बुधवार, 16 नवंबर 2022

    निजी चैनलों पर सार्थक बहस की दरकार

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      सुरेंद्र किशोर

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प्रश्न-

सार्थक डिबेट के लिए सर्वोत्तम निजी चैनल और सर्वश्रेष्ठ ऐंकर के नाम बताइए।

उत्तर-

चैनल का नाम है सी एन बी सी आवाज।

और ऐंकर हैं नीरज वाजपेयी।

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आज ही मैं सी.एनबी.सी.पर नीरज वाजपेयी के ‘‘ऐंकरत्व’’ में काॅलेजियम बनाम एन.जे.ए.सी.पर अत्यंत सार्थक बहस सुनकर आ रहा हूं।

मैं अपने व्यस्त रूटीन से समय निकाल कर जितने भी चैनल मैं देख पाता हूं,उनमें से मैंने यह चयन किया है।

संभव है कि किसी अन्य अच्छे चैनल में भी अच्छे ऐंकर हों

और जहां सार्थक बहस होती हो।

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अच्छे ऐंकर के लिए मेरी कुछ कसौटियां हैं।

वे हैं-

1-.जो ऐंकर ऐसे सर्वज्ञात गुंडा टाइप के आदतन अशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित न करें जो बहस को डिरेल करने के लिए जाने जाते हैं।

कुत्ते की तरह भौंकते रहते हैं और कभी -कभी मारपीट पर भी उतारू हो जाते हैं।

2.-जिन अतिथियों ने कभी डिबेट में गाली-गलौज की  हो,मारपीट की हो या उसकी नौबत ला दी हो,उन्हें तो न बुलाए।

3.-एक साथ कई अतिथियों को बोलने -चिल्लाने का अवसर न दे।

4.-अपनी बारी से पहले बोलने वाले किसी उदंड अतिथि की आवाज तुरंत बंद कर देने की पक्की तकनीकी व्यवस्था कर दे।आदि आदि......

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16 नवंबर 22 


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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कुछ बड़े सरकारी संस्थानों को मुख्य नगर 

के पास स्थानांतरित करना अब जरूरी 

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यह बहुत अच्छी बात है कि प्रशासन

ने पटना की मुख्य सड़कों से अतिक्रमण हटाने का काम इस बार कड़ाई से करने का निर्णय किया है।

इससे पहले भी समय-समय पर ऐसे अभियान चले हैं।

पर, हमेशा अतिक्रमणकारी ही अंततः शासन पर भारी पड़े।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार शासन तंत्र नियम-कानून तोड़कों पर भारी पड़ेगा।

ऐसे अतिक्रमण विरोधी अभियान बिहार के अन्य नगरों में भी चलाए जाने की सख्त जरूरत है।

हाल के वर्षों में पटना में कई फ्लाई ओवर बने हैं।

जाम की समस्या की विकटता थोड़ा कम करने में फ्लाई ओवर 

महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

फिर भी बढ़ते अतिक्रमणों के कारण समस्या भी साथ-साथ बढती़ जा रही है।

इससे पर्यावरण में प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

 अब तक यह धारणा रही है कि अतिक्रमणकारी इतने अधिक ताकतवर हैं कि राज्य सरकार उन पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करना चाहती।

पर,शासन के ताजा संकल्प देखकर उम्मीद की जाती है कि इस बार यह धारणा टूटेगी।

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     मुख्य नगर में ही बड़े संस्थान

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 पटना की मुख्य भूमि में ही कई बड़े सरकारी संस्थान अवस्थित हैं।

बिहार के अन्य अधिकतर नगरों का भी यही हाल है।

इनमें से कम से कम एक या दो संस्थानों को मुख्य पटना से हटाकर प्रादेशिक राजधानी के पास ही किसी देहाती इलाके में राज्य सरकार स्थापित कर सकती है।

इससे जाम की समस्या कम होगी। 

वे संस्थान हंै पटना विश्व विद्यालय, पटना मेडिकल काॅलेज और अस्पताल , पटना कलक्टरी और जिला अदालत।

यह तो अच्छा हुआ कि कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने पटना के पास फुलवारी शरीफ अंचल के एक गांव में एम्स की स्थापना की।

उस इलाके का तेजी से विकास भी हो रहा है।

कांेई नहीं कह रहा है कि एम्स मुख्य पटना से दूर क्यों ?

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  विचाराधीन कैदी और मतदान

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 कानून की एक विसंगति पर अगले महीने सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा।

लोक प्रतिनिधित्व कानून ,1951 की धारा -62 (5) को एक लोकहित याचिका के जरिए चुनौती दी गई है।

इस धारा के अनुसार विचाराधीन कैदी चुनाव के लिएं मतदान में भाग नहीं ले सकता।

  किंतु यह देखा गया है कि यदि सजायाफ्ता व्यक्ति जमानत पर छूटा हुआ हो तो वह मतदान कर सकता है।यह विरोधाभास है।

इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से उसकी राय मांगी है।

एक अन्य विसंगति भी है।

लगता है कि उसकी ओर  याचिकाकर्ता का ध्यान नहीं गया है।

वह यह कि एक विचाराधीन कैदी को

तो जेल से चुनाव लड़ने की तो छूट है किंतु विचाराधीन कैदी को मतदान करने की छूट नहीं है।

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केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं

राज्यों में कब स्थापित होंगी 

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सन 2018 में केंद्र सरकार ने यह योजना बनाई थी कि केंद्रीय सचिवालय की शाखाएं हर राज्य मुख्यालय में स्थापित की जाएंगी।

इसके जरिए केंद्र सरकार देश की जनता से और भी करीब से जुड़ना चाहती थी।

योजना अच्छी है।

किंतु इस संबंध में पिछले 4 वर्षों में क्या हुआ,यह पता नहीं चल सका है। 

यदि ऐसा हो जाता तो नई दिल्ली पर से भी आबादी का बोझ थोड़ा कम होता।

आबादी कम होने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा को स्वच्छ बनाए रखने में सुविधा होती।

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  क्षेत्र के बीच में हो थाना मुख्यालय 

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बिहार में ऐसे कुछ पुलिस थाने हैं जो थाना क्षेत्र की एक छोर पर दूर स्थित हैं।

दूसरी छोर तक पहुंचने में पुलिस को काफी समय लगता है।

इस कारण न तो ठीक से गश्त संभव है और न ही अपराध नियंत्रण।

खबर है कि पुलिस आउट पोस्ट की अवस्थिति को लेकर बिहार सरकार कुछ सकारात्मक निर्णय करने जा रही है।

ऐसे में थाना भवन की अवस्थिति को देखते हुए भी निर्णय होना चाहिए।

यानी,यदि किसी एक थाना क्षेत्र में दो आउट पोस्ट हैं तो वे वैसी जगह अवस्थित हों जहां से दूर-दराज इलाकों में भी पुलिस की मौजूदगी का लोगों को आभास होता रहे। .

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सरकार से अदालत के सवाल

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सन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि  संसदीय राजनीति में अपराधियों के प्रवेश को रोकने के लिए संसद कानून बनाए।

  पर,अब तक कुछ नहीं हुआ।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2019 में केंद्र सरकार से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा था।

सवाल यह था कि जन प्रतिनिधियों की बेतहाशा बढ़ती संपत्ति पर निगरानी रखने के लिए केंद्र सरकार ने अब तक कोई निगरानी तंत्र क्यों नहीं बनाया ?

इस पर भी केंद्र सरकार ने अब तक क्या-क्या किया,इस संबंध में कोई जानकारी सामने नहीं आई है।कुछ दशक पहले के जागरूक प्रतिपक्षी सांसदगण ऐसे सवालों को प्रश्न काल में उठाया करते थे।उनके जवाब भी आते रहते थे।

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और अंत में

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नेशनल पेमेंट काॅरपोरेशन आॅफ इंडिया के सर्वर से बैंक खातों  को लिंक नहीं किए जाने के कारण पी.एम.किसान सम्मान निधि का भुगतान बिहार के किसानों को नहीं हो पा रहा है।

खबर मिल रही है कि यह समस्या पूरे बिहार में है।

इस कारण दो किश्तें नहीं मिल पाई हैं।

उम्मीद है कि शासन तंत्र इस समस्या का समाधान जल्द कर लेगा।

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प्रभात खबर,पटना-14 नवंबर 22


सोमवार, 14 नवंबर 2022

 यदि आपका रसोइया 100 में से 85 रोटियां जला दे 

तो क्या आप उसे नौकरी में फिर भी बनाए रखेंगे ?

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सुरेंद्र किशोर

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एक परपोता के परदादा के पास 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन थी।

परदादा जी के निधन के बाद उनके बेटे और पोते उनकी बरखी व जयंती मनाते रहे।

किंतु जब परपोते को पता चला कि परदादा जी ने ऐयाशी और भ्रष्टाचरण के कारण 100 एकड़ पुश्तैनी जमीन में से 85 एकड़ जमीन बेच दी थी तो परपोते ने अपने परदादा जी की जयंती कौन कहे,बरखी मनाना भी बंद कर दिया।

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थोड़ा कहना ,बहुत समझना !!!

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14 नवंबर 22


   

अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलन ने विधान 

सभा के स्पीकर धनिक लाल मंडल की सराहना की थी

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   सुरेंद्र किशोर

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बात सन 1968 के प्रारंभ की है।

बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार गिरने ही वाली थी।

तत्कालीन स्पीकर धनिक लाल मंडल ने अविश्वास प्रस्ताव 

पर चर्चा की तारीख तय कर दी थी।

दल-बदल का खेल चल रहा था।

गैर कांग्रेसी सरकार के सत्ताधारी गठबंधन की ओर से 33 विधायकों ने दल बदल कर लिया था।

दलबदलुओं में सी.पी.आई.के विधायक से लेकर जनसंघ तक के विधायक शामिल थे।सर्वाधिक संख्या में संसोपा के विधायकों ने दल बदला था।(बाद की बी.पी.मंडल सरकार में सारे के सारे दलबदलू विधायक मंत्री बना दिए गए थे।)

महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाली सत्ताधारी जमात यह चाहती थी कि स्पीकर साहब अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की तारीख थोड़ा आगे बढ़ा दें।

  ताकि, विधायकों के ‘‘जुगाड’’़ के लिए उन्हें समय मिल जाए।

सत्ताधारी जमात को उम्मीद थी कि उससे सरकार बच सकती है।

  धनिक लाल मंडल सन 1967 में फुलपरास से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे।

इसके बावजूद मंडल जी ने तारीख नहीं बढ़ाई।

नतीजतन महामाया सरकार समय से पहले गिर गई।

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इस राजनीतिक घटना के बाद जब पीठासीन पदाधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ तो सम्मेलन ने प्रस्ताव पास करके धनिक लाल मंडल के उपर्युक्त निर्णय की सराहना की।

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याद रहे कि 94 साल की उम्र में मंडल जी का कल निधन हो गया।

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14 नवंबर 22


शनिवार, 12 नवंबर 2022

 


   पत्रकार गणेश मंत्री पर हरिवंश जी के संस्मरण

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      सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश ने ‘धर्मयुग’ के प्रधान संपादक रहे गणेश मंत्री पर अपनी पुस्तक आज मुझे दी।

  इस पुस्तक की संपादक हैं डा.अनुपमा कुमारी।

 अत्यंत प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ की प्रसार संख्या जब छह लाख थी,तब गणेश मंत्री ने धर्मयुग(अब प्रकाशन बंद) ज्वाइन किया था।

  हरिवंश जी भी कभी धर्मयुग के संपादकीय विभाग में मंत्री जी के सहकर्मी थे।

  बाद में मंत्री जी उस पत्रिका के प्रधान संपादक बने।

  गणेश मंत्री जैसे विचारवान,चरित्रवान और मूल्यपरक पत्रकार के बारे में कुछ भी पढ़कर मुझे अच्छा लगेगा।इसे मैं पढ़ूंगा। 

 और, जब गणेश मंत्री के व्यक्तित्व-कृतित्व पर हरिवंश जी के व्यक्तिगत संस्मरणों के साथ इसमें वैचारिक पक्ष की भी विस्तृत व्याख्या है तब तो और भी अच्छा लगेगा। 

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एक बात यह भी

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गणेश मंत्री के पिता राजस्थान सरकार में मंत्री थे।

पर,उनकी सरकारी गाड़ी का उपयोग करने से गणेश मंत्री ने इनकार कर दिया था।

इससे यह बात साबित होती है कि गणेश मंत्री मानते थे कि  पत्रकार के लिए नैतिकता और चरित्र बल का कितना अधिक महत्व होता है।

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6 नवंबर 22



 अनुच्छेद-142 का बेहतर इस्तेमाल करे सुप्रीम कोर्ट

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राजीव गांधी के हत्यारों की सजा घटाने के लिए संविधान के जिस अनुच्छेद का अदालत ने सहारा लिया है,उसी अनुच्छेद का इस्तेमाल अब वह भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों के खिलाफ करे।

अन्यथा, देर-सबेर या तो तानाशाही आ जाएगी या फिर देश गुलाम हो जाएगा।

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सुरेंद्र किशोर

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  भारतीय संविधान के अनुच्छेद -142 ने सुप्रीम कोर्ट को जो विशेष अधिकार दे रखा है,उसी का सहारा लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने राजीव गांधी के हत्यारों की सजा कल कम कर दी।

  सुप्रीम कोर्ट से, जो यह कह रहा है कि ‘‘भ्रष्ट लोग देश को तबाह कर रहे हैं’’ मेरा एक निवेदन है।

  निवेदन यह है कि मामले उसके विचारार्थ आने पर वह भ्रष्टाचार के आरोपितों की सजा बढ़ा दिया करे।

उदाहरणार्थ, यदि किसी आरोपित के खिलाफ कम से कम दस करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है,तो उसे फांसी की सजा देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट दे दिया करे।

  (याद रहे कि अनुच्छेद- 142 मौजूदा कानूनों से परे जाकर भी आदेश देने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को देता है।

दरअसल संविधान निर्माताओं ने यह पूर्वानुमान कर लिया था कि इस देश की राजनीति व प्रशासन  पर एक दिन ऐसे- ऐसे सत्ताधारी छा जाएंगे जो अपने स्वार्थ के लिए कानूनों को आए दिन तोड़ने लगेंगे और अपराध को कारगर ढंग से रोकने के लिए कोई कड़ा कानून भी नहीं बनाएंगे।उस दिन इस अनुच्छेद के जरिए सुप्रीम कोर्ट देश को बचा सकता है।) 

 याद रहे कि भ्रष्टाचार न सिर्फ देश को तबाह कर रहा है,बल्कि एक बार फिर एक अन्य तरह की गुलामी की पृष्ठभूमि भी तैयार कर रहा है।

  ऐसे अनेक उदाहरण आते रहते हैं कि जब इस देश के कतिपय नेताओं ,अफसरों और अन्य लोगों को राष्ट्रविरोधी और देश तोड़क शक्तियां पैसे देकर खरीद ले रही हैं।

1.-नब्बे के दशक में जैन हवाला कांड के तहत हमारे देश के जिन शीर्ष नेताओं ने भारी पैसे लिए,वे पैसे कहां से आए थे ?

वे पैसे हवाला के जरिए विदेशी जेहादी ताकतों ने कश्मीर के आतंकियों के लिए भेजे थे।

उन्हीं पैसों में से देश के प्रमुख 55 नेताओं व अफसरों को भारी पैसे मिले थे।

वे नेतागण तब देश की राजनीति के ‘‘हू इज हू’’ थे।

उन नेताओं में से कुछ ने इस देश में सक्रिय आतंकियों को मुकदमों से बचाये भी थे।

ऐसी खबर तब इंडिया टूडे में छपी थी।

इंडिया टूडे का वह अंक मेरे पास भी है।

2.-नब्बे के दशक में जब दाउद इब्राहिम ने समुद्र के रास्ते बड़ी मात्रा में विस्फोटक बंबई को दहलाने के लिए भिजवाए तो तट पर रक्षा में लगे सरकारी मुलाजिमों ने रिश्वत लेकर डोंगियों पर लदे विस्फोटक उतरने दिए थे।

इस काम के लिए उन घूसखोरों ने सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक रिश्वत की मांग आतंकियों ंसे की थी।

क्योंकि सरकारी कर्मियों को लग गया था कि डांेगियों में विस्फोटक पदार्थ हैं।उन्हें अपेक्षाकृत अधिक रिश्वत मिली भी थी।

ऐसे अन्य अनेक उदाहरण समय -समय पर मिलते रहते रहते हैं।

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12 नवंबर 22


गुरुवार, 3 नवंबर 2022

 पाक के भाइयो ! या तो आप धार्मिक लक्ष्य हासिल कीजिए

या भौतिक लक्ष्य,एक साथ दोनों हासिल होना असंभव है

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सुरेंद्र किशोर

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री इमरान खान ने कहा है कि 

‘‘भारत की विदेश नीति देखिए।

वो बिना किसी डर के रूस से तेल का आयात कर रहा है।पश्चिमी देशों का उस पर कोई दबाव नहीं है।

भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्रमुखता से आगे रखता है।

भारत एक स्वतंत्र और मजबूत राष्ट्र है,वहीं पाकिस्तानी शासक गुलाम हैं।’’

  इमरान साहब,भारत अपने संसाधनों का इस्तेमाल अपने देश को सैनिक तथा अन्य तरह से मजबूत बनाने के काम में लगा हुआ है।

 पिछले कुछ वर्षों में इस काम में तेजी आई है।

क्योंकि भ्रष्टाचार और महा घोटालों में सार्वजनिक धन अब पहले की अपेक्षा कम जाया हो रहा है।

दूसरी तरफ पाकिस्तान अपने संसाधनों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के अलावा भारत सहित दुनिया भर में हथियारों के बल पर इस्लाम के प्रचार के लिए करता रहा है।

  यहां तक कि विदेशों से मिली अनुग्रह राशि में से कुछ धन का इस्तेमाल भी पाक आतंकवाद को आगे बढ़ाने के लिए करता है।

सन 1947 के बाद पाक ने भारत पर चार बार हमला किया।

उसमें जो पैसे लगे,वे पाकिस्तान के विकास में लग सकते थे।

उससे पाक स्वावलंबी बन सकता था।

पर,दूसरी ओर यहां तक कि ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही शरण पाता है।

   इमरान साहब,जब तक पाकिस्तान व वहां के लोग अपना मुख्य लक्ष्य नहीं बदलेंगे,दूसरे देशों के इशारों पर उन्हें नाचना ही पड़ेगा।अभी तो और भी बुरे दिन आ सकते हैं।

यदि पाक के शासक व मदरसा शिक्षित वहां के अधिकतर लोग यह मानते हैं कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य जेहाद है तो उसी में मगन रहिए।

उसमें आपको भारी आत्मिक सुख मिलेगा।

फिर तो भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की तरफ ललचाई नजरों से देखने या इसकी तरह बनने की कोशिश करने की जरूरत भी क्या है ?

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दोनों में से एक ही काम संभव है।

या तो भारत की तरह बनिए या ‘‘आत्मिक सुख’’ प्राप्त करिए।

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30 अक्तूबर 22