शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

 



आज के दैनिक जागरण में प्रकाशित 

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संकट में काम आने वाला मित्र है इजरायल

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सुरेंद्र किशोर

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कारगिल संघर्ष के साथ 1971 के युद्ध में भी इजरायल ने हमारी मदद की थी,जबकि तब उससे हमारा राजनयिक संबंध नहीं था

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मित्रों का चयन सदैव सोच-समझकर और अपने हितों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

यह बात अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में भी लागू होती है।

हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि जवाहरलाल नेहरू की ओर से अनुपयुक्त मित्र का चयन होने के कारण हमने चीन के हाथों पराजय झेली थी।

मित्र सोवियत संघ ने उस कठिन दौर में भारत की मदद नहीं की।

आखिरकार भारत को अमेरिका के सामने मदद के लिए हाथ पसारना पड़ा।

प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 

इजरायल से दोस्ती करके पाकिस्तान के खिलाफ  कारगिल की कठिन लड़ाई जीती।

1962 के आसपास हमें ‘‘साम्यवादी अंतरराष्ठ्रीयतावाद’’ से लड़ना पड़ा था।

 1962 में चीन से युद्ध के बाद सी.पी.आई. से निकल कर 1964 में गठित सीपीएम अर्थात माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई।वैसे सी.पी.आई. से निकल कर 

 1964 में गठित सी.पी.एम.में शामिल हुए नेताओं ने भी तब चीन का ही साथ दिया था।

आज हमें ‘‘इस्लामिक अंतरराष्ट्रीयतावाद’’ से जूझना पड़ रहा है।यह किसी से छिपा नहीं है कि 

इस मामले में देश के कुछ लोग,दल एवं संगठन राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग राय रखती हैं।

   कठिन दौर में इजरायल ही हमारी मदद कर सकता है,इसे  ध्यान रखते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने

इजरायल-हमास युद्ध में इजरायल के साथ खड़े होने का  निर्णय किया।यह निर्णय देशहित में है।  

कारगिल युद्ध के समय हमारी मदद करके इजरायल ने यह साबित  किया था कि गाढ़े वक्त में वही हमारी मदद कर सकता है।

 1971 के युद्ध के समय भी इजरायल ने हमारी मदद की थी, जबकि तब उससे हमारा राजनयिक संबंध नहीं था।

 इजरायल से भारत का पूर्ण  राजयनिक संबंध सन 1992 में  कायम हो सका ।तब तक संबंध न होने का कारण इस्लामी देशों की नाराजगी का भय भी था और वोट बैंक की घरेलू राजनीति भी।इजरायल से संबंधों को मजबूत बनाने में मोदी सरकार ने विशेष सक्रियता दिखई।

इसके चलते आज दोनों देशों के संबंध कहीं अधिक प्रगाढ़ हैं।

 1962 के युद्ध के समय में सोवियत संघ ने कहा था कि ‘‘हम मित्र भारत और भाई चीन के बीच के झगड़े में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।’’

 बाद में यह पता चला कि चीन ने भारत पर हमला करने से पहले सोवियत संघ की सहमति ले ली थी। 

यह सही बात है कि बांग्लादेश युद्ध के समय सोवियत संघ की मदद भारत के बहुत काम आई थी।

लेकिन उसने हमेशा अपनी कम्युनिस्ट विचार धारा के हिसाब  से ही कदम उठाए।

अधिकतर देश अपने राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर ही फैसले करते हैं,लेकिन आजादी के बाद भारत सरकार ने कई बार भावनाओं से काम लिया जो अव्यावहारिक साबित हुए और हमें उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े।

आज यदि  मोदी सरकार रूस-उक्रेन युद्ध में निष्पक्ष

है तो यह राष्ट्रहित में है।

  कारगिल संघर्ष के समय की विषम स्थिति को याद करें।

पाकिस्तानी  सैनिक तब ऊंची पहाड़ियों पर छितरे हुए थे।उन्हें वहां से भगाने के लिए हमारी सेना को उच्च तकनीकी वाले हथियार चाहिए थे।

इसके अतिरिक्त सेटेलाइट की सुविधा की जरूरत थी।

गोला-बारूद की भी कमी थी।

किसी अन्य देश ने हमारी मदद नहीं की।उस विकट स्थिति में इजरायल ने हमें सब कुछ दिया जिसकी हमें जरूरत थी।

यहां तक कि चालक रहित विमान और बराक मिसाइल सिस्टम भी।

अन्य देशों ने भारत को ऐसी मदद करने से इजरायल को रोका भी,लेकिन उसने उनकी परवाह न करके हमारी मदद की।

उस मदद के कारण हम पाकिस्तानी सैनिकों को अपने भूभाग से भगा सके।   

दूसरी ओर, यह देखें कि चीन युद्ध के समय सोवियत संघ ने 

क्या किया था ?

 1987 में मशहूर वकील व लेखक एजी.नूरानी ने चीनी दस्तावेजों और सोवियत प्रकाशन का संदर्भ देते हुए अपने शोध पूर्ण लेख में लिखा था, ‘‘जब चीनी नेताओं ने सोवियत संघ के नेता निकिता खु्रश्चेव को बताया कि सीमा पर भारत का रुख आक्रामक है तो उन्होंने भारत के खिलाफ चीनी कार्रवाई को मंजूरी दे दी।’’     

     नुरानी के अनुसार  2 नवंबर, 1963 के चीनी अखबार ‘द पीपुल्स डेली’ ने

लिखा था कि  8 अक्तूबर 1962 को चीनी नेता ने सोवियत राजदूत से कहा कि भारत हम पर हमला करने वाला है और 

यदि ऐसा हुआ तो चीन खुद अपनी रक्षा करेगा।’’

13 अक्तूबर 1962 को खु्रश्चेव ने चीनी राजदूत से कहा कि ‘हमें भी ऐसी जानकारी मिली है और 

यदि हम चीन की जगह होते तो हम भी वैसा ही कदम उठाते जैसा कदम उठाने को वह सोच रहा है।’

  इसके बाद  20 अक्तूबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला कर दिया।

   सोवियत संघ की ओर से चीन का समर्थन करने का प्रमाण  सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘प्रावदा’ में भी मिलता है।

25 अक्तूबर, 1962 को ‘प्रावदा’ ने अपने संपादकीय में लिखा कि चीन मैकमोहन रेखा को नहीं मानता और हम इस मामले में चीन का समर्थन करते हैं।

 5 नवंबर 1962 को इसी अखबार ने लिखा कि ‘‘भारत को चाहिए कि वह चीन की शर्त को मान ले।’’

चीनी हमले के समय हमारी सेना के पास न तो गर्म कपड़े थे और न ही जूते।

जब चीन ने हमला किया तो भारतीय सेना ने कैसे मुकाबला किया ?

 एक युद्ध संवाददाता के अनुसार ,

 ‘‘ हम युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

 हमारी सेना के पास अस्त्र,शस्त्र की बात छोड़िये,कपड़े तक नहीं थे।

 प्रधान मंत्री ने कभी सोचा ही नहीं था कि 

चीन  हम पर हमला करेगा।

अंबाला से 200 सैनिकों को एयरलिफ्ट किया गया था।

उन्होंने सूती कमीजें और निकरें पहन रखी थीं।

उन्हें बोमडीला में एयर ड्राप कर दिया गया

जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री था।

वे इतनी भीषण ठंड का सामना नहीं कर सके।

  14 नवंबर 1962 को रक्षा मंत्री वाई.बी.चव्हाण ने पुणे में कहा था,‘हमें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि चीन के खिलाफ सोवियत संघ हमारा साथ देगा।’

   कुल मिलाकर अतीत में जब हमने सही दोस्त का चयन नहीं किया तो हमारे साथ धोखा हुआ।

बाद  में जब हम  सावधान हुए तो स्थिति सकरात्मक दिशा में बदली।इसी कारण इजरायल से मित्रता घनिष्ठ हुई।

इस घनिष्ठमता को और बढ़ाने की जरूरत है,क्योंकि वह हमारा सच्चा मित्र है और संकट में हमारा साथ देता है।

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20 अक्तूबर 23 


सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

 


अखबारों का बढ़ता-घटता प्रसार 

भी चुनावी हवा का एक संकेतक

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सुरेंद्र किशोर

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अस्सी के दशक में मशहूर फिल्म अभिनेता एन.टी.रामाराव ‘तेलुगु स्वाभिमान’ के लिए संघर्षरत थे।

तेलुगु दैनिक ‘इनाड’ु ने उनका पूरा साथ दिया।

इनाडु की प्रसार संख्या बहुत बढ़ गयी।

एन.टी.रामराव को भी तब बहुत बड़ी चुनावी सफलताएं मिली थीं।

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उस दौरान ‘इनाडु’ के बढ़ते प्रसार से भी पहले ही यह पता चल गया था कि एन.टी.रामाराव के पक्ष में चुनावी हवा है।

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 दमघोंटू इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में सन 1977 में जब लोक सभा चुनाव की घोषणा हो गयी और इमरजेंसी की कठोरता में ढिलाई आई तो दो अखबारों के प्रसार अचानक बहुत बढ़ गये।

वे अखबार थे--इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समैन।

ये अखबार जेपी और जनता पार्टी के समर्थक और इंदिरा गांधी की राजनीतिक शैली और इमरजेंसी के सख्त खिलाफ थे।

1977 के चुनाव में इंदिरा सरकार का केंद्र की सत्ता से सफाया हो गया।यहां तक इंदिरा-संजय भी लोक सभा चुनाव हार गये।

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सन 2005 में जब नीतीश कुमार सत्ता में आए तो बिहार के एक अखबार ने उनकी सरकार के अच्छे कामों की सराहना शुरू कर दी।

अखबार का प्रबंधन परेशान था।

यदि सन 2010 में सरकार बदल गयी तो हमारा क्या होगा ?

मुझसे पूछा गया।

मैंने उनसे सवाल किया कि आपके अखबार का सर्कुलेशन बढ़ रहा है या घट रहा है ?

उन्होंने कहा कि वह तो बहुत बढ़ रहा है। 

मैंने कहा कि तब आपको चिंतित होने की जरूरत नहीं है। 

2010 में भी यही सरकार आएगी।

वही हुआ भी।

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अब आप आज की राजनीतिक स्थिति पर आइए।

सन 2024 में लोक सभा का चुनाव होना है।

नतीजों के बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं।कई लोगों के प्राण टंगे हैं।

वैसे भी हर जगह के अधिकतर अखबार आम तौर से दो हिस्सों में बंटे होते हैं।

एक की सहानुभूति सत्ता दल और दूसरे की सहानुभूति प्रतिपक्ष के साथ होती है।

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नरेंद्र मोदी के साथ सहानुभूति रखने वाले नई दिल्ली से प्रकाशित अखबार का सर्कुलेशन घट रहा है या बढ़ रहा है ?

प्रतिपक्ष के साथ सहानुभूति रखने वाले अखबार का प्रसार घट रहा है या बढ़ रहा है ?

यही बात निजी टी.वी.चैनलों पर भी लागू होती है--

किस चैनल के दर्शकों की संख्या बढ़ रही है और किसकी घट रही है ?

 किस चैनल की सहानुभूति कहां है और कहां नहीं है,या निष्पक्ष है,यह तो अधिकतर मामलों में जगजाहिर ही है,

चाहे आप जितना छिपाएं !

अब कम कहना अधिक समझना।

आप तो खुद समझदार हैं।

क्षेत्रीय अखबारों और क्षेत्रीय निजी न्यूज चैनलों पर भी यही फार्मूला अपनाइए।

सही आकलन पर पहुंच जाइएगा।

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23 अक्तूबर 23 


रविवार, 22 अक्टूबर 2023

 मिलावट खोरी के खिलाफ देश भर में विशेष अभियान जरूरी

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पत्नी हाल में तीर्थ यात्रा पर गयी थीं।

उज्जैन,

सोमनाथ,

द्वारका,

शिरडी,

नासिक और 

वाराणसी की यात्रा थी।

यात्रा का आयोजन इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म काॅरपोरेशन लिमिटेड ने किया था।

आई.आर.सी.टी.सी.का प्रबंध सराहनीय रहा।

कोई असुविधा नहीं।

पर,विभिन्न तीर्थ स्थलों में उपलब्ध मिठाइयों की गुणवत्ता पर मुझे संदेह हुआ है।

मैं समझता था कि सिर्फ बिहार में ही क्वालिटी कंट्रोल करने वाला सरकारी तंत्र भ्रष्ट तथा निकम्मा है।

पर,यह समस्या तो लगभग देशव्यापी है।

पत्नी ने मुझे यह भी बताया कि महाराष्ट्र की सड़कों की अपेक्षा बिहार की सड़कें बेहतर हैं।

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बड़ बोलापन हो जाएगा ,फिर भी कह ही देता हूं।

जीभ से गले तक का मेरा स्थान प्रयोगशाला की तरह है।

मुंह में डालते ही आम तौर पर मुझे लग जाता है कि पदार्थ शुद्ध है या नहीं।

मुंह का कौर जब शरीर में टहलते हुए आगे जाता है तो एक बार फिर उसकी ‘जांच’ हो जाती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं शुद्ध चीजें खा-खाकर

गांव में बड़ा हुआ हूं।

मैं हरित क्रांति से पहले के छोटे दाने वाले गेहूं की स्वादिष्ट रोटी भी खा चुका हूं

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मैं पटना की सिर्फ एक ही मिठाई खाता हूं।

बार -बार उस मिठाई व बिक्री के स्थान का नाम बताना अच्छा नहीं लगता।

पर,संकेत दे देता हूं।

उस लड्डू में लापारवाही से छूट गए इलाइची के छिलके नहीं होते तो मुझे और अच्छा लगता।

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केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर मिलावटी खाद्य व भोज्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए अन्यथा कैंसर मरीजों के इलाज पर हो रहा खर्च बढ़ता जाएगा।

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1.-बिक्रेता गण सब्जियों की ताजगी बरकरार रखने अथवा उनके परिरक्षण के लिए उन्हें कीटनाशकों में डूबोते हैं।

तेलों और मिठाइयों में वर्जित पदार्थों की मिलावट की जाती है।

2.-सब्जियों और दूसरे खाद्य पदार्थ को धोना फायदेमंद है।लेकिन पकाने से विषैले अवशेष बिरले ही खत्म होते हैं।निगले जाने के बाद छोटी आंत कीटनाशकों को सोख लेती हैं।

3.-शरीर भर में फैले बसायुक्त उत्तक इन कीटनाशकों को जमा कर लेते हैं।इनसे दिल,दिमाग,गुर्दे और जिगर सरीखे अहम अंगों को नुकसान पहुंच सकता है।

--इंडिया टूडे हिंदी-15 जून, 1989

(आज तो हालात और भी बिगड़ चुके हैं।

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कई साल पहले भारत की  संसद में यह कहा गया कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में 

रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत अधिक है।

इस पर केंद्र सरकार ने कह दिया कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।

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यह तब की बात है जब प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  थे।पटना हवाई अड्डे पर  जो बोतलबंद पानी उन्हें परोसा जाने वाला था,वह अशुद्ध पाया गया था।ऐसी ही घटना मनमोहन सिंह के साथ कानपुर में हुई थी जब वे प्रधान मंत्री के रूप में वहां गए थे।

यानी, प्रधान मंत्री तक मिलावट की पहुंच है।

वे इसलिए बच पा रहे हैं क्योंकि उन्हें परोसने से पहले उसकी जांच का प्रावधान है।

  एक खबर के अनुसार, इस देश में बिक रहे 85  प्रतिशत दूध मिलावटी है।जितने दूध का उत्पादन नहीं है,उससे अधिक की आपूत्र्ति हो रही है।  

सवाल है कि इस देश में अन्य कौन सा खाद्य व भोज्य पदार्थ कितना शुद्ध है ?

यह जानलेवा समस्या बहुत पुरानी है।बढ़ती जा रही है।

विभिन्न सरकारें लोक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए क्या -क्या करती हंै ? कितने दोषियों को हर साल सजा हो पाती है ?

राज्यों में कितनी प्रयोगशालाएं हैं ?

मिलावट का यह कारोबार जारी रहा तो कुछ दशकों के बाद हमारे यहां कितने स्वस्थ व कितने अपंग बच्चे पैदा होंगे ?

पीढ़ियों के साथ इस  खिलवाड़ को आप क्या कहेंगे ?

क्या सबके मूल मंे सरकारी भष्टाचार नहीं है ?   

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21 अक्तूबर 23






बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

 पुलिस को मारोगे तो नहीं बचोगे

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हाल में बिहार के वैशाली जिले में अपराधियों ने एक सिपाही की हत्या कर दी।

उसके तत्काल बाद उस सिपाही के हत्यारा गिरोह के दो बदमाश पुलिस मुठभेड़ में मार दिए गए।

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सिपाही या पुलिस अफसर के हत्यारे आम तौर पर पुलिस मुठभेड़ में मार दिए जाते हैं।ऐसा लगभग पूरे देश में होता है।

अपवाद के तौर पर ही कोई पुलिस हंता बचा हो।

ऐसा क्यों होता है ?

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सुरेंद्र किशोर

18 अक्तूबर 23


सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

 इमरजेंसी मंे ‘शोले ग्राम’ की पहाड़ी पर हमने जार्ज 

फर्नांडिस के साथ एक खास तरह की ट्रेंनिंग ली थी।

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1975 में रिलीज अभूतपूर्व ‘शोले’ फिल्म की अब भी जब- तब मीडिया में चर्चा होती रहती है।मैंने भी न जाने कितनी बार उसे देखा है !!

जब भी चर्चा होती है,मुझे वह पहाड़ी याद आ जाती है।

बंगलोर (तब यही नाम था।) से करीब 50 किलोमीटर दूर शोले के फिल्मांकन स्थल वाली पहाड़ी।--अब तो उस इलाके को लेते हुए रामनगर  जिला भी 2007 में बन गया।

पहले तो बंगलोर ग्रामीण जिले में शोले के ठाकुर साहब की हवेली !!!! ? थी। 

आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हमने वहां एक खास तरह की ट्रेनिंग ली थी।

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मैं तब जे.एच.पटेल और लाड़ली निगम के साथ बंगलोर के एक होटल में टिका हुआ था।कई दिन वहां रहे।

तीनों के लिए डबल बेड वाले एक ही कमरे में प्रबंध था।संभवतः एम.जी.रोड पर।

हम लोग दिन भर सिनेमा देखते थे और रात में उस पहाड़ी पर जाकर ट्रेनिंग लेते थे।

जार्ज फर्नांडिस मुझे महत्व देते थे।

वे अपने साथ कार की पिछली सीट पर बैठाते थे।

बीच में बैठती थी--नन्दना रेड्डी-मशहूर अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की बेटी।

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वातानुकूलित सिनेमा हाॅल से बाहर निकलने पर बाहर का मौसम अधिक सुहाना लगता था।

सुनते हैं कि अब बंगलुरू में भी वायु प्रदूषण का प्रकोप छा गया है।

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जे.एच.पटेल बाद में कर्नाटका के मुख्य मंत्री बने।

लाड़ली निगम राज्य सभा के सदस्य बने।

मुझे जाननेवाले कहते हैं कि आपको तो किसी सरकारी कमेटी के मेम्बर लायक भी नहीं समझा गया।

मैं कहता हूं कि यही सच है।

मैं उस लायक कभी नहीं रहा।

उस लायक बनना पड़ता है भई !

वैसे कोई पद मिलता तो अच्छा ही रहता।

यदि नहीं मिला तो उससे भी अच्छा है।

संतोषम् परम सुखम्।

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रहिमन वे नर मर चुके ,जो कहुं मांगन जाहिं

उनते पहले वे मरे ,जिन मुख निकसत नाहिं।

मुझे इस बात की चिंता रहती थी कि ‘‘उनते पहले वे न मरें।’’

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इमरजेंसी की उस बंगलोर यात्रा में मुझे एक बात बुरी लगती थी।

मेेरे लिए कल्पनातीत थी।

मेरा भोला-भाला दिल-ओ-दिमाग तब तक यह कल्पना भी नहीं करता था कि देश के लिए जान देने पर तैयार रहने वाले नेता लोग शराब भी पी सकते हैं।

उस होटल में हम तीन के अलावा हर दिन एक

मशहूर मजदूर नेता आ जाते थे।

तीनों जमकर शराब पीते थे।मैं टुकुर -टुकुर देखता रहता था।

चिंतन करता था।चिंता होती थी।

लोहिया तो नहीं पीते थे।

कर्पूरी ठाकुर तो नहीं पीते थे।

पंडित रामानंद तिवारी तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे।

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खैर,उम्र बढ़ने के साथ ही मुझे बहुत सारे ‘ज्ञान’ प्राप्त होने लगे।

सब कुछ लिख दूं तो आपका मगज फट जाएगा और मैं जेल में रहूंगा।

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16 अक्तूबर 23

   


शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

     टैक्स चोरों के खिलाफ गुस्सा जरूरी

    भरसक ईमानदार लोगों को ही वोट दें

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    --सुरेंद्र किशोर--

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हाल में मैंने अपनी कुछ जमीन बेची।

पूरा पैसा ‘व्हाइट’ में लिया।

उस पर पूरा आयकर दिया।

अपने रोज ब रोज के खर्चे के लिए बेचना जरूरी था।

आगे भी जमीन बेचनी है।

उस पर भी पूरा टैक्स दूंगा।

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    यदि हम टैक्स नहीं देंगे तो इस देश की केंद्र व राज्य सरकारें विकास -कल्याण के कार्य कैसे करंेगी ?

साथ ही,इस देश पर मंड़राते आंतरिक और बाह्य खतरांे से देश को बचाने के लिए अधिकाधिक सेना-पुलिस-हथियारों का इंतजाम कैसे सरकार करेगी ?

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आप जिस किसी पेशे में हों,अफसर हो,नेता हों या पत्रकार हांे,आप निजी जीवन ईमानदारी से नहीं बिताते तो आपको किसी को उपदेश देने का भी कोई नैतिक हक नहीं है।आप ईमानदार सरकार के हकदार नहीं हैं।

वैसे भी उपदेश दीजिएगा तो लोग हंसेंगे।

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पर उपदेश कुशल बहुतेरे

जे आचरहिं ते नर न घनेरे 

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मैंने यह सब इसलिए लिखा क्योंकि ऐसा करके भी हम अपना शांतिपूर्वक संतोषप्रद जीवन बिता सकते हैं।

यानी टैक्स चोरी जरूरी नहीं।

लाखों-करोड़ों-अरबों रुपए आपको शांति नहीं देंगे।

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युद्धरत इजरायल से भी आज कुछ सीखने की जरूरत है।

आज के दैनिक भास्कर ने खबर दी है कि 

‘‘दुनिया भर में फैले इजराइली जंग के लिए गाजे -बाजे के साथ स्वदेश लौट रहे।’’

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हाल में एक पाक जेहादी ने सार्वजनिक रूप से यह धमकी दी है कि जो काम हमास ने इजरायल में किया,वही काम हम भारत में करेंगे।

यानी खतरा सामने है।

भीतरी खतरे भी हैं।हथियारबंद जेहादी भारत में सक्रिय हैं।

चीन से खतरे के बारे में आजादी के बाद ही नेहरू सरकार को कई नेताओं ने लगातार आगाह किया था।

पर,उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया।

तब की सरकार की यह नीति भी थी कि सीमा पर बाड़ लगाने से दुनिया में भारत की छवि खराब होगी।

यह बात कई साल पहले टी.वी.पर नेहरू युग के एक आई एफ.एस. अफसर ने, जो पूर्व विदेश सचिव भी थे, कह भी दी थी।उस दिन उस टी.वी.कार्यक्रम में संजय निरूपम भी थे।

उस पर निरूपम ने क्या कहा,वह मैं यहां नहीं कहूंगा ।

क्योंकि तब हमारे मित्र निरूपम शिव सेना में थे।

चेतावनी को अनसुना करने का खामियाजा 1962 में हमें भुगतना पड़ा।

आज भी चेतावनी नहीं सुनोगे तो इजरायल यहां भी दुहरा सकता है। 

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जिन देशों पर खतरे रहते हैं ,वहां अनिवार्य सैनिक सेवा का प्रावधान है।

वे देश हैं-

रुस

उत्तरी कोरिया 

दक्षिणी कोरिया

इजरायल

ब्राजिल

इरान 

स्वीडन

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भारत में भी अनिवार्य सैनिक सेवा का प्रावधान होना चाहिए।

ऐसे प्रावधान का इस देश में भारी विरोध होगा।

तब कम से कम हम वैसे आंतरिक विरोधियों 

को पहचान तो जाएंगे।

जिनकी उम्र सैनिक सेवा की नहीं है,वे ईमानदारी से टैक्स दें।

और जात, पांत,धर्म  आदि से ऊपर उठकर ईमानदार लोगों को ही वोट देकर अच्छी सरकारें चुनें।

अन्यथा, यह देश इस रूप में अधिक दिनों तक नहीं बच सकेगा।

क्योंकि मध्य युग की पुनरावृति करने की कोशिश करने वाली शक्तियां आज इस देश में जितनी ताकतवर हो चुकी हैं ,उतनी पहले कभी नहीं थीं।

ताकतवर इसलिए भी हैं क्योंकि वोट लोलुप नेताओं का उन्हें पूरा समर्थन हासिल है।

वे नेता कभी उनके देश विरोधी गतिविधियों के खिलाफ बयान तक नहीं देते।बल्कि उनका बचाव करते हैं।

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12 अक्तूबर 23


 


 यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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अतिक्रमणकारियों के खिलाफ सख्त रुख से राहत की उम्मीद

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पटना में इन दिनों मुख्य सड़कों पर से अतिक्रमण हटाने का अभियान चल रहा है।

यह अभियान पहले भी चले और विफल हुए।

संकेत मिल रहे हैं कि इस बार का अभियान सख्त है।

हठीले अतिक्रमणकारियों के खिलाफ पहले की अपेक्षा इस बार अधिक कड़ी कार्रवाई हो रही है।वैसा प्रावधान भी किया गया है।

फिर से अतिक्रमण न हो,इस बार यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है।

मुख्य मार्ग पर भारी अतिक्रमण के कारण यातायात दुरुह हो चुका है।

अतिक्रमण के कारण घायलों ,गंभीर रूप से बीमार, गर्भवती महिलाओं और परीक्षार्थियों आदि को अपार असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।

अतिक्रमणकारी शक्तियों के बारे में प्रशासन को भी मालूम रहता है।

इसलिए सख्ती होने पर उनके होश ठिकाने आ जाएंगे,ऐसी उम्मीद है।

प्रादेशिक राजधानी में यातायात सुगम हो जाए तो दूसरे राज्यों से यहां यदाकदा आने वालोें के दिल-ओ-दिमाग में बिहार की छवि बेहतर बनेगी।

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जिला मुख्यालयों में समस्या

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 अतिक्रमण की समस्या जिला मुख्यालय तथा छोटे शहर भी झेल रहे हैं।

अतिक्रमणकारियों और उनके संरक्षकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जिला मुख्यालयों में भी होनी चाहिए।

बिहार में हाल के वर्षों में सड़कों का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ है। कई पतली सड़कें चैड़ी भी हुई हैं।

पर,जैसे ही सड़कें चैड़ी होती हैं,उन पर अतिक्रमणकारी हावी हो जाते हैं।

अतिक्रमण कराने से कई सरकारी व गैर सरकारी लोगों की ऊपरी आय बढ़ जाती है।यह सब ढीले-ढाले शासन के लक्षण हैं।

यह अच्छी बात है कि पटना में वैसे कानून तोड़कों के खिलाफ वास्तविक सख्ती बढ़ रही है।उस सख्ती का विस्तार जिला स्तरों पर भी हो।

उससे जनता राहत महसूस करेगी।

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अंडरग्राउंड पार्किंग 

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नगरों की मुख्य सड़कों पर स्थित मार्केट काम्प्लेक्स में आम तौर पर भूतल पार्किंग की व्यवस्था नहीं है।

मार्केट काम्प्लेक्स का नक्शा तो पार्किंग के साथ ही पास होता है।पर,काम्पेक्स के मालिक संबंधित अफसरों को प्रभावित करके उसमें भी दुकान खोलवा देते हैं।

यदि शासन इस अनियमितता को दूर करे तो यातायात सुगम करने में सुविधा होगी।

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आर.टी.आई.कानून 

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यह खबर चैंकाती है।

देश के सूचना आयोगों के पास  3 लाख 21 हजार 537 अपील और शिकायतें लंबित हंै।निपटारे की गति धीमी हैं।इस बीच शिकायतों की संख्या बढ़ती जा रही हैं।

बड़ी उम्मीदों के साथ सन 2005 में सूचना अधिकार कानून बनाया गया था।

इसे मनमोहन सिंह सरकार की उपलब्धि मानी गयी।

शुरुआती वर्षों में इस मामले में अच्छे काम हुए भी।

पर,कई कारणों से बाद में शिथिलता आने लगी।

सूचना अधिकार कानून का जितना अधिक उपयोग होगा,भ्रष्ट और काहिल शासन पर उतनी ही अधिक लगाम लगेगी।जनता को राहत मिलेगी।

 इस दिशा में शिथिलता जनता के लिए नुकसानदेह है।

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़1998 के निर्णय पर विचार

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सन 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सांसदों पर सदन के भीतर कोई भी भाषण या वोट देने के लिए आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

संविधान के अनुच्छेद-105 ने इसकी छूट दे दी है।

पर,अब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार कर रहा है कि क्या कोई सांसद रिश्वत लेकर सदन में किसी के पक्ष में वोट दे तो उसे भी छूट मिलनी चाहिए ?

याद रहे कि नब्बे के दशक में यह आरोप लगा था कि कुछ प्रतिपक्षी सांसदों ने रिश्वत लेकर तत्कालीन सरकार के पक्ष में मतदान किया जिससे वह सरकार गिरने से बच गयी।

रिश्वत के पैसे उन सांसदों के बैंक खाातों में पाए गए थे।फिर भी तब सुप्रीम कोर्ट ने उन सांसदों को राहत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट कभी -कभी अपने ही पिछले निर्णयों को बदल देता है।

राजनीतिक और कानूनी हलकों में यह उम्मीद की जा रही है कि

सुप्रीम कोर्ट सन 1998 के अपने निर्णय को बदल देगा।

यदि ऐसा हुआ तो क्या तब के आरोपितों के खिलाफ अब मुकदमा चलेगा ?

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और भी हैं ऐसे कुछ मामले 

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सुप्रीम कोर्ट को लगे हाथ इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि सदन में कुछ प्रमुख सदस्य भी इन दिनों अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा देते है।उन आरोपों के बारे में भाषण से पहले पीठासीन पदाधिकारी से पूर्वानुमति नहीं ली जाती।

टी.वी.पर सीधे प्रसारण के इस दौर में लोगबाग उन आरोपों के बारे में जान जाते हैं।बाद मंें पीठासीन पदाधिकारी उन आरोपों को कार्यवाही से निकाल देने का आदेश दे देते हैं।कई बार आदेश नहीं देते।

शालीनता वाले दौर में सदस्य किसी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने से पहले स्पीकर को उसका सबूत दिखाते थे।यदि स्पीकर संतुष्ट होते थे तभी  वे सदन में वह बात रखने देते थे।

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और अंत में

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आम चुनाव के तत्काल बाद एक प्रतिपक्षी

विधायक ने सत्ताधारी दल ज्वाइन कर लिया।

दल बदल विरोधी कानून के अनुसार उस दल बदलू की सदन की सदस्यता समाप्त हो जानी चाहिए थी।

सदस्यता समाप्त करने के लिए प्रतिपक्षी दल के नेता ने स्पीकर से लिखित शिकायत भी की।पर,स्पीकर ने सदन का कार्यकाल बीत जाने के बाद भी उस दलबदलू के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

ऐसे मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट को विचार करना चाहिए।

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प्रभात खबर 

पटना

14 अक्तूबर 23