रविवार, 26 सितंबर 2021

                 एक 

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  सेंसेक्स 60 हजार अंक के स्तर को पार कर गया।

याद आता है कि 2016 में किसी ने लिखा था कि यदि रघुराम राजन भारत छोड़ते हैं तो देश से करीब सौ अरब डालर का निवेश बाहर चला जाएगा।

  साफ है कि भारत ऐसे उदारवादी विश्लेषकों और कथित अर्थ -शास्त्रि़यों के दंभ से कहीं बड़ा है।

         -- अभिषेक,दैनिक जागरण

             26 सितंबर, 21 

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                दो

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     पढ़िए एक नोबेल विजेता अर्थशास्त्री 

     का अनर्थ शास्त्र

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‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,

शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर, 2019

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       तीन

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इस साल जून में यह खबर आई कि भारत का फाॅरेन एक्सचेंज रिजर्व बढ़कर 600 अरब डाॅलर हो चुका है।

यह एक रिकाॅर्ड है।

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      चार

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पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने इसी जुलाई में कहा कि 

केंद्र सरकार अर्थ व्यवस्था को ठीक से चलाने में विफल रही है।

उसकी रूचि सिर्फ सरकारी खजाना भरने में है।

(अन्य अधिकतर नेताओं की रूचि तो निजी खजाना भरने की रहती है।)

क्या खुर्शीद साहब को इस तथ्य का भी ज्ञान नहीं है कि कोविड-19 के कारण भारत ही नहीं बल्कि लगभग पूरी दुनिया की सरकारों की अर्थ-व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है।

इसके बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियां देखने लायक हंै यदि आंखें खुली हों।

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       पांच

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 खुर्शीद ने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी शासन हमें सौंप दें ।हम दिखा दंेगे कि अर्थ व्यवस्था कैसे ठीक रखी जाती है।

दरअसल कांग्रेस नेता एक बार फिर सत्ता पर कब्जा करके

नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी के सुझाए रास्ते पर चलना चाहते हैं।

यानी भ्रष्टाचार को एक बार फिर अर्थ व्यवस्था का अनिवार्य अंग बना देना चाहते हैं।

(राहुल गांधी को ‘न्याय योजना’ का मंत्र अभिजीत बनर्जी ने ही दिया है। इतने करीबी हैं वे कांग्रेस के)

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सुरेंद्र किशोर

26 सितंबर 21

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मेरे फेसबुक वाॅल से



 


अगले चुनाव का मुख्य मुद्दा

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भ्रष्टाचार पर चोट बनाम भ्रष्टों का बचाव

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साइड मुद्दा

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जेहाद का विरोध बनाम जेहाद का

 प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन

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--सुरेंद्र किशोर-

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इस देश की भ्रष्ट राजनीति को है 

‘जेहादियों’ का पूरा सहारा 

बदले में भ्रष्ट राजनीति भी अपवादों को छोड़कर 

जेहादियों की 

तहे दिल से मदद कर रही

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अब मतदाताओं को सोचना और तय करना है।

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सन 2022 का यू.पी चुनाव--सेमी फाइनल

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सन 2024 का लोक सभा चुनाव फाइनल

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 भ्रष्ट राजनीति के समर्थन में एक नोबेल विजेता का 

यह गुरु मंत्र--पढ़ लीजिए।

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‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,

शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’’

--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर, 2019

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यह संयोग नहीं है कि अभिजीत बनर्जी ने ही 

कांग्रेस को ‘‘न्याय योजना’’ सुझाया था।

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कांग्रेस शासन काल में एक बड़े मीडिया समूह के मालिक ने मुझसे कहा था कि 

‘‘सुरेंद्र जी, भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने की जरूरत नहीं है।भ्रष्टाचार यहां से जाने वाला नहीं है।’’

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भ्रष्टाचार और कांग्रेस 

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    प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि

‘‘यदि भ्रष्ट मंत्रियों -अफसरों पर कार्रवाई होगी तो प्रशासन में पस्तहिम्मती आएगी।’’

(-- एम.ओ.मथाई की पुस्तक से )

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 जून, 1964 में  यानी शास्त्री जी के कार्यकाल में पंजाब के मुख्य मंत्री प्रताप सिंह कैरो पद से हटा दिए गए।

उन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे।फिर भी उन्हें नेहरू जी हटाना नहीं चाहते थे।

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 आरोप लगने पर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि 

‘‘सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार तो विश्वव्यापी है।’’

(इंदिरा जी का यह बयान तब के अखबारों में मैंने पढ़ा था।)

जेपी ने जब भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो इंदिरा जी ने जेपी को इंगित करते हुए कहा था कि ‘‘जो पूंजीपतियों से पैसे लेते हैं,वे भ्रष्टाचार की बात करते हैं।’’

उसके जवाब में जेपी ने अपने निजी खर्च और आय का पूरा विवरण एक पत्रिका में छपवा दिया।  

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राजीव गांधी की सरकार तो सन 1989 में बोफोर्स के दलालों को बचाने में चली गई।

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हालांकि राजीव गांधी एक अच्छी बात कह गए थे--

हम 100 पैसे भेजते हैं और उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं।

85 प्रतिशत सरकारी राशि भ्रष्टाचार में ही तो चली जाती थी।

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अब आप ही अंदाज लगा लीजिए कि 100 पैसे में से जवाहरलाल नेहरू के राज में कितना घिसा ?

लालबहादुर शास्त्री के शासन काल में कितना घिसा ?

इंदिरा गांधी के राज में कितना घिसा ?

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आगे का राजनीतिक दृश्य

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  आगे क्या होने वाला है ?

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यदि सन 2024 में नरेंद्र मोदी फिर लोक सभा चुनाव जीत गए तब तो इस देश के न जाने कितने छोटे -बड़े नेता व उनके परिजन जेलों में होंगे ?

मुझे उनके नाम बताने की यहां जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

अखबार व टी.वी.आपको कई साल से बताते रहे हंै।

पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण चहुंओर ईश्वर की तरह ही राजनीति में भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है।

अपवादों को छोड़कर।

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जिन नेताओं व उनके परिजनों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में केस चल रहे हैं,उनमें से अधिकतर मुकदमे सन 2029 तक तार्किक परिणति तक पहुंच चुके हांेगे।

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यदि सन 2024 में राजग विरोधियों की सरकार बन गई तो 

गैर राजग नेताआंे के खिलाफ जारी मुकदमे दबा दिए जाएंगे। इसका पूर्व उदाहरण मौजूद है।

 1980 में संजय गांधी के खिलाफ मुकदमे दबा दिए गए और 2004 में बोफोर्स मुकदमे का वही हाल हुआ।

बोफोर्स केस में तो अटल सरकार ने भी ‘प्रथम परिवार’ के प्रति नरमी दिखाई।कई महीनों तक अपील की अनुमति नहीं दी।

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 और क्या-क्या होगा,उसकी कल्पना कर लीजिए।

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16 सितंबर 21

              

  

 


शनिवार, 25 सितंबर 2021

    जातीय गणना में दिक्कत है,

   पर रोहिणी आयोग की सिफारिश 

   लागू करने में कैसी दिक्कत ?

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     --सुरेंद्र किशोर--

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कह दिया कि हम जातीय गणना नहीं कराएंगे।

मेरी राय में यदि वह करवा भी देती तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता।

यदि किसी कारणवश नहीं करवा पा रही है तो उससे भी आसमान नहीं गिर रहा है।

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खैर, अब पिछड़ों के वास्तविक भले की बात की जाए

ताकि पिछड़े समुदाय की सभी जातियों का समरूप विकास

हो सके।

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 कुछ सवाल हैं तो

कुछ जवाब भी है।

आम पिछड़ों के हक में कुछ उपाय भी।

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क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि मंडल आरक्षण का अब तक कोई भी लाभ करीब एक हजार कमजोर पिछड़ी जातियों में से किसी उम्मीदवार को भी क्यों नहीं मिला ?

ऐसा क्यों हुआ जबकि 1993 के बाद पिछड़ी जातियों के अनेक दबंग नेता केंद्र की सरकार को चलाते रहे थे और कुछ नेता तो सरकार को ‘हांकते’ भी थे ?

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पिछड़ी जातियों के लिए केंद्र सरकार की सेवाओं में 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं।

   उनमें से अभी औसतन 15 प्रतिशत सीटें ही 

क्यों भर पाती हैं ?

जो लोग आज आरक्षण का दायरा बढ़वाना चाहते हैं,उन्होंने सत्ता में रहते समय कोटा खाली रह जाने की भीषण समस्या को हल करने के लिए क्या प्रयास किया ? 

(वैसे आरक्षण का दायरा तो तभी बढ़ेगा जब सुप्रीम कोर्ट उसकी अनुमति देगा।)  

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अब नरेंद्र मोदी सरकार से सवाल

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रोहिणी आयोग की सिफारिश को लागू क्यों नहीं किया जा रहा है ?

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आयोग ने सिफारिश की है कि 27 प्रतिशत के कोटे को चार हिस्सों में बांट दिया जाए।

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रोहिणी न्यायिक आयोग की रपट के अनुसार केंद्रीय सूची में शामिल कुल 2633 पिछड़ी जातियों में से करीब 1000 जातियों के किसी भी उम्मीदवार को मंडल आरक्षण का लाभ अब तक नहीं मिल सका है।

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  याद रहे कि सन 2017 में गठित रोहिणी न्यायिक आयोग  ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है।

  मिली जानकारी के अनुसार आयोग ने 27 प्रतिशत मंडल आरक्षण को चार भागों में बांट देने की सिफारिश की है।

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   यदि सिफारिश मान ली गई तो केंद्र की सूची में शामिल 97 मजबूत पिछड़ी जातियों को कुल 27 में से 10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा।

  1674 जातियों को दो प्रतिशत आरक्षण, 534 जातियों को 6 प्रतिशत आरक्षण और शेष 328 जातियों को 9 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।

  आयोग के अनुसार अब तक आरक्षण का अधिक लाभ कुछ मजबूत पिछड़ी जातियों को ही अधिक मिलता रहा है।

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आयोग ने केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों तथा लोक उपक्रमों के कर्मियों का सर्वे किया।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों के आंकड़े भी एकत्र किए गए।

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एक नमूना

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नीतीश सरकार ने अल्पसंख्यक विद्यार्थियों की विशेष कोचिंग का प्रबंध करवाया है।

उससे अब राज्य सरकार की नौकरियों में अल्संख्यकों यानी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है।

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नरेंद्र मोदी सरकार बड़े पैमाने पर पिछड़ी जातियों खास कर अति पिछड़ी जातियों के विद्यार्थियों के लिए उच्चस्तरीय कोचिंग का प्रबंध तो करवा ही सकती है।

उससे 27 प्रतिशत कोटा पूरा करने के मार्ग में आने वाली बाधा भी दूर हो सकती है।

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25 सितंबर 21


शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

 


कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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चुनावी टिकटों की खुली खरीद-बिक्री से लोकतंत्र पर भारी खतरा

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रुपए लेने के बावजूद चुनावी टिकट न देने के आरोप से संबंधित एक मामला अब पटना अदालत तक पहुंच चुका है।

दूसरी ओर, पैसों के बल पर टिकट पा लेने के अन्य अनेक मामलों से लोगबाग अवगत होते रहे हैं।

  अदालत किस नतीजे पर पहुंचती है,वह तो समय बताएगा।

आरोप साबित होगा भी या नहीं ,यह भी एक यक्ष प्रश्न है।

पर, जानकार लोग बताते हैं कि बिहार में हाल के वर्षों में चुनावी टिकटों की खरीद-बिक्री का चलन तेजी से बढ़ रहा है।

इसके लिए कोई एक ही दल या नेता जिम्मेदार नहीं है।

  उधर वोट खरीदने की शिकायतें भी बढ़ रही हैं।इस तरह ईमानदार व सेवाभावी नेताओं के लिए अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं।पढे-लिखे व अच्छे वक्ताओं की आम तौर से जरूरत भी कम हो रही है क्योंकि सदनों में शोरगुल,हंगामा व मारपीट ही तो करनी पड़ती है।  

आम तौर से उम्मीदवारों के ‘वोट बैंक’ से बाहर वाले मतदाताओं के वोट खरीदे जा रहे हैं।

  यानी, कुल मिलाकर चुनाव का खर्च इतना बढ़ चुका है कि आम राजनीतिक कर्मियों के लिए कुछ खास दलों के टिकट पाना असंभव सा हो गया है।

   राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि चुनावी टिकट की खरीद -बिक्री की यही रफ्तार  रही तो लोकतंत्र का मंदिर  धन कुबेरों का सदन बन कर रह जाएगा।

  अभी तो अधिकतर सदस्य टिकट खरीदे बगैर विधायक व सांसद बन रहे हैं।

पर ऐसा कब तक चलेगा ?

वह दिन दूर नहीं जब सदन के अधिकतर सदस्य अपार धन वाले ही होंगे।

उधर ऐसे सदस्यों की संख्या भी बढ़ ही रही हैं जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं।

 सदनों में शांति भंग करने वालों की भी संख्या बढ़ ही रही है।

  इस तरह कुल मिलाकर बिहार सहित इस देश की विधायिकाओं का कैसा स्वरूप बनता जा रहा है ?

दूसरी तरफ राजनीति के विवेकशील लोग सदन की गरिमा कायम करने की कोशिश भी कर रहे हैं।पर लगता है कि वे एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।यदि अंततः वे हार गए तो क्या होगा ?

लोकतंत्र बचेगा ?

पता नहीं !

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 टिकटों की बिक्री की 

 जांच सी.बी.आई.करे

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सिर्फ एक मामले में पटना में केस हुआ है।

पर, चुनावी टिकटों की खरीद-बिक्री के मामले अनेक हैं।

 यानी, ऐसे सारे मामलों की जांच अदालत की निगरानी में यदि सी.बी.आई.करे करे तो लोकतंत्र की गरिमा व लोगों की उसमें आस्था बनाए रखने में सुविधा होगी।

 बिहार विधान सभा के गत चुनाव के समय मैंने एक परिचित से टिकट नहीं मिलने का कारण पूछा।

 एकाधिक बार विधायक व मंत्री रहे नेता ने बताया  कि मुझसे 50 लाख रुपए का चंदा हमारी पार्टी ने मांगा।

  मैं मात्र 15 लाख ही देने की स्थिति में था।इसलिए मेरा टिकट कट गया।

ऐसे न जाने और भी कितने मामले होंगे।

जिनकी जांच भी की जा सकती है।

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    कैसे बच जा रहे वेतन के पैसे !

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बिहार के एस.पी.राकेश दुबे प्रकरण में यह बात सामने आई कि अपने पूरे सेवाकाल में उन्होंने कुछ ही दफा वेतन खाते से पैसे निकाले।

  शासन को इससे यह संकेत ग्रहण करना चाहिए कि राकेश दुबे इस मामले में अकेले नहीं हैं।

ऊपरी कमाई की क्षमता वाली जगहों पर बैठे कर्मियों के सैलरी अकाउंट की नमूना जांच का प्रावधान होना चाहिए।

  जांच एजेंसियां समुचित प्रक्रिया के तहत ऐसा कर ही सकती है।

   चारा घोटाला सामने आने के बाद का एक प्रकरण याद है।

सी.बी.आई. ने बैंकों को चिट्ठियां लिखीं ।

बैंकों से जिन व्यक्तियों के खातों का विवरण मांगा गया था, उनमें बिहार काॅडर के चार वरीय आई.ए.एस.अफसर भी थे।उस पत्र से पहली बार यह बात सामने आई कि चारा घोटाले में कुछ आई.ए.एस.अफसर भी पकड़ में आने वाले हैं।पकड़ में आए भी।

  उसके बाद तो उनकी दुनिया ही बदल गई।आराम व शान का जीवन बर्बाद हो गया।

आश्चर्य है कि इसके बावजूद केंद्रीय सेवा के भी अनेक अफसरों में पैसे का लोभ तीव्र होता जा रहा है।

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  आॅटोमेटिक ड्राइविंग टेस्ट

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पटना में भी आॅटोमेटिक ड्राइविंग टेस्ट शुरू हुए हैं।

जो उसमें पास हो रहे हैं ,उन्हें ही गाड़ी चलाने का लाइसंेस दिया जा रहा है।

  हाल के टेस्ट में 46 प्रतिशत उम्मीदवार फेल कर गए।

पुराने जमाने में शैक्षणिक संस्थानों की ठीकठाक कदाचारमुक्त परीक्षाएं होती थीं तो लगभग इतने प्रतिशत परीक्षार्थी फेल करते थे।पर आज ?

बिहार स्कूल बोर्ड की परीक्षा में इन दिनों करीब 80 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर जाते हैं।

   आॅटोमेटिक ड्राइविंग टेस्ट में किसी तरह की बेईमानी का आविष्कार नहीं हुआ तो उसका सकारात्मक असर सड़कों पर भी पड़ेगा।

यानी, ड्राइवर भरसक अनुशासन कायम रखेंगे।

दुर्घटनाएं भी कम होंगी।

विमान चालकों के काम के घंटे तय हैं।उसी तरह सड़कों पर छोटी-बड़ी गाड़ियां चलाने वालों के काम के घंटे भी तय होने चाहिए।

 साथ ही,तीस साल से कम उम्र के लाइसेंसशुदा ड्राइवरों की कुशलता की जांच आॅटोमेटिक ड्राइविंग टेस्ट के जरिए होनी चाहिए

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और अंत में 

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समाजवादी नेता और विचारक डा.राममनोहर लोहिया ने कहा था,

‘‘पुश्तैनी गुलामों के परिवार हिन्दुस्तान में बहुत हंै,और दुनिया में भी इनकी कमी नहीं।

उन्हें गलती से रईस कहा जाता है।

पर, वे वास्तव में पारस्परिक रसज्ञ,सुसभ्य और योग्य होते हैं।

जो भी पक्ष जीते, उसकी खिदमत में वे हाजिर हो जाते हैं।

लेकिन जीत के पहले उनकी आंखें वर्तमान पर इतनी टिकी रहती है कि उनके अंतर्गत पकने वाले भविष्य को वे भांप लेते हैं।’’

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प्रभात खबर

पटना

24 सितंबर 21

  

  


बुधवार, 22 सितंबर 2021

     

 नरेंद्र मोदी की सत्ता के अनवरत 20 साल 

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आज के ‘हिन्दुस्तान’ में अखबार के प्रधान सम्पादक शशि शेखर का नरेंद्र मोदी पर वस्तुपरक लेख छपा है।

इस लेख का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि न तो शशि शेखर को और न ही हिन्दुस्तान को गोदी मीडिया की श्रेणी में रखा जा सकता है।

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मेरी टिप्पणी

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  मुझे भी याद नहीं कि इस लोकतांत्रिक देश में कोई नेता अपने व अपने दल के बल पर लगातार 20 साल सत्ता में रहा हो।

  दल महत्वपूर्ण है किंतु मोदी का बल निर्णायक ! 

 भाजपा एक ताकतवर व काॅडर आधारित दल है।

उसकी अपनी ताकत है।

पर, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का अलग से भी अतिरिक्त वोट बैंक बन गया है।

  ऐसा क्यों हुआ ?

उसके कुछ ही कारण गिना रहा हूं।

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गुजरात दंगे के लिए दशकों तक मोदी की देश-विदेश में भारी आलोचना होती रही।

मानो नरेंद्र मोदी से अधिक बड़ा दंगाई कोई पैदा ही नहीं हुआ।

किंतु यह आरोप निराधार है।

सिर्फ भागलपुर दंगे( 1989 )से गुजरात दंगे (2002) की तथ्याधारित तुलना करके देख लीजिए।

हर कसौटी पर भागलपुर दंगे में जघन्यता और व्यापकता तब की राज्य सरकार व केंद्र सरकार 

की विफलता ,मोदी सरकार से बहुत अधिक थी।

मैंने दोनों दंगों का तुलनात्मक अध्ययन किया है।

किसी को मेरी बात पर शक हो तो मैं कभी तुलनात्मक तथ्य पेश कर दूंगा।

लोगों में इस कारण मोदी के प्रति सहानुभूति ही हुई।

  बहुसंख्यक समाज में असली धर्म निरपेक्ष लोगों की कमी नहीं है।

उनमें भी  मोदी के प्रति सहानुभूति पैदा हुई ।

क्योंकि अधिक जघन्य दंगों के बावजूद मोदी को नाहक सबसे बड़े राक्षस और मौत के सौदागर के रूप में पेश किया गया।

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अधिकतर लोगों को नरेंद्र मोदी की यह खूबी पसंद है कि 

उनमें आय से अधिक संपत्ति एकत्र करने की कोई प्रवृति नहीं है।यह गुण बहुत ही कम नेताओं में है।

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 जहां इस देश की अधिकांश राजनीति, भीषण भ्रष्टाचार व वंशवाद-परिवारवाद में बुरी तरह बेशर्मी से लिप्त है,वहीं मोदी पर वंशवाद-परिवारवाद का कोई आरोप नहीं है।

ये दोनों विरल गुण हैं।

कोई राष्ट्रीय स्तर का बड़ा नेता ऐसा गुण खुद में विकसित करके देखे , लोग मोदी की तरह उसे भी पसंद करने लगेंगे। 

भले उतना नहीं।

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तो फिर कहिएगा कि अब भी देश -विदेश के अनेक लोग मोदी के इतने अधिक विरोधी क्यों हैं ?

मेरी समझ से इस देश में इस्लामिक शासन कायम करने के लिए प्रयत्नशील बाहरी-भीतरी शक्तियां यह समझ गई हैं कि मोदी के रहते यह संभव नहीं।

  दूसरे अधिकतर नेता व दल भले ही उन्हें वोट के लिए बढ़ावा देते और मदद करते रहें।

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मोदी की विफलता

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15 अगस्त, 2014 को लाल किले से नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘‘न मैं खाऊंगा और न ही खाने दूंगा।’’

खा तो नहीं रहे हैं।

किंतु दूसरों को खाने से नहीं रोक पा रहे हैं।

केंद्रीय मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का आरोप नहीं लगा है।

पर ब्यूरोक्रेसी व केंद्र व राज्यों में छुटभैया नेताओं का हाल सही नहीं है।

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सांसद फंड की कमीशनखोरी राजनीति व ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार कम नहीं होने दे रही है।

  यह भ्रष्टाचार का रावणी अमृत कुंड बन चुका है।

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दो सलाह--

1.-सांसदों की ओर से भारी विरोध है,फिर भी सांसद फंड मोदी बंद कर दें।इससे राजनीतिक संकट तो आएगा,पर इससे आपकी सरकार नहीं गिरेगी।हां,जनता आपकी वाह-वाह जरूर करेगी।

2.-भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी का प्रावधान कराएं।

3.-ब्यूरोक्रेसी की जकड़न कम करने के लिए लेटरल बहाली सराहनीय रही है।

किंतु ब्यूराक्रेसी पर लगाम लगाने के लिए संविधान में संशोधन भी जरूरी है।

राज्य सभा में बहुमत होते ही यह काम कर दीजिए।

एक ईमानदार मुख्यमंत्री ने एक बार मुझसे कहा था कि भ्रष्टाचार कम करने में बड़े अफसर सहयोग नहीं करते।

--सुरेंद्र किशोर

19 सितंबर 21


 अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ाने 

का एक तरीका यह भी 

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--सुरेंद्र किशोर--

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बहुत पहले कहीं पढ़ा था।

वही बताना चाहता हैं।

दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ का प्रसार 

यानी सर्कुलेशन 

बढ़ जाने का एक खास कारण रहा।

उस अखबार ने अपराध की घटनाओं का फाॅलोअप यानी पीछा करना शुरू कर दिया था।

उससे अखबार को प्रसार की दृष्टि से भारी लाभ हुआ।

अधिक प्रसार यानी अधिक विज्ञापन।

अधिक विज्ञापन यानी अधिक राजस्व।

उस बढ़े राजस्व के छोटे हिस्से का सदुपयोग बेहतर स्टाफ की संख्या बढ़ाने में करिए।

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इस विधि से आज के अखबार भी लाभ उठा सकते हैं।

आज होता क्या है ?

किसी गंभीर से गंभीर अपराध की कहानी एक-दो दिन या अधिक से अधिक एक सप्ताह तक छपकर रह जाती है।

अपराध संवाददाता फिर दूसरी घटना में लग जाते हैं।

समस्या उनके सामने भी है।

रिपोर्टर कम और काम ज्यादा है।

अधिकतर अखबार संपादकीय विभाग पर कम से कम खर्च करता है।

ऐसा विदेशी अखबार का प्रबंधन नहीं करता है।

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अपराध कथाओं में अब तो भ्रष्टाचार कथाओं को भी जोड़ लेना चाहिए।

खास कर राजनीति में जाकर जनता के करोड़ों-अरबों रुपए लूटने वालों की कथाएं।

हालांकि भ्रष्ट लोग सिर्फ राजनीति में ही नहीं हैं।

‘‘राडिया टेप कहानी’’ तो बताती है कि अन्य क्षेत्रों में भी यहां तक कि मीडिया में भी घोटालेबाज व हथियार के दलाल रहे हैं।

हाल ही में टी.वी.पर देखा कि एक बड़ा पत्रकार एक बड़े नेता का इंटरव्यू ले रहा था।

उस नेता ने कुछ दशक पहले उस पत्रकार के बारे में प्रभाष जोशी से शिकायत के लहजे में कहा था कि फलां पत्रकार ने मुझसे 5 करोड़ रुपए ठग लिए। 

भीषण भ्रष्टाचार आज की राजनीति का उसी तरह अंग बन चुका है जिस तरह आजादी के तत्काल बाद के वर्षों तक नेताओं के सिर पर गांधी टोपियां रहती थीं।

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भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की खबरें भी अखबारों में आम तौर पर क्षणभंगुर ही होती हैं।

उधर मीडिया की नजरों से मामला ओझल हुआ नहीं कि आरोपीगण मामले को रफा-दफा करने में लग जाते हैं।

  अधिकतर मामलों में रफादफा हो भी जाते हैं।

यदि उन आरोपों व आरोपितों पर मीडिया की निरंतर चैकसी रहे तो भ्रष्टों की नानी मर जाएगी।

इस तरह ऐसे फाॅलोअप करने वाले अखबारों की भी चांदी भी रहेगी।

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जरा करके देखिए,कैसी उपलब्धि मिलती है !!

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20 सितंबर 21



सोमवार, 20 सितंबर 2021

 याद करें सन 2014 की राहुल गांधी से 

अर्णब गोस्वामी की मशहूर बातचीत

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उस बातचीत ने भी 2014 के लोस 

चुनाव नतीजे पर असर डाला था

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यदि इंटरव्यू उपलब्ध न हो तो मेरे 

ही फेसबुक वाॅल पर देख लीजिए।

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-- सुरेंद्र किशोर -

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अर्णब गोस्वामी ने जनवरी, 2014 में राहुल गांधी से लंबी बातचीत की थी।

तब वे ‘टाइम्स नाऊ’ के लिए काम कर रहे थे।

अर्णब ने शालीन सवालों -दर सवालों के जरिए यह साबित कर दिया कि राहुल गांधी,नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते।

उस इंटरव्यू से राहुल गांधी की वास्तविक क्षमता का

 देश को पता चल गया।

वह राहुल का पहला औपचारिक लंबा इंटरव्यू था।

2014 लोक सभा चुनाव का क्या नतीजा हुआ,

यह सबको मालूम है।

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यह अर्णब गोस्वामी की भी उपलब्धि थी।

उस उपलब्धि के लिए अर्णब को चीखने-चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं पड़ी थी।

भविष्य में भी ऐसी पत्रकारीय उपलब्धि के लिए भी अर्णब जैसे तेजस्वी पत्रकार को चिल्लाना नहीं पड़ेगा।

बेजरूरत चिल्लाने व डिबेट के नाम पर कुछ जग जाहिर अशिष्ट लोगों को स्टुडियो में एक साथ बैठाकर एक दूसरे पर भुकवाने से किसी की इज्जत नहीं बढ़ती,न मीडिया की और न ही किसी और की।

हां, कहीं किसी में गुस्सा जरूर पैदा होता है।

नतीजतन कुछ समर्थवान लोग झूठा-सच्चा  केस भी करवा देते हैं।

इससे नाहक समय-पैसे की बर्बादी होती है।

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खुशी की बात है कि अर्णब के खिलाफ ऐसे दायर एक झूठे केस से उन्हें मुक्ति मिल गई है।

 अब उनके लिए यह सोच-विचार का अवसर है।

अपने लाखों शालीन प्रशंसकों के लिए अर्णब को अपनी उखाड़-पछाड़ वाली शैली बदल देनी चाहिए।

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 किसी का इंटरव्यू करने या किसी कार्यक्रम में प्रस्तुत होने से पहले कभी अर्णब गोस्वामी का गजब का होम वर्क होता था।

चीख-चिल्लाहट व हल्ला- गुल्ला गुणात्मक होम वर्क का विकल्प नहीं बन सकता।

उसे अब वैसा बनने भी नहीं देना चाहिए।

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--सुरेंद्र किशोर

19 सिमंबर 21

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