस्याएं हैं।

1.-भारत में सर्व व्यापी भ्रष्टाचार

2.-भारत सहित दुनिया भर में चल रही जेहादी आंधी

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इन दोनों समस्याओं के खिलाफ बेलाग-लपेट संघर्ष करके जो दल इन्हें पराजित करेगा,वे ही राजनीतिक दल या दल समूह इस देश की अधिकतर जनता के प्रिय बनेंगे,बाकी राजनीतिक दल समय के साथ कमजोर होते जाएंगे।

जेपी और लोहिया के जीवन से फिलहाल यही सबक मिलते हैं।

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पुनश्चः

जेपी पर जब भी कुछ आप लिखेंगे तो कुछ अर्ध ज्ञानी लोग कहेंगे कि उनके आंदोलन के कारण जेपी के जो चेले सत्ता में आए, वे बेईमान निकले।

 अरे भाई, जेपी के आंदोलन और इमर्जेंसी के तत्काल बाद सन 1977 में जो सरकारें बनीं थीं,उसके मुखिया कंेद्र में मोरारजी देसाई थे और बिहार में कर्पूरी ठाकुर।क्या ये दोनों बेईमान थे ?

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जिनकी ओर अज्ञानियों का इशारा होता है,वे ‘‘बोफोर्स आंदोलन’’और मंडल मंडल आंदोलन के कारण सत्ता में आए और जमे।केंद्र में सन 1989 में और बिहार में सन 1990 में।

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11 अक्तूबर 25


शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

       जब विधायकी से अधिक 

      कुछ और ही महत्वपूर्ण था

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    सुरेंद्र किशोर

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सन 1957 के आम चुनाव के समय मोरारजी देसाई

पर्यवेक्षक बन कर बिहार आए थे।

पटना के सदाकत आश्रम में कांग्रेस उम्मीदवारों से मिल रहे थे।

किसी ने पूर्वोत्तर बिहार के एक निवर्तमान विधायक और टिकट के उम्मीदवार के बारे में देसाई से शिकायत कर दी कि वे छुआछूत मानते हैं।

मोरारजी ने उस टिकटार्थी से पूछा--क्या यह सच है ?

उन्होंने कहा-- हां,मैं छुआछूत मानता हूं।

देसाई ने कहा कि कांग्रेस तो छुआछूत नहीं मानती।आपको टिकट कैसे मिलेगा ?

उस उम्मीदवार ने कहा--टिकट अपने पास रखिए।मैं चला।

(यहां छुआछूत के समर्थन में यह पोस्ट नहीं लिखा गया है।बल्कि यह बताने के लिए कि तब के कई विधायकों के लिए पैसे या पद का महत्व अपेक्षाकृत कम था।

अब तो सांसद-विधायक के साथ कानूनी तौर से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इतने अधिक धन जुड़ गये हैं कि अपवादों को छोड़कर टिकट के लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।ध्यान रहे कि बिहार विधानसभा के मौजूदा चुनाव में जितने अधिक खर्च हो रहे हैं और जितने अधिक खर्च होने वाले हैं,वे अभूतपूर्व व अकल्पनीय है।राज्य के बाहर के लोगों को भी यदि राजनीति में इस भारी गिरावट के घिनौने दृश्य देखने हों तो वे इन दिनों बिहार का चुनाव आकर देखें।सिर्फ पैसे फेंक कर जीतेगा,वह इस अभागे प्रदेश को निर्ममता से लूटेगा ही।यह अब जनता पर है कि वह लूटने वालों को वोट देगी या 

किसी बड़े उद्देश्य मतदातन करेगी !  

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एक दूसरी कहानी

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पूर्वोत्तर बिहार के आलम नगर के पूर्व जमीन्दार परिवार के सदस्य रहे वीरेन्द्र कुमार सिंह आलम नगर से चार बार विधायक रह चुके थे।उनके खिलाफ अनियमितता की कोई शिकायत भी नहीं थी।

पर 1995 में जनता दल ने उनका टिकट काट दिया।

नरेंद्र नारायण यादव को टिकट मिला।

वीरेंद्र बाबू ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत करते हुए तब कहा था कि भले मेरा टिकट काट दिया,पर मेरी जगह एक ईमानदार व्यक्ति को टिकट मिला है।यह अच्छी बात है।

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वीरेंद्र बाबू की राजनीति में पहले कोई रूचि नहीं थी।हां,कांग्रेस उम्मीदवार विद्याकर कवि की ही वे मदद करते थे।पर विशेष परिस्थिति में 1977 में पहली बार चुनाव लड़े और जीते।

विधायक के रूप में कैसा अनुभव रहा ?यह पूछने पर 

वीरेंद्र बाबू ने बताया कि ‘‘विधान सभा में पहले मामूली चापाकल के बारे में सवाल उठाये जाते थे तो प्रशासन हिल जाया करता था।आज वह स्थिति नहीं रही।सब कुछ (ये संस्थाएं)जड़ हो गया है।

यह तो 1995 तक का हाल था।

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पर आज ?

लोक सभा या विधान सभा की बैठक जैसे ही शुरू होती है,भारी शोरगुल शुरू हो जाता है।लगता है कि पागलखाने के गेट को तोड़कर कुछ लोग सीधे विधायिका मंे घुस गये हैं।

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स्पीकर,मार्शल,सत्ताधारी दल,कार्य संचालन नियमावली और अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलनों की सिफारिशें सब कुछ आज बेमतलब साबित हो चुके हैं।शांति पूर्वक -नियमपूर्वक सदनों के संचालन के पक्षधर सांसदों -विधायकों की संख्या अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है।

ऐसे में नई पीढ़ी के आदर्शवादी युवक ,हालांकि समाज में अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है,कैसे राजनीति की ओर आकर्षि होंगे ?

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3 अक्तूबर 25   


   


रविवार, 28 सितंबर 2025

 ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ पर 

गोलमेज सम्मेलन जरूरी

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अब शुरू हो चुका है‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

इस संघर्ष से पीड़ित देश इस समस्या पर काबू पाने 

के लिए शीघ्र गोलमेज सम्मेलन बुलाएं।

अन्यथा देर हो जाएगी।

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सुरेंद्र किशोर

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नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सेम्युएल 

पी. हंटिग्टन ने लिखा था कि ‘‘शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब देशों के बीच नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच संघर्ष होगा।

  उस संघर्ष में चीन इस्लामिक देशों के साथ रहेगा।’’

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करीब तीन दशक बाद हंटिंग्टन की भविष्यवाणी का मूर्त रूप सामने है।

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इसका निदान अभी नहीं तो कभी नहीं !!

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(सभ्यताओं के संघर्ष का मुख्य केंद्र अभी ब्रिटेन बन गया है।क्या दूसरा केंद्र भारत बनेगा ?)  

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27 सितंबर 25





गुरुवार, 11 सितंबर 2025

 किसी ने ठीक ही कहा है--

‘‘जरूरी नहीं है बीमार होने की वजह बीमारी ही हो .....कुछ लोग तो दूसरों की खुशियां देखकर भी बीमार हो जाते हैं।’’

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ऐसे बीमार लोगों में से कुछ की बीमारी शारीरिक होती है तो कुछ की मानसिक।शारीरिक बीमारी से ग्रस्त लोग तो अस्पताल पहुंच जाते हैं। किंतु मानसिक बीमारी वाले व्यक्ति आम लोगों के बीच अपने पागलपन के नमूने बिखरते रहते हैं--कुछ देश में रह कर तो कुछ विदेश जाकर।


 फेसबुक संवाद की एक झलक

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जिनके पास आपके तथ्यों और तर्कों का सही -सटीक जवाब नहीं होता ,वे 

पहले आपकी मंशा पर सवाल उठाते हैं और फिर अशिष्टता-असभ्यता-अश्लीलता पर उतर सकते हैं।

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ऐसे लोगों की परवाह न करके अपने मान-अपमान की चिंता किए बिना जो

बात  भी देशहित में हैं,उसे लिखते जाइए।

क्योंकि देश इन दिनों अभूतपूर्व संक्रमण काल से गुजर रहा है।

ऐसे में जरुरी है कि आप लोकतंत्र,संविधान,धर्म निरपेक्षता,कानून के शासन के पक्ष में मजबूती से खड़े रहें।

  


सोमवार, 8 सितंबर 2025

 क्या पोलैंड में भी आर.एस.एस.-

भाजपा सक्रिय है ???!!!

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सुरेंद्र किशोर

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यूरोपीय देश पोलैंड की संसद ने कह दिया है कि ‘‘मुसलमानों के लिए हमारे देश में कोई जगह नहीं है।

मुसलमानों को जगह देना यानी अपने देश में तबाही के लिए बम 

लगा देना।’’ 

(इस खबर को आप यूट्यूब पर देख सकते हैं।)

दूसरी ओर, भारत के तथाकथित और एकांगी सेक्युलर राजनीतिक दल और कुछ बुद्धिजीवी यह प्रचार करते रहते हैं कि इस देश की मुस्लिम सांप्रदायिकता -कटृटरपन,दरअसल भाजपा-संघ के कारण है।

क्या उनसे यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि पोलैंड और यूरोप के कई देशों में वहां की मूल आबादी अतिवादी मुस्लिमों के खिलाफ इन दिनों यदि उद्वेलित है,तो उसका कारण क्या है ?

क्या वहां भी भाजपा-आर.एस.एस. सक्रिय है ?

जापान में इन दिनों मुसलमानों के खिलाफ प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं ?

चीन सरकार अपने देश के उइगर मुसलमानों को अभूतपूर्व ढंग से क्यों प्रताडित कर रही है ?डर के मारे कोई मुस्लिम देश या भारत का सेक्युलर चीन की इस निरंतर प्रताड़ना के खिलाफ आवाज तक नहीं उठाता। 

एक आकलन के अनुसार भारत के करीब 10 प्रतिशत मुसलमान अपने समुदाय के अतिवादियों-जेहादियों से सहमत नहीं हैं।पर वह  10 प्रतिशत न तो प्रभावकारी है और न ही मुखर।

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8 सितंबर 25