रविवार, 18 जनवरी 2009

आलोचना हो, पर कैसी ?

पचास के दशक की बात है। एक बार अनुग्रह बाबू के एक खास करीबी नेता एक खास उद्देश्य से लाल बहादुर शास्त्री से मिले।उन्होंने शास्त्री जी से कहा कि आप जेपी से कहें कि वे सार्वजनिक रूप से जवाहर लाल नेहरू की आलोचना नहीं करें।इससे होता यह है कि कांग्रेस के अंदर डा.अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति उलझनपूर्ण हो जाती है। याद रहे कि जेपी, अनुग्रह बाबू के काफी करीबी माने जाते थे। शास्त्री जी ने जवाब दिया कि ‘ऐसा मैं जेपी को नहीं कह सकता।दरअसल जेपी ही ऐसे एक व्यक्ति हैं जो किसी राग-द्वेष या लाभ-लोभ के बिना नेहरू जी की जनहित में सार्वजनिक रूप से आलोचना कर सकते हैं।ऐसी आलोचनाएं सत्ताधारी नेता को एकाधिकारवादी व निरंकुश होने से रोकती हैं। नेहरू की अपार लोकप्रियता के कारण उनमें एकाधिकार की प्रवृति पनपने का खतरा मौजूद है। तुलना तो थोड़ी बेमेल हो रही है,पर नीतीश कुमार के खिलाफ भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप की हाल की सार्वजनिक आलोचना से वह प्रकरण याद आता है।नीतीश कुमार के जिस तरह जन समर्थन बढ़ने की खबर दी जा रही है, ऐसे में उनमें एकाधिकारवादी प्रवृति के पनपने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।डी.एन.गौतम को डी.जी.पी.बनाने के पीछे भी संभवतः मुख्य मंत्री की यही आत्म विश्वासपूर्ण मानसिकता काम कर रही है कि अगले किसी चुनाव में उन्हें मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर जाने से रोकने की जरूरत नहीं है बल्कि पुलिस की मदद से स्वच्छ मतदान कराने की जरूरत है। लोकतंत्र में राग-द्वेष व लोभ-लाभ से मुक्त होकर जन हित में सत्ता की जरूरत पड़ने पर कभी स्वस्थ आलोचना या फिर कभी तारीफ जरूरी भी है।एन.डी.ए.के भीतर से हरेंद्र प्रताप की ओर से संभवतः अब तक की सबसे कड़ी आलोचना सामने आई है। हरेंद्र प्रताप की ताजा आलोचना कैसी है ?इस पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं हैं।इसके तरह-तरह के मतलब भी लगाए जा सकते हैं।ऐसे समय में जब कि इस देश के पक्ष- विपक्ष के नेताओं द्वारा आए दिन हो रही राजनीतिक बयानबाजियों से तथ्यपरकता व जन कल्याण की भावना लुप्त होती जा रही है,वहां हरेंद्र प्रताप के बयान में भी ऐसा कुछ तलाश करना अस्वाभाविक नहीं है।पर, हरेंद्र प्रताप की कुछ बातें तो गौर करने लायक हैं। बिहार के विश्व विद्यालय कर्मियों की हड़ताल से उपजी समस्या के प्रति हरेंद्र जी की चिंता सराहनीय है। इस सरकार के पीछे सरकारी विफलता भी है।पोटा के खिलाफ मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बयान पर हरेंद्र प्रताप की आलोचना में भी दम लगता है।क्योंकि आतंकवाद की समस्या को गैर राजनीतिक व पेशेवर ढंग से देखने वाले तमाम विशेषज्ञ कड़े कानून की जरूरत महसूस करते रहे हैं।दुनिया के अन्य अनेक देशों ने इस संदर्भ में हाल के वर्षों में अपने कानून कड़े कर दिए हैं। पर भागल पुर दंंगे के मुकदमों की फिर से सुनवाई के नीतीश सरकार के फैसले पर उंगुली नहीं उठाई जानी चाहिए।हरेंद्र प्रताप ने उंगुली उठाई है।यदि दंगाइयों को सजा नहीं मिलेगी तो भविष्य में दंगा करने वालों के हाथ रुकंेगे कैसे ? दंगा- फसाद नहीं रुकेगा तो दरिद्र बिहार का विकास कैसे होगा ? वैसे भी सांप्रदायिक मसलों पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का रूख समय के साथ बदल रहा है। पर, हरेंद्रजी, इस बीच बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या को आप कैसे भूल गए ? आप तो इस समस्या के विशेषज्ञ जानकार रहे हैं।यह समस्या बिहार सहित देश भर में अब भी बरकरार है।बल्कि बढ़ रही है।लोक सभा के पूर्व स्पीकार पी.ए.संगमा ने हाल ही मेंे कहा है कि ‘बंगला देश से और डेढ़ करोड़ शरणार्थियों @कुछ लोग उन्हें घुसपैठी कहते हैं।@के जल्दी ही भारत में प्रवेश करने की आशंका है।’एक अनुमान के अनुसार दो करोड़ बंगला देशी घुसपैठी पहले से ही भारत में अवैध ढंग से रह रहे हैं।इस देश में इन दिनों जारी आतंकवादी वारदातों में बंगला देश में सक्रिय जेहादियों का ही अधिक नाम लिया जा रहा है।इस देश में जहां तहां बसे बंगला देशियों की गैर कानूनी बस्तियों में उन जेहादियों के शरण मिलने की आशंका रहती है। जहां तक छोटे पार्टनर को भी प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री पद देने का सवाल है तो इस देश में ऐसे अनेक उदाहरण है। केंद्र में मोरारजी देसाई और राज्यों में चरण सिंह,महामाया प्रसाद सिंहा,अजय मुखर्जी,गोविंद नारायण सिंह तथा इस तरह कई नेताओं ने जब सरकार बनाई थी तो वे गठबंधन में शामिल दलों में सबसे बड़े घटक के नेता नहीं थे।यदि केंद्र में भाजपा को प्रधान मंत्री पद चाहिए तो राज्यों में उसे अपने सहयोगी दलों को तरजीह देनी ही पड़ेगी। राष्ट्रीय सहारा, पटना (०७-०८-2008)

‘जालियांवाला बाग’ ने बदली नेहरू परिवार की जीवन शैली


जालियांवाला बाग के नर संहार ने नेहरू परिवार की जीवन-शैली बदल दी और वह परिवार अंग्रेजों के खिलाफ अभियान में शामिल हो गया। रौलट एक्ट के विरोध में गांधी के उठ खड़ा होने की खबर समाचार पत्रों में पढ़ कर युवा जवाहर लाल नेहरू जरूर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होना चाहते थे।पर, उनके पिता मोती लाल नेहरू का तब इस बात पर विश्वास नहीं था कि मुट्ठी भर लोगों के जेल चले जाने से देश का कोई भला हो सकता है। उधर जवाहर लाल, गांधी के साथ जुड़ने को उतावले थे।इस सवाल पर मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू के बीच अक्सर बहस होती थी।जवाहर लाल की बहन कृष्णा हठी सिंग ने लिखा है कि ‘इससे हमारे घर की शांति ही भंग हो गई थी।’ अपनी पुस्तक ‘इंदु से प्रधान मंत्री’ में कृष्णा ने लिखा है कि ‘हर स्थिति में से रास्ता निकालने में कुशल मेरे पिता जी ने आखिर इसका हल भी खोज ही लिया।उन्होंने गांधी जी को ही इलाहाबाद बुलाया। इस तरह गांधी जी हमारे यहां पहली बार आए,और तब उनका और नेहरू परिवार का पारस्परिक स्नेह क्रमशः गाढ़ा होता गया।’ ‘लंबी चर्चाओं के दौरान पिता जी और गांधी जी ने भारत की समस्याओं के अपने -अपने हल प्रस्तुत किए।लेकिन उनकी चर्चा जवाहर पर केंद्रित हो गई।क्योंकि पिता जी किसी ऐसे अकाट्य तर्क की खोज में थे जिससे जवाहर को सत्याग्रह सभा में शामिल होने से रोका जा सके।इसलिए तो गांधी को उन्होंने अपने यहां बुलाया था। गांधी जी बिलकुल ही नहीं चाहते थे कि इस सवाल को लेकर पिता-पुत्र में मन मुटाव हो, इसलिए वह पिता जी की इस राय से सहमत हो गए कि जवाहर लाल को जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए। लेकिन गांधी जी की यह सलाह बेकार ही साबित हुई। क्योंकि घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिससे सब कुछ गड़बड़ा गया। वह लोम हर्षक घटना थी पंजाब के एक शहर अमृतसर में निहत्थे लोगों पर गोरी हुकूमत का खूनी हमला।’ कृष्णा हठी सिंग ने उन दिनों के घटनाक्रम को विस्तार से लिखा है,‘ गांधी जी अपने आंदोलन को वेग देने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली चले गए। वहां उन्होंने रौलट एक्ट को रद करने की मांग के समर्थन में 31 मार्च 1919 को देश व्यापी आम हड़ताल की घोषणा की।भारी संख्या में लोग उनकी सभा में शरीक हुए। ब्रिटिश हुकुमत घबरा गई और उसने गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया।गांधी जी के गिरफ्तार किए जाते ही दिल्ली और दूसरे शहरों में उपद्रव शुरू हो गए।सभा व जुलूस पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन इससे लोगों के गुस्से और जोश में कोई फर्क नहीं पड़ा और न उन्हें यही पता चला कि गांधी फौरन छोड़ भी दिए गए। 13 अप्रैल को कई हजार स्त्री,पुरूष और बच्चे अमृत सर के जालियांवाला बाग में इकट्ठे हुए। यह चारों ओर उंची -उंची इमारतों से घिरा एक खुला मैदान था।जनरल डायर ने, जिसे इस सभा को भंग करने के लिए भेजा गया था, रास्ते की नाकेबंदी कर अपने सैनिकों को गोली चलाने का हुक्म दे दिया। गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए।’ ‘निहत्थी और निरीह जनता के इस कत्लेआम ने पिता जी के विचारों में आमूल परिवत्र्तन कर दिया। वह गांधी जी के प्रबल प्रशंसक और जवाहर के मत के अनुकूल हो गए। उनका विचार परिवत्र्तन इतने नाटकीय ढंग से हुआ कि वह अच्छी चलती वकालत को लात मार कर जी जान से राजनीति में कूद पड़े। घटना क्रम ने हमारे परिवार के जीवन प्रवाह ही बदल दिया। कहां तो हमारे खाने के टेबुलों पर बढि़या किस्म के देशी-विदेशी खानों के दौर चलते थे और कहां अब बहुत ही सादगीपूर्ण भारतीय भोजन थालियों में परोसा जाने लगा। चार - छह कटोरियों में सालन, दाल ,एक दो सब्जियां, दही, अचार और चटनी के साथ चपातियां या पराठे, चावल और अंत में एक मिठाई बस यही भोजन था।’ ‘अब न वह गपशप होती और न ही हंसी मजाक। वकालत छोड़ देने से पिता जी की भारी आय भी बंद हो गई। नौकरों की तादाद एकदम घटा दी गई। बिल्लौरी कांंच और चीनी मिट्टी के बढि़या बरतन, अस्तबल के उम्दा घोड़े और कुत्ते तथा तरह- तरह की उत्तम शराबें आदि सभी विलासिता सामग्री बेच दी गईं। अम्मा और कमला के पास बहुत से कीमती गहने थे-अंगुठियां, बालियां और कर्णफूल, हार, कंगन, कांटे और ब्रूच, सभी सोने और हीरे मोती, माणिक पन्ना जड़े हुए। अपने लिए मामूली गहने रखकर अम्मा और कमला बाकी सब बेचने के लिए राजी हो गर्इं। पिता जी ने अपना मकान कांग्रेस को भेंट कर दिया। वह स्वराज्य भवन कहलाया। हमलोगों के लिए बना नया और छोटा मकान आनंद भवन कहलाया। शुरू में तो मुझे हाथ से कती बुनी मोटी खादी पहनना जरा भी नहीं सुहाता था और मैं नाक भौं सिकोड़ती थी। मगर धीरे -धीरे अभ्यस्त हो गई।’ प्रभात खबर (03-10-2008)

आपातकाल में जेपी की नजरबंदी के दिन


आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण नजरबंद थे। वे नजरबंदी के दौरान अपनी डायरी लिखते थे। आज से ठीक 33 साल पहले यानी 26 सितंबर 1975 को जेपी ने अपनी डायरी में लिखा, ‘आज मेरी नजरबंदी के तीन महीने पूरे हो गए। अब लगता है, दिन काफी तेजी से बीत रहे हैं। फिर भी साथी के अभाव में समय पहाड़ बन गया है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि तानाशाही के गत्र्त की ओर पतन की प्रक्रिया रुक गई है। वह स्थायी या अस्थायी रूप से रुकी है, यह बताना अभी संभव नहीं। सुगत @दासगुप्त@कल कह रहे थे कि जिन क्षेत्रों में जाते-आते हैं,वहां सामान्य रूप से यह आशा बनी है कि संसदीय चुनाव अगले साल होने वाले हैं।अगर ऐसा होता है तो लोकतंत्र की ओर वापसी निश्चित है। यद्यपि आपातकाल की समाप्ति तो नहीं होगी और समाचार पत्र भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होंगे, परंतु जेलों से आम रिहाई निश्चित रूप से होगी और भाषण तथा संगठन करने की स्वतंत्रता पहले की अपेक्षा अधिक रहेगी।’ याद रहे कि 25 और 26 जून 1975 के बीच की रात में तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लगा कर जेपी सहित देश के करीब एक लाख नेताओं व राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को जेलों में डाल दिया था।जेपी को दिल्ली में गिरफ्तार करके पहले तो हरियाणा के सोहना में रखा गया,बाद में वहां से उन्हें 29 जून 1975 को चंडीगढ़ पहुंचा दिया गया।उन्हें सशस्त्र पुलिस की पहरेदारी में वहां के बड़े अस्पताल में रखा गया।जेपी जब आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में थे तो उनकी यह मांग अंगे्रजांे ने मान ली थी कि उनके साथ सह कैदी के रूप में डा.राम मनोहर लोहिया को रखा जाए। पर इंदिरा गांधी की सरकार ने किसी सह कैदी के उनके साथ रहने की जेपी की मांग ठुकरा दी थी। जेपी की जेल डायरी भारतीय इतिहास की त्रासदी का एक जीवंत दस्तावेज है।उनकी जेल डायरी में उनके अकेलापन की पीड़ा भी झलकती है। 28 सितंबर को अपनी डायरी में 73 वर्षीय जेपी ने लिखा,‘कल शनिवार को मेरे लिए बुरा दिन था।सुबह ज्यों ही मैं शौचालय में बैठा,मेरे पेट में भयानक दर्द महसूस हुआ।पहले तो मैंने सोचा कि दर्द खत्म हो जाएगा।परंतु वह जारी रहा,बल्कि और भी गंभीर हो गया।मैं पसीने से तर-बतर होने लगा।बेहोशी और बहुत कमजोरी महसूस हुई।यहां तक कि उठन,े हाथ धोने और बिछावन तक जाने में कठिनाई हो रही थी।मैंने डा.कालरा को बुलाने और डा.चुट्टानी को भी खबर करने को कहा।दर्द घंटों तक जारी रहा।डाक्टरों ने दवाएं दीं।घंटों तक बिछावन पर पड़ा रहा।’ 29 सितंबर को जेपी ने लिखा,‘ आज के ‘ट्रिब्यून’ में तीन कालम के शीर्षक के साथ श्री जग जीवन राम का भाषण प्रकाशित हुआ है।भाषण में उन्होंने बड़े जोर देकर कहा है कि प्रधान मंत्री का नेतृत्व बीस सूत्री योजना की क्रियान्विति के लिए महत्वपूर्ण है।आश्चर्य है कि वफादारी की यह घोषणा ऐसे उंचे स्वर में क्यों की जा रही है।क्या इसके पीछे कोई छिपा हुआ कारण है या समय- समय पर की जाने वाली वफादारी की अभिव्यक्ति मात्र है ? विश्वास नहीं होता कि ऐसी चापलूसी का जोरदार प्रदर्शन जगजीवन बाबू जैसे लोग भी कर रहे हैं।कैसा पतन है !’ ‘अफसोस यह कि किसी ने श्री राम से यह नहीं पूछा कि क्यों उनकी प्रिय प्रधान मंत्री का नेतृत्व दस सूत्री योजना की क्रियान्विति के मामले में विफल हुआ।शायद विरोधी पक्ष का विश्वासघात इसके लिए भी दोषी होगा।’ ‘आज सुबह का ट्रिब्यून घोषणा करता है कि संपूर्ण नशाबंदी संभव है।क्या खूब ! इसमें जो राजनीतिक चालबाजी निहित है,उसके बावजूद यह एक अत्यंत अभिनंदनीय निष्पति है।अवश्यमेव,इसमें राजनीतिक चाल यह है कि बिनोवा जी तथा सर्वोदय आंदोलन को अपने पक्ष में कर लें और यह दिखा दें कि श्रीमती गांधी जैसी सच्ची गांधीवादिनी के प्रति जय प्रकाश तथा उनके मित्रों का विरोध कितना गलत एवं दुष्टतापूर्ण है।इससे आने वाले चुनाव में भी मदद मिलेगी।अस्तु मुझे तो इसकी चिंता बिल्कुल नहीं है।श्रीमती गांधी की प्रशंसा और जय प्रकाश की निंदा होती है तो हो।जहां तक मेरा संबंध है,लोकतंत्र के पक्ष में तथा भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष जारी रहेगा।संपूर्ण क्रांति अब भी मेरा लक्ष्य है।’ 2 अक्तूबर को अपनी जेल डायरी में जय प्रकाश नारायण लिखते हैं,‘बापू,आपके चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन।बापू का नाम तो बहुत लिया गया,लेकिन उनका काम बहुत थोड़ा हुआ।पिछले कुछ वर्षों से देश के विद्वान यह अनुभव करने लगे हैं कि बापू का बताया हुआ मार्ग छोड़ कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की।जवाहर लाल के जमाने में इन्हीं विद्वानांे ने या इनके ही जैसे विद्वानों ने गांधी के मार्ग को दकियानूस माना और जवाहरलाल जी की माडर्न दृष्टि के वे प्रशंसक बने रहे।’ प्रभात खबर (26-09-2008)

पटना पुलिस गोली कांड पर जेपी बनाम नेहरू

जय प्रकाश नारायण आम तौर पर जवाहर लाल नेहरू की बड़ी इज्जत करते थे।पर मौका आने पर वे कभी-कभी उनकी तीव्र आलोचना करने से परहेज भी नहीं करते थे। बल्कि लाल बहादुर शास्त्री की राय में ‘जेपी ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जो नेहरू की आलोचना कर सकते हैं और उनकी आलोचना को पंडित जी गंभीरता से लेते हैं। ।’यह प्रसंग तब का है जब डा.अनुग्रह नारायण सिंहा जीवित थे।वे नहीं चाहते थे कि जेपी, नेहरू जी की सार्वजनिक रूप से कटु आलोचना करें।वे चाहते थे कि लाल बहादुर शास्त्री यह बात जेपी से कहें।क्योंकि जेपी जब इस तरह की बात बोलते हैं तो अनुग्रह बाबू के बारे में कांग्रेस के भीतर गलतफहमी होती है।अनुग्रह बाबू के जेपी काफी करीबी थे। उधर जेपी लाल बहादुर शास्त्री के रिश्तेदार थे। लाल बहादुर शास्त्री को किसी ने अनुग्रह बाबू का यह संदेश पहुंचाया तो शास्त्री जी ने कहा कि जेपी ही हैं जो पंडित जी को कुछ कह सकते हैं।यदि जेपी भी कुछ नहीं कहेंगे तो नेहरू जी तानाशाह हो जाएंगे।खैर यह तो हुई उनकी बात ।पर एक बार जेपी ने नेहरू के खिलाफ जो कड़ा बयान दिया, वह ऐतिहासिक ही साबित हुआ। यह बात सन् 1955 की है।पटना में पुलिस गोली कांड हुआ था। बी.एन.कालेज का छात्र दीनानाथ पांडेय मारा गया था।छात्रगण गोली कांड की न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे।पर तत्कालीन मुख्य मंत्री डा़. श्रीकृष्ण सिंहा न्यायिक जांच के खिलाफ थे।जनता में इस गोली कांड को लेकर भारी असंतोष था।सरकार के खिलाफ रोष था जिसे शांत करने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने 30 अगस्त 1955 को पटना के गांधी मैदान में आम सभा को संबोधित किया।उस सभा में नेहरू ने प्रेस और भीड़ को भला बुरा कहा और न्यायिक जांच की मांग को ठुकरा दिया। तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू के इस भाषण को उनका बेजोड़ अभिनय करार देते हुए जय प्रकाश नारायण ने एक कड़ा व लम्बा प्रेस बयान जारी किया।उनका यह बयान 2 सितंबर 1955 के अखबारों में छपा।जेपी ने अपने बयान में कहा कि ‘यह एक ऐसी घटना है जिस पर चुप रहने का अर्थ होगा कि मैं अपने नागरिक कत्र्तव्य का पालन नहीं कर रहा हूं।अभी प्रधान मंत्री पटना आए।अपार भीड़ इस उम्मीद में जमा हुई कि ऐसे शब्द सुनने को मिलेंगे जिनसे उनका मन शांत हो सके।लेकिन प्रधान मंत्री ने उनके जख्मों पर नमक छिड़का,अपना आपा खोकर वे भीड़ पर चिल्लाए,पटना प्रेस को गाली दी और पुलिस जुल्म के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए नागरिकों की भत्र्सना की।ब्रिटिश राज में जो लोग जुल्म की भत्र्सना करते थे उनका शुमार देश भक्तों में होता था लेकिन स्वराज में उन्हें गद्दारों की तरह देखा जाता है।’ जेपी ने कहा कि ‘प्रधान मंत्री कम्युनिस्टों पर बहुत से दोषारोपण करने में संलग्न हैं।कोई शक नहीं कि उन्हें बताया गया है कि सारे बखेड़े के जिम्मेदार कम्युनिस्ट हैं।पटना में हमारे बहादुर पुलिस वालों को, जो अपना ज्ञान तंतु खो चुके हैं,हर जगह एक कम्युनिस्ट बम लिए हुए नजर आता है और इसी ने इस कम्युनिस्ट कहानी को फैलाया है।जैसा कि सभी जानते हैं कि मैं कोई कम्युनिस्ट प्रशंसक नहीं हूं लेकिन मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं हो रही कि इस सारी उथल पुथल में उनकी भूमिका संयमित रही है।कम्युनिस्टों के भीतर बहुत सी कमियां हैं,लेकिन वे संगठित और अनुशासित लोग हैं।’ घटना के बारे में नेहरू के आकलन को चुनौती देते हुए जेपी ने कहा कि ‘नेहरू ने वही कहा जो उन्हें कहने को कहा गया। उनके कान इतनी चालाकी से भरे गए कि कुछ बाकी न रहा।मुझे सबसे अधिक धक्का इस बात से लगा कि प्रधान मंत्री के मन में यह शिष्टाचार तो है कि बी.एन.कालेज जाकर कहीं वे आयोग को कठिनाई में न डाल दें।लेकिन गोली कांड की घटना पर बोलते समय उन्होंने इस भावना का परिचय नहीं दिया।उन्होंने जोर- जोर से और बार -बार विद्यार्थियों और नागरिकों के हुड़दंग की भत्र्सना तो की लेकिन दूसरे पक्ष के विरूद्ध आरोपों पर वे एक शब्द भी नहीं बोले।’ ‘बिहार में देश भक्तों की कमी नहीं है और मुझे नहीं लगता कि देश भक्ति पर श्री नेहरू ने हमें कोई प्रशंसनीय पाठ पढ़ाया है।देश भक्ति मात्र एक कपड़े के टुकड़े की पूजा में नहीं, बल्कि निश्चित राष्ट्रीय सदाचारों,जीवन के निश्चित मूल्यों ,जनता और सरकार के आचरण के निश्चित स्तरों में है।बहुत दुःखी मन से मैंने ये पंक्तियां लिखी हैं।मेरे लिए राजनीतिक आंदोलन के दिन समाप्त हो चुके हैं।किसी विवाद में पड़ने की अब मुझमें शक्ति नहीं है।पिछले कुछ दिनों में बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष सहित कई लोगों ने मुझ पर अनुचित हमला किया है।फिर भी मैं शांत रहा।’ प्रभात खबर (२६-१२-2008)

जयप्रकाश नारायण बनाम डा. श्रीकृष्ण सिन्हा

एक बार जयप्रकाश नारायण ने डा. श्रीकृष्ण सिन्हा के शासन काल को ‘भूमिहार राज’ कहा तो श्रीबाबू ने भी उन्हें पलट कर यह जवाब दे दिया कि ‘जेपी भी जातपांत से उपर नहीं उठ सके।’ सन् 1957 के चुनाव में पराजित नेता के.बी. सहाय के राजनीतिक भविष्य के मुद्दे पर इन दिग्गज नेताओं के बीच हुए लंबे पत्र -व्यवहार को बिहार की राजनीति का दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय ही माना गया। इस पत्र -व्यवहार ने उस समय कई लोगों का मन खट्टा किया था। इस घटिया पत्र -व्यवहार के प्रसंग को छोड़ दें तो इन नेताओं का व्यक्तित्व इन सब ओछी चीजों से आम तौर पर उपर था। जेपी-श्रीबाबू पत्र-व्यवहार को एक पुस्तक में संजोया है वरिष्ठ पत्रकार डा.एन.एम.पी. श्रीवास्तव ने।इन दोनों नेताओं के बीच हुए पत्र -व्यवहार के विवरण को पढ़ने से ऐसा लगता है कि राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार और जातिवाद के बीज बोने का काम उन स्वतंत्रता सेनानियों ने ही जाने -अनजाने कर डाला था जिन नेताओं को स्वतंत्रता के बाद देश के शासन की बागडोर मिली थी।हालांकि यह बात भी मजबूती से कही जा सकती है कि आज देश व प्रदेश के शासन व राजनीति में भ्रष्टाचार व जातिवाद की जो मात्रा है,उसके मुकाबले तब के भ्रष्टाचार व जातिवाद अत्यंत मामूली थे।हालांकि उन स्वतंत्रता सेनानियों से कुछ और संयम की उम्मीद थी। बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा को राजनीति से संन्यास लिए जेपी ने लिखा कि ‘ महेश प्रसाद सिंहा और के.बी.सहाय चुनाव@1957@हार गए।सहाय को कुछ नहीं मिला।पर महेश बाबू राज्य खादी बोर्ड के अध्यक्ष बना दिए गए।उन्हें सरकारी बंगला दे दिया गया।बाद में वे प्रदेश कांग्रेस के खजांची भी बनाए गए।दूसरी ओर तमाम सेवाओं के बावजूद के.बी.सहाय आज कुछ भी नहीं हैं।’ जेपी ने श्रीबाबू को लिखा कि लिखा कि ‘आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि बिहार की राजनीति कितना नीचे गिर चुकी है और कितना भ्रष्टाचार पनप चुका है, यह भी आप जानते हैंै। इसके कई कारण होंगे, पर संभवतः सबसे बड़ा कारण यह है कि नेतागण व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और स्वार्थ में लिप्त हैं।आप और अनुग्रह बाबू के बीच प्रतिद्वंद्विता से राज्य में जातीयता ने खतरनाक स्वरूप ग्रहण कर लिया है।’ डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने जय प्रकाश नारायण को लिखा कि ‘आप बाजार की गपशप पर विश्वास करते हैं।आपके पत्र में यह संकेत है कि आप महेश बाबू को नीचा करने की और के.बी.सहाय को उठाने की कोशिश कर रहे हैं।मैंने तो वर्षों तक कृष्ण बल्लभ बाबू को ऐसे पद पर रखा जिसका महेश बाबू सपना भी नहीं देख सकते थे।भूमिहारवाद का आरोप भी गलत है। श्रीबाबू ने एक पत्र में लिखा कि जेपी भी जातपांत से उपर नहीं उठ सके हैं और वे चाहते हैं कि उनके स्वजातीय के.बी.सहाय को मैं अपना उतराधिकारी बना दूं। उन दिनों किसी नेता द्वारा अपना उतराधिकारी बनाने की गुंजाइश कम ही थी।वैसे भी डा.श्रीकृष्ण सिंहा के बाद विनोदानंद झा बिहार के मुख्य मंत्री बने थे।कांग्रेस विधायक दल में नेता पद के चुनाव के बाद विजयी होने पर कोई नेता आम तौर पर मुख्य मंत्री बनता था।पर जेपी और श्रीबाबू में जिन दो स्वतंत्रता सेनानियों के राजनीतिक भविष्य को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण पत्र व्यवहार हुआ,उन नेताओं के बारे में कुछ जानिए।क्या ये नेतागण जेपी और श्रीकृष्ण सिंहा के ‘संरक्षण’ के हकदार थे ? के.बी.सहाय और महेश प्रसाद सिंहा बाद के वर्षो में क्रमशः मुख्य मंत्री और मंत्री बने।इन पर भ्रष्टाचार के भीषण आरोप लगे।सन् 1967 में जब बिहार में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो इन दो नेताओं सहित कुल छह कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए अय्यर आयोग का गठन किया गया। सुप्रीम कोर्ट के जज रहे अय्यर साहब ने अन्य आरोपितों के साथ- साथ इन दो नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कुछ आरोपों को सही माना।महेश बाबू पर गंडक सिंचाई योजना के ठेकेदार रमैया के मैनेजर से घूस लेने का आरोप साबित हो गया था।के.बी.सहाय पर अन्य आरोपेां के अलावा अपने ही पुत्र को अपनी ही कलम से नाजायज तरीके से सरकारी खान का पट्टा देने का आरोप सही पाया गया। के.बी.सहाय और महेश बाबूू ने स्वतंत्रता के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं।पर आजादी के बाद गद्दी पाने पर वे संयम नहीं रख सके।ऐसा नहीं है कि तब बिहार कांग्रेस में संयमी स्वतंत्रता सेनानियों की कोई कमी थी।पर उनके राजनीतिक कैरियर की चिंता करने वाले जेपी और श्री बाबू जैसे दिग्गज नेता नहीं थे।के.बी.सहाय कुछ वर्षों तक श्रीकृष्ण सिंहा के गुट में थे।पर संबंध बिगड़ा तो के.बी.सहाय ने एक अवसर पर कहा कि ‘यदि साठी @भूमि घोटाला @कांड को लेकर डा.श्रीकृष्ण सिंहा ने मेरा इस्तीफा लिया होता तो उनकी स्थिति भी लज्जास्पद हो जाती क्योंकि वे भी साठी भूमि कांड के लाभान्वितों में शामिल थे।’ प्रभात खबर (२४-१०-2008)

भारतेंदु हरिश्चंद्र और खड्गविलास प्रेस


महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक पढ़ने से उनके जीवन में निर्णायक मोड़ आ गया। नई पीढ़ी के कम ही लोग जानते हैं कि इसके लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएं पटना के खड्ग विलास प्रेस में ही छपी थींं।अब वह प्रेस तो नहीं है,पर आधुनिक हिंदी को उस प्रेस का योग दान अद्भुत है।

उन्नीसवीं सदी के उतरार्ध में पटना का वह प्रेस बिहार का गौरव था। उस प्रेस और प्रकाशन संस्था पर शोध करके डाक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले डा.धीरेंद्र नाथ सिंह लिखते हैं, ‘आधुनिक हिंदी साहित्य को उजागर करने में इस प्रेस के योगदान का ऐतिहासिक मूल्य है।’ दिवंगत डा.सिंह ने आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस के विशिष्ट अवदान का मूल्यांकन किया था। इस विषय पर बिहार राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस की भूमिका’ में डा. सिंह ने लिखा है कि ‘उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी महाराजकुमार राम दीन सिंह ने सन् 1880 में पटना के बांकी पुर में खड्ग विलास प्रेस की स्थापना की थी।उन्होंने अपना जीवन शिक्षक के रूप में आरम्भ किया था तथा पाठ्य पुस्तकों और हिंदी पुस्तकों के अभाव ने उन्हें प्रकाशन व्यवसाय के लिए प्रेरित किया था।

उन्होंने स्वयं पाठ्य पुस्तकें तैयार कीं और अन्य लोगों से पुस्तकें लिखवाईं।इन कृतियों का प्रकाशन खड्ग विलास प्रेस ने किया।भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र और उनके युग के लेखक यदि आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता हैं तो निश्चय ही खड्ग विलास प्रेस और उसके संस्थापक को उनका एकमात्र प्रकाशक माना जाना उचित होगा।

यदि महाराज कुमार राम दीन सिंह का सद्भाव और सहयोग न मिला होता तो भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों को अपनी रचनाओं के व्यवस्थित प्रकाशन का इतना अच्छा सुयोग नहीं मिला होता।’ ‘इस प्रकाशन संस्थान ने भारतेंदु हरिश्चंद्र,पंडित प्रताप नारायण मिश्र,पंडित अम्बिका दत्त व्यास,पंडित शीतला प्रसाद त्रिपाठी,भारतीय सिविल सेवा में हिंदी के प्रतिष्ठापक फ्रेडरिक पिंकाट,आधुनिक हिंदी खड़ी बोली के प्रथम महा काव्य प्रिय प्रवास के प्रणेता पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’, पंडित दामोदर शास्त्ऱी सपे्र, लाल खड्ग बहादुर मल्ल, शिव नंदन सहाय प्रभृति साहित्यकारों को प्रकाशकीय संरक्षण प्रदान किया और उनकी कृतियों के प्रकाशन पर मुक्तहस्त से व्यय किया।’ 

‘हिंदी भाषी प्रदेशों में सबसे पहले बिहार प्रदेश में सन् 1835 में हिंदी आंदोलन शुरू हुआ था।इस अनवरत प्रयास के फलस्वरूप सन् 1875 में बिहार में कचहरियों और स्कूलों में हिंदी प्रतिष्ठित हुई, किंतु पाठ्््य पुस्तकों का सर्वथा अभाव था।खड्ग विलास प्रेस ने विभिन्न विषयों में पाठ्य पुस्तकें तैयार करा कर इनका प्रकाशन किया।साहब प्रसाद सिंह,उमानाथ मिश्र,चण्डी प्रसाद सिंह,काली प्रसाद मिश्र,प्रेमन पांडेय प्रभृति लेखकों ने इस दिशा में सक्रिय रूप से सहयोग किया था।साहब प्रसाद सिंह की ‘भाषा सार’ नामक पुस्तक सन् 1884 से 1936 तक बिहार के स्कूलों और कालेजों में पढाई जाती रही। 

राम दीन सिंह का बचपन पटना जिले के तारण पुर गांव में बीता जहां उनके मामा का घर था।राम दीन सिंह के पुत्र सारंगधर सिंह भी एक बुद्धिजीवी राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे।वे सन् 1937 में डा.श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल में संसदीय सचिव थे।बाद में वे बिहार से संविधान सभा के सदस्य बने।उन्होंने 1952 से 1962 तक पटना को लोक सभा में प्रतिनिधित्व किया।रामदीन सिंह से भारतेंदु हरिश्चंद्र के आत्मीय संबंध की झलक उनके आपसी पत्र -व्यवहार से भी मिलती है। 

23 सितंबर 1882 को भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बाबू राम दीन सिंह को लिखा,‘आपका पत्र और तार मिला।आपने जैसा अनुग्रह इस समय किया,वह कहने के योग्य नहीं,चित्त ही साक्षी है।आज शनिवार की दोपहर है।अब तक बाबू साहब प्रसाद सिंह नहीं आए।शाम तक या रात तक शायद आवें।यद्यपि इस अवसर पर फिर आपको कुछ लिखना निरा झख मारना है किंतु अत्यंत कष्ट के कारण लिखता हूं।हो सके तो एक सौ और भेज दीजिए।जो काम कमबख्त दरपेश है नहीं निकलता और मैं यहां किसी से उसका जिक्र तक नहीं किया चाहता इसी से फिर निर्लज्ज होकर लिखा।किंतु जाने दीजिए,बहुत कष्ट हो तो नहीं।क्षमा। इसके पीछे जो नोटिस है मेरे अनुरोध से क्षत्रिय पत्रिका में छाप दीजिएगा। भवदीय,हरिश्चंद्र ।’ ‘सूचना ः मेरी बनाई वा अनुवादित वा संग्रह की हुई पुस्तकों को श्री बाबू राम दीन सिंह खड्ग विलास के स्वामी छाप सकते हैं जब तक जिन पुस्तकों को ये छापते रहें और किसी को अधिकार नहीं कि छापें।-हरिश्चंद्र।’ 

भारतेंदु ने एक बार फिर राम दीन सिंह को लिखा,‘मेरे एक मित्र ने मुझसे बड़ा विश्वासघात किया।मेरा कुछ रुपया कुछ कारण से उसके नाम से रहता था।वह बेइमान होकर मिरजा पुर चला गया।वरंच मैं इसी वास्ते विन्ध्याचल गया था।अब वह साफ इनकार कर गया।खैर दीवानी फौजदारी जो कुछ होगी वह देख ली जाएगी।अब गुप्त बात आपको लिखता हूं कि रुपए सब एक साथ हाथ से निकल जाने से मैं बहुत ही तंग हो गया हूं।’ 
प्रभात खबर (21-11-2008)

जब ए.के. गोपालन ने मांगा दरभंगा राज से चंदा


सी.पी.आई.के अपने जमाने के एक बड़े नेता ए.के.गोपालन ने अपने गांव के स्कूल भवन के निर्माण के लिए सन् 1956 में दरभंगा महाराज सर डा. कामेश्वर सिंह से पत्र लिख कर चंदा मांगा था।

दूसरी ओर, उन्हीं दिनों के बारे में एक अन्य बड़े सी.पी.आई. नेता भोगेंद्र झा ने बताया है कि ‘जहां तक मुझे जानकारी है,उस समय दरभंगा महाराज के अंग्रेज जनरल मैनेजर डेनबी ने बाकी जमींदार और कुछ सरकारी अफसरों से मिल कर मेरी हत्या की योजना बनाई थी। ’यानी, एक ही दल के एक नेता चंदा मांग रहा था तो दूसरा जीवन मरण का संघर्ष कर रहा था।

तत्कालीन सी.पी.आई. एम.पी. ए.के.गोपालन ने 22 दिसंबर 1956 को दरभंगा के जमींदार ‘महाराजाधिराज’ कामेश्वर सिंह को लिखा कि मालाबार (केरल)पेरालसेरी हाई स्कूल कमेटी को भवन निर्माण के लिए पैसे भेजने का आपसे मैं अनुरोध करता हूं। उम्मीद है कि आप मेरे अनुरोध का सम्मान करेंगे।’ यह पत्र महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह (1907-62) की स्मृति में तैयार उस सुंदर पुस्तक में संग्रहीत है, जिसका संपादन मशहूर समाज विज्ञानी डा.हेतुकर झा ने किया है।

सर कामेश्वर सिंह अन्य राजा-महाराजाओं से थोड़ा हटकर थे। उनके बारे में पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव होता है। अब ए.के. गोपालन भी कोई मामूली नेता नहीं थे।वे अविभाजित सी.पी.आई. के संसदीय दल के नेता थे। उनकी पत्नी सुशीला गोपालन भी सांसद थींं। जाहिर है कि कम्युनिस्ट पार्टियों में उस तरह परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाता था जिस तरह गैर कम्युनिस्ट दलों में बेशर्म तरीके से किया जाता रहा है। यानी गोपालन साहब सपरिवार क्रांतिकारी थे। विचारों से आप मतभेद रख सकते हैं, पर कोई भी वैचारिक रूप से ईमानदार व्यक्ति यह मानेगा कि तब कम्युनिस्ट होने का मतलब ही था कष्टमय जीवन बिताना। पर, यह पढ़कर आश्चर्य हुआ कि जिस दरभंगा महाराज से बिहार के भोगेंद्र झा जीवन-मरण का संघर्ष कर रहे थे, उसी महाराज से केरल के गोपालन साहब चंदा मांग रहे थे।

हालांकि दरभंगा महाराज राजनीतिक लोगों को चंदा देने में उदार थे। आजादी की लड़ाई के दिनों में भी वे कांग्रेस को उदारतापूर्वक चंदा देते थे।पर कम्युनिस्टों की बात तो अलग मानी जाती थी। अब जरा भोगेंद्र झा के संघर्षों की एक झलक उन्हीें के शब्दों में, ‘ सन् 1946 में हमलोगों ने भूमि संघर्ष को लिया। जमींदारी मिटाने, अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई और जमीन का बंटवारा करने, सबको मिलाकर हमने शुरू किया। जमीन पर चढ़ना,केवल नारा देना नहीं, चढ़ने का मतलब कब्जा करना गरीबों के द्वारा। यह लड़ाई हमारे यहां 1946 में काफी उग्र हो गई थी। अंधेरी एक गांव है जहां महंथाना था। जमीन पर चढ़ने के सवाल पर हमारी कुछ जीतें हो गईं तो उसके बाद मुझे मारने का प्रयास किया गया था।’ यह विवरण ‘क्रांति योग’ नामक भोगेंद्र झा की पुस्तक में संग्रहीत है जिसे मौखिक इतिहास के तहत नेहरू स्मारक संग्रहालय ने तैयार कराया था। सी.पी.आई. के टिकट पर भोगेंद्र झा मधुबनी से कई बार लोक सभा सदस्य रहे। वे बताते हैं,‘जहां तक मुझे जानकारी है,उस समय दरभंगा महाराज के जनरल मैनेजर थे डेनबी। उसने बाकी जमींदार और कुछ सरकारी अफसरों से मिलकर योजना बनाई। 4 जनवरी 1947 को मधुबनी से मैं अंधेरी गांव आया और मुझे घेर लिया गया। इससे पहले भी दो- तीन बार घेरने के प्रयास हुए थे। टकराव हुए थे,पर वे लोग पीछे हट गए थे।मैं एक दिन अकेला था।सीधे हत्या करने का प्रयास हुआ। मैं बेहोश था, खून में लथपथ, मेरे लिए हटना संभव था, लेकिन मुझे मुनासिब नहीं लगा। यह मुझे मारने का संगीन प्रयास था, यह पता ही था। उसके विवरण में मैं नहीं जाउंगा, लंबा हो जाएगा।’

हालांकि एक अन्य स्थल पर भोगेंद्र झा कहते हैं,‘ आगे चलकर दरभंगा महाराज से भूमि सुधार के मामले पर जबर्दस्त संघर्ष हुआ। मैंने सारे महंथाना को मिटा दिया। भारत की पहली जमींदारी हमलोगों ने ही मिटाई। आजकल के मधुबनी जिला के बेनीपट्टी प्रखंड के अंधेरी गांव में 700 एकड़ की जमींदारी थी। एक इंच भी जमीन उसको नहीं छोड़ा।’

 एक अन्य अवसर पर केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र ने सर कामेश्वर सिंह को लिखा कि ‘ सिर्फ आपके आशीर्वाद से ही मैं अब तक अपना सार्वजनिक जीवन बरकरार रखने में समर्थ रहा हूंं। (विथ ओयर ब्लेसिंग एलोन,आई हैव बिन एबल टू मेंटेन माई पब्लिक लाइफ सो फार।) ललित बाबू ने 12 जनवरी, 1962 को महाराजाधिराज को लिखा कि ‘इस बार मेरा चुनाव आसान नहीं है। इस बार काफी संसाधन की जरूरत होगी जो मेरी क्षमता से बाहर है।’ यानी ललित बाबू ने भी महाराजा से आर्थिक मदद की मंाग की।यही नहीं बल्कि यह भी कहा कि आपके के ही बल पर मैं अब तक राजनीति में हूंं।

याद रहे कि दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह 1952 के लोक सभा चुनाव में दरभंगा नौर्थ क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवार श्याम नंदन मिश्र से हार गए थे। यानी, दरभंगा महाराज कांग्रेस में तब नहीं थे। पर कांग्रेस के कई बड़े नेता उनकी तरफ मदद के लिए मुखातिब रहते थे।


( प्रभात खबर 19-09-2008)