गुरुवार, 11 जनवरी 2018


आबादी बढ़ने के कुछ कारणों की मैं चर्चा करना चाहता हूं।
1.-कानून-व्यवस्था खराब रहने के कारण गांवों में एक बड़ा परिवार छोटे परिवार को अक्सर तंग -तबाह करता है।छोटा परिवार चाहता है कि उसका परिवार भी बड़ा हो।इस कोशिश में आबादी बढ़ती है।
2.-परिवार नियोजन के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश भ्रष्टाचार में चले जाते हैं।
3.-कुछ लोग बहुसंख्यक  समुदाय को समझाते हैं कि तुम परिवार नियोजन करोगे तो एक दिन यहां अल्पसंख्यक ही , बहुसंख्यक हो जाएंगे।फिर तो देश में लोकतंत्र भी नहीं रहेगा।
अल्पसंख्यक तो परिवार नियोजन कभी  करेंगे नहीं।
4.- अनेक गरीब लोग यह समझते हैं कि जितने अधिक हाथ होंगे, मजदूरी से उतने ही अधिक पैसे घर में आएंगे।चूंकि मजदूरी कम है, इसलिए एक -दो लोगों की मजदूरी से घर नहीं चलता। 
5.-भारत एक धर्मशाला है।यहां वोट के लिए कुछ खास राजनीतिक दल बंगला देशियों को यहां नाजायज तरीके से बसाते रहते हैं।
सीमा सुरक्षा बल के भी कुछ लोग भी रिश्वत लेकर बंगलादेशियों को इस देश में प्रवेश कराते रहते हैं।
कुछ साल पहले इस देश के एक पूर्व विदेश सचिव ने टी.वी.पर बातचीत में कहा था कि बंगला देश की सीमा पर बाड़ नहीं लगाया जाना चाहिए।
क्योंकि उससे दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।
वे नेहरू युग में  आई.एफ.एस.अफसर बने थे।यानी यही सब आजादी के बाद अफसरों को सिखाया गया।आबादी कैसे नहीं बढ़ेगी ?
5.-इस तरह के कुछ अन्य कारण  भी हैं। 

बुधवार, 10 जनवरी 2018

  बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं।यह भी कि वह खास  बात  किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई।
 मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर 
अपने जीवन में एक खास दिशा तय की।
उसका मुझे अपार लाभ मिला।
 मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आॅफिस ज्वाइन किया था। 
  हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह।
उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे।
 पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था।
 वे बाबूराव विष्णु पराड़कर  की यशस्वी धारा के पत्रकार थे।
 विद्वता और शालीनता से भरपूर।
इधर मैं लोहियावादी समाजवादी पृष्ठभूमि से निकला था।पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रबल समर्थक।
सक्रिय राजनीति से निराश होकर पत्रकारिता की तरफ बढ़ा ही था कि देश में आपातकाल लग गया।
  पहले  छोटी-मोटी पत्रिकाओं में काम शुरू किया था ।उन पत्रिकाओं में नई दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ भी था।उसके प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस और संपादक कमलेश थे।गिरधर राठी और मंगलेश डबराल भी प्रतिपक्ष में थे।भोपाल के आज के मशहूर पत्रकार एन.के.सिंह भी कुछ दिनों के लिए ‘प्रतिपक्ष’ में थे।ं 
पर वह जार्ज के दल  का मुखपत्र नहीं था।वह ब्लिट्ज और दिनमान का मिश्रण था।
  आपातकाल में मैं फरार था।बड़ौदा डायनामाइट केस  के सिलसिले में सी.बी.आई.मुझे बेचैनी से खोज रही थी कि मैं  मेघालय भाग गया।
जब आपातकाल की सख्ती  कम हुई तो में पटना लौट आया और ‘आज’ ज्वाइन कर लिया।
मैंने अपनी पृष्ठभूमि इसलिए बताई ताकि आगे की बात समझने में सुविधा हो।
  आज ज्वाइन करते ही मैंने देखा के ‘आज’ में हर जगह ब्राह्मण भरे हुए हैं।
मैंने पारस बाबू से इस संबध्ंा में पूछा और सामाजिक न्याय की चर्चा की । उन्होंने जो कुछ कहा ,उसका मेरे जीवन पर भारी असर पड़ा।
  ऋषितुल्य पारस बाबू ने कहा कि आप जिस पृष्ठभूमि से आए हंै,उसमें यह सवाल स्वाभाविक है।पर यह कोई लोहियावादी पार्टी का दफ्तर नहीं है।
  यदि यहां ब्राह्मण भरे पड़े हैं तो यह अकारण नहीं हैं।
  ब्राह्मण विनयी और विद्या व्यसनी होते हैं।
ये बातें पत्रकारिता के पेशे के अनुकूल हैं।
यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए।
अन्यथा, पहले आप जो करते थे, फिर वही करिए।
  मैंने पारस बाबू की बातों की गांठ बांध ली।
उसके अनुसार चलने की आज भी कोशिश करता रहता हूं।
उसमें मेहनत, लगन और ध्यान केंद्रण अपनी ओर से जोड़ा।यदि 1977 के बाद के शुरूआती वर्षों में पत्रकारिता के बीच के अनेक ब्राह्मणों ने मुझे शंका की दृष्टि से देखा,वह स्वाभाविक ही था।उन्हें लगा कि
पता नहीं मैं अपने काम में  सफल हो पाऊंगा या नहीं।पर पारस बाबू की शिक्षा  मेरे जीवन में रंग दिखा चुकी थी।
 नतीजतन मेरे पत्रकारीय जीवन में एक समय ऐसा आया जबकि देश के करीब आध दर्जन जिन प्रधान संपादकों ने मुझे स्थानीय संपादक  बनाने की दिल से कोशिश की, उनमें पांच ब्राह्मण ही थे।उनमें से एक -दो तो अब भी हमारे बीच हैं।
मैं इसलिए नहीं बना क्योंकि मैं खुद को उस जिम्मेदारी के योग्य नहीं पाता।
 पर, आज भी मेरे पास लिखने-पढ़ने के जितने काम  हैं ,वे मेरी क्षमता से अधिक हैं।पैसे के मामले में भी संतुष्टि है।नौकरी में रहते हुए जितने पैसे मुझे मिलते थे,उससे अधिक अब भी मिल जाते हैं।मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखने के बावजूद ।
 यह सब पारस बाबू के गुरू मंत्र का कमाल है।मैंने तो अपने जीवन में ‘आरक्षण’ का विकल्प  ढंूढ़  लिया ।वैसे 
यह बता दूं कि मैं अनारक्षित श्रेणी वाले समाज से आता हूं। 
    

 ‘प्रभात खबर’ ने पटना के विभिन्न मुहल्लों की बदहाली पर
इन दिनों एक अच्छा अभियान चला रखा  है।
  इस प्रादेशिक राजधानी मेें नये मुहल्ले तो बसे हैं, बसते जा रहे हैं,पर उनमें बुनियादी नागरिक सुविधाओं का घोर अभाव है।
यह समस्या बढ़ कर एक दिन भारी संकट पैदा करेगी।
 इस दुर्दशा को देखते हुए राज्य सरकार की जिम्मेदारी बढ़
जाती है।
बिहार आवास बोर्ड को चाहिए कि वह पटना सहित राज्य
के नगरों के आसपास जमीन का अधिग्रहण कर सुनियोजित ढ़ंग से उसे विकसित करे।सड़क, नाला, स्कूल, अस्पाल आदि के लिए जगह पहले से सुनिश्चित करे।
  फिर बोर्ड वहां  प्लाॅट बना कर आम लोगों को बेचे।
यदि अब भी वह ऐसा नहीं करेगी तो पटना के महा नगर बनने के बदले यहां  महा नरक का विस्तार होता जाएगा।
  याद रहे कि जिस तरह राज्य सरकार ने हाल में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है,उससे यह साफ है कि आगे भी राज्य सकार कहीं कोई किसी जमीन का अधिग्रहण करेगी तो वहां जबरन  कब्जा करने से पहले लोग सौ बार सोचेंगे।   
@10 जनवरी 2018@  

 आज के दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में एक ऐसी खबर छपी है जिस पर हर भारतीय गर्व कर सकता है।
खबर है कि अमेरिकी सांसदों के दबाव पर वहां की सरकार ने
‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ की नीति का कार्यान्वयन रोक दिया है।
सासंदों का कहना है कि इसे लागू करने से सात लाख भारतीयों को  अमेरिका छोड़ना पड़ेगा।इससे अमेरिका के आई.टी. क्षेत्र में बड़ा नुकसान हो जाएगा।साथ ही भारत से संबंध बिगड़ेगा जिससे अमेरिका को अलग से आर्थिक नुकसान होगा।
  पर इस खबर के साथ भारत सरकार के निरंतर निकम्मेपन और विफलताओं पर भी उन हर भारतीय को गुस्सा आएगा जो यहां के सार्वजनिक संसाधनों की लूट में शामिल नहीं है।
आखिर उन सात लाख भारतीयों  को भारत में ही काम क्यों नहीं दिया जा सका  ?
उन्हें स्वदेश क्यों छोड़ना पड़ा ? कोई कह सकता है कि हमारे पास उन्हें देने के लिए अधिक पैसे नहीं थे।
पर, घोटालो-महा घोटालों में गंवा देने के लिए तो भारत में बहुत पैसे हैं।लाखों करोड़ रुपए एन.पी.ए. में लुटा देने के लिए पैसे हैं।
 अधिकतर सत्ताधारी नेताओं को सरकारी धन पर उनके सात पुश्तों के लिए अमीर बना देने के लिए भी पैसों की कोई कमी नहीं है।
अधिकतर अफसर व व्यापारी देश को लूट रहे हैं।अनेक पदधारी नेता जनता के पैसों से पांच सितारा जीवन जी रहे हैं।
उन पर कितनी रोक लग सकी है ?
  यह भी कहा जा सकता है कि बाहर गए लोग देशप्रेमी नहीं हैं। वे  विदेशों में अत्यंत आलीशान व सुखमय जीवन चाहते हैं।उनमें से कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं।पर विदेशों में कार्यरत अनेक भारतीयों को स्वदेश की बहुत याद सताती है। उनमें से कुछ तो कुछ कम पैसों पर भी इसी देश में रहना चाहते हैं। 
 पर सिर्फ यही समस्या नहीं है।अनेक  स्तरों पर बहाली में पक्षपात की भी यहां बड़ी समस्या है।
आपको याद होगा कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री थे तो उनके घुटने के आॅपरेशन के लिए न्यूयार्क से डा.चितरंजन राणावत को बुलवाया गया था।मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका आपरेशन हुआ था।
सफल आपरेशन के बाद भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण दिया था।
उससे पहले जब डा.राणावत ने इस देश के एक राष्ट्रपति की आंखों का सफल आॅपरेशन किया  था।उस पर  उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था।
  पर डा.राणावत आखिर भारत छोड़कर अमेरिका में क्यों बस गये थे ?
क्योंकि नई दिल्ली के एम्स ने  नौकरी के उनके आवेदन को रिजेक्ट कर दिया था।
 उससे पहले राणावत को इंदौर के क्रिश्चियन मेडिकल काॅलेज में दाखिला तक नहीं मिल सका था। उन दिनों यह खबर भी छपी थी कि वहां  भी भेदभाव के कारण ही ऐसा हुआ था।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

अखबारों में लेख लिख कर अपना खर्च चलाते थे समाजवादी नेता मधु लिमये


           
  आज जबकि अधिकतर तथाकथित समाजवादी नेताओं के बीच  पैसे कमाने की होड़ मची हुई है,उनकी पुण्य तिथि पर मधु लिमये को याद करना अधिक प्रासंगिक हो गया है। 
    एक मई, 1922 को महाराष्ट्र में जन्मे मधु लिमये बिहार से चार बार लोक सभा सदस्य  चुने गये थे ।
8 जनवरी 1995 को एक सामान्य व्यक्ति की तरह उनका निधन हुआ।
इस बीच उन्होंने कभी सादगी,संयम और सिद्धांतों का साथ नहीं छोड़ा।जो उचित समझा,वह किया।यह और बात है कि उनके कुछ विचार  विवादास्पद रहे।पर उनकी मंशा कभी गलत नहीं थी।
 स्वास्थ्य खराब रहने के बावजूद दिल्ली की गर्मी में भी मधु लिमये के आवास में न तो कूलर था और न ही एयर कंडीशनर। फ्रीज या टी.वी. भी नहीं। ऐसी कोई सुविधा भी नहीं जो एक निम्न मध्य वर्ग के घरों में भी हुआ करती हैं। यानी सचमुच वे इस गरीब देश की अधिकतर जनता के असली  प्रतिनिधि थे। 8 जनवरी 1995 को  उनके निधन पर मशहूर पत्रकार  प्रभाष जोशी ने  लिखा था कि ‘ऐसा कोई दूसरा आदमी दिखे तो बताना, उसे मैं सामने रख कर अपने बचे हुए साल जी लूगा।’ हालांकि ऐसा ही नाम पूर्व कम्युनिस्ट सासंद ए.के.राय का भी है जो इन दिनों धनबाद में सामान्य जीवन बिता रहे हैं।कुछ अन्य नेता भी ऐसे होंगे।
    पुना में जन्मे मधु लिमये ने देश, समाज और समाजवादी आंदोलन को जितना दिया, उसके मुकाबले उन्होंने अपने लिए कुछ लिया नहीं।जो बड़ी -बड़ी सुविधाएं अपना हक समझ कर पूर्व सासंद गण लेते रहते हैं, उन्हें समय -समय पर बढ़ाते रहने की जोरदार मांग भी करते रहते हैं,,मधु जी ने वह सब भी स्वीकार नहीं किया।
   मधु लिमये स्वतंत्रता सेनानी थे।पर उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन स्वीकार नहीं की। उन्होंने पूर्व सांसदों के लिए तय पेंशन लेने से भी इनकार कर दिया। अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखों से जो पारिश्रमिक मिलता था,उसी से उनका  खर्च चलता था।जब सक्रिय राजनीति लायक उनका स्वास्थ्य नहीं रहा तो उन्होंने खुद को सिर्फ लिखने- पढ़ने के काम में लगा दिया।
   गरीबी में रहने के बावजूद मधु लिमये में न तो त्याग का कोई अहंकार था और न ही दीनता का कोई भाव।
  सक्रिय राजनीति से रिटायर हो जाने के बाद उनका रूटीन बदल गया था।सुबह वे लिखते -पढ़ते थे और शाम में लोगों से मिलते -जुलते थे।कोई जिद्दी समाजवादी सुबह के वक्त उनके यहां पहुंच जाता तो वे हाथ जोड़ कर उससे कहते थे कि ‘बाद में आइए,लिखने से ही मेरा घर -खर्च चलता है। मिलने के समय जब कोई उनके पास जाता तो वे बड़े प्यार से मिलते थे और खुद काॅफी बना कर  पिलाते थे।
  कई बार लोग पूछते हैं कि इस गरीब देश को कैसा नेता चाहिए ?
   इस सवाल पर  मधु लिमये जैसे नेता का नाम लिया जा सकता है ।यानी ऐसा व्यक्ति जो समाज से जितना ले,उसकी अपेक्षा अधिक समाज को दे। 
     मधु लिमये ने न सिर्फ समाजवादी आंदोलन को मजबूत किया बल्कि उन्होंने संसद की चर्चाओं में भी सराहनीय योगदान दिया।उन्हें मदद करने के लिए उनकी अर्धागंनी चंपा लिमये भी उनके साथ थीं जो शादी से पहले चंपा गुप्ते थीं।उनसे संकोची मधु लिमये का 1951 में प्रेम विवाह हुआ था।राष्ट्र सेवा दल के अध्ययन मंडल में चंपा गुप्ते से मधु लिमये की मुलाकात हुई थी।मधु लिमये वहां भाषण देने जाते थे।चंपा लिमये का भी समाजवादी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा। वैचारिक समानता के कारण व मधु लिमये की तेजस्विता और गंभीरता के कारण यह विवाह हुआ।चंपा गुप्ते के पिता अमलनेर के प्रसिद्ध वकील थे।उनका परिवार सम्पन्न था।दूसरी ओर मधु लिमये के जीवन में विपन्नता और संघर्ष थे।गोवा सत्याग्रह में मधु लिमये का योगदान महत्वपूर्ण रहा।
  मधु लिमये को लोक सभा में भेजने का श्रेय बिहार प्रदेश और  कुछ समाजवादी नेताओं और कार्यकत्र्ताओं को था।लोक सभा में जाने के बाद उन्होंने यह दिखा दिया कि किस तरह बिना कोई शोरगुल और हंगामा किए शालीन तरीके से भी संसद में प्रभावशाली ढंग से जनता की आवाज उठाई जा सकती है।पर इसके लिए संसदीय प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन जरूरी था जो उन्होंने धैर्यपूर्वक किया था।मधु जब लोक सभा में खड़ा होते थे,तो 
सत्ता पक्षा सावधान होकर अपनी सीटों पर बैठ जाता था।कुछ मंत्री आशंकित  हो जाते थे।  
   सन् 1964 में मुंगेर में हुए एक उप चुनाव के जरिए मधु लिमये पहली बार सयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लोक सभा में पहुंचे।दूसरी बार जब वे सन् 1967 में मुंगेर से ही चुनाव लड़ रहे थे तो प्रचार के दौरान उन पर कातिलाना हमला हुआ।उन पर हुए हमले को  राम देव सिंह यादव ने नहीं रोका होता तो मधु लिमये का बचना कठिन था।हालांकि तब वे बुरी तरह घायल हो गए थे।बाद में राम देव सिंह यादव बाद में बिहार सरकार के  राज्य मंत्री भी बने।मधु लिमये  सन् 1973 के उप चुनाव और सन् 1977 के आम चुनाव के जरिए बांका से चुनकर लोक सभा में गए थे। 
   @ मेरा यह लेख 8 जनवरी 2018 को  फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित@

एक नेता जो मसीहा न बन सका



           
कई दशक पहले की बात है।कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जे.बी.कृपलानी एक बीमार स्वतंत्रता सेनानी को देखने पटना आए थे।
लौटते समय  पटना हवाई अड्डा के रास्ते में साथ के एक व्यक्ति से उन्होंने कहा कि ‘यह बहुत बड़ा क्रांतिकारी था।पर लोभ ने इसे बर्बाद कर दिया।’ 
दरअसल वह क्रांतिकारी पहले भगत सिंह और चंद्र शेखर आजाद के साथ थे।
बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।विधायक बने और ‘दुनियादारी’ में लिप्त हो गए।
 लालू प्रसाद पर भी यह बात फिट बैठती है।
लालू प्रसाद ने बिहार में सामाजिक स्तर पर युगांतरकारी काम किया था।भूतो न भविष्यति !
मंडल आरक्षण विवाद  की पृष्ठभूमि में तत्कालीन मुख्य मंत्री  लालू प्रसाद ने सवर्ण सामंती धाक वाले राज्य बिहार में पिछड़ों और कमजोर वर्ग के लोगों को सीना तान कर चलना सिखाया।
याद रहे कि 1990 में  जब आरक्षण विरोधियों ने मंडल आरक्षण का बिहार में तीखा विरोध करना शुरू किया तो तत्कालीन मुख्य मंत्री  लालू प्रसाद ने अपनी पूरी सरकारी ताकत के साथ वैसे लोगों का उससे भी अधिक  तीखा प्रतिरोध  किया।
पिछड़ों को लगा कि लालू के रूप में हमें एक मसीहा मिल गया है। 1991 के लोक सभा चुनाव में लालू प्रसाद को मिला  भारी जन समर्थन उसका गवाह बना।उनमें पिछड़ों का आम्बेडकर बनने की संभावना देखी गयी।
पर बाद में यह मसीहा अपनी राह से भटक गया।
आज यदि लालू प्रसाद जेल में हैं तो उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है।उन्होंने खुद ही पिछड़ों का आम्बेडकर बनने का अवसर गंवाया। याद रहे कि रांची कोर्ट में गत माह दोषी ठहराये जाने के बाद लालू प्रसाद ने अपनी तुलना आम्बेडकर, नेलसन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग से की थी। 
अब नयी परिस्थिति में राजद  का क्या भविष्य होगा,यह देखना दिलचस्प होगा।हांलाकि राजद के नेतागण कह रहे हैं कि अब राजद का जन समर्थन और बढ़ेगा।क्योंकि लालू जी को सपरिवार प्रताडि़त किया जा रहा है।इससे पिछड़ों में नाराजगी है।
पर खुद लालू प्रसाद के दल का पिछला चुनावी इतिहास इस दावे की पुष्टि नहीं करता।
  मुख्य मंत्री बनने के बाद 1990 में लालू प्रसाद ने कहा था कि ‘बिहार की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है।’
पर 1991 के लोक चुनाव में भारी विजय के बाद लालू प्रसाद ने अपनी प्राथमिकता बदल ली।
 बिहार की सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद 2007 में लालू प्रसाद ने अवश्य यह स्वीकार किया था कि ‘चापलूसों से घिरे रहने और धन की भूूख हमें ले डूबी।’
समय -समय पर उन्होंने अपनी गलतियंा सार्वजनिक रूप से स्वीकारी,पर उसे सुधारने की कोशिश नहीं की।
सचमुच धन की भूख नहीं होती तो आज लालू प्रसाद की राज्य भर में मूत्र्तियां लगतीं जितना बड़ा काम उन्होंने पिछड़ों को जगाने के लिए किया ।
 पर अब कानूनी परेशानियों से बचने के लिए उनके और उनके दल के पास भावनात्मक नारे ही बचे हुए हैं जिनका अदालतों पर कोई असर नहीं हो रहा हैं।जांच एजेंसियों को भी प्रभावित करना लालू प्रसाद के लिए मुश्किल है क्योंकि केंद्र में उनके प्रभाव वाली सरकार नहीं है।ं
 हालंाकि नब्बे के दशक में जब चारा घोटाले की जांच शुरू हुई थी  तब केंद्र में लालू प्रसाद के दल की ही सरकार थी।पर वह सरकार भी अदालत के सामने लाचार थी।क्योंकि पटना हाईकोर्ट ने 1996 में चारा घोटाले की सी.बी.आई. से जांच कराने का आदेश दिया और सुप्रीम कोर्ट ने उसी साल उस पर अपनी मुहर लगा दी।
लोकहित याचिका में शामिल सबूतों को देख कर कोर्ट को वैसा आदेश देना पड़ा।
कुछ नमूने यहां पेश हैं।
पशुपालन विभाग का सालाना बजट लगभग 75 करोड़ रुपए का था।पर उसकी जगह जाली बिल के आधार पर करीब सवा दो सौ करोड़ रुपए सरकारी कोषागरों से निकाल लिए गए।
जब कुछ  कोषागारों ने निकासी पर रोक लगायी तो पटना सचिवालय से वित्त विभाग के संयुक्त सचिव और कोषागार निदेशक ने कोषागारों को लिखा कि आप निकासी पर रोक मत लगाइए।
इसके अलावा भी उच्चस्तरीय साजिश के कई सबूत सी.बी.आई.ने अदालत के सामने पेश किए हैं।ऐसे में कोई अदालत कैसा निर्णय कर सकती है ?
 तत्कालीन सी.बी.आई.निदेशक जोगिंदर सिंह के अनुसार ‘तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदर कुमार गुजराल ने चारा घोटाले में आरोपी के प्रति जब नरमी बरतने के लिए मुझसे कहा तो मैंने लिख कर मांगा।पर वह नहीं मिला।’
संभवतः प्रधान मंत्री जानते थे कि जांच हाईकोर्ट की निगरानी में हो रही है,इसलिए लिख कर देना सही नहीं होगा।
जोगिंदर सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त के बारे मंे लिखा है कि ‘ हमें उस समय के गृह मंत्री की भूमिका को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने सी.बी.आई.को मुक्त रूप से काम करने का मौका दिया।
इसके बावजूद सी.बी.आई पर इस मामले में राजनीतिक दबाव  
कभी कम नहीं हुआ।’
  दरअसल अदालत की रोज ब रोज की निगरानी और सबूतों के  भंडार के कारण रांची की अदालत ने चारा घोटाले के एक अन्य मामले में 2013 में भी लालू प्रसाद और डा.जगन्नाथ मिश्र सहित कई आई.ए.एस.अफसरों को भी सजा सुनाई।इस  बार डा.जगन्नाथ मिश्र क्यों और कैसे बरी हो गए,इस बात पर कई लोगों को जरूर आश्चर्य हुआ है।हालांकि इसमें कुछ लोग जातीय तत्व देख रहे हैं,पर उन्हें शायद नहीं मालूम कि संबंधित जज सवर्ण नहीं हैं।
  1997 में लालू प्रसाद जब पहली बार चारा घोटाला के आरोपी के रूप में जेल गए, तभी से उनके दल का जन समर्थन घटने लगा था ।
बिहार विधान सभा के 1995 के चुनाव में जहां लालू प्रसाद के दल को  पूर्ण बहुमत मिल गया था,वहीं सन 2000 के विधान सभा चुनाव में उनका बहुमत समाप्त हो गया।
1991 में ंबिहार के लगभग सारे पिछड़े लालू प्रसाद  के साथ थे।पर वही स्थिति सन 2000 में नहीं रही।उस समय लालू प्रसाद के दल को राज्य में सरकार बनाने के लिए  कांग्रेस का सहारा लेना पड़ा।गठबंधन सरकार बनी थी।
  सन 2005 के विधान सभा चुनाव में राजद के हाथ से बिहार की सत्ता निकल गयी।
2010 के विधान सभा चुनाव में तो लालू प्रसाद और राम विलास पासवान मिल कर लड़े थे।फिर भी उन्हें कुल 243 में से सिर्फ 25 सीटें ही मिलीं।
पर राजद नेताओं को यह उम्मीद है कि जिस तरह लालू परिवार को अब प्रताडि़त किया जा रहा है,उससे पूरी पिछड़ी जातियों में आक्रोश है और इसलिए राजद की ताकत बढ़ेगी।
 इस दावे की परीक्षा किसी अगले चुनाव में ही हो सकेगी।
इस बीच लालू प्रसाद का यदि राजनीतिक अवसान होता है तो एक सवाल तो रह ही जाएगा।
इस सवर्णी धाक की पृष्ठभूमि वाले बिहारी समाज में पिछड़ों के पक्ष में उस तरह मजबूती से  आवाज कौन उठा पाएगा जिस तरह लालू प्रसाद समय -समय पर उठाते रहे हैं।
मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद के अधूरे कामों को काफी  हद तक पूरा किया है।लालू प्रसाद ने यदि सीना तान कर चलना सिखाया तो नीतीश कुमार ने सीने के नीचे वाले पेट में कुछ अन्न के दाने देने शुरू कर दिए।
 पर  कुछ नेता जब समय -समय पर आरक्षण पर पुनर्विचार की जरूरत बताने लगते हैं तो पिछड़ों को लालू प्रसाद की याद आती है।
 ऐसे में सत्ताधारी राजग के नेताओं की जिम्मेदारी बढ़ गयी है।
 उन्हें यह देखना होगा कि सामाजिक न्याय के उनके नारे के साथ कभी कोई धोखाधड़ी नहीं हो। 
@ मेरे इस लेख का संपादित अंश 8 जनवरी 2018 के दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित@
  




     

समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि किसी व्यक्ति  की मूत्र्ति उसके निधन के सौ साल के बाद ही लगनी चाहिए।
क्योंकि, तब तक इतिहास उस व्यक्ति का सही आकलन कर चुका होता है। यह कि उसने देश के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा किया।कितना अच्छा किया और कितना बुरा किया।