पर्यावरण संतुलन कायम रखने में इस देश की सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। पर्यावरण संतुलन बिगड़ते जाने की इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब मीडिया का एक हिस्सा इस ओर पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान देने लगा है। यह खुश खबरी है। ‘डाउन टू अथर्’’ पत्रिका की संपादक सुनीता नारायण तो पहले से ही इस मामले में ऐतिहासिक काम कर रही हैं। पर हाल में एक ’ाालीन व जिम्मेवार इलेक्ट्रोनिक चैनेल एनडीटीवी ने भी यह सामाजिक जिम्मेदारी उठाई है। यह चैनल इन दिनों पर्यावरण जागरूकता के क्ष्ेात्र में भी बढि़या काम कर रहा है। उम्मीद है कि कुछ अन्य चैनल भी इस दिशा में जल्दी ही आगे आएंगे। इलेक्ट्रानिक चैनलों का भारतीयों के मानस पर भारी असर है।
अखबारों को भी चाहिए कि वे अब पर्यावरण को अलग एक प्रमुख ‘बिट’ के रूप में स्वीकार करें। क्योंकि बढ़ते पर्यावरण असंतुलन की यह समस्या काफी गंभीर बनती जा रही है। वैसे भी मीडिया का काम सूचना, शिक्षण और मनोरंजन ही तो है, पर केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरण के क्षेत्र में पहले जैसे ही अब भी लापारवाह हंै। यह लापारवाही इस बात के बावजूद है कि सुप्रीम कोर्ट ने सन् 1991 और उसके बाद बार -बार केंद्र और राज्य सरकारों को यह हिदायत दी कि वे प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक पर्यावरण की पढ़ाई पृथक और अनिवार्य विषय के रूप में करे, ताकि कम- से-कम आनेवाली पीढियां तो इस गंभीर समस्या के प्रति जागरूक हों। इस आदेश को मानते हुए सीबीएसई और आईसीएसई से जुड़े विद्यालयों ने तो पृथक और अनिवार्य विषय के रूप से पर्यावरण की पढ़ाई शुरू कर दी । पर बिहार सरकार, विश्वविद्यालय तथा अन्य कुछ सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नजरअंदाज ही कर दिया। या फिर इस तरह उसका पालन किया ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मंशा ही पराजित हो जाए। बिहार सरकार ने पर्यावरण विषय को अन्य कई विषयों के साथ मिला दिया और उस समाज अध्ययन को पढ़ाने के लिए भूगोल के टीचर पर जिम्मेदारी सौंप दी।
पटना के एएन काॅलेज तथा कुछ अन्य काॅलेजों में पर्यावरण विज्ञान व जल प्रबंधन विषय में बीएससी और एमएससी स्तर की पढ़ाई होती है और हर साल उनकी डिग्रियां दी जाती हैं, पर बिहार सरकार के पास उन डिग्रियों का कोई मोल नहीं है। यानी इन विषयों में पास करके कोई छात्र बिहार सरकार के किसी स्कूल या यहां के किसी विश्वविद्यालय या काॅलेज में शिक्षक नहीं बन सकता। सामाजिक कार्यकर्ता मिथिलेश कुमार सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत बिहार सरकार के शिक्षा विभाग से कई महीना पहले एक सूचना मांगी। उन्होंने पूछा है कि बिहार सरकार के शिक्षा विभाग, शिक्षण संस्थान या यहां किसी भी विश्व विद्यालय में ऐसा कौन सा पद है जो सिर्फ पर्यावरण विज्ञान में एमएससी की डिग्री पाए उम्मीदवार को ही दिया जा सकता है ? ठीक उसी तरह, जिस तरह किसी कालेज के गणित विभाग में वही टीचर बन सकता है जिसके पास गणित में स्नातकोत्तर की डिग्री हो। पर इसका उत्तर अब तक शिक्षा विभाग की तरफ से नहीं आया है। लगता है कि ऐसा कोई भी पद नहीं है। यदि कोई पद ही नहीं है तो बिहार सरकार या फिर यहां के विश्व विद्यालय पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई करा कर छात्र छात्राओं के जीवन और कैरियर को क्यों बर्बाद कर रहे हैं ? यदि पर्यावरण विज्ञान के बदले वे गणित पढ़ते तो कम से कम विश्वविद्यालयों और काॅलेजों के गणित विभागों में नौकरी की उम्मीद रख सकते थे। पर बिहार सरकार के कुछ खास नीति निर्धारकों को किसी के जीवन बर्बाद होने या नहीं होने से कितना मतलब रह गया है ? उनकी प्राथमिकताएं तो कुछ और ही हैं।
इस देश में बढ़ते पर्यावरण असंतुलन को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता एम.सी.मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में लोकहित याचिका दायर की।सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका संख्या-860-91 पर विचार करते हुए 22 नवंबर 1991 को यह आदेश दिया कि राज्य सरकारें मैट्रिक स्तर या फिर इंटर स्तर तक पर्यावरण विषय को पृथक और अनिवार्य रूप से पढ़ाने की व्यवस्था करे। काॅलेज और विश्व विश्वविद्यालय स्तर पर भी इस विषय की पढ़ाई की अनिवार्यता कायम करने की संभावना पर इस देश के विश्वविद्यालय विचार करें। किंतु इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ। जहां तक बिहार के स्कूलों में पर्यावरण की पढ़ाई का सवाल है तो इसे समाज विज्ञान का हिस्सा बना दिया गया है और इसे भूगोल के टीचर पढ़ाते हैं।
पर पर्यावरण विज्ञानी डा बिहारी सिंह बताते हैं कि आज पर्यावरण विज्ञान का जो सिलेबस है, उसमें भूगोल का हिस्सा मात्र सात प्रतिशत ही है।कोई भूगोल का टीचर उस विषय के साथ न्याय नहीं कर सकता।
खैर, अब बिगड़ते पर्यावरण की एक झलक। पर्यावरण से जुड़ी दुनिया की मशहूर संस्था वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड ने भविष्यवाणी की है कि जिस रफ्तार से संसाधनों की लूट हो रही है, उस हिसाब से अगले 50 साल के अंदर कार्बन डायआक्साइड सोंखने वाले सारे जंगल उजड़ जाएंगे और समुद्र की मछलियां गायब हो जाएंगी। न शुद्ध हवा मिलेगी और न शुद्ध पानी मिलेगा। इस बिगड़ती स्थिति को संभाल लेन के लिए हमारे पास सिर्फ सात साल का समय ही बचा है। तब तक नहीं संभला तो बाद में हम चाहते हुए भी नहीं संभाल पाएंगे।
सूखती और गंदे नाले में तब्दील होती गंगा नदी की दशा देख कर हम भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। हाल में स्वामी रामदेव के नेतृत्व में संतों ने कान पुर से ही गंगा को बचाने के लिए अभियान शुरू करने का फैसला किया तो वहां के सांसद व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल घबरा गए और उन्होंने प्रधान मंत्री से संतों को मिलवाया। इसके बाद गंगा बेसिन प्राधिकार बनाने का केंद्र सरकार ने फैेसला भी किया। पर बाद में इसे भी भुला दिया गया। अब तक ऐसी कोई खबर नहीं मिली है कि प्राधिकार ने कोई बैठक भी की हो।पता नहीं ,हमारी तकदीर में क्या लिखा हुआ है जहां की विभिन्न सरकारों में ऐसे ऐसे नीति निर्धारक बैठे हुए हैं जो पर्यावरण की रक्षा का महत्व ही समझने को तैयार नहीं हैं।अब तो इस देश का भगवान ही मालिक है। सरकारों को जगाने के काम में लगा कोर्ट भी अब थक चुका।शायद मीडिया खास कर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ही कोई असर पैदा करे !
(8 फरवरी, 2009)
सोमवार, 9 फ़रवरी 2009
पर्यावरण,सरकार और मीडिया
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
राजनीति में एक और प्रयोग
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कल कहा कि ‘हम रहेंगे या भ्रष्टाचार ।’ अपनी ही सरकार के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ नीतीश कुमार की जारी जंग को देख कर सन् 1969 की इंदिरा गांधी और 1990 के लालू यादव की जंगों की याद आती है। इन नेताओं ने भी तब अलग- अलग तरह से जंग की थी। यह और बात है कि दोनों नेताओं को अपनी जंग में आंशिक सफलता ही मिली थी। अब देखना है कि नीतीश कुमार को अपनी मौजूदा जंग में पूरी सफलता मिलती या नहीं ! पर मौजूदा जंग की पूर्ण सफलता के लिए यह जरूरी है कि पुरानी जंगों की गलतियों से शिक्षा ली जाए। सन् 1990 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की जंग आरक्षण विरोधियों के खिलाफ थी। वीपी सिंह की सरकार ने केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की तो आतुर आरक्षण विरोधी सड़कों पर आ गए। आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है जिसका विरोध अदूरदर्शितापूर्ण कदम रहा है। इसी विरोध और प्रति-विरोध की जंग में लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के महाबली हो गए थे।यह और बात है कि इस जंग से मिली राजनीतिक ताकत का उन्होंने सदुपयोग नहीं किया। पर एक बात जरूर हो गई कि योग्यता के बावजूद अब बिहार में किसी सवर्ण के मुख्य मंत्री बनने की फिलहाल कोई संभावना नहीं नजर आ रही है। यानी अपनी अदूरर्शिता के कारण सवर्णों के बीच के आरक्षण विरोधियों ने खुद सवर्ण नेताओं का ही नुकसान कर दिया। उन दिनों जब आरक्षण विरोधी और आरक्षणपक्षी लोग आपस में जहां तहां भिड़ रहे थे तो बिहार विधान सभा के प्रेस रूम में बैठकर यदा कदा मैं कहा करता था कि यदि ‘सवर्ण लोग गज नहीं फाड़ेंगे तो उन्हें एक दिन थान हारना पड़ेगा। ’कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा मेरी इस टिप्पणी के गवाह हैं। पर कई लोग इसे मेरा लालू समर्थन मानते थे। ठीक उसी तरह कई लोग आज नीतीश सरकार के विकास कार्यों को लेकर मेरी तरफ से कभी कभी हो रही तारीफ को एक व्यक्ति का नाहक गुणगान मानते हैं। आज के हालात की तुलना इंदिरा गांधी के कार्यकाल और लालू प्रसाद के कार्यकाल की से जा सकती है। तब आम लोगों को लगा था कि इंदिरा जी उनके भले के लिए निहितस्वार्थियों से लड़ रही हैं। सन् 1990 में पिछड़ों को लगा था कि लालू प्रसाद उनके लिए लड़ रहे हैं। याद रहे कि पिछड़ों की आबादी आरक्षण विरोधियों की अपेक्षा काफी अधिक है। इसी तरह गरीबों की आबादी इस देश में काफी अधिक है। परिणामस्वरूप 1971 के लोक सभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत हुई और सन् 1991 के चुनाव में लालू प्रसाद की भारी विजय हुई। अब उसी तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ जब नीतीश कुमार मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठ कर लड़ रहे हैं तो उन्हें भी इसका लाभ जन समर्थन के रूप में मिलेगा ही। क्योंकि देश -प्रदेश की बहुमत आबादी किसिम -किसिम के भ्रष्टाचारों से इन दिनों काफी पीडि़त है। सन् 1969 में कांग्रेस के महा विभाजन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और पूर्व राजाओं को हासिल प्रीवी पर्स समाप्त कर दिए। गरीब लोगों को लगा कि इंदिरा गांधी सचमुच गरीबी हटाना चाहती हैं। इंदिरा गांधी ने उन दिनों बार बार यह बयान दिया कि ‘इंदिरा गांधी चाहती है गरीबी हटाना और प्रतिपक्ष चाहता है इंदिरा गांधी हटाना।’ इस नारे का काफी असर हुआ।हालांकि तब मैं एक लोहियावादी समाजवादी कार्यकर्ता था, फिर भी मैं भी इंदिरा गांधी के इस लुभावने नारे से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। तब मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से प्रतिष्ठित साप्ताहिक ‘दिनमान’ तथा अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां तथा लेख लिखा करता था। दिनमान में छपा एक पत्र भी किसी लेख से कम असरदार नहीं होता था। तब मैंने इंदिरा जी के गरीबपक्षी कदमों की तारीफ में दिनमान में पत्र लिखा, जो छपा। उन्हीं दिनों मैं दिल्ली गया हुआ था। पत्रिका ‘जन’ और मेनकाइंड के दफ्तर में मुझे ओम प्रकाश दीपक, विनय कुमार तथा कुछ अन्य समाजवादी बुद्धिजीवी मिले। उन्होंने देखते ही मुझे झाड़ लगानी शुरू कर दी। ‘अकेला, तुम कैसे इंदिरा के झूठ के प्रभाव में आ गए ? यह सब जनता को धोखा देने का उनका एक तरीका मात्र है।’ उनकी वरीयता और विद्वता को देखते हुए मैं चुप रह गया। पर मैं तब उनकी बातों से तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ था। पर बाद के वर्षों में मुझे लगा कि वे कितना सही थे और मैं कितना गलत। इंदिरा जी ने सन् 1971 में लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल कर लेने के बाद आम लोगों की गरीबी हटाने के बदले अपने पुत्र की अमीरी बढ़ाने के लिए सरकारी साधन झोंक दिए। यानी मारुति कार कारखाना खोलवा कर वे अपने परिवार को इंडिया का फोर्ड बनाने की कोशिश में लग गईं। इंदिरा जी के शासनकाल में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप जरूर मिल गया। इसका प्रमाण बाद में खुद उनके पुत्र राजीव गांधी ने दिया। सन् 1984 में प्रधान मंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि दिल्ली से एक रुपया चलता है, पर जनता तक उसमें से मात्र 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं। बाकी पैसे बिचैलिए खा जाते हैं। ऐसी व्यवस्था किसने तैयार की ? समय के साथ देश व प्रदेश में भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उसी के खिलाफ नीतीश कुमार इन दिनों जंग कर रहे हैं। पता नहीं, इस जंग में वे सफल होंगे या नहीं। पर, यदि सफल होते हैं, तो उससे उन्हें इंदिरा गांधी और लालू प्रसाद की तरह ही राजनीतिक ताकत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि ताकत मिली, तो नीतीश कुुमार उस ताकत को इंदिरा गंाधी और लालू प्रसाद की तरह जाया नहीं करेंगे।
(6 फरवरी, 2009)
(6 फरवरी, 2009)
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009
नेता, अभिनेता, बाबा और बाहुबली
जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव ने बाबाओं, अभिनेताओं और व्यापारियों के राजनीति व संसद में बढ़ते दखल का सार्वजनिक रूप से विरोध किया है। इसके लिए उन्होंने अपने सहयोगी दल भाजपा को दोषी ठहरा दिया है। ऐसा करके उन्होंने एक नई बहस छेड़ दी है। बहस अपनी जगह पर सही है। पर इस बहस को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाया भी जाना चाहिए। शरद यादव के अनुसार नाचने-गाने वाले लोगों का भूख, गरीबी, सड़क, बिजली ,पेय जल जैसी समस्याओं के निदान से कोई मतलब नहीं है।दरअसल शरद यादव की बात में आधी सच्चाई है। क्योंकि वे भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पूर्णकालिक राजनीति करने वालों में से अधिकतर लोगों को भी आम जन की भूख और गरीबी से कुछ लेना देना अब नहीं रह गया है। अन्यथा, आज इस देश में 20 रुपए रोज की औसत आय वाले गरीबों की संख्या 84 करोड़ तक नहीं पहुंच गई होती। दूसरी ओर फिल्मी क्षेत्र में भी सुनील दत्त जैसे व्यक्ति थे जो देश के बारे में सोचते थे। पर सामाजिक न्याय, समाजवाद, गांधीवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा प्रखर राष्ट्रवाद के नाम पर चुनाव जीतने वाले लोक सभा सदस्यों की संख्या बढ़कर इन दिनों करीब सवा सौ तक पहुंच चुकी है जिनके खिलाफ घोटाले, हत्या, भ्रष्टाचार, अपहरण, बलात्कार, देशद्रोह तथा इस तरह के अनेक आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं। इनमें से कई सांसदों को तो निचली अदालतें सजा भी दे चुकी हैं। इन सवा सौ सांसदों में कितने बाबा, फिल्मी हस्ती या फिर उद्योगपति हैं ? इन सांसदों को गरीबों की भूख की कितनी चिंता रही है ? दरअसल जब पूरे कुएं में ही भांग पड़ गई है, तो क्या राजनीति और क्या फिल्मी क्षेत्र। बाबाओं और व्यापारियों को भी इस घनघोर कलियुग ने ग्रस ही लिया है। हर क्षेत्र में अच्छे और बुरे लोगों का अनुपात लगभग एक ही है। बल्कि देश के कुछ खास बड़े नेताओं की मदद से राजनीति में अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही बुरे लोग प्रवेश कर गए हैं। अब यह नेताओं पर निर्भर करता है कि वे किन -किन क्षेत्रों से अच्छे लोगों का चयन करके राजनीति में आगे बढ़ाते हैं, ताकि वे गरीबों की भूख के बारे में भी सोचें।
गलती न दुहराने का वादा
एलके आडवाणी को ‘प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग’ का दर्जा दे दिया गया है। पता नहीं वे वेटिंग रूम से निकल कर सत्ता की राजधानी एक्सप्रेस गाड़ी पर सवार हो पाएंगे या नहीं। पर इससे पहले एक काम तो उन्हें कर ही देना चाहिए। बल्कि यह काम एनडीए के अन्य नेतागण भी करें तो वे फायदे में रहेंगे। वे मतदाताओं से एक वायदा करें। उन्हें चाहिए कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में पूरी सरकार और उनके कई मंत्रियों ने जो- जो गलतियां की थीं, उन्हें वे फिर से सत्ता मिलने पर कतई नहीं दुहराएंगे। वे गलतियां क्या थीं ? एक गलती यह थी कि हवाला घोटाले के अनुसंधान का काम सीबीआई को तब ठीक से नहींं करने दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर सीबीआई को फटकारा भी था। वाजपेयी मंत्रिमंडल के चार सदस्य हवाला कांड के आरोपी थे। यदि एनडीए की फिर से केंद्र में सरकार बनती है और दुबारा ऐसा कोई घोटाला होता है, तो उन आरोपित मत्रियों के खिलाफ इस बार सीबीआई ईमानदारी से अनुसंधान करेगी, ऐसा वादा आडवाणी जी जनता से करें।तब तत्कालीन मुख्य सतर्कता आयुक्त एन ट्ठिल ने वाजपेयी मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों की संपत्ति की जांच के लिए जांच एजेंसी को लिखा था। इससे बौखला कर केंद्र सरकार ने सतर्कता आयोग के सदस्यों की संख्या एक से बढ़ा कर तीन कर दी थी, ताकि बिट्ठल के इकलौते चंगुल से उन मंत्रियों को साफ बचा लिया जाए। वे बच भी गए। इस तरह की कुछ और गलतियां वाजपेयी सरकार ने की थी। गलतियां करना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। पर उन्हें जान बूझ कर दुहराना महापाप है। यह पाप उस पाप से बड़ा है जो संसद में बाबाओं, फिल्मी अभिनेताओं और उद्योगपतियों को प्रवेश दिला कर किया जा रहा है। हालांकि वाजपेयी सरकार ने कई अच्छे काम भी किए थे। वे अच्छे काम बाबाओं और फिल्मी हस्तियों ने ही सरकार से करवाए, यह खबर नहीं मिली। साथ ही यह भी खबर नहीं मिली कि जो बुरे काम अटल सरकार ने किए, वे बाबाओं, फिल्मी हस्तियों के दबाव में ही किए गए।
और अंत में
जो नेता सत्ता की गद्दी छोड़ने के लिए हर दम तैयार रहता है, बार-बार गद्दी लौटकर उसके पास वापस आ जाती है।
प्रभात खबर (दो फरवरी, 2009)
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
पड़ोसी -निरपेक्ष शहरी जीवन
आज सुबह सोकर उठा, तो देखा कि मेरा फोन कई दिनों के बाद एक बार फिर ‘डेड’ हो गया। आशंका थी कि संभवतः गत रात में भी किसी उदंड ट्रक ड्रायवर ने फोन के तार की परवाह किए बिना गाड़ी दौरा दी होगी। घर से बाहर निकला, तो दूर से ही यह लग गया कि तार फिर टूटा हुआ है। पर पोल के निकट जाने पर लग गया कि यह तो किसी तार कटवा की कारस्तानी है। कटे हुए फोन तार का बचा हुआ, हिस्सा साफ इसकी गवाही दे रहा था। इतना ही नहीं, तार का जो हिस्सा घर से भीतर बच गया है, उसके आस-पास के सामान की हालत दयनीय हो गई। बाहर तो तार काटा गया, पर भीतर से झटके से उसे खींच लिया गया, जिससे ट्यूब लाइट क्षतिग्रस्त हो गई। यानी आशियाना नगर फेज वन सरीखे शांत और शालीन मुहल्ले में भी चोर निर्भीक हो गए हैं। बड़े अपराधी जरूर इन दिनों अपेक्षाकृत शंात हैं । पर, छोटों पर लगाम कस जाना अभी बाकी है। पटना का यह एक ऐसा मुहल्ला है, जहां महिलाएं रात में भी भोजन के बाद सड़क पर टहल सकती हैं। यहां किसी भी मकान के साथ एक दूकान खोल देने की छूट नहीं है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस मुहल्ले के सभी गेट एक साथ नहीं खुले रहते हंै। सफाई -व्यवस्था ठीक -ठाक है। जलापूर्ति को लेकर भी कोई शिकायत नहीं है, पर किसी अन्य शहरी इलाके की तरह यहां भी यह जरूरी नहीं है कि एक पड़ोसी अपने बगल के किसी मकान में रहनेवाले के बारे में जाने। किराए के मेरे आवास के पड़ोस के मकान मालिक साल में एक -दो बार ही कुछ दिनों के लिए ही यहां आते हैं। बाकी महीने वह घर खाली यानी बंद रहता है। उस मकान में यदा -कदा चोर ऐसे ही चोरी की कोशिश करते पाए जाते हैं, जिस तरह किसी बंद पड़े मकान में चूहे या तेलचट्टे उछल कूद करते रहते हंै। उस मकान मालिक ने किसी स्थानीय व्यक्ति को अपना फोन नंबर तक नहीं दिया है, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में उन्हें सूचना दी जा सके। मेरे घर के भीतर आया फोन का तार उसी बंद पड़े मकान के अहाते से होकर गुजरता है। शायद चोर को लगा होगा कि वह उसी खाली मकान में लगे फोन का तार काट रहा है। उसे किसी तरह के प्रतिरोध का भय नहीं रहा होगा। हालांकि मेरा यह अनुमान गलत भी हो सकता है। तार कटने का कोई और कारण भी हो सकता है। हालांकि इस घटना ने मुझे चैंकन्ना कर दिया है। अब हमें कुछ अधिक ही सावधान रहना पड़ेगा। क्यांेकि बीट पुलिसिंग की कोई झलक मेरे घर तक अभी नहीं पहुंची है। अपनी रक्षा खुद ही करनी है। इसके साथ ही फोन महकमे के बारे में भी दो शब्द। इस बार तो मेरे फोन का तार ट्रक से नहीं टूटा है, पर इससे पहले कई बार ट्रकों या बड़े वाहनों का कोप मैं झेल चुका हूं। वाहन के टकराने से फोन का तार टूटने का एक मात्र कारण है कि मेरे घर के सामने फोन का पोल जरूरत के अनुसार पर्याप्त ऊंचा नहीं है। मैं तो इस मुहल्ले के लिए नया हूं, पर देखने से लगता है कि फोन के पोल जब लगे होंगे, तो सड़क की ऊंचाई कम रही होगी। अब ऊंचाई बढ़ गई है और पोल छोटा पड़ चुका है। इसलिए छोटे वाहनों से तो तारों को कोई कष्ट नहीं होता, पर कभी -कभी बड़े वाहन आते हैं तो फोन को डेड कर जाते हंै। एक पत्रकार के लिए फोन कितना जरूरी है, यह बात कोई पत्रकार ही समझ सकता है। फोन महकमे वालों के लिए इस महत्व का कोई मतलब नहीं है। एक समय था कि जबकि पत्रकारों सहित कुछ महत्वपूर्ण नागरिक सेवाओं से जुड़े लोगों के फोनों की समय -समय पर टेस्टिंग होती रहती थी, ताकि यह देख लिया जाए कि फोन किसी कारणवश बंद तो नहीं है। ऐसे फोनों की एक सूची फोन महकमा अपने पास रखता था। इस टेस्टिंग के लिए किसी तरह की शिकायत करने की जरूरत नहीं पड़ती थी।पर जिस तरह अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, गिरावट और काहिली ने घर कर लिया है, उससे फोन महकमा अछूता कैसे रह सकता है ? अब शिकायत कीजिए और कई दिनों तक इंतजार कीजिए। इसके अलावा कोई चारा ही नहीं है। बड़े अफसरों को कहने का भी अब आम तौर पर कोई फायदा नहीं होता। अब तो मैंने कुछ कहना भी छोड़ दिया है। एक कटु अनुभव के बाद मुझे फोन महकमे से काफी निराशा हुई। जब मैं मजिस्ट्रेट कालोनी में रहता था, तो मेरे पास दो फोन थे। एक का नंबर 2586562 है, जो अब भी मेरे पास है। और दूसरे का नंबर था- 2586732 । दूसरा नंबर सन् 1996 में मैंेने अपने एक रिश्तेदार को दे दिया। उसके नाम फोन ट्रांसफर भी हो गया। उस व्यक्ति ने अलग से जमानत राशि भी जमा कराई जैसा कि नियम है। अब मेरे द्वारा जमा कराई गई जमानत राशि वापस होनी चाहिए थी। पर, करीब तेरह साल होने को है। अब भी मैं उस जमानत राशि का इंतजार कर रहा हूं। प्रारंभ के कुछ वर्षों तक तो मैंेने काफी दौड़- धूप की, पर बाद में हार कर छोड़ दिया। हालांकि इससे पहले संबंधित दफ्तर में फोटोग्राफर नरेंद्र देव के साथ जाकर वहां सुनील कुमार सिन्हा नामक एक अफसर को संबंधित सारे कागजात मैंने सौंप दिए थे और यह भी लिख कर दे दिया था कि फोन सेट की कीमत मेरी जमानत राशि में से काट ली जाए। याद रहे कि जिस रिश्तेदार को मैंने फोन ट्रांसफर किया था, उसे फोन महकमे ने कोई फोन सेट नहीं ही दिया। ऐसे कटु अनुभव के बावजूद मैं यह उम्मीद करता हूं कि फोन महकमे से अब और अधिक लोगों की नाराजगी नहीं बढ़े। क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र का भी जीवित रहना जरूरी है।
(तीन फरवरी, 2009)
(तीन फरवरी, 2009)
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
सराहनीय श्रवण कुमार पुरस्कार
इससे बेहतर कोई खबर नहीं हो सकती थी जो अभी -अभी मिली है। महावीर मंदिर न्यास समिति ने श्रवण कुमार पुरस्कार के लिए समिति की घोषणा कर दी। शारीरिक रूप से अक्षम माता-पिता की निःस्वार्थ सेवा के लिए श्रवण कुमार पुरस्कार कायम किया गया है। इसके लिए अनुशंसा भेजने की आखिरी तारीख 31 मार्च, 2009 तय कर दी गई है। पटना स्थित महावीर मंदिर की न्यास समिति और किशोर कुणाल इसके लिए बधाई के पात्र हैं। कु-पुतों और कु-पतोहुओं की बढ़ती संख्या के बीच उपेक्षित माता-पिता के लिए बड़ी राहत भरी खबर है। शायद इन पुरस्कारों के जरिए उनकी उपेक्षा कुछ कम हो सके। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एसएन झा ने पुरस्कार समिति की अध्यक्षता स्वीकारी है। इससे इस समिति की विश्वसनीयता भी बढ़ी है। साथ ही पुरस्कार की राशि भी आकर्षक है। यानी प्रथम पुरस्कार एक लाख रुपए का है। दूसरा पुरस्कार 50 हजार रुपए का। तीसरा पुरस्कार 25 हजार रुपए का है। इसके अलावा 25 लोगों के लिए सांत्वना पुरस्कार एक -एक हजार रुपए का है। शिशु कन्या भ्रूण हत्या और दहेज प्रताड़ना की तरह ही उपेक्षित माता-पिता की समस्या भी इस देश और प्रदेश में चिंताजनक होती जा रही है। सरकार की तरफ से समुचित सामाजिक सुरक्षा के अभाव में यह समस्या और भी विकराल होने वाली है। ऐसे में अपने ढंग से महावीर मंदिर न्यास ने सकारात्मक पहल की है। अभी तो इसकी शुरुआत हो रही है, पर यदि साधन-सुविधा में बढ़ोतरी हो तो बाद के वर्षों में ऐसे अनेक पुरस्कारों की व्यवस्था जिला स्तर पर भी की जानी चाहिए। पर सवाल यह भी है कि एक किशोर कुणाल कहां -कहां क्या -क्या करेंगे ! एक व्यक्ति की अपनी सीमा भी है। बुजुर्गों की उपेक्षा संयुक्त परिवार के टूटते जाने से और भी बढ़ी है। स्व-केंद्रित युवा वर्ग अभी यह महसूस ही नहीं कर रहा है कि उसके घर में भी एक दिन ‘बागवान’ फिल्म की कहानी दुहराने की नौबत आ सकती है। मैं हर सुनने वाले को कहता हूं कि तुम अपने पिता-माता को बीच- बीच में गांव से बुला कर अपने पास रखो और उनकी सेवा करो, ताकि तुम्हारे बढ़ते हुए बच्चे भी देख कर यह सीख सकें। इससे होगा यह कि तुम्हारे बच्चे जब बड़े हो जाएंगे, तो वे भी तुम्हारा ध्यान रखेंगे। जिन कुछ देशों में भारत की तरह बड़ी संख्या में अरबपति पैदा नहीं होते, वहां भी बेरोजगारी और वृद्धावस्था पेंशन की राशि इतनी अधिक होती है, जिससे उनका जीवन चल जाता है। पर हमारे यहां जहां जनता के पैसे ही लूट कर कुछ लाख लोगों को तो अत्यंत अमीर बनने की छूट सरकार ने दे रखी है, पर मुझे हर माह सिर्फ 1046 रुपए पेंशन देती है। यदि मैं पत्नी और संतान के मामले में सौभाग्यशाली नहीं होता, तो क्या होता ? यदि रिटायर होने के बाद भी मुझमें काम करते रहने की शारीरिक क्षमता नहीं होती तो क्या होता ? यदि देश के संपादकों की मेरे प्रति सदाशयता नहीं होती, तो क्या होता ? पर, अमीर लोगों से भरे पड़े इस गरीब देश में मेरे जैसे कितने सौभाग्यशाली बुजुर्ग हैं ? मैंने अपनी पेंशन राशि सिर्फ उदाहरण के रूप में यहां पेश की। इसका कोई और उद्देश्य कतई नहीं है। यदि मेरी पेंशन राशि कम है, तो इसकी खुद मुझे कोई परवाह नहीं है। पर इससे इस देश की पेंशन व्यवस्था का पता तो चल ही जाता है। मेरी 1046 रुपए की पेंशन के बारे में भी कुछ शब्द और। यह पेंशन राशि भविष्य निधि के साथ जुड़ी हुई है। सरकार ने ठीक ही कल्पना की थी कि रिटायर करने के बाद भविष्य निधि की एकमुश्त राशि से तो आम तौर पर मकान निर्माण, लड़की की शादी तथा दूसरी जिम्मेदारियां पूरी होती हैं। यदि किसी रिटायरकर्मी का पुत्र दबंग और निकम्मा हुआ, तो वह उस एकमुश्त राशि को किसी-न-किसी बहाने झपट लेता है। फिर जीवन भर नौकरी निभा कर घर लौटा बुजुर्ग कैसे खाएगा ? इसी समस्या को ध्यान में रखकर शुरू की गई यह पेंशन योजना। पर इसकी अत्यल्प राशि तो देखिए। अन्य पेंशन राशि के विपरीत इस राशि में सालाना बढ़ोतरी भी नहीं होती। खैर यह तो एक अलग विषय है। इस पर सोचने की फुर्सत हमारे हुक्मरानों को नहीं है, जो आए दिन अपने वेतन, सुविधा और पेंशन बेशर्मी से बढ़ाते रहते हैं। जबकि उनमें से अधिकतर हुक्मरानों ने इन लाखों अत्यल्प पेंशनधारी बुजुर्गों की तरह जीवन भर लोक सेवा नहीं की है। जो हो, ऐसे लाखों लोग रिटयर होने के बाद इसी तरह की अत्यल्प राशि हर माह उठाते हैं। इनमें कुछ लोगों को तो मुझसे भी कम राशि मिलती है। ऐसे लोग अपनी संतान पर बुरी तरह निर्भर हंै, पर अधिकतर संतानों के लिए वे बोझ ही हैं। जिन बुजुर्ग लोगों के जीवन में किसी तरह की कोई पेंशन राशि नहीं है और यदि वे अपनी संतान की ओर से उपेक्षित हैं, तो कैसे उनका जीवन कटता होगा, इसकी कल्पना किशोर कुणाल ने की है। इसीलिए श्रवण कुमार पुरस्कार सामने आया है। शायद इन पुरस्कारों से उनमें से कुछ के जीवन में कुछ फर्क आए !
(दो फरवरी 2009)
(दो फरवरी 2009)
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
नेता नहीं तो बाबा सही
कभी जेपी तो कभी वीपी और अब बाबा राम देव ! भ्रष्टाचार के खिलाफ इनके धारावाहिक अभियानों को यह देश देख रहा है। जेपी और वीपी के अभियान व संघर्ष तो बाद में कुछ भ्रष्ट व निकम्मे नेताओं के चलते एक तरह से निष्फल कर दिए गए। पर, अब बाबा राम देव के अभियान का क्या होगा ? इस प्रस्तावित अभियान के अच्छे नतीजों का देश को इंतजार रहेगा। जय प्रकाश नारायण ने सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार तथा कुछ अन्य समस्याओं के खिलाफ अभियान शुरू किया था। अस्सी के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफर्स तथा अन्य कई घोटालों को लेकर देश में ऐसा समां बांधा था कि सन् 1989 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई। सन् 1990 में देश की कई विधान सभाओं के चुनावों में भी कांग्रेस सरकारें बुरी तरह हार गईं। पर तब जिस तरह की जनता दल सरकारें बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में बनीं, उसने अपने काम काज से कांग्रेसियों को भी लजा दिया। भ्रष्टाचार बेतहासा बढ़ा। 1974 के जेपी आंदोलन के बाद केंद्र और राज्यों में जो सरकारें बनीं थीं,वे भी जेपी की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकीं, किंतु 1990 के बाद राज्यों में बनी सरकारों से फिर भी वे बेहतर थीं।जेपी आंदोलन से उपजी केंद्र की सरकार के मुखिया मोरारजी देसाई थे।बिहार में सन् 1977 में मुख्य मंत्री बने थे कर्पूरी ठाकुर और उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव।तीनों नेता व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे। इसीलिए शासन-प्रशासन में वैसी गिरावट नहीं आई जैसी बाद के वर्षों में आई। अब तो भ्रष्टाचार इतना बढ़ गया है कि नेताओं के बीच से भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने वाला कोई नेता भी उपलब्ध नहीं है। भ्रष्टाचार से जर्जर राजनीति में अब वह नैतिक ताकत ही नहीं बची है।राज्य स्तर पर बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने जरूर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरू किया है,पर उस अभियान का भी बाहर-भीतर से इतना परोक्ष और प्रत्यक्ष विरोध हो रहा है कि मुख्य मंत्री अपने ही संघर्ष में हांफते नजर आ रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में स्वामी राम देव ने देश की राजनीति और शासन में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के लिए कमर कस ली है।जेपी और वी।पी.की ताकत भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने से बढ़ी थी।जेपी हालांकि आजादी की लड़ाई के अप्रतिम योद्धा थे,पर सर्वोदय मेंे चले जाने के बाद उनकी सभाओं में कुछ सौ या हजार लोग ही आम तौर पर जुट पाते थे।पर जब उन्होंने 1974 में बिहार आंदोलन का नेतृत्व संभाला तो उन्हें सुनने के लिए लाखों लोग जुटने लगे थे। वीपी सिंह ने राजीव सरकार से संघर्ष का खतरा उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया।लोगों ने उन पर विश्वास किया। क्योंकि वे भी व्यक्तिगत रूप से ईमानदार थे।पर अपने निधन के कुछ साल पहले वीपी सिंह ने यह कह कर देश को चैंका दिया कि उन्होंने बोफर्स को लेकर राजीव गांधी पर कोई आरोप ही नहीं लगाया था। उनका यह कहना सच नहीं था। सही बात यह है कि वी.पी.सिंह ने अपना पूरा बोफर्स अभियान राजीव गांधी के खिलाफ ही चलाया था। वीपी के पलटने से भी राज नेताओं की विश्वसनीय घटी। वैसे भी राजनीति में ं कितने लोग अब भी माजूद हैं जिनकी कुछ ताकत बची है और फिर भी वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाना चाहते हैं ? ऐसा नहीं हैं। संभवतः इसीलिए स्वामी राम देव को सामने आना पड़ रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वामी राम देव ने देश को जितना दिया है, उतना कम ही लोगों ने दिया है। जनता के एक बड़े हिस्से में उनकी काफी साख है। इसलिए उनको यह पूरा अधिकार है कि जनता की अन्य ज्वलंत समस्याओं पर अपनी राय रखें और उसके निराकरण के लिए अभियान चलाएं।गंगा की सफाई को लेकर उन्होंने जो अभियान चलाया,उसी का नतीजा है कि केंद्र सरकार ने गंगा बेसिन प्राधिकार बनाया। अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी वे अभियान शुरू करेंगे ,लोग उसे गंभीरता से लेंगे। शायद उसके कुछ अच्छे नतीजे भी सामने आएं।पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाना जितना जरूरी है, उसी अनुपात में उस अभियान में सफल होना उतना ही कठिन है। क्योंकि देश के हर क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों में से अधिकतर लोग इस देश को अपनी पूरी ताकत से लूटने में लगे हुए हैं। जेपी और वीपी के विपरीत रामदेव ने अपने अन्य उपायों से संचित जन समर्थन की ताकत के बल पर अभियान शुरू करने का निर्णय किया है। वे यह भी कहते हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय बाबा राम देव की यह समझ सही है कि देश की 99 प्रतिशत जनता ईमानदार है और 99 प्रतिशत नेता बेईमान हैं। याद रहे कि अनेक नेता यह तर्क देते हैं कि जब जनता ही चोर है तो नेताओं को भी वैसा बनने की मजबूरी है। बाबा ऐसा नहीं मानते। राम देव यह भी नहीं मानते कि देश की सिर्फ 5 प्रतिशत जनता ही टैक्स देती है। ऐसा प्रचार वहीं लोग करते हैं जो इस बात की अघोषित छूट चाहते हैं कि कुछ ही लोगांे ंको इस देश के संसाधनों के इस्तेमाल का हक हे। बल्कि सही बात यह है कि जो गरीब व्यक्ति नमक भी खरीदता है,वह भी टैक्स देता है और सरकार के संसाधनों पर उसका भी हक है। कुछ नेता यह कहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता।रामदेव ऐसा नहीं मानते। इसी तरह की कुछ और बातें राम देव कहते हैं। यानी,देश की बीमारी की सही पहचान रामदेव ने कर ली है। जिस ईमानदार व योग्य डाक्टर ने मर्ज की सही पहचान कर ली,उसने बीमारी दूर भी कर दी। देखना है कि राम देव क्या कर पाते हैं। दुःखद बात यह है कि इस देश में जेपी कौन कहे, वीपी जैसे नेता भी अब उपलब्ध नहीं है। यह इस देश की राजनीति पर टिप्पणी है। इसीलिए राम देव को आगे आना पड़ रहा है। जबकि आज जेपी और वीपी के समय की अपेक्षा देश को अधिक गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। (एक फरवरी, 2009)
sukishore_patna@yahoo.co.in
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रविवार, 1 फ़रवरी 2009
गुप्त विदेशी खाते अब गुप्त नहीं
स्विट्जरलैंड के पास एक छोटा सा देश है। उसका नाम है लाइख टेंस्टाइन। उसके राज कुमार के बैंक का नाम है एलजीटी बैंक। उस बैंक में भारत सहित दुनिया भर के अमीरों के अपार काले पैसे रखे गए हैं। यहां खातेदार का नाम नहीं बताया जाता। हाल में स्विस बैंकों ने अपने यहां पैसे रखने वाले लोगों के नाम-पते की गोपनीयता बनाए रखने की परंपरा समाप्त कर दी। इस कारण काले धन के मालिकों ने लाइखटेंस्टाइन की ओर रुख किया। एलजीटी बैंक के एक कम्प्यूटर कर्मचारी हैनरिक कीबर ने सारे गुप्त खातों के नाम-पता वाला सीडी तैयार कर अपने पास रख लिया। बैंक के प्रबंधन ने भले इस अवैध काम के लिए कीबर को नौकरी से निकाल दिया, पर उसने वह पूरी सीडी जर्मनी की खुफिया सेवा को 40 लाख पाउंड में बेच दी। ब्रिटेन को सिर्फ अपने देश के काला धन वालों की सूची चाहिए थी। इसलिए उसे कम पैसे लगे। उसने मात्र एक लाख पाउंड में उन लोगों के नाम ले लिए। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम और कई दूसरे देश उस सीडी में उपलब्ध जानकारियां कीबर से ले गए। ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि यह लाभ का सौदा है। क्योंकि अपने देश के काला धन वालों से हम इस सूचना के जरिए टैक्स के रूप में काफी पैसे वसूल लेंगे।
प्रभात खबर (24नवंबर, 2008)
पर, भारतीय ‘धन-पशु’ चिंतामुक्त
भारत के भी अनेक अमीर लोगों की भारी धन राशि उस बैंक में जमा है। जाहिर है कि वे काली कमाई की राशि है। गत साल यह खबर आई भी थी कि भारत के अमीर लोगों ने विदेशों में 30 से 40 बिलियन डालर गैर कानूनी तरीके से जमा कर रखा है। इस देश के टैक्स चोर हर साल नौ लाख करोड़ रुपए की टैक्स चोरी करते हैं। इस पृष्ठभूमि में इसी साल के प्रारंभ में यह खबर आई कि लाइखटेंस्टाइन में अमीर भारतीयों के गुप्त खातों के बारे में जानकारी देने संबंधी जर्मन सरकार की पेशकश पर भारत सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है। इस संबंध में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तब प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह को पत्र लिखा था। पी चिदम्बरम् ने 16 मई, 2008 को उस पत्र का जवाब दे दिया। चिदम्बरम् ने स्वीकार किया कि जर्मनी सरकार ने ऐसी पेशकश की थी। चिदम्बरम् के अनुसार भारत सरकार ने फरवरी में ही उससे खातों का विवरण मांगा था। पर, जर्मन सरकार के कर कार्यालय ने जवाब दिया कि वह तत्काल ऐसा करने की स्थिति में नहीं है। सवाल है कि भारत सरकार कीबर से ही सूचनाएं खरीदने की कोशिश क्यों नहीं करती ? जो तरीका ब्रिटेन और जर्मनी की सरकारों ने अपनाया, वही तरीका भारत सरकार क्यों नहीं अपना सकती ? क्या भारत सरकार ने अपने किसी दूत केे जरिए जर्मन सरकार के प्रतिनिधि से मिलकर सूचनाएं खरीदने की कोशिश की ? या फिर आलोचनाओं से बचने के लिए सिर्फ पत्र-व्यवहार करके औपचारिकता पूरी कर ली ? क्या ऐसे मामले सिर्फ पत्र-व्यवहार से सुलझते हैं ? अगले लोकसभा चुनाव में प्रतिपक्ष यह सवाल खड़ा कर सकता है कि लाइख के खातों को छिपाने में केंद्र सरकार का कैसा निहितस्वार्थ है ?कैसा है प्रतिपक्ष का दामन
पर क्या ऐसे सवालों पर बोलने का नैतिक अधिकार भाजपा को कितना है ? सन् 2002 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार थी। तब यह एक बड़ा खुलासा हुआ था कि इस देश के व्यापारी व उद्योगपति सरकारी बैंकों के 11 खरब रुपए दबा कर बैठ गए हैं। उन्होंने कर्ज के रूप में लिया था। पर रिजर्व बैंक उन डिफाॅल्टरों के नाम तक सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है। इस 11 खरब की ‘लूट’ पर मनमोहन सिंह और पी चिदम्बरम् के तब के बयानों की शब्दावली उससे भी कड़ी थी जैसा ‘उद्गार’ अपने पत्र में श्री आडवाणी ने लाइख टंेस्टाइन बैंक के गुप्त खातों के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में व्यक्त किया था। इस बीच यह खबर आई है कि सिर्फ बीस रुपए रोज पर जीवन गुजारने वाले भारतीयों की संख्या 80 करोड़ से बढ़ कर 84 करोड़ हो गई है। काला धन स्वदेश वापस आता तो वह इन गरीबों के तो काम आता, पर गरीबांे की चिंता आज कितने नेताओं को है ? और अंत में
अपनी गलतियां सार्वजनिक रूप से कबूलना सचमुच अच्छी बात है। पर, कबूली गई उन्हीं गलतियों को जानबूझ कर बार-बार दुहराना गलत बात है।प्रभात खबर (24नवंबर, 2008)
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