सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

    
 विकास ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ के अनुसार 
या ‘‘आइडिया आॅफ भारत’’ के अनुसार ???
      --सुरेंद्र किशोर--
आजादी के तत्काल बाद ‘‘आइडिया आॅफ भारत’’ के अनुसार यदि देश को चलाया गया होता तो सरकारें उद्योगों की अपेक्षा कृषि पर अधिक ध्यान देती।
   यानी , तांगे के आगे घोड़ा होता, न कि घोड़े के आगे 
तांगा !!
    पर, तब के हुक्मरानों को तो देश को ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ के अनुसार चलाना था।
    चैधरी चरण सिंह का कहना था कि किसानों की आय बढ़ेगी तो ही छोटे -बड़े उद्योग बढ़ेंगे।
नहीं बढ़ेगी तो करखनिया माल के खरीदार कहां से आएंगे ?
अपवादों को छोड़कर निर्यात के लिए जरूरी गुणवत्ता की कमी रही है।
 यदि सफेदपोशों के लिए नौकरियों का इंतजाम पहले कर देना हो तब कोई चरण सिंह जैसों की बातों  पर ध्यान क्यों देगा ?
 आजादी के बाद सत्ताधीशों की सोच बनी कि लोक उपक्रमों का ही जाल पहले बिछाना होगा !
यही हुआ भी।
नेहरू सरकार की नीति थी कि अपने देश के कारखानों के माल विदेश में बिकेंगे और उन पैसों से विदेश से अनाज खरीदकर भारतीयों को खिलाया जाएगा।
  ंयह नीति विफल हो गई।
देश का समुचित विकास नहीं हो सका।
   हर स्तर पर भ्रष्टाचार ने कोढ़ में खाज का काम किया।
 देर से ही सही , अब खेती पर ध्यान दिया जा रहा है ।फिर भी  उतना नहीं, जितना दिया जाना चाहिए।
सरकार के पास साधनों की कमी है।
देर -सवेर कृषि आधारित उद्योगों का जाल देश में  बिछाना ही होगा।
  गांव से मजबूती से जुड़े बिहार चैंबर आॅफ कामर्स के पूर्व महा सचिव पशुपतिनाथ पांडेय ने ठीक ही कहा है कि गांवों के विकास पर विशेष फोकस का दूरगामी सकारात्मक असर होगा।   
--सुरेंद्र किशोर--3 फरवरी 2020

इस झूठ के बिना भी काम 
तो चल ही सकता है !
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   हमारे देश के अधिकतर नेता दो अवसरों पर खास कर सच नहीं बोलते।
एक प्रतिशत नेता ही सच बोलते हैं।
99 प्रतिशत नेता असत्य या फिर अर्ध सत्य बोलते हैं।
जाहिर है कि इससे नेताओं व राजनीति की साख खराब होती है।पर आज उसकी चिंता भला किसे है ?
एक अवसर होता है -बजट।
बजट पर प्रतिक्रियाओं को देख-पढ़ लीजिए ।
सत्ता पक्ष के लिए सब कुछ हरा ही हरा होता है।
तो ,प्रतिपक्ष के लिए कुछ भी सही नहीं होता ।
सच्चाई कहीं बीच में होती है।
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दूसरा अवसर--मतदान और मतदान की गणना के बीच का समय।
जो नेता मन ही मन अच्छी तरह जानता है कि वह या उसका दल  हार रहा  है,फिर भी वह कहता है कि हम ही जीत रहे हैं।इतना पर भी नहीं रुकता।
चार असभ्य बातें मीडिया और एक्जिट पोल सर्वेक्षण करने वालों के खिलाफ भी बोल जाता है।
एक बात मीडिया को लेकर भी
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पुराने दिनों के कुछ संपादक बताते थे कि ‘‘घाटे का बजट’’ कभी मत लिखो।
‘‘कमी का बजट’’ लिखो ।
 क्योंकि सरकार कोई व्यापारी तो है नहीं !!
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--सुरेंद्र किशोर 
2 फरवरी 2020    

   साठोत्तरी राजनीति पर मुझसे बेहतर संस्मरण
   शिवानंद तिवारी ही लिख सकते हैं।
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      -- सुरेंद्र किशोर--
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 बिहार की साठोत्तरी राजनीति पर मुझसे बेहतर संस्मरण एक ही व्यक्ति लिख सकते हैं।
उनका नाम है-शिवानंद तिवारी।
उन्होंने लिखने का वादा भी किया है।
पर शायद उनसे संभव नहीं हो पाएगा !
अब तो वे ‘‘शाहीन बाग’’ में लग गए।
वह कहते हैं कि यह लंबा चलेगा।
वैसी लड़ाई में शिवानंद भाई का मन भी अधिक लगता है।
इसलिए लगता है कि मेरे लिए मैदान साफ है।
फिर भी यदि शिवानंद जी लिखें तो उनकी किताब में मेरी अपेक्षा अधिक जानकारियां होंगी।
उनमें मुझसे अधिक हिम्मत भी है।
  मैंने संस्मरणों वाली अपनी प्रस्तावित किताब की तैयारी में संदर्भ सामग्री पलटने का काम शुरू भी कर दिया है।
मेरे पास 50-55 साल से जतन से तिनका- तिनका एकत्र किया हुआ राॅ मेटेरियल्स का पहाड़  है।
मैं ऐसी एक पंक्ति भी नहीं लिखना चाहता जिसका मेरे पास सबूत या संदर्भ न हो।
   देखने के सिलसिले में कल मुझे एक खास बात से संबंधित सामग्री मिली।
वह बात है-लालू प्रसाद ने किस तरह मेरी जान बचाई।
और, मैंने एक अन्य अवसर पर किस तरह लालू प्रसाद की जान बचाई।
हम दोनों पर गंभीर खतरा था।
  होगी न पठनीय मेरी संस्मरणात्मक किताब ! ?
लालू प्रसाद और मैं दो धु्रव हैं।
हममें लव और हेट का संबंध है।
 पर कुछ  बातें समाज की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भी हैं।
मेरा मानना है कि मंडल आरक्षण के पक्ष में मजबूती से खड़ा होकर लालू प्रसाद ने युगांतरकारी काम किया।
समाज को बदल दिया।यह काम सिर्फ वही कर सकते थे।
कर्पूरी ठाकुर जी नरम पड़ गए थे।
बाकी तो जो -जो काम लालू ने किए,उसका फल तो 
वे भोग ही रहे हैं।
उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं।
समाजवादी मित्र की हैसियत से मैंने तो लिख- लिख कर उन्हें तब चेताया था।वह मुझसे उम्र में भी छोटे हैं।
  पहले मेरे बारे में उनकी राय बहुत खराब थी।
उनकी नजर में मंै एक ‘‘राजपूत पत्रकार’’ के अलावा कुछ नहीं था।
उन्होंने मुुझे अखबार से निकलवाने व बदली करवाने की बड़ी कोशिश की।
पर हाल में एक अत्यंत विश्वसनीय व्यक्ति ने रांची से लौटकर  मुझे बताया कि वे अब मेरे बहुत बड़े प्रशंसक हो गए हैं।
  यह भी बता दूं कि 1969 में समाजवादी युवजन सभा की बिहार शाखा के निर्वाचित --मनोनीत नहीं--तीन संयुक्त सचिवों में मैं और लालू प्रसाद थे।
शिवानंद तिवारी सचिव चुने गए थे।
वे हमारे नेता थे।
वैसे इन सब बातों का कोई खास मतलब नहीं है।
मतलब यह है कि सार्वजनिक जीवन में समाज के लिए किसने कितना किया,नहीं किया,यह सब अगली पीढि़यों को भी जानना चाहिए।
ताकि, अपने- अपने ढंग से लोग सबक ले सकें।
  इतिहास व संस्मरण लिखने में हमारे देश के लोग बड़े कंजूस होते हैं।
कई लोगों ने तो लिखा कम, छिपाया ही अधिक।
उसका खामियाजा आज भी देश भुगत रहा है।
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--सुरेंद्र किशोर --3 फरवरी ,2020

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

   पहले शब्द बेधी वाण
अब शब्द बेधी रिवाल्वर
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पृथ्वीराज चैहान पर फिल्म बन रही हैं
 कई अन्य कारणों से भी पृथ्वीराज चैहान इन दिनों चर्चा में हैं।
  शब्दबेधी वाण उनकी कहानी का महत्वपूर्ण तत्व  है।
कई लोग सोचते होंगे कि क्या यह संभव है ?
लगता है कि संभव है।
धनबाद के एक पुलिस अफसर ने मुझे अस्सी के दशक में बताया था कि एक माफिया शूटर पिस्तौल शब्दबेधी वाण की तर्ज पर चलाता है।
  उस शूटर रघुनाथ सिंह पर मशहूर मजदूर नेता बी.पी.सिन्हा की हत्या का आरोप था।
रघुनाथ से उन दिनों मैंने जनसत्ता के लिए लंबी बातचीत की थी। 
वह बातचीत मेरे ब्लाॅग पर उपलब्ध है।
बातचीत में उसने कई सनसनीखेज घटनाओं के अलावा इस बात की भी पुष्टि की थी।
  वह जब इंटरव्यू देने मेरे घर आया था तो उसके पास एक सिक्सर और एक ग्रेनेड था।
  मैं तो थोड़ा घबरा गया था।
 पर उसने कहा कि एक भीड़ को रोक देने के लिए मेरे पास पर्याप्त हथियार रहता है।  
--सुरेंद्र किशोर -  2 फरवरी 2020

नए ढंग के आंदोलन पर कैसा है लोगों का मन -मिजाज ?
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खबर है कि सरजमीन से जुड़ी हुई एक क्षेत्रीय सेक्युलर पार्टी के नेता लोग अब सीएए विरोधी आंदोलन में पहले जैसे उत्साह से बढ़ -चढ़कर शामिल नहीं होंगे।
  क्योंकि उन्हें  गांवों से अपनी कतार के एक हिस्से से भी यह खबर मिल रही है कि
यह आंदोलन इस्लामिक एजेंडा वाला है और इस्लामिक नारों के साथ चल रहा  है।
  वैसे मेरा मानना है कि दिल्ली विधान सभा के जो चुनाव क्षेत्र ग्रामीण इलाके में पड़ते हैं,वहां के नतीजों से देश के राजनीतिक मन-मिजाज का कुछ पता चलेगा।
दिल्ली के शहरी क्षेत्रों के आम लोगों के बीच में केजरीवाल सरकार ने काम किए हैं,ऐसा
एक से अधिक लोग कह रहे हैं।
...सुरेंद्र किशोर 
1 फरवरी 20


जामिया-शाहीन बाग की फायरिंग प्रति-उत्पादक !!
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कन्हैया कुमार के काफिले पर सारण में हुआ हमला निन्दनीय है।
उसी तरह जामिया के बाद शाहीन बाग की फायरिंग भी निन्दनीय है।
साथ ही, इन दोनों घटनाओं में शामिल लोग दण्डनीय भी हंै।
  मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूं कि कन्हैया कुमार-जामिया-शाहीन अभियान प्रशंसनीय है।
  इसलिए कह रहा हूं कि जो व्यक्ति कन्हैया कुमार के काफिले पर हमले और जामिया-शाहीन  फायरिंग की निन्दा नहीं करता,उसे मुंह रूमाल बांध कर पत्थरबाजी करने वालों की निन्दा करने का भी कोई नैतिक हक नहीं है।
‘‘देश के खिलाफ काम करने वालों से’’ पुलिस-प्रशासन-सेना-न्यायालय को ही निपटने दीजिए।
  वे सक्षम हैं।
  कन्हैया जैसे लोगों पर हमला करके आप उनके प्रति कुछ वैसे लोगों में भी सहानुभूति पैदा होने का अवसर देंगे जिनकी अभी सहानुभति नहीं है।वैसे कन्हैया के समर्थकों की भी कमी नहीं है।
  अनेक लोगों की सहानुभूति इसलिए भी नहीं है क्योंकि उन लोगों पर जो आरोप हंै,उससे संबंधित मुकदमें में अभियोजन चलाने की अनुमति केजरीवाल सरकार नहीं दे रही है।
  अरे भई,यदि आपने कोई कसूर नहीं किया है तो अदालतों का सामना करने से क्यों भाग रहे हैं ?
 यहां तो तीन स्तरीय अदालतें हैं।
हर स्तर पर अन्याय ही हो जाएगा,ऐसा मानना सही नहीं ं।
--सुरेंद्र किशोर-2 फरवरी 2020

   
  

नाम गुम जाएगा,
चेहरा ये बदल जाएगा,
मेरी आवाज ही पहचान है !!
   ---बी बी सी 
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   --सुरेंद्र किशोर-- 
बी. बी. सी. हिन्दी रेडियो सेवा बंद कर दी गई।
80 साल पहले शुरू की गई थी।
कभी के मेरे सर्वाधिक प्रिय मीडिया संगठन का
अवसान मुझे बहुत खराब लगा।
हालांकि हाल के वर्षों में मैं उसे सुन नहीं पा रहा था।
   कुछ साल तक समाचार विश्लेषण का अवसर बी.बी.
सी.रेडियो ने मुझे भी दिया था।
अच्छे पैसे भी मिले थे।
   इसके बंद होने के कारणों की पड़ताल जरूर होनी चाहिए ताकि अन्य मीडिया संगठन उसकी रपट से लाभ उठा सकें।
 नब्बे के दशक में मैंने पटना के दैनिक ‘इंडियन नेशन’ में सिंगापुर डेटलाइन से बीबीसी. के उप प्रधान की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी पढ़ी थी।
 उनसे पूछा गया था कि बी.बी.सी. की साख का राज 
क्या है ?
उन्होंने बताया कि 
‘‘यदि दुनिया के किसी देश में कम्युनिज्म आ रहा है तो हम यह सूचना लोगों को देते हैं कि आ रहा है।
उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।
दूसरी ओर, यदि किसी देश से कम्युनिज्म जा रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि जा रहा है।
हम उसे बचाने की भी कोशिश नहीं करते।
 यही हमारी साख का राज है।’’
   क्या बी बी सी इस बीच अपने उस ध्येय से अलग 
हो चुका था ?
या, क्या कोई आर्थिक कारण रहा ?
या, यह आरोप सही है कि मोदी सरकार ने बंद करवा दिया ? ,ऐसा  आरोप सोशल मीडिया में इन दिनों  लगाया भी जा
 रहा है।
क्या यह आरोप सही है कि बीबीसी रेडियो नकारात्मक हो गया था ?
या, फिर कोई अन्य कारण रहा जिसे दूर करना  न तो व्यवस्था के वश में था और न संपादकीय विभाग के ं ?
 एक समय के सर्वाधिक साख वाले इस मीडिया का तिरोहित होना  पूरे मीडिया जगत के लिए भी कोई अच्छी बात नहीं है।
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1 फरवरी 2020