मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

निकलने लगीं हैं ढकी-छुपी बातें
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एक ताजा किताब से यह बात सामने आई कि जवाहर लाल नेहरू अपने प्रथम मंत्रिमंडल में सरदार पटेल को शामिल करने के पक्ष में ही नहीं थे।
  इससे पहले भी बारी -बारी से कई ढकी-छुपी बातें सामने आती रही हैं।
रामचंद्र गुहा सहित अनेक  लेखकों  ने लिखा कि इंदिरा गांधी को राजनीति में आगे बढ़ाने में नेहरू का कोई हाथ नहीं था।
पर जब महावीर त्यागी-जवाहरलाल नेहरू पत्र -व्यवहार सामने आया तो सच्चाई का पता चल गया।
  नेहरू ने 1 फरवरी, 1959 को  त्यागी को लिखा था कि ‘‘इस वक्त उसका कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है।’’
  मोतीलाल पेपर्स के अनुसार मोतीलाल नेहरू ने अपने बाद 1929 में जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए गांधी को तीन चिट्ठियां लिखीं।
पहले दो चिट्ठियों पर गांधी राजी नहीं हुए थे।
तीसरी पर मान गए।
 अब कांग्रेस की आज की दयनीय स्थिति पर नजर डालिए।
पचास-साठ के दशकों की कांग्रेस से उसकी तुलना कीजिए।
उसकी अवनति में वंशवाद का कितना योगदान है ?
किसी नेता के योग्य पुत्र को पद देना बुरा नहीं है।
पर किसी वंश में यह परंपरा ही डाल दी जाए कि योग्य हो या न हो, उसी वंश का व्यक्ति प्रधान बनेगा तो उसका खामियाजा भी भुगतना ही पड़ेगा।
  स्थानीय कारणों से कांग्रेस भले कुछ राज्यों में चुनाव जीत जाए, पर राष्ट्रीय स्तर उसका कोई हस्तक्षेप बचा भी है ?
   बातें छुपाने का एक प्रयास कुछ साल पहले भी हुआ था।
वामपंथी लेखक की एक किताब आई जिसमें लिखा गया कि इस देश की राजनीति में वंशवाद की परंपरा सिंधिया परिवार ने डाली।
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---सुरेंद्र किशोर--11 फरवरी 2020

कई नेहरू भक्त इन दिनों यह लगातार लिख रहे हैं कि नेहरू का पटेल से बहुत अच्छा संबंध था।
  उनक पास इस बात का क्या जवाब है कि नेहरू पटेल को अपने मंत्रिमंडल से भी दूर रखना चाहते थे ?
   गांधी जी ने 20 अप्रैल 1946 को ही यह साफ कर दिया था कि जवाहर लाल प्रधान मंत्री होंगे।
इसके बावजूद 29 अप्रैल को 15 में से 12 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पटेल के पक्ष में राय भेजी।
तय था कि कांगेस अध्यक्ष को ही सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
   गांधी ने पटेल से कहा कि आप अपना दावा छोड़ दीजिए।
उन्होंने छोड़ दिया।
गांधी ने जवाहर लाल को अध्यक्ष बनवा दिया।
गवर्नर जनरल ने उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया।  
यही लोकतंत्र था गांधी-नेहरू का !!!
सुरेंद्र किशोर--11 फरवरी 2020 

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

   अमेरिका,चीन ,जर्मनी और जापान कौन कहे,यहां तक 
कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगला देश में भी
नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता कार्ड का 
प्रावधान  है।
लोगों को दिए गए हैं।
  पर, भारत में कुछ लोगों को एन.आर.सी. किसी भी कीमत पर मंजूर  नहीं  है !!
क्यों भाई ?
इसलिए कि एन. आर. सी. विरोधी मुसलमानों के लिए भारत कोई देश नहीं, बल्कि मात्र धर्मशाला है।
इस देश में जनसंाख्यिकी बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है।
जब प्रक्रिया पूरी हो जाएगी
 तो फिर यहां भी एन.आर.सी.बन जाएगा।
इधर इस देश के नकली सेक्युलर दलों के लिए देश से अधिक महत्वपूर्ण वोट बैंक है।
--सुरेंद्र किशोर --9 फरवरी 2020
  

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

अपनी बागवानी की यह कहानी मैं लिखने ही वाला था कि अमित ने बाजी मार ली।
यानी ,बेटा बाप से आगे निकल गया।
अच्छा ही हुआ।
पर, इस मामले में  सबसे आगे तो मेरी पोती रही।
 वह महत्वपूर्ण बात अमित उर्फ गुड्डन से छूट ही गई।
 इस फल का नामकरण भी हो चुका है।
  यू.के.जी. में पढ़ रही गुड््न की बेटी आद्या से एक दिन मैंने पूछा कि यह तो अजीब फल है।इसमें नींबू और संतरा दोनों के गुण हैं।
  इसका क्या नाम रखा जाए ?
उसने एक क्षण देर किए कह दिया-
-‘नीसंत !!’
यानी नींबू प्लस संतरा।



    सूचना के अधिकार का इस्तेमाल आप भी करें
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समाज सेवी राघवेंद्र नारायण सिंह उर्फ आर.एन.सिंह ने आर.टी.आई. के जरिए इस इलाके के संबंध मंें एक महत्वपूर्ण जानकारी गत माह सोन नहर प्रमंडल से  हासिल की है।
  यह प्रमंडल बिहार सरकार के सिंचाई विभाग के तहत पड़ता  है।
  बिहार के पटना जिले के फुलवारीशरीफ अंचल 
के सुन्दर नगर ,कोरजी मोहम्मद पुर निवासी श्री सिंह को बताया गया है कि जमालुद्दीन चक से नकटी भवानी सड़क के निर्माण कार्य का स्पेशिफिकेशन यानी पूर्ण विवरण क्या है।
याद रहे कि इसी इलाके में पास में ही पटना एम्स अवस्थित है।
   सिंचाई विभाग के सोन नहर प्रमंडल,खगौल  के अंतर्गत स्थित साढ़े तीन किलोमीटर लंबी इस सड़क के निर्माण का टेंडर प्रक्रिया में है।
इस पर लगभग लगभग 4 करोड़ 79 लाख रुपए खर्च आने कव अनुमान है।
 गत 21 जनवरी, 2020 को श्री सिंंह को लिखी चिट्ठी में कार्यपालक अभियंता ने सूचित किया है कि फरवरी -मार्च में निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।
   ई.अनिल कुमार शर्मा के अनुसार स्पेशिफिकेशन का विवरण इस प्रकार है--
 जी.एस.बी.- 365 एम एम 
डब्ल्यू एम एम -225 एम एम 
डी बी एम -50 एमएम 
एस.डी.बी.सी.-25 एम एम
  इस तरह राघवेंद्र नारायण सिंह के प्रयास से इस महत्वपूर्ण सड़क के पुनर्निर्माण से संबंधित अनिश्चितता अब दूर हो गई है।
 एक पत्रकार के इलाकावासी  होने के कारण यहां के लोगबाग अक्सर  इस सड़क की लगातार दुर्दशा और भारी मरम्मत में देरी का कारण मुझसे पूछते रहते थे।
  राघवेंद्र जी के सहयोग से उन लोगों की जिज्ञासा का जवाब अब मिल गया है।
  सूचना का अधिकार कानून यानी आर.टी.आई.आम लोगों के लिए एक अच्छा साधन है ।
उसी के इस्तेमाल से यह संभव हुआ है।
अब यहां के लोगों की इच्छा है कि यह सड़क जब भी बने मजबूत बने।
क्योंकि यह छोटी जरूर है,पर दो एन.एच.को आपस में 
जोड़ती  है।
मरीजों को एम्स तक पहुंचने के लिए यह भी प्रमुख फीडर रोड  है।
--सुरेंद्र किशोर--7 फरवरी 2020



शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

पाक से लौट कर सबक दे गए सज्जाद 
जहीर और जोगेंद्र नाथ मंडल !
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यदि  सीखना चाहते हों 
तो अब भी समय है !!
हालांकि अब समय काफी कम है।
 --सुरेंद्र किशोर--
जो कुछ बातें आजादी के बाद हमसे भरसक छिपाई गई हैं,उनमें जोगेंद्र नाथ मंडल और सज्जाद जहीर की कहानियां भी शामिल हैं।
दैनिक जागरण को धन्यवाद कि आज उसने नई पीढ़ी को अपने देश की भाषा में मंडल की कहानी लिख ही दी।
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  सज्जाद जहीर की संक्षिप्त  कहानी 
इसी के साथ मेरी ओर से पेश है 
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पाक के पहले कानून मंंत्री 
जिन्हें लौटना पड़ा था भारत
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भारत-पाकिस्तान  का विभाजन बीती बात हो चुकी है।
लेकिन तुलनात्मक रूप से देखें तो पाकिस्तान आज भारत से पीछे है।
यह कुंठा पाकिस्तानी राजनेताओं के बयानों और आतंकी कार्रवाइयों के जरिए समझ में  भी आती है।
  पाकिस्तान ने लोगों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और फिर उन्हें छोड़ दिया। 
चाहे फिर वो पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल ही क्यों न हो।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब देते हुए अपने संबोधन में जोगेंद्र नाथ मंडल का जिक्र किया।
जिज्ञासा जरूर पनपती है कि कैसे एक दलित शख्स पाकिस्तान कव पहला कानून मंत्री बना और फिर कैसे उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा।
 शुरुआती जीवन
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जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म 29 जनवरी, 1904 को नामसुंद्रा दलित समाज में अविभाजित बंगाल में हुआ था।
शुरुआती जीवन में उन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ा।
उनका राजनीतिक जीवन बंगाल में अनुसूचित जातियों के नेता के रूप में शुरू हुआ।
वे 1937 में बंगाल विधान सभा के लिए चुने गए।
बाद में मंत्री बने।
हालांकि कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद वे मुस्लिम लीग से जुड़े।
  पाकिस्तान में योगदान
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जोगेंद्र नाथ मंडल उन प्रमुख व्यक्तियों में थे जिन पर मुहम्मद अली जिन्ना को काफी विश्वास था।
 वे उन प्रमुख व्यक्तियों में एक थे जिन्होंने पाकिस्तान को आधुनिक व विकसित करने का ख्वाब देखा था।
वे पाकिस्तान के पहले कानून अैर श्रम मंत्री रहेे।
 साथ ही वे राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों के दूसरे मंत्री थे।
लीग के लिए उनका समर्थन इस विश्वास से उपजा था कि भारत में जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी की तुलना में जिन्ना के धर्म निरपेक्ष पाकिस्तान में दलित हित को बेहतर रूप में संरक्षित किया जाएगा।
 विभाजन के बाद वे 1947 में पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बने।
 ऐसे बिगड़ी बात
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मुस्लिम बहुल देश में मंडल को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
खास तौर पर 1948 में जिन्ना की मौत के बाद।
मार्च 1949 में मंडल ने एक विावदास्पद प्रस्ताव का समर्थन किया।
जिसमें पाकिस्तान के लिए कई सिद्धांत थे।
जिनमें ब्रह्मांड पर अल्लाह की सम्प्रभुता,लोकतंत्र के सिद्धांत ,स्वतंत्रता सभी को इस्लाम के अनुसार देखा गया।
 छोड़ दिया पाकिस्तान
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पाकिस्तान बननने के बाद ही गैर मुस्लिमों के हालात लगातार बिगड़ने लगे।
मंडल ने इसके खिलाफ आवाज उठाई।
जवाब में उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा।
उन्होंने लियाकत अली मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
8 अक्तूबर 1950 को भारत लौट आए।
 इस्तीफे में लिखा यह
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मंडल ने अपने इस्तीफे में लिखा कि पाकिस्तान में दलितों के खिलाफ अत्याचार बढ़ गए हैं।
कोई सुनवाई नहीं है।
हत्या-अत्याचार आम है।
इसमें उन्होंने हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों का जिक्र किया।
कहा कि बलपूर्वक इस्लाम में परिवत्र्तन किया जा रहा है।
5 अक्तूबर, 1968 को मंडल  का निधन हो गया।
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अब कम्युनिस्ट नेता
सज्जाद की कहानी
साम्यवाद का प्रचार करने के लिए 
पाक में जा बसे थे।
निराश होकर लौटने के लिए नेहरू की मदद लेनी पड़ी।
उससे पहले वे वहां के जेल में भी रहे।
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पाक से लौटना पड़ा था सज्जाद जहीर को
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सज्जाद जहीर उत्तर प्रदेश के एक अच्छे खानदान से आते थे।
उनके पिता न्यायाधीश थे।
फिर भी उन्होंने संघर्ष का जीवन अपनाया।
आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
कम्युनिस्ट बने।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।
भारत के बंटवारे के बाद सी.पी.आई.ने इस प्रमुख कम्युनिस्ट नेता सज्जाद जहीर को पाकिस्तान भेजा ताकि वहां बेहतर ढंग से पार्टी का काम हो सके।
  पर, वहां जाकर जहीर को निराशा हुई।
वहां उनके काम करने का कोई माहौल ही नहीं था।
उन्हें 1951 में पाक सरकार ने जेल में डाल दिया।
  किसी तरह छूटे और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की मदद से 1954 में भारत लौट आए।
 1973 में उनका निधन हो गया।
याद रहे कि फिल्म अभिनेता राज बब्बर की पहली शादी सज्जाद जहीर की  बेटी नादिरा से हुई। 
यानी नादिरा का जन्म एक ऐसे सेक्युलर व प्रगतिशील माहौल में हुआ था कि उन्हें राज बब्बर से शादी करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
ऐसे सेक्युलर नेता की पाकिस्तान में भला क्या जरूरत !!
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कहां शिष्ट पंडित नेहरू और 
कहां अगिनखोर राहुल !!
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 कहां जवाहरलाल नेहरू जैसे शिष्ट नेता और कहां 
राहुल गांधी नामक उनका वंशज !!
राहुल गांधी ने इस बुधवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है,वैसा अब तक किसी शीर्ष नेता ने दूसरे शीर्ष नेता के खिलाफ नहीं किया है।
 ऐसे में एक बात याद आ गई।
 बात तब की है जब पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधान मंत्री थे।
बिहार के एक मनबढू सांसद ने संसद में जे.बी.कृपलानी को सी.आई.ए.का एजेंट कह दिया।
यह उस समय सबसे बड़ी राजनीतिक गाली मानी जाती थी।
यह सुनकर देशभक्त कृपलानी बीमार पड़ गए।
उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
  प्रधान मंत्री उन्हें देखने अस्पताल गए।
लौटकर उन्होंने उस तमीज हीन सांसद को बुला भेजा।
बुलावे पर युवा सांसद बड़ा खुश हुआ।
उसे लगा कि अब तो मेरा मंत्री पद पक्का !
 याद रहे कि कृपलानी प्रधान मंत्री की तीखी आलोचना
किया करते थे।
यानी उस सांसद ने सोचा कि शायद सीधे प्रधान मंत्री आवास से राष्ट्रपति भवन जाना है !
वह अच्छी पोशाक में सज -धज कर तीनमूत्र्ति भवन पहुंचा।
पर वह आज का जमाना तो था नहीं कि नेता को ‘‘एलसेशिएन’’ 
पालने की जरूरत थी।
आज तो लगभग हर दल के नेताओं को उसकी जरूरत पड़ती है।यह परंपरा ‘इंदिरा युग’ में शुरू हुई।
हां, तब जवाहरलाल जी बड़े आईने के सामने खड़ा होकर उस समय दाढ़ी बना रहे थे।
शीशे में ही उन्होंने जैसे ही उस सांसद को देखा,वे तेजी से पलटे ।
और लगे डांटने उस सांसद को।
बाद में वह सांसद कई महीनों तक प्रधान मंत्री के आमने- सामने  होने से बचता रहा।
  यह कहानी तब के सांसद व बाद के मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह ने मुझे सुनाई थी।
  अब इस पृष्ठभूमि में राहुल गांधी को देखिए।
राहुल ने एक रैली में कहा कि 
‘‘ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, 6 महीने बाद घर से बाहर नहीं निकल पाएगा।
हिन्दुस्तान के युवा इसे डंडा मारेंगे।’’
राहुल  पहले भी चैकीदार चोर है जैसी  भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं।
ऐसी भाषा सुनकर किसी को यह लग सकता है कि  मोदी से राहुल का कोई व्यक्तिगत झगड़ा है।
जमीन या संपत्ति का झगड़ा है।
  किसी ने कहा कि ‘‘झगड़ा है न !
जब किसी की अरबों रुपए की संपत्ति  मुकदमे में फंस जाएगी और डा.स्वामी से कोई राहत भी प्रधान मंत्री उसे न दिलाएंगे तो फिर कैसी बोली निकलेगी ?
जल्द फिर से सत्ता मिलने की उम्मीद भी रहती तो जुबान से ऐसी आग नहीं निकलती जो परलोक में पंडित नेहरू को शर्मिंदा करती होगी !!’’
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--सुरेंद्र किशोर--7 फरवरी 2020