ललित नारायण मिश्र की आज पुण्य तिथि है।
1975 में समस्ती पुर में उनकी हत्या कर दी गयी थी।
उनकी हत्या से संबंधित मुकदमा एक ऐसा नमूना मुकदमा है,जो शायद दुनिया के इतिहास में अकेला मामला है।
ललित बाबू जिस दल में थे,उसी दल की सरकार की सी.बी.आई.ने असली हत्यारे को बचा कर किसी और को कोर्ट से सजा दिलवा दी।
जिन्हें लोअर कोर्ट से सजा हुई है,उनके बारे में ललित बाबू ़के भाई डा.जगन्नाथ मिश्र व उनके पुत्र विजय कुमार मिश्र ने कोर्ट में कहा था कि इनसे ललित बाबू की कोई दुश्मनी नहीं थी।@2019@
एक ऐसी पेंशन योजना जिसमें बढ़ोत्तरी
का कोई प्रावधान ही नहीं
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कर्मचारी पेंशन स्कीम, 1995 के तहत मुझे हर माह 1231 रुपए मिलते हैं।
यह राशि 2005 में तय हुई थी जिसमें आज तक कोई परिवत्र्तन नहीं हुआ।
हां, इसे उन लोगों के लिए न्यूनत्तम 1000 रुपए जरूर किया गया जिन्हें उससे भी कम मिलते थे।
संभवतः दुनिया का यह एक मात्र पेंशन स्कीम है जिसमें बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान ही नहीं है।
इस पेंशन के लिए हम कर्मचारियों ने भी अपने सेवाकाल में पेंशन फंड में हर माह आर्थिक योगदान किया है।
यदि योगदान के पैसे हमने सेवा निवृत्ति के समय ही उठा लिए होते तो हम फायदे में रहते या घाटे में ,मैं यह कह नहीं सकता।
कर्मचारी भविष्य निधि पेंशनर्स संघर्ष समिति को 6 दिसंबर 2017 को केंद्रीय श्रम मंत्री ने आश्वासन दिया था कि न्यूनत्तम पेंशन हर माह 7500 रुपए कर देने की आपकी मांग को प्रधान मंत्री के सामने रखा जाएगा।
पर अब तक उस दिशा में क्या हुआ, यह पता नहीं चला।
कुछ माह पहले जदयू के हरिवंश ने भी यह मामला राज्य सभा में मजबूती से उठाया था।
श्रमजीवी पत्रकार सहित देश के गैर सरकारी क्षेत्र के कुल 60 लाख रिटायर कर्मचारी यह पेंशन उठाते हैं।इनमें से 40 लाख कर्मचारियों को हर माह 15 सौ रुपए से भी कम मिलते हैं।
बिहार सरकार ने भी कुछ साल पहले पत्रकार पेंशन योजना शुरू करने की घोषणा की थी।मैंने उसके लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि मैंने बिहार सरकार की कोई सेवा नहीं की है।मैं तो वहीं से बढ़ोत्तरी की मांग करूंगा जहां के पेंशन फंड में मेरा कुछ आर्थिक योगदान हुआ है।
हालांकि बिहार सरकार की पेंशन योजना को मैं गलत नहीं मानता।उससे पत्रकारों को भी राहत मिलती और सरकार को भी यश मिलता।
पर, पता नहीं क्यों वह घोषित योजना वर्षों बाद भी लागू नहीं हो सकी है।सरकारी काम ऐसे ही चलता है !
अब पत्रकारों की स्थिति व उनका योगदान समझिए।
आज का ही अखबार आप देख रहे हैं।हर दिन का अखबार तैयार करने के लिए पत्रकार अपनी पूरी प्रतिभा के साथ रात -दिन खटते हैं ।तभी आपके पढ़ने लायक एक अखबार तैयार होता है ।जिस दिन अखबार नहीं मिलता ,उस दिन पाठकों की बेचैनी देखते बनती है।उन पाठकों में सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेता भी शामिल हैं।
फिर भी श्रमजीवी पत्रकारों की ऐसी उपेक्षा ! !
क्योंकि वे रिटायर हो गए ?
पेंशन में कोई बढ़ोत्तरी तक नहीं ?
कमाल की होती हैं हमारी सरकारें !
मैं तो स्वतंत्र लेखन करके अपने जरूरी खर्चे निकाल लेता हूंं।पर जिन रिटायर पत्रकारों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है या जो यह काम नहीं करना चाहते,उनकी आर्थिक स्थिति पर गौर कीजिए।
मेरा भी तब क्या होगा, जब हाथ-पांव-दिमाग सुस्त पड़ने लगेंगे ?
दिनेश सिंह बिहार के समस्ती पुर जिले के मोहिउद्दीन नगर प्रखंड के चापर गांव के निवासी हैं।यह गांव गंगा नदी के पास है।
उन्होंने सूचित किया है कि चापर में पानी मंे आर्सेनिक की मात्रा बढती़ जा रही है।
जहरीला पानी पीने से लोग मर रहे हैं।
जिस नलकूप की गहराई 150 फीट है,उसके पानी में भी आर्सेनिक है।लोग क्या करें कुछ समझ में नहीं आता।
मोदी सरकार ने बड़ी उम्मीद से अक्तूबर, 2017 में
रोहिणी आयोग का गठन किया था।
रिपोर्ट देने के लिए आयोग को सिर्फ तीन महीने का समय दिया गया था।रपट नहीं आई।
आयोग का कार्यकाल तीन -तीन महीने बढता गया।एक बार तो केंद्र सरकार ने कह दिया था कि अब अवधि विस्तार नहीं होगा।पर हो गया।अब मई में रिपोर्ट आएगी।
ताजा खबर है कि आयोग देशव्यापी सर्वे करेगा।
यानी अब अंतिम रपट आने में वर्षों लग सकते हैं।
मोदी सरकार चाहती थी कि आयोग की रपट को आधार बना कर 27 प्रतिशत पिछड़ा आरक्षण को तीन हिस्सों में बांट दिया जाए ताकि अति पिछड़ों के वोट राजग के लिए पक्का हो जाए।
पर लगता है कि आयोग ने ऐसा नहीं होने दिया।
आयोग केंद्र सरकार ,लोक उपक्रम और केंद्रीय विश्व विद्यालयों में आरक्षण कोटे के तहत बहाल विभिन्न पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व का आंकड़ा जुटा लिया है।उस आधार पर वह अंतरिम रपट दे सकता था।
अंतरिम रपट के आधार पर केंद्र अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कर सकती थी।
पर लगता है कि अब वह नहीं हो पाएगा।
यदि मोदी सरकार अगले चुनाव के बाद सत्ता में नहीं लौट पाएगी तो भाजपा के कई नेता उसके लिए आयोग के काम काज में ढिलाई को जिम्मेदार मान सकते हैं।
इस देश की निचली अदालतों में 140 मुकदमे 60 साल से अधिक समय से लंबित हैं।आज के टाइम्स आॅफ इंडिया की यह लीड खबर है।
नेशनल जूडिशियल डाटा ग्रिड के रिकाॅर्ड के अनुसार हजारों मुकदमे 40-50 साल से पेंडिंग हैं।
वैसे गत जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 3 करोड़ 30 लाख मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं।
यह आंकड़ा देख कर अस्सी के दशक की एक बात याद आ गयी।
तब मैं दैनिक ‘आज’ अखबार में काम करता था।
न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ माइकल टी.काॅफमैन पटना आए थे।
उनसे मेरी लंबी बातचीत हुई थी।मैंने उनसे पूछा कि अमेरिका के लोग हिन्दुस्तान के बारे में क्या सोचते हैं ?
उन्होंने कहा कि कुछ नहीं सोचते।सोचने की फुर्सत कहां ?
मैंने जिद की।कुछ लोग तो एशिया के इस इलाके के विशेषज्ञ
होंगे।
शायद वे कुछ सोचते होंगे,कुछ विचार रखते होंगे !
उन्होंने कहा कि हां,सोचते हैं,पर मैं नहीं बताऊंगा।आपको बुरा लगेगा।
मैंने कहा कि मुझे तनिक बुरा नहीं लगेगा।
काॅफमैन ने कहा कि यह सोचते हैं कि भारत के एक तिहाई लोग कचहरियों में रहते हैं।अन्य एक तिहाई अस्पतालों में रहते हैंं।बाकी एक तिहाई मनमौजी हैं।
@मैं उन दिनों और भी दुबला-पतला था।@
आप मेरे देश में होते तो हम पहला काम यही करते कि नजदीक के किसी अस्पताल में आपको भर्ती करा देते ।
माइकल का 2010 में निधन हो गया।यदि आज होते तो भी यही बात कहते।
दरअसल हमारे अधिकतर हुक्मरानों को ऐसी मूल समस्याओं की जगह दूसरी ही बातों से मतलब रहता है।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने एक पत्रकार मित्र को यह लिख भेजा है,
‘हालांकि हम दोनों समाजवादी पृष्ठभूमि वाले हैं,पर हमारे पुराने मित्र नाराज या नाखुश होते हैं जब हम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की बीच -बीच में प्रशंसा अथवा समर्थन करते हैं।
उनको मेरा एक ही जवाब होता है कि हम यह सिर्फ मेरिट के आधार पर करते हैं।अगर सरकार कुछ अच्छा करती है तो कुछ प्रशंसा और गलत फैसलों की आलोचना भी करते हैं।आप भी मुझसे इस पर सहमत होंगे।’
यह पढ़कर मुझे राजेंद्र माथुर की याद आ गयी।
उन्होंने मुझसे 1983 में कहा था कि ‘आप इंदिरा गांधी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबर लाइए,मैं उसे छापूंगा।पर इंदिरा जी में कई अच्छाइयां भी हैं।मैं उन्हें भी छापूंगा।’
मेरा मानना है कि पत्रकारिता की दृष्टि से माथुर साहब की इस बात को आदर्श माना जाना चाहिए।
मेरी राय में पत्रकार को चाहिए कि वह मोदी के पक्ष या विपक्ष में जाने वाली हर तरह की सूचनाएं आम लोगों तक पहुंचाए ।वैसे इस बात का ध्यान रहे कि जो कुछ आप लिख रहे हैं,उसके सबूत आपके पास होने चाहिए।
आम लोग सही समय पर खुद सही-गलत का निर्णय कर लेंगे।
हर पत्रकार भी एक मतदाता होता है।वह भी वोट देता है।मेरी राय में किसी भी मतदाता को यह देखना चाहिए कि देश व आम लोगों के सामने फिलहाल सबसे बड़ी दो या तीन भीषण समस्याएं कौन -कौन सी हैं।उन समस्याओं के हल में कौन सी पार्टी सबसे अधिक कारगर साबित हो सकती है ।वे उसे ही वोट दे।
1.-नवाज शरीफ को विदेश में संपत्ति बनाने के आरोप में पाकिस्तान की अदालत ने सात साल की सजा दी।वहां की जनता ने उनकी पार्टी को चुनाव में हरा दिया।
2.- खालिदा जिया के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो बंाग्ला देश की अदालत ने भी उन्हें सात साल की सजा दी।
उनके पुत्र पर भी विदेश में एक बिलियन डालर जमा करने का आरोप है।बांग्ला देश की जनता ने भी खालिदा जिया की पार्टी को चुनाव में हरा दिया।
3.- अपने देश में भी कुछ महीने के बाद चुनाव होने वाला है।देखना है कि यहां की जनता भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कैसा रुख अपनानी है।वैसे कई लोग यह कहते हैं कि पड़ोसी देशों की अपेक्षा हमारे यहां अधिक जीवंत लोकतंत्र है।