शनिवार, 21 अप्रैल 2018

---सरकारी भूमि पर कब्जा करने वालों के नाम जग जाहिर करे सरकार ---


सवाल सिर्फ पटना के गोलक पुर का ही नहीं है।देश -प्रदेश के अनेक स्थानों में कानून को ठेंगा दिखा कर अनेक लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का निर्माण कर रखा है।
मुकदमे चलते हैं,सुनवाई होती है,पीढि़यां बीत जाती हैं।
इस बीच जमीन के अभाव में आम सरकारी विकास व कल्याण के अनेक काम जहां तहां रुके रहते हैं।
  सरकारों को चाहिए कि वे इस बीच अतिक्रमणकारियों के नाम -पता जग जाहिर करे।
लोगों को पता तो चले कि वे महानुभाव कौन हैं।उनमें से शायद कुछ लोगों को शर्म आए।उन्हें नहीं तो उनके वत्र्तमान व भावी रिश्तेदारों को शर्म आए।सभ्य समाज में उनकी ‘महिमा’ गाई  जाए!
उनके नाम मालूम हो जाएंगे तो अनेक लोग इस बात का भी अनुमान  लगा लेंगे कि उन्हें  मदद किन नेताओं से मिल रही है।
  यदि अतिक्रमणकारियों में कोई सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थान में कर्मचारी है तो उसका वेतन -प्रमोशन वगैरह रोका जा सकता है।कानून इजाजत दे तो पेंशन भी।यदि इस मामले में कानून की कमी है तो उसे बनाया जाना चाहिए।
 यदि पटना के गोलक पुर का ही मामला लें तो दशकों पूर्व उस तीन एकड़ जमीन का अधिग्रहण  पास के इंजीनियरिंग काॅलेज के विकास के लिए हुआ था।
पर स्थानीय प्रशासन की साठगांठ या अनदेखी से उस पर अतिक्रमण होता चला गया।
विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा का भला हो जिन्होंने अपनी जान  हथेली पर लेकर इस संबंध में कानूनी लड़ाई शुरू की।
पर पटना हाई कोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद प्रशासन लचर साबित हो रहा है।क्या प्रशासन विकास चंद्र से भी कमजोर है ? खैर, गोलक पुर का चाहे जो हश्र हो ,पर ऐसे अन्य अतिक्रमणकारियों के भी शुभ नाम तो अखबार पढ़कर लोग जान तो लें।
दशकों से यह मांग होती रही थी कि बैंकों से भारी कर्ज लेकर दबा लेने वालों के नाम सरकार उजागर करे।नहीं किया।नतीजतन इस बीच अनेक विजय माल्या और नीरव मोदी पैदा हो गए।  
साथ चुनाव से स्थानीय मुद्दे गौण नहीं---
क्या लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने से राज्यों से संबंधित स्थानीय मुद्दे गौण हो जाएंगेे ?
पिछला अनुभव तो यह नहीं बता रहा  है।
पर अनेक लोग इसी आधार पर इसका विरोध कर रहे हैं।
याद रहे कि 1967 में अंतिम बार लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे।उस चुनाव में  लोक सभा में तो कांग्रेस को बहुमत मिल गया था ,पर सात राज्यों में कांग्रेस हार गयी थी।दो अन्य राज्यों में दल बदल के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।
बिहार के लोगों में भी स्थानीय कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के कारण उसके खिलाफ भारी रोष था।
पर उतना ही रोष केंद्र की कांग्रेसी सरकार के खिलाफ नहीं था।
नतीजतन राज्य की कुल 53 लोक सभा सीटों में से 34 सीटें कांग्रेस को मिलीं।
यानी आधी से अधिक सीटेंे।
पर बिहार विधान सभा की आधी से अधिक सीटों पर कांग्रेस हार गयी थीं।दरअसल आज के कुछ नेता और दल यह चाहते हैं कि जितनी अधिक दफा चुनाव होंगे,तो उतना ही अधिक चंदा बटोरने का उन्हें अवसर मिलेगा।
उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि अधिक चुनाव यानी सरकार का अधिक खर्च।
अधिक चुनाव के कारण विकास भी रुकते हैं।
संभवतः अपने देश में जिस तरह के कुछ नेता हैं,वैसे शायद ही किसी अन्य देश में होंगे ! 
भारी घाटे के बावजूद विनिवेश का विरोध-
एयर इंडिया में अब तक करीब 50 हजार करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है।
इसके अलावा उस पर 55 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी है।
इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इसके 76 प्रतिशत शेयर को बचे देने का निर्णय किया है।पर उसका भी विरोध हो रहा है।इसी तरह घाटे में चल रहे कोलकाता के ग्रेट इस्टर्न होटल को ज्योति बसु सरकार ने बेचना चाहा तो विरोध हो गया।उनके ही दल से जुड़े सीटू ने विरोध किया।बिक्री रुक गयी।पर जब स्थिति और बिगड़ी तो आखिरकार बुद्धदेव सरकार ने उसका विनिवेश कर दिया।
उसी तरह अभी जो लोग एयर इंडिया के विनिवेश का विरोध कर रहे हैं,स्थिति के और बिगड़ने पर उन्हें उसका समर्थन करना पड़ेगा।
दरअसल इस गरीब देश में होना तो यह चाहिए था कि देश के विभिन्न मजदूर और सेवा संगठन अपने संस्थान में व्याप्त भ्रष्टाचार और काहिली का कारगर विरोध करते तो कहीं विनिवेश की नौबत ही नहीं आती।
निजी क्षेत्र का विस्तार नहीं होता जैसा हो रहा है।
  दिनकर की याद को  समर्पित रेणु की कविता---
 1974 के इसी महीने की 24 तारीख को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का  निधन हुआ  था।
 उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने तत्काल उन पर एक कविता लिखी।कविता थोड़ी लंबी है।जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी।
पर उस कविता का एक अंश यहां प्रस्तुत है। 
 हा,याद है।
उच्चके जब मंचों से गरज रहे थे
हमने उन्हें प्रणाम किया था
पहनाया था हार।
भीतर प्राणों में काट रहे थे हमें
हमारे वे पाप
हमारी बुझी ज्वाला को धधका कर
हमें अग्निस्नान करा कर पापमुक्त
खरा बनाया।
पल विपल हम अवरुद्ध जले
धरा ने रोकी राह,हम विरुद्ध चले
हमें झकझोर कर तुमने जगाया था
‘रथ के घर्घर नाद सुनो..........
आ रहा देवता जो,उसको पहचानो
अंगार हार अरपो रे.........
वह आया सचमुच,एक हाथ में परशु
और दूसरे में कुश लेकर
किंतु...तुम ही रूठ कर चले गये।
विशाल तम तोम और चतुर्दिक घिरी
घटाओं की व्याकुलता से अशनि जनमी,
धुओं और उमस में छपप्टाता हुआ प्रकाश
खुल कर बाहर आया।
किंतु तुम....?
अच्छा ही किया ,तुम सप्राण
नहीं आये,नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता ?
      भूली-बिसरी याद--- 
धारावाहिक ‘रामायण’ के लिए हनुमान की भूमिका निभाने के
लिए किसी पहवान का चयन करना था।
इस किरदार के लिए कई पहलवान रामानंद सागर के पास पहुंचे थे।
इस प्रसंग का विवरण दारा सिंह ने अपनी जीवनी में कुछ इस तरह लिखा है, ‘पर रामानंद सागर के दिल-दिमाग में 
मेरी तस्वीर इस चरित्र को निभाने के लिए इस तरह दृढ़ता से जमी हुई थी कि दूसरा व्यक्ति उनको जमता ही नहीं था।
यह महाबली हनुमान की अपनी इच्छा थी जो सागर साहब को मेरे हक में प्रेरित करती रही होगी।
धारावाहिक रामायण चर्चित हो जाने के कारण सभी कलाकारों को बहुत लाभ हुआ।लोगों ने मरे चरित्र को ऐसे महसूस किया ,जैसे हनुमान जी प्रत्यक्ष आकर अदाकारी कर रहे हों।
मैं इस चरित्र को निभाने से पहले महाबली हनुमान जी आशीर्वाद मांगता था।
और मैं यह महसूस करता था कि उन्हें मुझे वरदान दिया है।तभी तो सारी जनता ने मेरे इस चरित्र को पसंद किया,वरामैं किस योग्य था !
दारा सिंह लिखते हैं कि बहुत से विद्वान और सयाने लोग मुझसे पूछते हैं कि हनुमान की भूमिका करते हुए मैंने कैसा महसूस किया ?
यह पत्रकारों ने भी पूछा।मैंने उनको महाबली में अपनी आस्था के बारे में बताया ।खास कर पहलवान लोग शक्ति के प्रतीक हनुमान जी को मानते हैं।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि हनुमान जी आज भी मृत्यु लोक में विचर रहे हैं।
  रामायण की शूटिंग के दौरान खान-पीने के बारे में भी 
दारा सिंह ने लिखा है कि ‘शूटिंग के दौरान खाने पीने में परहेज किया जाता था।
कई कलाकार दुःखी भी थे कि तपस्वियों वाले तौर तरीकों में रहना पड़ रहा है।पर जब वाहवाही मिलती तो खुश भी होते थे।
हालांकि बाद में कइयों ने खा-पीकर दंगे फसाद भी किए।
    और अंत में---
विवादास्पद आई.पी.एस.अधिकारी विवेक कुमार की कमाई की रफ्तार तो देखिए !
यदि इसी रफ्तार के साथ डी.जी.पी.पद तक पहुंच जाते तो 
इनके पास कितना धन संग्रह हो गया होता ?
उसका अनुमान तो मुश्किल
 है।पर एक बात जरूर होती ।हमारे देश के कुछ धन बटोरू नेतागण  ईष्र्यालु  जरूर हो गए होते।सोचते कि कहां नेता बने,आई.पी.एस.ही बन गए होते।हालांकि वह तो उनके वश में होता तो राजनीति में क्यों जाते ?  





 मशहूर पत्रकार एस.निहाल सिंह का गत सोमवार को
89 साल की उम्र में निधन हो गया।
पुरानी कार्य -संस्कृति के संपादकों की विलुप्त होती पीढ़ी की  
 आखिरी हस्तियों में से वह एक थे।
  एस.निहाल सिंह देश के संभवतः एक मात्र
प्रधान संपादक थे जिन्होंने प्रबंधन से मतभेद के कारण बारी-बारी से तीन अखबारों से इस्तीफा दे दिया था।
वे अखबार थे द स्टेट्समैन,इंडियन एक्सप्रेस और इंडियन पोस्ट।
वे संपादकीय विभाग को अखबार की  विज्ञापन शाखा से अलग रखते थे।आज के संदर्भ में तो यह असंभव काम माना जाता है।इसे अव्यावहारिक भी बताया जाता है।यह अकारण भी नहीं है।
एस. निहाल सिंह गुरूमुख निहाल सिंह के पुत्र थे जो बारी -बारी से स्पीकर,मुख्य मंत्री और राज्यपाल भी रह चुके थे।
आपातकाल के समय एस.निहाल सिंह स्टेट्समैन के संपादक के थे।
@अप्रैल 2018@
जब सेंसरशिप लगा तो उन्होंने अपने अखबार के प्रथम पेज पर ही लिख दिया कि यह अखबार संेसरशिप के तहत निकला है।
  ऐसा लिखना भी तब बड़ी  हिम्मत की बात थी।हां,कुछ अखबारों ने विरोधस्वरूप संपादकीय काॅलम खाली जरूर  छोड़ दिया था।
आपातकाल में एस.निहाल सिंह विदेशी खबरों को अधिक प्रमुखता देते थे और इस देश की खबरों को पहले पेज के निचले हिस्से में या किसी कोने में संक्षेप में छापते थे।
  सरकार के एतराज पर उन्होंने कहा था कि क्या नहीं छापना है,सरकार के इस आदेश का तो हम पालन कर ही रहे हैं।यदि सरकार ऐसा कोई आदेश निकाले कि हमें क्या -क्या छापना है तो हम उसका भी पालन करेंगे।ऐसा आदेश सरकार भला कैसे निकाल सकती थी !
  ऐसे रीढ़ वाले संपादक हमेशा याद रहेंगे। 
@19 अप्रैल 2018@
    

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

 फ्रांसीसी यात्री बरनियर ने सन 1700 में लिखा था कि 
‘यह हिन्दोस्तान एक ऐसा अथाह गड्ढा है,जिसमें संसार का अधिकाशं सोना और चांदी चारों तरफ से,अनेक रास्तों से आ -आकर जमा होता है और जिससे बाहर निकलने का उसे एक भी रास्ता नहीं मिलता।’
  याद रहे कि सन 1000 में विश्व के जी.डी.पी.में भारत का योगदान करीब 29 प्रतिशत था।
 यह प्रतिशत 1600 में घटकर 22  हो गया।
1820 में 16 प्रतिशत और 1950 में 4 दशमलव 2 प्रतिशत रहा।सन 1979 में तीन प्रतिशत और 2015 में सात प्रतिशत रहा।
‘डेक्कन हेराल्ड’ के अनुसार 2017 में यह प्रतिशत बढ़कर 17 हो गया है।
पर उससे पहले सन 1900 में ब्रिटिश लेखक विलियम डिगबी ने लिखा था कि ‘बीसवीं सदी के शुरू में करीब दस करोड़ मनुष्य ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं ,जिन्हें किसी समय भी पेट भर अन्न नहीं मिल सकता....।इस अधःपतन की दूसरी मिसाल इस समय किसी सभ्य और उन्नतिशील देश में कहीं पर भी दिखाई नहीं दे सकती।’
  याद रहे कि विश्व बैंक की 2016 की रपट के अनुसार भारत में 24 करोड़ 40 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।
जिनकी आय प्रतिदिन 1.90 डाॅलर से कम है,वे गरीबी रेखा से नीचे हैं।
अब यह ध्यान देने की बात है कि हमारे देश के जो हुक्मरान जो खुद को जनता का सेवक बताते  हैं,वे खुद पर कितना सरकारी धन रोज व्यय करते हैं ?
हुक्मरानों में सिर्फ नेता नहीं हैं।बल्कि उन्हें आप प्रभु वर्ग कहिए। उनमें कई क्षेत्रों के लोग शामिल हैं।हालांकि नेताओं, खास कर सत्ताधारी नेताओं की जिम्मेदारी अधिक है।उन 24.40 करोड़ लोगों के लिए वे कितना सोचते हैं ?कितना करते हैं ?
  

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सन 1985 में एक चीनी पत्रकार ने लिखा कि ‘आज का 
चीन बस पूंजीवाद का इस्तेमाल समाजवाद को सुदृढ़ करने
 के लिए कर रहा है।’
सन 2012 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में निवत्र्तमान राष्ट्रपति हू जिंताओ ने पार्टी में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि ‘यह घातक साबित हो सकता है और पार्टी की चूलें हिला सकता है।’
 सन 2018 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति शी चिनपिंग को अनिश्चितकाल तक पद पर बने रहने की छूट दे दी।
क्रांतिकारी माओ से ‘राजशाही’ शी चिनपिंग तक का सफर , यह कैसा चीनी सफर ! ?

 आई.पी.एस.अफसर विवेक कुमार के ठिकानों पर विशेष निगरानी इकाई ने कल छापे मारे ।उस अफसर पर एक दारोगा की पत्नी ने गंभीर आरोप लगाया था।
आरोप है कि थानेदार के रूप में पोस्टिंग को लेकर उस दारोगा से विवेक ने लाखों रुपए रिश्वत ले ली थी।दारोगा ने बाद में आत्म हत्या कर ली थी। 
  दरअसल थानेदारों की मनमानी पोस्टिंग को लेकर हमेशा शिकायतें आती रहती हैं।अब राज्य सरकार को पोस्टिंग की कोई बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए ।
क्योंकि इसका सीधा संबंध आम अपराध से है।
 कुछ दशक पहले मेरा एक करीबी परिजन बिहार पुलिस की सेवा में था।वह बारी -बारी से दस एस.पी.के तहत काम कर चुका था।एक बार उसने मुझे बताया था कि उन  दस में से 
सिर्फ एक एस.पी. डा.परेश सक्सेना को छोड़कर सभी नौ ने पोस्टिंग के लिए मुझसे रिश्वत ली थी।
दूसरी ओर बिना पैसे के सक्सेना साहब ने मुझे अपने जिले के सबसे महत्वपूर्ण थाने का प्रभारी बनाया था।  
  इस परिस्थिति में राज्य सरकार को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे ताकि थानेदार की पोस्टिंग में एस.पी.की मनमानी न चले।क्योंकि अब तो दारोगा को आत्म हत्या तक करनी पड़ रही है।भारी घूस देकर जो थानेदार बनेगा,वह अपराध करवा कर या फिर उसे बढ़ावा देकर ही  तो नाजायज पैसे  कमाएगा।
  एक समय कहा जाता था कि राज्य में तो दो ही लोगों के पास असली ताकत है।एक दारोगा और दूसरे मुख्य मंत्री।
अंग्रेजों के जमाने में भी पूर्व मुख्य मंत्री दारोगा प्रसाद राय के पिता ने उनका नाम दारोगा इसलिए रखा था कि उनकी इच्छा थी कि उनका  बेटा बड़ा होकर दारोगा बने।यह और बात है कि वे मुख्य मंत्री बन गए।


---अपनी स्वतंत्र सोच के कारण ही दोबारा राष्ट्रपति नहीं बन सके थे डा.राधाकृष्णन---


       
सन 1967 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति पद के लिए डा.राधाकृष्णन को चुनाव में उतारने  पर सहमति नहीं दी ।तब  यह कहा गया कि ऐसा राधाकृष्णन की  स्वतंत्र सोच के कारण हुआ।
जबकि, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने मजबूती से डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम आगे बढ़ाया था।
याद रहे कि सन् 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और सन् 1966 में इंदिरा गांधी को प्रधान मंत्री बनवाने में कामराज की महत्वपूर्ण भूमिका थी।पर उधर इंदिरा गांधी अपनी पसंद के राष्ट्रपति चाहती थीं।याद रहे कि 1967 में डा.जाकिर हुसेन राष्ट्रपति बने थे।
डा.राधाकृष्णन तो जवाहर लाल नेहरू की पसंद रहे थे।
इस तरह डा.राजेंद्र प्रसाद ही एक मात्र व्यक्ति थे जिन्हें 
लगातार बारह साल तक राष्ट्रपति बने रहने का अवसर मिला।
याद रहे कि जवाहर लाल नेहरू 1957 में ही डा.राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे।पर अबुल कलाम आजाद ने डा.राजेंद्र प्रसाद के लिए जिद कर दी और जवाहर लाल जी मान गए। 
 इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्री बनने के एक ही साल बाद  राष्ट्रपति पद का चुनाव होना था।तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज ने इंदिरा गांधी से यह आग्रह किया था कि वह डा.राधाकृष्णन को दोबारा राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की मंजूरी दें।कामराज का यह तर्क था कि डा.राजेंद्र प्रसाद को जब यह सुविधा दी गई थी तो राधाकृष्णन को क्यों नहीं।पर इंदिरा गांधी और उनके सलाहकार इस पक्ष में नहीं थे।कामराज को बुरा लगा था कि इंदिरा जी ने उनकी बात नहीं मानी। डा.राधाकृष्णन से इंदिरा जी का  आखिरी साल में संबंध सामान्य नहीं  रहा था। 
  1967 में इस पद को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान शुरू हो गई थी।शायद कामराज को यह मालूम नहीं था कि इंदिरा गांधी ने जाकिर हुसेन को राष्ट्रपति बनाने का मन बना लिया था।डा.राधाकृष्णन को जब इस बात की भनक मिली तो उन्होंंने  इस दौर से खुद को बाहर कर लिया।  
 राधाकृष्णन उम्र में पंडितजी से एक साल बड़े भी थे।संकट की घड़ी में जवाहर लाल जी राधाकृष्णन से औपचारिक -अनौपचाारिक सलाह-मशविरा भी करते रहते थे।
 ऐसा एक महत्वपूर्ण  अवसर सन 1962 में भी आया  था।तब चीन के हाथों हुए अपमान के कारण प्रधान मंत्री क्षुब्ध थे।राधाकृष्णन की सलाह पर ही नेहरू ने वी.के.कृष्णमेनन को रक्षा मंंत्री पद से हटाया था।राष्ट्रपति ने प्रधान मंत्री से कहा था कि वह दोस्ती के बदले कत्र्तव्य को प्रमुखता दें।खुद प्रधान मंत्री कृष्ण मेनन को हटाने के पक्ष में नहीं थे ।
  सन् 1957 में कांग्रेस केे कई अन्य बड़े नेता भी राजेन्द्र प्रसाद  के पक्ष में थे।इसलिए नेहरू जी ने उनकी बात मान ली।नेहरू जी अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक मिजाज के थे।पर इंदिरा गांधी वैसी नहीं थीं।इंदिरा जी ने भी देखा था कि किस तरह पंडित जी पर भावनात्मक दबाव डालकर राधाकृष्णन ने कृष्ण मेनन को मंत्री पद से हटवा दिया था।इंदिरा गांधी की सहानुभूति भी मेनन के साथ थी।
   जब राजेन बाबू 1957 में दोबारा राष्ट्रपति चुन लिये गये तो राधाकृष्णन ने उप राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे देने का मन बना लिया  था।उन्हें नेहरू जी ने किसी तरह  इस शत्र्त पर मनाया कि उन्हें 1962 में मौका मिलेगा।
  नेहरू ने तो अपनी बात रखी,पर इंदिरा गांधी ने  डा.राधाकृष्णन के बारे में अपने दलीय सहयोगियों की बातों को नजरअंदाज कर दिया। याद रहे कि सन 1966 में राधा कृष्णन ने अपने एक भाषण में कह दिया था कि ‘सरकार अपने अनेक कत्र्तव्यों से विमुख हो रही है।’उन्होंने यह भी कहा था कि ‘समाज रसातल में जा रहा है और राज नेता गण शानो -शौकत में व्यस्त हैं।’
उन दिनों यह आम चर्चा थी कि डा.राधाकृष्णन अपने प्रधान मंत्रियों को बेबाक सलाह दिया करते हैं।उनके कार्यकाल में बारी-बारी से जवाहर लाल नेहरू,लाल बहाुदर शास्त्री और इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री रही थीं।
  याद रहे कि डा.राधाकृष्णन को दोबारा राष्ट्रपति बनवाने की कोशिश में के.कामराज की संभवतः यह भी सोच रही होगी कि उत्तर भारत के राजेंद्र बाबू को दोबारा अवसर मिला तो दक्षिण भारत के राधाकृृष्णन ही इस अवसर से वंचित क्यों रहें ?कामराज 1964 से 1967 तक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।याद रहे कि 1969 में कांग्रेस के महा विभाजन तक कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र जिंदा था।
 डा.राधाकृष्णन ने विवादरहित परिस्थितियों में राष्ट्रपति भवन में प्रवेश किया था।पर 1967 में राजनीतिक कारणों से देश का तब तक का यह सर्वाधिक विवादास्पद पद हो गया।
खुद डा.राधाकृष्णन दोबारा इस पद के लिए चुना जाना चाहते थे या नहीं,यह तो नहीं मालूम ,पर जब उन्होेंने देखा कि इस पद के लिए विवाद हो रहा है तो उन्होंने खुद को इस झमेले से अलग कर लिया।
  डा.राधाकृष्णन 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक राष्ट्रपति रहे।इससे पहले वह उप राष्ट्र्रपति थे।
शिक्षा विद् डा.राधा कृष्णन का जन्म 5 सितंबर, 1888 और निधन 17 अपै्रल, 1975 को हुआ।
  @--सुरेंद्र किशोर @
@पुण्य तिथि पर@

    

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

 हमारी सरकारें किस तरह काम करती हैं,उसका एक और नमूना मुझे 3 अप्रैल 2003 के इंडियन एक्सपे्रस  की एक खबर   से मिला।
  खबर का संबंध 4 नवंबर, 1977 को असम के जोरहाट के पास के एक गांव में हुई चर्चित विमान दुर्घटना से है।
तब तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
देसाई जी बाल-बाल बचे थे।उनको बचाने में मुख्य भूमिका तो उन जांबाज पायलटों की थी जिन्होंने अपनी जान देकर प्रधान मंत्री को बचा लिया था।
  पर दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका उस गांव के इंद्रेश्वर बरूआ की थी जिन्होंने मोरारजी को दुर्घटनास्थल से उस रात सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था।
याद रहे विमान बांस के उप वन में गिर गया था।
तब मोरारजी ने उस गांव के विकास का  घटनास्थल पर ही वादा किया था।साथ ही, बरूआ को इनाम देने का भी।
 विकास का क्या हुआ,यह तो पता नहीं चला,पर इनाम की फाइल  लटक गयी ।
जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री बने तो प्रधान मंत्री सचिवालय में धूल खा रही संबंधित फाइल किसी संवेदनशील अफसर ने उन्हें दिखाई।अटल जी ने 2003 में यानी 26 साल बाद बरूआ को डेढ़ लाख रुपए भिजवाए थे।