शनिवार, 29 जुलाई 2023

  बिहार में ही क्यों,पूरे देश में जातिवाद है,

पर, इस राज्य के रिश्वत खोर और दहेज 

दानव कभी जातिवाद नहीं करते  

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      --सुरेंद्र किशोर--

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कुछ लोग कहते हैं कि बिहार में बहुत जातिवाद है।

किंतु मेरा मानना है कि रिश्वत-खोरी और दहेज-खोरी 

के क्षेत्रों में कोई जातिवाद नहीं है।

(हां,उत्तर बिहार के कतिपय समाजिक समूह में दहेज का प्रचलन नहीं रहा है।क्या अब भी वही स्थिति है ?मुझे नहीं मालूम।कोई बताए।)

सरकारी दफ्तरों के ‘‘आदतन भ्रष्ट रिश्वतखोर’’ अपनी जाति को भी नहीं बख्शते।

वे तुरंत कह देते हैं कि ‘‘अरे यार,मुझे ऊपर भी तो पहुंचाना पड़ता है।’’

ऐसा है तांे फिर भैया,अपना हिस्सा तो छोड़ दो।

इस पर वे कहते हैं कि हमारे भी तो बाल-बच्चे हैं।

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दहेज दानव तो और अधिक क्रूर होते हैं।वह तो जाति के भीतर का ही मामला है। 

कुछ सरकारी कामों को तो आप टाल भी सकते हैं।

पर,बिटिया की शादी 

तो नहीं टल सकती।

मेरी पांच बहनों की शादियों में बारी-बारीे से औसतन पांच बीघे जमीन बिक गयी थी।

हमारे पास तो बेचने के लिए जमीन थी और है भी ,तो काम चल गया,अब भी मेरा कोई बड़ा काम जमीन बेच कर ही होता है।

पर, जिनके पास साधन सीमित हैं,वे तो उस  क्षण को कोसते होंगे जिस क्षण उनके यहां बिटिया पैदा हुई थी।  

’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के बारे में एक बात सुनी थी।

बात अपुष्ट है,इसलिए 

जो अधिक जानकार हों,वे मुझे बताएं।मैं खुद को सुधार लूंगा।

उनकी कन्या की शादी होनी थी।

उन्हीें दिनों उन्हें सवा लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।

जिस लड़के वाले के यहां राष्ट्रकवि जाते थे,उसकी नजर उस सवा लाख पर ही लगी होती थी।

पता नहीं, संवेदनशील दिनकर जी ने कैसे चीजों को संभाला होगा !

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दिनकर जी पर आज उनके स्वजातीय सहित पूरा समाज -देश गर्व करता है।

करना भी चाहिए।

पर,उस पीड़ा के दौर से किसने उनको बाहर किया होगा,इस पर मैं अपनी कल्पना के घोड़े ही दौड़ा सकता हूं।

(आज भी जो अत्यंत थोड़े से लोगों का जो ईमानदारी की कमाई पर किसी तरह जीवित हैं, कितने लोग ध्यान रखते हैं ?)

मेरे फेसबुक मित्र डा.रामवचन राय इस संबंध में दिनकर जी पर बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं।

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आज की पीढ़ी के एक ‘अर्धाक्षर’ (साक्षर और निरक्षर के बीच का यह शब्द कैसा रहेगा !)पत्रकार ने दिनकर के बारे में हाल में कहीं लिख दिया कि ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ लिखने के बाद जब प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू नाराज हो गये तो दिनकर जेपी के साथ हो लिए।

अरे अर्ध ज्ञानी जी महाराज, आजादी के हीरो जेपी पर दिनकर ने प्रारंभिक दिनों में ही कविता लिख दी थी।

जब डा.लोहिया ने दिनकर से कहा कि जेपी पर तुमने लिखा,मुझ पर लिखो।

दिनकर का जवाब था-जेपी ने मुझे जितना प्रभावित किया,उतना आप भी प्रभावित कर देंगे तो मैं लिख दूंगा।

खैर,लगे हाथ यह भी बता दूं कि जेपी की चिट्ठी पर ही नेहरू जी ने दिनकर जी को पहली बार राज्य सभा का सदस्य बनाया था।

दूसरी और तीसरी बार भी बने।

चैथी बार नहीं बने।

चीनी आक्रमण के बाद यदि दिनकर ‘‘परशुराम की प्रतीक्षा’’ नहीं लिखते तो आगंे भी वे राज्य सभा में होते।

पर,दिनकर सहित उन दिनों की कई हस्तियों के लिए देश पहले था, पद बाद में।

  राजनीति में तब आज जैसा कलियुग नहीं आया था।अपवादों को छोड़कर आज के इस युग को राजनीति के कलियुग के बदले ‘‘दुर्योधन युग’’ ही कहना शायद बेहतर  होगा।

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 29 जुलाई 23  

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(यह पोस्ट उन पर लागू नहीं होता है जो आज के दौर में भी दहेज या रिश्वत नहीं लेते और अपनी -अपनी जगह में के.के.पाठक की तरह ही निडर और कर्तव्यनिष्ठ बने हुए हैं।) 


 


बुधवार, 26 जुलाई 2023

 एक अनुमान के अनुसार इस देश में करीब 14 लाख 

करोड़ रुपए का काला धन हर साल पैदा हो रहा है

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     --सुरेंद्र किशोर--

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एक मोटे अनुमान के अनुसार इस देश की केंद्र और राज्य सरकारों के कुल सालाना बजट करीब 70 लाख करोड़ रुपए के होतेे हैं।

   अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर सरकारी कामों में कमीशन या घूसखोरी की दर आम तौर पर औसतन 20 प्रतिशत है।

यानी, 14 लाख करोड़ रुपए का काला धन हर साल पैदा हो रहा है।

ये 14 लाख करोड़ रुपए किन -किन लोगों की जेबों में

जाते हैं, जरा आप भी मेरी जानकारी बढ़ाइएगा।

इतने पैसों का कितना उपयोग देशहित में होता है और कितना राष्ट्रद्रोह के काम में ?

इनमें से कितने पैसे हवाला के जरिए या दूसरे उपायों से विदेशों में भेज दिए जाते हैं ?

(इस देश के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री पर यह आरोप है कि उसने छह देशों में डेढ़ लाख करोड़ रुपयों की निजी संपत्ति बनाई है।इ.डी. उसकी जांच कर रही है।)

  हर साल करीब एक लाख लोग भारत की नागरिकता छोड़कर विदेशों में बस रहे हैं।

उन में से कितने लोगों ने इस देश को लूटने के बाद विदेश में बसने का निर्णय किया है ?

भारत में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है।

हमारे संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में यह लिखा गया है कि लोगों के बीच आर्थिक विषमता कम करने की शासन कोशिश करेगा।

आदि ...आदि 

और, कोई बात हो तो बताइए।

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नोट-बगोदर के माले विधायक दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह वहां के सरकारी अफसरों से घूस लौटवाने का अभियान चलाते रहते थे।वे कभी चुनाव नहीं हारे।

महेंद्र जी जन दबाव से घूस वापस करा भी देते थे जो आम जनता से लिए गए होते थे।

जब वे बिहार विधान सभा में बोलते थे तो सभी पक्षों के लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे।

  आज के ‘भ्रष्ट युग’ में भी यदि कोई राजनीतिक संगठन अंचल स्तर से राज्य स्तर तक के भ्रष्ट अफसरों आदि पर जन दबाव डाल कर घूस वापस कराने का सत्याग्रह करे तो वह राजनीतिक दल थोड़े ही दिनों में काफी लोकप्रिय हो जाएगा।पर,समस्या यही है कि आज महेंद्र सिंह जैसा कार्यकर्ता या नेता ढूंढ़ना बहुत मुश्किल काम है।

  याद रहे कि आज घूस के बिना सरकारी दफ्तरों में कहीं कोई काम नहीं हो रहा है,अपवादों की बात और है।

एक तरफ सरकारी पैसों की भारी लूट है और दूसरी तरफ अधिकतर सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। 

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25 जुलाई 23 

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  जाली कागजात के आधार पर ताज महल और लाल किले तक को बेच देने वाला नटवर लाल एक बार खुद ठगी का शिकार बन गया था

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सुरेंद्र किशोर

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करीब चार सौ लोगों को बारी -बारी से ठगने वाला नटवर लाल सत्तर के दशक में खुद ठगी का शिकार बन गया था।

  दशकों के उसके आपराधिक जीवन में उसने ताज महल और लाल किले तक को बेच डाला था।

संसद भवन को बेचने के लिए तो उसने राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद का नकली हस्ताक्षर कर दिया था।

  यह संयोग ही था कि डा.प्रसाद और नटवरलाल दोनों बिहार के अविभाजित सारण जिले के जिरादेई के मूल निवासी थे।अब जिरादेई सिवान जिले में है।

राजेंद्र बाबू के छात्र जीवन में एक परीक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका में लिख दिया था कि परीक्षार्थी यानी राजेन्द्र प्रसाद परीक्षक से भी अधिक ज्ञानवान  है।

  उधर नटवरलाल शब्द, संज्ञा से सर्वनाम बन चुका है।

 मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल के जयपुर में ठगे जाने की कहानी शकील अख्तर ने लिखी है।

  सन 1970 में नटवरलाल जयपुर केंद्रीय जेल का ‘मेहमान’ था।

उस समय उसकी उम्र 55 साल थी।

नटवर जब जेल लाया गया,उस समय उसके पास दो महंगे सूट थे।

जेल नियम के अनुसार दोनों सूट जेल में जमा कर लिए गए।

एक दिन एक जेल अधिकारी नटवर लाल का शानदार बंद गले का सूट

पहनकर नटवर से मिलने पहुंच गया।

अपना सूट दूसरे के शरीर पर देखकर नटवर चैंका।

उसने कहा कि यह तो मेरा सूट है,आपने कैसे पहन लिया ?

यह तो जेल में जमा रहना चाहिए।

जेल अधिकारी ने कहा कि आप तो इस सूट को वापस ले चुके हैं।

आपने हमारे रजिस्टर में इसे वापस करने के दस्तखत किये हैं।

नटवर बड़ा भन्नाया।

उसने सख्ती से कहा कि मैंने तो इसे वापस लिया ही नहीं।

जेल अधिकारी ने बड़े इत्मीनान से उसे जेल का  इंट्री रजिस्टर लाकर दिखा दिया।

  वहां वाकई दोनों सूट वापस लेने के लिए नटवरलाल के दस्तखत मौजूद थे।

एकदम असली दस्तखत।

ठग सम्राट बुरी तरह चैंेक गया।

यह नटवर की कल्पना से परे था।

जयपुर के उस जेल अफसर ने नटवरलाल को कांगजों में ही उसे मात दे दी थी।

जेल अफसर ने इस घटना का मजा लेते हुए बताया कि हमारे जेल में आने वाले हर कैदी की एंट्री के लिए एक रजिस्टर होता है।

उसमें हम उससे संबंधित जानकारियां दर्ज करते हैं।

उसी में कैदी के साथ जो सामान होता है,उसे जमा करके लिखा जाता है।

 उसमें दो सूट जमा थे।

एक बार पेशी की तारीख पर नटवर लाल बाहर गया था।

जाते समय वह अपना एक सूट ले गया।

 उस सूट की प्राप्ति के दस्तखत उसने किए थे।

 ठीक उसके नीचे उसका दूसरा सूट दर्ज था।

जेल अधिकारी ने कहा कि मैंने किया यह कि नटवर लाल ने जो एक सूट की प्राप्ति के दस्तखत किए थे उस दस्तखत के आगे एक कोष्ठक बना दिया।

अब वह दस्तखत दोनों सूटों की प्राप्ति के लिए हो गया।

पहली नजर में सीधे-सादे सामान्य से दिखने वाले नटवरलाल को जयपुर जेल में कड़े बंदोबस्त के साथ रखा गया था।

  जेलों से अक्सर भाग जाने का उसका इतिहास था।

इसलिए नटवर को फांसी की कोठरी नंबर दो में रखा गया था।

 पर,यह नटवर को मंजूर नहीं था।

उसने जयपुर के सेशन कोर्ट में अपील की।उसकी अपील अलग कोठरी में बंद किए जाने के खिलाफ थी।

वकालत की पढ़ाई कर चुका नटवर ने कहा कि उसे ‘कंडम सेल’ में रखा गया है,जो नियम के खिलाफ है।

जेल अधिकारी इस अपील के बाद परेशानी में पड़ गये।

जेल अधिकारी चाहते थे कि उसकी अपील मंजूर न हो।अन्यथा उसके लिए विशेष सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

 क्योंकि नटवर लाल बेहद शातिर था।वह बात करने में उस्ताद था।

किसी को भी वह जल्दी ही प्रभावित कर लेता था।

जेल शासन ने कोर्ट में ऐसी बहस की कि नटवर की अपील खारिज हो गयी।

नटवर लाल की कहानी अद्भुत है।

अब तो वह दंत कथाओं का पात्र बन चुका है।

सन 1912 में जन्मे नटवरलाल के बारे में नटवर लाल के भाई ने सन 2009 में कोर्ट में यह हलफनामा दिया कि नटवर लाल की मृत्यु 13 साल पहले हो चुकी है।

  याद रहे कि अदालत के आदेश से पुलिस 24 जून 1996 को नटवर लाल को कानपुर जेल से इलाज के लिए दिल्ली ले गई।लौटते समय यानी 25 जून को दिल्ली स्टेशन पर से संतरियों को चकमा देकर नटवरलाल फरार हो गया।उस समय उसकी उम्र 84 साल थी।उसके बाद वह कहीं नहीं देखा गया।

वैसे तो नटवर लाल ने वाराणसी से ठगी की शुरूआत की थी।पर,उसके खिलाफ आठ राज्यों में 100 मुकदमे दायर हुए थे।

उसके 52 छद्म नाम थे।

उसे कुल मिलाकर 113 वर्षों की सजा हो चुकी थी।

उसके खिलाफ सबसे चर्चित मामला

दिल्ली की कुछ मश्हूर इमारतों को बेच देने का था।

उसने अफसर बन कर विदेशियों को  ताज महल,लाल किला,राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को बेच दिया।उसके लिए उसने जाली कागजात तैयार कर लिए थे।

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19 जुलाई 23

   


मंगलवार, 25 जुलाई 2023

      इस देश में निजी टी.वी. चैनलों पर हो रहे वाद-विवाद का स्तर अधिक ऊंचा है या संसद-विधान मंडलों के वाद-विवाद का स्तर अधिक ऊंचा है ?

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 ऐसे डिबेट्स से हमारी नयी पीढ़ी कैसी शिक्षा ,संस्कृति और जानकारियां हासिल कर रही हैं ?

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इससे नयी पीढ़ी के दिल ओ दिमाग में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति सकारात्मक धारणा बन रही है या नकारात्मक ?

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     --सुरेंद्र किशोर

     25 जुलाई 23



रविवार, 23 जुलाई 2023

    वजन अधिक है तो दुर्घटना होने पर अधिक हड्डियां टूटेंगी

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         सुरेंद्र किशोर

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सड़क दुर्घटनाएं रोकना आपके वश में नहीं होता है।

किंतु अपने बढ़ते वजन पर काबू पाना आपके वश में है।

दुर्घटना होने पर अधिक मोटे लोगों की अधिक हड्डियां टूटती हैं।

सामान्य वजन वालों की कम हड्डियां टूटती हैं।

क्योंकि बढ़े वजन का बोझ हड्डियों को ही झेलना पड़ता है।

जिस करवट गिरोगे,बाकी शरीर का बोझ उसी हिस्से की हड्यिों को ही झेलना पड़ता है।

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सामान्य वजन किसे कहते हैं ?

यदि आपकी लंबाई 65 इंच है और आपका वजन 65 किलो ग्राम है तो उसे सामान्य वजन कहेंगे।

हां, 5 किलो कम या 5 किलो अधिक चलेगा।

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अब आपको ही चुनाव करना है।

भोजन पर कंट्रोल करके और शारीरिक गतिविधियां बढ़ाकर वजन पर काबू रखना है या जीभ का गुलाम बन कर और आलसी जीवन बिता कर अधिकाधिक हड्डियां तुड़वानी हंै ?

इस देश में जितने लोग भूख-कुपोषण से मरते हैं,उससे अधिक लोग अति-भोजन से मरते हैं।वजन बढ़ने का एक कारण अति भोजन भी है।

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23 जुलाई 23



शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

   कैसे चलेगा वह देश जहां बेल 

   नियम और जेल अपवाद हो !

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       सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जस्टिस वी.आर.कृष्णा अय्यर ने कहा था कि ‘‘बेल नियम होना चाहिए और जेल अपवाद।’’

तिस्ता सितलवाड और ब्रजभूषण शरण सिंह को मिली जमानत के बाद मुझे कृष्णा अय्यर की वह मशहूर उक्ति याद आ गयी।

न्यायपालिका के भीष्म पितामह कहे जाने वाले कृष्णा अय्यर की उक्ति का अदालतें पालन कर रही हंै।

याद रहे कि जज बनने से पहले कृष्णा अय्यर सन 1957 में गठित ई.एम.एस.नम्बूदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार के मंत्री थे।

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यह संयोग नहीं है ।

 सन 2020 में आई.पी.सी.मामलों में इस देश में 59 प्रतिशत आरोपितों को अदालतों से सजा हुई थी।

पर सन 2021 में सजा की दर में दो प्रतिशत की कमी आ गयी।

सब जानते हैं कि बेल पर बाहर आने के बाद अधिकतर प्रभावशाली आरोपित कौन -कौन से जतन करते हैं।

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जापान में सजा की दर 99 प्रतिशत है और अमेरिका में 93 प्रतिशत।

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सन 2001 में वल्र्ड ट्रेंड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका में पहले से मौजूद संबंधित कानून को और भी कड़ा बनाया गया।

पर,उसके विपरीत सन 2004 में सत्ता में आने के बाद मनमोहन सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानून को ढीला कर दिया जबकि भारत में भी आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ आई हुई थी।

  नाइन एलेवेन की घटना के बाद पटना की एक बड़ी सेक्युलर हस्ती ने एक अखबार में लेख लिखा कि हमला यहूदियों ने किया था जबकि ओसामा बिन लादेन ने कहा कि हमारे आदमियों ने हमला किया है।मुद्दई सुस्त,गवाह चुस्त। 

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नेहरू युग में विदेश सेवा में आए एक रिटायर अफसर को टी.वी.पर एक बार यह बोलते हुए मैंने सुना था कि हमारे देश की  सीमाआंे पर यदि हम बाड़ लगाएंगे तो दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।तब उन्हें यही सिखाया गया था।

उस पर टी.वी.डिबेट में शामिल शिवसेना के सांसद ने उनसे सवाल किया--आप भारत के विदेश सचिव थे या बंाग्ला देश के  ?

ध्यान दीजिए आज घुसपैठियों की बाढ़ के कारण भारत में कैसी -कैसी विपत्तियां आ रही हैं।

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जस्टिस संतोष कुमार हेगडे ने कहा था कि इस देश के इस परंपरागत ‘‘न्याय शास्त्र’’ में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि 

‘‘भले 99 दोषी छूट जाएं किंतु एक भी निर्दोष को

सजा न मिले।’’

बदली हुई परिस्थिति में अब होना चह चाहिए

कि ‘‘कोई भी दोषी सजा से बच न पाए, भले इस सिलसिले में दो -चार निर्दोष फंस जाएं।’’

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आज हमारे यहां बड़ी -बड़ी शक्तियों सक्रिय हैं जो इस बात की कोशिश करती रहती है कि हमारे यहां सुशासन न आए।

भ्रष्टाचार न रुके।

चाहे सीमाओं की रक्षा का सवाल हो या शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने का प्रयास हो।

परीक्षा में चोरी रोकने पर तो यहां राज्य सरकार (नब्बे के दशक की उत्तर प्रदेश सरकार इसका उदाहरण है।)का ही पतन तक हो जाता है।

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और अंत में

एक स्कूली शिक्षक ने आठवीं कक्षा के छात्र से पूछा--

लोक सभा -विधान सभा के बारे में तुम कितना जानते हो ?

छात्र--ये वैसी जगहें हैं जहां बैठक शुरू होने के तुरंत बाद भारी हंगामा कर देने की मजबूरी होती है ताकि बैठक स्थगित हो जाए।

हम तो आपके क्लास रूम में कदम रखते ही शांत हो जाते हैं।

पर,लोक सभा -विधान सभा के हेड मास्टर लोगों (यानी स्पीकर)को भी वहां कोई कुछ नहीं समझता।

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21 जुलाई 23


  सन 1967 में दक्षिण पटना में साढ़े नौ सौ 

एकड़ में स्थापित लोहिया नगर को अब कोई

 लोहिया नगर नहीं कहता

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   सुरेंद्र किशोर

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पटना स्थित लोहिया नगर पोस्ट आॅफिस का नाम बदल कर अब कंकड़बाग पोस्ट आॅफिस कर दिया जाना चाहिए।

   क्योंकि जिस मुहल्ले में लोहिया नगर के नाम से पोस्ट आॅफिस अवस्थित है,उस मुहल्ले को अब कोई लोहिया नगर नहीं बोलता,न ही लिखता है।

यदि कोई लिखता-बोलता हो तो हमें जरूर बताएं।ं

 सन 1967 में करीब साढ़े नौ सौ एकड़ जमीन में लोहिया नगर बसाया गया था।

तब की महामाया प्रसाद सिन्हा सरकार में कई लोहियावादी मंत्री थे।

कर्पूरी ठाकुर तो उप मुख्य मंत्री ही थे।कट्टर लोहियावादी भोला प्रसाद सिंह एल.एस.जी.मंत्री थे।

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केंद्र सरकार ने जो पोस्ट आॅफिस स्थापित किया,उसका नाम लोहिया नगर रख दिया।

पर,समय बीतने के साथ यहां के लोगों ने लोहिया नगर का नाम लेना छोड़ दिया।

 उस इलाके में होने वाले शादी-विवाह ,अन्य समारोह ,सरकारी -गैर सरकारी कार्यक्रमों के कार्ड पर लोहिया नगर मैंने नहीं देखा।

अब सवाल है कि जिस मुहल्ले के पोस्ट आॅफिस का नाम लोहिया नगर पोस्ट आॅफिस है,उस मुहल्ले को लोगबाग लोहिया नगर क्यों नहीं कहते ?

क्या लोहिया के नाम से इतना एतराज है ?

यहां तक कि उस मुहल्ले के विकास व निर्माण कार्यों का जो सरकारी टंेडर होता है,उसमें भी कंकड़बाग ही लिखा होता हैंइसलिए सिर्फ पोस्ट आॅफिस ही क्यों ?

यह स्थिति लोहिया की याद को चिढ़ाने वाली है।

यह तो डा.लोहिया का अपमान भी है।

इसलिए पोस्ट आॅफिस का नाम जल्द बदल दिया जाना चाहिए।

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21 जुलाई 23