गुरुवार, 9 नवंबर 2017

पिछड़ों के ही हक में है सरकारी स्कूलों में सुधार


केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की यह सलाह  बिलकुल सही है कि जो शिक्षक पढ़ाने लायक नहीं हैं,उन्हें दूसरे कामों में लगाया जाना चाहिए।यह अच्छी बात है कि कुशवाहा ने किसी को बेरोजगार कर देने की सलाह नहीं दी। 
  कुशवाहा की यह बात भी सही है कि बिहार में शिक्षा की बदहाली 1980 से शुरू हुई।
 मेरी समझ से अब यह बिहार सरकार पर निर्भर करता है कि जो शिक्षक पढ़ाने लायक नहीं हैं,वह उनकी पहचान कैसे करती है।
 सही पहचान संभव है।थोड़ी निर्ममता दिखानी पड़ेगी।
अत्यंत कड़ाई से छोटे -छोटे समूहों में टेस्ट परीक्षा लेनी होगी।उस परीक्षा में जो  अयोग्य पाए जाएं उन लोगों को कहीं और तैनात करना पड़ेगा।अन्यथा, अगली पीढि़यां बर्बाद होती रहेंगी।
  छोटे समूहों में बारी -बारी से परीक्षा लेने से कदाचार की गुंजाइश नहीं रहेगी।
पटना के गांधी मैदान के पास पांच हजार लोगों के बैठने के लिए एक सभा भवन भी बन ही गया है।उसी में बैठा कर परीक्षा लीजिए। परीक्षा की निगरानी के लिए भरपूर पुलिस फोर्स के साथ ईमानदार आई.ए.एस. और आई.पी.एस.अफसरों को तैनात करा दीजिए।
 हर रविवार को राज्य के  पांच- पांच हजार शिक्षकों की बारीे -बारी से टेस्ट परीक्षा कराई जाए।
  उसमें जो पास करेगा ,वह सचमुच गुरू कहलाने लायक होगा।वैसे ही गुरूओं के पांव छात्र गण गोंविंद से पहले  छुएंगे। 
  दरअसल इस पिछड़ा बहुल प्रदेश बिहार में सरकारी स्कूलों पर आम तौर पिछड़े और गरीबों के बच्चे निर्भर हैं।अमीरोंं के लिए तो इस राज्य में भी नये -नये महंगे निजी स्कूल खुल ही रहे हैं।किसी भी जाति -समुदाय के अमीर अभिभावक तो दूसरे राज्यों में भेज कर अपने बाल-बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा ही रहे हैं।
 1990 से ही इस प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर  पिछड़े समुदाय के नेता ही हैं।आश्चर्य होता है कि इसके बावजूद सरकारी स्कूलों को सुधारने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हो रही है।अब भी देर नहीं हुई है। 
  

नाना जी ने रोकी थी जेपी पर चली लाठी


  जय प्रकाश नारायण  और नाना जी देशमुख की जयंती एक ही दिन पड़ती है।
यह एक संयोग है।पर इन दोनों नेताओं के बीच एक और खास ‘संबंध; भी है।
 4 नवंबर 1974 को पटना में सी.आर.पी.एफ. के एक जवान ने जेपी पर जो लाठी चलाई थी,उसे बीच में ही नाना जी ने अपनी बांह पर रोक लिया था।वह लाठी इतनी जोरदार चली थी कि नाना जी को अपनी बांह के इलाज के लिए कई दिनों तक पटना के अस्पताल में रहना पड़ा था ।
यानी वह लाठी बीच में ही नहीं रोक ली गयी होती तो जेपी के साथ उस दिन कुछ भी  हो सकता था।याद रहे कि उस दिन जेपी के नेतृत्व में  प्रदर्शन के लिए जुलूस आगे बढ़ रहा था कि बीच में ही सी.आर.पी.एफ.ने भीड़ पर निर्मम लाठी चार्ज कर दिया।जब पुलिस छात्रों -नौजवानों को बेरहमी से पीटने लगी तो जेपी ने आगे बढ़कर कहा कि बच्चों को क्यों मारते हो, मुझे मारो।
  पुलिस ने उन पर तथा उनके साथ आगे बढ़े नेताओं पर भी बेरहम प्रहार शुरू कर दिया।लाठी चार्ज मेें अनेक बड़े नेता भी घायल हुए जिनमें श्याम नंदन मिश्र,अली हैदर, लखन लाल कपूर और सर्वोदय नेता बाबू राव चंदावार भी शामिल थे।
 पर जेपी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका नाना जी देशमुख की थी। 
इसको लेकर नाना जी काफी चर्चा में आए।जेपी आंदोलन में शामिल कुछ दलों के कुछ बड़े राष्ट्रीय  नेता ईष्यालु हो गए।
उनमें से एक ने मुझसे पूछा था कि क्या यह सही है कि नाना जी ने अपने हाथ पर लाठी रोक ली थी  ? मैंने कहा कि उस खास स्थल पर तो मैं उस समय नहीं था क्योंकि  लाठी चार्ज शुरू होने के साथ ही काफी भगदड़ मच गयी।इसलिए मैं प्रत्यक्षदर्शी  नहीं था।पर विभिन्न प्रत्यक्षदर्शियों की बातंे सुनने और अस्पताल में नाना जी की बांह की हालत देखकर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं  कि बात सही है।  
  पटना मेडिकल काॅलेज  के राजेंद्र सर्जिकल वार्ड में घायल नानाजी को देखने के लिए न सिर्फ जय प्रकाश नारायण गये थे ,बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी भी दिल्ली से आए।
एक पत्रकार के रूप में मैं भी वहां यदाकदा  जाया करता था।अन्य अनेक आंदोलनकारी भी उस दिन लाठी चार्ज में घायल होकर उस अस्पताल में पड़े थे।उन दिनों मैं साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का बिहार संवाददाता था।
  संयोग से जिस दिन अटल जी आए थे तो मैं भी वहां था।
अटल जी ने खुद आमलेट बना कर नाना जी को खिलाया।
न सिर्फ नाना जी को बल्कि मेरे सहित वहां जो भी थे, सबके लिए अटल जी ने बारी -बारी से बनाया और खिलाया।
 याद रहे कि नाना जी ही थे जिन्होंने जनसंघ में तब के बड़े नेता बलराज मधोक को दरकिनार करके अटल जी को आगे किया।मधोक  जी थोड़ा अतिवादी थे,पर  अटल जी समन्वयवादी।
जनसंघ के संगठन मंत्री नाना जी को संभवतः यह लगता था कि इस देश में मधोक के बदले वाजपेयी ही चलेंगे।
  जेपी और नाना जी में एक और भी समानता रही।उन लोगों ने देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई,पर वे सत्ता में नहीं गए।             




बुधवार, 8 नवंबर 2017

 पूर्व प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा है कि जी.एस.टी. 
लागू करने से ‘कर आतंकवाद’ बढ़ा।उन्होंने यह भी कहा कि संगठित लूट थी नोटबंदी।
  उधर वित्त मंत्री अरूण जेटली का तर्क है कि लूट तो 2 -जी और कोल घोटाले थे।जेटली ने यह भी सवाल उठाया है   कि ‘टैक्स चोरी रोकने का सिस्टम आतंकवाद कैसे है ?
   इस साल के प्रारंभ में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव हुआ।
उसमें गैर राजग दलों ने नोटबंदी को बड़ा मुददा बनाया था।
पर मतदाताओं ने फिर भी भाजपा को सत्ता सौंप दी।
 अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधान सभा के चुनाव हो रहे हैं।इसमें गैर भाजपा दलों ने नोटबंदी के साथ जी.एस.टी.को भी बड़ा मुददा बनाया है।देखना है कि इन मुद्दों पर वहां मतदाताओं की क्या राय है !
  मेरा मानना है कि इस देश की अधिकतर जनता अधपढ़ और अनपढ़ जरूर है,पर वह अपवादों को छोड़कर हमेशा ही चुनावों में देशहित में सही निर्णय ही करती है।  

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

श्रीबाबू के टाइम से ही बिहार का प्रशासन खोने लगा था अपनी चमक



         

श्रीबाबू के टाइम से ही बिहार का प्रशासन खोने लगा था अपनी चमक  
         
आम धारणा के विपरीत बिहार के प्रशासन में 1957 से ही गिरावट शुरू हो गयी थी।हालांकि तब गिरावट की गति धीमी थी।
  वैसे आम धारणा यह है कि 1967 में जब राज्य में गैर कांग्रेसी सरकारों का दौर शुरू हुआ , तभी से गिरावट शुरू हुई।
  पर 1977-78 में बिहार के मुख्य सचिव रहे 
1951 बैच के आई.ए.एस. पी.एस.अप्पू ने अपने व्यक्तिगत अनुभवोंे के आधार पर लिखा है कि गिरावट की शुरूआत 1957 के आम चुनाव के बाद से  ही शुरू हो गयी थी।
  लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक रह चुके अप्पू हर दम संविधान और कानून के साथ खड़े रहने वाले अफसर थे। 1929 मेें जन्मे अप्पू का 2012 में निधन हो गया।
उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था।
अपने सेवाकाल में अपनी कठोर ईमानदारी के लिए चर्चित अप्पू साहब देश की अखिल भारतीय सेवाआंे में गिरावट,अवमूल्यन और विनाश पर करीब एक दशक पहले साप्ताहिक ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में लंबा लेख लिखा था।
 बिहार की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्ष में लोक प्रशासन के सुविख्यात विद्वान प्रो.पाॅल एपलबी 
राज्य की यात्रा पर आए थे।उन्होंने बिहार के प्रशासन को उसी रूप में पाया जैसा किसी संसदीय लोकतंत्र में होना चाहिए।
इसलिए उहोंने बिहार के प्रशासन को विश्व के सर्वोत्तम प्रशासनों मेें एक की संज्ञा दी । 
  खुद के अनुभवोें की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा कि 1953 में मेरी तैनाती तत्कालीन मुख्य मंत्री के जिले में हुई थी।तब कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि मुख्य मंत्री का जिला है।बहुत नाजुक पोस्टिंग है।मुख्य मंत्री के खास लोग आपको परेशान करेंगे।धमकी भी देंगे।
 इस पृष्ठभूमि  में मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने मुझे एक दिन बुलाया और कहा कि ‘ कई लोग आपके पास जाकर मेरा नाम लेंगे।आप उनको विनम्रतापूर्वक सुन लीजिए।पर जो उचित लगे,वही कीजिए।मैं आपको कभी कुछ नहीं कहूंगा।’
  अप्पू ने इस नियम का पालन किया।पर उनके अनुसार सभी नेता श्रीबाबू जैसे नहीं थे।
 खुद श्रीबाबू के शासन के आखिरी दिनों के बदलते अंदाज की भी चर्चा अप्पू ने विस्तार से की है।यह 1957 के चुनाव के समय की बात है।
अप्पू का मानना है कि प्रशासन में धीमी गिरावट उसी समय से शुरू हो गयी।
  अप्पू ने लिखा कि 1957 के चुनावों में कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।अनुग्रह नारायण सिंह के समर्थकों ने उन्हें मनाया कि वे पार्टी में श्रीकृष्ण सिंह को चुनौती दें।एक दूसरे को मात देने की होड़ में यह प्रतियोगिता एक विषाक्त शत्रुता में बदल गयी जिसमें तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए।यहां तक कि आॅफिस और घूस का भी लालच दिया गया।कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में श्रीकृष्ण सिंह साफ बढ़ते लेते हुए जीत गए।लेकिन इससे बिहार की राजनीितक प्रक्रिया को भारी नुकसान पहुंच चुका था।
नेता पद के मुकाबले की पूर्व संध्या पर किए गए वायदों को पूरा करना श्रीकृष्ण सिंह की बाध्यता थी।
कई समर्थकों को ,जिनमें कई अप्रभावी व जनाधारविहीन लोग थे, उप मंत्री बना दिया गया।
इनके पास बहुत कम शक्तियां थीं,पर जल्द ही ये प्रशासन की राह में रोड़े अटकाने लगे, खास कर ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में।
  तत्कालीन मुख्य सचिव एल.पी.सिंह के प्रशंसक  अप्पू ने लिखा कि ‘तब तक एल.पी.सिंह केंद्रीय नियुक्ति पर जा चुके थे।
आई.सी.एस.,एम.एस.राव ने उनका स्थान संभाला।
पर वे दक्ष मुख्य सचिव साबित नहीं हो सके।
राव मुख्य मंत्री के साथ वह करीबी सद्भाव नहीं बना पाए ,जो एल.पी.सिंह को हासिल था।
  इसके अलावा अपने आखिरी दिनों में श्रीकृष्ण सिंह चंद निहितस्वार्थी तत्वों के एक गुट के प्रभाव में आ गए।
अब बिहार के प्रशासन में धीमी ही सही, गिरावट आनी शुरू हो गयी।
 हालांकि अब भी जब मुख्य सचिव या कोई अन्य वरीय अधिकारी कोई अनुचित निर्णय मुख्य मंत्री की निगाह में लाता था तो वे हस्तक्षेप करते थे और उसे दुरूस्त कर देते थे।
अब मैं पीछे मुड़ कर इन चीजों की पड़ताल करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों मैं बिना पक्षपात के प्रभावी ढंग से काम कर पाया तो वह श्रीकृष्ण सिंह जैसे व्यक्ति  थे जिनकी वजह से यह संभव हो पाया।’
 श्रीबाबू के निधन के बाद के वर्षों की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा है कि ‘कई अफसर शक्तिशाली मंत्रियों के साथ गुट बनाने लगे और उनके बेजा कामों में साथ देने लगे।अब बिहार का प्रशासन अपनी चमक खोता जा रहा था।’    
    @यह लेख 7 नवंबर, 2017 को मेरे ‘भूले बिसरे’ काॅलम के तहत लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित@
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

आम धारणा के विपरीत बिहार के प्रशासन में 1957 से ही गिरावट शुरू हो गयी थी।हालांकि तब गिरावट की गति धीमी थी।
  वैसे आम धारणा यह है कि 1967 में जब राज्य में गैर कांग्रेसी सरकारों का दौर शुरू हुआ , तभी से गिरावट शुरू हुई।
  पर 1977-78 में बिहार के मुख्य सचिव रहे 
1951 बैच के आई.ए.एस. पी.एस.अप्पू ने अपने व्यक्तिगत अनुभवोंे के आधार पर लिखा है कि गिरावट की शुरूआत 1957 के आम चुनाव के बाद से  ही शुरू हो गयी थी।
  लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक रह चुके अप्पू हर दम संविधान और कानून के साथ खड़े रहने वाले अफसर थे। 1929 मेें जन्मे अप्पू का 2012 में निधन हो गया।
उन्हें पद्मभूषण से भी सम्मानित किया गया था।
अपने सेवाकाल में अपनी कठोर ईमानदारी के लिए चर्चित अप्पू साहब देश की अखिल भारतीय सेवाआंे में गिरावट,अवमूल्यन और विनाश पर करीब एक दशक पहले साप्ताहिक ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ में लंबा लेख लिखा था।
 बिहार की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्ष में लोक प्रशासन के सुविख्यात विद्वान प्रो.पाॅल एपलबी 
राज्य की यात्रा पर आए थे।उन्होंने बिहार के प्रशासन को उसी रूप में पाया जैसा किसी संसदीय लोकतंत्र में होना चाहिए।
इसलिए उहोंने बिहार के प्रशासन को विश्व के सर्वोत्तम प्रशासनों मेें एक की संज्ञा दी । 
  खुद के अनुभवोें की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा कि 1953 में मेरी तैनाती तत्कालीन मुख्य मंत्री के जिले में हुई थी।तब कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि मुख्य मंत्री का जिला है।बहुत नाजुक पोस्टिंग है।मुख्य मंत्री के खास लोग आपको परेशान करेंगे।धमकी भी देंगे।
 इस पृष्ठभूमि  में मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने मुझे एक दिन बुलाया और कहा कि ‘ कई लोग आपके पास जाकर मेरा नाम लेंगे।आप उनको विनम्रतापूर्वक सुन लीजिए।पर जो उचित लगे,वही कीजिए।मैं आपको कभी कुछ नहीं कहूंगा।’
  अप्पू ने इस नियम का पालन किया।पर उनके अनुसार सभी नेता श्रीबाबू जैसे नहीं थे।
 खुद श्रीबाबू के शासन के आखिरी दिनों के बदलते अंदाज की भी चर्चा अप्पू ने विस्तार से की है।यह 1957 के चुनाव के समय की बात है।
अप्पू का मानना है कि प्रशासन में धीमी गिरावट उसी समय से शुरू हो गयी।
  अप्पू ने लिखा कि 1957 के चुनावों में कांग्रेस प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई।अनुग्रह नारायण सिंह के समर्थकों ने उन्हें मनाया कि वे पार्टी में श्रीकृष्ण सिंह को चुनौती दें।एक दूसरे को मात देने की होड़ में यह प्रतियोगिता एक विषाक्त शत्रुता में बदल गयी जिसमें तमाम तरह के हथकंडे अपनाए गए।यहां तक कि आॅफिस और घूस का भी लालच दिया गया।कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में श्रीकृष्ण सिंह साफ बढ़ते लेते हुए जीत गए।लेकिन इससे बिहार की राजनीितक प्रक्रिया को भारी नुकसान पहुंच चुका था।
नेता पद के मुकाबले की पूर्व संध्या पर किए गए वायदों को पूरा करना श्रीकृष्ण सिंह की बाध्यता थी।
कई समर्थकों को ,जिनमें कई अप्रभावी व जनाधारविहीन लोग थे, उप मंत्री बना दिया गया।
इनके पास बहुत कम शक्तियां थीं,पर जल्द ही ये प्रशासन की राह में रोड़े अटकाने लगे, खास कर ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में।
  तत्कालीन मुख्य सचिव एल.पी.सिंह के प्रशंसक  अप्पू ने लिखा कि ‘तब तक एल.पी.सिंह केंद्रीय नियुक्ति पर जा चुके थे।
आई.सी.एस.,एम.एस.राव ने उनका स्थान संभाला।
पर वे दक्ष मुख्य सचिव साबित नहीं हो सके।
राव मुख्य मंत्री के साथ वह करीबी सद्भाव नहीं बना पाए ,जो एल.पी.सिंह को हासिल था।
  इसके अलावा अपने आखिरी दिनों में श्रीकृष्ण सिंह चंद निहितस्वार्थी तत्वों के एक गुट के प्रभाव में आ गए।
अब बिहार के प्रशासन में धीमी ही सही, गिरावट आनी शुरू हो गयी।
 हालांकि अब भी जब मुख्य सचिव या कोई अन्य वरीय अधिकारी कोई अनुचित निर्णय मुख्य मंत्री की निगाह में लाता था तो वे हस्तक्षेप करते थे और उसे दुरूस्त कर देते थे।
अब मैं पीछे मुड़ कर इन चीजों की पड़ताल करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों मैं बिना पक्षपात के प्रभावी ढंग से काम कर पाया तो वह श्रीकृष्ण सिंह जैसे व्यक्ति  थे जिनकी वजह से यह संभव हो पाया।’
 श्रीबाबू के निधन के बाद के वर्षों की चर्चा करते हुए अप्पू ने लिखा है कि ‘कई अफसर शक्तिशाली मंत्रियों के साथ गुट बनाने लगे और उनके बेजा कामों में साथ देने लगे।अब बिहार का प्रशासन अपनी चमक खोता जा रहा था।’    
    @यह लेख 7 नवंबर, 2017 को मेरे ‘भूले बिसरे’ काॅलम के तहत लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित@
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

पूना पैक्ट के जरिए हुआ था अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण






          
महात्मा गांधी और डा.आम्बेडकर के बीच हुए पूना पैक्ट के जरिए अनुसूचित जाति के लिए विधायिका में आरक्षण की राह खुली थी।
 इन दोनों महान नेताओं के लिए वह पैक्ट बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया था।
  यह पैक्ट यानी समझौता 24 सितंबर 1932 को पूना के यरवदा जेल में महात्मा गांधी और डा.आम्बेडकर के बीच हुआ था।आजादी की लड़ाई के दौरान उन दिनों महात्मा गांधी जेल में थे।
   उससे पहले ब्रिटिश सरकार ने  दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव दिया था।महात्मा गांधी ने यह कहते हुए उसका विरोध कर दिया था कि इससे हिंदू समाज टूट जाएगा।महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को जेल में ही आमरण अनशन शुरू कर दिया ।दरअसल  ब्रिटिश सरकार ने पृथक निर्वाचक मंडलों के बारे में डा.आम्बेडकर का सुझाव मान लिया था।यह सुझाव गोलमेज सम्मेलन में डा.आम्बेडकर ने दिया था।
  डा.आम्बेडकर नहीं चाहते थे कि महात्मा गांधी इस सवाल पर आमरण अनशन करें।डा.आम्बेडकर ने तब कहा था कि ‘मैं विश्वास करता हूं कि महात्मा जी अपने जीवन और हमारे लोगों के अधिकारों में से किसी एक को पसंद करने के लिए मुझे नहीं खींचेंगे।क्योंकि मैं अपने लोगों को आने वाली पीढि़यों में हिंदुओं के लिए उनके हाथ -पैर बांध कर उन्हें कभी न सौंप सकूंगा।’ डा. आम्बेडकर का यह बयान बहुत कड़ा था।पर जब महात्मा गांधी ने अनशन शुरू कर दिया तो डा.आम्बेडकर पिघले।उन्होंने कहा कि ‘अनशन से समस्या उत्पन्न हो गई और वह समस्या थी कि गांधी जी के प्राण कैसे बचाएं जाएं।उनके प्राण बचाने का केवल एक ही उपाय था ,वह यह कि ‘कम्युनल एवार्ड’ को बदल दिया जाए जिसे गांधी जी कहते थे कि उससे उन्हें बड़ा आघात पहुंचा है। ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने इसे बहुत बार स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल अब उसे वापस नहीं लेगा न उसमें कोई परिवत्र्तन करेगा।बल्कि वे किसी ऐसे सिद्धांत जो सवर्ण हिंदुओं और अछूतों को मान्य हो,उसमें जोड़ने को थे।’
   डा.आम्बेडकर ने कहा कि ‘ यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि मैं ऐसी स्थिति में पड़ गया कि वैसी सांप -छछूंदर की स्थिति में शायद कोई न पड़ा होगा।बहुत घबराने की स्थिति थी।मुझे दोनों में से किसी एक विकल्प को चुनना था।मेरे सामने कत्र्तव्य था जो मानवता का बड़ा अंग था गांधी जी के प्राणों की रक्षा करना।दूसरी ओर मेरे सामने समस्या थी अछूतों के उन अधिकारों की रक्षा करने की जिन्हें प्रधान मंत्री ने दिए थे।
मैंने मानवता की पुकार का वरण किया और महात्मा गांधी के प्राणों की रक्षा की और कम्युनल एवार्ड में ऐसे परिवत्र्तन करने पर मैं सहमत हो गया जिस पर गांधी जी सहमत थे।’
    पूना  पैक्ट के नाम से चर्चित इस समझौते का मूल स्वरूप इस प्रकार से थाः
1. प्रातीय विधान सभाओं में सामान्य निर्वाचित सीटों में से दलित वर्गों के लिए सीटें सुरक्षित की जाएंगी जो निम्न प्रकार से होंगी।
मद्रास -30 ,बम्बई और सिंध -15 ,पंजाब-8 , बिहार और उडी़सा-18 ,सेंट्रल प्रोविंस -20 ,आसाम - 7 ,बंगाल - 30 ,यू.पी.- 20  यानी कुल 148  ।
 2. इन सीटों के लिए चुनाव संयुक्त निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाएगा।
3. केंद्रीय व्यवस्थापिका में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व समझौते के उपर्युक्त पारा- दो के अनुसार होगा जो संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के सिद्धांत पर होगा।
4.  केंद्रीय व्यवस्थापिका में दलित वर्गों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या 18 प्रतिशत होगी और उनका चुनाव भी उपर्युक्त पद्धति से होगा।
5 . अभ्यर्थियों के पैनल की प्राथमिक चुनाव व्यवस्था कें्रद्रीय तथा प्रांतीय व्यवस्थापिकाओं के लिए -जिनका ऊपर उल्लेख किया गया है-प्रथम दस वर्षों के बाद समाप्त हो जाएगी।
इसके अलावा भी कुछ प्रावधान किए गए थे।
   पूना पैक्ट के नतीजे के बारे में डा.आम्बेडकर ने 1937 के चुनाव के बाद  लिखा कि प्रश्न है कि पूना समझौता करने से अस्पृश्यों को क्या लाभ मिला ?
इसे समझने के लिए हमें विधान मंडलों के लिए हुए चुनाव परिणमों की निरख-परख करनी होगी।भारत सरकार अधिनियम 1937 की व्याख्या के अनुसार नये विधान मंडलों के लिए चुनाव हुए।जहां तक अस्पृश्यों कव संबंध है,फरवरी 1937 में जो चुनाव हुए,वे पूना समझौते के अनुसार हुए।संयुक्त प्रांत में आरक्षित कुल 20 सीटों में से 16 सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जात हुई।
कुल मिलाकर देश की 151 सीटों में 78 सीटें कांग्रेस को मिलीं।’
 @ लाइवबिहार.लाइव में प्रकाशित मेरा लेख@




सोमवार, 6 नवंबर 2017

  मैं सुनता था कि ईश्वर की तरह इस देश में भ्रष्टाचार भी
सर्वव्यापी है।पहले यह बात मुझे एक कहावत भर लगती
थी।
लगता था कि किसी को  अपनी
बात को दमदार बनाना होता है तो वह ऐसा कह देता है।
पर, हाल के कुछ अनुभवों से अब लग रहा है कि वह सिर्फ  कहावत नहीं बल्कि  हकीकत है।हालांकि अपवाद तो सब जगह होते हैं।
बिहार के देहाती इलाके से मेरे एक रिश्तेदार ने एक माह पहले  फोन पर सूचना दी थी कि ‘ स्थानीय बैंक शाखा में  खाता खोलने के लिए  बैंक कर्मी ने मुझसे रिश्वत मांगी है।क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता ! कैसी सरकार है यह ?’
  एक परिचित कल पटना स्थित मेरे आवास पर आए।वह राजस्व कर्मचारी के यहां से लौट रहे थे।
मैंने उनसे कहा कि पहले तो  मालगुजारी  बहुत कम लगती थी। महंगी के अनुपात में उसमें बढ़ोत्तरी हुई है या नहीं ?
उन्होंने बताया कि बढ़ोत्तरी भी हुई है,पर एक नया खेल भी चल रहा है।
अब राजस्व कर्मचारी को रसीद काटने के लिए प्रत्येक रसीद पर सौ रुपए की रिश्वत भी देनी पड़ती है।उसके बिना वह रसीद काटेगा ही नहीं। 
  इसे ही कहते हैं लहर गिन कर पैसे कमाना ।
मेरी जानकारी के अनुसार बैंक खाता खोलने और मालगुजारी की रसीद कटवाने में रिश्वतखोरी की परंपरा संभवतः हाल में शुरू हुई है।
यानी जहां भी पहले काम मुफ्त में हो जाता था,वहां भी भ्रष्टाचार पहुंच चुका है।लगता है कि घूसखोर लोग पिछले  जन्म में कवि थे।कहा ही जाता है कि ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां जाए  कवि !’ कृपया कवि जी बुरा न मानेंगे।मैंने सिर्फ पहंुच
के मामले मेें यह तुलना की।अन्य मामलों में कत्तई नहीं।

अफसर जीवन काल में ही बन गए थे लोक चर्चाओं के विषय



         
  यह घटना उस समय की है जब 1951 बैच के आई.ए.एस.अफसर पी. एस. अप्पू लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक थे।
  एक प्रशिक्षु आई.ए.एस.अफसर ने सह प्रशिक्षु लड़कियों के साथ दुव्र्यवहार किया।इतना ही नहीं उन पर रिवाल्वर  भी तान दी।
  निदेशक ने उस उदंड प्रशिक्षु को बर्खास्त कर देने की सिफारिश कर दी।पर केंद्र सरकार ने अप्पू की सिफारिश को नहीं माना।
  इसके विरोध में अप्पू ने सेवा से इस्तीफा दे दिया।उन्हें साढ़े तीन साल बाद रिटायर होना था।
याद रहे कि अप्पू 2 अगस्त, 1980 से 1 मार्च, 1982 तक निदेशक पद पर रहे।
  न सिर्फ सेवा के अंतिम दिनों में बल्कि पूरे सेवा काल में अप्पू कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर बने रहे।
 इस्तीफे के बाद वह बंगलुरू  जाकर बस गए क्योंकि उस शहर के पास जमीन सस्ती थी।उन्होंने कोई दूसरा काम स्वीकार करने के बदले अपने आवास के अहाते में एक सौ तरह के गुलाब के पौधे लगाए।माचर्, 2012 में उनका निधन हो गया।
  बिहार काॅडर के आई.ए.एस. अफसर अप्पू ने दो किस्तों में कुल इक्कीस वर्षों तक बिहार की सेवा की।उनका सबसे अच्छा अनुभव डा.श्रीकृष्ण सिंहा के मुख्य मंत्रित्व काल के प्रारंभिक वर्षों का रहा।पर 1957 के बाद अप्पू ने श्रीबाबू के शासन काल में भी गिरावट देखी थी।
 अप्पू ने अपने संस्मरण में संविधान सभा में दिए गए सरदार पटेल के भाषण को याद किया है।सरदार साहब ने कहा था कि ‘ आज मेरा सचिव मेरे विचार के खिलाफ कोई नोट लिख सकता है।मैंने सभी साथियों को यह आजादी दी है।मैंने उन्हें बता दिया है कि यदि वे अपनी ईमानदार और सही राय इस आधार पर नहीं देते कि मंत्री साहब नाराज हो जाएंगे तो बेहतर होगा कि वे इस्तीफा दे दें।और मैं कोई दूसरा सचिव खोज लूंगा।’
  अप्पू ने सरदार पटेल के दिशा निदेश के तहत एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर की तरह पूरे सेवाकाल में  कत्र्तव्य निभाने की कोशिश की।
 पर सत्तर के दशक में तत्कालीन  मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर के साथ अप्पू के जो अनुभव रहे ,वे बिहार की शासन -व्यवस्था की पोल खोल देते हैं। 
अप्पू के शब्दों में ही जानिए तब के बिहार शासन का हाल !
‘कर्पूरी ठाकुर मुझे तब से जानते थे जब मैं उनके जिला दरभंगा का कलक्टर था।1967 में जब वे वित्त मंत्री थे तो मैंने उनके तहत वित्त सचिव का काम किया था।
 हम दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे। 1977 में मुख्य मंत्री पद संभालने के तत्काल बाद कर्पूरी जी ने मुझे बताया कि वे मुझे मुख्य सचिव बनाना चाहते हैं।
मैंने उनसे कहा कि अभी बिहार काॅडर में कार्यरत पांच अधिकारी मुझसे सिनियर हैं।उनमें से किसी को बना दीजिए।
पर एक सप्ताह बाद उन्होंने मुझे सूचित किया कि कैबिनेट की राय है कि मैं ही मुख्य सचिव बनूं।
 मैंने कहा कि एक अनुशासित सिविल सर्वेंट के रूप में उनकी आज्ञा मानने के अतिरिक्त मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।
हालांकि मैंने यह भी जोड़ा कि प्रशासन बदतर हालत में है और तब ही मैं सक्षम होऊंगा ,जब वे यानी कर्पूरी ठाकुर कुछ शत्र्तें मानने को तैयार हों।शत्र्तें ये थीं कि वे मेरे द्वारा चुने हुए कुछ बेहतर अफसरों को कुछ प्रमुख पदों पर तैनात  करें।प्रचूर मात्रा में शक्तियां मातहत अधिकारियों को सौंपें।
उनके काम मेें किसी तरह का बेजा हस्तक्षेप न हो।
कर्पूरी जी ने सारी शत्र्तें मान लीं।
पर मुख्य सचिव का पद संभालने के कुछ ही दिन बाद मैंने पाया कि मुख्य मंत्री उन शत्र्तों को पूरा नहीं कर सकते थे।मैंने यह भी पाया कि वस्तुपरकता के आधार अफसरों की पोस्टिंग के लिए कैबिनेट को राजी करना कर्पूरी जी के लिए संभव नहीं था।
 अप्पू ने लिखा कि खास -खास पदों के लिए लाॅबिंग उन दिनों जोरों पर थी।मंत्री वैसे अफसरों की ताक में रहते थे जो या तो उनकी जाति का हो या फिर उनकी हर वाजिब-गैर वाजिब मांगों को पूरा करने में किसी तरह का ना -नुकूर न करे।
मंत्रियों द्वारा प्रायः दक्ष और बेहतर रिकाॅर्ड वाले अफसरों की अन देखी कर दी जाती थी।
भ्रष्ट और अकुशल अफसरों को पसंद किया जाता था।
कई अफसर लाॅबिंग के बूते मनचाही पोस्टिंग या तबादला पाने में कामयाब हो गए।
समय- समय पर जारी कई चेतावनियों के बावजूद दिन प्रति दिन  के प्रशासन में खास कर पोस्टिंग- ट्रांसफर से जुड़े मामलों में गैर जरूरी हस्तक्षेप बेरोकटोक बढ़ता गया।
प्रशासन का आत्म विश्वास पहले ही से गिरा हुआ था अब और गिरने लगा।
जब मैंंने यह महसूस किया कि प्रशासन में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है तो अप्रैल 1978 में मैंने बिहार छोड़ दिया।
अखिल भारतीय सेवाओं में क्रमिक गिरावट, अवमूल्यन और विनाश का संक्षिप्त इतिहास लिखते हुए  अप्पू ने यह भी लिखा है कि किसी मंत्री या नौकरशाह ने इमरजेंसी का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई।साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि अगर केवल डीजीपी, मुख्य सचिव और चंद पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने निडरता दिखाई होती तो गुजरात में नरमेध यज्ञ को रोका जा सकता था।’
@फस्र्टपोस्ट हिंदी  के मेरे साप्ताहिक काॅलम ‘दास्तान ए सियासत’ में 6 नवंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख @