रविवार, 24 दिसंबर 2017

  दहेजमुक्त शादी में जो कुछ खास तरह की समस्याएं  आती हंै, आज मैं उनकी चर्चा करना चाहूंगा।
ऐसा नहीं है कि समाज के पास इन  समस्याओं का हल नहीं है।
पर, शत्र्त यह है कि समाज के कुछ जन सेवी लोगों को थोड़ा समय देना होगा।
  जातीय व सामाजिक संगठन इसमेें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
कुछ तो निभाते भी हैं।पर, इसमें विस्तार की जरूरत है।
 फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर राजपूत समुदाय में जो एकता देखी जा रही है, उस एकता का सदुपयोग ऐसे  काम में हो सकता है।
   मेरे छोटे भाई नागेंद्र सन 1976 में बिहार सरकार में श्रम प्रवत्र्तन पदाधिकारी पद पर नियुक्त हुए थे।एक तो सरकारी नौकरी,दूसरे अपनी खेती-बारी और तीसरे लड़के का प्रभावशाली व्यक्तित्व।
  दहेज देने वालों की कमी नहीं थी।
पर, मेरा परिवार चाहता था कि हम दहेज के चक्कर में न पड़ें।अन्य बातों पर ध्यान दें।हमने 1979 में पटना जिले के बैकट पुर मंदिर में नागेंद्र की शादी आयोजित की।कोई दहेज नहीं ,कोई फालतू दिखावा नहीं।
 अच्छी शादी हुई।परिवार व रिश्तेदार अच्छे मिले।
   पर, उससे पहले मुझे 1978 में एक अजीब अनुभव हुआ। उन दिनों मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में काम करता था।एक विधि पदाधिकारी  मेरे एक रिश्तेदार को लेकर मेरे आॅफिस में  आए।आते ही उस पदाधिकारी ने मुझसे पूछा कि ‘आप भाई का कितना तिलक लीजिएगाा ?’
मैंने कहा कि हम लोग तिलक -दहेज नहीं लेते।
लड़की यदि पसंद आ जाएगी तो मुफ्त में शादी हो जाएगी।
 वे चले गए।उन्होंने लौटते समय मेरे रिश्तेदार से कहा कि लगता है कि लड़के में कोई दोष है,इसीलिए यह आदमी दहेज नहीं मांग रहा है।
   अब यहीं सामाजिक संगठन की भूमिका आती है।
संगठन ऐसे लोगों की सूची तैयार करें जो दहेजमुक्त और कम से कम खर्च में शादी करना चाहते हैं।
  मैरिज एक्सचेंज बनाएं।दोनों पक्षों को मिलाएं।वैसे लोग कम मिलेंगे,पर मिलेंगे जरूर।
 वैसी जातियों के समाजसेवी लोगों को यह काम पहले शुरू करना चाहिए जिन जातियों में दिखावे के लिए शादियों में अनाप -शनाप खर्च करने की परंपरा रही है।शादियों में फिजूलखर्ची के कारण कई परिवारों की आर्थिकी बिगड़ते मैंने देखा है।
   एक और कठिनाई है।
यदि किसी लड़की वाले से कहिए कि हम मंदिर में शादी करना चाहते हैं तो वे कहेंगे कि लोग क्या कहेंगे ?
बारात हमारे दरवाजे पर आनी चाहिए।
  ऐसी ही समस्या 1971 में कर्पूरी ठाकुर को भी झेलनी पड़ी थी।वे चाहते थे कि उनकी पुत्री की शादी देवघर मंदिर में हो,पर लड़की की मां की जिद पर शादी उनके गांव पितौझिया में हुई।
  मेरी अपनी शादी 1973 में सोन पुर में हुई।मैं भी चाहता था कि शादी मंदिर में हो।पर मेरी भावी पत्नी के पिता की अपनी समस्या थी।
उनकी बड़ी लड़की की दहेजमुक्त आदर्श शादी मंदिर में हुई थी।
इस बार मेरी ससुराल वाले चाहते थे कि उनके घर बारात जाए।
मेरी शादी दहेज मुक्त होनी थी।इसलिए समस्या थी कि बारात का खर्च कहां से आएगा ?
मैंेने बाबू जी को साफ मना कर दिया था कि बारात सजाने के लिए जमीन नहीं बिकेगी। 
हालांकि वे वैसा करने को तैयार थे।
 उन्होंने कहा कि जब मेरे रिश्तेदार और मित्र-परिचित बारात में नहीं जाएंगे तो मैं भी नहीं जाऊंगा।उन्हें मैं कैसे छोड़ दूं ? तुम जाओ शादी कर लो।
मुझे कोई एतराज नहीं।
 फिर क्या था ! मेरी शादी की ‘बारात’ में पटना  लाॅ कालेज  के मेरे  सहपाठी, युवजन सभा के  साथी और सोशलिस्ट नेता तथा  आधा दर्जन विधायक थे ।मेरे दोनों भाई जरूर शादी में थे।कर्पूरी ठाकुर ने एक तरह से समधी की भूमिका निभाई।
  रात में ही बारात के लोग पटना लौट आए।लगे हाथ बता दूं कि उसी साल मेरी अपनी शादी के कुछ ही दिन पहले मैं पटना के लाला लाजपत भवन में नीतीश कुमार के आदर्श विवाह में शामिल हुआ था।
मैंने अपने बड़े बेटे अमित की शादी भी उसी तरह से की।मेरे समधी उदय नारायण सिंह हजारीबाग में वकील हैं।
वे ही लोगों को बताते हैं कि ‘मुझसे  सुरेंद्र जी ने कोई दहेज नहीं ली।’
मेरे छोटे पुत्र अनुपम ने मुम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस से एम.एस.डब्ल्यू. किया है। उसने  ‘नेट’ भी कर लिया है।इन दिनों वह रांची में  एन. जी. ओ. में काम करता है।
उसने कहा है कि वह जब भी शादी करेगा, कोर्ट मैरिज ही करेगा।
कोई तामझाम नहीं।जाहिर है कि मुझे उसके फैसले पर गर्व है।
पर मेरा मानना है कि ऐसी शादियों के लिए जो भी और जहां भी तैयार हो, उन्हें समाज का बढ़ावा और सहयोग मिलना चाहिए ताकि ऐसे कदमों को  सामाजिक स्वीकृति मिले।
  जहां इस देश के अधिकतर सत्ताधारी नेताओं के यहां की  शादियों में अत्यंत कीमती उपहारों की झरी लगा दी जाती है, वहीं बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने आज अपने पुत्र की दहेजमुक्त शादी करके मिसाल कायम की है।उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी शादी  से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी।
@ --सुरेंद्र किशोर--3 दिसंबर 2017@

   
  


  

  देश के थोड़े से चर्चित मुकदमों के बारे में संक्षिप्त बातें यहां पेश हैं।
यदि किसी मित्र के पास इस तरह के अन्य उदाहरण व जानकारियां भी हों तो कृपया साझा करें।
चारा घोटाले से जुड़े डी.ए.केस में लालू प्रसाद बहुत पहले ही अदालत से दोषमुक्त  हो चुके हैं।
जय ललिता-शशि कला हाईकोर्ट से रिहा हुई थीं, पर सुप्रीम कोर्ट 
ने उन्हें सजा दे दी।
कनिमोझी की रिहाई विवादास्पद है।ऊपरी अदालत में उनके साथ भी यथायोग्य हो सकता है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम को टेल्कम घोटाले में 2011 में पांच साल की सजा हुई थी।उससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री श्यामधर मिश्र को सजा हुई थी।उन पर हत्या का आरोप था।
खुद डा.जगन्नाथ मिश्र को 2013 में लालू प्रसाद के साथ ही सजा मिल चुकी है।
अजित सरकार हत्याकांड मुकदमे में क्या सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी ?
शेयर घोटालेबाज हर्षद मेहता 2002 में जेल में ही मर गया।
पूर्व कंेद्रीय राज्य मंत्री मतंग सिंह जेल में हैं या बाहर ?
उत्तर प्रदेश के दो बड़े विवादास्पद नेता के भ्रष्टाचार जग जाहिर हैं।उनके खिलाफ पी.आई.एल. का क्या हाल है ?
 क्या कभी वे गिरफ्तार हुए ?
  23 दिसंबर 2017 को  लालू प्रसाद के साथ जगदीश शर्मा को भी सजा हुई और डा.मिश्र के साथ भगत और निषाद रिहा हो गए।
इस तरह के मुकदमों के अनेक उदाहरण हंै।
सारी चीजों को एक खास चश्मे से देखने से किसी को कोई लाभ नहीं होता।न व्यक्ति को, न देश को न ही किसी जाति  की अगली पीढि़़यों को।
 इस बात पर विचार क्यों नहीं करते कि लालू प्रसाद के साथ मंडल आरक्षण आंदोलन के समय यानी 1990 में पिछड़ी जातियों के जितने लोग थे, आज उतने क्यों नहीं हैं ? 
  अंग्रेजों के जाने के बाद से ही इस देश में सजा पाने का प्रतिशत घटता जा रहा है।लालू प्रसाद भी लंबे समय तक सत्ता में थे।उन्होंने 
अधिक से अधिक आरोपितों को सजा दिलवाने के लिए अभियोजन व्यवस्था को टाइट करने के लिए क्या किया ? इस दिशा में आज भी देश और खास कर बिहार में क्या हो रहा है ? 
अभी बिहार में सिर्फ दस प्रतिशत मामलों में ही सजा हो पाती है।हत्या के मामले में तो यह दो प्रतिशत ही है।यह स्थिति एक दिन में पैदा नहीं हुई ।न ही इसके लिए कोई एक सत्ताधारी नेता जिम्मेदार नहीं है। 


  2 जी. स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए विशेष सी.बी.आई.  जज ओ.पी.सैनी ने गत गुरूवार को कहा था कि कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी.बी.ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले मेंं अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह नहीं की।कोई सवाल नहीं किया।याद रहे कि उस  टीवी कंपनी का मालिकाना करूणानिधि परिवार से जुड़ा है।
मान लिया कि कोई सवाल नहीं किया ।क्योंकि शायद मनमोहन सरकार के तोते सी.बी.आई. के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।
पर खुद जज साहब के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौके के लिए  धारा -165 का प्रावधान किया गया है।आश्चर्य है कि  धारा -165 में प्रदत्त अपने अधिकार का सैनी साहब ने इस्तेमाल क्यों नहीं किया।
 संभवतः इस सवाल पर अब ऊपरी अदालत में विचार होगा कि 
 जज ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा -165 में  मिली शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया जबकि उनके पास  यह सूचना थी कि
इस घोटाले में 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा हैै ?
इस केस का यह सबसे प्रमुख सवाल है।
  उक्त धारा के अनुसार- ‘न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चलाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए ,किसी भी रूप में किसी भी समय, किसी भी साक्षी या पक्षकारों से, किसी भी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह चाहे पूछ सकेगा तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा और न तो पक्षकार और न उनके अभिकत्र्ता हकदार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई भी आक्षेप करंे , न ऐसे किसी भी प्रश्न  के  प्रत्युत्तर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रति परीक्षा करने के हकदार होंगें।’


शनिवार, 23 दिसंबर 2017

कभी महाबली रहे लालू चारा घोटाले के कारण खोते गए जन समर्थन


            

सन् 1996 में चारा घोटाले के प्रकाश में आने के बाद से लालू प्रसाद का जन समर्थन लगातार घटता गया है।कभी उनके दल की सीटें बढ़ीं भी तो वह चुनावी गठबंधन में शामिल सहयोगी दलों के बल पर न कि राजद की खुद की ताकत के कारण।
   जन समर्थन पहले से तो घट ही रहा था,पर  सन 2013 में लालू प्रसाद को चारा घोटाला मामले में  पहली बार सजा हो जाने के बाद राजद का जन समर्थन और भी घट गया।
इस बार की सजा के बाद इस फैसले का राजनीतिक असर क्या होता है,यह देखना दिलचस्प होगा।
किंतु एक बात तय है कि सामाजिक स्तर एम.वाई.- गठबंधन आम तौर पर लालू प्रसाद के दल के साथ ही रहेगा,ऐसा राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है।हालांकि सिर्फ एम -वाई यानी मुस्लिम -यादव गठजोड़ किसी राजनीतिक दलीय गठबध्ंान को सत्ता दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।हां,यह गठबंधन अन्य समुदायों में प्रतिक्रिया पैदा जरूर करता है।जहां भाजपा मुकाबले में हो तब तो यह और भी अधिक।
  पर, सबसे बड़ी बात यह है कि लालू प्रसाद के परिवार में उनके राजनीतिक उत्तराधिकार की समस्या राजद को आगे भी परेशान करती रहेगी।वैसे अपनी ओर से लालू प्रसाद ने अपने छोटे पुत्र.तेजस्वी प्रसाद यादव को अपना उत्तराधिकारी जरूर घोषित कर दिया है।छोटे पुत्र अपेक्षाकृत अधिक योग्य भी हैं।
  1990 के  मंडल आरक्षण विवाद की पृष्ठभूमि में लालू प्रसाद के दल को 1991 के लोक सभा चुनाव में बिहार में बड़ी संख्या में सीटें मिली थीं।खुद लालू के दल जनता दल को बिहार में 54 में से 31 सीटें मिल गयी थीं।उनके सहयोगी दलों को भी कुछ सीटें मिली थीं।उन दिनों लगभग पूरा पिछड़ा समुदाय लालू के साथ था।
सन् 1990 में जब लालू प्रसाद मुख्य मंत्री बने थे तब उनके दल को बिहार विधान सभा में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं था।
भाजपा के समर्थन से उन्हें बहुमत हुआ  था।
पर 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद को अकेले  विधान सभा में बहुमत मिल गया।इसका पूरा श्रेय सिर्फ लालू को मिला था।श्रेय मिलना सही भी था।उन्होंने कमजोर पिछड़ों को भी सीना तान कर चलना सिखाया था।
  1996 के लोक सभा चुनाव में भी बिहार में लालू के दल को 22 सीटें मिलीं। 1998 के लोक सभा चुनाव में भी लालू दल को 17 सीटें मिल गयी थीं।
पर 1999 के लोक सभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल यानी राजद  को सिर्फ 7 सीटें मिलीं।यानी जन समर्थन का क्षरण शुरू हो गया।
इस बीच चारा घोटाले में विचाराधीन कैदी के रूप में लालू जेल में रह  चुके थे।
  बिहार विधान सभा का चुनाव सन 2000 में हुआ।लालू के दल को खुद का बहुमत नहीं मिला।पर कांग्रेस के समर्थन से राबड़ी देवी मुख्य मंत्री बनीं।
याद रहे कि जेल जाने से पहले 1997 में ही लालू अपनी जगह अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्य मंत्री बनवा चुके थे।
1997 में पार्टी भी टूट चुकी थी।
1994 में उनसे नीतीश कुमार अलग होकर समता पार्टी बना चुके थे।
बाद में समता पार्टी और शरद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल का आपस में विलय हो गया।जदयू बना ।इस दल ने भाजपा से तालमेल करके बिहार में लालू के खिलाफ एक मजबूत विकल्प खड़ा कर दिया।
  सन 2004 में राम विलास पासवान के साथ गठबंधन बना कर लालू लोक सभा की 22 सीटें जीत चुके थे।पर सन 2005 के बिहार विधान सभा चुनाव में  लालू के दल के हाथों से सत्ता निकल गयी।2005 में नीतीश कुमार भाजपा के समर्थन से मुख्य मंत्री बने।
बीच में कुछ महीनों के लिए जीतन राम मांझी को नीतीश ने मुख्य मंत्री बनवा दिया था।पर बाद में खुद नीतीश मुख्य मंत्री बन गए।
 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस और नीतीश के साथ गठबंधन के कारण लालू को विधान सभा में सबसे अधिक सीटें यानी 80 सीटें जरूर मिल गयी,पर वे सीटें  लालू की ताकत को प्रतिबिंबित नहीं करती।
अब लालू नीतीश कुमार से अलग हैं।
अब उन्हें किसी अगले चुनाव में कितनी सीटें मिलती  हैं,यह देखना बाकी है।
हां, एक संकेतक जरूर हैं ।सन 2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू और राम विलास पासवान मिल कर चुनाव लड़े थे।
इन्हें 243 सीटों में से सिर्फ 25 सीटें मिली थीं।
अब दूसरी बार सजायाफ्ता होने पर उनका जन समर्थन कितना घटता या बढ़ता है ,यह देखना दिलचस्प होगा।इस बार एक और फर्क आया है।लगभग पूरा लालू परिवार कानूनी परेशानियों में है।
2010 की अपेक्षा एक सकारात्मक फर्क जरूर आया है । कांग्रेस अब लालू के साथ रहेगी।पर कांगेेस की अपनी ताकत बहुत ही कम
है।  
@ 23 दिसंबर 2017 को फस्र्टपोस्टहिंदी  में प्रकाशित मेरा लेख@
  

  



एक महीने में ही सरकार से समर्थन वापसी की अजूबी राजनीतिक घटना



            

इंदिरा गांधी ने एक महीने के भीतर ही चरण सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
यह राजनीति की अजूबी घटना थी।
  साथ ही दूसरी घटना यह हुई कि चरण सिंह  संसद 
का सामना किए बिना प्रधान मंत्री पद से हट गए।बड़े नेताओं की राजनीतिक उच्चाकांक्षा के कारण जनता पार्टी में टूट के बाद 15 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।कांग्रेस और सी.पी.आई. के समर्थन से जनता@एस@के नेता चरण सिंह 28 जुलाई 1979 को प्रधान मंत्री बने।
 राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने निदेश दिया  था कि चरण सिंह 20 अगस्त तक लोक सभा में बहुमत सिद्ध करें।
   पर इस बीच इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को ही यह घोषणा कर दी कि वह चरण सिंह सरकार को संसद में बहुमत साबित करने में साथ नहीं देगी।
नतीजतन चरण सिंह ने लोक सभा का सामना किए बिना ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
राष्ट्रपति ने 22 अगस्त 1979 को लोक सभा भंग करने की घोषणा कर दी।
  लोक सभा का मध्यावधि चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी 14 जनवरी 1980 को प्रधान मंत्री बन गयीं।
  यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया ?
  इसके लिए कौन जिम्मेदार थे ? किसे किसने ठगा और किसे इसका राजनीतिक लाभ मिला  ?
 यह सब बताना तो  इतिहास लेखकांे का काम है,पर मोटा- मोटी कुछ बातें समझ में आ जाती हैं।
  इंदिरा गांधी और संजय गांधी ने चरण सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पूरा राजनीतिक लाभ उठाया।
संजय गांधी तभी से राज नारायण से सीधे संपर्क में थे जब मोरार जी देसाई और चरण सिंह में खटपट शुरू हो गयी थी।
 पर चरण सिंह भी एक हद से अधिक समझौते नहीं कर सकते थे।उनके भी कुछ उसूल थे जिससे वे कभी डिगते नहीं थे।
  मोरारजी देसाई के प्रधान मंत्रित्व काल में इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर मुकदमे हुए थे।
स्वाभाविक ही था कि कांग्रेस समर्थन के बदले में उन मुकदमों की वापसी की उम्मीद चरण सिंह की सरकार से करे।
  पर चरण सिंह इसके लिए तैयार नहीं थे।
फिर यह गठबंधन चलता कैसे  ?नहीं चला।
पर इसी बीच इंदिरा गांधी का एक बड़ा राजनीतिक  उद्देश्य पूरा हो चुका था।उन्होंने जनता नेताओं की पदलोलुपता और फूट को जनता के सामने प्रदर्शित कर दिया।
 1977 में लोगों में जनता पार्टी के नेताओं के लिए जैसी इज्जत की भवाना थी,वह कम हो गयी।इससे कांगे्रस की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ हो गया।
  पर चरण सिंह अपनी सरकार के चले जाने का कारण इन शब्दों में बताया था।अपदस्थ चरण सिंह ने तब बताया था कि ‘मुझे इंदिरा गांधी के बारे में गलतफहमी कभी नहीं थी।
पर,हमने सोचा कि एक महत्वपूर्ण सवाल पर जिससे राष्ट्रीय एकता जुड़ी हुई थी,जब उन्होंने बिना शत्र्त समर्थन की पेशकश की तो हमने उसे स्वीकार किया।जब हम गरीबों, किसानों, पिछड़ों और उपेक्षित वर्गाें के लिए अपना कार्यक्रम बना ही रहे थे कि इंदिरा गांधी ने अपने नजदीकी लोगों से इस तरह के संदेश भेजना शुरू कर दिया कि जब तक संजय गांधी के खिलाफ जारी मुकदमे उठा नहीं लिए जाते वे 20 तारीख को  विश्वास मत पर सरकार का साथ नहीं दे सकतीं।’
 चरण सिंह ने यह भी कहा कि ‘ यह देश हमें कभी माफ नहीं करता यदि कुर्सी से चिपके रहने के लिए मुकदमे उठा लेते जो इमरजेंसी के अत्याचारों के लिए जिम्मेदार थे।मैं ब्लैकमेल की राजनीति स्वीकार कर एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकता।’
   हालांकि उन दिनों चरण सिंह की इस बात पर कुछ लोगों ने यह सवाल किया कि क्या चरण सिंह इतने भोले थे कि वे इंदिरा गांधी की मंशा नहीं समझ सके थे ?  संजय पर मुकदमे चलते रहने की स्थिति में भी इंदिरा गांधी चरण सिंह की सरकार को समर्थन देना कैसे जारी रख  सकती थीं ? क्या इंदिरा गांधी पर संजय के प्रभाव से चरण सिंह अवगत नहीं थे ?
  खैर दरअसल चरण सिंह प्रधान मंत्री बनने की जल्दीबाजी में थे।वे तो बन भी गए।
  पर इसके अतिरिक्त चरण सिंह में कई गुण भी थे।वह पढ़े -लिखे थे।कुछ पठनीय किताबें भी लिखी हैं।जीवन के प्रारंभिक काल में गाजियाबाद में वकालत करते थे। किसानों की समस्याओं को वे जितना समझते थे,उतना कम ही नेता समझते थे।
वे बार- बार कहा करते थे कि जब तक किसानों की आय नहीं बढ़ेगी, तब तक कारखानों में उत्पादित माल के खरीदार नहीं बढे़ंगे।खरीदार नहीं बढ़ेंगे तो कारखाने मुनाफे में कैसे रहेंगे  ? 
  चैधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को  यूनाइटेड प्रोविंस के नूर पुर गांव में, जो अब उत्तर प्रदेश है,  हुआ था।
वे सन 1937 में  विधान सभा के सदस्य चुने गए थे।
सन् 1967 में मुख्य मंत्री बनने से पहले राज्य के कैबिनेट मंत्री रह चुके थे।वे 1970 में भी मुख्य मंत्री बने थे।
 सन् 1977 में वे केंद्र सरकार में उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बने।वे आजादी की लड़ाई और आपातकाल में जेल में रहे।
उन्होंने हमेशा वही किया जो वे चाहते थे।
29 मई 1987 को उनका निधन हो गया।
@चरण सिंह के जन्म दिन पर फस्र्टपोस्टहिंदी पर 23 दिसंबर 2017 को प्रकाशित मेरा लेख@
  


  

 1.-राज्य सभा में अनुशासन हीनता के कारण 3 सितंबर, 1962 को समाजवादी सदस्य गौड मुरहरि सत्र की बाकी बैठकों के लिए निलंबित कर दिए गए।
इसके बावजूद जब वे सदन से बाहर जाने को तैयार नहीं हुए तो उन्हें मार्शल के जरिए बाहर कर दिया गया।
2.- 25 जुलाई, 1966 को समाजवादी राज नारायण और मुरहरि ऐसे ही कारणों से एक सप्ताह के लिए निलंबित किए गए और सदन से जबरन  निकाल बाहर कर दिए गए।
3.- 12 अगस्त, 1971 को भी राज नारायण बाकी बैठकों के लिए राज्य सभा से निलंबित हुए और मार्शल आउट कर दिए गए।
4.- 15 मार्च, 1989 को 63 सदस्य राज्य सभा से एक सप्ताह के लिए निलंबित किए गए।
5.- 23 दिसंबर 2005 को डा.छत्रपाल सिंह लोधा राज्य सभा से निष्कासित किए गए।
    पर चूंकि 2005 के बाद अनुशासनहीनता के बावजूद ऐसी कार्रवाइयां बंद हो गयीं इसलिए राज्य सभा में हंगामा बढता़ गया और सभापति के लिए निरंतर बेचारगी की स्थिति पैदा होती गयी।राज्य सभा की कवर्यवाही  का दृश्य टी.वी. पर देख- देख कर देश के विवेकशील लोग कुढ़ते रहते हैं।
अब तो स्थिति यह हो गयी है कि जिसे देश ने ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया है,उसे भी  राज्य सभा में जनोपयोगी बातें बोलने का मौका नहीं मिल रहा है। निराश होकर वह अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है।
पर वैसे सांसद गण बोलने का खूब अवसर पा रहे हैं जो सांसदों के वेतन बढ़ाने की मांग करते हैं और जन प्रतिनिधियों के खिलाफ त्वरित अदालतों के गठन के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध करते हैं।
कहां जा रही है यह देश, राज्य सभा और संसदीय व्यवस्था ?
इस हड़भोंग को आखिर  कौन ठीक करेगा ?
यदि इसे आज के लोकतंात्रिक नेतागण ठीक नहीं करंेगे तो कोई और आकर ठीक कर देगा।फिर पछताने से कुछ नहीं होगा।
  मौजूदा राज्य सभा सभापति वेंकैया नायडु इसे ठीक करना चाहते हैं।पर राज्य सभा में सत्ताधारी जमात का अभी  बहुमत नहीं है।
अगले साल बहुमत होने की उम्मीद है।
 नायडु साहब, उसके बाद आप बेरहमी से इस हड़भोंग को बंद कराइए । जिन लोगों ने लोकतंत्र के नाम पर राज्य सभा को चंडूखाना बना रखा है,उनसे राज्य सभा की गरिमा की रक्षा कीजिए और लोकतंत्र की भी।उससे देश के अधिकतर लोग आपको धन्यवाद देंगे।@ 23 दिसंबर 2017 @
साठ के दशक मंे जब राज नारायण और गौड़ मुरहरि मार्शल आउट किए जा रहे थे, तब लोकतंत्र समाप्त नहीं हुआ था।आगे भी ऐसा करिएगा तोभी लोकतंत्र समाप्त नहीं होगा। बल्कि लोकतंत्र जनता के लिए अधिक उपयोगी बनेगा। 


शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

गलत मुकदमे की जल्दी सुनवाई से खुश होते हैं आरोपित


यदि किसी के खिलाफ निराधार  मुकदमे कायम  कर दिए जाएं तो वह खुद ही चाहता है कि उस मुकदमे की सुनवाई शीघ्र हो जाए ।ऐसे में उसे अदालत से राहत की उम्मीद होती है।साथ ही वह नाहक बदनामी से बचता है।
पर अगर बात इसके उलट हो तो आरोपित चाहते हैं कि मुकदमा लंबा खिंचे। इस बीच गवाह दिवंगत हो जाएं।सबूत कमजोर कर दिए जाएं।जांच अधिकारी  को अन्य तरह से प्रभावित कर लिया जाए।
कुछ सांसदों और विधायकों के खिलाफ जारी मुकदमों के मामले में भी यही हो रहा है।
हालांकि कुछ अन्य सांसद-विधायक चाहते हैं कि उनके खिलाफ चल रहे मुकदमे की सुनवाई जल्द पूरी हो जाए
ताकि दाग शीघ्र मिट सके।
  पर हाल में  कांग्रेस और सपा के सदस्यों ने राज्य सभा में सवाल उठाया कि सांसदों-विधायकों के खिलाफ चल रहे मुकदमों की त्वरित सुनवाई के लिए  12 विशेष अदालतें गठित क्यों की जा रही है ?
 सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2009 में छह विशेष अदालतांे  के गठन का आदेश दिया था ताकि गुजरात दंगों के आरोपितों के खिलाफ मुकदमों की सुनवाई शीघ्र हो सके।
  तब विशेष अदालतें बनी भी।अन्य लोगों के साथ- साथ उस विशेष अदालत से  माया कोडनानी को भी सजा हुई।कोडनानी गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार की राज्य मंत्री थीं जब गुजरात में दंगा हुआ था।उन पर दंगा कराने का आरोप था।
तब कांग्रेस या किसी अन्य दल ने  यह नहीं कहा कि विशेष अदालतों का गठन सिर्फ दंगा के मामलों के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि देश के सभी मुकदमों के लिए होना चाहिए।
  पर   पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलोंं की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बने तो कांग्रेस और सपा विरोध में उठ खड़ी हुई।
सपा के नरेश अग्रवाल ने गत मंगलवार को राज्य सभा में कहा कि ‘अदालत संविधान नहीं बदल सकती ।’
अग्रवाल से सवाल है कि  गुजरात दंगों के लिए विशेष अदालतों के गठन के लिए संविधान बदला गया था ?
 राज्य सभा में कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजादी ने कहा कि अदालतों का गठन सिर्फ सांसदों-विधायकों के लिए ही नहीं बल्कि 
सभी नागरिकों के लिए होना चाहिए।
गुलाम नबी केंद्र में ंमंत्री रह चुके हैं।वे जानते हैं कि सरकार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह सभी 3 करोड़ मुकदमों के लिए विशेष अदालतें बना पाएगी।यानी उनका तर्क है कि 
 सबके लिए विशेष अदालतें बनने   तक सांसदांे-विधायकों के लिए अदालतों के गठन का काम रुका रहे।जानकार लोग समझते हैं कि ऐसे तर्क क्यों दिए जाते हैं।  
--सांसदों-विधायकों के मामलों की 
सुनवाई में देरी जानबूझ कर --
सुप्रीम कोर्ट ने गत 1 नवंबर को केंद्र सरकार से कहा कि वह सांसदों-विधायकों पर चल रहे मुकदमों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय गठित करे।
इस संबंध में अगले छह सप्ताह में केंद्र सरकार हमारे यहां प्रस्ताव पेश करे।
 केंद्र सरकार ने 12 विशेष अदालतों का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में पेश भी कर दिया।अब उस पर काम शुरू होने वाला है।
  इस प्रस्ताव पर मिली जुली -प्रतिक्रिया देखी जा रही है।
जिन जन प्रतिनिधियों पर निराधार या मामूली आरोपों के तहत वर्षों से मुकदमे चल रहे हैं, वे विशेष अदालत की खबर से खुश हैं।
उन्हें इस झंझट या बदनामी से शीघ्र मुक्ति की उम्मीद जो है।
पर जिन जन प्रतिनिधियों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और उन्हें सजा होने और उनके राजनीतिक जीवन समाप्त होने का खतरा है,वे मुकदमे को अनंत काल तक लटकाए रखना चाहते हैं।
याद रहे कि देश के 1581 सासंदों और विधायकों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमे चल रहे हैं।इन में से कई मुकदमे तो दशकों से चल रहे हैं।
  राजनीति में घुसे अपराधियों के खिलाफ मुकदमे भी चलते हैं और वे अपराधी अगला अपराध भी करते जाते हैं।यदि आपराधिक छवि का व्यक्ति जन प्रतिनिधि हो तो वह अपने इलाकों में अन्य अनेक अपराधियों का संरक्षणदाता भी बन जाता है।
इससे न सिर्फ एक बड़े इलाके की कानून -व्यवस्था खराब होती है बल्कि रंगदारी वसूली के कारण विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं।
इसीलिए सामान्य अपराधियेां और वैसे आरोपितों में फर्क है जो जन प्रतिनिधि भी बन गए हैं।
पर इस फर्क को समझने के लिए कुछ कांग्रेस व सपा नेता तैयार ही नहीं है।
हालांकि सब समझते हैं कि वे ऐसा क्यों करते हैं।
  मुफस्सिल पत्रकारों की सुरक्षा----
आए दिन मुफस्सिल पत्रकारों को धमकी दिए जाने और उन पर हमले की खबरें आती रहती हैं।  
कभी -कभी उनकी हत्या भी हो जाती है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बिहार में सरजमीनी पत्रकारिता करने वाले ऐसे संवाददाताओं की सुरक्षा को लेकर चिंता करने का समय आ गया है।बिहार सरकार ने हाल में राज्य सभा के पूर्व सदस्यों के लिए सुरक्षा की व्यवस्था करने का निर्णय किया है।
 संवाददाताओं के काम का महत्व देखते हुए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए। कम से कम जो पत्रकार अपनी जान पर खतरा महसूस करें, उनको निशुल्क सुरक्षाकर्मी मुहैया कराने के बारे में राज्य सरकार को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।
 ----- राजनीति में आदर्श उदाहरण--
जदयू से अपने वैचारिक मतभेद के कारण एम.पी. वीरेंद्र कुमार ने पार्टी छोड़ दी और हाल में राज्य सभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया।
वीरेंद्र कुमार केरल से राज्य सभा में जदयू के सदस्य थे।
उनका कार्यकाल 2022 तक का था।इसके बावजूद ऐन केन प्रकारेण सदस्य बने रहने के लिए उन्होंने कोई बहाना नहीं ढूंढ़ा।
बल्कि  उन्होंने मशहूर समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव की राह चुनी।
 आदर्शवादी आचार्य ने जब 1947 में कांग्रेस छोड़ने का निर्णय किया तो उन्होंने अपने करीब एक दर्जन साथियांे के साथ उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था।
 याद रहे कि आजादी के बाद कांग्रेस ने कह दिया था कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के लोग दोनों दलों में एक साथ नहीं रह सकते।वे कोई एक पार्टी चुन लें।आजादी की लड़ाई के दिनों कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता व कवर्यकत्र्ता कांग्रेस के भीतर ही रह कर आजादी की लड़ाई में  सक्रिय थे।आचार्य जी के साथ साथ जेपी और लोहिया भी कांसोपा में ही थे। 
   आचार्य जी को कुछ नेताओं ने कहा था कि उप चुनाव में आप लोग हार जाएंगे।क्योंकि कांग्रेस की हवा है।
 आचार्य जी ने कहा कि भले हम हार जाएं,पर अब मैं उस दल में नहीं हूं जिस दल ने मुझे विधायक बनाया था।इसलिए सदन से इस्तीफा दूंगा।
वहीं हुआ ।उप चुनाव में इस्तीफा दे चुके 12 उम्मीदवारों में से सिर्फ एक व्यक्ति जीते ।पर आचार्य जी को इसका कोई अफसोस नहीं था।  
       ------और अंत में---
छात्र जीवन में  एक दफादार से मेरा परिचय कराया गया था।
साढ़े छह फुट लंबा ,रोबीला और कड़ी मूंछों  वाला दफादार था वह ।जब ‘दफादार साहब’ चले गए तो परिचय कराने वाले
ने बताया कि अंग्रेजों के जमाने में यह एक  डाकू था।
पर यह आदमी अपना पुराना धंधा छोड़ना चाहता था।पुलिस महकमे को  पता चला तो इसे दफादार बना दिया गया।जब से दफादार बना है, इलाके में शांति हैं।क्योंकि छोटे चोर और डाकू सब इससे डरते हैं।
  आज बिहार के गांवों में अपराध की जो स्थिति है,उसमें पुराने रोबिले चैकीदार -दफादार याद आते हैं।
वह व्यवस्था अब लगभग टूट चुकी है।
साथ ही अपराधियों और दबंग लोगों पर सामाजिक दबाव कम हो गया है।
 उधर आपराधिक छवि के राजनीतिककर्मियों ने स्थानीय बदमाशों को संरक्षण दे रखा है।
 इस स्थिति से निपटने के लिए अंग्रेजों के जमाने के कुछ फार्मूलों  को आजमाया जा सकता है।
@ 22 दिसंबर 2017 के प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे  कानोंकान काॅलम से@