शनिवार, 14 जनवरी 2023

 महाराणा प्रताप की याद में 

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जो घास की रोटी खाना मंजूर करता है, फिर भी अपने सिद्धांत से समझौता नहीं करता,उसे उसी तरह का सम्मान मिलता है जिस तरह का सम्मान महाराणा प्रताप व उनके वंशज को मिलता रहा है।

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कुछ नमूने प्रस्तुत हैं--

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भारत की आजादी के बाद तक भी राजस्थान के सभी राजा, महाराणा प्रताप के वंशज को शाष्टांग प्रणाम

करते थे।

सभी राजा यानी सभी राजा !

पता नहीं, अब क्या स्थिति है ?

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अंग्रेजी सरकार ने जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार में हाजिर होने से सिर्फ महाराणा प्रताप के वंशज को छूट दी थी।

क्योंकि सारे भारतीय राजाओं की यह मजबूरी होती थी कि वे ब्रिटिश किंग के सामने झुककर उन्हें नजराना दें।

चूंकि महाराणा के वंशज इसके लिए तैयार नहीं थे,इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें यह छूट दे दी थी।(-पुस्तक नेहरू के साथ तेरह वर्ष-एम.ओ.मथाई से)

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आजादी के बाद एकमात्र अपवाद सामने आया था।

महाराणा के वंशज को ‘महाराज प्रमुख’ बनाया गया।

अन्य राजे-महाराजे ‘राज प्रमुख’ ही बने।

जबकि, जयपुर अपेक्षाकृत बड़ा राज्य था।

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प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महाराणा के वंशज को दिल्ली बुलाकर अपने साथ प्रधान मंत्री आवास में ठहराया और उनकी समस्या दूर की थी।

प्रधान मंत्री की ओर से ऐसा सम्मान शायद ही किसी को मिलता था।  

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यह सब क्यों हुआ ?

क्योंकि महाराणा प्रताप एक मात्र राजा थे जिन्होंनंे घास की रोटी भले खाई, किंतु अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

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बिहार सरकार ने यह तय किया है कि पटना के मुख्य मार्ग यानी मजहरूल हक पथ,यानी, फ्रेजर रोड पर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगाई जाएगी।

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बिहार विधान परिषद के सदस्य व बिहार जदयू के उपाध्यक्ष संजय सिंह महाराणा की याद में स्वाभिमान समारोह का आयोजन करने जा रहे हैं।

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कहानी का मोरल ??

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पर,सवाल है कि महाराणा प्रताप के जीवन से आज के नेताओं व अन्य लोगों को कैसी शिक्षा लेनी चाहिए ?

जवाब है कि सबसे बड़ी शिक्षा तो यही अपेक्षित है कि भले ‘‘घास की रोटी खानी पड़े’’ किंतु वे सत्ता सुख के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता न करें।

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क्या ऐसी शिक्षा ग्रहण करना आसान है ?

आसान तो नहीं है किंतु असंभव भी नहीं है।

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सुरेंद्र किशोर

14 जनवरी 23 


शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

   जार्ज-नीतीश संबंध को लेकर 

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      सुरेंद्र किशोर

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नीतीश कुमार के आलोचक अक्सर यह आरोप लगा देते हैं कि 

नीतीश कुमार ने जार्ज फर्नांडिस की उपेक्षा की।

इस संबंध में कभी -कभी कड़े शब्दों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

मेरा मानना है कि इस संबंध में आलोचकों को जो कहना हो,वे कहें।

 उन्हें रोकने वाला मैं कौन होता हूं !

मैं न तो नीतीश कुमार के दल में हूं और न ही उनका  प्रवक्ता हूं। 

हां,समकालीन पत्रकार और जार्ज का कभी सहकर्मी होने के नाते मेरी भी इस संबंध में कुछ जानकारियां हैं,जो मैं आम लोगों से आज शेयर करना चाहता हूं।

दरअसल,मेरी जानकारी के अनुसार, नीतीश ने जार्ज को नहीं छोड़ा,बल्कि 2005 के आसपास जार्ज ने ही नीतीश को छोड़ दिया था।

  मेरी जानकारी के अनुसार ,जार्ज साहब नीतीश के बदले तब दिग्विजय सिंह(बांका) को बिहार का मुख्य मंत्री बनवाना चाहते थे।

  ऐसे में नीतीश कुमार क्या करते ?!

 एक राजनेता जो करता है,वही नीतीश ने भी किया। 

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इस अप्रिय प्रसंग के बावजूद उनके जीवन की संध्या बेला में,जब वे शारीरिक रूप से अशक्त हो रहे थे, नीतीश कुमार ने  

जार्ज को बिहार से राज्य सभा का सदस्य बनवा दिया।

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जार्ज फर्नांडिस का मैं बड़ा प्रशंसक रहा हूं।

उनके अन्य कई साथियों की तरह ही मैंने भी आपातकाल में भूमिगत होकर जार्ज के साथ ‘डायनामाइटी अभियान’ चलाया था। 

जान हथेली पर लेकर चलने वाला वह समय था।

मैंने जार्ज जैसा देशभक्त,ईमानदार व बहादुर इंसान राजनीति में बहुत ही कम देखे हैं।अब तो और भी नहीं।

 लेकिन यह बात भी है कि कोई व्यक्ति पूर्ण नहंीं होता।

न मैं, न आप, और न जार्ज।

मैं कुछ अन्य बड़े नेताओं के अलावा जार्ज के साथ के अपने अनुभव भी विस्तार से बाद में लिखूंगा।

तब बातें और साफ होंगी।

मेरा मानना है कि सन 2005 के बिहार की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति के आकलन में जार्ज गलती कर गए थे।

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12 जनवरी 23 


   इस देश के एक राज्य में एक ऐसे नेता भी मुख्य मंत्री हुए हैं जिन्हें छात्र जीवन में मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती होना पड़ा था।

उनके अभिभावक ने उनके इलाज के लिए वहां भर्ती किया था।

बाद में वे ठीक हो गए और मुख्य मंत्री तक बने।

हालंाकि तब भी कभी- कभी उनकी उलटी-सीधी बातों से यह लग जाता था कि शायद कभी वे ‘बीमार’ रह चुके होंगे।

 इसी देश के एक राज्य में एक ऐसे आई.पी.एस.अफसर राज्य के पुलिस प्रमुख बने थे जिन्हें अपने सेवा काल में भी यदाकदा मानसिक आरोग्यशाला जाना पड़ता था।

 पर,पुलिस प्रमुख तो बने ही ।

इसलिए उन लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं जिनके दिमाग में हर बार सुलझे हुए विचार नहीं आते।

 किसी को बताए बिना देश या विदेश के किसी अच्छे मानसिक आरोग्यशाला में वे अपना इलाज ठीक ढंग से करा लें।

ठीक हो जाएं।

फिर तो वे बड़े से बड़ा पद पर बैठ ही सकते हैं।

---सुरेंद्र किशोर

13 जनवरी 23




     आज का चिंतन

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 देश की राजनीति,कल,आज और कल !!

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       --सुरेंद्र किशोर-

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   सन 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत के क्या-क्या कारण बने थे ?

उसके लिए कौन से तत्व जिम्मेदार थे ?

मेरी समझ से उस जीत में यू.पी.ए.सरकार की खामियों का योगदान 60 प्रतिशत था।

 जीत में 40 प्रतिशत ही योगदान नरेंद्र मोदी व राजग की खूबियों का था।

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2019 लोस चुनाव में भी स्थिति लगभग वही बनी रही।

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आज भी लगभग वही स्थिति है जबकि 2024 का चुनाव कुछ ही महीने दूर है।

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अगले कुछ महीनों में मोदी विरोधी दलों ने यदि अपना चाल,चरित्र और चिंतन नहीं बदला तो सन 2024 में भी वही रिजल्ट आने वाला है।

रवैया कैसे बदला जा सकता है,उस पर फिर कभी बाद में लिखूंगा।

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लेकिन यदि मोदी सन 2024 में फिर सत्ता में आ गए तो प्रतिपक्ष का क्या होगा ?

खास कर उन छोटे -बड़े दर्जनों प्रतिपक्षी नेताओं का क्या होगा जिन पर देश की विभिन्न अदालतों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में मुकदमे चल रहे हैं ?

  2024 चुनाव से पहले कई अन्य प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे शुरू हो सकते हैं।

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यदि मोदी की 2024 में भी विजय हुई तो 2024 और 2029 के बीच क्या -क्या होगा ?

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  प्रतिपक्षी दलों के अधिकतर नेताओं के खिलाफ मुकदमों में कम से कम लोअर कोर्ट्स से तो फैसले आ ही चुके होंगे।

सबूत देखने के बाद उन नेताओं को इन दिनों अदालतंे कोई खास राहत नहीं दे रही हैं।

इसलिए अंतिम नतीजों का भी अनुमान लगा लें।

बड़े नेताओं को बड़ी सजाएं ही हांेगी !

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यह भी अनुमान लगा लें कि 2024 और 2029 के बीच कितने प्रतिपक्षी नेतागण जेलों में होंगे और कितने बाहर ?

फिर देश का राजनीतिक दृश्य कैसा होगा ?

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31 दिसंबर 22

  


   


      बिहार के शिक्षा मंत्री ने भाजपा 

    को दे दिया उसके अनुकूल मुद्दा

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     सुरेंद्र किशोर

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यदि बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्र शेखर जी सन 2024 के लोक सभा चुनाव तक अपने पद पर बने रह गए तो भाजपा को एक अच्छा-खासा चुनावी मुद्दा उपलब्ध रहेगा।ऐसा मुद्दा भाजपा के लिए अनुकूल होता है।

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2014 में जब मोदी सरकार केंद्र की सत्ता में आई तो भाजपा के कई बड़बोले सांसद व मंत्री ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ देने लगे जिस तरह का संदेश चंद्रशेखर दे रहे हैं।

पर नरेंद्र मोदी ने अपने दल के नेताओं से सार्वजनिक रूप से अपील की कि आप राष्ट्र के नाम संदेश देने के बदले अपने काम करें।

फिर भी कई भाजपा नेता संदेश देते रहे।

इस तरह वे भाजपा विरोधी दलों को मुद्दा थमाते रहे।

वैसे सबसे अधिक ऐसे ‘‘संदेश’’ जीतनराम मांझी ने दिए थे जब वे मुख्य मंत्री बने थे।

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1977 के बिहार मंत्रिमंडल के एक सदस्य के यहां मैं गया था।

पुराने परिचित थे।

उन्होंने करीब दो घंटे तक मुझसे बातचीत की। 

अपने विभाग की बात छोड़कर देश-दुनिया की ही बातें वे करते रहे।

 मंत्री बनने के बाद वे ‘चिंतक’ बन गए थे।उसके बाद वे कभी चुनाव नहीं जीत सके।

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  12 जनवरी 23 


 इस देश के कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए प्रज्ञा सिंह ठाकुर के ‘कुबोल’ कोई समस्या नहीं।

नेताओं और बुद्धिजीवियों के दूसरे हिस्से के लिए ‘‘गजवा ए हिन्द’’ कोई समस्या नहीं।

  जबकि, देश की एकता,लोकतांंित्रक-व्यवस्था और सुख -शांति के लिए हर नागरिक को इन दोनों तरह की प्रवृतियों  के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए।

  पर, वोट बैंक की राजनीति जो न कराए !!

इसे इस देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे।

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7 जनवरी 23  


   राष्ट्रपति वेंकटरमण ने डा.लोहिया के तैल चित्र 

  का अनावरण करने से इनकार कर दिया था

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    सुरेंद्र किशोर

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वीर सावरकर की बात तो अभी छोड़ ही दीजिए।

मैं डा.राम मनोहर लोहिया की बात करता हूं।

लोहिया ने कभी ब्रिटिश सत्ता को माफीनामा नहीं लिखा।

फिर भी ‘‘इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया’’ की धारणा पालने वाली कांग्रेस के नेता रहे आर.वंेकटरमण जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने संसद के सेंट्रल हाॅल में लोहिया के तैल चित्र का अनावरण करने से साफ इनकार कर दिया था।

बाद में प्रधान मंत्री चंद्रशेखर ने लोहिया के उस चित्र का अनावरण किया।

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तब वेंकट रमण को मधु लिमये ने इसके विरोध स्वरूप एक लंबा व कड़ा पत्र लिखा था।

वह पूरा पत्र कलकत्ता से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘संडे’ में छपा था।मैंने भी उसे पढ़ा था।

उस अंक को मैं अपनी लाइबे्ररी में खोज रहा हूं।मिल जाएगा तो उससे भी उधृत करते हुए कुछ बातें भी लिखूंगा।

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 आजादी की लड़ाई के दिनों जवाहर लाल नेहरू जब कांग्रेस अध्यक्ष बने तो उन्होंने पार्टी का ‘विदेशी मामलों का प्रभाग’ बनाया था।नेहरू ने लोहिया को उसका सचिव मनोनीत किया।

 नेहरू के प्रधान मंत्री बनने के बाद एक बार लोहिया दिल्ली ़ जेल भेज दिए गए थे।

आमों का मौसम था।

नेहरू जी इंदिरा गांधी के साथ एक दिन भोजन के टेबल पर थे।

 उन्होंने पूछा, ‘‘इन्दु,लोहिया को तो आम नहीं मिला होगा।

उसे आम भिजवाना चाहिए।’’

उस पर नेहरू के सचिव एम.ओ.मथाई आम लेकर जेल गए थे।

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लगता है कि बाद के वर्षों में कांग्रेस में ऐसी प्रवृति पैदा कर दी गई जो रही कि कुछ खास नेताओं के अलावा किसी अन्य को आजादी की लड़ाई का श्रेय नहीं दिया जाए।

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 13 जनवरी 23