रविवार, 6 जनवरी 2019

--हंगामा करते सदस्यों को निकाल देने की लोक सभा की पहल अनुकरणीय--सुरेंद्र किशोर --


लोक सभा में 2 जनवरी को हंगामा कर रहे अन्ना द्रमुक के 24 सदस्यों को स्पीकर सुमित्रा महाजन ने सदन से पांच काम- काजी दिवसों के लिए निलंबित कर दिया।
लोस स्पीकर का यह कदम सराहनीय है।हालांकि  यह सजा काफी कम है। यह सजा सबक सिखाने के लिए तो बिलकुल ही अपर्याप्त  होगी।
 खैर शुरूआत अच्छी है।
 अब राज्यों की विधायिकाओं के पीठासीन पदाधिकारियों को भी जरूरत पड़ने पर ऐसे ही कदम उठाने ही चाहिए।ऐसा करके वे लोकतंत्र का भला करेंगे।
लोक सभा में लगभग रोज ही हो रहे हंगामे से क्षुब्ध स्पीकर ने पिछले महीने कहा था कि आपकी हालत तो स्कूली छात्रों से भी बदतर है।ठीक ही कहा था।
उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि यदि हंगामा बंद नहीं हुआ तो कार्रवाई होगी।
 उन्होंने कार्रवाई की शुरूआत भी कर दी।
उधर राज्य सभा में पीठासीन पदाधिकारी हंगामों से अब भी परेशान रहते हैं।दरअसल सत्ताधारी गठबंधन को वहां बहुमत हासिल नहीं है, लगता है इसीलिए किसी तरह की सख्त कार्रवाई में हिचक है।
 लेकिन बिहार सहित देश की  अनेक राज्य विधान सभाओं में अनुशासन लाने के लिए संबंधित पीठासीन पदाधिकारी लोक सभा स्पीकर का अनुसरण कर सकते हैं।उससे लोकतंात्रिक संस्था  के प्रति नई पीढ़ी में गलत धारणा नहीं बनेगी।
उनको इसका श्रेय भी मिलेगा।
  दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश की  अधिकतर विधायिकाएं 
‘हंगामा सभाएं’  बन कर रह गई हैं।
इसके लिए सारे दल जिम्मेदार हैं।जो जहां प्रतिपक्ष में है,वहां वह हंगामा करना अपना कत्र्तव्य समझता है।नतीजतन लोकतंत्र लहू लुहान हो रहा है।नई पीढ़ी को गलत संदेश मिल रहा है।संसद की कार्यवाही देखने गए एक स्कूली छात्र ने एक बार कहा था कि ‘हम तो इनसे अच्छे हैं।’ 
--नो-मो-फोबिया से ग्रस्त-- 
नोमोफोबिया यानी एक ऐसी बीमारी जिसमें मोबाइल साथ में नहीं रहने पर डर लगता हो ! कहीं जरूरी फोन करना है तो काम बिगड़ सकता है,यदि उस समय मेरे पास मोबाइल नहीं हो।यह है डर !
  अब तो स्मार्ट फोन का जमाना आ गया है।शहर से गांव तक यह महामारी के रूप मौजूद  है।बढ़ता जा रहा है।
स्मार्ट फोन में व्यस्त पिता को पुत्र से बात करने की फुर्सत नहीं तो पति को पत्नी से।अब तो पत्नियों के हाथों में भी स्मार्ट फोन नजर आने लगा है।इससे सबसे अधिक खतरा बच्चों की आंखों को है।पर कौन ध्यान देता है !
कई बार तो आपके ड्राइंग रूम में बैठे आपके चारों -पांचों मित्रों की नजरें  अपने -अपने स्मार्ट फोन पर 
होती हैं और आपकी तरफ से वे लगातार लापारवाह रहते हैं।
  हद तो तब हो जाती है जब कोई राजनीतिक दल या संगठन किसी गंभीर विषय पर बात करने के लिए कुछ प्रमुख व्यक्तियों की बैठक बुलाए।
बैठक में रह -रह कर  मोबाइल की घंटियां ध्यान बंटा देती हैं।
हाल में दार्जिलिंग में जब गोरखा जन मुक्ति मोर्चा ने गंभीर चिंतन के लिए बैठक बुलाई तो उसने सख्त हिदायत दे दी थी कि किसी के हाथ में मोबाइल सेट नहीं होगा।
ऐसी बैठकों के लिए एक अन्य उपाय भी हो सकता है।उससे ‘नो-मो-फोबिया’ से एक हद तक  लोगों को बचाया जा 
सकता है।
बैठक हाॅल में प्रवेश करने से पहले सारे लोग अपने मोबाइल सेट की बैट्री एक छोटे लिफाफे में रख कर एक जगह जमा कर दें।
जाहिर है कि उन लिफाफों में उनके नाम लिखे होंगे।इससे लौटाने में सुविधा होगी।
मोबाइल सेट तो पास में रहने का संतोष होगा,पर बात नहीं कर पाएंगे।
यानी  यह संतोष  रहेगा कि कुछ देर बाद बैट्री वापस मिलते ही बातें होने लगेंगी।शायद इससे ‘नोमोफोबिया’ से बचा जा सके ! 
याद रहे कि नोमोफोबिया शब्द 2010 से ही चलन में है।
 -- पी.एम.उम्मीदवार ममता बनर्जी--
तृणमूल कांग्रेस  ममता बनर्जी को प्रधान मंत्री की उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव लड़ेगी।
पार्टी के स्थापना दिवस पर यह घोषणा की गयी।ममता बनर्जी के भतीजा व सांसद अभिषेक बनर्जी ने उम्मीद जताई है कि  नया साल अच्छे दिन लाएगा।
खबर मिल रही है कि देश के कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के कुछ नेता भी उम्मीद कर रहे हैं कि शायद उन्हें भी  उसी तरह प्रधान मंत्री बनने का अवसर मिल सकता है जिस तरह नब्बे के दशक में एच.डी.देवगौड़ा को मिला था।
हालांकि बेल के पेड़ के नीचे संयोग से ही आम मिला करता है।
पर ‘हम किससे कम !’ इसी तर्ज पर राजनीति चल रही है।
पर इसमें एक दिक्कत भी है।
अधिकतर क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपनी औकात से अधिक लोक सभा सीटों पर लड़ना चाहते हैं ताकि अधिक सीटें जीतें।अधिक विजयी सांसद यानी उस दल के नेता के पी.एम.बनने के उतना ही अधिक चांस !
 पर इस सिलसिले में विभिन्न दलों के बीच चुनावी तालमेल में दिक्कतें आ रही हैं।देखना है कि आने वाले दिनों में महा गठबंधन व फेडरल फं्रट इस समस्या का किस तरह समाधान करते हैं।
 --बांध के साथ ही घाट का भी निर्माण जरूरी-- 
सारण जिले के दरिया पुर अंचल के भरहा पुर गांव के पास की नदी पर इस राज्य सरकार ने कुछ साल पहले मजबूत व ऊंचा बांध बनवाया।उसकी जरूरत भी थी।लोग खुश हुए।
 बांध बनने  से पहले नदी के घाट पर लोग नहाते  व छठ पूजा वगैरह करते थे।पहले घाट काम चला देते थे।
पर अब उस काम में काफी दिक्कतें आ रही हैं।क्योंकि 
बांध से उतर कर नदी में जाने के लिए ढलान अब बहुत तीखा हो गया है।
सरकार नदियों में घाट बनाती ही रहती है।यदि बांध निर्माण को घाट निर्माण के काम से जोड़ दिया जाए तो लोगों  की खुशियां दुगुनी हो जाएंगी।
    -- भूली बिसरी याद--
आजादी के तत्काल बाद राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर कई अच्छे कानून बनाए गए,पर उन्हें कड़ाई से लागू नहीं किया गया ।
पश्चिम बंगाल का बटाईदारी कानून उसका बड़ा उदाहरण है।
जानकार बताते हैं कि बिहार का जमीन्दारी उन्मूलन कानून भी कुछ वैसा ही था।जमींदारों के फायदे के लिए उसमें  कुछ छेद छोड़ दिए गए थे।
पश्चिम बंगाल की वाम मोरचा सरकार का ‘बरगा आपरेशन’ काफी चर्चित और कारगर रहा।उसका राजनीतिक लाभ वर्षों तक वाम मोरचा को मिला।
पर वाम सरकार का बरगा अभियान कोई नया नहीं था।डा.विधान चन्द्र राय के कांग्रेसी मंत्रिमंडल के समय के भू राजस्व मंत्री विमल चन्द्र सिंह ने बटाईदारों को जोतदारों द्वारा अनवरत बेदखल किए जाते देख एक कानून बनाया था।विमल चन्द्र सिंह हांलाकि खुद बहुत बड़े जमीन्दार थे।उस कानून
के तहत बटाईदारों के नाम दर्ज करना जरूरी कर दिया गया था।
उस मंत्री ने उस समय यह भी कहा था कि जो भी बटाईदार अपना नाम दर्ज कराने आएगा, उसका नाम दर्ज करना अनिवार्य होगा।पर कांग्रेसी सरकार ने उस कानून पर अमल ही नहीं किया।अमल किया ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम सरकार ने। 
   -- और अंत में--
इस देश के कुछ खास नेताओं की मीडिया के एक हिस्से  से अक्सर एक खास तरह की शिकायत रहती है।
वे कभी कहते हैं कि उनके बयान को गलत ढंग से पेश किया गया।कभी कहते हैं कि मेरे बयान का गलत अर्थ लगाया गया।कभी कुछ और तो कभी कुछ और !
अरे भई नेता जी ,आपके ही बयानों के साथ अक्सर ऐसा  क्यों होता है ?
आप द्विअर्थी संवाद आखिर बोलते ही क्यों हैं ?
ऐसे बयान देते ही क्यों हैं जिनके दो अर्थ लग सकते हों ?
पर,शायद आप जानबूझकर ऐसे बयान देते हैं।आप कुछ खास संदेश भी देना चाहते हैं।साथ ही, अपने बयान के कुपरिणाम से बचना भी चाहते हैं।ऐसे में मीडिया पर दोषारोपण कर देने से बढि़या और कोई उपाय है भी नहीं !
हां, ऐसे आदतन द्विअर्थी संवाद अदायगी वाले नेताओं का मीडिया बहिष्कार करने लगे तो उनके होश ठिकाने आ जाएंगे।
@4 जनवरी 2019 को प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि 
‘ कई मुस्लिमों की समस्या यह है कि जब मैं हिंदुओं की बुराइयों की आलोचना करता हूं तो वे ताली बजाते हैं।
 लेकिन जब मैं मुसलमानों की बुराइयों की आलोचना करता हूं तो वे शोर मचाने लगते हैं।
यह नहीं चलगा। सेक्युलरिज्म एकतरफा नहीं हो सकता।
यह दो तरफा होता है।’  

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

पाटलिपुत्र विश्व विद्यालय का स्थायी भवन पटना के मीठा पुर बस स्टैंड के पास बनेगा।
यानी पटना को गैस चेम्बर बनने से रोकने का एक और अवसर बिहार सरकार ने खो दिया।
 यह स्थान इस तर्क के आधार पर चुना गया है कि प्रादेशिक राजधानी के सारे बड़े शिक्षण संस्थान एक ही साथ आसपास रहें।
यह तर्क तो सही है।
पर, पटना मेडिकल काॅलेज अस्पताल का प्रस्तावित विशाल भवन भी तो नगर के बीच में ही बनने जा रहा है।
विशाल बिहार म्यूजियम नगर की मुख्य सड़क पर बन गया।
पटना कलक्ट्री को नगर के बाहर ले जाने का प्रस्ताव कुछ साल पहले सामने आया था।पर वह भी कार्यान्वित नहीं हो सका।
  नगर में अधिक आॅफिस और प्रतिष्ठान, यानी महा नगर बन रहे  पटना नगर में अधिक वाहन।अधिक वाहन यानी अधिक प्रदूषण।
अधिक आबादी यानी भूजल पर भी अधिक दबाव।अन्य अनेक समस्याएं।
  चीन ने अपने महा नगरों से कुछ प्रतिष्ठान बाहर शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।वे अपने महा नगरों को गैस चेम्बर बनने से अभी से रोक देना चाहते हैं।पर हमारी केंद्र सरकार यही काम दिल्ली में नहीं कर रही है।
 जहां सबसे ताकवर सरकार बसती है,उस महा नगर दिल्ली में सर्वाधिक प्रदूषण ! ?आश्चर्य होता है।
भीषण प्रदूषण के कारण दिल्ली के लोगों की आयु 7 साल कम हो गयी है।पटना का भी यही हाल है।
दिल्ली से कुछ लोग बाहर जा रहे हैं,पर प्रतिष्ठान व सरकारी दफ्तर यथावत हैं।क्यों भाई ?
अपनी ही अगली पीढि़यों की थोड़ी चिंता तो कर लो !
रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जमींदार परिवार के पास कलकत्ता में भी जमीन थी,पर उन्होंने वहां से 168 किलोमीटर दूर शांति निकेतन बसाया।      

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

 आतंकी तत्वों से हमदर्दी की आदत--सुरेंद्र किशोर
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   हाल में दिल्ली के जाफराबाद और उत्तर प्रदेश के अमरोहा से एनआइए ने एक मौलवी और इंजीनियरिंग छात्र सहित दस लोगों को देश के खिलाफ आतंकी साजिश रचने के आरोप में  गिरफ्तार किया। 
    उनकी योजना देश को दहलाने और कुछ हस्तियों को नुकसान पहुंचाने की थी।बताया जा रहा है कि ये लोग आइएस से प्रेरित थे।हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि अतीत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘सिमी’ के साथ इस देश के कुछ दलों और नेताओं का  स्नेह-समर्थन का  संबंध रहा है।
   संभवतः ऐसी ‘उर्वर भूमि’ देख-सुन कर ही अबु बकर अल बगदादी के समर्थकों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी हो।
नतीजतन यह मामला सामने आया।
पता नहीं, इस देश में अभी और कहां-कहां अमरोहा या जाफराबाद पल रहा है !
  देखा जाए तो  सिमी, खलीफा के शासन का पक्षधर था और बगदादी का आइ.एस. भी।
      1977 में अलीगढ़ में गठित छात्र संगठन सिमी अपने प्रेस इंटरव्यू में साफ-साफ कहता रहा कि हम हथियारों के बल पर इस देश में इस्लामिक शासन कायम करना चाहते हंै।ं
स्थापना के समय सिमी का संबंध जमात ए इस्लामी से था।
लेकिन  जब उसने  इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति का नारा दिया तो 1986 में जमात ए इस्लामी ने सिमी से अपना नाता तोड़ लिया।
इसके बावजूद कुछ तथाकथित सेक्यूलर दलों के बड़े नेतागण उसे छात्रों का निर्दोष संगठन बताने लगे। जब उस पर 2001 में प्रतिबंध लगा तो कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद सिमी के बचाव  में सुप्रीम कोर्ट में खड़े हो गए।खुर्शीद उस समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे।
     इसके अलवा बिहार,उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कई बड़े नेताओं ने भी खुलेआम सिमी का बचाव करते हुए कहा कि सिमी एक निर्दोष संगठन है।
2008 में दिल्ली हाईकोर्ट के ट्रिब्यूनल ने सिमी पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कर दिया तो सपा नेता मुलायम सिंह यादव और राजद नेता लालू प्रसाद ने ट्रिब्यूनल के निर्णय का स्वागत किया।लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निर्णय को रद कर दिया।उसके बाद भी लालू प्रसाद ने प्रतिबंध हटाने की वकालत की।
     मुलायम सिंह ने इसी तरह की मांग करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में सिमी ने कोई आतंकी कार्रवाई नहीं की है।पर सिमी की हिंसक और देशद्रोही करतूतों को ध्यान में रखते हुए पूर्ववर्ती केंद्र सरकार@कांग्रेसनीत सरकार@ ने सिमी पर से प्रतिबंध नहीं हटाया।
चूंकि हमारे यहां आतंकियों का खुलेआम समर्थन करने वालों के लिए किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है,इसलिए भी उन लोगों ने अपना काम जारी रखा है।  
यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी के नेतृत्व में भाजपा 
का शिष्टमंडल 19 अगस्त, 2008 को चुनाव आयोग दफ्तर गया था।
 शिष्टमंडल ने आयोग से मांग की थी कि सिमी जैसे चरमपंथी संगठन का पक्ष  लेने वाले राजनीतिक  दलों की मान्यता खत्म की जाए।परंतु यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी जैसे नेता आज चुप हैं क्योंकि अब वे भाजपा में नहीं हैं।
      इस देश में पार्टी बदल जाने पर देश की रक्षा के प्रति नेताओं की गंभीरता में भी फर्क आ जाता है।
 सिमी की पत्रिका ‘इस्लामिक मूवमेंट’@सितंबर 1999@ के  संपादकीय ने सेक्यूलर लोकतंत्र के बजाए जेहाद और शहादत की अपील की।
सिमी @अहमदाबाद@के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने एक अंग्रेजी अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया  @30 सितंबर 2001@से कहा था  कि ‘जब भी हम सत्ता में आएंगे ,हम मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बनाएंगे।’
 इसी तरह ‘सिमी-संघर्ष यात्रा के 25 वर्ष’ नामक पुस्तिका में सिमी ने लिखा था कि ‘राष्ट्रवाद खिलाफत में सबसे बड़ी बाधा है।’
       सिमी बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुसाहिल ने 20 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘कुरान हमारा संविधान है।हम भारतीय संविधान से बंधे हुए नहीं हैं।हम भारत सहित पूरी दुनिया में खलीफा का शासन चाहते हैं।’
    अहमदाबाद धमाके के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया कि सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं।उसके लिए एकमात्र रास्ता जिहाद है।
इसके बावजूद कांग्रेसी नेता डा.शकील अहमद ने कहा था कि गुजरात दंगे के विरोध स्वरूप इंडियन मुजाहिदीन यानी आइएम का गठन हुआ।
जबकि  हकीकत यह है कि अनेक हिंसक कारनामों की खबरों के बीच 2001 में जब केंद्र सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाया तो सिमी के नेताओं ने 2002 में इंडियन मुजाहिदीन बना लिया।
2002 के गुजरात दंगे से बहुत पहले सिमी एलान कर चुका था कि हमारा उद्देश्य हथियार के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करने का है।हमारे आदर्श ओसामा बिन लादेन हैं।माना जाता है कि आइ एम के मोस्ट वांटेड आतंकी अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ लादेन और उसके साथियों ने पाकिस्तान के पैसे के बल पर इंडियन मुजाहिदीन की जड़ें जमाईं।
    26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक साथ 21 बम विस्फोट हुए जिनमें 56 लोगों की जान गई थीं।
उस विस्फोट की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी।दरअसल सिमी के सदस्य ही आइ एम में सक्रिय हो गए थे।
यह तथ्य सिमी और इंडियन मुजाहिदीन की कार्यशैली को समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।फिर भी कुछ कथित सेक्युलर दलों के नेताओं ने सिमी से संबंध जारी रखा।
याद रहे कि 2012 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन डी.जी.पी.एन.मुखर्जी ने कहा था कि सिमी के जरिए आई.एस.आई.ने माओवादियों से तालमेल बना रखा है।
इसके अलावा हाल में  केरल पुलिस ने वहां के हाई कोर्ट को यह बताया है कि पोपुलर फं्रट आॅफ इंडिया, सिमी का ही नया रूप है।
 पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी जब गत वर्ष  पी.एफ.आई. से जुड़े महिला संगठन के कार्यक्रम में केरल गए थे,तो उस पर भारी विवाद हुआ था। 
इस पृष्ठभूमि में एनआइए की ओर से की गई गिरफ्तारी को देखना मौजूं होगा।
 दुख की बात है कि आइएस की बर्बरता की खबरें मिलते जाने पर भी राजनीतिक कारणों से कई दलोें में कोई खास चिंता नहीं देखी जा रही है।
तथाकथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी भी बेपरवाह हैं।कुछ तो इस पर एनआइए का मजाक उड़ाने के लिए सक्रिय हो गए कि उसने सुतली बम बरामद किए।
यह एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रदर्शित की जाने वाली घोर अगंभीरता ही है।
इस अगंभीरता से यही प्रकट हुआ कि अपने देश में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों को किस तरह संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत भी पनपने लगी है।
@ 3 जनवरी , 2019 के  दैनिक जागरण में प्रकाशित@ 

ललित नारायण मिश्र की आज पुण्य तिथि है।
 1975 में समस्ती पुर में उनकी हत्या कर दी गयी थी।
उनकी हत्या से संबंधित मुकदमा एक ऐसा नमूना मुकदमा है,जो शायद दुनिया के इतिहास में अकेला मामला है।
ललित बाबू जिस दल में थे,उसी दल की सरकार की सी.बी.आई.ने असली हत्यारे को बचा कर किसी और को कोर्ट से सजा दिलवा दी।
जिन्हें लोअर कोर्ट से सजा हुई है,उनके बारे में ललित बाबू ़के भाई डा.जगन्नाथ मिश्र व उनके पुत्र विजय कुमार मिश्र ने कोर्ट में कहा था कि इनसे ललित बाबू की कोई दुश्मनी नहीं थी।@2019@
  

बुधवार, 2 जनवरी 2019

एक ऐसी पेंशन योजना जिसमें बढ़ोत्तरी 
का कोई प्रावधान ही नहीं
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कर्मचारी पेंशन स्कीम, 1995 के तहत मुझे हर माह 1231 रुपए मिलते हैं।
यह राशि 2005 में तय हुई थी जिसमें आज तक कोई परिवत्र्तन नहीं हुआ।
हां, इसे उन लोगों के लिए न्यूनत्तम 1000 रुपए जरूर किया गया जिन्हें उससे भी कम मिलते थे।
संभवतः दुनिया का यह एक मात्र पेंशन स्कीम है जिसमें बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान ही नहीं है।
इस पेंशन के लिए हम कर्मचारियों ने भी अपने सेवाकाल में पेंशन फंड में हर माह आर्थिक योगदान किया है।
यदि योगदान के पैसे हमने सेवा निवृत्ति के समय ही उठा लिए होते तो हम फायदे में रहते या घाटे में ,मैं यह कह नहीं सकता।
 कर्मचारी भविष्य निधि पेंशनर्स संघर्ष समिति को 6 दिसंबर 2017 को केंद्रीय श्रम मंत्री ने आश्वासन दिया था कि न्यूनत्तम पेंशन हर माह 7500 रुपए कर देने की आपकी मांग को प्रधान मंत्री के सामने रखा जाएगा।
पर अब तक उस दिशा में क्या हुआ, यह पता नहीं चला।
कुछ माह पहले जदयू के हरिवंश ने भी यह मामला राज्य सभा में मजबूती से उठाया था।
श्रमजीवी पत्रकार सहित देश के गैर सरकारी क्षेत्र के कुल 60 लाख रिटायर कर्मचारी यह पेंशन उठाते हैं।इनमें से 40 लाख कर्मचारियों को हर माह 15 सौ रुपए से भी कम मिलते हैं।
   बिहार सरकार ने भी कुछ साल पहले पत्रकार पेंशन योजना  शुरू करने की घोषणा की थी।मैंने उसके लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि मैंने बिहार सरकार की कोई सेवा नहीं की है।मैं तो वहीं से बढ़ोत्तरी की मांग करूंगा जहां के पेंशन फंड में मेरा कुछ आर्थिक योगदान हुआ है।
हालांकि बिहार सरकार की पेंशन योजना को मैं गलत नहीं मानता।उससे पत्रकारों को भी राहत मिलती और सरकार को भी यश मिलता।
पर, पता नहीं क्यों वह घोषित योजना वर्षों बाद भी लागू नहीं हो सकी है।सरकारी काम ऐसे ही चलता है !
  अब पत्रकारों की स्थिति व उनका योगदान समझिए।
 आज का ही अखबार आप देख रहे हैं।हर दिन का अखबार तैयार करने के लिए पत्रकार अपनी पूरी प्रतिभा के साथ रात -दिन खटते हैं ।तभी आपके पढ़ने लायक  एक अखबार तैयार होता है ।जिस दिन अखबार नहीं मिलता ,उस दिन पाठकों की बेचैनी देखते बनती है।उन पाठकों में सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेता भी शामिल  हैं।
फिर भी श्रमजीवी पत्रकारों की ऐसी उपेक्षा ! ! 
क्योंकि वे रिटायर हो गए ?
 पेंशन में कोई बढ़ोत्तरी तक नहीं ?
कमाल की होती हैं हमारी सरकारें !
मैं तो स्वतंत्र लेखन करके अपने जरूरी खर्चे निकाल लेता हूंं।पर जिन रिटायर पत्रकारों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है या जो यह काम नहीं करना चाहते,उनकी आर्थिक स्थिति पर गौर कीजिए।
मेरा भी तब क्या होगा, जब हाथ-पांव-दिमाग सुस्त पड़ने लगेंगे ? 
   

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

दिनेश सिंह बिहार के समस्ती पुर जिले के मोहिउद्दीन नगर प्रखंड के चापर गांव के निवासी हैं।यह गांव गंगा नदी के पास है।
उन्होंने सूचित किया है कि चापर में पानी मंे आर्सेनिक की मात्रा बढती़ जा रही है।
जहरीला पानी पीने से लोग मर रहे हैं।
जिस  नलकूप की गहराई 150 फीट है,उसके पानी में भी आर्सेनिक है।लोग क्या करें कुछ समझ में नहीं आता।