रविवार, 12 अगस्त 2018

मुजफ्फर पुर कांड में सार्थक परिणाम तभी, जब अदालतें जांच पर नजर रखें



   पटना हाई कोर्ट की निगरानी के कारण अब यह उम्मीद बनी है कि  मुजफ्फर पुर बालिका अल्पावास गृह यौन हिंसा कांड का  कोई आरोपित बचेगा नहीं।
 सी.बी.आई. उन्हें उसी तरह  अदालत के कठघरे तक पहुंचा देगी जिस तरह चारा घोटाले में हो रहा है।
  पर मुजफ्फर पुर के महा पाप की कहानियां पढ़ने-सुनने के बाद  साफ हो गया है कि यह सरकारी सिस्टम की  विफलता का स्पष्ट नतीजा हैं।यह अधिक गंभीर बात है।
सिस्टम की ऐसी ही विफलता वाले चारा घोटाले की सी.बी.आई.जांच पटना हाई कोर्ट  के आदेश के कारण ही संभव हो सकी थी।जांच पर तब अदालत की सतत  निगरानी भी रही।
नतीजतन दो पूर्व मुख्य मंत्रियों सहित अनेक महारथि नेता,अफसर और व्यापारी सजायाफ्ता हुए।
बालिका अल्पावास गृह यौन हिंसा कांड के अनुभव से सीख कर राज्य सरकार को चाहिए कि वह जनता से सीधे जुड़े कुछ अन्य विभागों की भी इसी तरह की सोशल आॅडिट कराए।अन्य जगहों से भी चैंकाने वाली जानकारियां मिल सकती हैं।
अगर इस देश में कभी पुलिस थानों की सोशल आॅडिट संभव हो पायी तब तो भूकम्प ही आ जाएगा।
 याद रहे कि बिहार सरकार ने मुम्बई के नामी संस्थान ‘टिस’ यानी टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस की टीम से अल्पावास गृहों की जांच कराई थी।
  टिस एक ऐसा गर्व करने वाला संस्थान है जहां के अधिकतर छात्र समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत होकर निकलते हैं।मेरा उसका व्यक्तिगत अनुभव भी है।
राज्य सरकार यदि उस  संस्थान की टीम से कुछ अन्य महत्वपूर्ण विभागों के कार्यकलाप की सोशल आॅडिट कराए तो 
राज्य का कल्याण होगा।
  बिहार सरकार की विडंबना यह है कि देश के अधिकतर राज्यों की तरह ही यहां के सिस्टम के रग -रग  में भी भष्टाचार लिप्त हो चुका है।
ईमानदार मंशा वाला कोई मुख्य मंत्री भी उस सिस्टम के सामने लाचार हो जाता है।
एक बार एक मुख्य मंत्री ने मुझसे कहा था कि  भ्रष्टाचार कम करने के लिए आई.ए.एस.अफसरों को भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का रुख अपनाना होगा।पर ऐसा हो नहीं पा रहा है ।क्योंकि यहां आई.ए.एस.अफसरों की संख्या बहुत कम है और मलाईदार पोस्ट अधिक है।
इसलिए तबादला कोई सजा नहीं है।हालांकि सभी अफसर एक जैसे नहीं हैं।
  आज सरकारी सिस्टम में भरोसा बहुत कम लोगों को रह गया है।
   हां, यदि मुजफ्फर पुर बालिका गृह यौन हिंसा कांड के दोषियों को सचमुच उनके असली मुकाम तक पहुंचा देना संभव हो पाया तो  सिस्टम में विश्वास की बहाली की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
मंत्री स्तर पर सांठगांठ की हालत यह है कि मुजफ्फर पुर कांड में राज्य की समाज कल्याण मंत्री मंजू देवी को अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा।
 मंजू देवी ने कहा था कि उनके पति का मुजफ्फर पुर कांड के मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर से कोई संबंध नहीं रहा है।वे सिर्फ एक बार मेरे साथ मुजफ्फर पुर गए थे।
पर अब यह पता चल रहा है कि न सिर्फ मंजू देवी के पति ने ब्रजेश ठाकुर से 17 बार फोन पर बातचीत की,बल्कि वे 9 बार मुजफ्फर पुर की यात्रा कर चुके हैं।
 इतना ही नहीं,समाज कल्याण विभाग के एक बड़े अफसर ने पहले तो कह दिया था कि ‘टिस’ की रपट में यौन हिंसा की कोई चर्चा नहीं है।पर बाद में पता चला कि वैसी चर्चा उस रपट में मौजूद है।
 अब जो बातें खुल कर सामने आ रही हैं,उनके अनुसार लगभग  पूरे शासन तंत्र के संबंधित लोगों  ने मुजफ्फर पुर अल्पावास गृह  के संचालक को उसके जघन्य कार्यों में सहयोग किया या जानबूझ कर अनदेखी की।अल्पावास गृह की 44 में से 34 लड़कियों  के साथ लगातार बलात्कार हो,पड़ोसी भी उनकी चीख- पुकार सुन लें,पर प्रशासन की नींद न टूटे तो इसे सिस्टम की विफलता नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।जबकि संबंधित अफसर निरीक्षण की कागजी खानापूरी भी करते रहे।
मिली जानकारियों के अनुसार अनेक संबंधित सत्ताधारी नेताओं,अफसरों,कर्मचारियों को बस  उसकी एक ‘कीमत’ चाहिए थी जो उन्हें मिलती गयी।तरह -तरह की कीमतें।घूसखोरी तो प्रमुख हथकंडा रहा ही।
 मुजफ्फर पुर  कांड की जांच की अदालती निगरानी से वैसी ही उम्मीद बंधती है जैसी चारा घाटाले में बंधी थी।पूरी भी हुई।
 चारा घोटाले मंे ंअदालत की निगरानी के कारण ही सी.बी.आई. तब के प्रधान मंत्री के दबाव को भी नजरअंदाज कर सकी थी।
तब के सी.बी.आई. निदेशक जोगिंदर सिंह पर जब  तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदर कुमार गुजराल ने आरोपितों को बचाने के लिए दबाव डाला तो .निदेशक ने यही बात लिखित रूप से देने का प्रधान मंत्री से आग्रह कर दिया।
उस पर  प्रधान मंत्री पीछे हट गए थे।दोनों अदालत से डर रहे थे।
मुजफ्फर पुर कांड की जांच के सिलसिले में यह कहानी दुहरायी जा सकती है ,यदि ऐसी कोई कोशिश होगी तो।
याद रहे कि ब्रजेश ठाकुर की गिरफ्तारी के तत्काल बाद से ही बड़े -बड़े नेताओं के फोन अफसरों के यहां जाने लगे थे।
  याद रहे कि बिहार के ही श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बाॅबी हत्या कांड@1983@और ललित नारायण मिश्र हत्याकांड के मामलों में अदालती निगरानी नहीं थी।इसलिए सी.बी.आई.ने उन मामलों में आरोपितों को बचाने के लिए सफलतापूर्वक गलत मोड़ दे दिया।बचाने के लिए उच्चस्तरीय दबाव जो था !
  भागल पुर के ताजा चर्चित सृजन घोटाले की जांच में भी सी.बी.आई. तीन प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर पाई है।इस मामले में भी अदालती निगरानी होती तो बात कुछ और होती।
@ 12 अगस्त, 2018 के हस्तक्षेप-राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित मेरा लेख@



ं   

आर.सी.पी.सिंंन्हा ने कहा है कि हरिवंश जी ने राज्य
सभा की सदस्यता भी मांगी नहीं थी।
  मैं जितना थोड़ा -बहुत नीतीश जी और हरिवंश जी को जानता हूं ,उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि आर.सी.पी.सही कह रहे हैं। 

शनिवार, 11 अगस्त 2018

खबर है कि ओडिशा विधान सभा की अगली बैठक 
में राज्य में विधान परिषद की स्थापना के लिए प्रस्ताव 
पास कराया जाएगा।  
 देश की राजनीति के बदलते स्वरूप के बीच नेताओं व दलों को यह जरूरी लगता है कि उच्च सदन का प्रावधान हर राज्य में हो।
अभी विधान परिषद सात ही राज्यों में  है।
अन्य कई राज्यों से केंद्र को मिले ऐसे प्रस्ताव कुछ कारणवश अभी लंबित हैं।
 1967 में जब आदर्शवादी  गैर कांग्रेसी दल राज्यों में सता में आने लगे तो उन्होंने खर्च घटाने के लिए कुछ राज्यों से विधान परिषदें  समाप्त करवा दीं।
 बिहार में भी सत्तर के दशक में सी.पी.आई.के राज कुमार पूर्वे के प्रस्ताव पर बिहार विधान सभा ने विधान परिषद को समाप्त करने का प्रस्ताव पास कर दिया था।
पर वह प्रस्ताव  तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सका।
अगले विधान सभा चुनाव में जब पूर्वे जी अपनी सीट  हार गए तो वे विधान परिषद के सदस्य बन गए।
अब तो दलों के बीच का अंतर समाप्त होता जा रहा है।
  दरअसल अन्य राज्यों में भी विधान परिषद की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है क्योंकि वंशवाद की आंधी में 
कई राजनीतिक नेता टिकट से वंचित हो जा रहे।सीटें पुश्तैनी बनती जा रही हैं।
कुछ अन्य कारण भी हैं।
ओडिशा में तो ऐसे विधायकों को अगली बार विधान सभा के टिकट से वंचित करना है जिनसे जनता खुश नहीं है।
वे विधान परिषद में जाएंगे ताकि उन्हें कोई अन्य दल लपक न ले।
 वैसे इस मुद्दे पर एक बुद्धिजीवी ने कहा कि अब नेताओं को चाहिए कि वे निचले सदनों को बड़े नेताओं के बाल -बच्चों के लिए अघोषित तौर पर लगभग रिजर्व ही कर दें।उच्च सदनों को  राजपाट चलाने लायक लोगों से भरें।
  यहां में यह नहीं कहा जा  रहा है  कि नेताओं के सारे वंशज अयोग्य ही होते हैं।    

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018


--गांवों तक विशेषज्ञ डाक्टर पहुंचाने का  महाराष्ट्रीयन तरीका--
महाराष्ट्र सरकार ने  निजी डाक्टरों से मोल-तोल करके 
ऊंचे वेतन पर सरकारी अस्पतालों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध कराए हैं।ये ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात किए जा रहे हैं।
ध्यान रहे कि सुदूर स्थानों में जाने के लिए आम तौर से विशेषज्ञ चिकित्सक तैयार नहीं होते ।
यह समस्या बिहार सहित  पूरे देश की है।सामान्य सरकारी डाक्टरों में से भी अधिकतर अपने कार्य स्थलों से अनुपस्थित ही पाए जाते हैं।
  कुछ साल पहले एक बिहार के विधायक के यहां एक महिला डाक्टर आईं। उन्होंने कहा कि मैं आपके क्षेत्र में ज्वाइन करने को तैयार हूं।पर आप मुझे अनुपस्थित रहने की ‘छूट’ दिलवा दीजिए।विधायक ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
 यह हाल  सामान्य चिकित्सकों का है ।
 यानी ब्लाॅक स्तर पर तैनात कुछ ही सरकारी डाक्टर ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। 
इस पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र सरकार ने हाल में जो कुछ किया है,उसे बिहार सहित अन्य राज्य भी अपना सकते हैं।
 गरीब देश के आम लोग शिक्षा,स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सरकार पर ही तो निर्भर रहते हैं।
   महाराष्ट्र सरकार ने निजी विशेषज्ञ डाक्टरों से मोल-तोल करके और उन्हें भारी वेतन देकर ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए राजी कर लिया है।
इस तरीके से  कुल 356 डाक्टरों की नियुक्ति हुई है।इनमें 12 विशेषज्ञ चिकित्सक  तीन लाख रुपए मासिक से अधिक वेतन पर राजी हुए।अन्य 12 चिकित्सकों का वेतन दो और तीन लाख रुपए के बीच तय हुआ।
51 विशेषज्ञ डाक्टरों का वेतन एक से दो लाख रुपए के बीच  है।
बाकी डाक्टरों के वेतन 50 हजार से एक लाख रुपए के बीच  है।
 बिहार के चिकित्सकों की शिकायत थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली नहीं रहती।पर अब तो स्थिति बदली है।
ऐसे में महाराष्ट्र जैसा प्रयोग यहां भी किया जा सकता है। 
 --क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में सुधार जरूरी--
सुप्रीम कोर्ट की यह पीड़ा स्वाभाविक ही है कि ‘लेफ्ट ,राइट और सेंटर हर तरफ  बलात्कार हो रहा है। इसे रोका क्यों नहीं जा रहा है ?’
हालांकि  इस देश मंे सिर्फ बलात्कार ही हर जगह नहीं हो रहा है,बल्कि हर तरह के अपराध हो रहे हैं।
 शासन ‘कानून का राज’ कायम करने में आंशिक रूप से ही सफल हो पा रहा है।
  नतीजतन तरह-तरह के  अपराधियों के मन से कानून का खौफ गायब है।
2016 में इस देश में हर तरह के अपराधों में अदालती सजाओं का औसत प्रतिशत 46 दशमलव 8 ही रहा।
 अमेरिका व जापान में  कुल अपराधों में से  99 प्रतिशत अपराधों में आरोपितों को सजा मिल ही जाती है।
 तर्क दिया जाता है कि भारत में पुलिस और कचहरियों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं।
अपराधों के वैज्ञानिक अनुसंधान 
के लिए सरकार के पास  साधन नहीं है।यहां तक कि फोरेंसिक साइंस लेबोटरीज की भी भारी कमी है।गवाहों की सुरक्षा का प्रबंध नहीं है। यह सब करने के लिए सरकार को देश भर में बहुत बड़ी राशि खर्च करनी पड़ेगी।
यह पैसा कहां से आएगा ? क्यों नहीं ‘टैक्स फाॅर रूल आॅफ लाॅ’ लगाया जाना चाहिए।पहले तो जनता को वह बोझ लगेगा।पर बाद में इसके इतने अधिक फायदे होंगे कि लोगबाग खुश हो जाएंगे।अभी नहीं तो कम से कम 2019 के लोक सभा चुनाव के बाद केंद्र में सत्ता में आने वाली  सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।अन्यथा संकेत हैं कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की लगातार अनदेखी के अंततः भयानक परिणाम  होंगे।
   ---आर.के.धवन और एम.ओ.मथाई-- 
किसी बड़े नेता के निजी सचिव को कैसा होना चाहिए ?
एम.ओ.मथाई की तरह या आर.के धवन की तरह ?
इस सवाल का जवाब तो आसान नहीं है।दोनों के अपने -अपने पक्ष हैं।
  पर इन दोनों के बारे में कुछ बातें जानने योग्य हैं।
आर.के.धवन @1937-2018@का हाल में निधन हो गया।
वे लंबे समय तक इंदिरा गांधी के निजी सचिव थे।
एम.ओ.मथाई@1909-1981@सन 1946 से 1959 तक जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव थे।
 मथाई ने अपनी दो पुस्तकांे के जरिए लोगों को यह बता दिया कि जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार में कौन -कौन सी खूबियां और कमियां थीं।बहुत सारी जानी-अनजानी बातें।
दूसरी ओर, आर.के.धवन इंदिरा गांधी से संबंधित सारे अच्छे -बुरे संस्मरण अपने साथ लेते चले गए।कभी इंदिरा जी के खिलाफ कुछ नहीं कहा।इस बिन्दु पर कुछ लोगों ने मथाई को सराहा तो कुछ अन्य ने धवन की तारीफ की।
अनेक  ने कहा कि निजी सचिव को धवन जैसा ही  होना चाहिए।
दूसरी ओर खुशवंत सिंह ने तब लिखा था कि ‘मथाई नमक हराम है।उसे चैराहे पर कोड़े लगाए जाने चाहिए।’
वैसे यह कहने वाले लोग भी थे कि मथाई ने लोगों को साफ- साफ यह बता तो दिया कि आजादी के तत्काल बाद के शासकों ने इस देश को किस तरह चलाया।कितने ऊंचे नेता  थे तो कितने गिरे नेता।कुछ नेताओं  मंे तो ऊंचाई भी थी और गिरावट भी।
हालांकि  दोनों सचिव बारी -बारीे से विवादास्पद परिस्थितियों में  पद से हटाए गए।धवन की तो शानदार वापसी हो गयी।पर मथाई की  संभव नहीं थी।वैसे भी उन्होंने किसी ‘देवता’ को बख्शा ही नहीं था । 
   ---भूली-बिसरी याद--
सन् 1857 के हीरो बाबू वीर कुंवर सिंह की 1856 की सक्रियता 
पर भी एक नजर डाल लीजिए।
  मई, 1856 में कंुवर सिंह ने जहानाबाद के अपने मित्र को लिखा था, ‘भाई जुल्फिकार,आपकी उपस्थिति से उस बैठक में जो कुछ तय हुआ ,उस सिलसिले में तैयारी पूरी करने का वक्त आ गया है।अब भारत को हमारे खून की जरूरत है।
हम आपकी मदद और समर्थन के आभारी हैं।पत्रवाहक से आपको मालूम हो जाएगा कि यह पत्र किस जगह से लिखा जा रहा है।आपका पत्र समय पर मिल गया था।
अब 15 जून 1856 को बैठक होगी।उसमें आपकी उपस्थिति अनिवार्य है।यह हमारी अंतिम बैठक होगी।
तब तक सभी तैयारियां पूरी कर लेनी है।’
  अगस्त 1856 में बाबू कुवंर सिंह ने उन्हें फिर लिखा,‘समय आ गया है।मेरठ की ओर कूच करें।वहां आपका इन्तजार किया जाएगा।
सभी तैयारियां पूरी हो चुकी है। आप स्वयं अनुभवी और योग्य हैं।हमारी फौज तैयार है।हम यहां से कूच करेंगे और आप  वहां से।
ब्रिटिश फौज काफी कम है।आपके जवाब की प्रतीक्षा है।’
तीसरी चिट्ठी कुंवर सिंह ने जनवरी, 1857 में उन्हें लिखी।उन्होंने लिखा कि ‘हम दिल्ली के लिए रवाना हो चुके हैं।हमें अपनी जान की बाजी लगानी है।समय करीब है।यही बेहतर है कि हम रण क्षेत्र में लड़ते -लड़ते मर जाएं।यह एक दुःखद सूचना है कि असद अली ने हमारे बारे मंंे ब्रिटिश अधिकारियों को खबर दी है।’
याद रहे कि 1857 के विद्रोह से पहले के ये पत्र हैं।
इन पत्रों की पुष्टि डा.के.के.दत्त और प्रो.एस.एच.असगरी ने की है।
 इन पत्रों से यह जाहिर होता है कि 1857 के विद्रोह से पहले ही बिहार लड़ने की तैयारी कर रहा था।
काजी जुल्फिकार अली जहानाबाद के थे।उन्होंने भी अपनी पलटन तैयार की थी।
वे वीर कुंवर सिंह के दोस्त थे।
जुल्फिकार अली दिल्ली पहुंच कर ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।आश्चर्य है कि किन कारणों से जुल्फिकार अली का उतना नाम नहीं हुआ जिसके वे हकदार थे ! 
       --और अंत मंे-
अस्सी के दशक की बात है।मैंने एक मुख्य मंत्री के आवास पर फोन किया।फोन किसी ‘गोपाल’ ने उठाया।मुझे जो सूचना लेनी थी,वह मिल गयी।
मैंने समझा कि गोपाल कोई स्टाफ होगा।पर दूसरे दिन उस मुख्य मंत्री के एक करीबी व्यक्ति मुझे  मिले।उन्होंने कहा कि ‘आपने जब फोन किया था,उस समय मैं भी वहां मौजूद था।’
मैंने पूछा कि ‘वहां गोपाल कौन हैं ?’उन्होंने बताया कि गोपाल-वोपाल कोई नहीं है।दरअसल मुख्य मंत्री जी के पुत्र ने  ही फोन उठाया था।पर, वे आपको भी अपना नाम नहीं बताना चाहते थे।किसी को नहीं बताते हैं।क्योंकि वहां फोन उठाना उनकी ड्यूटी नहीं है।
अब मैं सोचता हूं कि उस जमाने के लोग कम से कम इस बात का ध्यान तो रखते थे।
@10 अगस्त, 2018 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम ‘कानोंकान’ से।

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडु सदन में
शांति-शालीनता बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील
रहे हैं।अब उप सभापति पद पर भी हरिवंश के रूप में एक ऐसे व्यक्ति आए हैं जिन्होंने अपनी  सदस्यता की अवधि में ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे उच्च सदन की गरिमा कम होती हो।
अब यह उम्मीद की जाती है कि सभापति व उप सभापति मिलकर ऐसे सदस्यों पर काबू पाएंगे जिनका मुख्य काम ही बारी से पहले बोलना और शोरगुल-हंगामा  करना होता है।
  साठ-सत्तर के दशक में संसद खास कर राज्य सभा से समाजवादी नेता राज नारायण सहित कुछ  सदस्य मार्शल के जरिए निकाल दिए जाते थे जब वे आसन के निदेश का पालन करने से इनकार कर देते थे।
 जरूरत पड़ने पर मार्शल का इस्तेमाल अब भी होना चाहिए ताकि संसद खास कर उच्च सदन की गरिमा कायम की जा सके।जब भी सदन में शांति रहती है,प्रतिपक्ष को अपनी बातें रखने का अधिक अवसर मिलता है।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

सुप्रीम कोर्ट ने कल ठीक ही कहा है कि ‘लेफ्ट ,राइट और सेंटर हर तरफ हो रहा है बलात्कार ! इसे रोका क्यों नहीं जा रहा है ?’
वैसे इस देश मंे सिर्फ बलात्कार ही हर जगह नहीं हो रहा है,
बल्कि हर तरह के अपराध हो रहे हैं।
 शासन ‘कानून का राज’ कायम करने में आंशिक रूप से ही सफल हो पा रहा है।
  नतीजतन अधिकतर अपराधियों के मन से कानून का खौफ गायब है।इनमें सफेदपोश अपराधी तरह -तरह के घोटालेबाज,दलाल  व भ्रष्ट अफसर  भी शामिल हैं।
अनेक मामलों में पुलिस, चैकीदार के बदले भागीदार है।
रक्षक ही भक्षक बन रहे हैं।शुक सागर में लिखा गया है कि कलियुग में राजा ही प्रजा को लूटेगा।
अधिकतर बड़े अफसरों ने भी प्रधान मंत्री मोदी की 2014 की इस चेतावनी को भी नजरअंदाज कर दिया कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा।’
2016 में इस देश में हर तरह के अपराधों में अदालती सजाओं का औसत प्रतिशत 46 दशमलव 8 रहा।
जबकि, अमेरिका व जापान में हुए कुल अपराधों में से  99 प्रतिशत अपराधों में आरोपितों को सजा मिल ही जाती है।
 बहाना है कि भारत में पुलिस और कचहरियों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं।
भले भ्रष्टाचार में लूट लिए जाने के लिए अरबों रुपए उपलब्ध हैं।
अपराधों के वैज्ञानिक अनुसंधान 
के लिए सरकार के पास समुचित साधन नहीं है।यहां तक कि फोरेंसिक साइंस लेबोटरीज की भी भारी कमी है।
 अधिकतर गवाहों को खरीद लिया जाता है या धमका कर चुप करा दिया जाता है।
सरकार कुछ ठोस काम करे तो स्थिति बदल सकती है।
1.-पूर्व डी.जी.पी.प्रकाश सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निदेश का कार्यान्वयन किया जाए ताकि पुलिस निष्पक्ष हो सके।
2.- पुलिस बल और अदालतों की संख्या जरूरत के अनुसार बढ़ायी जाए।
3.-गवाहों की सुरक्षा के लिए अलग से ‘गवाह सुरक्षा फोर्स’ बने।
4.- मोहल्ला व गांव स्तर पर चैकीदारी व पुलिस व्यवस्था के साथ -साथ अतिरिक्त खुफिया तंत्र विकसित किया जाए ताकि अपराधों व अपराधियों के बारे में सूचनाएं  मिलती रहे।
पुलिस थानों की संख्या बढ़ायी जाए। 
अनेक अपराधों के मामलों में डर के कारण प्राथमिकियां दर्ज नहीं करायी जातीं।या फिर पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखती।ऐसे मामलों की सूचनाएं खुफिया तंत्र दे सकता है।
5.-कुछ खास तरह के अपराधों के लिए त्वरित अदालतों की संख्या बढ़ायी जाए।
6.-थाना स्तर पर अनुसंधान को कानून -व्यवस्था से अलग किया जाए।थानों का भी सोशल आॅडिट कराया जाए।
7.-हत्या व बलात्कार जैसे अपराधों के आरोपियों के पक्ष में  पैरवी करने वाले नेताओं के नाम सार्वजनिक किए जाएंं।
8.-जिन अफसरों के पास जायज आय से कम से कम पांच करोड रुपए़ अधिक अवैध धन पाया जाए,उस अफसर के ऊपर-नीचे तैनात अफसरों व कर्मियों की संपत्ति की भी जांच हो।
9.- इन सब कामों के लिए काफी धन की जरूरत होगी।
इसके लिए केंद्र व राज्य सरकारें ‘सुशासन टैक्स’ लगाएं।
पहले तो यह टैक्स जनता को भार लगेगा।पर उसका जब लाभ दिखायी पड़ने लगेगा तो लोग खुशी -खुशी टैक्स देंगे।
क्योंकि शांति -व्यवस्था ठीक रहने पर सबकी तरक्की होगी।
10.- भ्रष्ट पुलिसकर्मियों का सेना की तरह ‘कोर्ट मार्शल’ हो।


बरसात देती है टाउन प्लानिंग की गड़ बडि़यां समझने का मौका


बरसात बता देती है कि टाउन प्लानरों  की दूरदर्शिता कितने पानी में है।
अन्य किस शहर की बात करें, हर बरसात में मुम्बई जैसे महा नगर की हालत भी दयनीय हो जाती है।
पर हम हैं कि कोई सबक सीखने को तैयार ही नहीं हैं।
पटना तथा बिहार के अन्य अधिकतर शहरों के विकास की शैली को भी बरसात बेनकाब कर देती है।जिसने जहां चाहा ,घर बना लिया।कहीं सड़क का अतिक्रमण हुआ तो कहीं नालों का।
 नालियों और सड़कों के निर्माण की गुणवत्ता की सच्चाई भी सबके सामने होती है।
 बरसात में भ्रष्टाचार की भी बू आने लगती है।
फिर भी हर बरसात के बाद हम सब कुछ भूल जाते हैं।
 समस्या नगर निकायों और सरकार के बीच तालमेल की भी आती है।वैसे किसी भी जन सेवी सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह बरसात में यह आकलन करा ले कि बरसात के बाद कहां -कहां और क्या- क्या सुधार  जरूरी हैं।
 वैसे  अनेक शहरों के मध्य में भी आबादी के बढ़ते दबाव के कारण भी तरह -तरह की समस्याएं आ रही हैं।
  आश्चर्य है कि किसी भी राज्य सरकार ने इस बात पर विचार क्यों नहीं किया कि पटना में गंगा किनारे के चार बड़े संस्थानों में से कम से कम दो को मुख्य पटना से बाहर स्थानांतरित कर दिया जाए ?
  आसपास ही बसे पटना विश्व विद्यालय ,पी.एम.सी.एच.,पटना कलक्टरी और जिला अदालत ने मध्य पटना की भीड़ बढ़ा दी है।ये सब भीड़ जुटाऊ जगहें हैं।साथ ही गांधी मैदान भी पास में ही हैं।खैर, उसका तो कोई विकल्प नहीं है।
 --ट्राफिक प्रबंधन की समस्या--
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी गत माह यह स्वीकारा  कि ट्राफिक प्रबंधन इस देश की पुलिस के लिए बड़ी समस्या बन चुकी है।
उन्होंने तीव्र शहरीकरण को इसका मुख्य कारण बताया है।
अब सवाल है कि सुव्यवस्थित शहरीकरण के लिए इस देश की सरकारें क्या और कितना कुछ कर रही हैं ?
 यदि सरकार नहीं करेगी तो निजी एजेंसियां तो करेंगी ही।
निजी एजेसियां तो आम तौर पर जैसे -तैसे ही करेंगी।
निजी एजेंसियों पर नजर रखने वाली सरकारी एजेंसियों में से अधिकतर का मुख्य लक्ष्य पैसे कमाना रहता है।
पहले यह कहावत बिहार में ही थी।पर अब पूरे देश में के लिए यह सत्य है।यानी अधिकतर सरकारी कर्मी आॅफिस आने के लिए वेतन लेते हैं और काम करने के घूस।
हालांकि इसके अपवाद भी हैं।
देश भर के भ्रष्टाचारियों में जेल जाने का भय समाप्त हो चुका है।फिर उपाय क्या है ?जो सत्ता में हैं,उन्हें अन्य बातों के साथ -साथ इस पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि सख्त अदालती  आदेश के बावजूद अतिक्रमणकारी इतना निर्भीक क्यों रहते हैं ?फुटपाथों और सड़कों पर अतिक्रमण ट्राफिक समस्या का एक बड़ा कारण है।यह सब पटना सहित लगभग पूरे देश में देखा जा रहा है।सिर्फ वी.वी.आई.पी.इलाके इसके अपवाद हैं।केंद्रीय गृह मंत्री को चाहिए कि वे सभी राज्यों की बैठक बुलाएं और इस समस्या के समाधान के लिए कानून में बदलाव करना जरूरी हो तो वह भी करें।
  --सीमा पर चैकसी जरूरी--
    असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के ड्राफ्ट में अभी करीब 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं।
इनमें से जो चाहें , अभी सबूतों के साथ अपना नाम दर्ज करने का दावा कर सकते हैं।
जिनके पास पक्के सबूत होंगे ,उनके तो नाम अंततः दर्ज हो ही जाएंगे।
पर फिर भी संकेत हैं कि लाखों लोग सबूत नहीं जुटा पाएंगे।
नतीजतन वे वोटर नहीं रहेंगे।यानी ऐसे गैर वोटरों में उन राजनीतिक दलों की रूचि समाप्त हो जाएगी जिन्होंने इन बंगलादेशियों को नाजायज तरीकों से वोटर बनवाया और दूसरी सरकारी सुविधाएं दिलवाईं।
बोर्डर पार कराकर भारत लाने में तो सीमा पर तैनात भ्रष्ट सुरक्षा कर्मी व दलाल  जिम्मेदार होते हैं।पर, उन्हें वोटर बनवाने के लिए  वोट लोलुप नेता और राजनीतिक कार्यकत्र्ता जिम्मेदार होते हैं।
यदि टपा कर लाए गए मानुष वोटर ही नहीं बन पाएंगे तो फिर नेता लोग क्यों घुसपैठियों की मदद करेंगे  ? नतीजतन घुसपैठ की समस्या काफी कम हो जाएगी।असम में भी और अन्य राज्यों में भी।
हां,साथ ही समस्या के पूर्ण निदान के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों के बीच फैले भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार को विशेष उपाय करने होंगे।
--सुप्रीम कोर्ट की पहल से उम्मीद जगी--
सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फर पुर अल्पावास गृह यौन हिंसा कांड का खुद संज्ञान लेकर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
देश की सबसे बड़ी अदालत की इस पहल से लोगों में यह उम्मीद बढ़ी है कि उस कांड के पीडि़तों को न्याय मिलेगा।
 दरअसल सी.बी.आई.जांच पर जब तक अदालत की नजर नहीं रहती ,तब तक निष्पक्ष जांच की उम्मीद कम ही रहती है।
बिहार के 1983 के बाॅबी हत्याकांड और 1999 के शिल्पी जैन हत्याकांड में ऐसा हो चुका है।सत्ताधारी आरोपियों के समक्ष तो जांच एजेंसी की बेचारगी ही सामने आती रही है।
  दर्जनों निरीह बच्चियों के साथ जघन्य महा पाप के ताकतवर आरोपी बच कर निकल न जाए,इसके लिए जरूरी है कि उनकी नार्काे और डी.एन.ए.जांच भी हो।यदि सुप्रीम कोर्ट इसकी खास अनुमति देगा तो न्याय होने मेंे सुविधा होगी।
याद रहे कि 2010 के अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि आरोपी की मर्जी के खिलाफ उसका नार्को-डी.एन.ए.टेस्ट नहीं हो सकता।
इस निर्णय ने बिहार में भी कई बार जांच एजेंसियों का काम 
कठिन बना दिया है।यदि जरूरत समझे तो सुप्रीम कोर्ट इन निरीह व बेसहारा बच्चियों के लिए 2010 के अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर ले।
       --भूली-बिसरी याद--
आपातकाल के बड़ौदा डायनामाइट केस से कन्नड व तेलुगु की मशहूर फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी का नाम अंतिम समय में हटा दिया गया था।
 याद रहे कि जार्ज फर्नांडिस उस केस के मुख्य आरोपी 
थे।आपातकाल में जब सी.बी.आई.ने अभियुक्तों की सूची बनायी   थी तो उसमें स्नेहलता का भी नाम था।
पर आरोप पत्र से उनका नाम हटा दिया गया।इस संबंध में गृह मंत्रालय की राय बनी थी कि स्नेहलता अत्यंत लोकप्रिय व खूबसूरत अभिनेत्री हैं।
अभिनेत्री  किसी मुकदमे में अभियुक्त बनेगी तो मुकदमे में ग्लेमर का तत्व आ जाएगा।
इससे मुकदमा अधिक चर्चित हो जाएगा।
इससे उस केस के अन्य अभियुक्तों के प्रति भी लोगों की सहानुभूति बढ़ सकती है।
पर सरकार नहीं चाहती थी कि बड़ौदा डायनामाइट केस के अभियुक्तों खास कर जार्ज फर्नांडिस के प्रति किसी की सहानुभूति हो।
  हालांकि सरकार यह नहीं जानती थी कि स्नेहलता डायनामाइट के इस्तेमाल के खिलाफ थीं।
बंगलुरू की  निवासी स्नेहलता का  पूरा परिवार समाजवादी था।डा.राम मनोहर लोहिया का अत्यंत प्रशंसक।
जार्ज का भी उनके घर आना जाना था।पर हिंसा के सवाल पर  स्नेहलता परिवार में मतभेद था।स्नेहलता आपातकाल के खिलाफ सिर्फ  अहिसंक आंदोलन के पक्ष में थीं जबकि उनकी पुत्री नंदना रेड्डी जार्ज के साथ थी।
  फिर भी  स्नेहलता को मई, 1976 में गिरफ्तार किया गया था।उन्हें जेल में इतना अधिक कष्ट दिया गया कि उनकी हालत खराब हो गयी।खराब हालत के कारण उन्हें छोड़ा गया। जेल से छूटने के कुछ ही समय बाद यानी जनवरी 1977 में उनका निधन हो गया।याद रहे कि कन्नड की
पहली समानांतर सिनेमा ‘संस्कार’ में  स्नेहलता काम कर चुकी थींं।     
   --और अंत मंे-
यदि कोई सरकार चाहती है कि किसी आयोग की रपट जल्द से जल्द उसे मिल जाए  तो उसे एक काम पहले ही कर देना चाहिए।
उसे आयोग या कमेटी  के प्रधान व सदस्यों से अनौपचारिक रूप से यह कह देना चाहिए कि इस आयोग का काम समाप्त होते ही आपको एक दूसरे आयोग को संभालना है।
  दरअसल आयोग की कुर्सी मिल जाने पर शायद ही उसे कोई छोड़ना चाहता है।क्योंकि उसके साथ कई सुविधाएं जुड़ी रहती हैं।
इसलिए अधिकतर आयोग फाइनल रपट तैयार करने में अनावश्यक विलंब करते हैं। 
@ 3 अगस्त, 2018 को ‘प्रभात खबर’ -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम ‘कानोंकान’ से@