मंगलवार, 15 जुलाई 2014

नीतीश को मिली अच्छे कामों की सजा ?

(इस लेख का संपादित अंश 19 मई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)



बुरे कामों की सजा तो मतदाता देर-सवेर जरूर देते हैं, पर इस बार बिहार में नीतीश कुमार को उनके कुछ अच्छे कामों की भी सजा मिल गयी।

  बिहार के अधिकतर सवर्ण मतदाताओं ने नीतीश को ऐसी गलती के लिए सजा दी जो उन्होंने की ही नहीं थी। अधिकतर सवर्ण मतदातागण नीतीश कुमार से इन दिनों नाराज चल रहे हैं। पर यहां यह कहना जरूरी है कि नरेंद्र मोदी फैक्टर का भी चुनाव में जबर्दस्त असर था।

हालांकि मोदी की लहर नहीं होती तोभी बिहार के अधिकतर सवर्ण मतदाता  नीतीश कुमार के गठबंधन को वोट नहीं देते।

उन लोगों ने इस लोकसभा चुनाव 2014 मंे जदयू को वोट नहीं दिया जबकि नीतीश कुमार की सरकार ने सन 2005 में सत्ता में आने के बाद सर्वाधिक राहत सवर्णों को ही पहुंचाई। नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में खुद सवर्णों ने भी कभी बड़ी भूमिका निभाई थी। वे लालू के जंगल राज से ऊब चुके थे। पर बाद में स्थिति बदल गई।

  लालू -राबड़ी के कथित ‘जंगल राज’ से व्यवसायियों के बाद सवर्ण ही सर्वाधिक परेशान थे। वे लालू-राबड़ी राज से मुक्ति चाहते थे। नीतीश ने मुक्ति दिलाई।

जो सवर्ण किसान गांवों में नक्सलियों, अपराधियों व सरकारी संरक्षणप्राप्त दबंगों के डर से खेती तक नहीं कर पा रहे थे, उन्हें नीतीश की सरकार ने भारी राहत दिलाई। कानून -व्यवस्था ठीक करके नीतीश सरकार ने ऐसा किया।

   नीतीश राज आने पर वर्षों बाद राज्य के अनेक गांवों में फिर से खेती-बाड़ी शुरू हो गई। खेती-बाड़ी बंद होने से अनेक गांवों मंे शादी-विवाह भी बंद थे। सब चालू हो गए। इसके अलावा भी कई तरह की राहतें नीतीश सरकार ने पहुंचाई।

पर आखिर नीतीश कुमार व उनकी सरकार ने उनका बाद में क्या बिगाड़ा कि वे उनके खिलाफ हो गये ?

उनका तो कुछ नहीं बिगाड़ा। बल्कि कई तरह के उपायों से अन्य लोगों के साथ -साथ उनका भी भरसक बनाया ही। नीतीश सुशासन व न्याय के साथ विकास की नीति पर चल रहे थे। न्याय के साथ विकास का मतलब है गरीबों का भी विकास। राज्य के विभिन्न हिस्सों से मिल रही सूचनाओं के अनुसार दरअसल कमजोर वर्ग के लोगों का सरकार द्वारा भला किए जाने के कारण अधिकतर सवर्ण नीतीश से खफा हो गये।

ठीक ही कहा गया है कि कुछ लोग अपने दुःख से नहींे बल्कि पड़ोसियोंे के सुख से अधिक दुःखी हो जाते हैं। 

आम सवर्णों के प्रति भी नीतीश कुमार का सदा मधुर व्यवहार रहा है। लंबे समय से मुख्य सचिव व डी.जी.पी. सवर्ण ही हैं। एक कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र होने के कारण नीतीश कुमार को ऐसा संस्कार मिला जिसके तहत सामाजिक मामलों में उनका संतुलित दृष्टिकोण रहता है। 

 कुछ ही साल पहले नीतीश कुमार जब ‘थ्री इडिएट’ फिल्म देखने पटना के एक सिनेमा हाॅल गये थे तो उनके साथ उनके चार गहरे दोस्त थे। चारों सवर्ण ही थे। यह कोई संयोग नहीं था। जानकार लोग बताते हैं कि दरअसल नीतीश कुमार ने जातीय भावना से कभी कोई काम नहीं किया। इसी तरह की अन्य कई बातें हैं। 

लालू-राबड़ी राज में बुरी तरह बिगड़ी कानून -व्यवस्था को ठीक करने में नीतीश सरकार ने महत्वपूर्ण काम किया। विकास के काम भी काफी तेज  हुए। उससे भी समाज के अन्य लागों के साथ -साथ सवर्णों को भी काफी लाभ हुआ। सरकारी पदों पर लाखों बहालियों से सवर्णों को भी लाभ मिला।

 लालू -राबड़ी राज में सरकारी पद खाली रहने के बावजूद बहालियां लगभग बंद थीं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार इस चुनाव में सवर्णों के वोट से वंचित नीतीश कुमार को यदि राजनीतिक मजबूरी में कभी राजद के साथ जाना पड़ेगा तो इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार माना जाएगा ? जाहिर है कि वे सवर्ण ही अधिक जिम्मेदार होंगे जिन्होंने नीतीश कुमार को बीच मझधार में छोड़ दिया। हालांकि राजद के साथ जदयू की कभी सरकार बनेगी तो उससे सवर्णों का कितना भला होगा ?

     यह बिहारी समाज के लिए विडंबना ही है कि नीतीश कुमार से  सवर्णों की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह रहा कि नीतीश सरकार ने कमजोर वर्ग के लिए बड़े पैमाने पर कल्याण व विकास के काम किये। उन लाभान्वित लोगों में अधिकतर खेतिहर मजदूर हैं। जब नीतीश के कारण उनका आर्थिक सशक्तीकरण हुआ तो वे भूमिपतियों से मजदूरी को लेकर सौदेबाजी की स्थिति में आ गये। वे कभी -कभी आराम भी करने लगे। यदा कदा अब वे काम पर जाने से मना कर देते हैं। भूमिपतियों में सवर्ण ही अधिक हैं। यह सौदेबाजी व मजदूरों की ‘आराम तलबी’ उन्हें मंजूर नहीं है। उन्हें खेती के लिए अपनी पुरानी यानी सस्ती शर्तों पर मजदूर मिलने में दिक्कत होने लगी है। कमजोर वर्ग के लोग अब आम तौर पर उनसे दबते नहीं हैं। 

   गांवों के कई सवर्ण भूमिपतियों ने चुनाव से पहले इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि लालू प्रसाद तो पिछड़ों के लिए सिर्फ बड़ी -बड़ी बातें ही अधिक करते थे, पर नीतीश कुमार ने तो आर्थिक सशक्तीकरण करके उनका मनोबल वास्तव में बहुत बढ़ा दिया है। अब हमलोगों के लिए खेती करना कठिन हो गया है। इस बार हम नीतीश को हरा देंगे।
  यही हुआ भी।

 सन 2009 के लोकसभा चुनाव में जदयू को बिहार में 24.04 प्रतिशत वोट मिले थे, पर इस बार जदयू 15.80 प्रतिशत सिमट गया।

   उधर एक बात और है। भाजपा के पक्ष में लगभग देशव्यापी लहर से बिहार भला अछूता कैसे रह पाता ? इसलिए बिहार में भाजपा की भारी सफलता राज्य की राजनीति के लिए उतनी महत्वपूर्ण बात नहीं है जितनी सत्ताधारी नीतीश कुमार के दल की भारी विफलता और इस विफलता से उपजी राजनीतिक अनिश्चितता। जदयू इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहा। कहते हैं कि होम करते नीतीश के हाथ जले। दूसरा स्थान राजद गठबंधन को मिला। यानी सवर्णों के अलावा भी कुछ दूसरे लोगों ने भी नीतीश को वोट नहीं दिये। तीसरे स्थान पर जाने का भी दुःख जदयू को है।

  जबकि नीतीश सरकार ने बिहार को लगभग हर मोर्चे पर विकसित किया। अब भी विकास के काम धुआंधार जारी हैं। उन्होंने पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों के बीच के उस हिस्से के लिए विशेष काम किये जिन्हें उसकी सर्वाधिक जरूरत थी।

  विकास के करीब -करीब हर संकेतक में बिहार का प्रदर्शन शानदार रहा। कानून व्यवस्था बेहतर होने के कारण लोगबाग अपने- अपने छोटे -बड़े रोजगार में निर्भीकतापूर्वक लगे हुए हैं। पहले आतंक के माहौल में व्यापार कठिन था। तब व्यापारी राज्य के बाहर भाग रहे थे।

   इसके साथ ही कई अन्य सकारात्मक बातें भी हो रही हैं। इसके बावजूद यदि नीतीश कुमार को मतदाता अस्वीकार कर दे तो उस नेता के लिए हतोत्साहित होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार मतदाताओं के एक हिस्से ने नीतीश कुमार को ठुकराकर नीतीश से अधिक खुद का यानी बिहार का अधिक नुकसान किया है। क्योंकि शासन की दृष्टि से बिहार जैसे एक बीहड़ प्रदेश को पटरी पर लाने का काम करने की कूबत नीतीश कुमार के अलावा अन्य किस नेता में है, इस सवाल का जवाब अभी कई लोगों को नहीं मिल रहा है।

  जदयू और खासकर नीतीश कुमार का इसलिए भी दुखी व उदास होना स्वाभाविक है कि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता ने जनता की मदद से तो मोदी की लहर को रोक ही लिया है। यह काम बिहार में क्या नहीं हो सकता था ? जबकि बिहार में मुख्यमंत्री के रुप में नीतीश कुमार ने बहुत मेहनत की थी और जनता से वे अपनी मेहनत की मजदूरी मांग रहे थे। वह मजदूरी उन्हें नहीं मिली।

  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार नीतीश जैसे ईमानदार, मेहनती, कल्पनाशील व संवेदनशील नेता के इस्तीफे के पीछे यह पीड़ा साफ झलकती है। 

(इस लेख का संपादित अंश 19 मई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)

रविवार, 13 जुलाई 2014

मीडिया ने पिछड़ा उभार को सकारात्मक नजरिये से नहीं देखा

(प्रभात खबर, पटना में 7 अप्रैल 2001 को प्रकाशित)


 पत्रकार सुरेंद्र किशोर से प्रभात खबर के लिए 
अनीश अंकुर और अविनाश की बातचीत 

प्रश्न-पिछले दस वर्षों के दौरान पिछड़ा उभार या सशक्तीकरण का बिहार के समाज पर जो असर पड़ा, मीडिया ने उसको किस रूप में रेखांकित किया ?

उत्तर- कुछ अपवादों को छोड़कर मीडिया ने पिछड़ा उभार या सशक्तीकरण को सकारात्मक नजरिए से नहीं देखा। इसके कई कारण हैं। इस सवाल का जवाब मीडिया के लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी ढूंढ़ा जा सकता है। पिछड़ा उभार और सशक्तीकरण के आंदोलन के नेतागण भी इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। सवर्ण बहुल मीडिया से यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि वह सशक्तीकरण के नाम पर पिछड़ों के बीच की कुछ खास जातियों को उन्मादी और नव सवर्ण रूप में स्वीकार कर ले। सशक्तीकरण को व्यापक और समरूप बनाने की जरूरत है। दूसरी ओर मीडिया की सामाजिक बुनावट में यदि परिवर्तन नहीं हुआ, तो खुद मीडिया के सामने विश्वास का संकट और भी गहराएगा। 

प्रश्न - लोग कहते हैं कि पिछड़े वर्गों के सशक्तीकरण ने बिहार के आर्थिक विकास की अवस्था को पीछे धकेलने का काम किया। इसकी क्या वजह हो सकती है?

उत्तर - इसके लिए सशक्तीकरण के नेता जिम्मेवार हैं। सशक्तीकरण से पहले भी बिहार विकास के मामले में पीछे ही जा रहा था। पर पिछले दस वर्षों से सत्ता जिसके हाथों में रही, उन्हें जातिवाद, भ्रष्टाचार व अराजकता के बदले विकास को अपना मूलमं़ बनाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। इस कारण एक तरह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुंडा गिरोह बड़े पैमाने परपनपे और दूसरी ओर नक्सली।

प्रश्न - हिंदी प्रदेशों में वामपंथ का सबसे मजबूत गढ़ बिहार माना जाता रहा है। पर आज उसमें एक ठहराव-सा दिखता है। बिहार में ही वामपंथ के ज्यादा आगे बढ़ने के क्या कारण रहे तथा आज जो ठहराव व गतिरोध की स्थिति है उसे कैसे तोड़ा जा सकता है?

उत्तर- बिहार एक अद्र्धसामंती समाज है। वामपंथियों के गढ़ बंगाल से यह सटा हुआ प्रदेश है। बिहार में पहले से ही राजनीतिक जागरूकता अधिक रही है। इस तरह के कारणों से वामपंथी दल यहां मजबूत हुए। पर, यहां भी वामपंथी नेताओं ने कार्यकर्ताओं व समर्थकों को छला। पहले के नेता अपने निजी जीवन की सादगी व निष्ठा के जरिए युवकों व छात्रों को प्रेरित व प्रभावित करते थे। अब वैसी बात नहीं है। कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट पार्टियों के उत्तराधिकारी संगठनों के कार्यकर्ता आज आम तौर पर अभिकर्ता (ठेकेदार) बन चुके हैं। अपवादों की बात अलग है। इस गतिरोध को कैसे तोड़ा जाए, इस सवाल का जवाब आसान नहीं है।

प्रश्न- बिहार में लोहिया के तमाम लोहार आज त्रिशूल बना रहे हैं। किसी भद्र पुरुष के इस कथन को आप किस तरह देखेंगे?

उत्तर - लगता है कि लोहियावाद अब किताबों में सिमट कर रह गया है। किशन पटनायक जैसे थोड़े से लोग उसे जहां-तहां चला रहे हैं। बिहार के संदर्भ में देखें तो आज के अधिकतर नेता अपने-अपने कबीले के सरदार जैसे लगते है। कोई यादवों का नेता है, तो कोई कुर्मियों का। कोई कोइरी का नेता है, तो कोई राजपूतों का। कोई पासवान नेता है, तो कोई चमार नेता है। ऐसा कहे जाने पर  भी उन्हें कोई असुविधा नहीं होती। पूरे समाज का कोई नेता नहीं नजर आता। इन ‘कबीलाई सरदारों’ के रहन-सहन, हाव भाव और क्रियाकलाप मध्ययुगीन राजाओं से मिलते-जुलते हैं। पिछड़े नेताओं ने सामाजिक न्याय का उसी तरह कचूमर निकाला, जिस तरह कांग्रेसियों ने गांधीवाद का।

प्रश्न - बिहार हिंदुस्तान भर में जातीय हिंसा से सर्वाधिक त्रस्त राज्यों में रहा है। बिहार के साथ जातिवाद जैसे समानार्थक हो गया है। आप क्या कहते हैं?

उत्तर- सवाल है कि जातिवाद को मापने का क्या पैमाना बने। बिहार बदनाम अधिक है। दूसरी जगहों में जातिवाद ज्यादा या इतना ही रहा है। दरअसल जातिवाद की जकड़न को तोड़ने के लिए बिहार में अधिक कोशिशें हुई हैं। उसका शोर अधिक हुआ। इसलिए कि जकड़न टूटी। जिन लोगों को जकड़न टूटने से नुकसान हुआ, उन्होंने जातिवाद का शोर अधिक मचाया। आज सन 1950-60 की तरह सत्ता सिर्फ दो सवर्ण जातियों के हाथों में नहीं है। पर बंगाल में सत्ता अब भी दो सवर्ण जातियों के हाथों में है। यदि वहां भी इस लाइन पर आंदोलन हुआ होता, तो वहां भी जातिवाद को शोर मचा होता। 

     यह भी आरोप लगाया जाता है कि केंद्र की 1952-57 की सरकार जितनी जातिवादी थी, उतनी जातिवादी लालू-मुलायम की सरकारें भी नहीं रही हैं। आंकड़े तो यही बताते हैं। मेरिट केक नाम पर एक खास जाति के लोगों को बड़ी संख्या में पद दिये गये। इन कथित मेरिट वालों ने आजादी के बाद देश को ऐसे चलाया कि हम भारी विदेशी कर्जे में डूब गये। आज हमें उन कर्जों के सिर्फ सूद के रूप में हर साल करीब एक लाख करोड़ रुपये देने पड़ते हैं।

प्रश्न-बिल्कुल इधर ‘गांव बचाओ देश बचाओ’ रैली में लालू यादव ने कहा कि अब बैकवर्ड-फारवर्ड की लड़ाई मैं बंद करता हूं। पहले देश बचाना जरूरी है। जब देश बचेगा, तो लड़ाई फिर कभी हो जाएगी। लालू यादव में इस परिवर्तन के राजनीतिक अर्थ क्या हो सकते हैं?

उत्तर - लालू यादव पहले भी यह बात कह चुके हैं। जब-जब वे राजनीतिक जरूरत महसूस करते हैं, ऐसी बातें कहते हैं। यदि लालू यादव इस समस्या के प्रति गंभीर होते तो वे पहले पता लगाते कि ऐसी नौबत क्यों आई कि देश एक बार फिर आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहा है। इस समस्या को विकट बनाने में खुद उनकी बिहार सरकार का पिछले दस साल में कितना बड़ा योगदान रहा है? फिर उस कमी को दूर करने की वे कोशिश करते तो गांव बचाने में मदद मिलती।

रैली में करोड़ों रुपये फूंक देने से तो देश और जल्दी गुलाम होगा! सब जानते हैं कि ऐसी रैलियों के लिए पैसे कहां से आते हैं।

मान लीजिए कि बिहार सरकार ने विश्व बैंक से भारी कर्ज लेकर राज्य में बड़ी निर्माण योजानाएं शुरू कीं। ंयोजना के पैसों की बंदरबांट कर ली गई। योजना से कोई रिटर्न नहंीं आया। कर्ज और सूद बढ़ता गया। सरकार महाजन के पैसे वापस करने की स्थिति में नहीं है। अब सरकार को महाजन के निर्देश पर काम करना पड़ेगा। उसी तरह के महाजनों के दबाव पर इस देश की केंद्रीय सरकार उदारीकरण के खिलाफ देश बचाओ गांव बचाओ रैली की जा रही है। क्या लालू यादव ने यह पता लगाया कि विदेशी कर्जे से शुरू हुई कितनी विकास योजनाएं बिहार के प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढ़ गयी?

भ्रष्टाचारियों पर कौन सी कार्रवाई हुई? किसी ने ठीक ही कहा है कि भ्रष्ट सरकार अपने देश की स्वतंत्रता कायम नहीं रख सकती।

प्रश्न- पचास साल बाद बिहार की तस्वीर आपको कैसी नजर आती है ?

उत्तर-विभिन्न क्षेत्रों में पूरे देश में गिरावट की जो रफ्तार है, उसके अनुसार तो अगले दस साल में ही पूरे देश की हालत गड़बड़ होने वाली है। भूमंडलीकरण व उदारीकरण के दुष्परिणाम सामने आने लगेंगे तो आशावादी लोगों के होश उड़ जाएंगे। मैं तो निराशावादी बन गया हूंं। पानी की कमी व पर्यावरण असंतुलन की जो भीषण समस्या अगले दस पंद्रह साल में ही जो सामने आने वाली है, उसकी कल्पना करके डर लगता है। इस बीच केंद्र सरकार देश में एक सवा लाख करोड़ रुपये खर्च करके सुपर हाईवे बनवा रही है जबकि तत्काल लाखों तालाब बनवाने की जरूरत है। ताकि भूमिगत जल का स्तर और नीचे नहीं जाए।

वर्षा का पानी तालाबों में इकट्ठा होता है। अटल बिहारी वाजपेयी शाहजहां की तरह ताजमहल बनवा रहे हैं जबकि उन्हें शेरशाह की तरह सड़क बनवा कर वृक्ष लगवाने चाहिए थे। आज तालाबों की उतनी ही जरुरत है जितनी शेरशाह के जमाने में सड़क की थी।

प्रश्न-बिहार में इन दिनों हो रही पत्रकारिता का विश्लेषण आप कैसे करेंगे? पिछले दशक में बिहार की पत्रकारिता में किन लोगों के योगदान को आप महत्वपूर्ण मानते हैं?

उत्तर-अखबार जनता के कुछ अधिक करीब गये हैं। पिछले दशक में कई पत्रकारों ने अच्छा काम किया है। खासकर बिहार के अनेकानेक घोटालों की खबरें पूरी की पूरी जनता तक गई हैं।

पत्रकारिता में सुधार की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है। पर्यावरण, जल प्रबंधन और उदारीकरण के खतरों की ओर बहुत कम अखबार ध्यान दे रहे हैं। इन दिनों अखबारों में व्याकरण गलतियों में भारी वृद्धि हुई है। अधिक पन्ने, चिकने कागज और रंगीन छपाई पर तो ध्यान दिया जा रहा है, पर इस बात पर गौर नहीं किया जा रहा है कि छात्रों की भाषा बिगड़ती जा रही है। पहले अंग्रेजी और हिंदी अखबारों से भी छात्र भाषा सीखते थे।

          --अनीश अंकुर एवं विनाश। 
(प्रभात खबर, पटना में 7 अप्रैल 2001 को प्रकाशित)

बुधवार, 7 मई 2014

चुनाव में मनी पावर यानी एक नया वोट बैंक

चुनावों में ‘मनी पावर’ एक नये ढंग के वोट बैंक के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह तत्व भी मतदान को एक हद तक प्रभावित करने लगा है।
 जिन चुनाव क्षेत्रों में थोड़े मतों से हार-जीत का फैसला होता है, वहां मनी पावर निर्णायक साबित होता दिख रहा है।

 यह मनी पावर यानी नया वोट बैंक, परंपरागत जातीय व सांपद्रायिक वोट बैंक को जहां -तहां काफी ताकत पहुंचा रहा है। तीनों तत्व मिलकर कहीं -कहीं निर्णायक साबित हो रहे हैं।

 मिल रही सूचनाओं के अनुसार मनी पावर अभी किसी जातीय वोट बैंक से अधिक ताकतवर नहीं बना है, पर यह उस रास्ते पर जरूर है।

   मौजूदा चुनाव में आयकर दस्तों ने देश भर में 273 करोड़ रुपये नकदी और करीब दो करोड़ लीटर शराब जब्त की है। यह आंकड़ा गत एक मई तक का है। बिहार सहित देश भर में ऐसी जब्तियां अब भी जारी हैं। जब्तियों की यह मात्रा अभूतपूर्व है।

  जितने पैसे व शराब पकड़े गये हैं, वे उन अपार धन व सामग्री के बहुत छोटा हिस्सा हंै जो पकड़े नहीं जा सके। वे मतदाताओं के एक हिस्से के बीच वितरित कर दिये गये।

 एक ताजा अध्ययन के अनुसार देश के नेतागण इस पूरे चुनाव में कुल करीब तीस हजार करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इनमें वैध व अवैध खर्च शामिल हैं।

   गत साल जून में भाजपा नेता गोपी नाथ मुंडे ने सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा के चुनाव में अपने क्षेत्र में 8 करोड़ रुपये खर्च किये थे।

 गत दिनों चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा ने एक रहस्योद्घाटन किया । श्री ब्रहमा ने कहा कि मैंने सुना है कि आंध्र प्रदेश के एक संभावित लोकसभा उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र में एक सौ करोड़ रुपये खर्च करने वाला है। एक अन्य उम्मीदवार ने व्यक्तिगत बातचीत में श्री ब्रह्मा को बताया था कि अपने चुनाव क्षेत्र में वह 35 करोड़ रुपये खर्च करने वाला है।

  इन आंकड़ों व सूचनाओं को देखकर क्या ऐसा नहीं ंलगता कि ‘मनी पावर’ एक नया वोट बैंक बनता जा रहा है। वह  जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक से कम खतरनाक नहीं है !

  यह संयोग नहीं है कि इस देश की संसद व विधायिकाओं में करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

 चुनाव आयोग की कड़ाई के कारण चुनाव में बाहुबल का इस्तेमाल पहले की अपेक्षा थोड़ा कम हुआ है। पर, कई क्षेत्रों में मनी पावर, अब बाहुबल का विकल्प बन कर उभरा है।

  बूथ कैप्चर की जगह भारी पैसे के बल पर मतदाताओं के एक हिस्से को अपने प्रभाव में लाया जा रहा है। मतदाताओं का जो हिस्सा पैसे स्वीकार कर रहा है,उनमें से अधिकतर लोगों के दिलों -दिमाग में यह भाव उभर रहा है कि जब सत्ता में आने के बाद किसी भी दल को आम जन की भलाई के लिए काम नहीं ही करना है, खुद की भलाई के लिए ही बहुत करना है, तो क्यों नहींं आज जो कुछ उनसे मिल रहा है, उसे ही स्वीकार करके संतोष कर लिया जाए।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार वैसे मतदाता इस बात की परवाह नहीं कर रहे हैं कि पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले नेतागण  और भी कितना अधिक निर्भीक होकर इस देश को लूटंेगे।

 हालांकि यह बात भी सही है कि इसी देश में  कुछ दल व नेता ऐसे भी हैं जो चुनावों में मनी पावर के खेल में शामिल नहीं हैं।  


(साभार -दैनिक भास्कर ,पटना संस्करण- 6 मई 2014)

होली की गालियां या गब्बर सिंह के डायलाॅग ?


गत बिहार विधानसभा चुनाव में भी प्रतिस्पर्धी नेताओेंं के बीच तीखे आरोपों -प्रत्यारोपों के दौर चले थे। तब एक बड़े नेता ने कहा था कि चुनाव के दौरान की गई आलोचनाएं होली की गालियां जैसी होती हैं। उन गालियों को होली बीतने के बाद भुला दिया जाता है।

   पर क्या इस बार की तीखी व अभूतपूर्व गालियां भी होलियाना ही हैं ? ऐसा तो नहीं लगता। इन गालियों व तीखे संवादों के सामने तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके हो गये हैं।

क्या नेताओं के जहर बुझे बयानों से लगे घाव चुनाव के बाद भी जल्दी भर पाएंगे ? उम्मीद की जानी चाहिए कि वे घाव जल्द ही भर जाएं और तनावमुक्त ढंग से लोकतंत्र की गाड़ी फिर से चलने लगे।

   पर, ऐसा होने मेंे  कई लोगों को अभी संदेह है। उनका मानना है कि इसका असर चुनाव के बाद भी कुछ दिनों तक रहेगा। कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि क्यों चुनाव आयोग  कसूर के अनुपात में तौलकर उन नेताओं को  सजा नहीं दे रहा है जो नेतागण खुलेआम चुनाव आचार संहिता का घोर उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही जो वोट के लिए समाज में विद्वेष फैलाने के साथ- साथ लोकतंत्र की गरिमा भी गिरा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि आचार संहिता के सवाल पर एक -दो चुनाव क्षेत्रों के चुनाव स्थगित कर दिए गए होते तो बेलगाम नेताओं की बोलती बंद हो गई होती।

   चुनाव के कुछ फेज अब भी बाकी हैं। अब यह मतदाताओंं पर ही निर्भर है कि एक दूसरे के खिलाफ बयानों के ऐसे जहर बुझे तीर चलाने वालों को वे वोट देंगे या नहीं। क्या मतदातागण ऐसे ही लोगों के हाथों संसदीय जनतंत्र की कमान सौंपेंगे जिनकी जुबान इतनी बेलगाम व जहरीली हैं ? जो वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं उभार सकते हैं ? जो किसी की भी प्रतिष्ठा का ख्याल रखे बिना किसी भी तरह के अपुष्ट व उल्टे सीधे आरोप लगा सकते हैं ?

  इतने गंदे, अश्लील, दिलों को भेदने वाले तथा समाज में द्वेष फैलाने वाले आरोप-प्रत्यारोप इससे पहले किसी चुनाव में नहीं लगाये गये थे। जब जुबान पर हिंसा हो तो सरजमीन पर भी उसका असर देखा ही जा सकता है। चुनाव से संबंधित हिंसक घटनाओं की खबरें आने भी लगी हैं।

  इसके साथ ही जितनी अधिक मात्रा में काला धन का इस्तेमाल मौजूदा चुनाव में हो रहा है,उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

  लगातार पकड़े जा रहे भारी मात्रा में काला धन से इस बात की पुष्टि होती है। याद रहे कि जुबान ही नहीं बल्कि काला धन भी मतदाताओं के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं। इस देश के लोकतंत्र में तेजी से घर कर रही इन गंभीर बीमारियों का इलाज सिर्फ मतदाताओं के पास है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि नफरत व चुनावी गंदगी फैलाने वाले नेताओं को इस चुनाव में नकार दें।

   अन्यथा जहर उगलने वाले नेतागण अपने राजनीतिक लाभ के लिए आने वाली पीढि़यों के दिलो -दिमाग में भी जहर ही घोलेंगे।   

अब जरा कुछ नेताओं की बदजुबानियों के कुछ नमूने पढि़ए।

 एक नेता ने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता के बारे में कहा कि वह घमंडी और लुटेरा है। दूसरे ने कहा  कि वह कसाई है। तीसरे की टिप्पणी थी कि उसे देख कर तो कसाई भी शर्मा जाते हैं।

  जब तक वे एक दूसरे को पप्पू और फेंकू कह रहे थे, तब तक वह सहनीय था। क्योंकि उसमें मनोरंजन का भी पुट था। पर अब तो आरोप-प्रत्यारोपों में खांटी दुश्मनी के भाव दिख रहे हैं। जीजाजी शब्द के उच्चारण से राजनीति की गरिमा गिरी। नपुंसक व गुंडे शब्द ने लोकतंत्र को शर्मा दिया। इनके अलावा भी कुछ ऐसे डायलाॅग बोले गये जिन्हें सुन कर गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके लगने लगे।

वैसे अभी चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अब भी न जाने कितने विषैले तीर हमारे नेताओं के पास बचे हुए हैं। हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे नेता ऐसे ही हैं। इस तनावपूर्ण चुनाव में भी कुछ नेताओं की जुबान पर अब भी शालीनता विराजमान है।


(30 अप्रैल 2014 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)       

गुरुवार, 1 मई 2014

विचारों की बेतरतीबपना से जूझती ‘आप’


आम आदमी पार्टी में वैचारिक संतुलन बिगाड़ने के लिए क्या प्रशांत भूषण कम थे जो शाजिया इल्मी ने भी मोर्चा संभाल लिया? दरअसल यह ‘आप’ में फैली वैचारिक बेतरतीबपना की निशानी है। यह समय-समय पर प्रकट होती रहती है। कुछ लोग इसे वैचारिक अराजकता भी कह रहे हैं।

  इससे देश भर में फैले ‘आप’ के अनेक प्रशंसक निराश हो रहे हैं। यदि यह सब जारी रहा तो वे हताश हो सकते हैं। इससे उन लोगों को वास्तव में निराशा हुई है जो उम्मीद कर रहे हैं कि ‘आप’ एक न एक दिन भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले देश में ‘वैकल्पिक राजनीति’ पेश करेगी।

  पर वैकल्पिक राजनीति पेश करने का काम वह संतुलित विचारों के जरिए ही कर सकती है। ‘आप’ के अधिकतर नेताओं में अच्छी मंशा, त्याग व व्यक्तिगत ईमानदारी की पूंजी पहले से है। इसलिए भी उनमें संभावना है। बल्कि अन्य दलों की अपेक्षा संभावना अधिक है।

   भाजपा पर एक रंग की सांप्रदायिकता को हवा देने का आरोप है तो कांग्रेस पर दूसरे रंग की सांप्रदायिकता को बढ़ाने का आरोप है।
कई लोग इस स्थिति से ऊब रहे हैं।   


जनता का कुशासन और भ्रष्टाचार विरोधी मूड

 आवेश से भरे इस चुनावी माहौल में जनता का कुशासन और भ्रष्टाचार विरोधी मूड साफ देखा जा सकता है। तरह -तरह के सांप्रदायिक तत्वों को सत्ता व राजनीति के शीर्ष से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना भी कुशासन का ही तो हिस्सा है।

  जनता के मूड को देख कर नरेंद्र मोदी को भी यह कहना पड़ रहा है कि सत्ता मिलने के बाद वे भारत के संविधान के अनुसार ही देश को चलाएंगे। गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के जहरीले बयानों की ओर इशारा करते हुए मोदी कहते हैं कि हमारे शुभचिंतक संकीर्ण बयानों से परहेज करें। पर दूसरी ओर गाजियाबाद में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार शाजिया इल्मी मुसलमानों से अपील कर रही हैं कि उन्हें अधिक धर्मनिरपेक्ष बनने की जरूरत नहीं है। वे थोड़ा सांप्रदायिक होकर वोट करें। विरोध होने पर शाजिया अपने इस विवादास्पद बयान पर माफी मांगने को भी तैयार नहीं हैं।

  अपने बयान पर सफाई में शाजिया ने जो कुछ कहा है, वह भी अनेक लोगों की नजरों में उन्हें क्लीन चीट नहीं देता। शाजिया के ऐसे बयान से सिर्फ भाजपा के बीच के अतिवादी तत्वों को ही राजनीतिक फायदा मिलेगा। जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार अब भी दिल्ली में भाजपा की मुख्य विरोधी पार्टी ‘आप’ ही नजर आती है। वाराणसी में भी मुख्य मुकाबले में मोदी और केजरीवाल ही अभी बताये जा रहे हैं।

 वाराणसी में भी भाजपा को शाजिया के बयान से बल मिल सकता है। क्योंकि एक रंग की सांप्रदायिकता दूसरे रंग की सांप्रदायिकता की खुराक पर पलती है।

  वहां कुछ निष्पक्ष लोग यह पूछ सकते हैं कि क्या उन्हें ऐसे दलों के बीच से ही चुनाव करना होगा जिन दलों में गिरिराज सिंह और शाजिया इल्मी जैसे नेता मौजूद हैं ?

याद रहे कि न तो शाजिया को ‘आप’ ने दल से निलंबित किया है और न ही भाजपा ने गिरिराज के खिलाफ कोई कार्रवाई की है।      

  शाजिया इल्मी एक ऐसी पार्टी की प्रमुख नेता हैं जो पार्टी देश के संविधान और कानून की दुहाई देती रही है। भारतीय संविधान हमें पंथनिरपेक्ष बने रहने की सीख देता है। आप नेता मनीष सिसोदिया ने शाजिया के बयान पर कहा है कि ‘हम सांप्रदायिक राजनीति में विश्वास नहीं करते। बल्कि हम भारत और सभी भारतीयों को एक करने में विश्वास करते हैं।’

पर, ‘आप’ की ओर से इतना ही कहा जाना काफी नहीं है।

    अनेक निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कसूर को देखते हुए गिरिराज और शाजिया पर क्रमशः भाजपा व आप का रुख काफी नरम ही माना जा रहा है। ऐसे नरम रुख से बाद में इन दलों के कुछ अन्य अतिवादियोें की ओर से भी कुछ इस तरह के बयान आ सकते हैं।


अरविंद केजरीवाल ने बरती सावधानी

    हालांकि इससे पहले मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल ने बाटला हाउस एनकाउंटर की फिर से जांच कराने की मांग ठुकरा कर यह दिखा दिया था कि उनकी राजनीति एक तरफा नहीं है।

हाल में वाराणसी में मुख्तार अंसारी के समर्थन के सवाल पर भी केजरीवाल ने सावधानी बरती।

याद रहे कि विवादास्पद अंसारी के चुनाव मैदान से हट जाने के बाद वाराणसी में एक जाली चिट्ठी बंटी। वह चिट्ठी ‘आप’ की तरफ से अंसारी को लिखी बताई गई थी। उसमें लिखा गया था कि मुख्तार अंसारी के चुनाव मैदान से हट जाने के लिए आम आदमी पार्टी अंसारी का धन्यवाद देती है। अरविंद ने इसे जाली बताया। 

   आश्चर्य है कि जिस दल में योगेंद्र यादव और प्रो. आनंद कुमार जैसे समाजवादी विचारक हैं, उस दल के कुछ हलकों में एक तरफा बातें की जा रही हैं। तथा कुछ अन्य तरह की वैचारिक तथा अन्य तरह की अराजकता भी देखी जा रही है। दरअसल समाजवादी लोग दोनों रंगों की सांप्रदायिकताओं के खिलाफ रहे हैं।


प्रशांत भूषण का कश्मीर पर बयान

   इससे पहले अरविंद केजरीवाल प्रशांत भूषण के उस बयान से अपनी असहमति जाहिर कर चुके हैं जिसमें भूषण ने कश्मीर में जनसंग्रह की बात कही थी। हालांकि प्रशांत ने बाद में अपने बयान पर सफाई दी थी। पर उनकी सफाई भी कश्मीर में भारतीय सेना के रुख से मेल नहीं खाता। इसलिए प्रशांत के बयान व सफाई से आप की एक खास तरह की छवि बन रही है।

   यदि यही सब जारी रहा तो आप का कोई अन्य नेता कल बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के पक्ष में बयान दे सकता है जो उतना ही बुरा होगा।



(हिंदी दैनिक जनसत्ता के 24 अप्रैल 2014 के अंक में इस लेख का संपादित अंश प्रकाशित)
  
   

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

जनता के कठघरे में सांप्रदायिकता बनाम शासनहीनता

क्या राष्ट्रीय स्तर पर दुहराएगा 2005 का बिहार ?


  सांप्रदायिकता को भष्टाचार और शासनहीनता से अधिक खतरनाक मानने वाले दलों को 2005 में बिहार में चुनावी मात मिली थी। क्या वही चुनावी कथा इस बार राष्ट्रीय स्तर पर भी दुहराएगी जाएगी? पता नहीं कि अंततः क्या होगा। क्योंकि देश बड़ा है और चुनावों में एक साथ कई फैक्टर काम करते रहते हैं। अधिकतर क्षेत्रों में मतदान होने भी अभी बाकी हैं।

 फिर भी मतदाताओं के जो प्रारंभिक किंतु अपुष्ट रुझान मिले हैं, उनसे लगता है कि अधिकतर मतदाताओं के समक्ष  सांप्रदायिकता की अपेक्षा भ्रष्टाचार व महंगाई के दानव बहुत बड़ी समस्या बन कर उपस्थित हुआ है। अनिर्णय, अशासन व कुशासन ने इन समस्याओं को बढ़ाया है। बिहार में भी यही हुआ था।

   बिहार में 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही जनता के सामने भ्रष्टाचार, अविकास, शासनहीनता व जंगल राज की समस्याएं बड़ी तीव्रता से उठ खड़ी हुई थीं।

राज्य में 1990 से 1997 तक लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे। 1997 से 2005 तक राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। सन 2000 से 2005 तक तो बिहार में राजद और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार थी।

  कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी इस बीच लगातार बिहार सरकार का बचाव करती रहीं। इन दलों ने तब कहा कि वे सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए लालू-राबड़ी की सरकार का साथ दे रही हैं। इसके विपरीत अधिकतर जनता के लिए सांप्रदायिकता की समस्या की अपेक्षा भ्रष्टाचार, जंगल राज और अविकास की समस्याएं काफी बड़ी समस्याएं थीं।

  1996 में समता पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने भी यह बात समझ ली थी। इसीलिए उन्होंने तब भाजपा से हाथ मिला लिया।

  नतीजतन 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गई। एकतरफा व ढोंगी धर्म निरपेक्षता की माला जपने वाली पार्टियां हाशिए पर चली गईं। नीतीश सरकार में भाजपा की मजबूत उपस्थिति रही। हालांकि भाजपा नीतीश कुमार के दबंग व्यक्तित्व के कारण बिहार में हिन्दुत्व का एजेंडा नहीं चला सकी। यहां तक कि वह पूर्वोत्तर बिहार में बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या भी भूल गई जिसको लेकर ए.बी.वी.पी. अक्सर आंदोलन करता रहता था।

 सत्ता में आने के बाद नीतीश सरकार ने भागलपुर सांप्रदायिक दंगे में शामिल दोनों पक्षों के आरोपियों को अदालतों से सजाएं दिलवाई। इसके लिए बंद करा दिये गये मुकदमों को भी फिर से खुलवाया गया था। इस कदम से दोनों समुदाओं में से किसी ने भी यह महसूस नहीं किया कि  शासन किसी के साथ पक्षपात कर रहा है। याद रहे कि इस मामले में बिहार सरकार ने वैसी एकतरफा कार्रवाई नहीं की जैसी कार्रवाई हाल के मुजफ्फरनगर दंगे के सिलसिले में करने का आरोप अखिलेश सरकार पर लगा।

   याद रहे कि इस काम में भाजपा ने नीतीश सरकार का विरोध नहीं किया। भागलपुर दंगे के एक आरोपी व एक हिन्दू संगठन से जुड़े कामेश्वर यादव के खिलाफ भी बंद केस को फिर से खुलवा कर शासन ने उसे अदालत से सजा दिलवाई। इसका भी भाजपा ने विरोध नहीं किया।

  ऐसा करके नीतीश कुमार अपने नेता डा. राम मनोहर लोहिया का ही अनुसरण कर रहे थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों का समान रुप से विरोध किया था।

   1967 के आम चुनाव से ठीक पहले डा. लोहिया ने सार्वजनिक रुप से यह कह दिया था कि वे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के पक्षधर हैं। याद रहे कि भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले अनुच्छेद में यह लिखा हुआ है कि शासन देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।

  पर डा. लोहिया के इस बयान का अल्पसंख्यकों के एक बड़े हिस्से ने कड़ा विरोध कर दिया।

  खुद डा. लोहिया के दल के कुछ बड़े नेताओं ने लोहिया से कहा  कि चुनाव सिर पर है और आपने ऐसा बयान दे दिया। अब तो आप चुनाव हार जाएंगे।

 डा. लोहिया ने जवाब दिया कि मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति में नहीं हूं। बल्कि देश की बेहतरी के लिए राजनीति में हूं। इस विवाद के कारण 1967 में डा. लोहिया मुश्किल से मात्र लगभग चार सौ मतों से ही लोकसभा चुनाव जीत सके थे।

  याद रहे कि लोहिया यह भी कहा करते थे कि इस देश में जब -जब कट्टर हिन्दुत्व हावी रहा है तब -तब देश कमजोर हुआ है। पर इसके विपरीत स्थिति होने पर देश का भला हुआ है। पर आज के कितने नेतागण सांप्रदायिक समस्या पर इस तरह सम्यक व संतुलित रूप से सोचते हैं ?

  पर, बिहार में सन 2009 के लोकसभा चुनाव व 2005 और 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों के विश्लेषण से यह साफ लगता है कि आम जनता में से अधिकतर लोग उन नेताओं व दलों को ंपसंद नहीं करते हैं जो सांप्रदायिक समस्या का एकतरफा हौवा खड़ा करते रहते हैं।

  जनता के चुनावी फैसलों से यह नतीजा निकलता है कि वह दोनों तरह की कट्टरताओं को नापसंद करती है। ताजा लोकसभा चुनाव मंे हो रहे मतदान के ताजा रुझान भी कमोवेश यही संकेत दे रहे हैं। इसके बावजूद दोनों पक्षों के अतिवादी नेताओं के उत्तेजक व एकतरफा बयान आने  थम नहीं रहे हैं। यदि यह सब जारी रहा तो इसका असर आगे के मतदानों पर भी पड़ सकता है।

  बिहार के चुनाव नतीजों व ताजा लोकसभा चुनाव के मतदान के आरंभिक रुझानों से एक साफ संदेश मिलता है। पर क्या नेता व बुद्धिजीवी लोग संकेत ग्रहण करना चाहेंगे ?

  यदि वे कथित सांप्रदायिक दलों को सत्ता में आने से सचमुच रोकना चाहते हैं तो वे कुछ कथित सेक्युलर दलों से भी यह अपील करें कि वे अपने दल व सरकार में जारी भ्रष्टाचार, अपराध, वंशवाद और जातिवाद पर काबू पाएं।

 दरअसल संविधान व कानून का पालन करने वाली भ्रष्टाचारमुक्त व अपराधमुक्त पार्टी व निर्मल शासन-व्यवस्था ही सभी रंगों के सांप्रदायिक तत्वों से भी कारगर तरीके लड़कर उन्हें पराजित  सकती है। याद रहे कि भ्रष्टाचार से महंगाई बढ़ती है। महंगाई  जाति और संप्रदाय के स्तर पर कोई भेदभाव नहीं करती।

( इस लेख का संपादित अंश 12 अप्रैल, 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)
     
 

बुधवार, 26 मार्च 2014

खुशवंत के जीवन में एक अफसोस और एक कुख्याति

खुशवंत सिंह को इस बात का अफसोस रहा कि ‘मैंने जीवन का बहुत सा हिस्सा वकालत और राजनयिक सेवा जैसी व्यर्थ की नौकरी में गंवा डाला। काश ! मेरा वह समय भी लिखने में लगा होता।’

  याद रहे कि 1939 से 1947 तक उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट में वकालत की। वकालत चल नहीं रही थी। बैठे -बैठे मक्खियां मारने की नौबत थी।

1947 में विदेश मंत्रालय की नौकरी कर ली। लंदन में भारतीय उच्चायोग में सूचना अधिकारी बन गये। पर तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन से तालमेल नहीं बना पाने के कारण खुशवंत का ओटावा तबादला कर दिया गया। 

   एक साक्षात्कार में उन्होंने लेखिका उषा महाजन को 1997 में एक और बात बताई थी, ‘लोग मुझे नाहक शराबी, कबाबी और व्यभिचारी समझते हैं जबकि मैं ऐसा नहीं हूं। इस नाहक कुख्याति का भी उन्हें अफसोस रहा। पर उन्होंने यह स्वीकारा कि मानता हूं कि अपनी इस कुख्याति के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार हूं।

उन्होंने कहा ः दरअसल मेरी यह छवि बंबई में इलेस्ट्रेटेड वीकली के संपादन के दौरान बीते नौ वर्षों की देन है। वहांं मैंने सेक्स जैसे प्रतिबंधित विषयों पर लिखने की शुरुआत की और लड़कियों की अर्धनग्न तस्वीरें छापीं। इससे पत्रिका की प्रसार संख्या 80 हजार से बढ़कर चार लाख से भी अधिक हो गई।ल ेकिन दुर्भाग्यवश इसके साथ ही एक ऐसी छवि भी अर्जित कर ली जो मेरी सही तस्वीर न होते हुए भी आज तक मुझसे चिपकी हुई है। मेरे परिवारवाले और मुझे करीब से जानने वाले जानते हैं कि मैं वैसा नहीं हूं।

मैं न तो शराबी हूं और न ही औरतों आशिक हूं। दिन भर पढ़ने -लिखने और लोगों से मिलने का इतना काम रहता है कि इन सब चीजों की फुर्सत ही नहीं मिल सकती।

सिर्फ शाम में मैं अपनी ड्रिंक के साथ रिलैक्स करता हूं। ज्यादा कभी नहीं पीता वरना दूसरे दिन काम कैसे करूंगा ? अपनी पूरी जिंदगी में मैंने एक बार भी शराब पीकर अपने होश नहीं खोये।

  खुशवंत सिंह ने जब भी किसी को कोई इंटरव्यू दिया, उन्होंने सच्ची बातें बता दीं। ऐसी बातें भी जिन्हें आम तौर पर लोग छिपा जाते हैं।

 हाल ही में दिल्ली की एक हिंदी पाक्षिक पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कहा था कि संजय गांधी के कहने पर मुझे एक अंग्रेजी दैनिक का संपादक बनाया गया था।

 उन्होंने यह भी स्वीकारा था कि उनकी नेहरु-इंदिरा परिवार से नहीं बल्कि सिर्फ संजय गांधी से घनिष्ठता थी। इंदिरा गांधी के कहने पर मुझे उस अखबार के संपादक पद से हटा दिया गया था।

इस साल के प्रारंभ में उनसे पूछा गया था कि इस उम्र में भी सक्रिय रहने का राज क्या है ? उन्होंने बताया कि मैं अपने जीवन में बहुत सख्त हूं। कम खाता हूं। मैं बहुत कम पीता हूं। ज्यादातर तरल लेता हूं। क्योंकि वह पचाने में आसान होता है।

 कई विधाओं में कलम चलाने वाले खुशवंत सिंह ने सिख इतिहास भी लिखा था जिसकी शुरू के दिनों में व्यापक चर्चा भी हुई।वे कथाकार थे। ट्रेन टू पाकिस्तान उनका चर्चित उपन्यास है जिस पर फिल्म भी बनी। अपनी पुस्तकों में से ‘दिल्ली’ को वे सर्वाधिक पसंद करते थे।

साहित्यिक पुरस्कारों के बारे में उन्होंने अपनी राय करीब डेढ़ दशक पहले ही बता दी थी। उन्होंने कहा था कि ‘जिनको अवार्ड मिलते हैं, वे अपने आप को वोट देकर अवार्ड ले लेते हैं। खुद को कैनवैस करके, लोगों के आगे -पीछे लग कर न जाने कितनी सेकेंड ग्रेड की किताबों को मिल जाते हैं पुरस्कार ! मैंने उनमें से एक भी किताब बाजार में नहीं देखी।

    ‘राज्यसभा की सदस्यता के बारे में उन्होंने कहा था कि राज्यसभा की सदस्यता ऐसे नहीं मिलती है। मांगनी पड़ती है। कैनवेसिंग करनी पड़ती है। इसके लिए बहुत तरफ से दबाव पड़ रहे होते हंै उन पर।’ उनसे पूछा गया था कि आपके मित्र इंदर कुमार गुजराल अब प्रधानमंत्री हैं। क्या आपको पुनः राज्यसभा की सदस्यता कर उम्मीद है ? खुशवंत सिंह 1980 से 1986 तक राज्यसभा के सदस्य थे।

 खुशवंत सिंह की याद आते ही एक और सवाल बरबस जेहन में कौंध जाता है। खुशवंत सिंह ने अधिक पुस्तकें लिखीं या उनके पिता सर सोभा सिंह और दादा सरदार सुजान सिंह ने अधिक बिल्डिंगें बनवार्इं ?

वे दिल्ली के सबसे बड़े ठेकेदार थे। सचिवालय का साउथ ब्लाॅक, इंडिया गेट, आकाशवाणी भवन, राष्ट्रीय संग्रहालय, बड़ौदा हाउस और सैकड़़ों सरकारी बंगले उन्होंने बनवाये।

  (जनसत्ता के 21 मार्च 2014 के अंक में प्रकाशित)