शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

 नोटों के पहाड़ पर पार्थो चटर्जी !

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सुरेंद्र किशोर

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सार्वजनिक क्षेत्र मंे गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा किसी भी गरीब देश की संवेदनशील सरकार की प्राथमिकता में रहनी चाहिए।

 क्योंकि शिक्षा के निजी क्षेत्र उनके लिए है जिनके पास पैसे हैं।

    पर जब स्कूली शिक्षकों की बहाली के एवज में 

कोई शिक्षा मंत्री अपने ठिकानों पर नोटों का पहाड़ खड़ा कर ले तो गरीबों के बच्चे उन अयोग्य शिक्षकों से कैसी शिक्षा हासिल कर पाएंगे ?

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बहाली में भीषण भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा की गुणवत्ता के क्षरण की समस्या बिहार सहित देश के अनेक राज्यों में भी है।

क्या पार्थो चटर्जी जैसे धनलोलुप मंत्री गरीबों के घरों के नौनिहालों के भविष्य, प्रकारांतर से देश के भविष्य, के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे और देश मूक दर्शक बना रहेगा ?

कोलकाता में अर्पिता के घरों में नोटों के पहाड़ देख कर भले आज देश गुस्से में है। 

किंतु स्कूली शिक्षा या फिर पूरी शिक्षा व्यवस्था के बर्बाद होते जाने की समस्या इस देश में दशकों पुरानी है।अब भी चेत जाने का समय है।

सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है।केंद्र और राज्य सरकारें कैंसर जैसी इस समस्या पर मिल बैठकर विचार करे। 

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29 जुलाई 22


  नरेंद्र मोदी से नाराज डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी भी 2024 में 

 भाजपा की ही जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं

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सुरेंद्र किशोर

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जी हिन्दुस्तान टी.वी चैनल से बातचीत करते हुए डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आज कह दिया कि सन 2024 के लोक सभा चुनाव में भी भाजपा ही जीतकर एक बार फिर केंद्र में सत्ता में आएगी।

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खबर मिलती रही है कि डा.स्वामी इन दिनों नरेंद्र मोदी से नाराज चल रहे हैं।

क्योंकि भाजपा ने उनका भी ‘आडवाणीकरण’ कर दिया है।

(सन 2024 की भविष्यवाणी उनका वस्तुपरक आकलन है या भाजपा से उनकी फिर पटरी बैठने वाली है ?!!

पता नहीं।अभी तो वस्तुपरक ही मान लें)

यदि डा.स्वामी भी नरेंद्र मोदी की तीसरी जीत देख रहे हैं तो इसके साथ ही  प्रतिपक्षी नेता गण 2024 के बाद का अपना राजनीतिक व कानूनी भविष्य का अनुमान लगा लें।

खासकर देश भर के वैसे नेतागण अपना हश्र जान लें जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं या केंद्रीय एजेंसियों द्वारा उनकी जांच चल  रही है।

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2024 में भाजपा एक बार फिर सत्ता में आ जाएगी तो 2029 तक तो सारी जांचें अपनी तार्किक परिणति तक पहुंच ही जाएंगी।

उसके बाद इस देश के कितने नेतागण चुनाव

चुनाव लड़ने लायक रह जाएंगे ?

वे अपने केस की गंभीरता के अनुपात में अपना भविष्य अभी से जान लें।

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इस देश के अधिकतर आम लोग,जो किसी जातीय या सांप्रदायिक वोट बैंक के हिस्सा नहीं हैं, तरह -तरह के आर्थि और बौद्धिक भ्रष्टाचारियों से ऊब रहे हैं।

ऐसे में आगे का अनुमान लगाइए।

जब एक राज्य के एक मंत्री पार्थों चटर्जी के अत्यंत करीबी के पास  21 करोड़ रुपए नकद मिले हैं तो पार्थों की अपेक्षा इस देश के अधिक ताकतवर नेताओं ने इस गरीब देश को कितना लूटा है ,उसका अनुमान मुश्किल नहीं।

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ताजा खबर के अनुसार सिर्फ ई. डी. ने घोटालेबाजों की एक लाख चार हजार 702 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है।अन्य एजेंसियां अलग हैं।

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26 जुलाई 22

  


 शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल की निविदा जारी 

होने के बाद अब दिघवारा-नयागांव के 

‘न्यू पटना’ बनने की संभावना बढ़ी

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कुछ महीने पहले कहा था कि शेरपुर-दिघवारा गंगा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद दिघवारा से नया गांव तक का इलाका ‘न्यू पटना’ बन जाएगा।

    प्रस्तावित पुल के निर्माण के लिए अब निविदा जारी कर दी गई है।

  पटना में गंगा नदी पर यह पांचवां पुल होगा।

  इसके बनकर तैयार हो जाने पर सारण जिले के एक बड़े इलाके का तेजी से विकास होगा।

विकास के कुछ सरकारी प्रयास होंगे किंतु अधिक निजी प्रयास होंगे।

 पिछले कुछ महीनों से इस पुल की आहट थी।

कुछ साल पहले पटना के पास गंगा नदी पर जेपी सेतु के बनकर तैयार हो जाने के बाद से ही पटना के डेवलपर्स परमानंदपुर और आसपास के इलाके में सक्रिय हो गए हैं।

हाल में पता चला कि शेरपुर-दिघवारा पुल की प्रत्याशा में दिघवारा-भेल्दी रोड के  किनारे डेरनी तक जमीन की खरीद-बिक्री तेज हो गई है।

जमीन खरीदने के इच्छुक लोग बाहर से भी वहां जा रहे हैं। 

   एक कहावत है कि अमेरिका ने सड़क बनाई और सड़क ने अमेरिका को बना दिया।

  दिघवारा -भेल्दी स्टेट हाईवे स्थित एक बाजार में जमीन की कीमत अब लगभग एक करोड़ रुपए प्रति कट्ठा हो गई है।इस स्टेट हाईवे का चैड़ीकरण होना है।

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शेरपुर दिघवारा पुल के बनकर तैयार हो जाने के बाद पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा।

क्योंकि दिल्ली के यमुनापार की तर्ज पर यहां गंगा पार कालोनियां भी विकसित हो सकती हैं।

यदि कोई तकनीकी बाधा न हो तो शेरपुर -दिघवारा पुल की प्रस्तावित निर्माण अवधि को थोड़ा कम किया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 22

 


सोमवार, 25 जुलाई 2022

 जेल जाने के बावजूद मंत्री ??!!

सुप्रीम कोर्ट इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेता ?

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सुरेंद्र किशोर

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महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक जेल जाने के बावजूद मिनिस्टर बने रहे थे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब भी जेल में हैं।

इसके बावजूद वे मंत्री भी हैं।

 पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।फिर भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी दे ही देना चाहिए।कोई मार्ग दर्शन जारी करना चाहिए। 

किंतु जेल में भी कोई मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?  

क्या इसे संविधान की धज्जियां उड़ाया जाना नहीं कहेंगे ?

सुप्रीम कोर्ट के रहते संविधान की धज्जियां उडं़े ?

यदि कोई सरकारी कर्मी जेल चला जाए तो वह तुरंत सेवा से निलंबित हो जाता है।

किंतु नेता जेल जाते ही अपने लिए पहले अस्पताल का इंतजाम कर लेता है।

साथ ही, घटिया व बेशर्म राजनीति के इस दौर में वह मंत्री भी बना रहता है।

   बेचारे लालू यादव और जय ललिता का क्या 

  कसूर था जो उन्हें जेल जाने के लिए मुख्य 

   मंत्री पद छोड़ना पड़ा था ???!!!

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25 जुलाई 22



 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मिलावटों की आशंका कम करने के लिए दवाओं की कीमतंे घटानी जरूरी 

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केंद्र सरकार कुछ महत्वपूर्ण दवाओं की भारी कीमतों में कमी लाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।कीमतों में सत्तर प्रतिशत कमी का प्रस्ताव है।

यदि सरकार ने अंततः सचमुच ऐसा कोई निर्णय कर लिया तो उससे  दवाओं में मिलावट की आशंका भी कम होगी।

ध्यान रहे कि जो महंगी दवाओं में मिलावट अधिक होती है।

सस्ती दवाओं में मिलावट कम होती है।

क्योंकि सस्ती दवाओं में मिलावट के धंधे में मुनाफा काफी कम होता है।

‘आयुष्मान भारत’ की दवाओं की कीमतें काफी कम हैं।

इसलिए उसमें कोई मिलावट करके भला कोई कितना कमाएगा ?

 पुराने जमाने में सार्वजनिक क्षेत्र के आई.डी.पी.एल. कारखानों में निर्मित अत्यंत सस्ती दवाएं काफी असरदार होती थीं।क्योंकि उनमें मिलावट नहीं होती थी।

पर, जब उसी कम्पोजिशन वाला टेबलेट ब्रांडेड कंपनी भारी कीमत में बेचे तो जाहिर है कि उसमें मिलावट से समाजविरोधी तत्वों को काफी फायदा होगा।

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    ठंडे पेय पदार्थों में कीटनाशक

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दवाआंें के साथ-साथ केंद्र सरकार ठंडे पेय पदाथों में  कीटनाशक दवाओं की भारी मौजूदगी पर भी ध्यान दे।

उससे भी बीमारियां हो रही हैं। 

 कई साल पहले भारत की  संसद में प्रतिपक्षी सदस्य ने सवाल पूछा था कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत काफी अधिक क्यों है ?

इस पर केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।

तब यह सवाल उठा था कि कोल्ड डिं्रक बनाने वाली अमरीकी कंपनी अपने देश में तो कीटनाशक की मौजूदगी के खिलाफ है। किंतु वही कंपनी भारत के लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ क्यों करती है ?

पिछली सरकारें भले यह बर्दाश्त करती रहीं।किंतु क्या मौजूदा केंद्र सरकार भी उसी लीक पर चलेगी ?

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छापेमारी में दुस्साहस 

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बालू, पत्थर, कोयले और पशु के काले धंधे में काफी काला धन है।

इस धंधे में लगे माफियाओं को देश भर में शासन के एक हिस्से का गुप्त संरक्षण मिलता रहा है।

जगजाहिर है कि 

इस काम में निचले व मझोले स्तरों के अफसरों की उनसे साठगांठ रहती है।

  इसीलिए धंधेबाज समय -समय पर पुलिसकर्मियों को अपनी गाड़ियों से कुचलते रहे हैं।उन्हें लगता है कि उनका कुछ बिगड़नेवाला नहीं।

इस धंधे को निर्मूल करने की कोशिशें भी होती रहती हैं।पर,वह कभी सफल नहीं होती।

  कोशिश सफल हो,उससे पहले उनकी गाड़ियों से कुचलने वाले अफसरों की जानें कैसे बचाई जाएं ?

इस पर बड़े अफसरों को विशेष तौर पर ध्यान देना होगा।कभी- कभी यह सवाल भी उठता है कि माफियाओं को रोकने के लिए कुछ अफसर अकेले या बहुत कम फोर्स के साथ मैदान में क्यों चले जाते हैं ?

क्या इस संबंध में शासन का कोई खास निदेश नहीं है ?

क्यों वे अफसर अति उत्साही हो जाते हैं ?

या माफियाओं के समक्ष अकेले चले जाने के पीछे उनका उद्देश्य कुछ और होता है ?

इस पर सरकारों को उच्च स्तर पर विचार करके कोई कठोर दिशा निदेश जारी करना चाहिए।

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जेल में फिर भी मंत्री

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नवाब मलिक जब तक जेल में रहे,मिनिस्टर भी बने रहे।

दिल्ली के मंत्री जैन साहब जेल में हैं।इसके बावजूद अब तक ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है।

पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी जेल गए।पिछली खबर मिलने तक वे भी मंत्री बने हुए हैं।

यह कैसी परंपरा डाली जा रही है ?

इससे पहले तो नेता लोग जेल जाने से पहले मंत्री या मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे देते थे।

 मीडिया ट्रायल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ताजा टिप्पणी समयोचित है।

उस पर उन्हें कोई जजमेंट भी देना चाहिए। किंतु जेल में भी मंत्री पद पर बना रहे,इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करेगा ?    

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भूली-बिसरी याद

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जस्टिस हंसराज खन्ना सन 1982 में ज्ञानी जैल सिंह के खिलाफ प्रतिपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे।सुप्रीम कोर्ट के चर्चित जज रहे खन्ना साहब ने राष्ट्रपति की भूमिका पर अपनी राय दी थी जो आज भी मौजूं है।

जस्टिस खन्ना ने कहा था कि ‘‘राष्ट्रपति देश का प्रतीक होता है।

उसके आचार-विचार का समाज पर असर पड़ता है।

हालांकि उसे कड़ाई से संविधान के अंतर्गत ही कार्य करना होता है।

परंतु मैं समझता हूं कि इसी सीमा के भीतर वह देश के नैतिक पतन को रोकने में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शासक दल से टकराव की स्थिति पैदा करेगा।

टकराव की तो असल में कोई संभावना ही नहीं है।

खास कर उस स्थिति में ,जबकि राष्ट्रपति देश के नैतिक पर्यावरण को साफ करने के प्रति चिंतित हो।

 अपनी स्थिति की सीमाओं के भीतर ही उसे अपनी सक्रियता तय करनी होगी।’’

   जस्टिस खन्ना की टिप्पणियां न्यायपूर्ण थी।

हाल में  राष्ट्रपति चुनाव हुआ।उसके उम्मीदवार यशवंत सिन्हा तथा कुछ अन्य प्रतिपक्षी नेताओं की टिप्पणियों की जरा जस्टिस खन्ना की टिप्पणियों की तुलना करके देख लें।

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 और अंत में

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जिन राज्यों में एक दलीय शासन है,वहां के मुख्य मंत्री यदि ईमानदार हैं,तो वे अपने मंत्रियों पर चैकस नजर रख सकते हैं।किंतु जहां मिली जुली सरकारें हैं,उन राज्यों के मुख्य मंत्रियों के सामने दिक्कतें हैं।

 ऐसी दिक्कतें कैसे दूर हों ?

इस पर तो संबंधित दलीय हाईकमान को ही विचार करना होगा। 

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कानोंकान 

प्रभात खबर

पटना

25 जुलाई 22


 


शनिवार, 23 जुलाई 2022

       

मुझे लगता है कि ओमप्रकाश राजभर और शिवपाल सिंह यादव जैसे नेताओं की मूल समस्या उनके बेटों की राजनीतिक उच्चाकांक्षाएं हैं।

उन्हें किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द किसी न किसी सदन में भेजने की जल्दीबाजी है।

  देखना है कि बेचारे उन नेता पुत्रों की इच्छी कब पूरी हो पाती है।

 राजभर और शिवपाल जैसी इच्छा रखने वाले नेताओं की इस देश में कोई कमी नहीं है।

पुत्रों की उच्चाकांक्षा पूरी कराने के चक्कर में कई दल धीरे -धीरे बर्बाद होते जा रहे हैं।

पर, यह ऐसी इच्छा है जो मरती ही नहीं।

 हाल में बेचारे शरद यादव की ऐसी ही इच्छा राजद पूरी नहीं कर सका।

देखना है कि राजभर और शिवपाल की इच्छा किस दल से कब पूरी होती है।

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23 जुलाई 22

  

 














शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

 भूली-बिसरी याद

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25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद संजय गांधी के ही कहने पर केंद्र सरकार अनेक फैसले कर रही थी।

  शाह आयोग की रपट में उसका विवरण आया है।

रपट के पेज नं.-21 पर लिखा है, 

‘‘....जब श्री रे (सिद्धार्थ शंकर राय)कमरे के दरवाजे से बाहर जा रहे थे तो वे (केंद्रीय गृह राज्य मंत्री )ओम मेहता से यह सुनकर आश्चर्य चकित हो गए कि अगले दिन (यानी 26 जून 1975 को)उच्च न्यायालयों को बन्द करने के आदेश दे दिए गए है।

सभी समाचार पत्रों को बिजली सप्लाई बन्द करने के भी आदेश दिए गए हैं।’’

   श्री राय इस बात के विरोधी थे।

 वे इस फैसले को प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर रद करवाना चाहते थे।

दरअसल यह फैसला संजय गांधी का था जो किसी पद पर नहीं थे।

  इस बीच संजय गांधी ने अत्यंत बदतमीजी और गुस्ताखी से कहा कि आप (यानी श्री राय)नहीं जानते कि देश पर शासन कैसे किया जाता है।

अंततः सिद्धार्थ शंकर राय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्होंने दोनों आदेशों को रद करवाया।दरअसल आपातकाल लगाने की सलाह श्री राय की ही थी।

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आपातकाल में एक विधेयक तैयार किया गया था।

उसमें इस बात का प्रावधान था कि राष्ट्रपति,प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ आजीवन कोई मुकदमा दायर नहीं हो सकता।

पर, किसी ने राजनीतिक कार्यपालिका को समझाया कि ऐसा अनर्थ मत कीजिए।उसके बाद वह उस विधेयक पर काम आगे नहीं बढ़ा।

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22 जुलाई 22