इसे जरूर पढ़ लीजिए
....................................
‘‘............चीन के झेजांग प्रांत की 20 वर्षीया जियाओ माओ की खांसते वक्त 10 पसलियां टूट गईं।
डाक्टरी जांच से पता चला कि माओ हद से ज्यादा सनक्रीन लगाती रही और इस वजह से उनके शरीर को पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिल पाया।
इससे उनकी हड्डियां कमजोेर हो गईं और पसलियां भी टूट गईं।
यह चैंकानेवाला है।आखिर सूर्य से इतना डर क्यों ?...................’’
--डा.नेहा पंत,
क्लिनिकल साइकोलाॅजिस्ट
हिन्दुस्तान--फुरसत-12 जनवरी 2020
राजदीप,सोहराबुद्दीन और माफीनामा
...................................
इस राजदीप सरदेसाई प्रकरण से असावधान
मीडिया को नसीहत लेनी चाहिए।
राजदीप ने सोहराबुद्दीन प्रकरण को लेकर एक
खबर दी, आरोप लगाया।
पर केस होने पर उसे वह साबित नहीं कर सके।
नतीजतन राजदीप को माफी मांगनी पड़ी।
ऐसी स्थिति से एक बार मुझे
भी गुजरना पड़ा है।
पत्रकारिता के वे मेरे प्रारंभिक साल थे।
जिस सज्जन ने मुझसे माफी मंगवाई,उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि आपने एक शब्द भी गलत नहीं लिखा है।
पर मेरे खिलाफ आपके पास एक आरोप का भी सबूत नहीं है।
मैं तब से लिखने में सावधान हो गया।उस सज्जन के प्रति गुस्सा के बदले मेरे दिल में सम्मान है।उन्होंने मुझे राह दिखाई।
आज भी यदि मेरे पास सबूत नहीं होता तो अपने फेसबुक वाल पर भी ,जिसका मैं ही लेखक -सह-संपादक होता हूंं-किसी का नाम तक नहीं लिखता।
राजदीप सरदेसाई का झुकाव-रुझान जगजाहिर है।
उससे किसी को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए।
हां,तथ्य सही हो,किसी पत्रकार से इसकी मांग स्वाभाविक है।
मैं सरदेसाई से कभी मिला नहीं।
कोई परिचय नहीं।
इसकी कोई जरूरत भी नहीं।
पर वैसे कुछ अन्य पत्रकारों सेे उन्हें मैं बेहतर मानता हूंं जो बिलकुल एकतरफा हैं।
इस मामले में मैं राजदीप का प्रशंसक हूं कि पिछले कई विधान सभा चुनावों के दौरान उनकी भविष्यवाणियां सही साबित हुईं।
उन्होंने अपने स्वाभाविक रुझान से अलग हट कर भविष्यवाणी की थी।
मोदी-शाह या किसी अन्य को नापसंद या पसंद करना किसी पत्रकार का भी संवैधानिक अधिकार है।
पर यदि आप किसी नेता को नापंसद करते हैं तो उसके खिलाफ कुछ लिखने से पहले अपेक्षाकृत अधिक सावधानी बरतें और पहले ही पूरा सबूत जुटा लें।
सोशल मीडिया पर तो इन दिनों भारी अराजकता है।
जो लोग जिम्मेदार व्यक्ति हैं ,वे सोशल मीडिया पर बस एक ही बात का ध्यान रख सकते हैं।
जो बातें आम प्रसार वाले अखबारों में नहीं छप सकतीं, या नहीं छपतीं, वैसी बातें सोशल मीडिया में कत्तई न लिखें।
सोशल मीडिया आम लोगों के लिए बहुत बड़ा साधन है,वैसे लोगों के लिए खास तौर पर जिनकी आम मीडिया तक पहुंच नहीं है।
इसकी रक्षा करें। यानी ,इसका सिर्फ सदुपयोग ही करें।
सुरेंद्र किशोर--13 जनवरी 2020
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केरल के कोच्चि में प्रशासन ने दो बहुमंजिली इमारतें गिरा दीं।
इमारतें अवैध ढंग से बनाई गईं थीं।
इस देश-प्रदेश में न जाने कितनी अवैध इमारतें अब भी खड़ी हैं।
जाहिर है कि ऐसा गैर कानूनी काम शासन को नजराना-शुकराना देकर ही संभव है।
यदि ऐसी सारी इमारतेंं कोच्चि की तरह ही ध्वस्त होने लगें
तो कानून तोड़कों और अन्य क्षेत्रों के छोटे- बड़े अपराधियों पर भी अंकुश लगने का माहौल बनेगा।
...सुरेंद्र किशोर-13 जनवरी 2020
--अभेद्य सीमा के बिना देश की सुरक्षा कैसे ?--
नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान और बांग्ला देश से लगी
7419 किलोमीटर भारतीय सीमा पर अभेद्य बाड़ लगाने का काम श्ुारू कर दिया है।
पहले की घेराबंदी में कुछ जगह स्थिति ऐसी जर्जर है कि हल्के धक्के से ही वह ध्वस्त हो जा सकती है।
घेराबंदी का काम आरलैंड की एक कंपनी को दिया गया है।
प्रति किलोमीटर 1.99 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
पर नेपाल सीमा पर घुसपैठियों को कैसे रोका जाए,इस संबंध में सरकार की ओर से अभी कोई स्पष्टता नहीं है।
यह चिंताजनक बात है।
आजादी के तत्काल बाद से ही मजबूत घेराबंदी का यह काम सरकार को करना चाहिए था।
पर ‘‘अपनी खास दुनिया’’ में जी रही तब की सरकार तो कहती थी कि बाड़ लगाने से दुनिया के सामने हमारे देश की छवि खराब हो जाएगी।
पर छवि कौन कहे,देश की ही स्थिति ही जब खराब होने लगी तो कुछ दशक पहले बड़े पैमाने पर बाड़ लगाने का काम शुरू हुआ।
पर मजबूती का ध्यान नहीं रखा गया।
उन दिनों अपुष्ट चर्चा यह भी थी कि लोहे के खम्भे की ऊंचाई थोड़ी कम करवा कर कुछ प्रभावशाली लोगों ने खुद को मालामाल कर लिया था।
अब जो अभेद्य घेराबंंदी होनी है, वह छ्रिद्रदार जंगरोधक स्टील से होगी।
उसे पार पाना दुश्मनों के लिए मुश्किल होगा।
अभेद्य सीमा के बिना देश की सुरक्षा कैसे ?
बाहरी घुसपैठियों को रोक देने से भीतर के घातियों से भी निपट लेना सरकार के लिए आसान हो जाएगा।
---सुरेंद्र किशोर--11 जनवरी 2020
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह देश की अदालतों की सुरक्षा के लिए वहां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल तैनात करने की व्यवस्था करे।
दिल्ली की एक अदालत में गत नवंबर में भारी उपद्रव हुआ था।
पुलिस और वकील आमने-सामने थे।
उसी घटना को ध्यान में रखते
हुए सबसे बड़ी अदालत को ऐसी सलाह देनी पड़ी है।
घटना दिल्ली की तीस हजारी अदालत में हुई थी।
खैर तीस हजारी कोर्ट जैसी घटना तो बहुत कम ही होती है।पर इस देश की अनेक अदालत परिसरों से हिंसा की खबरें आती रहती हैं।
बिहार भी इस मामले में पीछे नहीं है।
कहीं विचाराधीन कैदी की हत्या हो जाती है तो कहीं गवाह की।
कहीं -कहीं हाजतों से कैदी भगा लिए जाते हैं।
कहीं -कहीं तो सरेआम गवाहों को धमकाया जाता है।
ऐसी घटनाओं में आम तौर पर स्थानीय पुलिस की साठगांठ या कमजोरी पाई जाती है।
ऐसे में न्याय का शासन कायम करने में दिक्कतें आती हैं।
याद रहे कि सी.आई.एस.एफ.की ट्रेनिंग कुछ खास तरह की होती है।
उस बल के बारे में सुप्रीम कोर्ट का यह आकलन सही है
कि सी.आई.एस.एफ.विपरीत परिस्थितियों में बेहतर काम कर सकता है।
--मुकदमा नीति का अनुपालन नहीं
होने से मुकदमों का अंबार--
पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रशिक्षण पूरा होने की तारीख से ही शिक्षकों को प्रशिक्षित वेतनमान मिलना चाहिए।
संभवतः हाईकोर्ट का इससे पहले भी ऐसा निर्णय आ चुका है।
पर शासन तंत्र इसे आम तौर पर लागू नहीं करता।
जिस व्यक्ति के बारे में निर्णय होता है,उसे लागू कर के शासन तंत्र अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर देता है।
जबकि बिहार सरकार की मुकदमा नीति कहती है कि ऐसे अन्य मामलों में भी अदालत के निर्णय को लागू कर दिया जाना चाहिए।
यानी किसी एक मामले में निर्णय आने के बाद उस तरह के अन्य मामलों के पीडि़तों को भी सरकार राहत दे दे।
पर यह आम तौर पर नीति लागू नहीं होती। क्यों नहीं लागू होती,इसका कारण सब जानते हैं।
नतीजतन एक ही तरह के मामले में राहत पाने के लिए अनेक लोगों को अलग अलग हाईकोर्ट जाना पड़ता है।
अदालतों में मुकदमों का अंबार लगने का यह भी एक बड़ा कारण है।
ऐसे मामले में तो शासन को चाहिए कि वह अखबारों में विज्ञापन देकर लोगों को यह सूचित करे कि जिनको
इस निर्णय के तहत राहत चाहिए,वे फलां अफसर से मिलें।
--सतर्क हो जाने का समय--
पिछले महीने दिल्ली के सीमापुरी मुहल्ले में संशोधित नागरिकता कानून विरोधी लोगों की हिंसक भीड़ ने भारी
हिंसा की।
उस सिलसिले में हाल में 7 लोग पकड़े गए हैं।
उनमें दो विदेशी हैं।
पर उन लोगों ने यहां की नागरिकता से संबंधित सारे कागजात गलत ढंग से बनवा लिए हैं।
यानी,अब सवाल यह है कि इस देश के अनेक सरकारी दफ्तरों में पैसे देकर कोई भी राष्ट्रद्रोही विदेशी नागरिक कोई भी जाली कागजात यहां बनवा सकता है ?समय आने पर खुद को भारतीय नागरिक साबित कर सकता है।
केंद्र और राज्य सरकारों को इस समस्या पर मंथन करना चाहिए।
ऐसे जालसाजी मामले में फंसे सरकारी कर्मियों के खिलाफ यदि राष्ट्रद्रोह का केस चले तो शायद स्थिति बदले।
साथ ही खुफिया पुलिस की संख्या भी बढ़ानी होगी।
उस महकमे पर अधिक खर्च करना पड़ेगा।
अन्यथा, एक दिन इस देश को पछताना पड़ेगा।
--बढ़ते हत्यारे और घटते जल्लाद--
सन 1947 में विभिन्न आरोपों के तहत सिर्फ उत्तर
प्रदेश में 354 लोगों को फांसी दी गई थी।
पर 2018 में पूरे देश में सिर्फ 162 लोगों को ही फांसी की सजा दी गई।
कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि 1947 के मुकाबले आज हर तरह का अपराध बढ़ा है।
फिर सजाएं पहले से भी कम क्यों ?
जबकि, इस देश की आबादी इस बीच बेशुमार बढ़ चुकी है।
भ्रष्टाचार इस देश की सबसे बड़ी समस्याओं में एक है।
चीन में भ्रष्टाचार के आरोप में फांसी की सजा का प्रावधान है।
जब चीन जैसे कड़े शासन वाले देश में भ्रष्टाचार के लिए इतनी बड़ी सजा के प्रावधान की जरूरत है ,तब तो भारत में इसकी और अधिक जरूरत होनी चाहिए।
क्योंकि यह तो एक ढीले -ढाले शासन वाला देश है।
-- और अंत में--
किसी ने फीस बढ़ोत्तरी के विरोध में जारी अपने आंदोलन को प्रभावकारी बनाने के लिए एक विश्वविद्यालय के कम्प्यूटर के सर्वर को तोड़ डाला ।
वहां कुछ अन्य लोगों रजिस्ट्रेशन व पढ़ाई के पक्ष में खड़े होकर अपने ढंग से कानून तोड़ा।
यदि आप लोगों ने कानून तोड़ा तो उसके लिए निर्धारित सजा भुगतने के लिए भी तैयार रहिए।
आजादी की लड़ाई में गांधी जी यदि कानून तोड़ते थे तो सजा पाने के लिए भी सदा तत्पर रहते थे।
जो लोग इन दिनों संविधान व कानून की रक्षा के पक्ष में देश भर में जोरदार नारे लगाते फिर रहे हैं,वे भी उन कानून तोड़कों से कहें कि यदि कानून का राज रहेगा तभी तो संविधान की भी रक्षा हो पाएगी ?
.............................................
कानोंकान-प्रभात खबर-पटना-10 जनवरी 2020
जिस देश में एक सांसद के इधर से उधर हो जाने पर
केंद्र सरकार गिर जाती है।
सन 1999 में अटल सरकार एक वोट से गिर गई थी।
वहां अब कई लोक सभा चुनाव क्षेत्रों की हालत ऐसी बना दी गई है जहां का चुनाव परिणाम बंगलादेशी घुसपैठिए तय करते हैं।ऐसा ही रहा तो ऐसे चुनाव क्षेत्रों की संख्या बढ़ सकती है।
इसके बावजूद हारा हुआ प्रतिपक्ष राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनने नहीं दे रहा है।
और, भारी बहुमत से चुनी हुई सरकार बेबस नजर आ रही है।
नागरिक रजिस्टर बंगला देश में भी है और पाक में भी।
पर यहां इसलिए रजिस्टर नहीं होगा क्योंकि इस देश के साथ कुछ लोगों को अभी कुछ खास सलूक करना है।
उनके अनुसार यह देश नहीं धर्मशाला है।
इस देश का भगवान ही मालिक है।
नब्बे के दशक में पूर्वोत्तर बिहार के एक लोक सभा उम्मीदवार
के साथ उसके चुनाव क्षेत्र में मैं भ्रमण कर रहा था।तब मैं ‘जनसत्ता’ में था।
खेतों में ताजी फूस से बनी झोपडि़यों से हम गुजर रहे थे।
अनगिनत झोपडि़यां थीं।
उनमें बंगला देशी घुसपैठियों को लाकर बसाया गया था।
सेक्युलर दल का उम्मीदवार घूम -घूम कर उनसे सिर्फ यही कह रहा था कि ‘‘आप लोग चिंता मत कीजिए।यहां से आपको कोई नहीं भगाएगा।’
---सुरेंद्र किशोर--10 जनवरी 2020
पाक से लौटना पड़ा था सज्जाद जहीर को
.......................................................
सज्जाद जहीर उत्तर प्रदेश के एक अच्छे खानदान से आते थे।
उनके पिता न्यायाधीश थे।
फिर भी उन्होंने संघर्ष का जीवन अपनाया।
आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
कम्युनिस्ट बने।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।
भारत के बंटवारे के बाद सी.पी.आई.ने इस प्रमुख कम्युनिस्ट नेता सज्जाद जहीर को पाकिस्तान भेजा ताकि वहां बेहतर ढंग से पार्टी का काम हो सके।
पर, वहां जाकर जहीर को निराशा हुई।
वहां उनके काम करने का कोई माहौल ही नहीं था।
उन्हें 1951 में पाक सरकार ने जेल में डाल दिया।
किसी तरह छूटे और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की मदद से 1954 में भारत लौट आए।
1973 में उनका निधन हो गया।
याद रहे कि फिल्म अभिनेता राज बब्बर की पहली शादी सज्जाद जहीर की बेटी नादिरा से हुई।
यानी नादिरा का जन्म एक ऐसे सेक्युलर व प्रगतिशील माहौल में हुआ था कि उन्हें राज बब्बर से शादी करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
ऐसे सेक्युलर नेता की पाकिस्तान में भला क्या जरूरत !!
7 जनवरी 2020