सोमवार, 15 जनवरी 2018


  राजीव गांधी हत्याकांड जैसे अत्यंत संवेदनशील मामले की भी सुप्रीम कोर्ट में अपेक्षाकृत जूनियर जजों की बंेच ने सुनवाई की थी।
  टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार पिछले 20  वर्षों में  15 ऐसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए बेंच गठित करने में सुप्रीम कोर्ट ने जजों की वरीयता का ध्यान नहीं रखा था।
यानी इन अति  संवेदनशील मामलों को सुनवाई के लिए वरिष्ठत्तम जजों को नहीं सौंपा गया था।
पर तब कांग्रेस या किसी जज ने  सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशों के निर्णय पर कोई सवाल नहीं उठाया था।
 पर जब गत शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठत्तम जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके मौजूदा मुख्य न्यायाधीश पर यह आरोप लगाया कि केस के बंटवारे में वरीयता का ध्यान नहीं रखा जा रहा है तो लपक कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कह दिया कि ‘जजों ने जो मामला उठाया हैै,वह अत्यंत गंभीर है और उसकी जांच होनी चाहिए।’
 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार  ऐसे दोहरा मापदंड से ही कांग्रेस की चुनावी दुर्दशा होती जा रही है।दोहरा मापदंड के उदाहरण और भी हैें।
  राहुल गांधी ने जस्टिस बृज गोपाल लोया की मौत का मामला उठाते हुए भी शुक्रवार को कहा था कि उसकी जांच सुप्रीम कोर्ट में उच्च स्तर पर होनी चाहिए।
  याद रहे कि राहुल गांधी ने यह मामला इसलिए उठाया क्योंकि जस्टिस लोया एक कथित माफिया शोहराबुद्दीन शेख की मुंठभेड़ में मौत के मामले की जांच कर रहे थे।हालांकि लोया के पुत्र अनुज लोया ने कहा है कि उसके पिता की मौत के पीछे कोई रहस्य नहीं है। हार्ट अटैक से 2014 में उनका निधन हुआ था।
  याद रहे कि नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्रित्वकाल में पुलिस के साथ विवादास्पद मुंठभेड़ में शोहराबुददीन मारा गया था।
आरोप लगाया गया कि मुंठभेड़ नकली थी। उस संबंध में केस चल रहा है।
 शोहराबुददीन जैसे मामले में भी कांग्रेस का दोहरा रवैया रहा है।शोहराबुददीन जिस माफिया लतीफ का पहले डाइवर था,उस लतीफ की भी 1997 में पुलिस मुंठभेड़ में ही हत्या हुई थी।आरोप है कि लतीफ गुजरात में वही धंधा करता था जो धंधा मुम्बई में दाउद इब्राहिम करता था।
  पर गुजरात में 1997 में कांग्रेस समर्थित सरकार थी जिसके मुख्य मंत्री शंकर सिंह बघेला की पार्टी राजपा के एक नेता थे।
उस सरकार ने लतीफ को मारने वाले पुलिस अफसरों को तब सार्वजनिक रूप से सम्मानित भी किया था।
  पर शोहराबुददीन हत्याकांड में कई आई.पी.एस.अफसर भी जेल गए।
गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह भी कुछ समय के लिए जेल में थे। पर अदालत ने बाद में अमित शाह के खिलाफ लगे आरोपों को रद कर दिया था।याद रहे कि लतीफ की मौत के बाद शोहराबुददीन उसका उत्तराधिकारी बन गया था।
संभव है कि लतीफ की तरह शोहराबुददीन की मौत भी नकली मुंठभेड़ में ही हुई हो।
पर इस देश में ऐसे सैकड़ों मुंठभेड़ें हर साल होती रहती हैं।
इन दिनों भी उत्तर प्रदेश में पुलिस के साथ धुंआधार  मुंठभेड़ें हो रही हैं।पर ,उनकी जांच -पड़ताल करने या उन पर शंका उठाने से किसी को कोई वोट नहीं मिलने वाला है।
पर  लोया-शोहराबुददीन प्रकरण में कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट बैंक की फसल नजर आ रही  है।पर अंततः ऐसे मुददे कांग्रेस के लिए महंगे ही साबित होते रहे हैं। 
 पहले भी वर्षों तक कांग्रेस शोहराबुददीन मामले का इसी उद्देश्य से इस्तेमाल करने की कोशिश करती रही।पर हर बार उसका लाभ उल्टे भाजपा को मिला। कांग्रेसी दांव उल्टा पड़ा।
पर कांग्रेस ने उससे शिक्षा  नहीं ली।गुजरात विधान सभा के गत चुनाव में भाजपा ने खुद को कमजोर स्थिति में पाकर मतदाताओं से अपील की थी कि आपको ‘भाजपा राज चाहिए या लतीफ राज ?’
भाजपा ने मतदाताओं को ‘लतीफ राज’ की याद दिलायी जो कांग्रेस शासन काल का दुःस्वप्न माना जाता रहा है।
  कहा जाता है कि इस नारे ने कांग्रेस के चुनावी बढ़ाव को रोक दिया था।क्योंकि गुजरात और उसके आसपास के कुछ राज्यों के अनेक लोग लतीफ और शोहराबुददीन के नाम सुन कर आज भी कांप उठते हैें।
क्या कांग्रेस के पास अपनी चुनावी ताकत बढ़ाने के लिए लोया-शोहराबुददीन प्रकरण की जगह 
 कुछ अच्छे मुददे और बेहतर नारे नहीं हैं ?      

आतंक से निपटने का इजरायी तरीका भारत को सीखना ही चाहिए




         
यदि इजरायल ने 234 अरब छापामारों को रिहा कर दिया  होता तो सन् 1972 में 11 इजराइली ओलम्पिक खिलाडि़यों की जान बच जाती।
पर, व्यापक देशहित में इजरायल ने उन आतंकवादियों के सामने झुकना मंजूर नहीं किया जिन्होंने   म्यूनिख ओलम्पिक के दौरान 11 इजराइली खिलाडि़यों को बंधक बना रखा था।
 छापामारों को रिहा करने से इनकार कर देने पर 11 खिलाडि़यों को अरब आतंकवादियों ने मार डाला।उस दौरान  जर्मन पुलिस की कर्रवाई में चार छापामार 
भी मारे गये।तीन पकड़े गये।पर एक भागने में सफल हो गया।
  हां, बाद के वर्षों में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उन सारे षड्यंत्रकारी हमलावरों को खोज -खोज कर एक- एक कर मार डाला जो 11 इजराइली खिलाडि़यों की हत्या में शामिल  थे और तत्काल पकड़े जाने के बाद भी बाद में छोड़ दिए गए थे।
वे इजरायल के डर से कई देशों में जा छिपे थे।
मोसाद ने करीब 20 वर्षों में यह टास्क पूरा किया था।हत्यारों को मोसाद ने बारी-बारी से इटली, फ्रांस, ब्रिटेन ,लेबनान,एथेंस और साइप्रस में अपने नाटकीय आपरेशन के जरिए मारा।
बदले का इजरायल का वह बहादुराना कदम भारत जैसे आतंकपीडि़त देश  के लिए एक खास सबक बन सकता है। 
इस घटना के बाद अरब-इजरायल  तनाव और भी बढ़ गया था ।पर इजरायल की जनता ने भी उसकी परवाह नहीं की। आतंकवादियों से निपटने को  लेकर वहां की जनता में  दो तरह की राय नहीं हुआ करती।
  
 5 सितंबर, 1972 की बात है।म्यूनिख में 20 वां ओलम्पिक खेल मेला लगा हुआ था।ब्रिटेन के प्रधान मंत्री एडवर्ड हीथ सहित दुनिया के कई दे’ाों की महत्वपूर्ण हस्तियां वहां उपस्थित थीं।किसी ने सोचा भी नहीं था कि वहां कोई खूनी खेल भी हो जाएगा।
पर , ऐसा ही हुआ।अरब छापामारों ने अपने साथियों की रिहाई के लिए वहीं ताकत का इस्तेमाल ’ाुरू कर दिया। अरब छापामार दस्ता दीवाल फांद कर ओलम्पिक गांव में प्रवे’ा कर गया।उन्होंने मोरचाबंदी करके इजरायली क्वार्टर पर कब्जा कर लिया।यह पुरूष खिलाडि़यों का ठिकाना था।
  दो इजरायली खिलाडि़यों को तो उन लोगों ने मौके पर मार दिया।
कु’ती प्र’िाक्षक मुनिया ग्रिनबर्ग की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई थी।मुक्केबाज प्र’िाक्षक मो’ाा बिनबर्ग की मृत्यु दो घंटे बाद हुई।
गोलियां चलने के बाद एक इजरायली  खिलाड़ी खिड़की से भागने में सफल हो गया था।
  भारोत्तोलक प्र’िाक्षक तुबिया सोकोल्वस्की ने बाद में बताया कि जब अरब छापामार उनके क्वार्टर में दाखिल हुए तो उनका दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था।उस खुले दरवाजे से उन्होंने गोलियां चलाईं।मैं इधर अपने कुछ कपड़े लेकर खिड़की से भाग खड़ा हुआ।पड़ोस में तब तक छिपा रहा जब तक प’िचम जर्मनी की पुलिस ने स्थिति को संभाल नहीं लिया। मैंने लोगों की चीख पुकार सुनी थी।
सोेकाल्वस्की के अनुसार नकाबपो’ा छापामारों की संख्या नौ या दस थी।छापामारों ने नौ इजरायली  खिलाडि़यों को बंधक बना लिया।वे 234 अरब छापामारों की इजरायल  से रिहाई की मांग करने लगे।वे चाहते थे कि इन 234 लोगों को सुरक्षित मिस्र पहुंचा दिया जाए।  
 स्वाभाविक ही था कि हमले की खबर से पूरा ओलम्पिक गांव  सनसनी और तनाव से भर उठा।इजरायल ने अपने वि’ेाष दस्ते म्यूनिख भेजने का आॅफर किया।पर जर्मन सरकार ने उसे अस्वीकार कर दिया। 
इस घटना की खबर सुनकर  प’िचम जर्मनी के प्रधान मंत्री बिली ब्रांट खुद बाॅन से म्यूनिख पहुंच गये।
  उन्होंने छापामारों के सामने प्रस्ताव रखे कि   जितना चाहें आप पैसे ले लें ,पर इजरायली  खिलाडि़यों को छोड़ दें।या फिर इजरायलियों की जगह जर्मनों को बंधक रख लें।
लेकिन छापामारों ने शत्र्तें नामंजूर कर दीं।उन्होंने कहा कि जब तक 234 छापामारों को रिहा नहीं किया जाएगा,तब तक इन्हें छोड़ने का प्र’न ही नहीं उठता। जर्मन अधिकारी उनसे आग्रह करते रहे ,पर वे अपनी जिद पर अड़े रहे।इस बीच उन लोगों ने एक और धमकी दे दी।उन्होंने कहा कि यदि एक खास समय सीमा के अंदर  उनकी मांग नहीं मानी जाएगी तो वे हर दो घंटे पर एक  इजरायली  बंधक को मारते जाएंगे।इस बीच अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष एवेरी ब्रूंडेज ने ओलम्पिक खेलों को 24 घंटे के लिए स्थगित कर दिया।दूसरी ओर मिस्र के अधिकारियों ने इस घटना पर क्षोभ प्रकट किया और अपने खिलाडि़यों को वापस बुला लिया।इजरायली  प्रधान मंत्री गोल्डा मीर ने कहा कि यह घटना अमानवीय है और इस तरह के माहौल में खेलों को जारी रखना उचित नहीं होगा।अमेरिका के यहूदी खिलाड़ी स्पिट्ज को भी वापस भेज दिया गया।स्पिट्ज ने म्यूनिख मेंें पहले के खेलों में एक साथ सात स्वर्ण पदक जीत लिये थे।
  अरब छापामारों ने यह मांग करनी शुरू कर दी कि उन्हें बंधकों समेत किसी अरब दे’ा में सुरक्षित भेज दिया जाए अन्यथा वे किसी भी  इजरायली  खिलाड़ी को जिंदा नहीं छोड़ेंगे।।याद रहे कि इजरायल  234 अरब छापामारों को छोड़ने को किसी कीमत पर कत्तई तैयार नहीं था।अंततः वे सब ओलम्पिक खेल गांव की हवाई पटटी तक बस से लाये गये।तब तक जर्मन पुलिस उस हवाई पट्टी पर हेलिकाॅप्टर द्वारा पहुंचाई जा चुकी थी।पुलिस घात लगा कर बैठी हुई थी।जर्मन पुलिस ने कार्रवाई शुरू की ।अरब छापामारों ने खुद को घिरा हुआ देख कर सभी इजरायली  बंधकों को  मार डाला।बंधक इजरायली खिलाडि़यों की संख्या नौ थी।चार छापामार भी मारे गये।एक जर्मन पुलिस अफसर  की भी जान चली गई।पर,तीन छापामार पकड़ लिये गये।एक छापामार नजर बचा कर कहीं छिप गया।इजरायल  ने अपने बहुमूल्य खिलाडि़़यों की जान की परवाह नहीं की।वह अरब छापामारों के दबाव में नहीं आया।इजरायल को यह अफसोस जरूर रहा कि प’िचम जर्मन सरकार ने उसके वि’ोष पुलिस दस्ते को म्यूनिख नहीं पहुंचने दिया।उधर अरब छापामारों के प्रवक्ता ने काहिरा में यह कहा कि इजरायल  को मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए यह कार्रवाई की गई।
@ 15 जनवरी 2018 को  ‘फस्र्टपोस्ट हिन्दी’ पर 
मेरा यह लेख प्रकाशित@
    


रविवार, 14 जनवरी 2018

  मैंने आज वीर कुंवर सिंह की चर्चा इसलिए की क्योंकि 
कल मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने जगदीश पुर में ऐसी ही बात कही थी।उन्होंने कहा कि वीर कुंवर सिंह के  योगदान को उतना महत्व नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था।
मेरा कहना है कि जिसने अंग्रेजों को एक दो नहीं बल्कि छह-छह  युद्धों में हराया,उसे तो राष्ट्रीय स्तर पर महत्व मिलना चाहिए था।मैं इस देश के किसी अन्य योद्धा को नहीं जानता जिसने छह युद्धों में अंग्रेजों को हराया हो।
इसके पीछे यह बात भी छिपी है कि हमारे पास काबिल योद्धा तो थे, पर उनमें एकता नहीं थी,इसलिए भी  हम गुलाम बने।
वीर कुंवर सिंह के अनोखे युद्ध कौशल पर जनरल एस.के. सिंहा ने भी किताब लिखी है।
  अस्सी के दशक में चैधरी चरण चरण सिंह ने एक ब्रिटिश इतिहासकार की पुस्तक का हिंदी में अनुवाद करवा कर बंटवाया था।
उसमें उस इतिहासकार ने लिखा था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने 
भारत में भारतीयों के बीच के फूट और अलगाव का लाभ उठा कर ही सत्ता स्थापित की न कि अपनी वीरता के कारण।पंडित सुंदर लाल की किताब में भी इसकी चर्चा है।

 ं 
  

 बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह ने सर गणेश दत्त 
सिंह के बारे में जो कुछ लिखा है, उसे मैं यहां हू ब हू प्रस्तुत कर रहा हूं --
 ‘ सन 1944 की बात है।सर गणेश दत्त सिंह की प्रशंसा में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था, किंतु उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला था।
एक दिन राम दयालु बाबू उनसे मिलाने के लिए मुझे पटना विश्वविद्यालय परिसर में कृष्ण कुंज में ले गए।
उसे उन्होंने अपने लिए बनवाया था।
बाद में उनकी इच्छानुसार वह मकान पटना विश्व विद्यालय को दे दिया गया।
उस समय सर गणेश दत्त सिंह व्हील चेयर पर चलते थे।
उनको देखते ही तत्काल मैं स्वाभाविक रूप से प्रभावित हो गया।
 उन्होंने मेरा परिचय पाकर मुझे भरपूर आशीर्वाद दिया।
उनके चेहरे पर विचित्र चमक थी।
शालीनता थी।
और साथ ही स्पष्टतः निर्भयता झलकती थी।
उनका निजी जीवन निस्पृह था।उनमें सिद्धांत के प्रति विशेष प्रतिबद्धता थी।मंत्री की हैसियत से जो तनख्वाह उन्हें मिलती थी,उनमें से अपने खर्च के लिए एक अल्पांश रख कर सब कुछ शिक्षा के प्रसार के लिए वे दान कर दिया करते थे।
  सर गणेश दत्त लोन स्काॅलरशिप से वित्तीय सहायता पाकर बड़ी संख्या में विद्यार्थी डाक्टर बन कर लाभान्वित हुए।मैं भी कुछ वर्षों तक संबंधित कमेटी का सदस्य था।
इसके माध्यम से विदेश में शिक्षा प्राप्त करने के लिए लोन स्काॅलरशिप दी जाती थी।
शत्र्त यह थी कि स्वदेश आने पर अपनी कमाई से किस्तों में लौटा देना होगा।
  सर गणेश दत्त सिंह निजी जीवन में त्यागी और तपस्वी थे।
आज अफसोस होता है कि उनके नाम से पटना विश्व विद्यालय में 
कोई चेयर की स्थापना अभी तक नहीं की गयी है।
इसके लिए हम सब दोषी हैं। आज ज्यादा आश्चर्य तो इससे होता है कि शिक्षा के क्षेत्र में जिनका योगदान नहीं था,उनके नाम पर कई विश्व विद्यालयांे का नामकरण कर दिया गया।’  
@ करीब एक दशक पूर्व प्रकाशित सत्येंद्र बाबू की आत्म कथा  ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ से साभार @ 
@ 13 जनवरी 2018@

शनिवार, 13 जनवरी 2018

प्रख्यात हिंदी साहित्यकार दूध नाथ सिंह का 
हाल में निधन हो गया।
वह प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे।
 इस पर मुझे अस्सी के दशक का एक प्रकरण याद आया।
 उन दिनों पटना के एक बड़े पत्रकार प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे  थे।मुम्बई में इलाज करा रहे थे। पर, निराश हो गए थे।
इस बीच उन्हें पटना के ही एक उतने ही बड़े पत्रकार ने  सलाह दी, ‘ आप स्वमूत्र  चिकित्सा अपनाइए।ठीक हो जाइएगा।’
उन्होंने यह भी कहा था कि लीवर कैंसर को छोड़कर किसी भी अंग के कैंसर के लिए स्वमूत्र चिकित्सा रामवाण है।
  सलाह देने वाले बुजुर्ग पत्रकार ने उन्हीं दिनों बिहार विधान सभा के प्रेस रूम में एक दिन मुझे बताया था कि ‘मेरी सलाह पर उन्होंने स्वमूत्र चिकित्सा को अपनाया और वे अब स्वस्थ हैं।’
 याद रहे कि स्वमूत्र चिकित्सा के सबसे बड़े प्रशंसक व लाभुक मोरारजी देसाई थे।वह खुद स्वमूत्र पान करते थे।वे इसे छिपाते भी नहीं थे।उनकी लंबी उम्र का यही राज बताया गया था।
पर आम भारतीयों में इसके प्रति अभी आम स्वीकृति नहीं है। हालांकि जापान  में बड़ी सख्या में लोगों ने  इसे अपनाया है।
यह बात खुद मोरारजी भाई ने एक अखबार को बताई थी।
पर कुछ लोग इसे अवैज्ञानिक चिकित्सा बताते हैं।
वैसे  इस विषय पर उपलब्ध सबसे अच्छी किताब ‘वाटर आॅफ लाइफ’ के लेखक आर्मस्ट्रांग ने इस चिकित्सा विधि के पक्ष में तर्क दिए हैं। 
   

इस देश के अधिकतर न्यूज चैनलों के एंकर अपने श्रोताओं -दर्शकों के साथ भारी अन्याय करते हैं।
 जरूरत पड़ने पर भी वे बकबादी और ‘मुंहजोड’़ अतिथियों की माइक डाउन नहीं करते।नतीजा यह होता है कि कई अतिथि अपनी बारी से पहले अविराम बोलते रहते हैं।एक साथ कई अतिथि बोलते हैं।कई बार इन्हें अतिथि कहना भी इस शब्द कव अपमान लगता है।हालांकि सब अतिथि एक जैसे नहीं होते।
कुछ तो एंकर के बुलावे के बिना एक शब्द नहीं बोलते।
कई बार तो भारी शोरगुल के बीच किसी दर्शक को कुछ समझ में नहीं आता कि कौन क्या बोल रहा है।श्रोताओं का समय खराब होता है।वह चैनल बदल देता है।जब वह किसी दूसरे चैनल पर जाता है, तो देखता है कि वहां भी उसी तरह का ‘बतकुचन’ हो रहा है।
 आखिर वह क्या करे ?
किसी और काम में लग जाता है।
 गुस्सा एंकर पर आता है।
वे ऐसे बकबादी अतिथियों को क्यों झेलते हैं ?
देश के सामने शालीनता से अपनी बातें रखने वाले और बारी से पहले नहीं बोलने वाले समझदार लोगों की इस देश में इतनी कमी हो गयी है क्या ?
  
   

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

आरक्षण पर हलचल मचाने वाली रपट की केंद्र को है प्रतीक्षा----



केंद्र सरकार ने मंडल आरक्षण कोटे के भीतर  कोटे के लिए एक आयोग का गठन गत साल  किया। संविधान के अनुच्छेद -340 के तहत इस आयोग का गठन हुआ है।
कोटे में कोटा यानी 27 प्रतिशत मंडल आरक्षण का दो या तीन हिस्सो में  विभाजन।
आयोग की अध्यक्ष दिल्ली हाई कोर्ट की रिटायर जज जी.रोहिणी हैं। इस आयोग को  तीन महीने में अपनी रपट देनी है।
वह अवधि पूरी होने ही वाली  है।रपट किसी भी समय आ सकती है।
  राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस संबंध में पहले ही सिफारिश कर रखी है।आयोग के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बांट दिया जाना चाहिए।
 उससे पिछड़े वर्ग की सभी जातियों को आरक्षण का लाभ समरूप ढंग से मिल सकेगा।
 अभी पिछड़ा वर्ग की कुछ खास मजबूत जातियां ही आरक्षण का अधिक लाभ उठा लेती हैं।अत्यंत पिछड़ों को इसका समुचित लाभ नहीं मिलता।
  याद रहे कि  अति पिछड़ों के लिए बिहार तथा कुछ अन्य राज्यों में अलग से आरक्षण का कोटा निर्धारित है।
 उससे आरक्षण का लाभ नीचे तक मिल पाता है।
राज्यों का आरक्षण राज्य सरकारों की सेवाएं के लिए है।मंडल आरक्षण की सुविधा केंद्र सरकार की नौकरियों में मिलती है।
  मन मोहन सरकार के कार्यकाल में ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की संबंधित सिफारिश सरकार को मिल चुकी थी।पर उस सरकार ने 
उस सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
  नरेंद्र मोदी सरकार ने उस रपट की समीक्षा के लिए आयोग गठित कर दिया।जस्टिस रोहिणी आयोग कोटे में कोटा संबंधित सिफारिश की समीक्षा करेगा। 
  जानकार सूत्रों के अनुसार रोहिणी आयोग इस बात की जांच करेगा कि विभिन्न जातियों व समुदायों के बीच आरक्षण के लाभ का समान वितरण हो पा रहा है या नहीं।
आयोग ओ.बी.सी.में उप वर्गीकरण के लिए वैज्ञानिक तरीके से मानक, शत्र्त व तंत्र के बारे में विचार करेगा।
साथ ही जातियों व समुदायों को विभिन्न उप वर्गों में शामिल करने का भी काम करेगा।
  ऐसे कदम  राजनीति पर असर डालेंगे।
 पिछले चुनावों में यह देखा गया है कि मजबूत पिछड़ा समुदाय जहां आम तौर पर कांग्रेस गठबंधन या उसके सहयोगी दलों के साथ रहा है,वहीं अति पिछड़ों का झुकाव राजग की तरफ रहा।
 यदि सचमुच 27 प्रतिशत आरक्षण को दो या तीन हिस्सों में बांट देने का काम हो गया तो उससे राजनीतिक हलचल भी शुरू हो सकती है।मजबूत पिछड़ों के नेता इसका विरोध कर सकते हैं।
आरक्षण को लेकर कोई भी  विवाद राजनीतिक गर्मी पैदा करता है।
      बासी दही की खपत --
पिछले साल संक्रांति के दस दिन बाद मैंने एक रिटेलर से 
डिब्बा बंद दही खरीदा।
घर जाकर उस डिब्बे पर तारीख देखी।
तारीख 12 दिन पहले की थी।
अब बताइए, 12 दिन पहले का दही कैसा रहा होगा ?
फेंक देना पड़ा।
पर रिटेलर ने मेरी असावधानी का फायदा उठा लिया।
मुझे खरीदते समय ही तारीख देख लेनी चाहिए थी।
पर कई  उपभोक्ता तो और भी लापारवाह होते हैं।
दरअसल उपभोक्ताओं का ऐसा शोषण संक्रांति के समय अधिक होता है।
  कई रिटेलर थोक बिक्रेता के यहां से जरूरत से अधिक  बड़ी मात्रा में दही उठा लेते हंै।सब तो संक्रांति के अवसर पर बिक नहीं पाता।
बचा माल वे अगले कई दिनों तक खपाते रहते हंै।
थोक बिक्रेताओं को चाहिए कि वे जन स्वास्थ्य का ध्यान रखें और बचे हुए माल को रिटेलर के यहां से वापस मंगवा लंे।
      कैसे काबू में आए अपराध---
 उत्तर प्रदेश में पिछले 10 महीनों में पुलिस की  अपराधियों के साथ 921 मुठभेड़ें हो चुकी हैं।उनमें 33 अपराधी मारे गए हैं।
तीन पुलिकर्मी भी मरे और 210 घायल हुए।
इतने कम समय में इतनी संख्या में मुठभेड़ों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो गया है।
दरअसल ऐसे मामलों में लगभग पूरे देश में पुलिस के सामने 
मजबूरी रहती है।
  एक तरह के शासक कहते हैं कि पुलिस नरमी बरते।जब दूसरे शासक आतेे हैं तो वे कड़ाई बरतते हैंं।इस बीच अपराधी निडर हो जाते हैं।सिर्फ गिरफ्तारी से जब अपराध नहीं रुकता तो मुंठभेड़ों की नौबत आती है।मुंठभेड़ों के बाद कई बार मानवाधिकार आयोग  पुलिसकर्मियों की परेशानी बढ़ा देते हैं।
 इस देश के हुक्मरानों और नीतियां बनाने वालों को इस समस्या पर खास तौर पर विचार करना चाहिए।इस बात पर कि किस तरह अपराध भी कम हांे और ऐसा करते समय पुलिसकर्मियों को भी कोई परेशानी न हो। 
   एक भूली बिसरी याद---
सन् 1983 की बात है।यह कहानी पशु पालन घोटाले की ही है।
तब वाई.बी.प्रसाद बिहार सरकार के सहाय्य और पुनर्वास विभाग में संयुक्त सचिव थे।
पशुपालन विभाग का एक मामला परीक्षण के लिए उनके सामने आया था।
उस मामले में पशु पालन  विभाग के क्षेत्रीय अपर निदेशक डा.पी.लकड़ा निलम्बित हुए थे।
अपने एक संस्मरणात्मक लेख में वाई.बी.प्रसाद ने बाद में लिखा था कि ‘ पी. लकड़ा ने कहा कि पटना सचिवालय में तैनात कुछ कर्मचारी पशु पालन विभाग के 15 लाख रुपए के आबंटन आदेश लेकर खुद रांची आए।
उनके साथ पशु दवाओं के तीन सप्लायर भी थे।
ऊपरी आदेश के कारण विषय -वस्तु की छानबीन नहीं की जा सकी।
 उसी दिन बिल कोषागार को भेजा गया।
और संभवतः दूसरे ही दिन पूरी निकासी कर ली गयी।’
 अब पशु पालन घोटाले से संबंधित एक दूसरी कहानी पढि़ए जो नब्बे के दशक की है।  
17 दिसंबर, 1993 को बिहार सरकार के कोषागार निदेशक एस.एस.शर्मा ने अपने पत्र में लिखा कि पशु पालन विभाग के पैसों की निकासी पर रोक हटा ली जा रही है।
 याद रहे कि डोरंडा कोषागार के अधिकारी ने पशुपालन विभाग के बकाया बिलों का भुगतान रोक दिया था।
 उसे लगा था कि बजट प्रावधानोंं से काफी अधिक पैसों की निकासी हो रही है।
बिल भी पहली नजर में जाली लगे।
निकासी रुक जाने के बाद बिहार सरकार के  वित्त विभाग के संयुक्त सचिव एस.एन.माथुर ने  कोषागार पदाधिकारी को पत्र लिखा। पत्र में आदेश दिया गया कि निकासी पर से रोक हटा ली जाए।यह पत्र घोटालेबाजों के फायदे मेें रहा। 
 बेशुमार निकासी का एक नमूना यहां  पेश है।
वित्तीय वर्ष 1994-95 में पशुपालन विभाग का बजट मात्र 65 करोड़ 47 लाख रुपए का था।
पर उस कालावधि में मुख्यतः जाली बिलों के आधार पर राज्य के सरकारी कोषागारों से  237 करोड़ 85 लाख रुपए निकाल  लिए गए।
  इसी तरह के अन्य अनेक सनसनी खेज प्रकरणों से सी.बी.आई.और अदालतों का सामना हुआ था।
अब ऐसे में कोई अदालत कैसा निर्णय करती ? 
 लोकहित याचिका पर सी.बी.आई.की जांच का आदेश देते समय 1996 के मार्च में पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि ‘उच्चस्तरीय साजिश के बिना ऐसा घोटाला हो ही नहीं सकता था।’
        और अंत में ---
 जब लालू प्रसाद सत्ता में नहीं आए थे, तब भी 
 पशुपालन माफिया बिहार में  सक्रिय थे।हालांकि वे तब उतने अधिक ताकतवर नहीं थे जितने 1990 के बाद हुए।
  हालांकि 1990 से बहुत पहले की एक  पुरानी घटना भी कम चैकाने वाली नहीं थी।
एक बार के.बी.सक्सेना  पशुपालन विभाग के सचिव बना दिए गए थे।
कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस. अफसर सक्सेना ने पशुपालन माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी।नतीजतन तीन महीने के भीतर ही सक्सेना साहब उस पद से हटा दिए गए।
बाद में सक्सेना ने एक अन्य आई.ए.एस अफसर आभाष चटर्जी से कहा कि मैं जानता था कि वे लोग @यानी पशुपालन माफिया@ बहुत ताकतवर हैं।पर यह पता नहीं था कि पूरी सरकार उनकी जेब में है।
  अवकाश ग्रहण करने के बाद आभाष चटर्जी ने एक अखबार में लेख लिख कर यह रहस्योद्घाटन किया था।
@12 जनवरी, 2018 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे ‘कानोंकान’ काॅलम से @