रविवार, 31 जनवरी 2021

     हामिद अंसारी का सेक्युलरिज्म

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पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा है कि वह सेक्युलरिज्म मौजूदा सरकार के शब्दकोश में नहीं है जो 2014 से पहले की केंद्र सरकार के शब्दकोश में था।  

  क्या हामिद अंसारी और कांग्रेस का सेक्युलरिज्म,पी.एफ.आई.के सेक्युलरिज्म से मेल खाता है ?

यदि ऐसा नहीं है तो पूर्व उप राष्ट्रपति अंसारी पी.एफ.आई.की महिला शाखा के समारोह में शामिल होने के लिए सितंबर, 2017 में कोझीकोड क्यों गए थे ?

  पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.का गत कर्नाटका विधान सभा चुनाव में कांग्रेस से तालमेल क्यों हुआ था।

क्या पी.एफ.आई.सेक्युलर संगठन है ?

  केरल सरकार ने  24 दिसंबर, 2012 को हाईकोर्ट से कहा कि सिमी का ही नया रूप पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया है।

  याद रहे कि यह आरोप है कि गत साल दिल्ली व उत्तर प्रदेश में भीषण दंगे कराने में पी.एफ.आई.का हाथ था।.

    सिमी के बारे में जानिए।

 उस संगठन के अहमदाबाद जोन के सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में  मीडिया से  बातचीत  में कहा था कि

 ‘जब हम भारत में सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’

सिमी के एक दूसरे नेता ने मीडिया से कहा था कि लोकतांत्रिक तरीके से भारत में इस्लामिक शासन संभव नहीं है।इसलिए हमारा  एकमात्र रास्ता जेहाद है।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार सन 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया था।

बाद की मनमोहन सरकार ने भी उस पर प्रतिबंध जारी रखा।क्योंकि खुफिया रपट ही वैसी थी।

प्रतिबंध के खिलाफ कांग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सुप्रीम कोर्ट में सिमी के वकील थे।

  इस देश के अधिकतर तथाकथित ‘सेक्युलर’ दलों ने समय -समय पर सार्वजनिक रूप से सिमी का बचाव किया।

  नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता दूसरा सबसे बड़ा कारण यही था।

सबसे बड़ा कारण मनमोहन सरकार का भीषण भ्रष्टाचार था।

यदि कांग्रेस सरकारों ने आम मुसलमानों के कल्याण के लिए काम किए होते तो उसकी वैसी चुनावी दर्गति नहीं होती।

पर उसने मुसलमानों के बीच के जेहादी तत्वों का हमेशा साथ दिया।   

    अब समझ गए न कि हामिद अंसारी का सेक्युलरिज्म कैसा है ?

क्या हामिद ने कभी सिमी,पी.एफ.आई.या जेहादी तत्वों  का विरोध किया ?

 अन्य धर्मो के अतिवादी तत्वों की खूब आलोचना कीजिए।

 पर जरा जेहादियों के खिलाफ भी तो कुछ बोलिए।

यदि नहीं तो कांग्रेस व हामिद अंसी जैसे लोगों व बुद्धिजीवियों का कोई भविष्य नहीं है।

वे लगातार हाशिए पर पहुंचते रहेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर --31 जनवरी 21 




बुधवार, 27 जनवरी 2021

 तथाकथित किसान आंदोलन का घिनैाना रूप

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शर्म करो किसान नेताओ !

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चेतावनी के बावजूद अपने बीच से विध्वंसक तत्वों को निकाल बाहर नहीं किया

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किसानों की नेतागिरी छोड़ो या आज के विध्वंसक हिंसक तत्वों के खिलाफ गवाही दो 

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--सुरेंद्र किशोर--

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1.-खालिस्तानी तत्व-नक्सली तत्व-पाक समर्थक तत्व-आढतिए और मंडी के दलाल-वे दल जिनके नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं आदि ने मिलकर दिल्ली को आज बंधक बना लिया।

2.-इससे पहले गत साल जेहादी संगठन पी.एफ.आई.ने विदेशी पैसे के बल पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में भीषण दंगे करवाए थे।

3.-आने वाले दिनों में जब सी.ए.ए.-एन.आर.सी.लागू करने की 

कोशिश केंद्र सरकार करेगी तो जेहादी तत्व एक बार फिर देश में आग लगाने की कोशिश करेंगे।

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प्रतिपक्ष में जो भी जिम्मेदार व देशभक्त तत्व हैं, जो पाक या चीन समर्थक नहीं हैं,उनसे मिलकर सत्ता दल इस बात पर विचार करे कि देश को कोई बंधक बनाना चाहे तो सरकार को क्या करना चाहिए ?

प्रतिपक्ष यदि साथ न दे तो भी सरकार को चाहिए कि वह बंधक बनाने वाले तत्वों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करे चाहे उसका जो भी नतीजा हो।

  जब देश बचेगा तभी तो लोकतंत्र, दल व लोग बचेंगे !

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--सुरेंद्र किशोर-26 जनवरी 21

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मंगलवार, 26 जनवरी 2021

      नाम को नहीं,काम को मिला सम्मान !

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 नरेंद्र मोदी के शासनकाल में पद्म सम्मानों की गरिमा 

स्थापित होने लगी है।

बिहार से सम्मानितों की सूची को देख कर लगा कि नाम को नहीं बल्कि काम को सम्मान मिला है।

5 सम्मानितों में से तीन का मैंने पहली बार नाम सुना है।

मैंने नहीं सुना तो इसका मतलब यह नहीं कि उनके काम -योगदान सराहनीय नहीं रहे।

हां, वे प्रचार से दूर रहकर अपने काम में लगे रहे।

  पर इस सम्मान की गरिमा तब पूरी तरह स्थापित होगी जब उन लोगों को यह सम्मान नहीं मिलेगा जिन्होंने राजनीति में घृणित अपराधियों व कू्रर माफियाओं को स्थापित किया है।

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कई दशक पहले की बात है।

एक नामी व्यक्ति को पहले पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय हुआ था।

पर पता चला कि उस हस्ती ने 16 लाख रुपए खर्च करके पद्म भूषण हथिया लिया।

ऐसे ही मामलों को जान-सुनकर एक बार खुशवंत सिंह ने कहा था कि 

‘‘पद्म सम्मान देने के आधार क्या हैं,मैं आज तक जान नहीं पाया।’’

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--सुरेंद्र किशोर-26 जनवरी 21   

   


   दिल्ली में हुड़दंग,हिंसा और टकराव

यह सरकार द्रोह नहीं बल्कि देशद्रोह है।

  आंदोलनकारियों को न तो संसद पर भरोसा है

 और न सुप्रीम कोर्ट पर 

इन्हें अहिंसा में भी विश्वास नहीं हैं

फिर इनसे सरकार कैसे निपटे !

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--सुरेंद्र किशोर-

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भारत की संसद ने गत साल तीन कृषि कानून पास किए।

तीन-चार राज्यों के कुछ किसानों को ये कानून पसंद नहीं हैं।

वे आंदोलनरत-धरनारत हैं।

अब तो हिंसक हो उठे हैं।

   केंद्र सरकार उन कानूनों को रद करने की मांग नहीं मांन रही है।

क्योंकि इन कानूनों के जरिए देश के किसानों की आय दुगुनी होनी है।

किसानों के आंदोलन को आढतियों व बिचैलियों का आंदोलन बताया जा रहा है।

उनमें कुछ देशद्रोही तत्व घुस गए हैं।

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कृषि कानून विरोधी किसानों को कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए था।

कोर्ट से उन्हें मांग करनी चाहिए थी कि वह कानून को रद करे।

  पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास नहीं है।

 यदि कृषि कानून देश के किसानों के खिलाफ है तो किसानों व उनके नेताओं को चाहिए था कि वे 2024 के लोक सभा चुनाव का इंतजार करते

जो सरकार किसान विरोधी होगी, वह चुनाव नहीं जीत पाएगी।

  पर आंदोलनकारी यह जानते हैं कि तीन राज्यों को छोड़कर देश के अधिकतर किसान कानून के पक्ष में हैं।

इसलिए कृषि कानून विरोधी किसान व उनके नेता आज दिल्ली की सड़कों पर पुलिस से ‘युद्ध’ कर रहे हैं।

 युद्ध का मुकाबला केंद्र सरकार को युद्ध से दे 

ही देने को मजबूर होना पड़ेगा।

दरअसल किसानों के बीच कुछ ऐसे देशद्रोही तत्व घुस गए हैं जो इस आंदोलन के जरिए कोई अन्य लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं।

   उनके उद्देश्यों का पता परंपरागत किसान नेताओं को पहले से ही था।

इसलिए उन्हें आंदोलन फिलहाल स्थगित कर देना चाहिए था।

पर उन्होंने ऐसा न करके खुद को गैर जिम्मेदार नेता साबित किया है।

  पता नहीं आज का हिंसक आंदोलन कौन सा रूप ग्रहण करेगा।

 किंतु अंततःकेंद्र सरकार को तत्काल उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके उन्हें ठंडा करना पड़ेगा।

बाद में उन पर देशद्रेाह का मुुकदमा कायम करना होगा।

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--सुरेंद्र किशोर-

26 जनवरी, 21  


शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

 बाबू जी की पुण्य तिथि पर

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा (जमशेद पुर में बस गए हैं) उनके बारे में कहते थे कि मेरे बहनाई शेर हैं।

  स्वाभाविक ही है कि उनके जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायाण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

  बाबूजी का 19 जनवरी 1986 को निधन हो गया।

मेरी बेटी अमृता ने फेसबुक पर आज उन्हें पहले याद किया।

बाद में मैं।

  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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 डिजिटल प्लेटफार्म के लिए भी फिल्म सेंसर बोर्ड जैसी व्यवस्था अब जरूरी-सुरेंद्र किशोर

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इस देश के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड ने 

प्रमाण पत्र देने के कुछ नियम बहुत पहले से तय कर रखे हैं।

ऐसा माना जाता रहा है कि जो फिल्म उन नियमों पर खरी उतरेगी,उसे ही पास किया जाएगा।

   कई दशक पहले तक तो इसका आम तौर से पालन होता था।

नतीजनत ,तब ऐसी फिल्में बनती थीं जिन्हें लोग सपरिवार देख सकते थे।यानी साफ-सुथरी और शालीन।शिक्षाप्रद व प्रेरक भी। 

 पर आज स्थिति बदल चुकी है।

आज उन नियमों का व्यवहार में इसका कितना पालन होता है,यह जांच का विषय है।

  डिजिटल प्लेटफार्म के लिए तो अभी ऐसा कोई नियम बना ही नहीं।

नतीजतन वाणी की स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया में भारी अराजकता है। 

सेंसर बोर्ड का एक नियम यह है कि ‘‘जातिगत,धार्मिक या अन्य समूहों के लिए अवमाननापूर्ण दृश्य नहीं प्रदर्शित किए जाएंगे।

साथ ही अवमाननापूर्ण शब्द भी उच्चारित नहीं किए जाएंगे।’’

   चूंकि वेब सिरिज ‘‘तांडव’’ किसी सेंसरशिप प्रक्रिया से नहीं गुजरा,इसलिए तांडव जन भावना को गलत ढंग से उभारने वाला साबित हुआ है।यह चिंताजनक स्थिति है।

क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर तांडव के आपत्तिजनक दृश्यों-शब्दों का बचाव भी हो रहा है।

तांडव पर आपत्ति करने वालों का गुस्सा इसलिए बढ़ गया है क्योंकि तांडव का बचाव करने वाले लोग इसी तरीके से किसी अन्य समुदाय की भावना पर चोट पहुंचने पर विभिन्न मंचों से जोर -जोर से चिल्लाने लगते हैं।

  हां, यहां एक बात कहनी जरूरी है।

ओवर द टाॅप प्लेटफार्म यानी ओटीटी पर नकेल कसने के लिए

जो भी बोर्ड या समिति  बने उसे उस तरह न संचाालित किया जाए जिस तरह लुंजपुज तरीके से मौजूदा फिल्म सेंसर बोर्ड को चलाया जा रहा है। 

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फिल्म सेंसर बोर्ड की 

विवादास्पद कार्य प्रणाली 

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‘तांडव’ के बहाने फिल्म सेंसर बोर्ड पर एक बार फिर  सरसरी नजर डालने की जरूरत है।

इन दिनों की अधिकतर फिल्में सेंसर बोर्ड के अपने ही नियमों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

 मेरे सामने बोर्ड के करीब एक दर्जन नियमों की एक लिस्ट है।

 उसे जब मैं देखता हूं तो ऐसा लगता है कि बोर्ड अपना काम नहीं कर रहा है।

 या तो वहां अब भी भ्रष्टाचार है या फिर किन्हीं माफियाओं का उस पर भारी असर है।

  नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद लगा था कि बोर्ड की स्थिति में फर्क आएगा।

किंतु लगता है कि अन्य अधिक जरूरी कामों के दबाव में केंद्र सरकार को उस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं है।

2014 के अगस्त में सेंसर बोर्ड के सी.इ.ओ.राकेश कुमार को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

गिरफ्तारी के बाद राकेश कुमार ने यह रहस्योद्घाटन किया था कि बड़ी -बड़ी फिल्मों को भी बोर्ड में चढ़ावा देना पड़ा था।

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    सेंसर नियमों की बानगी

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 1.-मानवीय संवेदनाओं को चोट पहुंचाने वाली अशिष्टता,अश्लीलता और दुराचारिता वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

2.-अपराध करने के लिए प्रेरित करने वाले दृश्य न दिखाए जाएं।

अपराधियों की कार्य प्रणाली न दिखाई जाए।

3.-महिलाओं को बदनाम करने वाला कोई भी दृश्य न दिखाया जाए।

 किसी भी प्रकार से महिलाओं का तिरस्कार करने वाला दृश्य न दिखाया जाए।

4.-उत्पीड़न या लैंगिक हिंसा के दृश्य न दिखाए जाएं।

यदि जरूरी हो तो अत्यंत संक्षेप में दिखाया जाए।

5.-हिंसा को उचित ठहराने वाले दृश्य फिल्म में न हों।

सेंसर बोर्ड के इस तरह के अन्य कई नियम व कसौटियां हैं।

फिर भी क्या उनका पालन आज की फिल्मों में हो रहा है ?

पचास-साठ के दशकों में पालन जरूर होता था।

तब लोग परिवार के साथ भी फिल्में देखा करते थे।

आज की कितनी फिल्मों को परिवार के साथ देखा जा सकता है ?

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  यू.पी.में फिल्म सिटी का निर्माण शुरू

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इस बीच यह अच्छी खबर आई है कि गौतम बुद्ध नगर में 

प्रस्तावित फिल्म सिटी का निर्माण कार्य शुरू हो गया है।

इस साल वहां फिल्मों की शूटिंग भी शुरू कर देने की योजना है।

यदि योजनानुसार काम चला तो वहां एक दिन देश की सबसे

 बड़ी फिल्म सिटी बनेगी। 

  ऐसे में सेंसर बोर्ड का मुख्यालय इसी प्रस्तावित फिल्म सिटी में रखा जाना चाहिए।

इससे मुम्बई के विवादास्पद लोगों के हाथों में सेंसर बोर्ड की  

नकेल नहीं रहेगी।

फिल्मी दुनिया पर से निहितस्वार्थी तत्वों का एकाधिकार समाप्त हो जाएगा।

  वैसे सेंसर बोर्ड में ऐसे लोगों को रखा जाना जरूरी है जो नियमों के अनुसार काम करने के अभ्यस्त हों।

देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है।

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  गन्ना किसानों की परेशानी 

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बिहार के सीतामढ़ी जिले की रीगा चीनी मिल गत मई 

से बंद है।

मजदूर और किसान परेशान हैं।

आसपास के गन्ना किसानों से कहा गया है कि वे गोपालगंज ,सिधवलिया और मझौलिया चीनी मिलों में अपना गन्ना पहुंचाएं।

गन्ना पहुंचाने में जिन्हें घाटा हो रहा है,वे किसान गन्ना जला रहे हैं।

संयुक्त किसान संघर्ष मोरचा ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार से अपील की है कि वे गन्ना मूल्य और के.सी.सी.के 140 करोड़ रुपए का भुगतान करवाने का प्रबंध करें।

   और अंत में 

  ’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

आर्यभट्ट की नगरी खगौल ज्ञान -विज्ञान के लिए मशहूर रही।

 बिहार के दानापुर के पास स्थित खगौल में दो काॅलेज चलते हैं।

पर, उनमें से किसी में भी स्नातकोत्तर की पढ़ाई तक नहीं होती।रिसर्च वगैरह की बात कौन कहे !

क्या इस पर कभी किसी ने सोचा ?

यदि नहीं, तो क्या नीति निर्धारक लोग अब तो सोचेंगे !

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साप्ताहिक काॅलम ‘कानोंकान,’

प्रभात खबर ,पटना ,

22 जनवरी 21


बुधवार, 20 जनवरी 2021

         हम होंगे कामयाब एक दिन !!

         --सुरेंद्र किशोर--

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याज्ञवल्क्य ने कहा था कि 

‘‘अपराधी कोई भी हो,सजा समान होनी चाहिए।’’

काश ! आजादी के बाद अपने देश में भी ऐसा ही हुआ होता।

पर, इसके बदले हो गया --

‘‘प्रथम ग्रासे , मक्षिका पात !’’

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यह घटना तब की है जब 

सरदार पटेल जीवित थे।

एक केंद्रीय मंत्री के पुत्र से उत्तर प्रदेश में एक 

हत्या ‘हो गई !’

 केंद्रीय मंत्री, त्राहिमाम करते प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास गए।

नेहरू ने कोई मदद करने से साफ मना कर दिया।

पर एक अन्य ताकतवर केंद्रीय मंत्री काम आ गए।

पुत्र को जेल से रिहा करवा कर विदेश भेज दिया गया।

भले विदेश जाकर उसने बहुत अच्छा काम किया-लौटकर अपने देश के लिए भी।

   पर, उस घटना से यह तो तय हो गया कि आजाद भारत में कानून सबके लिए बराबर नहीं होगा।

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आजादी के प्रारंभिक वर्षों में ही नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य सी.डी.देशमुख ने प्रधान मंत्री से कहा था कि मंत्रियों में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की खबरें मिलने लगी हैं।

आप एक ऐसी उच्चस्तरीय एजेंसी बना दें जो भ्रष्टाचार की उन शिकायतों को देखे।

इस पर नेहरू ने कहा कि ऐसा करने से मंत्रियों में पस्तहिम्मती आएगी।

उसका विपरीत असर सामान्य सरकारी कामकाज पर पड़ेगा।

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जार्ज फर्नांडिस ने आरोप लगाया था कि 1971 के लोक सभा चुनाव में बंबई में मुझे हरवाने के लिए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने वहां के माफियाओं की मदद ली।

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सन 1962 में जे.बी.कृपलानी को वी.के. कृष्ण मेनन से हरवाने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने सिर्फ फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की मदद ली थी।

(दिलीप कुमार की जीवनी में यह बात दर्ज है।)

पर, उनकी पुत्री और आगे बढ़ गईं।

(नब्बे के दशक में ही वोहरा कमेटी की रपट ने

यह बता दिया था कि हमारे हुक्मरानों ने देश की हालत कैसी बना रखी है !)

इंदिरा जी ने कहा था कि 

‘‘मेरे पिता संत थे।

पर,मैं तो राजनेत्री हूं।’’

उनके पिता ने कोई निजी संपत्ति खड़ी नहीं की।

पर इंदिरा जी के वसीयतनामे में (इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया-19 मई, 1985)

मेहरौली के फार्म हाउस के अलावे भी बहुत सी बातें हैं।

अपवादों को छोड़कर आज के नेता तो विंस्टन चर्चिल के शब्दों में ‘‘पुआल के पुतले’’ मात्र हैं !

इस देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के बारे में

इंदिरा जी ने कहा था कि यह तो वल्र्ड फेनोमेना है।

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अब आज के नेताओं के बारे में क्या कहना !!!

जब स्वतंत्रता सेनानियों का यह हाल था !

अपवाद पहले भी थे,अपवाद आज भी हैं।

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पर इस बीच देश की हालत क्या बन गई है ?

ऐसे -ऐसे लोग बहुत ताकतवर हो गए

हैं जो पैसे व वोट के लिए देश का सौदा कर रहे हैं।

देश के बचाने व बांटने पर अमादा लोगों के बीच

अघोषित ‘युद्ध’ चल रहा है।

पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद वह तेज होगा।

आजादी के बाद ही देश की ऐसी कमजोर अधारशीला  बना दी  गई कि लड़ाई अब कठिन हो गई है।

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यानी, याज्ञवल्क्य तो नहीं बचा सके ,अब शायद भगवान ही बचा लंे अपने देश को तो बहुत है ! 

देश को बचाने की कोशिश में लगी शक्तियां हांफ रही हैं।

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---सुरेंद्र किशोर --19 जनवरी 21