क्या किसी आतंकी हमले की स्थिति में तत्काल कमांडो दस्ते को घटनास्थल पर भेजने में हमारी सरकार अगली बार सफल हो पायेगी ? कई कारणों से अब तक तो विफल ही रही है। 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड और 2008 के मुंबई हमले के कटु अनुभव देश के सामने हैं। सरकार ने कंधार कांड में विफलता से नहीं सीखा और गत साल वही गलती दुहराई गई। कंधार कांड में केंद्र सरकार कंधार में नहीं, बल्कि अमृतसर में विफल हुई थी। विमान को कंधार जाने से पहले तब अमृतसर में ही रोका जा सकता था। केंद्र सरकार नेशनल सिक्युरिटी गार्ड को देश के तीन और स्थानों में स्टेशन करने की व्यवस्था करने जा रही है। इस कदम से तो त्वरित कार्रवाई के लिए सरकारी मंशा जाहिर होती है। साथ ही यह पिछली घटनाओं में त्वरित कमांडो कार्रवाई में विफलता की भी परोक्ष स्वीकृति भी है, पर क्या इतना ही काफी है ? याद रहे कि अभी एनएसजी के दस्ते दिल्ली के पास मनेसर (गुड़गांव) में तैनात हैं। कंधार विमान अपहरण कांड और मुंबई ताज हमले के समय हुई कुछ अन्य गलतियों से भी सबक लेने की जरूरत जान पड़ती है। किसी आतंकी हमले की स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उच्चतम स्तर पर तत्क्षण जवाबी हमले का फैसला लेने की जरूरत पड़ती है। कंधार और मुंबई हादसे के समय सरकारों ने इस दिशा में काफी सुस्ती दिखाई। कांग्रेस के नेतागण यदा-कदा यह कह कर भाजपा को चिढ़ाते रहते हैं कि जसवंत सिंह आतंकी मसूद अजहर को अपने साथ ले जाकर कंधार छोड़ आये थे। आतंकवाद पर वे क्या बात करेंगे ? 24 दिसंबर, 1999 को अपहरणकर्ता इंडियन एयरलाइंस के काठमांडु-दिल्ली विमान -814 को लखनऊ और अमृसर होते हुए कंधार ले गये थे। उस विमान पर करीब पौने दो सौ यात्री सवार थे। कंधार में विमान पहुंचने के बाद तब की भारत सरकार और उसके विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने जो कुछ किया, उस कृत्य को तब के लगभग पूरे प्रतिपक्ष का समर्थन हासिल था। केंद्र सरकार को उस विमान के अपहरण की सूचना उस दिन शाम में 4 बजकर 56 मिनट पर मिल चुकी थी, तब वह लखनऊ के ऊपर उड़ रहा था। तब से करीब तीन घंटों तक भारतीय सीमा में विमान चक्कर लगाता रहा। जब वह विमान अमृतसर से उड़ा, तो सात बजकर 49 मिनट हो चुके थे। इस बीच अमृतसर हवाई अड्डे पर वह विमान 40 मिनट तक रुका भी रहा, पर तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर थे और वे अपने विशेष विमान से दिल्ली लौट रहे थे। जिस विमान से प्रधानमंत्री यात्रा कर रहे थे, उसमें सेटेलाइट फोन की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए ऐसी आपात स्थिति में भी उन्हें सूचित करके उनसे उचित निदेश प्राप्त नहीं किया जा सका। प्रधानमंत्री के उनके दिल्ली आवास पहुंचने पर ही इस संबंध में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर शुरू हुआ। सवाल है कि प्रधानमंत्री जिस विमान में यात्रा कर रहे हों, उसमें सेटलाइट फोन नहीं हो, सरकार के ऐसे आपराधिक निकम्मेपन के लिए एनडीए सरकार को जम कर कोसा जाना चाहिए था। यदि किसी कारण प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं हो सका, तो दूसरे मंत्री और अफसर ऐसी आपात स्थिति में हाथ-पर-हाथ रख कर बैठे रहेंगे ? समय पर एनएसजी कमांडो को अमृतसर क्यों नहीं भेजा जा सका ? इंधन भरने के लिए अपहरणकर्ता विमान को अमृतसर उतरवाने को बाध्य हो गये थे और इस बात की पूर्व सूचना कें्रद सरकार को थी। एनएसजी से संबद्ध एक अधिकारी ने 25 दिसंबर, 1999 को मीडिया से कहा था कि ‘विमान से अमृतसर से उड़ान भरने के बाद भारतीय सीमा क्षेत्र से बाहर जाने से पहले तक एनएसजी कमांडो दस्ते के पास विमान को अपहर्ताओं से मुक्त करा लेने के पर्याप्त अवसर थे, लेकिन ऊपर के स्तर पर भ्रम होने के कारण कमांडो का उपयोग नहीं किया जा सका। ऐसी ही स्थितियों से निबटने के लिए बनाये गये विशेष प्रबंधन ग्रूप के अधिकारियों को पता ही नहीं था कि उन्हें क्या करना है, जबकि इसके लिए दिशा-निर्देश स्पष्ट हैं।’ यदि विमान अमृतसर में ही रोक लिया गया होता, तो अपहर्ताओं से वार्ता चलाने पर भारत सरकार का पलड़ा भारी होता, पर विमान के कंधार चले जाने के बाद तो भारत सरकार असहाय हो गयी, क्योंकि वहां तब तालिबान की सरकार थी और उससे भारत का कोई राजनयिक रिश्ता था ही नहीं। तालिबानी अपहरणकर्ताओं से मिले हुए थे। अमृतसर में भारत सरकार की विफलता के लिए किसी-न-किसी को सजा मिल गयी होती, तो इस बार गत माह कमांडो को मनेसर से मुंबई भेजने में साढ़े नौ घंटे नहीं लग जाते। यदि गत नवंबर में समय पर कमांडो मुंबई पहुंच गये होते, तो वहां मृतकों और घायलों की संख्या काफी कम हो सकती थी। इस बार तो कमांडो को दिल्ली से मुंबई पहुंचाने के लिए विमान ही समय पर उपलब्ध नहीं हो सका। तब एनएसजी के लिए आरक्षित वह विमान पता नहीं क्यों चंडीगढ़ में था ! जबकि, उसे इंधन भरी टंकी के साथ दिल्ली हवाई अड्डे पर हरदम तैनात रहना चाहिए था। अब देखना यह होगा कि कमांडो के लिए आरक्षित विमान का किसी वीवीआइपी के लिए घटना के समय ही इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है ! कंधार में खड़े किये गये विमान के यात्रियों को किसी-न-किसी कीमत पर छुडा लाने के लिए 27 दिसंबर, 1999 को दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी थी। बैठक के बारे में दूसरे दिन के अखबार में यह खबर छपी, ‘देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान के यात्रियों और चालक दल की सकुशल रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने का सरकार को सुझाव दिया है। इन दलों के नेताओं ने कहा कि संकट की इस घड़ी में वे सब एक हैं। मगर पल- पल बदलते घटनाक्रम के मद्देनजर जरूरी कदम उठाने का फैसला तो सरकार ही ले सकती है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजित, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जे चितरंजन सहित कई प्रमुख नेताओं ने भाग लिया।’ यानी जब अमृतसर में उस विमान को नहीं रोका जा कसा, तो पूरा देश लाचार हो गया। यह और बात है कि राजनीतिक कारणों से अब मसूद अजहर को छोड़ देने के लिए एक दल दूसरे दल को दोषी ठहरा रहा है। हालांकि तब प्रतिपक्ष ने केंद्र सरकार से साफ- साफ कहा था कि यात्रियों और चालक दल की वह सकुशल रिहाई कराये। किसी ने बैठक में यह नहीं कहा कि भले यात्रियों की जान ही क्यों न चली जाये, पर मसूद अजहर या किसी आतंकी को नहीं छोड़ना है। अब जरा ताजा मुंबई के समय सरकारी सुस्ती का एक नमूना देखिए। 26 नवंबर, 2008 की रात नौ बज कर 30 मिनट पर आतंकियों ने मुंबई में गोलियां चलानी शुरू कर दीं। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को सूचना दी गयी। उन्होंने 11 बजे रात में केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटील को फोन पर कहा कि उन्हें एनएसजी कमांडो चाहिए। पाटील ने एनएसजी प्रमुख जेके दत्ता को निदेश दिया कि 200 कमांडो मुंबई भेजें। जिस विमान से उन्हें मुंबई भेजना था, वह उस समय चंडीगढ़ में था। उसे दिल्ली हवाई अड्डा लाकर उसमें इंधन भरते काफी देर हो गयी। धीमी गति वाला विमान मुंबई पहुंचा और कमांडो 27 नवंबर की सुबह सात बजे ही अपनी कार्रवाई शुरू कर सके। अब सवाल है कि क्या ऐसे मौकों के लिए तेज गति वाला विमान नहीं रहना चाहिए ? क्यों कमांडो को घटना स्थल पर भेजने में साढ़े नौ घंटे लगे ? क्यों कंधार कंाड के समय प्रधानमंत्री के विमान में सेटेलाइट फोन की सुविधा नहीं थी ? यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री मुख्यालय में नहीं हैं, तो आपात स्थिति में तत्क्षण निर्णय लेने के लिए अन्य मंत्री या अफसर अधिकृत क्यों नहीं हैं ? इन और इस तरह के सवालों का माकूल जवाब ही अगले किसी खतरे से हमें बचा पायेगा।
प्रकाशित
बुधवार, 21 जनवरी 2009
समाजवादी एकता और टूट की एक अलग कहानी
सन् 1952 के आम चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी को मिला कर प्रजा समाजवादी पार्टी का गठन कर दिया गया था।पर तीन साल के भीतर ही समाजवादियों का यह दल टूट गया। हालांकि इस विलयन और टूट के पीछे कुर्सी की होड़ तब नहीं थी जिस तरह की होड़ बाद के वर्षों में समाजवादियों में देखी गई।तब दो दलों का विलयन इस कारण हुआ था ताकि देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत किया जा सके। टूट भी इसलिए हुई क्योंकि नई संयुक्त पार्टी यानी प्रसपा अपनी ही पुरानी बात से मुकर रही थी। सन् 1950 में जब मध्य भारत में पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला कर कुछ लोगों की जान ले ली थी तो समाजवादी पार्टी ने उस सरकार से इस्तीफे की मांग की थी।पर जब त्रावन कोर कोचिन की प्रसपा सरकार की पुलिस ने सन् 1954 में भीड़ पर गोलियां चलार्इं तो राज्य मंत्रिमंडल ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। प्रसपा के महा सचिव डा.राम मनोहर लोहिया ने वहां के मुख्य मंत्री पट्टम थानु पिल्लई को तार भेज कर उन्हेंे इस्तीफा देने को कह दिया।पर प्रसपा के अध्यक्ष जे.बी.कृपलानी चाहते थे कि पहले गोली कांड के लिए दोषी कौन है ,इस बात का पता लगाया जाए।फिर जरूरत पड़ने पर कानून व्यवस्था का महकमा जिसके पास है,उससे इस्तीफा मांग लिया जाए।मुख्य मंत्री से नहीं। डा.लोहिया का तर्क यह था कि सिर्फ देश के खिलाफ बगावत की स्थिति में ही गालियां चलनी चाहिए।इस मसले पर प्रसपा के भीतर आंतरिक कलह इतना बढ़ा कि डा.लोहिया को 1955 में अलग सोशलिस्ट पार्टी बनानी पड़ी।डा.लोहिया कथनी और करनी में एकरूपता के पक्षधर थे। उधर जब सन् 1952 में सोशलिस्ट पार्टी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी का विलयन हुआ तो यह कहा गया कि इससे देश में कांग्रेस का एक मजबूत विकल्प बनेगा और कांग्रेस सत्ता के मद में मनमानी नहीं कर पाएगी।तब सोशलिस्ट पार्टी के नेता आचार्य नरेंद्र देव और के.एम.पी.पी.के नेता आचार्य जे.बी.कृपलानी थे। सन् 1952 के आम चुनाव में देश में कांग्रेस को कुल चार करोड़ 40 लाख वोट मिले थे।तब वोट हासिल करने के लिहाज से सोशलिस्ट पार्टी और के.एम.पी.पी.भारत की दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टियां थीं।इन दोनों दलों को मिला दें तो पहले आम चुनाव में देश भर में इन्हें एक करोड़ 74 लाख मत मिले थे।इन दलों के विलयन से जय प्रकाश और अशोक मेहता जैसे नेता बडे़ उत्साहित थे।पर बाद में कई कारणों से जेपी सर्वाेदय में चले गए और अशोक मेहता कांग्रेस में। दो दलों के विलयन के फैसले पर अशोक मेहता ने कहा था कि ‘सोशलिस्ट पार्टी तथा के.एम.पी.पी.के प्रस्तावित विलय से मैं अत्यधिक खुश हूं, भावविह्वल हूं।मैं मानता हूं कि यह न केवल आम चुनाव के बाद बल्कि आजादी प्राप्त होने के बाद की एक बड़ी राजनीतिक घटना है।’ ‘ हम यह याद करें कि महात्त्मा जी की हत्या के बाद हम समाजवादी कांग्रेस से इसलिए अलग हुए थे कि हमारा निश्चित मत था कि तीव्र सामाजिक परिवत्र्तन के बिना आजादी बरकरार नहीं रखी जा सकती है।पर उस परिवत्र्तन के लिए कांग्रेस में न तो इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता।जिन 4.40 करोड़ मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया है ,उनका धीरे धीरे मोहभंग होगा और वे वहां से हटकर नए राजनीतिक केंद्र की ओर आना चाहेंगे।हमारी पार्टी मानती है कि समान दृष्टि वाली सभी छोटी-बड़ी पार्टियों के साथ आने से राजनीतिक विकास की यह प्रक्रिया आगे बढेगी। जय प्रकाश नारायण ने इस विलय पर कहा था कि ‘ आम चुनाव के विदारक अनुभव के बाद हम सब हतप्रभ थे।हमें यह समझ में आया कि जब तक राजनीतिक समेकन नहीं होता और समान विचार वाली पार्टियां एक साथ नहीं मिलतीं , एक ओर प्रक्रियावादी शक्तियों के लिए और दूसरी ओर अराजक तत्वों के लिए द्वार खुलेगा,जो देश को विनाश की ओर ले जाएगा। जेपी ने यह भी कहा कि ‘सवाल उठाया गया है कि क्या के.एम.पी.पी.माक्र्सवाद में विश्वास करता है ? मैं साथियों से प्रार्थना करूंगा कि वे माक्र्सवाद को दूसरा धर्म न बनने दें और सार को छोड़ कर रूपों में न उलझ जाएं।इस मुद्दे पर पंचमढी सम्मेलन में काफी अच्छी बहस हुई और लोहिया के स्मरणीय उत्तर के बाद इसे पुनः उठाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी।हम यह न भूलें कि न केवल विभिन्न समयों एवं स्थानों पर बल्कि समान स्थिति में भी माक्र्सवाद की विभिन्न परस्पर विरोधी व्याख्याएं हैं।फिर इतिहास, भारत के इतिहास सहित ,इस बात का गवाह है कि जो लोग अपने को माक्र्सवादी कहने पर जोर डालते रहे, वे गलत साबित हुए और उन्होंने ऐतिहासिक गलतियां की।’ प्रभात खबर (09-०१-2009)
सती होते देख मूर्छित हो गए थे इब्नबतूता
14वीं सदी में भारत की यात्रा पर आए इब्न बतूता एक स्त्री को सती होते देख मूर्छित हो गए थे। वे लिखते हैं, ‘मैं यह हृदय विदारक दृश्य देख कर मूर्छित हो घोड़े से गिरने को ही था कि मेरे मित्रों ने संभाल लिया और मेरा मुख पानी से धुलवाया।’
इब्न बतूता अरब देश से 22 साल की छोटी उम्र में विश्व भ्रमण का निकल पड़े थे। वे 30 साल तक घूमते रहे। इब्न बतूता ने अपनी यात्रा के वृतांत में भारत के उस सदी के शासकों, सामाजिक धार्मिक मान्यताओं, रीति रिवाजों आदि का रोमांचक आंखों देखा हाल वर्णित किया है। इब्न बतूता ने यह भी लिखा कि स्त्री को इस तरह जलाने की अनुमति सम्राट देते थे। क्रूर सती प्रथा का वर्णन इब्न बतूता ने विस्तार से किया है। याद रहे कि इस प्रथा के खिलाफ राजा राम मोहन राय ने बाद में अभियान चलाया और सन् 1829 में अंग्रेज शासक ने इस पर कानूनी रोक लगाई।
इससे पहले मुस्लिम शासक भी स्वेच्छा से सती होने के कृत्य पर रोक नहीं लगाते थे। वे इसे हिंदुओं का एक धार्मिक कृत्य मान कर हस्तक्षेप नहीं करते थे। पर अंग्रेज और मुस्लिम शासक इस बात का ध्यान जरूर रखते थे कि किसी महिला को कोई जबरन सती न बना दे। इस बात का जिक्र अबुल फजल ने भी ‘अकबरनामा’ में किया है। आज के युग में दहेज प्रथा, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सती प्रथा की तरह ही मारक साबित हो रही है। आज का दहेज विरोधी कानून, दहेज पिपासुओं के खिलाफ बेअसर ही साबित हो रहा है।
सती प्रथा का 14वीं सदी में कैसा स्वरूप था, वह इब्न बतूता के शब्दों में पढि़ए, ‘एक बार मैंने भी एक हिंदू स्त्री को बनाव सिंगार किए घोड़े पर चढ़कर जाते हुए देखा था। हिंदू और मुसलमान इस स्त्री के पीछे चल रहे थे। आगे- आगे नौबत बजती जाती थी और ब्राह्मण साथ -साथ थे। घटना का स्थान सम्राट की राज्य सीमा के अंतर्गत होने के कारण बिना उनकी आज्ञा प्राप्त किए जलाना संभव नहीं था। आज्ञा मिलने पर यह स्त्री जलाई गई। हिंदुओं में प्रत्येक विधवा के लिए सती होना आवश्यक नहीं है। परंतु पति के साथ स्त्री के जल जाने पर वंश प्रतिष्ठित गिना जाता है और उसकी भी पतिव्रताओं में गणना होने लगती है। सती न होने पर विधवा को मोटे- मोटे वस्त्र पहन कर महाकष्टमय जीवन तो व्यतीत करना ही पड़ता है, साथ ही वह पति परायण भी नहीं समझी जाती।’
एक युद्ध में खेत रहे तीन जवानों की विधवाओं के सती होने का विवरण देते हुए इब्न बतूता ने लिखा कि ‘इन तीन स्त्रियों ने तीन दिनों तक खूब गाया बजाया और नाना प्रकार के भोजन किए। इनके पास चारों ओर की स्त्रियों का जमघट लगा रहता था। चौथे दिन इनके पास घोड़े लाए गए और ये तीनों बनाव सिंगार कर सुगंधि लगाकर उन पर सवार हो गईं। इनके दाहिने हाथ में एक नारियल था, जिसको ये बराबर उछाल रही थीं और बाएं हाथ में एक दर्पण था जिसमें ये अपना मुख देखती थीं। चारों ओर ब्राह्मणों और संबंधियों की भीड़ लगी थी। प्रत्येक हिंदू आकर अपने मृत माता, पिता, बहिन, भाई तथा अन्य संबंधी या मित्रों के लिए इनसे प्रणाम कहने को कह देता था और ये हां हां कहती और हंसती चली जाती थीं।
मैं भी मित्रों के साथ यह देखने को चल दिया कि ये किस प्रकार से जलती हैं। तीन कोस जाने के बाद हम एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां जल की बहुतायत थी और वृक्षों की सघनता के कारण अंधकार छाया हुआ था। यहां चार मंदिर बने हुए थे।’ ‘मंदिरों के निकट पहुंचने के बाद इन स्त्रियों ने उतर कर स्नान किया और कुंड में एक डुबकी लगाई। वस्त्र आभूषण उतार कर रख दिए और मोटी साडि़यां पहन लीं। कुंड के पास अग्नि दहकाई गई। सरसों का तेल डालने पर उसमें प्रचंड शिखाएं निकलने लगीं। पंद्रह पुरुषों के हाथों में लकड़ियों के बंधे हुए गट्ठे थे और दस पुरुष अपने हाथों में लकड़ी के बड़े-बड़े कुंदे लिए खड़े थे। नगाड़े, नौबत और शहनाई बजाने वाले स्त्रियों की प्रतीक्षा में खड़े थे। स्त्रियों की दृष्टि से बचाने के लिए लोगों ने अग्नि को एक रजाई की ओट में कर लिया था। परंतु इन में से एक स्त्री ने रजाई को बलपूर्वक खींच कर कहा कि क्या मैं जानती नहीं कि यह अग्नि है, मुझे क्यों डराते हो? इतना कह कर वह अग्नि को प्रणाम कर तुरंत उसमें कूद पड़ी।
नगाड़े, ढोल, शहनाई और नौबत बजने लगी। पुरुषों ने अपने हाथों की पतली लकड़ियां डालनी प्रारंभ कर दीं। और फिर बड़े- बड़े कुंदे भी डाल दिए गए जिससे स्त्री की गति बंद हो गई। उपस्थित जनता भी चिल्लाने लगी। मैं यह हृदय द्रावक दृश्य देख कर मूर्छित हो घोड़े से गिरने को ही था कि मेरे मित्रों ने संभाल लिया और मेरा मुख पानी से धुलवाया। संज्ञा लाभ कर मैं वहां से लौट आया।’
प्रभात खबर (07-11-2008)
कंधार विमान अपहरण कांड से कोई सबक नहीं
आतंकवादी हमलों को लेकर भारत के राजनीतिक दलों में आम सहमति तैयार करना आज भी टेढ़ी खीर है।पर,जिस बात पर कभी विभिन्न दलों के बीच एक खास परिस्थिति में सहमति बन भी जाती है,उस बात को लेकर भी बाद में असहमति जताना और राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करना, इस देश की राजनीति की फितरत बन चुकी है।यह बात लगभग सभी दलों पर लागू होती है।चिंताजनक बात यह है कि ऐसी राजनीति देश की रक्षा के मामलों में भी होती है। मुम्बई के ताजा आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में कंधार विमान अपहरण प्रकरण को एक बार फिर याद करना मौजूं होगा।कंधार अपहरण कांड यह बताता है कि हमारे हुक्मरान अपनी गलतियों से सीखने के लिए कत्तई तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकवादियों ने 24 दिसंबर,1999 को इंडियन एयर लाइंस के विमान 814 का अपहरण कर लिया।उसे वे कंधार यानी अफगानिस्तान ले गए।तब वह देश तालिबानियों के कब्जे में था।उस विमान के 152 यात्रियों कों आतंकियों ने बंधक बना लिया।कई दिनों के शर्मनाक ड्रामे के बाद हरकत उल अंसार के आतंकी मौलाना मसूद अजहर को रिहा करने के बदले अपहृत विमान के बंधक यात्रियों को छुड़ा लिया गया।आतंकीं को अपने साथ लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह कंधार गए थे। इससे पहले 27 दिसंबर 1999 को दिल्ली में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी।उस बैठक में यह सहमति बनी थी कि बंधक यात्रियों को किसी भी कीमत पर बचाना है।पर, जब कीमत दे दी गई तो उन्हीें दलों के नेतागण समय- समय पर भाजपा और जसवंत सिंह पर ताने मारते रहते हैं कि आप भी तो मसूद अजहर को साथ लेकर कंधार गए थे।याद रहे कि विचारक और लोगों को प्रेरित करने में माहिर आतंकवादी अजहर कश्मीर के अनंतनाग में 1994 में गिरफ्तार किया गया था।हाल में फिल्म अभिनेता आमिर खान ने कहा है कि ‘मुझे और मेरे बच्चों को कुछ आतंकवादी बंधक बना लें तो मैं अपनी सरकार से यह कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहूंगा कि वह मेरी और मेरे बच्चों की परवाह न करें और और देश के व्यापक हित में आतंकवादियों को मार गिराए।’ काश,ऐसा ही साहस उन बंधकों के परिजनों ने दिखाया होता जो तब कंधार में बंधक थे।दुनिया के कई देश कभी ऐसे हालात में भी आतंकवादियों की शत्र्तें नहीं मानते,चाहे कुछ भी हो जाए।पर खुद अटल मंत्रिमंडल के सदस्य जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन कंधार के सवाल पर आपस में तू तू मैं मैं कर रहे थे।महाजन की शिकायत थी कि जसवंत जल्दी मसूद अजहर को लेकर कंधार क्यों नहीं जा रहे हैं। उधर दिल्ली में बंधकों के परिजन समूह बना कर सरकार की ऐसी -तैसी कर रहे थे।वे चाहते थे कि जल्दी आतंकियों की शत्र्तें सरकार पूरी कर दे।सरकार ने कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं को बुलवा कर उन रिश्तेदारों से मुलाकात और बात कराई।विधवाएं कह रही थीं कि आतंकियों की शत्र्तें मानने पर इस देश की और महिलाएं विधवा बनेंगीं।पर उसका कोई असर उन पर नहीं पड़ा।टी.वी.चैनल उन रिश्तेदारों के हंगामे का दृश्य दुनिया भर को निरंतर दिखा रहे थे । एक बंधक के रिश्तेदार डा.राजीव छिब्बर ने जसवंत सिंह से तब रोष भरे शब्दों में कहा कि ‘तब अपहृत रूबैया के बदले आतंकवादी छोड़े गए थे तो अब क्यों नहीं ?’ अब जरा कंधार काल की प्रशासनिक गलतियों से हाल की गलतियों की तुलना की जाए तो पता चलेगा कि गत नौ वर्षों में इस मामले में हमारी सरकारेंं इस पुरानी राह पर कायम हैं कि ‘हम नहीं सुधरेंगे।’ मुम्बई पर आतंकी हमले के बाद जिस तरह की खुफिया,सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताओं की खबरें आईं,वे लोगांे ंको अच्छी तरह याद ही होंगीं।अब जरा कंधार कांड के समय की विफलताओं की चर्चा की जाए।तब की केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव पर आरोप था कि अपहरण की खबर मिल जाने पर भी बैठक बुलाने में उन्होंने देरी की।पी.एम.ओ.के प्रधान सचिव पर आरोप लगा कि विमान जब अमृतसर के पास और फिर अमृतसर में था, तब उसे उन्होंने उलझावपूर्ण संकेत भेजे। फैसले में देरी की। राॅ के तत्कालीन प्रमुख पर आरोप लगा कि अपहरण की खबर पाते ही वे चैकन्ना नहीं हुए। एन.एस.जी. ने राॅ की टीम के इंतजार में वक्त गंवाया।वात्र्ताकारों के बगैर एन.एस.जी.को अमृसर रवाना होना चाहिए था।याद रहे कि अमृसर जाने के लिए विशेष विमान इंतजार करता रहा,पर वात्र्ताकार नहीं पहुंचे।याद रहे कि अपहरणकत्र्ता विमान को काठमांडो से लखनउ,दिल्ली होते हुए अमृतसर ले गए थे।अमृसर में इंधन के लिए विमान रूका।फिर वे उसे कंधार ले गए।सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वह उस विमान को अमृतसर में अपने कब्जे में नहीं कर सकी।क्या इन गलतियों से भारत सरकार ने इस बीच कोई शिक्षा ग्रहण की हैं ? मुम्बई की ताजा घटना इस सवाल का नकारात्मक उत्तर ही देती है। प्रभात खबर (०५-१२-2008)
रविवार, 18 जनवरी 2009
बंगाल का चुनावी फार्मूला बिहार में !
बंगाल में 1977 में सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु सरकार ने करीब 16 लाख बटाईदारों को कानूनी हक दिलवा दिया । वाम मोर्चा बाद के हर चुनाव में उन बटाइदारों को यह हिदायत देती रहती है कि कहीं कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई तो वह आपको इस हक से वंचित कर देगी।अब भला बटाईदार क्यों कांग्रेस को वोट देंगे ? हाल में जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि ‘राजद के आरोप पत्र के मुताबिक बिहार में नीतीश शासन काल में दो लाख 40 हजार शिक्षकों की बहालियां फर्जी डिग्रियों के आधार पर हुई हैं।श्री तिवारी ने कहा कि यदि लालू प्रसाद की चली तो इन शिक्षकों को वे बर्खास्त कर देंगे।’ ऐसा कह कर श्री तिवारी ने जोरदार तीर चलाया है।सन् 2010 तक कुल मिलाकर नीतीश सरकार करीब 5 लाख बेरोजगारों को नौकरियां देने की योजना बना रही है। श्री तिवारी के बयान से यह लगता है कि अगले विधान सभा चुनाव में एन।डी.ए.की ओर से मतदाताओं से यही कहा जाएगा कि राजद यदि फिर से सत्ता में आएगा तो वह इन पांंच लाख लोगों को फिर से बेरोजगार बना देगा।
पूर्वोत्तर के पीडि़त हिंदी भाषी
महाराष्ट्र के हिंदीभाषियों की पीड़ा को लेकर बिहार के नेताओं ने तो एकजुटता दिखाई,पर लगता है कि इसी देश के पूर्वोत्तर राज्यों के हिंदीभाषियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप हाल में पूर्वोत्तर के प्रवास पर थे।उन्होंने बताया कि वहां हर रोज चार- पांच हिंदी भाषी मारे जा रहे हैं।वे इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वे हिंदी भाषी हैं।असम सरकार ऐसी घटनाओं में मृतकों को तीन लाख रुपए सरकारी मुआवजा देती है।पर हिंदी भाषी मृतकों के परिजनों को वह भी मुआवजा नहीं मिल रहा है। पूर्वोंत्तर के हिंदीभाषियों की हत्याओं में कई मामलों में उन लोगों का हाथ रहता है जो बंगला देशी घुसपैठिए हैं।क्या बिहार के तथाकथित सेक्युलर नेता उन हिंदीभाषियों की सुध इसलिए नहीं ले रहे हैं,क्योंकि इससे उनके खास वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है ?
संपादक नीतीश
कई साल पहले की बात है।एक विवाह समारोह में पटना के चर्चित पत्रकार, मंच से सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे थे।श्रोताओं में विधान परिषद तत्कालीन सभापति प्रो।जाबिर हुसेन भी थे।जाबिर साहब ने टिप्पणी की कि इस पत्रकार महोदय की यदि नौकरी छूट भी जाए तो भी इन्हें रोजी-रोटी की तकलीफ नहीं होगी। अब इसी तरह की बात मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कही जा सकती है।यदि नीतीश कुमार कभी राजनीति से उब जाएं तो वे एक सफल संपादक बन सकते हैं।अपनी सरकार के तीन साल पूरा होने से पहले ही जब उपलब्धियों के दस्तावेज इकट्ठे किए जा रहे थे तो यह खबर आई थी कि रिपोर्ट कार्ड का संपादन खुद नीतीश कुमार कर रहे हैं।रिपोर्ट कार्ड जब छप कर आ गया तो पता चला कि नीतीश कुमार एक अच्छे संपादक भी हैं। 48 पेज के रिपोर्ट कार्ड के विभिन्न पन्नों के ले आउट और छपाई मनोहारी हैं।फोटोग्राफ का प्रस्तुतीकरण शालीन और ग्राफ आसानी से समझ में आ जाने वाले हैं। मध्य प्रदेश में अस्सी के दशक में जब अर्जुन सिंह मुख्य मंत्री और अशोक वाजपेयी संस्कृति सचिव थे तो उस राज्य के सरकारी प्रकाशन भी ऐसे ही शालीन,सूचनाप्रद और मनोहारी हुआ करते थे।
भगत सिंह बनाम कायर
अमर शहीद सरदार भगत सिंह और आज के उन अन्य लोगों मंे कितना फर्क है जो आज के भगत सिंह बनना चाहते हैं ?बहुत फर्क है।भगत सिंह ने संेट्रल एसेम्बली में बम फेंका तो उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्होंने ऐसा किया। वे कायर नहीं थे।उन्होंने इस तरह का अन्य काम भी किया तो उसे स्वीकार किया। ंवे इसका कानूनी नतीजा भी भुगतने के लिए तैयार रहे।क्योंकि वे बहादुर थे।परिणाम स्वरूप उन्हें अमर शहीद का दर्जा मिला। पर आज तथाकथित शहीद बनने वाले कायर लोग क्या कर रहे हैं ? तरह- तरह की धार्मिक आस्थाओं व अनास्थाओं के नाम पर वे भारी हिंसा तो कर रहे हैं। वे छिप कर निर्दोष लोगों की जान तो ले रहे हैं,पर पकड़े जाने पर खुद को निर्दोष बता कर साफ रिहा हो जाने और अपनी जान बचा लेने का बहाना भी कर रहे हैं।दरअसल वे क्रांतिकारी नहीं बल्कि कायर हैं।उनके राजनीतिक मददगार तो और भी घटिया जीव हैं।
मौत का सौदागर कौन ?
एक नेता ने कुछ माह पहले नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। तब सोहराबुद्दीन नामक एक अभियुक्त की कथित पुलिस मुंठभेड़ में मौत हो गई थी।सोहराबुद्दीन, अब्दुल लतीफ का ड्रायवर था।लतीफ कभी गुजरात का अंडर वल्र्ड किंग था और वह दाउद इब्राहिम का गुजरात में बिजनेस मैनेजर था। लतीफ 1997 में गुजरात पुलिस की गिरफ्त से भागने की कथित कोशिश में पुलिस की गोली से मारा था।दाउद और लतीफ के हथियारों का जखीरा सहराबुदद्ीन ने उज्जैन के पास अपने गांव के कुएं में छिपा दिया था। कुएं से मिले हथियारों का यह जखीरा 1993 में मुम्बई बम ब्लास्ट के पहले विदेश से भारी मात्रा में लाए गए कुल हथियारों का एक छोटा हिस्सा था।सोहराबुद्दीन की कथित फर्जी मुंठभेड़ में कथित हत्या के खिलाफ मशहूर गीतकार जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है।यह अकारण नहीं है कि उनकी अभिनेत्री पत्नी शबाना आजमी यह आरोप लगाती हैं कि मुम्बई में उन्हें मकान नहीं मिलता। अब जरा लतीफ और सहराबुद्दीन की कथित पुलिस मुंठभेड़ ‘हत्याओं’ की तुलना कर लें।इससे इस देश के नेताओं की ढांेगी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद के प्रति उनके रवैए का पता चल जाएगा। लतीफ जब मारा गया था तब गुजरात में राष्ट्रीय जनता पार्टी के दिलीप पारीख मुख्य मंत्री थे और वह सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी।तब की गुजरात सरकार,सत्ताधारी राजपा और कांग्रेसी नेताओं ने लतीफ की मौत को गुजरात पुलिस की भारी उपलब्धि माना था। तब के अखबारों मेंे उनके बयान सबूत के रूप में मौजूद हैं। संभव है कि इसके लिए तब संबंधित पुलिस अफसरों को सरकार ने इनाम भी दिया हो।पर जब सहाराबुद्दीन की मौत हुई तो गुजरात की सरकार नरेंद्र मोदी के हाथों में आ चुकी थी।सहराबुद्दीन की मौत पर कांगे्रस के शीर्ष नेताओं ने गुजरात सरकार व मोदी को मौत का सौदागर कहा।इस कांड में कई आई।पी.एस.अफसर जेल भिजवा दिए गए।वे मुकदमा झेल रहे हैं।धर्मनिरपेक्षता के झंडावरदार जावेद साहब अदालत तक पहुंच गए।अच्छा होता यदि इस देश के किसी राष्ट्रभक्त हिंदू या मुसलमान के साथ हुए पुलिस जुल्म पर जावेद कोर्ट जाते।
तिवारी प्रकरण एक चेतावनी
एन.डी. तिवारी-उज्वला प्रकरण वैसे नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो ‘ बिन फेरे हम तेरे ’ फार्मूला में विश्वास रखते हैं। याद रहे कि उज्ज्वला सिंह के पुत्र रोहित शेखर ने यह दावा किया है कि आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एन.डी.तिवारी ही उनके पिता हैं। यदि यह दावा सही है तो यह तिवारी जी के प्रति उज्ज्वला का विश्वासघात ही माना जाएगा।क्योंकि उन्होंने तिवारी जी से शादी तो नहीं की थी।यूं ही सह जीवन के लिए तैयार हो गई हांेगी। यदि शादी की भी होंगी तो उसकी सूचना आम लोगों को नहीं थी।देश भर से छन -छन कर अक्सर यह खबर आती रहती है कि कई मशहूर नेता ‘बिन फेरे हम तेरे’ बने हुए हैं। क्या तिवारी प्रकरण ऐसे दिलफेंक नेताओं को यह सीख दे पाएगा कि उज्ज्वलाओं पर अब विश्वास करने में नुकसान है।आर्थिक भी और राजनीतिक भी।
पूर्वोत्तर के पीडि़त हिंदी भाषी
महाराष्ट्र के हिंदीभाषियों की पीड़ा को लेकर बिहार के नेताओं ने तो एकजुटता दिखाई,पर लगता है कि इसी देश के पूर्वोत्तर राज्यों के हिंदीभाषियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप हाल में पूर्वोत्तर के प्रवास पर थे।उन्होंने बताया कि वहां हर रोज चार- पांच हिंदी भाषी मारे जा रहे हैं।वे इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वे हिंदी भाषी हैं।असम सरकार ऐसी घटनाओं में मृतकों को तीन लाख रुपए सरकारी मुआवजा देती है।पर हिंदी भाषी मृतकों के परिजनों को वह भी मुआवजा नहीं मिल रहा है। पूर्वोंत्तर के हिंदीभाषियों की हत्याओं में कई मामलों में उन लोगों का हाथ रहता है जो बंगला देशी घुसपैठिए हैं।क्या बिहार के तथाकथित सेक्युलर नेता उन हिंदीभाषियों की सुध इसलिए नहीं ले रहे हैं,क्योंकि इससे उनके खास वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है ?
संपादक नीतीश
कई साल पहले की बात है।एक विवाह समारोह में पटना के चर्चित पत्रकार, मंच से सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे थे।श्रोताओं में विधान परिषद तत्कालीन सभापति प्रो।जाबिर हुसेन भी थे।जाबिर साहब ने टिप्पणी की कि इस पत्रकार महोदय की यदि नौकरी छूट भी जाए तो भी इन्हें रोजी-रोटी की तकलीफ नहीं होगी। अब इसी तरह की बात मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कही जा सकती है।यदि नीतीश कुमार कभी राजनीति से उब जाएं तो वे एक सफल संपादक बन सकते हैं।अपनी सरकार के तीन साल पूरा होने से पहले ही जब उपलब्धियों के दस्तावेज इकट्ठे किए जा रहे थे तो यह खबर आई थी कि रिपोर्ट कार्ड का संपादन खुद नीतीश कुमार कर रहे हैं।रिपोर्ट कार्ड जब छप कर आ गया तो पता चला कि नीतीश कुमार एक अच्छे संपादक भी हैं। 48 पेज के रिपोर्ट कार्ड के विभिन्न पन्नों के ले आउट और छपाई मनोहारी हैं।फोटोग्राफ का प्रस्तुतीकरण शालीन और ग्राफ आसानी से समझ में आ जाने वाले हैं। मध्य प्रदेश में अस्सी के दशक में जब अर्जुन सिंह मुख्य मंत्री और अशोक वाजपेयी संस्कृति सचिव थे तो उस राज्य के सरकारी प्रकाशन भी ऐसे ही शालीन,सूचनाप्रद और मनोहारी हुआ करते थे।
भगत सिंह बनाम कायर
अमर शहीद सरदार भगत सिंह और आज के उन अन्य लोगों मंे कितना फर्क है जो आज के भगत सिंह बनना चाहते हैं ?बहुत फर्क है।भगत सिंह ने संेट्रल एसेम्बली में बम फेंका तो उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्होंने ऐसा किया। वे कायर नहीं थे।उन्होंने इस तरह का अन्य काम भी किया तो उसे स्वीकार किया। ंवे इसका कानूनी नतीजा भी भुगतने के लिए तैयार रहे।क्योंकि वे बहादुर थे।परिणाम स्वरूप उन्हें अमर शहीद का दर्जा मिला। पर आज तथाकथित शहीद बनने वाले कायर लोग क्या कर रहे हैं ? तरह- तरह की धार्मिक आस्थाओं व अनास्थाओं के नाम पर वे भारी हिंसा तो कर रहे हैं। वे छिप कर निर्दोष लोगों की जान तो ले रहे हैं,पर पकड़े जाने पर खुद को निर्दोष बता कर साफ रिहा हो जाने और अपनी जान बचा लेने का बहाना भी कर रहे हैं।दरअसल वे क्रांतिकारी नहीं बल्कि कायर हैं।उनके राजनीतिक मददगार तो और भी घटिया जीव हैं।
मौत का सौदागर कौन ?
एक नेता ने कुछ माह पहले नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। तब सोहराबुद्दीन नामक एक अभियुक्त की कथित पुलिस मुंठभेड़ में मौत हो गई थी।सोहराबुद्दीन, अब्दुल लतीफ का ड्रायवर था।लतीफ कभी गुजरात का अंडर वल्र्ड किंग था और वह दाउद इब्राहिम का गुजरात में बिजनेस मैनेजर था। लतीफ 1997 में गुजरात पुलिस की गिरफ्त से भागने की कथित कोशिश में पुलिस की गोली से मारा था।दाउद और लतीफ के हथियारों का जखीरा सहराबुदद्ीन ने उज्जैन के पास अपने गांव के कुएं में छिपा दिया था। कुएं से मिले हथियारों का यह जखीरा 1993 में मुम्बई बम ब्लास्ट के पहले विदेश से भारी मात्रा में लाए गए कुल हथियारों का एक छोटा हिस्सा था।सोहराबुद्दीन की कथित फर्जी मुंठभेड़ में कथित हत्या के खिलाफ मशहूर गीतकार जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है।यह अकारण नहीं है कि उनकी अभिनेत्री पत्नी शबाना आजमी यह आरोप लगाती हैं कि मुम्बई में उन्हें मकान नहीं मिलता। अब जरा लतीफ और सहराबुद्दीन की कथित पुलिस मुंठभेड़ ‘हत्याओं’ की तुलना कर लें।इससे इस देश के नेताओं की ढांेगी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद के प्रति उनके रवैए का पता चल जाएगा। लतीफ जब मारा गया था तब गुजरात में राष्ट्रीय जनता पार्टी के दिलीप पारीख मुख्य मंत्री थे और वह सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी।तब की गुजरात सरकार,सत्ताधारी राजपा और कांग्रेसी नेताओं ने लतीफ की मौत को गुजरात पुलिस की भारी उपलब्धि माना था। तब के अखबारों मेंे उनके बयान सबूत के रूप में मौजूद हैं। संभव है कि इसके लिए तब संबंधित पुलिस अफसरों को सरकार ने इनाम भी दिया हो।पर जब सहाराबुद्दीन की मौत हुई तो गुजरात की सरकार नरेंद्र मोदी के हाथों में आ चुकी थी।सहराबुद्दीन की मौत पर कांगे्रस के शीर्ष नेताओं ने गुजरात सरकार व मोदी को मौत का सौदागर कहा।इस कांड में कई आई।पी.एस.अफसर जेल भिजवा दिए गए।वे मुकदमा झेल रहे हैं।धर्मनिरपेक्षता के झंडावरदार जावेद साहब अदालत तक पहुंच गए।अच्छा होता यदि इस देश के किसी राष्ट्रभक्त हिंदू या मुसलमान के साथ हुए पुलिस जुल्म पर जावेद कोर्ट जाते।
तिवारी प्रकरण एक चेतावनी
एन.डी. तिवारी-उज्वला प्रकरण वैसे नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो ‘ बिन फेरे हम तेरे ’ फार्मूला में विश्वास रखते हैं। याद रहे कि उज्ज्वला सिंह के पुत्र रोहित शेखर ने यह दावा किया है कि आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एन.डी.तिवारी ही उनके पिता हैं। यदि यह दावा सही है तो यह तिवारी जी के प्रति उज्ज्वला का विश्वासघात ही माना जाएगा।क्योंकि उन्होंने तिवारी जी से शादी तो नहीं की थी।यूं ही सह जीवन के लिए तैयार हो गई हांेगी। यदि शादी की भी होंगी तो उसकी सूचना आम लोगों को नहीं थी।देश भर से छन -छन कर अक्सर यह खबर आती रहती है कि कई मशहूर नेता ‘बिन फेरे हम तेरे’ बने हुए हैं। क्या तिवारी प्रकरण ऐसे दिलफेंक नेताओं को यह सीख दे पाएगा कि उज्ज्वलाओं पर अब विश्वास करने में नुकसान है।आर्थिक भी और राजनीतिक भी।
तापमान (दिसंबर, 2008)
‘स्टिंग’ से भयभीत क्यों बासा ?
‘बासा’ ने स्टिंग आपरेशन के लिए मुख्य मंत्री के सुझाव का सार्वजनिक रूप से विरोध कर दिया है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को प्रखंड प्रमुखों को यह सुझाव दिया था कि वे भ्रष्ट अफसरों के कारनामों का भंडाफोड़ करने के लिए आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करें।जो जन प्रतिनिधि बी.डी.ओ.पर दबाव डाल कर सिर्फ लेन -देन का रिश्ता नहीं बनाना चाहते होंगे, वे स्टिंग आपरेशन चला या चलवा सकते हैं। मुख्य मंत्री के सुझाव के बाद अब यह काम कुछ दूसरे लोग भी कर सकते हैं। इस ‘आपरेशन’ के शिकार कभी कुछ प्रखंड प्रमुख भी हो सकते हैं। बिहार प्रशासनिक सेवा संघ यानी बासा के अध्यक्ष अरूण चंद्र मिश्र ने कहा है कि मुख्य मंत्री के इस सुझाव से अफसरगण मानसिक रूप से परेशान हो जाएंगे। उनकी यह राय है कि भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ पहले से निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल है कि कोई ईमानदार अफसर किसी स्टिंग आपरेशन की आशंका मात्र से ही मानसिक रूप से क्यों परेशान हो जाएगा ? जो अफसर ईमानदारी पूर्वक अपनी ड्यूटी निभाता है और बिना रिश्वत लिए सरकारी काम करता रहता है,उसे किसी भी संभावित स्टिंग आपरेशन से क्यों परेशान हो जाना चाहिए ? पुराने तरीके से बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मदद नहीं मिल रही है। याद रहे कि सरकारी भ्रष्टाचार ही इस देश की भीषण गरीबी व अन्य अधिकतर समस्याओं का जनक है।चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की सजा की व्यवस्था है,इसीलिए वह देश आज अमेरिका से भी अधिक स्वर्ण पदक ओलम्पिक में जीत जा रहा है। पर, हम अपनी अधिकतर जनता को भूखे पेट सोने को मजबूर कर देते हैं।हालांकि इस देश की संसद व विधान सभाएं इतना अधिक पैसे का बजट हर साल जरूर पास कर देती हैं जिससे कोई भूखा पेट नहीं सोए।पर बिचैलिए लूट लेते हैं। हालांकि नीतीश कुमार ने भी इस बारे में जरूर अधूरी बात कही है।उन्हें साथ- साथ यह भी कहना चाहिए था कि राज्य के राजनीतिक कार्यकत्र्ता,जन प्रतिनिधि व जनता को चाहिए कि वे मंत्रियों तथा दूसरे अफसरों तथा अन्य क्षेत्रों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ भी स्टिंग आपरेशन चलाएं।हां,यदि स्टिंग आपरेशन के जरिए कोई बड़े घोटाले का भंडाफोड़ होता है तो आपरेशन में लगे लोगों को राज्य सरकार भरपूर इनाम दे।साथ ही,ऐसे राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को चुनावी टिकट में तरजीह मिले। स्टिंग आपरेशन कितना जरूरी है,यह बात बासा के अध्यक्ष के बयान के बाद और भी साफ हो गया है। क्योंकि स्टिंग आपरेशन की आशंका से ही मानसिक रूप से परेशान होने वाले अफसर मौजूद हैं। क्या स्टिंग आपरेशन के बिना दिल्ली के आर.के.आनंद जैसे बड़े वकील को बेनकाब करना संभव था ? संसद में सवाल पूछने के लिए जिन दर्जन भर सांसदों ने रिश्वत ली थी,उन्हें स्टिंग आपरेशन के बिना बेनकाब करके संसद से बाहर करवाना संभव था ? एक केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जू देव के खिलाफ का एक सफल स्टिंग आपरेशन कौन भूल सकता है ? इस देश में गलत उद्देश्य से चलाए गए कुछ स्टिंग आपरेशनों की कोर्ट ने निंदा की है तो कुछ आपरेशनों की अदालत ने जरूरी भी बताया है। बिहार में ही हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में परंपरागत तरीके से भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। क्या बासा अध्यक्ष दावा कर सकते हैं कि इससे राज्य के सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हुआ है ?शायद स्टिंग के भय से भ्रष्टाचार कम हो ! क्या बासा अध्यक्ष यह बता सकते हैं कि बिहार के किस प्रखंड कार्यालय में रिश्वत के बिना जनता का कोई जायज काम भी होता है ? क्या उनके सदस्य ने बासा या राज्य सरकार को कभी यह लिख कर दिया है कि उनकी इच्छा के बिना भी उनके मातहत क्लर्क या अफसर जनता से रिश्वत ले रहे है ? जाहिर है कि सभी प्रखंड प्रमुख शुद्ध मन से ही भ्रष्ट बी.डी.ओ.या सी.ओ. के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं करते। कई के अपने निजी एजेंडे होते हैं।शिक्षा नियुक्ति घोटालों ने बिहार के अनेक जन प्रतिनिधियों को भी बेनकाब कर दिया है।पर यदि बासा सभी तरह के भ्रष्टों के खिलाफ नई -नई तकनीकी के जरिए कार्रवाई नहीं करने देगा तो न तो उनके सदस्य खुद आने वाले दिनों में सुरक्षित रहेंगे और न ही अन्य लोगों के साथ साथ उनकी भी आने वाली पीढि़यां महफूज रहेंगीं।क्योंकि सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हो रहा है और विकास नहीं होने का सर्वाधिक लाभ बिहार में माओवादियों को मिल रहा है जो अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं। राष्ट्रीय सहारा, पटना (२८-०८-2008)
एकमुश्त मतदान की जरूरत
यदि दलीय नेता ही अवसर आने पर अपने दल के सभी सदस्यों की ओर से सदन में एकमुश्त मतदान कर दिया करें ं,तो ‘नोट के बदले वोट’ की नौबत शायद नहीं आएगी। यह बात अलग है कि दलीय नेता ही बिक जाएं।पर, ऐसी नौबत कम ही आती है।लोक सभा में गत 22 जुलाई को जो कुछ हुआ,उसे देखते हुए क्या इस सुझाव पर विचार करने का समय नहीं आ गया है ? पर, सदस्यों की ओर से संसदीय व विधायक दलों के नेताओं को ऐसा अधिकार दिया जाए, इसके लिए संबंधित नियम में परिवत्र्तन करना पड़ेगा। क्या लोकतंत्र मेंं पनपी एक शर्मनाक बुराई को रोकने के लिए नियमों में एक और परिवत्र्तन नहीं किया जाना चाहिए ? अधिक दिन नहीं हुए जब राज्य सभा चुनावों में अपने दलीय नेता या उनके प्रतिनिधि को मत पत्र दिखाकर वोट देने की बाध्यता कायम की गई।यानी सदस्यों को उनके मनोनुकूल मतदान करने का उनका अधिकार छीन लिया गया। उससे पहले बड़े पैमाने पर ऐसी शिकायत आ रही थी कि अनेक विधायक पैसे लेकर राज्य सभा के उम्मीदवारों को वोट दे रहे हैं। कल्पना कीजिए कि पहले से संसदीय दल के नेताओं को ही विश्वास प्रस्ताव पर अपने पूरे दल की ओर से एकमुश्त वोट देने का अधिकार होता तो कम से कम संगठित व बड़े दलों से तो कोई दल -बदल या पक्ष परिवत्र्तन नहीं होता।हां,निर्दलीय सदस्यों के बारे में भी अलग से विचार किया जा सकता है। निर्दलीय सदस्य जब चुन कर जाते हैं,उसी समय उनसे यह लिखवा कर स्पीकर रख लें कि वे पूरे पांच साल वे किस पक्ष में रहेंगे ? उन्हें पहले ही यह लिख कर दे देना चाहिए कि वे सत्ता दल के साथ रहेंगे या विपक्ष के साथ ? या फिर वे कभी भी किसी पक्ष की ओर से मतदान ही नहीं करेंगे।जब वे यह लिख कर दे देंगे तो उनके द्वारा किसी भी हालत में पक्ष बदलने की स्थिति में स्पीकर उनकी सदस्यता तत्काल समाप्त घोषित कर देंगे। ऐसा ही नियम बनाया जा सकता है। दलीय व निर्दलीय जन प्रतिनिधियों के लिए ऐसे नियम बन जाएं तो बिकने के लिए कोई जन प्रतिनिधि घोड़ामंडी में उपलब्ध ही नहीं रहेगा।यदि उपलब्ध ही नहीं रहेगा तो खरीदने वाले कैसे व कहां से खरीदेंगे ? यदि नहीं खरीद पाएंगे तेा लोकतंत्र शर्मसार होने से बच जाएगा।यानी भविष्य में कभी किसी मंत्रिमंडल के बारे में यह नहीं कहा जा सकेगा कि फलां मंत्रिमंडल तो खरीदे हुए सांसदों के ही बल पर वर्षो तक चला। इससे लोकतंत्र बदनाम होने से बचेगा और जनतंत्र मंंें आम जनता की आस्था समाप्त नहीं होगी।आस्था बनी रहेगी तो माओवादी जैसी जो शक्तियां इन दिनों मौजूदा लोकतंत्र को समाप्त करने की कोशिश में लगी हुई हैं,उन्हें जनता से अधिक ताकत नहीं मिलेगी। एक बार 1993 में सरकार बचाने के लिए कुछ सांसद बिके थे। इस बार भी सांसदों को खरीद कर ही मन मोहन सरकार बचाई गई, इस आरोप की जांच संसदीय समिति कर रही है।जांच का नतीजा जो भी आए , पर पूरे देश ने यह दृश्य कई बार अपने टी.वी.स्क्रीन पर देखा कि किस तरह सांसदों की घोड़ामंडी सजी।इस घृणित प्रकरण की चर्चा अभी चलती ही रहेगी।ऐसी शर्मनाक चर्चाओं पर विराम लगाने के उपाय किए जाने में यदि इस देश के प्रमुख दल रूचि रखते होंगे तो जरूर उपर दिए गए सुझाव या फिर इससे भी किसी बेहतर सुझाव पर अमल करेंगे।पर क्या इस देश के पक्ष विपक्ष की राजनीति के दिग्गज नेता लोग सचमुच चाहते हैं कि नोट के बदले वोट जैसे प्रकरणों से भारत का लोकतंत्र दुनिया भर में बदनाम होने से बचे ? या फिर इस घृणित व्यापार की सहूलियत उपलब्ध रहने पर उसका समय आने पर सभी दल सिर्फ लाभ ही उठाना चाहते हैं ? अभी लाभ यू.पीए. ने उठाया,कल होकर एन.डी.ए. उठाएगा। यह बात इसलिए कही जा रही है कि झामुमो रिश्वत कांड मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में ही यह कहा था कि यदि कोई सांसद घूस लेकर सदन में वोट देता है तो उसे सजा देने का अधिकार संसद को ही है,कोर्ट को नहीं।पर इस फैसले के दस साल बीत जाने के बावजूद ऐसे घूसखोर सांसदों को सजा देने के लिए संविधान के संबंधित अनुच्छेद में संशोधन करने का कोई उपाय न तो एन.डी.ए.ने किया और न ही यू.पी.ए. ने जबकि दोनों इस बीच लंबे समय तक बारी-बारी से सत्ता में रहे। राष्ट्रीय सहारा, पटना (१४-०८-2008)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
