गुरुवार, 3 नवंबर 2022

   समय रहते मतदातागण चेत जाएं,

  दल और नेता तो चेतने से रहे !

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   सुरेंद्र किशोर

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यदि आशंकित तानाशाही या अर्ध तानाशाही से इस देश को बचाना हो तो मतदातागण 

भ्रष्टाचारियों,

अपराधियों,

टुकड़े-टुकड़े गिरोहों के सदस्यों 

या उनके समर्थकों-मददगारों ,

वंशवादियों-परिवारवादियों को अपने बहुमूल्य वोट नहीं दें।

तानाशाही में सर्वाधिक कष्ट आम लोगों को ही होता है।

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किसी नेता के योग्य और ईमानदार पु़त्र(या पुत्री )यदि सक्रिय राजनीति में आना चाहे तो उस पर कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

किंतु वैसी स्थिति में खुद पिता चुनावी-सत्ता की राजनीति 

से अलग हो जाएं।

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  राजनीति कौन कहे,फिल्म में भी कम योग्य संतानों को आगे बढ़ाने के चक्कर में फिल्मी परिवार भी दृश्य से बाहर होते चले जाते हैं।

कभी कपूर खानदान ‘राज’ करता था।

किंतु अब ??!

ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं।

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ठाकरे परिवार ने उद्धव के बदले यदि राज ठाकरे और गांधी परिवार ने राहुल की जगह यदि वरूण को आगे बढ़ाया होता तो इन दलों की लोकप्रियता में संभवतः ऐसी ढलान नहीं आती।

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1 नवंबर 22  


बुधवार, 2 नवंबर 2022

 


पिछले कुछ दिनों से रोज ही इक्के -दुक्के सज्जन मुझसे फोन पर पूछते रहते हैं।

क्या बिहार की राजनीति में कोई और बड़ा भूकम्प आने वाला है ?

मैं कह देता हूं कि भई, मुझे कुछ भी मालूम नहीं।

वैसे कुछ भी और कभी भी हो सकता है।

वैसे आप हर स्थिति के लिए तैयार रहिए।

मैं पहले यदा कदा ऐसे राजनीतिक अनुमान लगाया करता था।

अक्सर वह सही साबित होता था।

पर,पिछले राजनीतिक भूकम्प को लेकर मेरा अनुमान गलत साबित हो गया।

इसलिए यह काम मैंने छोड़ दिया।

  वैसे भी इधर अपनी किताबों पर इन दिनों काम कर रहा हूं।

उधर क्या होने जा रहा है,उससे मेरा कोई खास मतलब नहीं है।

वैसे भी होनी को भला कौन टाल सकता है ???!!!!

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इस बीच सोशल मीडिया खास कर यूट्यूब पर निरंतर आ रही  चैंकाने वाली राजनीतिक खबरों का आप मजा लेते रहिए।

अनेक यूट्यूबर लगभग रोज ही चैंकाते रहते हैं।

जब नेतागण ही इन दिनों चैंकाने लगे हैं तो बेचारे यूट्यूबर क्यों पीछे रहें ? 

इन दिनों कई नेताओं के अधिकतर राजनीतिक फैसलों के पीछे राजनीतिक तर्क की जगह कुछ और ही होते हैं।

इसलिए भी पूर्वानुमान और भी मुश्किल हो गया है। 

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सुरेंद्र किशोर

1 नवंबर 22





 इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि की 

पूर्व संध्या पर

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31 अक्तूबर ,1984 की 

वह काली सुबह

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‘‘.......... ( राॅ के प्रधान रहे आर.एन.)काव ने ,(जो प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार थे) बेअंत सिंह के संदेहास्पद होने की ताकीद की थी।

  इसी आधार पर उसका तबादला दिल्ली पुलिस की सशस्त्र इकाई में कर दिया गया था।

कहते हैं कि इंदिरा गांधी उसे बेहद पसंद करती थीं और सरदार जी कहकर पुकारती थीं।

 उनकी(यानी, प्रधान मंत्री की)दखल पर वह (बेअंत)वापस (प्रधान मंत्री की सुरक्षा में )लौट आया।

 31 अक्तूबर की उस काली सुबह प्रधान मंत्री पर सबसे पहले उसी ने (यानी बेअंत ने )गोली चलाई।

 केहर और सतवंत ने उसका साथ दिया।

कुछ देर बाद बेअंत को ‘रहस्यमय’ कारणों से गोली मार दी गई।

 प्रधान मंत्री की हत्या के षड्यंत्र का वही मुख्य मोहरा था।

उसका बयान कई तथ्यों को उजागर कर सकता था।’’

---शशि शेखर,

प्रधान संपादक, 

हिन्दुस्तान,

30 अक्तूबर 2022

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(बेअंत की बिदाई और वापसी पर मैं खुद पहले कई बार लिख चुका हूं।पर शशि शेखर जी का लिखना अधिक माने रखता है।उन्होंने काव की चर्चा करके उस घटना को पुष्ट कर दिया है।(-सु.कि.)

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  राजीव गांधी की हत्या(1991)

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21 मई 1991 को तमिलनाडु के पेेरंबदुर में एक मानव बम विस्फोट में राजीव गांधी की मौत हो गई।

उस दिन के विस्फोट से पहले ‘ब्लू बुक’ में दर्ज सुरक्षा के उपायों का पालन नहीं किया गया था।

राजीव गांधी के पास जाने वालों की तलाशी होनी चाहिए थी।

पर, उस मानव बम की तलाशी नहीं हुई।

आखिर क्यों ?

पेरंबदुर के उस घटनास्थल पर तैनात पुलिस उप निरीक्षक अनुसूया डेजी अर्नेस्ट ने मानव बम धनु को राजीव के पास पहुंचने से रोकने की दो बार कोशिश की थी।

पर थोड़ी दूर से देख रहे राजीव ने सुरक्षाकर्मी से कहा कि  ‘‘सबको मेरे पास आने दो।’’

मानव बम धनु माला पहनाने के बहाने राजीव के पास गई और उसने विस्फोट कर दिया।

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     महात्मा गांधी की हत्या(1948)

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दिल्ली के बिड़ला भवन स्थित प्रार्थना स्थल के बाहर 20 जनवरी 1948 को बम विस्फोट हो चुका था।    

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार पटेल ने कहा था कि 

‘‘ सुरक्षा सावधानियों को अधिक प्रभावकारी बनाने के लिए पुलिस का विचार था कि प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले प्रत्येक अजनबी की परिसर में जाते समय तथा अन्य समय तलाशी ली जाए।

   नई दिल्ली के पुलिस अधीक्षक ने गांधी जी के स्टाफ के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था।

  लेकिन उन्हें बताया गया कि गांधी जी इससे असहमत  हैं।उप महा निरीक्षक ने भी गांधी जी के स्टाफ से संपर्क किया था।

 लेकिन परिणाम वही रहा।

तब डी.आई.जी.स्वयं व्यक्तिगत रूप से गांधी जी से मिले।

 उन्हें समझाया कि उनके जीवन पर खतरा है।

उन्हें सुरक्षा प्रबंध करने की  अनुमति दी जानी चाहिए।

अन्यथा कोई अप्रिय घटना होने पर उनकी बदनामी होगी।

लेकिन गांधी जी सहमत नहीं हुए।

उन्होंने कहा कि उनका जीवन ईश्वर के हाथ में है।

यदि उनकी मृत्यु आ गई है तो कोई सावधानी उन्हें नहीं बचा पाएगी।’

  पटेल ने कहा कि ‘मैंने स्वयं गांधी जी से पुलिस को उनकी रक्षा के लिए कत्र्तव्य पालन की अनुमति देने के लिए वकालत की।

परंतु हम असफल रहे।’

अंततः 30 जनवरी 1948 को नाथू राम गोडसे ने गांधी जी की हत्या कर दी।

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विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत(1980)

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संजय गांधी की जिस विमान

दुर्घटना में मौत हुई,उसे खुद वही चला रहे थे।

उस दुर्घटना के लिए मशीन जिम्मेदार थी या खुद चालक ?

 इस सवाल के जवाब के लिए आप अपने अनुमान के घोडे़ दौड़ा सकते हैं,यदि आप संजय गांधी की कार्य शैली से वाकिफ रहे थे।

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सवाल, निष्कर्ष और चेतावनी 

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  ऐसी घटनाओं को लेकर आपकी क्या राय है ?

इस देश के अनेक बड़े नेता अपनी सुरक्षा के प्रति इतने लापारवाह क्यों रहे हैं ?

याद रहे कि कई बार दुखद घटनाओं का दर्दनाक खामियाजा देश, जनता,समुदाय और संबंधित दलों को भुगतना पड़ता है।

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कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बताया था कि राहुल गांधी ने 21 बार अपनी सुरक्षा के नियमों का पालन करने से इनकार किया।

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सुरेंद्र किशोर

30 अक्तूबर 22 


   

आजादी की कहानी,सावित्री दीदी की 

जुबानी,‘दीदी’ में जिंदा हैं बापू

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--राजीव कांत मिश्र 

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भागलपुर के भीखनपुर में रहने वाला हमारा पूरा परिवार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा है।

मेरे पिता जी स्वं.पंडित निशिकांत मिश्र,बड़े पिता जी स्व.बालकृष्ण मिश्र,मेरी मां संध्या मिश्र और बड़ी मां सवित्री मिश्र के अलावे परिवार के कई सदस्य अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय थे।

    जंग ए आजादी की लड़ाई लड़ने में हमारी दादी ने परिवार के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित किया।

भागलपुर में भारतीय आजादी की लड़ाई को धार देने के लिए महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी से लेकर डा.राजेंद्र प्रसाद,सुभाष चंद्र बोस लाल लाजपत राय समेत देश के सभी बड़े क्रांतिकारी समय -समय पर आते रहे।

  मेरी बड़ी मां सावित्री मिश्र जिन्हें लोग सम्मान से ‘दीदी’ कह कर संबोधित करते हैं,उन्होंने महिला क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया था।

  आज भी जब वे अंग्रेजों के खिलाफ भागलपुर के लोगों के स्वतंत्रता संघर्ष की गाथा सुनाती हैं तो लगता है कि मानो हम चलचित्र देख रहे हैं और गांधी जी साक्षात हमारे सामने आ खड़े हुए मालूम पड़ते हैैं।

 स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं के बारे में मां और पिता जी को सुनते हुए हम बड़े हुए हैं।

आज भी जब बड़ी मां यानी सावित्री दीदी से ब्रिटिश  के खिलाफ अपने परिवार और भागलपुर के लोगों की वीरता और राष्ट्रभक्ति की कहानी सुनता हूं तो लगता है कि सुनता ही रहूं।

  दीदी में राष्ट्रपिता गांधी और आजादी की लड़ाई की घटनाएं पूरी तरह जीवंत हैं।

इस उम्र में उनकी उनकी यादाश्त शक्ति भी हतप्रभ कर देने वाली है।

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बाकी विवरण पढ़िए मासिक पत्रिका ‘‘भारत वार्ता’’(अक्तूबर 2022) के संबंधित पेज की स्कैन काॅपी में जो नीचे प्रस्तुत की गई है। 

   


       जेल में भी मंत्री बने रहे

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केजरीवाल सरकार के जेल मंत्री सत्येंद्र जैन महीनों से तिहाड़  जेल में हैं।

फिर भी अरविंद केजरीवाल की कृपा से मंत्री पद पर भी बने हुए हैं।

  यदि जेल जाने के बाद भी किसी आरोपी के मंत्री बने रहने में कोई कानूनी या संवैधानिक बाधा नहीं है तो किसी मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री के लिए भी कोई बाधा नहीं होगी।

  सत्येंद्र -अरविंद की इस करतूत को देखकर लालू प्रसाद के प्रति हमारा सम्मान बढ़ जाना चाहिए।

  सन 1997 में जेल जाने के लिए लालू को मुख्य मंत्री पद छोड़ देना पड़ा था।

वे भी तो सत्येंद्र जैन की तरह जेल से सरकारी काम कर सकते थे !! 

  याद रहे कि शरद पवार के दल के नबाब मलिक भी और ठाकरे सरकार के एक अन्य मंत्री भी लंबे समय तक मंत्री रहते हुए जेल में रहे।

क्या इस देश का लोकतंत्र घोर कलियुग के दौर से गुजर रहा है ?

  क्या मोदी सरकार इस मामले में संविधान या कानून में परिवर्तन करने पर विचार करेगी ?

भारत के लोकतंत्र को जग हंसाई से बचाने के लिए अब यह जरूरी है कि कोई आरोपी मंत्री,प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री जेल जाने के बाद अपने पद पर बना नहीं रहे।

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पुनश्चः

गुजरात के मोरबी पुल कांड के बारे में जान कर ऐसी धारणा बन रही है कि एक स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले में गुजरात और अन्य राज्यों में कोई फर्क नहीं है।

  क्या अब भी भ्रष्टों के लिए इस देश में फांसी की सजा का कानूनी प्रावधान नहीं होगा ?

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सुरेंद्र किशोर

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2 नवंबर 22

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 बिना रुके-थके-हांफे छह मंजिला अपार्टमेंट 

की सीढ़ियों से मैं पहुंच गया था छत पर  

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सुरेंद्र किशोर

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इस बार मेरे परिवार ने पड़ोस में स्थित कौशिकी प्राइड अपार्टमेंट की छत पर छठ पूजा की।

 यह छह मंजिला अपार्टमंेट है।

जाहिर है कि इसमेें लिफ्ट भी है और सीढ़ियां भी।

मैंने सोचा कि क्यों न सीढ़ियों से ऊपर पहुंचा जाए।

मैं छत पर पहुंच गया।

बिना रुके बिना थके और बिना हांफे !

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किसी ने कहा कि इसका लक्षण यह है कि इस उम्र में भी आपका हर्ट स्वस्थ है।

मैंने कहा कि घुटने में भी तो कोई दर्द नहीं हुआ।

अब आप भी कुछ बताइए।

यानी, मुझे बढ़ावा दीजिए।

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2 नवंबर 22

 

 


मंगलवार, 1 नवंबर 2022

 मराठी के बाद अब जार्ज फर्नांडिस 

पर अंग्रेजी में किताब 

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      सुरेंद्र किशोर

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जार्ज फर्नांडिस का पूरा नाम क्या है ?

इसका जवाब कम ही लोगों के पास होगा।

मैं बताता हूं पूरा नाम।

वह है --जार्ज मैथ्यू इसाडोर फर्नांडिस।

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नालंदा से जब जार्ज लोक सभा का चुनाव लड़ रहे थे तो एक संवाददाता के रूप में मैं वहां गया था।

मैंने एक ग्रामीण से पूछा- आप किसको वोट देंगे ?

उसने कहा--जांडिस फ्रांडिस को।

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यानी, जार्ज के कई रूप थे।उनका नाम कुछ भी हो !!

उनके संपर्क क्षेत्र बहुत व्यापक थे।

यानी, उन्हें जानने वाले लोगों ने उन्हें कई रूपों में देखा है।

अधिकतर के पास उनको लेकर अनेकानेक रोमांचक व शौर्यपूर्ण कहानियां हैं।

उनमें से अधिकतर कहानियां गर्व करने वाली हैं।

उनके व्यक्तित्व का फलक विस्तृत था।

जार्ज के मित्र,उनके सहकर्मी, उनके समर्थक,उनके प्रशंसक ,उनके राजनीतिक विरोधी,इमरजेंसी में जान हथेली पर रखकर उनके साथ ,उनके निदेश पर काम करने वाले गुमनाम लोगों ने उनके अनेक रूप देखे हैं।

उन्हंे किसी एक पुस्तक में समेटना संभव नहीं है।

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फिर भी जार्ज पर एक नई किताब आज मुझे मिली है।

करीब साढे़ पांच सौ पन्नों की इस अंग्रेजी किताब को मैंने अभी पढ़ा नहीं है।

जार्ज को जिन जानने वालों ने इसे अब तक पढ़ा है,उनकी इस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं।

मैं एक ही बात कह सकता हूं कि बड़े लोगों पर हर नई किताब,एक और किताब की जरूरत बता देती है।

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मुम्बई के पत्रकार व जार्ज के समाजवादी  सहकर्मी रहे नीलू दामले ने जार्ज पर मराठी में पुस्तक लिखी है।

उसे लिखने से पहले नीलू ने करीब एक सप्ताह पटना स्थित मेरे आवास में रह कर मुझसे तथा बिहार के कुछ अन्य लोगों से विस्तृत जानकारियां व कागजात लिए थे।

याद रहे कि आपातकाल में जब जार्ज भूमिगत थे तो मैं उनसे पटना,बंगलौर,कलकत्ता और 

दिल्ली में बारी -बारी से मिला था।नीलू को यह मालूम था।इसीलिए उन्होंने मेरे यहां काफी समय बिताया।

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खुशी की बात है कि मेरी जानकारी के अनुसार मराठी (नीलू दामले)और अंग्रेजी(राहुल रामगंुडम) में उन पर

अच्छी पुस्तकें आ गई हैं।

अब हिन्दी में आनी चाहिए।ं कई छूट गईं बातें भी हिन्दी में आ जाएंगी।जार्ज में रूचि रखने वाले हिन्दी पट्टी में सर्वाधिक लोग हैं।

याद रहे कि जार्ज का अधिकांश राजनीतिक और संसदीय जीवन बिहार से ही जुड़ा रहा।

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सुरेंद्र किशोर

1 नवंबर 22