मंगलवार, 31 जनवरी 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

.......................

दोहरे शासन की समाप्ति के बिना विश्व विद्यालयों में सुधार कठिन

............................................

बिहार के विश्व विद्यालयों में शिक्षा-परीक्षा की हालत दयनीय है।

इसके लिए राज्य सरकार, राज भवन को और राज भवन राज्य सरकार को जिम्मेवार मानता रहा है।

चूंकि विश्व विद्यालयों पर द्वैध शासन है ,इसलिए एक दूसरे पर जिम्मेदारी थोपना आसान हो गया है।

ऐसे में अब यह जरूरी हो गया है कि विश्व विद्यालयों की पूरी जिम्मेदारी, संबंधित कानून में संशोधन करके,  बिहार सरकार खुद अपने हाथों में ले ले।

राजनीतिक कार्यपालिका के लोग चुनाव लड़ते हैं,जनता के पास उन्हें जाना पड़ता है।उनसे मतदातागण सवाल पूछते हैं कि शिक्षा क्यों चैपट होती जा रही है ?

  इस देश के कुछ राज्यों में वहां की राज्य सरकारों ने राज्यपालों को, कुलाधिपति के पद से मुक्त कर दिया है।शायद ऐसा करने का उनका उद्देश्य अलग है।

पर,यहां तो शिक्षा-परीक्षा को पटरी पर लाने की समस्या है।

लालजी टंडन जब बिहार के राज्यपाल थे तो मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि 

‘‘विश्व विद्यालय ठीक से चलें,यह अधिकार और जिम्मेदारी मेरे पास हैं।’’

पर, उससे पहले के पहले के राज्यपाल  देवानंद कुंवर के कार्यकाल में एक शर्मनाक घटना हो गई थी।

जब कुंवर जी बिहार विधान मंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे तो कांग्रेस की ही विधान पार्षद श्रीमती ज्योति ने अपनी ऊंची आवाज में सदन में ही राज्यपाल से पूछ दिया कि ‘‘आजकल आपके यहां वी.सी.बहाली का क्या रेट चल रहा है ?’’

  एक अन्य मामले में जब राज्य सरकार ने एक भ्रष्ट वी.सी.के खिलाफ कार्रवाई की तो राज भवन ने राज्य सरकार को लिख दिया कि आपने हमारी अनुमति के बिना उस वी.सी.के खिलाफ कार्रवाई क्यों की ?

दशकों पहले इस देश में जब राज्यपालों को विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति बनाने का निर्णय हुआ था तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि कोई व्यक्ति, किसी राज्यपाल से पूछेगा कि ‘‘क्या रेट चल रहा है।’’

अब समय आ गया है कि राज्य सरकार खुद विश्व विद्यालयों की जिम्मेदारी ले अन्यथा बिहार की शिक्षा देर-सबेर पूरी तरह चैपट हो जाएगी।

...................................................................

समझ में आने वाला अनुवाद

.........................

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़ ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की प्रतियां शीघ्र ही हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय

भाषाओं में मिलेंगी।

यह सराहनीय व उपयोगी कदम है।

किंतु इस सिलसिले में एक खास बात पर ध्यान रखने की जरूरत पड़ेगी।

वह यह कि अनुवाद इतना सरल हो जो आसानी से समझ में आ जाए।

यहां यह इसलिए कहा जा रहा है कि भारतीय संविधान का हिन्दी अनुवाद सरल भाषा में नहीं हो सका है।

कानून की किताबों के अनुवाद भी ऐसे जटिल हैं कि उन्हें समझ पाना कठिन होता है।

.................................

भूली-बिसरी याद

....................

सन 1973 में इलाहाबाद नगर महा पालिका ने डा.राम मनोहर लोहिया की आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी।

 पूर्व मुुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर को अनावरण के लिए आमंत्रित किया गया था।

कर्पूरी जी वहां जाने ही वाले थे।

किंतु उस बीच उत्तर प्रदेश के कुछ लोहियावादियों ने, जिन्होंने डा.लोहिया के साथ काम किया था,कर्पूरी जी से अपील की कि आप यह काम मत कीजिए।

क्योंकि यह काम खुद डा.लोहिया की इच्छा के खिलाफ है।

डा.लोहिया ने कहा था कि किसी व्यक्ति की मूर्ति या उसके नाम पर स्मारक स्थापित करने का काम उसके निधन के तीन सौ साल बाद ही होना चाहिए।

 तब तक उस व्यक्ति के बारे में आम लोग पूर्वाग्रह रहित होकर इस नतीजे तक पहुंच चुके होते हैं कि उस व्यक्ति का वास्तविक योगदान क्या था।

निधन के तत्काल बाद तो ख्याति से लोगबाग मोहित रहते हैं।समय बीतने के बहुत बाद यह तय हो पाता है कि उसकी ख्याति क्षणिक थी या स्थायी।उसका वास्तविक योगदान क्या था ?

याद रहे कि डा.लोहिया की मृत्यु सन 1967 में हुई थी।

डा.लोहिया की मूर्ति की स्थापना का विरोध करने वालों को यह नहीं पता था कि मूर्ति की स्थापना में लगे नेता व अन्य लोग लोहिया को उनकी मूर्ति तक ही सीमित कर देना चाहते थे।क्योंकि लोहिया की जीवन शैली,नीतियों और कार्य शैली का अनुकरण करना तो उनके वश में नहीं था।

ऐसे में कम से कम वे मूर्ति स्थपित करके उनको याद करने की औपचारिकता पूरी कर रहे थे।याद रहे कि विरोध के कारण कर्पूरी ठाकुर मूर्ति का अनावरण करने इलाहाबाद नहीं गए थे।    

....................

और अंत में

.......................

बिहार में करीब आठ साल पहले जैविक खेती की शुरूआत हुई थी।

अब तो ऐसी खेती का काफी विस्तार हुआ है।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अब मोटे अनाज के उत्पादन पर भी जोर दिया है।मोटे अनाज को सुपर फूड कहा जाता है।

पर,जैविक खेती में एक समस्या आ रही है।

व्यावसायिक ढंग से शुद्ध जैविक खेती करने पर उत्पाद काफी महंगा 

पड़ता है।

उदाहरणाथर्, एक लीटर शुद्ध जैविक सरसांे तेल की कीमत 389 रुपए है जबकि सामान्य सरसों तेल 225 रुपए प्रति लीटर की दर से बिक रहा है।अन्य उत्पाद की कीमत भी इसी तरह है।

सरकारी सब्सिडी की जरूरत महसूस हो रही है।अन्यथा,ऐसा न हो कि जैविक खेती के प्रति किसानों का उत्साह समय के साथ कम हो जाए।


    ‘‘इंडिया टूडे’’ के इस प्रशंसक पाठक का हाल

    ......................................

      सुरेंद्र किशोर 

लगता है कि इंडिया टूडे के ‘‘हुक्मरानों’’ को अपने प्रकाशन के प्रसार में कोई खास रूचि नहीं है।

मैं पहले ‘दिनमान’ को पसंद करता था।

अब मेरी पसंदीदा पत्रिका है--‘इंडिया टूडे’।

क्योंकि इसकी विश्वसनीयता अपेक्षाकृत अधिक है।

मेरे निजी पुस्तकालय में सन 1982 से ‘इंडिया टूडे’ के अंक मौजूद है।

 पहले अंग्रेजी संस्करण और बाद में हिन्दी संस्करण।

2015 से जब मैं पटना के बगल के गांव में रहने लगा,तब से मुझे ‘इंडिया टूडे’ मिलने में काफी दिक्कत होने लगी।

क्योंकि अखबारों के हाॅकर यहां नहीं पहुंचाते।

इसलिए मैंने सोचा कि इंडिया टूडे के मुख्यालय से ही पत्र-व्यवहार करके शुल्क भेज कर डाक से उसे मंगवाने का प्रबंध करूं।

............................

  मैंने सबसे पहले एक सज्जन पत्रकार को मेल भेजा।

वे अब इंडिया टूडे -हिन्दी के संपादकीय विभाग में बड़े पद पर हैं।

उन्होंने मेरे मेल का जवाब तक नहीं दिया।

 जबकि, कुछ साल पहले मना करने के बावजूद नगर से दूर स्थित मेरे आवास पर आ गए थे।

 उन्होंने मेरा लंबा इंटरव्यू लिया था।सहृदय व्यक्ति लगे थे।

................................

पटना के मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र कहा करते हैं कि दिल्ली वालों का यही हाल है।

उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब होता है।

इसीलिए यदि उनका कोई काम होता है तो मैं उसके बदले पहले ही भरपूर पैसे उनसे ले लेता हूं। 

.........................

मैंने इंडिया टूडे के प्रसार विभाग के व्हाट्सेप्प पर भी संदेश भेजा।कोई जवाब नहीं मिला।

तीन दिन पहले इ मेल पर एक संदेश भेजा।

अब तक कोई जवाब नहीं।

अब इसका क्या अर्थ लगाया जाए ?!!

मैं चाहता था कि मेरे निजी-पारिवारिक पुस्तकालय में 

इंडिया टुडे की आवक बनी रहे ताकि हमारी अगली पीढ़ियां भी देखंे कि हमारे यहां एक अच्छी पत्रिका भी उपलब्ध है।

 .................................... 

31 जनवरी 23


सोमवार, 30 जनवरी 2023

   चुनावी आंकड़ों के जानकार प्रशांत किशोर ने जातिगत जन गणना का विरोध कर दिया है।

साथ ही, उन्होंने इस गणना के पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ‘‘समाज को जातीय गुटांें में बांटने की तैयारी है।’’

 मेरी समझ से ऐसा कहकर प्रशांत किशोर ने बिहार की 52 प्रतिशत आबादी से खुद को काट लिया है।

  इस राज्य में पिछड़ों की आबादी, कुल आबादी का 52 प्रतिशत है।

 मुझे तो पिछड़ी जाति का कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो जातिगत गणना का विरोध कर रहा हो।

क्या प्रशांत किशोर की उनकी बिहार यात्रा के दौरान पिछड़ी जाति का कोई ऐसा व्यक्ति उन्हें मिला ?

बिहार में राजनीति करने के लिए पहले यहां की सामाजिक स्थिति को समझना होगा।

सिर्फ चुनावी आंकड़ों का विशेषज्ञ होने से काम नहीं चलेगा।

............................  

सुरेंद्र किशोर

27 जनवरी 23


   जातिगत गणना का विरोध 

 खुद सवर्णों के हक में नहीं

 मंडल आरक्षण को लेकर 

यह बात साबित हो चुकी है  

................................................

सुरेंद्र किशोर

.....................................

सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी, 2023 को ठीक ही सवाल किया  कि ‘‘जातिगत गणना के बिना आरक्षण की नीति सही तरीके से कैसे लागू होगी ?’’

संविधान के अनुच्छेद16(4) के अनुसार , ‘‘पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है,राज्य नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करेगा।’’

..............................

क्या ऐसा प्रावधान करते समय संविधान निर्माताओं का उद्देश्य 

हिन्दू समाज को बांटना था ?

संविधान निर्माताओं में अधिकतर लोग तो ऊंची जातियों के ही तो थे।दरअसल वे उदारमना थे।

सन 1931 तक तो जाति के आधार पर गणना हुई ही थी।

क्या उससे तब हिन्दू समाज बंट गया ?

आज किस जाति का उचित प्रतिनिधित्व नहीं ,यह जानने के लिए तरह -तरह की गणनाएं करनी ही पड़ेंगी।

उससे यह भी पता चलेगा कि सवर्णों में भी किसे कितनी सरकारी मदद की जरूरत है।

...............................

1990 तक भारत सरकार में कैसा प्रतिनिधित्व था,उसके लिए आंकड़ा यहां प्रस्तुत है। 

इस आंकड़े के बावजूद मंडल आरक्षण का 1990 में कड़ा विरोध हुआ था।

...........................................

1990 में केंद्र सरकार के विभागों में पिछड़ी जातियों के कर्मियों की संख्या

----------------------------------

विभाग    ---  कुल क्लास वन अफसर ---- पिछड़ी 

                                          जाति 

-----------------------------------राष्ट्रपति सचिवालय --- 48  -------  एक भी नहीं

प्रधान मंत्री कार्यालय--  35 ------      1

परमाणु ऊर्जा मंत्रालय--  34   ------    एक भी नहीं 

नागरिक आपूत्र्ति-----  61  -------  एक भी नहीं 

संचार    ------    52  ------    एक भी नहीं

स्वास्थ्य -------- 240   -------  एक भी नहीं 

श्रम मंत्रालय------   74  --------एक भी नहीं

संसदीय कार्य----    18   ---         एक भी नहीं

पेट्रोलियम -रसायन--  121    ----   एक भी नहीं 

मंत्रिमंडल सचिवालय--   20  ------      1

कृषि-सिंचाई-----   261   -------   13

रक्षा मंत्रालय ----- 1379   ------      9

शिक्षा-समाज कल्याण--  259 -----      4

ऊर्जा ----------  641 -------- 20

विदेश मंत्रालय  ----- 649 -------- 1

वित्त मंत्रालय----    1008 ---------1

गृह मंत्रालय----      409  --------13

उद्योग मंत्रालय--     169----------3

सूचना व प्रसारण--    2506  ------124

विधि कार्य--         143   --         5

विधायी कार्य ---    112    ------ 2

कंपनी कार्य --       247      ------6

योजना---           1262 -----    72

विज्ञान प्रौद्योगिकी ----101  ---     1

जहाज रानी-           103 --        1

------------------------------

----1990 के दैनिक ‘आर्यावत्र्त’ से साभार 

------------------

( 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के बावजूद केंद्रीय सेवाओं में अब भी यानी 2023 में भी पिछड़ों का प्रतिनिधित्व औसतन सिर्फ 19 प्रतिशत है।यह भी देखना चाहिए कि कमजोर पिछड़ों का हक मजबूत पिछड़े तो नहीं मार ले रहे हैं। यह भी गणना से ही तो पता चलेगा।जो गणना अभी बिहार में हो रही है,उससे अलग ढंग की सघन गणना भी करानी पड़े तो करानी ही चाहिए।) 

  1990 का ऊपर लिखित आंकड़़ा उनके लिए भी है जो लोग यह मानते हैं कि 1993 में लागू मंडल आरक्षण

इस देश की अनेक समस्याओं की जड़ में है।

यह आंकड़ा उस समय का है जब ओ.बी.सी. के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण लागू नहीं था।

जहां प्रत्येक को  वोट का समान अधिकार है,वहां 52 प्रतिशत पिछड़ी आबादी के लिए शासन में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए था जो ऊपर का 1990 या 2023 का आकंड़ा बता रहा है ?

वह भी आजादी के 76 साल बाद भी ?

..............................

मंडल आयोग ने सन 1931 की जातीय जन गणना को आधार बनाया था।

1990 में आरक्षण विरोधियों ने इसे भी अपने विरोध का एक आधार बनाया।

सवाल उठाया कि 1931 के पुराने आंकड़े के आधार पर आज कोई निर्णय कैसे हो सकता है ?

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

फिर तो 1931 की तरह आज भी जातीय गणना जरूरी है।

लेकिन जब गणना होने लगती है तो विरोध शुरू हो जाता है।

...................................

वी.पी.सिंह की सरकार ने सन 1990 में जब 27 प्रतिशत आरक्षण किया तो देश में हंगामा खड़ा हो गया।

बिहार में पक्ष और विपक्ष में काफी संघर्ष भी हुए।

इस संघर्ष से लालू प्रसाद जैसे सामान्य नेता पिछड़ों के महाबली नेता बन गए।

मेरी समझ से इसका श्रेय आरक्षण विरोधियों को ही जाता है।

विरोध नहीं हुआ होता तो सामान्य ढंग की राजनीति पहले जैसी ही चलती रहती।कोई सवर्ण मुख्य मंत्री भी बन जाता।

............................

तब बिहार विधान सभा के प्रेस रूम बैठकर मैं लगातार यह कहता रहा कि आरक्षण का विरोध नहीं होना चाहिए।(1993 में तो सुप्रीम कोर्ट ने मंडल आरक्षण पर अपनी मुहर भी लगा दी।)

 मैं आरक्षण विरोधियों से यह भी कहता था कि ‘‘गज नहीं फाड़िएगा तो थान हारना पड़ेगा।’’

कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा को थान हारने वाली मेरी वह बात आज भी याद है।वे हमारे बीच मौजूद हैं।शंका हो तो फोन पर पूछ लीजिएगा।

...........................

अब सवाल है कि थान कैसे हारे ?

यदि मंडल आरक्षण का कड़ा विरोध नहीं होता तो बिहार में कोई सवर्ण योग्य नेता मुख्य मंत्री बनने से वंचित नहीं हो जाता।

यह संयोग नहीं है कि सन 1990 से अब तक कोई सवर्ण बिहार का मुख्य मंत्री नहीं बन सका।

वह भी संयोग नहीं था जब हमंे आजादी मिली तो कांग्रेस ऐसे मामले में अतिवादिता के दूसरे छोर पर थी।

याद कीजिए कांग्रेस को बिहार विधान सभा जब- जब अपने बल पर पूर्ण बहुमत मिला,उसने चुन-चुन कर सिर्फ सवर्णों को ही मुख्य मंत्री बनाया।

...............................

और अंत में 

.............

चैधरी चरण सिंह ने बहुत पीड़ा के साथ एक बार कहा था कि ‘‘मुझे लोग जाट नेता कहते हैं।जबकि हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल में सिर्फ एक ही जाट था,वह भी राज्य मंत्री था।दूसरी ओर, राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में 15 ब्राह्मण कैबिनेट मंत्री  हैं।फिर भी उन्हें कोई जातिवादी नहीं कहता।’’     

.......................................

जहां तक प्रतिभा की बात है,आजादी के तत्काल बाद की सरकारों  में शामिल सत्ताधारी नेताओं में सारे प्रमुख नेता व अफसर आॅक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़े थे।फिर भी सरकारी  1 रुपया घिसकर 1985 आते- आते सिर्फ 15 पैसे ही रह गया था।यानी 100 सरकारी पैसे दिल्ली से चलते थे,पर गांव तक पहुंचते-पहुंचते सिर्फ 15 पैसे रह जाते थे।

बाकी भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते थे।

अन्य विफलताएं भी सामने आईं।

.........................................

21 जनवरी 23                                           




                                             



लालू प्रसाद का बड़प्पन

  ............................

   सुरेंद्र किशोर

  ........................

यह बात तब की है जब पिछली बार लालू प्रसाद पटना आए थे।

मेरे एक मित्र उनसे मिलने गए हुए थे।

लालू जी ने उनसे पूछा,‘‘सुरेन्दर भाई तोहरे बगल में रहते हैं ?’’

उन्होंने कहा कि ‘‘हां’’

लालू जी ने कहा कि ‘‘उनका के हमर सलाम कहीह !’’

.......................

मुझे जब यह बात बताई गई तो मैंने सोचा कि सिंगापुर से जब वे लौटेंगे तो मैं उनसे मिलूंगा,यदि वे समय देंगे तो।

खैर, यह तो सामान्य शिष्टाचार वाली बात हुई।

इससे बड़ी बात आगे बताऊंगा जिसे मैं उनका बड़प्पन मानता हूं।

थोड़ी आपसी संबंध की पृष्ठभूमि बता दूं।

1969 से मैं लालू जी को जानता हूं।

उस साल बिहार समाजवादी युवजन सभा के जो तीन संयुक्त सचिव चुने गए थे उनमें मैं, लालू जी और शांति देवी (बेगूसराय)थीं।

शिवानंद तिवारी सचिव चुने गए थे।

बाद के वर्षों में भी यदाकदा लालू प्रसाद से मुलाकातें होती रहीं,खास कर जेपी आंदोलन के दिनांे में भी।

..........................

 वे सन 1990 में मुख्य मंत्री बने ।

  एक संवाददाता के रूप में मेरी उनसे मुलाकात होने लगी।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘सहयोग कर।मिलजुल के राज चलावे के बा।’’

मैंने कुछ कहा नहीं।

दरअसल उन्हें इस बात का अनुमान नहीं था कि मेरी सक्रिय राजनीति में अब कोई रूचि नहीं है।

खैर, जब उनकी सरकार की कमियां मुझे नजर आने लगीं तो मैं ‘जनसत्ता’ में एक पेशेवर पत्रकार के रूप में लिखने लगा।

उसी अनुपात में वे मुझसे नाराज होने लगे।

हालांकि मंडल आरक्षण का लालू प्रसाद ने जिस तरह बचाव किया और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ वे जिस तरह हमलावर रहे,उस काम के लिए मैं उनका प्रशंसक

रहा।मैं सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण को जरूरी मानता रहा हूं।

तदनुसार मैं आरक्षण के पक्ष में लिखता रहा।किंतु मैं उनके अन्य विवादास्पद कामों का बचाव नहीं कर सकता था,नहीं किया।

 .................................

दरअसल जब कोई पत्रकार किसी नेता की गलतियों को उजागर करता है तो उस नेता के मन में

कई तरह के विचार आते हैं-

जैसे

 1.पत्रकार जातीय भावना से लिख रहा है।

2.-मेरा राजनीतिक विरोधी के इशारे पर लिख रहा है

3.-मेरा भयादोहन करके मुझसे कुछ पाना चाहता है।

आदि .....आदि

..............................

2005 में लालू प्रसाद की पार्टी बिहार की सत्ता से हट गई।

उसके बाद के वर्षों में भी लालू प्रसाद मेरे बारे में जानते-सुनते रहे।

उन्होंने देखा कि अब भी सुरेंदर के चाल,चरित्र चिंतन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो मेरे बारे में उनके विचार बदले।जिसमें बड़प्पन होता है,वह असलियत जान लेने के बाद अपना विचार बदल लेता है।

बदले हुए विचार के तहत लालू प्रसाद ने कई माह पहले मेरे बारे में जो विचार प्रकट किए,वह 

मेरे लिए ‘‘भारत रत्न’’ के समान है।

..............................

एक पुस्तक लेखक लालू प्रसाद से मिलने रांची जेल में गये थे।

वे जेपी आंदोलन पर लिखना चाहते थे।

उनसे लालू जी ने कहा कि ‘‘यहां काहे  आ गए।पटना में सुरेंदर किशोर से बात कर लीजिए।

जेपी आंदोलन का सब कुछ वह जानता है।ईमानदारी से सब बात बता देगा ।उसमें किसकी कैसी भूमिका थी,वह सब जानता है।

अंत में लालू जी ने मेरे बारे में कहा कि ‘‘सुरेन्दर संत है,फकीर है , 24 कैरेट का सोना है।’’

(लगे हाथ यह भी बता दूं कि अधिकतर पत्रकार सहित समाज के अन्य मुखर वर्ग के लोगों के चाल,चरित्र,चिंतन के बारे में वह नेता सबसे अधिक जानता है जो कम से कम 5 साल तक भी राज्य का मुख्य मंत्री रह चुका हो।अधिक दिनों तक मुख्य मंत्री रह जाने वाला नेता तो और भी अधिक जानता है।)

.....................................

अभी वे स्वास्थ्य लाभ कर रहे है।

मैं लालू प्रसाद के दीर्घ जीवन की कामना करता हूं।

इसलिए कि वे बिहार को सतत विकसित होते हुए लंबे समय तक अपनी आंखों से देखें।

जिस तरह मेरे बारे में उनके विचार बदले,उसी तरह वे अपने एक पुराने विचार को भी बदल लें ।

जब वे सत्ता में थे तो उनका यह विचार था कि ‘‘विकास से वोट नहीं मिलते,बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हैं।’’

अब वे खुद देख लें कि किस तरह विकास से भी वोट मिलते हैं और सामाजिक समीकरण की भी उसमें भूमिका रहती है।

.................................

29 जनवरी 23    

 

 


शनिवार, 28 जनवरी 2023

    

 

बी.बी.सी.की पक्षपाती डाक्युमेंट्री का 

लाभ अंततः भाजपा को मिलेगा

........................................

इंदिरा गांधी और लालू प्रसाद को भी ऐसे ही 

मामलों में चुनावी लाभ मिल चुके हैं।

.....................................

सुरेंद्र किशोर

.................................

जहां कम लोग मरे ,वहां के बारे में तो बी. बी. सी. की डाक्युमेंट्री फिल्म आ गई।

पर,जहां बहुत अधिक लोगों का एकतरफा संहार हुआ,वहां के बारे में चुप्पी रही। 

 ..........................

कम से कम दो मामलों में इस देश में पहले भी ऐसा लाभ उन्होंने उठाया जिनका विरोध हुआ।

.............................

सन 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत आरक्षण की घोषणा हुई।

आरक्षण विरोधियों ने आंदोलन शुरू कर दिया।

बिहार के तब के मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने लोगों से कहा कि ‘‘हम तो सामाजिक अन्याय को समाप्त करना चाहते हैं और आरक्षण विरोधी लोग हमें ही गद्दी से हटा देना चाहते हैं।’’

52 प्रतिशत पिछड़ी आबादी पर लालू प्रसाद की बातों का असर हुआ।नतीजतन 1991 के लोक सभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल और उनके सहयोगी दलों ने बिहार की अधिकतर लोक सभा सीटें जीत लीं।

.............................

उससे पहले सन 1969 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया।

 उनकी सरकार ने पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स व विशेषाधिकार समाप्त किए। 

14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।

आम लोगों को लगा कि सचमुच इंदिरा गांधी गरीबी हटाना चाहती है।

लोगों ने इंदिरा कांग्रेस को लोक सभा चुनाव में भारी बहुमत से जिता दिया।

.....................................

 अब आप देश के मौजूदा हालात पर गौर करिए।

 बी.बी.सी.ने गलत तथ्यों और कुतर्कों पर आधारित डाक्युमेंट्री बनाई।

  इस देश के भाजपा विरोधी लोगों ने प्रतिबंध के बावजूद उसे प्रदर्शित किया।

..........................

आज इस देश के बहुसंख्य लोगों को यह लग रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार बड़े- बड़े घोटालेबाजांे और जेहादियों-आतंकियों  से कठिन लड़ाई लड़ रही है।

  दूसरी ओर, तरह-तरह के तत्व मोदी सरकार को येन केन प्रकारेण अपदस्थ करना चाहते हैं।

इंडिया टुडे -सी.वोटर के ताजा सर्वे के अनुसार ‘‘देश का मिजाज’’ यह है कि आज लोस का चुनाव हो जाए तो भाजपा को 298 सीटें मिलेंगी।

सर्वे के अनुसार 67 प्रतिशत लोग मोदी सरकार के काम काज से बेहद संतुष्ट हैं।

वैसे तो 2024 के लोस चुनाव में अभी दर है।

यदि इस बीच पूरा प्रतिपक्ष एकजुट हो जाए तो यह आंकड़ा बदल सकता है।

किंतु क्या पूरे प्रतिपक्ष को चुनाव के लिए एकजुट करना आसान काम है ? 

...................................

 गुजरात दंगा पूर्व नियोजित 

साजिश नहीं --सुप्रीम कोर्ट

24 जून, 2022

..................................... 

2002 का गुजरात दंगा बनाम 

  1984 का सिख नर संहार

 --1989 का भागलपुर दंगा।

मृतकों के आंकड़ों की तुलना कर लीजिए

   ..........

गुजरात दंगे के दौरान पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की जान भीड़ से बचाने के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को भी फोन किए गए थे।

किंतु दंगाइयों से पूर्व सांसद को नहीं बचाया जा सका।

.....................................

सन 1984 में दिल्ली में जब सिख संहार हो रहे थे तो तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने अपने रिश्तेदारों और मित्रों को दंगाइयों से बचाने के लिए कई बार प्रधान मंत्री राजीव गांधी और गृह मंत्री पी वी नरसिंह राव को फोन किए।

उनलोगों ने राष्ट्रपति तक के फोन नहीं उठाए।

ज्ञानी जैल सिंह ने बाद में अपने जीवनी लेखक से कहा था कि राजीव गांधी के प्रधान मंत्री बनने के दो-तीन दिनों के बाद से ही उनसे मतभेद शुरू हो गए थे।

क्या मतभेद का यही कारण था कि राष्ट्रपति के रिश्तेदारों-मित्रों को प्रधान मंत्री दंगाइयों से नहीं बचा सके ?

.......................................

‘खुशामद सिंह’ के नाम से चर्चित पत्रकार-लेखक खुशवंत सिंह के फोन भी किसी सत्ताधारी हस्ती ने 1984 में नहीं उठाए जबकि नेहरू-गांधी परिवार खासकर संजय गांधी का  इमरजेंसी में भी खुशवंत सिंह ने समर्थन किया था।

1984 में खुशवंत सिंह भी दंगाइयों से अपने लोगों की जान बचाना चाहते थे।

....................................................................

मनमोहन सिंह ने सन 1984 में सेना नहीं बुलाने 

के लिए गृह मंत्री पीवी नरसिंह राव को दोषी माना।

याद रहे कि मनमोहन ने 

प्रधान मंत्री राजीव गांधी को दोषी नहीं माना।

आश्चर्य है।

   यदि वे उन्हें दोषी मान लेते तो 2004 में प्रधान मंत्री कैसे बनते ?

याद रहे कि एक से 4 नवंबर 1984 तक दिल्ली में सिख संहार होता रहा।पुलिस बल मूक दर्शक या मददगार बना रहा।

......................................

पर जब 2002 में 59 कार सेवकों को गोधरा स्टेशन पर ट्रेन में पेट्रोल छिड़क कर जिन्दा जला देने के बाद धरती हिली तो कांग्रेसी तथा दूसरे अनेक वोट लोलुप दलों व पैसालोलुप या दिग्भ्रमित बुद्धिजीवियों ने आसमान सिर पर उठा लिया।

काश ! इसी तरह का उनका रुख-रवैया यदि सिख संहार व भागलपुर दंगे पर भी रहता तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दू सांप्रदायिक तत्व सिर नहीं उठाते।

  इसी तरह के दोहरे मापदंड के कारण नरेंद्र मोदी आज प्रधान मंत्री हैं और आगे नहीं रहेंगे,इसकी कोई गारंटी भी नहीं।

  क्योंकि इस देश के ढोंगी सेक्युलरिस्टों का दोहरा मापदंड आज भी कायम है। 

...............................................

सिख संहार के केस में वरिष्ठ कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा पर मुहर लगाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर, 2018 को कहा था कि 

‘‘ 1 से 4 नवंबर तक पूरी दिल्ली में 2733 सिखों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

उनके घरों को नष्ट कर दिया गया था।

देश के बाकी हिस्सों में भी हजारों सिख मारे गए थे।सिखों का एकतरफा संहार हुआ था।

इस भयावह त्रासदी के अपराधियों के बड़े समूह को राजनीतिक संरक्षण का लाभ मिला और जांच एजेंसियों से भी उन्हें मदद मिली।’’

..........................................

अब गुजरात दंगे और 1989 के भागलपुर दंगे की तुलना करते हैं।

............................................

मनमोहन सिंह सरकार ने संसद को बताया था कि गुजरात दंगे में अल्पसंख्यक समुदाय के 790 और  बहुसंख्यक समुदाय के 254 लोग मरे।

गुजरात दंगे में दंगाई भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश में 

200 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे।

गुजरात पुलिस ने दंगाइयों पर जो गोलियां चर्लाइं,उस कारण भी दर्जनों लोग मारे गए थे।

 गुजरात में दंगा में

सिर्फ नौ जानें जाने के बाद ही वहां सेना सड़कों पर थी।

.................................................

इसके विपरीत 1989 के दंगे में भागलपुर में अल्पसंख्यक समुदाय के 900 और बहुसंख्यक समुदाय के 100 लोग मरे।

पुलिस की गोलियों से वहां कितने दंगाई मारे गए ?

मुझे नहीं मालूम।भागलपुर दंगे को हैंडिल करने में कांग्रेस सरकार की भूमिका विवादास्पद रही।

..........................................

अधिक क्रूर दंगा 2002 में गुजरात में हुआ या 1989 में भागलपुर में ?

आंकड़े तो बता रहे हैं कि भागलपुर में अधिक क्रूरता हुई।

क्योंकि जहां अपेक्षाकृत अधिक लोगों को मारा जाता है,उसे अधिक क्रूर कहा जाता है।

फिर भी बी.बी.सी.ने कम हिंसा वाली जगह पर फिल्म बनाई और अधिक हिंसा को नजरअंदाज किया।

  ..........................

 फिल्म बनाना कोई सामान्य बात नहीं है।

इसके पीछे गूढ़ रहस्य है।

क्या रहस्य है?

पता लगाइए।

........................

28 जनवरी 23


 



जब कम खतरे में अधिक मुनाफा हो तो कैसे 

थमेगा सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार ?

........................................

स्टिंग आॅपरेशन की राह कारगर

 ....................................

सुरेंद्र किशोर

...............................

बिहार सरकार के निगरानी जांच ब्यूरो की पड़ताल के बाद हाल में यह पता चला है कि एक करोड़पति क्लर्क आालीशान माॅल का भी मालिक है।

आरोप है कि ग्रामीण कार्य विभाग के उस क्लर्क ने इसके अलावा भी काफी नाजायज संपत्ति बना रखी है।

ऐसे  मामले आते ही रहते हैं।पर,भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा है।क्योंकि भ्रष्टाचार की जड़ में कोई सरकार मट्ठा नहीं डाल रही है।उसकी डालियां काटी जा रही हैं।

    इसी क्लर्क की काली कमाई क्या उसके ऊपर के अधिकारियों से उसकी सांठ गांठ के बिना संभव थी ?

बिलकुल नहीं।

  यदि क्लर्क का नार्को-पाॅलीग्राफिक-ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराया जाए तो वह यह तथ्य उगल देगा कि उसने नाजायज धनोपार्जन के लिए अपने ऊपर और नीचे के कितने अफसरों और सरकारी -गैर सरकारी लोगों से सहयोग लिया था।

 यदि उन सबकी संपत्ति की जांच इस क्लर्क की जांच के साथ ही हो जाए और सब पर मुकदमा चलाया जाए तो भ्रष्ट प्रशासक डरेंगे।

यदि यह काम करने के लिए अभी कोई कानून उपलब्ध नहीं हो तो वैसा कानून बनाया जाना चाहिए।

  इस देश यह आम धारणा बन चुकी है कि सरकारी भ्रष्टाचार कम खतरे और ज्यादा मुनाफे का धंधा है।   

......................

और अंत में

...................  

पटना जिले के बेलछी अंचल के राजस्व कर्मचारी को  निलंबित कर दिया गया।

उस पर रिश्वतखोरी का आरोप है।

रिश्वत मांगने संबंधी ओडियो वायरल हुआ।

यानी, उस कर्मचारी की गिरफ्तारी तभी संभव हुई जब उसके खिलाफ स्टिंग आपरेशन हुआ।

जानकार लोग बताते हैं कि यदि स्टिंग आपरेशन्स को व्यापक बनाया जाए,तो सरकारी दफ्तरों के भ्रष्ट तत्वों में काफी भय पैदा होगा।

अभी निजी प्रयासों से ही छिटपुट स्टिंग हो रहे हैं।

क्या बिहार सरकार का निगरानी ब्यूरो खुद अपनी एक स्टिंग आपरेशन शाखा नहीं खोल सकता ?

वह शाखा गुप्त ढंग से अपना काम करे।

केंद्र सरकार का इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य पुलिस का स्पेशल ब्रांच देशहित में गुप्त तरीके से बहुत सारी सूचनाएं एकत्र करता ही रहता है।

 भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए यदि लीक से हट कर भी कोई उपाय करना पड़े तो वह देशहित का ही काम होगा।क्योंकि सामान्य व परंपरागत उपायों से तो भ्रष्टाचार कम हो ही नहीं रहा है।

..............................

साप्ताहिक काॅलम ‘कानांेकान’

प्रभात खबर,पटना

23 जनवरी 23