मंगलवार, 9 मार्च 2021

    उनके बयान की बात कौन 

   कहे, इमरजेंसी में जेपी के कहीं 

   आने -जाने की खबर भी नहीं 

   छपने दी जाती थी

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    --सुरेंद्र किशोर--

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16 जुलाई, 1976 को भारत सरकार ने इस देश के अखबारों को यह निदेश दिया था कि 

‘‘जयप्रकाश नारयण के कहीं आने-जाने से संबंधित कोई समाचार न छापा जाए।’’

  आज कुछ लोग कह रहे हंै कि इस देश में इमरजेंसी (1975-77) जैसे हालात हैं।

क्या आज केंद्र सरकार ऐसा कोई आदेश मीडिया

को दे रही है ?

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8 मार्च 21

   


1975-77 के आपातकाल में देश भर के 253 पत्रकार भी हुए थे गिरफ्तार-सुरेंद्र किशोर

 


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  जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 का बिहार आंदोलन  मार्च में ही शुरू हुआ था।

  बाद में वह देशव्यापी हुआ।

अंततः 1975 के जून में देश में आपातकाल लगा।

आपातकाल मार्च, 1977 तक रहा।

आपातकाल कितना दमनकारी व भयावह था ?

उसका अनुमान इस बात से लगाइए।

 उस दौरान करीब सवा लाख राजनीतिक नेताओं व कार्यकत्र्ताओं के अलावा देश भर के 253 पत्रकार भी गिरफ्तार व नजरबंद हुए थे।

उन्हें आंतरिक सुरक्षा कानून(मीसा) व भारत रक्षा कानून (डी.आइ.आर.)के तहत पकड़ा गया था।

   यानी, तब की केंद्र सरकार ने 253 पत्रकारों को भी देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक माना था।

   इन दिनों अक्सर यह कह दिया जाता है कि देश में अब इमर्जेंसी जैसे हालात हैं।

क्या कभी 19 महीने की कालावधि में किसी सरकार ने करीब 253 पत्रकारों को गिरफ्तार किया है ?

कभी नहीं।

  सन 1975-77 के आपातकाल में सरकार ने न सिर्फ सवा लाख नेताओं व राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को ,बल्कि 253 पत्रकारों को भी जेलों में ठूंस दिया, उन्हें अदालत जाने से भी वंचित कर दिया था।

  इतना ही नहीं,देश के 50 पत्रकारों की सरकारी मान्यता भी रद कर दी गई थी।उनमें कई नामी -गिरामी पत्रकार व कार्टूनिस्ट थे।

 18 पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद करा दिया गया था।

कुछ नेता लोग आज जब यह कहते हैं कि देश में आपातकाल जैस स्थिति है तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि दमन के उपर्युक्त संक्षिप्त आंकड़ों पर आपकी क्या राय है ?

याद रहे कि इमर्जेंसी का दमन इससे अधिक व्यापक था। 

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    आपातकाल के पीड़ितों 

    की पेंशन बंद क्यों ?

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राहुल गांधी ने कहा है कि 1975 में देश में इमर्जेंसी लगाना गलत था।ठीक ही कहा है।

क्योंकि सन 1977 के चुनाव में आम जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर करके इमर्जेंसी को गलत साबित कर भी दिया था।

याद रहे कि इमर्जेंसी के दौरान हजारों निर्दोष लोगों को जेलों में ठूंस कर कांग्रेस सरकार ने उनके साथ नाहक अत्याचार किया था।

बाद में कई गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों ने पीड़ितों के लिए लोकतंत्र सेनानी -जेपी सेनानी पेंशन का प्रावधान किया।

पर मध्य प्रदेश ,महाराष्ट्र और राजस्थान की कांग्रेसी सरकारों ने बारी बारी से उस पेंशन को बंद कर दिया।

  यदि राहुल गांधी सचमुच यह मानते हैं कि इमर्जेंसी लगाना गलत था तो वे उस पेंशन को फिर से शुरू करवाएं।

वे तत्काल राजस्थान और महाराष्ट्र सरकारों से कहें कि वे लोकतंत्र सेनानी पेंशन फिर से शुरू करें।

यदि राहुल गांधी ऐसा नहीं करते हैं तो यह माना जाएगा कि इमर्जेंसी को लेकर उनका ताजा बयान मात्र दिखावा है।  

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 सरकारी योजनाओं की जानकारी 

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भारत सरकार की 115 योजनाएं हैं।

वे विकास और कल्याण आदि की योजनाएं हैं।

इनमें से कुछ योजनाओं के नाम तो बहुत चर्चित हैं।

उनके नाम अधिकतर लोगों को मालूम भी हैं।

उन पर हो रहे खर्चे भी नजर आते रहते हैं।

पर क्या आम लोगों को उन सारी 115 योजनाओं के बारे में पता है ?शायद नहीं।

  इसी तरह राज्य सरकारों की भी अनेक योजनाएं हैं।

उनमें से कुछ के बारे में लोग जानते हैं।पर यहां भी वही हाल है।अन्य अनेक योजनाओं के बारे में अधिकतर लोगों को कुछ नहीं मालूम।

  दोनों सरकारों की इन सारी योजनाओं के बारे में लोगों को पता हो जाए तो इनके कार्यान्वयन की स्थिति के बारे में लोग पता कर लेंगे।

  सूचना में बड़ी शक्ति होती है। 

उस शक्ति का लाभ अततः लोगों को ही मिलेगा।

सरकारों का यह कत्र्तव्य है कि अपनी योजनाओं के बारे में लोगों को बताए।

 समाज में ऐसे जागरूक लोग अब भी मौजूद हैं जो वैसी योजनाओं के लाभ लोगों तक पहुंचाने में सरकार की मदद कर सकते हैं जो सिर्फ कागजों पर हैं।

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   प्रशासन में नई प्रतिभाएं

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  केंद्र सरकार  संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर निजी क्षेत्रों  से आमंत्रित कर विशेषज्ञों व नई प्रतिभाओं को बहाल करा रही है।

चयन का काम यू.पी.एस.सी. के जरिए ही हो रहा है।

ऐसी बहुत सारी बहालियां हो चुकी हैं।

निजी क्षेत्रों के अफसरों में आम तौर अपने कत्र्तव्यों के प्रति अधिक निष्ठा देखी जाती है।संविदा पर रहने के कारण भी उनमें सक्रियता की कभी कमी नहीं होती।

इससे आई.ए.एस.-आई.पी.एस.की कमी की समस्या भी कम हो रही है।

इसे ‘‘लेटरल इंट्री’’ कहा जा रहा है।

बिहार सहित दूसरे राज्यों में भी केंद्रीय सेवा के अफसरों की भारी कमी है।

इससे सरकारी काम-काज पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

  केंद्र सरकार को चाहिए कि वह लेटरल इंट्री के जरिए राज्यों में भी अफसरों की कमी को भी पूरा करे।

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 डूबते जहाज से भागते चूहे 

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जहाज डूबने लगता है तो चूहे भी भाग खड़े होते हैं।

उसी तरह जिस राजनीतिक दल में सत्ता पाने की ताकत नहीं रह जाती,उसके सत्ताकांक्षी सदस्य दल का साथ छोड़ देते हैं।

इन दिनों इस देश में यही हो रहा है।

कई दलों से उनके नेता-कार्यकत्र्ता अलग होते जा रहे हैं।

हालांकि कुछ दलों ने अपनी गलत नीतियों-रणनीतियों-कार्य नीतियों के कारण ही जाने-अनजाने अपनी ताकत घटाई है। 

यदि वे खुद में सुधार लाएं तो उनकी ताकत बढ़ सकती है।

फिर तो वही सत्ताकांक्षी लोग उनके साथ होंगे।यही इन दिनों की राजनीति का  आम चलन  है।स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छा संकेत नहीं है।  

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और अंत में

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पटना स्थित एक सरकारी अस्पताल के निबंधन और बिल बनाने वाले काउंटरों को निजी क्षेत्र के हवाले कर 

दिया गया है।

इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों के कुछ काउंटरों को भी ‘आउटसोर्स’ कर देना चाहिए।

यानी, ऐसे काउंटर जहां पैसे का लेनेदन नहीं है,उन्हें निजी क्षेत्र को सौंपने से कार्य 

-कुशलता बढ़ेगी।   

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.कानोंकान

प्रभात खबर,

 पटना,5 मार्च 21


 13 सितंबर, 2008 को इंडियन मुजाहिदीन ने दिल्ली में

कई जगह विस्फोट करके 26 लोगों को मार डाला।

(याद रहे कि सिमी का नया रूप आई.एम.था।सिमी पर 2001 में प्रतिबंध लगा तो उसके लोगों ने नया संगठन आई.एम.बनाया।

अब सिमी के ही लोगों ने पी.एफ.आई.बना लिया है।)

उनमें से कुछ आतंकी बाटला हाउस में छिपे थे।

दिल्ली पुलिस वहां पहुंची।

मुंठभेड़ हुई।दोनों पक्षों के कुछ लोग मारे गए।

  ममता बनर्जी ने अगले महीने उस इलाके में सभा करके उसे फर्जी मुंठभेड़ बताया।

ममता ने कहा कि असली साबित हो जाए तो मैं राजनीति छोड़ दूंगी।

अब सबूतों के आधार पर कोर्ट ने उसे असली साबित कर दिया।

जाहिर है कि ममता राजनीति नहीं छोडं़ेगी।

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उन्हीें दिनों यानी 2008 में ही आई.एम. के जिया उर रहमान ने कहा कि 

‘‘अगर खुदा चाहता है तो मैं उस बाजार को भी बम से उड़ा दूंगा जहां मेरी वालिदा सब्जी खरीदती है।उसे जन्नत नसीब होगी।’’

(इंडिया टूडे -हिन्दी-15 अक्तूबर 2008

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याद रहे कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में भी इस तरह के आतंकवादी -अतिवादी तत्वों के खिलाफ कभी बयान नहीं देती।कैसे देंगी ? !!

उन्हीं लोगों के बल पर तो एक बार फिर चुनाव जीतने का हौसला बांध रही हैं।

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9 मार्च 21


 


 अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर

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सास बन चुकी बुजुर्ग महिलाओं से एक अपील

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आप जिस तरह अपनी बेटियों की सौ गलतियों 

को भी नजरअंदाज कर देती हैं,उसी तरह आप अपनी 

पतोहुओं की कम से कम 50 गलतियों को तो माफ 

कर दिया कीजिए !

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यह अपील उन पर लागू नहीं होती जो अपनी 

बहू को भी अपनी बेटी की तरह ही प्यार-सहारा देती हैं।

क्योंकि शायद उन्हें याद रहता है कि 

‘‘सास भी कभी बहू थी।’’

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--सुरेंद्र किशोर-

   8 मार्च 21


सोमवार, 8 मार्च 2021

    गद्यमय कविता के इस दौर में 

    बच्चन की ‘मधुशाला’ की शैली में 

    कमलाकान्त सिन्हा की ‘मतवाला’ !

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       --सुरेंद्र किशोर--

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‘‘बच्चन जी की मधुशाला के दूसरे भाग की पांडुलिपि कहां मिल गयी ?’’

    ‘मतवाला’ की पांडुलिपि देखकर प्रो.(डा.)रामवचन राय ने कमलाकान्त प्रसाद सिन्हा से यही सवाल किया था।

जब उन्हें बताया गया कि यह कमलाकान्त जी की कृति है तो 

प्रो.राय ने रचनाकार को बधाई दी।

  अपनी अनुरागानुभूति (प्रस्तावना) में प्रो.राय ने लिखा है कि 

‘‘हिन्दी कविता अपने विकास के इस दौर में अधिक गद्यमयता के कारण आम पाठकों की अभिरुचि और स्मरणीयता के दायरे से अलग होती गयी है।

ऐसे में मतवाला का प्रकाशन न सिर्फ उन पाठकों को आकर्षित करेगा,बल्कि नया पाठक वर्ग भी तैयार करेगा।’’

अब जेपी आंदोलन के नेता और कर्पूरी ठाकुर सरकार (1977)के संसदीय सचिव रहे कवि-शायर कमलाकान्त सिन्हा उर्फ लालू दा की रचना के कुछ नमूने पढ़िए।

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बहुत पुराना है मदिरालय

बहुत पुरानी है हाला,

आदिम मिट्टी से निर्मित है

यह सुन्दर मृण्मय प्याला।

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पा अनंग से सोम-कलश जब 

साकीबाला थिरक उठी

सृजनहार था पीनेवाला

प्रथम बना वह मतवाला

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तब से गमक रहा मदिरालय

तब से खनक रहा प्याला

तब से होड़ मची रिन्दों में 

गूंज रहा ‘हाला-हाला’

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अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दुमका के अध्यक्ष बलभद्र नारायण सिंह बालेन्दु ने लिखा है कि ‘‘लालू दा(कमलाकान्त सिन्हा)को शायरी का शौक बचपन से है।

राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं पर तीखी व्यंग्यात्मक टिप्पणियों से भरी है इनकी शायरी।

स्वभाव से फक्कड़ और मजदूरों का सा सादा जीवन जीने वाला यह कवि शायर खास अंदाज में शेरो -शायरी पेश कर एवं मौजूदा गंदी-बेढंगी राजनीति पर सामाजिक हलचल को समेट कर जनमन को खोलने की सरस चेष्टा करता है।

  लालू दा के व्यक्तित्व का निर्माण देशकाल से प्रभावित होता है।

इस संग्रह में कवि शायर की संघर्ष चेतना को वाणी मिली है।’’ 

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पुस्तक-‘मतवाला’

लेखक-कमलाकान्त सिन्हा

प्रथम संस्करण - सन 2021

के.एल.हाउस

गिलान पाड़ा

दुमका-814101

झारखंड

मो-9431154576

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5 मार्च 21


गुरुवार, 4 मार्च 2021

   1975-77 का आपातकाल

 मीडिया के लिए बुरे दिन !

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25 जून, 1975 की रात में इमर्जेंसी लगाने के बाद भारत सरकार के प्रेस इन्फाॅर्मेशन ब्यूरो से अखबारों को निरंतर आदेश -निदेश दिए जाते रहे।

दिए गए कुछ निदेशों का विवरण यहां प्रस्तुत है।

सरकार की ओर से अखबारों को यह निदेश दे दिया गया 

 कि वे जयप्रकाश नारायण का फोटोग्राफ नहीं छापें।

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26 जून,1975

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समाचार एजेंसियों के टेलीप्रिंटरों से सभी नेताओं की गिरफ्तारी 

के समाचार हटा दिए जाएं।

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5 जुलाई 1975

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आनंद मार्ग के बारे में अदालती केस की रिपोर्ट नहीं छापें।

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19 अगस्त 1975

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गुजरात में राष्ट्रपति शासन हटाने और कांग्रेस सरकार के गठन से संबंधित समाचार/टिप्पणी नहीं छापें।

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15 सितंबर 1975

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कुलदीप नैय्यर की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय नहीं छापें।

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(जारी)

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(लेखक-पत्रकार बलबीर दत्त लिखित

‘‘इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर’’ 

पुस्तक से साभार।)

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राहुल गांधी की हाल की एक टिप्पणी के संदर्भ में 1975 के उपर्युक्त निदेशों को देखिए।

क्या लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया के साथ आज की सरकार वैसा ही सलूक कर रही है ?

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इमर्जेंसी में लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों के साथ इंदिरा सरकार ने कैसा सलूक किया था,उसके कई नमूने विभिन्न पुस्तकों में पहले ही आ चुके हैं।

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--सुरेंद्र किशोर-

    4 मार्च, 21

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बुधवार, 3 मार्च 2021

 मोरारजी देसाई (29 फरवरी, 1896-10 अप्रैल 1995)

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मोरारजी देसाई में खूबियां अधिक थीं।

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  --सुरेंद्र किशोर--

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  जिस नेता में खूबियां अधिक और कमियां कम हों,उन्हंे

 समय -समय पर याद करना ही चाहिए।

   मोरारजी देसाई वैसे नेताओं में प्रमुख थे।

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मोरारजी देसाई अपने कठोर संयम के कारण करीब 

सौ साल जिए।

 आज मैं असमय बीमार होते कुछ करीबी लोगों से यदाकदा पूछता हूं ।

 आप खानपान में संयम क्यों नहीं बरतते ?

  वे तुरंत जवाब दे देते हैं-‘‘क्या करें,मेरा जाॅब ही ऐसा है कि 

संयम नहीं निभ पाता।’’

 दरअसल यह चटपटा खाने -पीने का बहाना है !

  क्या कोई जाॅब प्रधान मंत्री के जाॅब से भी अधिक व्यस्तता वाला हो सकता है ?

मैं नहीं मानता-जानता !

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देसाई का आत्मानुशासन बेजोड़

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यदि मोरारजी देसाई राजनीति की भागदौड़ वाली जिंदगी में भी करीब सौ साल का जीवन प्राप्त कर सके थे तो यह उनके आत्मानुशासन का ही परिणाम था।

    प्रधान मंत्री रहे मोरारजी भाई जैसा अब कोई नहीं।

आप उनकी राजनीतिक, आर्थिक या किन्हीं अन्य नीतियों से असहमत हो सकते हैं।

 पर, आप उनके निजी जीवन के कठोर अनुशासन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।

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     गोधरा दंगे को लेकर देसाई का 

     हुआ था अंग्रेज कलक्टर से मतभेद

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   देसाई अपने जीवन के प्रारंभिक काल में डिप्टी कलक्टर थे।

गुजरात के गोधरा में तैनात थे ।

तब अंग्रेज कलक्टर ने उन पर दबाव डाला कि वे दंगाइयों को निर्दोष बताते हुए रपट दें।

मोरारजी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

उस पर अंग्रेज शासक से उनका मतभेद शुरू हो गया।

    अंततः गांधी जी के आहवान पर देसाई ने 1930 में नौकरी छोड़ दी । 

स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

 राजनीतिक जीवन में भी उनकी अपनी तय की हुई लक्ष्मण रेखाएं थीं।

 उनसे वे आम तौर पर कभी नहीं डिगते थे।

  यह सब राजनीति में अब दुर्लभ है।

मोरारजी देसाई ने अपने लिए कोई मकान तक नहीं बनवाया।

अंतिम दिनों में वे किराए के मकान में थे।

कोई संपत्ति खड़ी नहीं की।

जबकि, वे 1952 में ही बंबई प्रांत के मुख्य मंत्री बन गए थे।

 बाद में वे केंद्र में मंत्री,उप प्रधान मंत्री और अंततः प्रधान मंत्री बने।

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   मोराजी का रूटीन

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    मोरार जी प्रातः 4 बजे जग जाते थे।

 रात में नौ बजे सो जाते थे।

पर वे कहते थे कि सोने और तैयार होने के समय को छोड़ कर उनका सारा समय लोगों का था।

  चार बजे प्रातः से लेकर सात बजे सुबह तक का समय उनका अपना होता था।

उस समय  वे किसी तरह का व्यवधान नहीं होने देते थे।

 इस बीच वे नित्य क्रिया से निवृत होकर टहलते थे ।

   मन ही मन गीता का पाठ करते थे।

  वे नौ बजे रात के बाद किसी भी हालत में  जगे नहीं रहते थे।

  वे जब प्रधान मंत्री थे और 1979 में उनकी सरकार गिरने लगी तौभी उन्होंने नौ बजे रात के बाद जगने से मना कर दिया।

  जबकि, सरकार बचाने के उपाय पर विचार करने के लिए रात में उनसे उनके कुछ प्रमुख राजनीतिक सहयोगी विचार विमर्श करना चाहते थे।

  पर सहयोगी  निराश ही हुए।

 यानी मोरारजी एक बार जो कुछ तय कर लेते थे , उस बात पर घाटा उठा कर भी अमल करते थे।

उनकी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा आधार यही था।

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     मोरारजी का भोजन

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    मोरार जी के भोजन में गाय का दूध, मक्खन, फल, नारियल पानी,शहद,अखरोट,उबले आलू,खजूर,गुड़-मक्के की बनी मिठाई शामिल थे।

सब चीज लेने के समय तय थे।

उसमें कोई व्यवधान नहीं हो सकता था।

वे कहते थे कि शाम में फल नहीं लेना चाहिए ।

क्योंकि आयुर्वेद में यह मना किया गया है।

काश ! मोरारजी का कोई जोड़ा राजनीति में आज भी होता।

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