मंगलवार, 9 मई 2023

 



महाराणा प्रताप की याद में 

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इस महावीर के प्रति सरकारी उदासीनता के बावजूद 

लोगबाग गांवों में भी महाराणा प्रताप के चित्र टांगते थे

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सुरेंद्र किशोर

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जो घास की रोटी खाना मंजूर करता है, फिर भी अपने सिद्धांत से समझौता नहीं करता,उसे उसी तरह का सम्मान मिलता है जिस तरह का सम्मान महाराणा प्रताप व उनके वंशज को मिलता रहा है।

मैंने बचपन से ही अपने गांव तथा आसपास के इलाकों में देखा है कि लोग महाराणा प्रताप के बड़े -बड़े चित्र वाले कलेंडर दीवालों पर लगाना पसंद करते थे।

ऐसा करने वालों में लगभग हर जाति के लोग थे।

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महाराणा प्रताप की प्रतिष्ठा के कुछ नमूने यहां प्रस्तुत हैं--

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भारत की आजादी के बाद तक भी कहीं किसी समारोह में राजस्थान के सभी राजा, महाराणा प्रताप के वंशज को शाष्टांग प्रणाम

करते थे।

सभी राजा, यानी सभी राजा !

पता नहीं, अब क्या स्थिति है ?

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अंग्रेजी सरकार ने जार्ज पंचम के दिल्ली दरबार(सन 1911) में हाजिर होने से सिर्फ महाराणा प्रताप के वंशज को छूट दे दी थी।

याद रहे कि सारे भारतीय राजाओं की यह मजबूरी होती थी कि वे ब्रिटिश किंग के सामने झुककर उन्हें नजराना दें।

चूंकि महाराणा के वंशज इसके लिए तैयार नहीं थे,इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें यह छूट दे दी थी।(-एम.ओ.मथाई लिखित पुस्तक ‘‘नेहरू के साथ तेरह वर्ष’’से)

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आजादी के बाद एकमात्र अपवाद सामने आया था।

महाराणा के वंशज को ‘‘महाराज प्रमुख’’ बनाया गया।

अन्य राजे-महाराजे ‘राज प्रमुख’ ही बने।

जबकि, जयपुर अपेक्षाकृत बड़ा राज्य था।

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प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महाराणा के वंशज को दिल्ली बुलाकर अपने साथ प्रधान मंत्री आवास में ठहराया और उनकी समस्या दूर की थी।

प्रधान मंत्री की ओर से ऐसा सम्मान शायद ही किसी को मिलता था।  

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यह सब क्यों हुआ ?

क्योंकि महाराणा प्रताप एक मात्र राजा थे जिन्होंने घास की रोटी भले खाई, किंतु बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

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नीतीश सरकार ने हाल में पटना के मुख्य मार्ग यानी मजहरूल हक पथ,यानी, फ्रेजर रोड पर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगवा कर उन्हें सम्मान दिया।

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बिहार विधान परिषद के सदस्य व बिहार जदयू के उपाध्यक्ष संजय सिंह ने इस काम को संभव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।(वैसे मेरी समझ से एक कमी रह गयी।उस मूर्ति के शिला लेख में वह टिप्पणी होनी चाहिए थी जो वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष ने महाराणा प्रताप के शौर्य के बारे में व्यक्त की थी।याद रहे कि राष्ट्राध्यक्ष का कहना था कि महाराणा की युद्ध नीति से मिली प्रेरणा से ही वियतनाम अमेरिका को पराजित कर पाया था।)

याद रहे कि आजादी के 75 साल में इससे पहले किसी राज्य सरकार को महाराणा की याद नहीं आई थी।

दूसरी ओर नब्बे के दशक में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री

अर्जुन सिंह ने मुगल सम्राट अकबर की 450 वीं जयंती धूमधाम से मनाने का काम शुरू कर दिया था।

किंतु दक्षिण भारत से विरोध होने पर उन्हें समारोह को बीच में ही रोक देना पड़ा।याद रहे कि दक्षिण के लोग अकबर को हमलावर मानते हैं।

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एक सवाल जरूर है।

वह यह कि महाराणा प्रताप के जीवन से आज के नेताओं व अन्य लोगों को कैसी शिक्षा लेनी चाहिए ?

जवाब यह है कि सबसे बड़ी शिक्षा तो यही अपेक्षित है कि भले ‘‘घास की रोटी खानी पड़े’’ किंतु वे सत्ता सुख और धन लिप्सा की पूर्ति के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता न करें।

देश-प्रदेश के हितों को नुकसान न पहुंचाएं।

बाहर-भीतर के देशद्रोहियों से मुकाबला करते समय वोट बैंक का ध्यान न रखें। 

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क्या ऐसी शिक्षा ग्रहण करना आज के अधिकतर नेताओं के लिए आसान है ?

आसान तो नहीं है किंतु असंभव भी नहीं है।

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9 मई 23


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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सर्वदलीय बैठक के सर्वसम्मत निर्णय के बावजूद बाद में उसी फैसले का विरोध !

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गत साल 2 जून को बिहार सरकार ने तय किया कि राज्य में जाति आधारित गणना कराई जाएगी।

उससे एक दिन पहले सर्वदलीय बैठक में ऐसा करने का निर्णय हुआ था।

पर,इस 4 मई को ऐसी गणना पर पटना हाईकोर्ट ने अस्थायी रोक

लगा दी तो कुछ राजनीतिक नेताओं के स्वर बदल गए।

कुछ नेताओं के परोक्ष कटाक्षों और परस्पर विरोधी बयानों से यह लगता है कि कुछ दलों व नेताओं के लिए सर्वदलीय फैसलों का भी कोई मतलब नहीं है।

  ऐसे ही राजनीतिक प्रकरणांे से राजनीति की साख घटती है।

वैसे पटना हाईकोर्ट ने एक बुनियादी सवाल उठाया है।

वह यह कि राज्य सरकार को ऐसा करने का अधिकार नहीं है।

यानी, यह अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार का है।

यानी यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा।सुप्रीम कोर्ट अब जो फैसला करे।

  उससे पहले केंद्र सरकार यह कह चुकी है कि हम जाति आधारित गणना नहीं कराएंगे।

यदि राज्य सरकार चाहे तो करा सकती है।दरअसल आरक्षण का मामला जब अदालतों में जाता है तो कई बार अदालतें पूछती है कि किन आंकड़ों के आधार पर यह इतना आरक्षण हुआ है।कुछ सरकारें भी चाहती हैं कि पूरे समाज के समरूप विकास के लिए पहले इस बात का पता लगा लिया जाए कि कौन सा समूह अब भी पिछड़ा हुआ है।गणनाओं के आंकड़े विशेष मदद का आधार बताएंगे।फिर पिछड़ गए लोगों का विकास करके पूरे समाज का समरूप विकास किया जा सकेगा। 

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अजब-गजब राजनीति 

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 पहले राजी और बाद में बेराजी हो जाने की कुछ दलों की पुरानी आदत रही है।

ऐसा ही एक प्रकरण सन 1999 में देश के सामने आया था।

 आतंकवादियों ने इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर लिया।उसे वे कंधार ले गए जिसमें 152 यात्री थे।

आतंकी मसूद अजहर तथा कुछ अन्य को जेल से छोड़ने की मांग करने लगे। 27 दिसंबर, 1999 को प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।

बैठक में यह सहमति बनी कि बंधक यात्रियों को ‘‘किसी भी कीमत पर’’ सरकार छुडव़ाए।

केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह मसूद अजहर तथा अन्य को लेकर कंधार गए।बंधकों को छुड़वाया।पर,इधर प्रतिपक्षी दलों के नेतागण सरकार की इस बात को लेकर बाद में आलोचना करने लगे कि मसूद अजहर को लेकर मंत्री कंधार क्यों गए ?

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घर से मतदान

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कर्नाटका विधान सभा चुनाव में एक बड़ी बात हो रही है।

80 साल से अधिक उम्र के मतदातागण पोस्टल बैलेट के जरिए अपने घरों से ही मतदान कर रहे हैं।यह सुविधा किसी भी उम्र के दिव्यांगों को भी मिल रही है।

ऐसी सुविधा का लाभ बाद के चुनावों में देश भर के मतदाता उठाएंगे।

इससे बड़ी बात यह भी होगी कि मतदान का प्रतिशत थोड़ा बढ़ जाएगा।

यदि यह सुविधा अन्य आयु वर्ग के लोगों को भी मिलने लगे तो मतदान का प्रतिशत और भी बढ़ेगा।

 हां,इस संबंध में यहां एक सलाह दी जा 

सकती है।

दरअसल नगरों के उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के अनेक मतदातागण मतदान के दिन अपने घरों में आराम करते हैं।वे मतदान केंद्रों पर नहीं जाते।यदि उनसे कुछ शुल्क लेकर उनके लिए भी ऐसी सुविधा का प्रावधान हो जाए तो मतदान का प्रतिशत और बढे़गा। 

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भूली -बिसरी यादें

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पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 2 सितंबर 1977 को सुमित्रानंदन पंत को लिखा कि ‘‘श्री पी.डी.टंडन से यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि आपने मुझे लिखा और मैंने उस पत्र का उत्तर नहीं दिया।

मेरी कोशिश हमेशा रही है कि प्रत्येक पत्र जो मुझ तक पहुंचे ,उसका जवाब स्वयं दूं।

फिर आप जैसे प्रसिद्ध उच्च कोटि के कवि की कैसे उपेक्षा करती ?

हार के बाद बहुत सारे पत्र और तार आये।

 उसी समय घर बदलना था और दफ्तर वाले सब चल दिये।

तो हो सकता है कि डाक में कुछ गड़बड़ी हो और आपका पत्र मेरे पास पहुंच न पाया हो।

   आपका स्नेह और सद्भावना भरा पत्र मेरे लिए विशेष ही मूल्यवान 

था।

आपका पत्र आप जैसे श्रेष्ठ कवियों के साथ काव्य शास्त्र विनोद में बीते हुए समय की भी याद दिलाता।

दुर्भाग्य की बात है ,पत्र खो गया।

शुभ कामनाओं के साथ इंदिरा गांधी।’’

इस पत्र को यहां पेश करने का उद्देश्य यह है कि लोग जानें कि एक शीर्ष साहित्यकार के बारे में एक शीर्ष नेत्री की कैसी राय थी।  

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और अंत में

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कर्नाटका के पूर्व मुख्य मंत्री जगदीश शेट्टार ने भाजपा क्यों छोड़ी ?

भाजपा से उनकी शिकायत रही कि पार्टी, लिंगायतों के बीच से दल के लिए नया काॅडर तैयार कर रही थी।

ऐसी शिकायत इस देश के अन्य राज्यों के अनेक नेताओं की भी अपने नेतृत्व से रही है।

ऐसे नेतागण दल को तालाब के पानी के रूप में देखते हैं।दूसरी ओर विकासशील दलों के नेता अपने दल को अविरल जल वाली नदी बनाना चाहते हैं।

याद रहे कि शेट्टार भाजपा के टिकट पर छह बार विधायक बने।

पर,इस बार जब भाजपा ने उन्हें टिकट से वंचित कर दिया तो शेट्टार ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली।

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शुक्रवार, 5 मई 2023

 कर्नाटका में पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन के 

साथ कांग्रेस का चुनावी तालमेल

ऐसा ही तालमेल सन 2018 के चुनाव में भी था

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सुरेंद्र किशोर

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अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जेहादी संगठन सिमी पर सन 2001 में प्रतिबंध लगा दिया था।

उसके बाद सिमी तथा कुछ अन्य अतिवादी संगठनों ने मिलकर पहले इंडियन मुजाहिद्दीन और बाद में पी.एफ.आई. बनाया।

नरेंद्र मोदी सरकार ने पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध लगाया।

याद रहे कि पी.एफ.आई.ने सन 2047 तक हथियारों के बल पर भारत को इस्लामिक देश बना देने का लक्ष्य तय कर रखा है।उसके लिए वह लगातार काम भी कर रहा है।

पी.एफ.आई.का राजनीतिक संगठन है एस.डी.पी.आई.।

पी.एफ.आई.का महिला संगठन भी है।

सितंबर, 2017 में पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी केरल के कोझीकोड में आयोजित महिलाओं के एक सम्मेलन में शामिल हुए थे।

वह महिला संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया से संबद्ध है।

उस समय उस पर काफी विवाद हुआ था।

सिमी पर जब प्रतिबंध लगा तो सिमी ने सुप्रीम कोर्ट में प्रतिबंध हटाने के लिए याचिका दायर की।तब सिमी के वकील थे बड़े कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद।

यानी,सिमी-पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई.से कांग्रेस का मधुर संबंध रहा है।

सन 2018 के कर्नाटका विधान सभा चुनाव में भी कांग्रेस ने एस.डी.पी.आई. से कुछ क्षेत्रों में चुनावी तालमेल किया था।

इस बार भी दोनों दलों में वैसा ही तालमेल है।

(अभी -अभी मैंने अपने इस वाॅल पर ‘टाइम्स नाऊ’ का एक आइटम शेयर किया है।उसे पढ़ लीजिएगा।देश को सुरक्षित रखना चाहते हों तो इन सब चिंताजनक विवरणों को जरूर पढ़िए।)  

याद रहे कि सब कुछ जानते हुए भी कांग्रेस ने न तो सिमी पर प्रतिबंध लगाया और न ही पी.एफ.आई. पर।

यह देश के लिए कितनी चिंता की बात है,वह आप समझिए।

कल्पना कीजिए कि कांग्रेस कर्नाटका में और बाद में केंद्र में सत्ता में आ जाए तो पी.एफ.आई. को काम करने में कितनी बड़ी सुविधा मिल जाएगी।

  पी.एफ.आई. को केरल की माकपा सरकार ने खुली छूट दे रखी है।

वहां के ईसाई पी.एफ.आई. की हिंसा और लव जेहाद से इतने परेशान हैं कि वे भाजपा में जा रहे हैं।क्योंकि माकपा सरकार से उन्हें सुरक्षा नहीं मिल रही है।

याद रहे कि सन 2008 में जब पाक आतंकवादियों ने मुम्बई के ताज होटल आदि पर हमला किया तो कुछ लोगों ने मनमोहन सरकार को सलाह दी थी कि वह पाकिस्तान पर सख्त कार्रवाई करे।

अपुष्ट खबर के अनुसार मनमोहन सरकार ने 

कहा था कि वैसा करने पर सन 2009 के आगामी लोक सभा चुनाव में हमें मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे।

2014 के लोक सभा चुनाव के बाद ए.के.एंटोनी कमेटी ने कहा था कि हम कांग्रेसी इसलिए भी हारे क्योंकि लोगों की यह धारणा बनी कि हमारी पार्टी का झुकाव मुसलमानों की ओर अधिक था।इसे लोगों ने अच्छा नहीं माना।


    कर्पूरी ठाकुर बनाम अरविंद केजरीवाल

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किसे किस रूप में याद करेगा इतिहास ?!

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     सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल के ‘‘45 करोड़ी शीश महल’’ की जोरदार चर्चा है।

  (वैसे इस मामले में केजरीवाल इस गरीब देश में अकेले नहीं हैं।

पर, उन्होंने हद जरूर कर दी है।

जिस देश के अनेक सरकारी अस्पतालों में डिटाॅल और रूई तक उपलब्ध नहीं हैं।

जहां के अनेक सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए शिक्षक,भवन, बेंच और ब्लैक बोर्ड नहीं है,वहां के अनेक सत्तधारी नेतागण मध्य युगीन ऐयाश राजाओं व बादशाहों की तरह व्यवहार करें तो यह लोकतंत्र कब तक चल पाएगा ?)

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इस पृष्ठभूमि में मुझे अविभाजित बिहार के मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर की याद आ गई।

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कर्पूरी जी जिस झोपड़ी में पैदा हुए,अपने बाल-बच्चों के लिए वही झोपड़ी छोड़ गए।

  समस्तीपुर जिले के पितौझिया गांव  

कर्पूरी जी के न रहने के बाद हेमवतीनन्दन बहुगुणा गए थे।

उस झोपड़ी को देखा तो बहुगुणा जी की आंखों में आंसू आ गए थे।

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अब कर्पूरी ठाकुर के कुत्र्ता फंड की कहानी भी पढ़ लीजिए

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सन 1977 में मुख्य मंत्री बनने के बाद की यह कहानी है।

  उससे पहले वे सन 1967 में उप मुख्य मंत्री और सन 1970 में मुख्य मंत्री रह चुके थे।

कर्पूरी जी 1952 से लगातार किसी न किसी सदन के सदस्य रहे।

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जयप्रकाश नारायण के पटना स्थित आवास पर जेपी का जन्म दिन मनाया जा रहा था।

उस अवसर पर देश भर के जनता पार्टी के बड़े -बड़े नेतागण जुटे थे।

   मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर भी वहां पहुंचे।

  उनका कुत्र्ता थोड़ा फटा हुआ था।

  चप्पल की स्थिति भी ठीक नहीं थी।

दाढ़ी बढ़ी हुई थी। 

और बाल बिखरे हुए थे ।

क्योंकि कंघी शायद ही वे फेरते थे।

  धोती थोड़ा ऊपर करके कर्पूरी जी पहनते थे।

यानी, देहाती दुनिया के सच्चे प्रतिनिधि।

कर्पूरी जी की ‘फटेहाली देख कर’ एक नेता ने कहा कि 

‘‘भई किसी मुख्य मंत्री के गुजारे के लिए उसे न्यूनत्तम कितनी तनख्वाह मिलनी चाहिए ?वह तनख्वाह कर्पूरी जी को मिल रही है या नहीं ?’’

   इस टिप्पणी के बाद जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रशेखर उठ खडे़ हुए।

वे बड़े नाटकीय ढंग से अपने कुत्र्ते के अगले हिस्से के दो छोरों को दोनों हाथों ंसे पकड़कर खड़े हो गये।

  वे वहां उपस्थित नेताओं के सामने बारी -बारी से जा -जाकर वे कहने लगे,

  ‘‘आपलोग कर्पूरी जी के कुत्र्ता फंड में चंदा दीजिए।’’

 चंदा मिलने लगा।

कुछ सौ रुपये तुरंत एकत्र हो गये।

  उन रुपयों को चंद्रशेखर जी ने कर्पूरी जी के पास जाकर उन्हें समर्पित कर दिया और उनसे आग्रह किया कि आप इन पैसों से कुत्र्ता ही बनवाइएगा।

  कोई और काम मत कीजिएगा।

  कर्पूरी जी ने मुस्कराते हुए उसे स्वीकार कर लिया और कहा कि ‘‘इसे मैं मुख्य मंत्री रिलीफ फंड में जमा करा दूंगा।’’

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27 अप्रैल 23.


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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चुनाव मुकाबला कांटे का हो तो भाषणों के स्वर भी हो जाते हैं तीखे

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जब चुनाव मुकाबला कांटे का हो तो अनेक नेताओं की जुबान छुरी की तरह चलने लगती हैं।

कई तो ‘जहर बुझी छुरी’ चलाते रहते हैं।हालांकि सारे नेता एक जैसे नहीं होते।बिहार सहित इस देश के कई नेता अब भी शालीन व गरिमापूर्ण बयानों और भाषणों के लिए जाने जाते हैं। सभी पक्षों के लोग उनका इस कारण सम्मान करते हैं। 

कुछ बदजुबान नेताओं को जवाब देने के लिए कई बार प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल उनसे भी अधिक बदजुबान नेताओं को आगे कर देते हैं।

फिर तो संवाद के स्तर की आप कल्पना कर लीजिए।

क्या ऐेसे संवादों को संबंधित नेताओं की संतानें या परिजन भी पसंद करते हैं ?

कुछ करते होंगे।पर,अधिकतर नहीं करते।

पूछने पर कुछ नेता कहते हैं कि क्या करें,राजनीति में यह सब चलता है।

इन गालियों को होली की गाली की तरह ही बाद में भुला दिया जाता है।

पर,वैसे नेता नहीं समझ पाते कि इससे हर चुनाव के बाद राजनीति के बारे में आम धारणा कुछ और खराब हो जाया करती है।

इससे लोकतंत्र का नुकसान ही होता है।

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नेहरू और वी.पी. के उदाहरण

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सन 1962 में उत्तर प्रदेश के फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ डा.राममनोहर लोहिया उम्मीदवार थे।

चुनाव प्रचार के दौरान 

 प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि 

‘‘राजनीतिक मतभेद अपनी जगह है।

लेकिन अगर मुझसे कोई यह पूछे, मैं अपना वोट किसे दूंगा,तो मैं निश्चित रूप से यही कहूंगा कि मैं अपना कीमती वोट राममनोहर लोहिया को दूंगा।’’

सन 1988 में इलाहाबाद संसदीय उप चुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री व जन मोर्चा के नेता वी.पी.सिंह का मुकाबला कांग्रेस के सुनील शास्त्री से था।

सुनील शास्त्री के पिता लालबहादुर शास़्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपना पांचवां बेटा मानते थे।

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी न तो विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सुनील शास्त्री का नाम लिया और  न ही सुनील शास्त्री ने विश्वनाथ प्रताप सिंह का।व्यक्तिगत आलोचना की बात कौन कहे ! 

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चुनाव का सेमी फाइनल

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कर्नाटका विधान सभा चुनाव के लिए 10 मई, 2023 को वोट डाले जाएंगे।

वहां से मिल रही खबरों के अनुसार उस चुनाव में कई मुद्दे सामने आ रहे हैं।कहते हैं कि मुकाबला कांटे का है।नतीजे के बारे में अनुमान लगाना फिलहाल कठिन हो रहा है।

पर,एक बात तय है।

उस चुनाव के नतीजे से अगले लोक सभा चुनाव नतीजों की एक हल्की झलक मिल सकती है।

वैसे पूरी झलक तो नहीं ही मिलेगी।

इस बीच कुछ अन्य राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं।

हां,देश स्तर पर मुरझाती कांग्रेस में एक हद जान आ जाएगी यदि कांग्रेस  कर्नाटका विधान सभा में अपने बल पर पूर्ण बहुमत हासिल कर ले।उससे प्रतिपक्षी अभियान को भी बल मिलेगा।   

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एक परिवार एक टिकट

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भाजपा ने ‘एक परिवार,एक टिकट’की परंपरा शुरू की है।

भाजपा ने यह शुरूआत गत साल के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से की ।

कर्नाटका के चुनाव में भी यह परंपरा कायम रही।

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से ठीक पहले यह खबर आई थी कि कम से कम दो बडे़ गैर भाजपा  नेताओं का भाजपा में इसी शर्त के कारण प्रवेश नहीं हो सका।क्योंकि वे अपने और अपने पुत्र के लिए चुनावी टिकट चाहते थे।

यह ऐसी परंपरा है जिसे भाजपा विरोधी दल भी अपना सकते हैं।

इससे किसी भी दल में कार्यकर्ताओं  का मनोबल बना रहेगा।यदि अधिक से अधिक टिकट कुछ ही परिवारों में सिमट जाए तो अन्य कार्यकर्ता किस उम्मीद या किस प्रेरणा से पार्टी में काम करते रहेंगे ?

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भूली बिसरी यादें

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एक बार प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने सी.पी.आई.सांसद भोगेंद्र झा से पूछा था,‘‘यदि केदार पांडेय (बिहार के मुख्य मंत्री पद से)को हटा दिया जाए तो कैसा रहेगा ?’’

भोगेंद्र झा ने पूछा -क्यों ?

इंदिरा जी का जवाब था-उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों के 

बहुत से पत्र आ रहे हैं।

झा जी अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘क्रांति योग’ में लिखते हैं-

‘‘सिर्फ उन्हीं के खिलाफ बहुत से पत्र आ रहे हैं ?

यदि हां तब तो किसी संगठित प्रयास से आता होगा।

आपकी पार्टी में कौन है जो भ्रष्ट नहीं है ?

भ्रष्टाचार में केदार पांडेय का नंबर बिहार में पहला,दूसरा,तीसरा,चैथा भी नहीं होगा।पांचवां,छठा,सातवां हो सकता है।जब आप उनको हटाएंगी तो

बिहार अनावश्यक रूप से सामाजिक आधार विभाजित हो जाएगा।’’

इस तरह पांडेय जी को हटाने का प्रस्ताव स्थगित हो गया।

बाद में केंद्रीय मंत्री ललितनारायण मिश्र ने भोगेंद्र झा से कहा कि ‘‘प्रधान मंत्री ने आपकी बात मान ली।’’केदार पांडेय 1972-73 में मुख्य मंत्री थे।

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और अंत में

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अंग्रेजों ने भारत छोड़ते समय चीन को लेकर दो बातें कही थीं।

पहली बात यह कि तिब्बत चीन का है।

दूसरी बात कि भारत और चीन के बीच की मैकमोहन रेखा ही वास्तविक विभाजन रेखा हैं।भारत ने दोनों बातें मान लीं।

पर,उसी बात पर चीन ने तिब्बत को तो हथिया लिया ।पर वह मैकमोहन रेखा नहीं मानता।

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 लेस्ट वी फाॅरगेट !

कहीं हम भूल न जाएं !!

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सुरेंद्र किशोर

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एक बार एक ‘‘रोबिनहुड टाइप नेता जी’’ एक शीर्षस्थ सत्ताधारी के पास पहुंचे।

कहा कि फलां बुद्धिजीवी जी को एम.एल.सी.बना दीजिए।

शीर्षस्थ जी ने कहा कि जब राजपूत को ही बनवाना है तो सुरेंद्र किशोर

को ले आइए।

बना देंगे।

रोबिनहुड जी चुप रह गए।

क्योंकि वे जानते थे कि भले सुरेंदर मेरा जात -भाई है,पर मुझे तो अपनी पीठ पर हाथ रखने ही नहीं देता है।

वह भला मेरे कौन काम का है !

फिर गोइठा में घी क्यों सुखाया जाए !

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पर. वहां शीर्षस्थ जी के पास बैठकर सुन रहे हमारे एक पड़ोसी अफसर दूसरे ही दिन अपने माॅर्निंग वाॅक के बाद मेरे घर पहुंच गए।

हुलसते हुए कहा--सुरेंदर जी,आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी है।चाय पिलाइए।

(नाम लेकर) शीर्षस्थ जी आपको एम.एल.सी.बनाना चाहते हैं।आप उनसे मिल लीजिए।

मैंने हंसते हुए पूछा--आपने दिन में सपना देखा है या रात में ?

थोड़ा गुस्सा का भाव लिए (मुझसे अधिक उम्र के थे और स्वजातीय भी थे)उन्होंने कहा कि आप इसे मजाक मत समझिए।

फिर उस बुजुर्ग जी ने पूरी बात बताई।

यानी रोबिनहुड-शीर्षस्थ संवाद।

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मैंने उनसे कहा कि मेरा फोन नंबर हर साल बिहार डायरी में छपता है।

शीर्षस्थ जी या रोबिनहुड जी मुझे सीधे फोन कर सकते थे।

पर ,उन्होंने तो कभी कोई ऐसा संकेत नहीं दिया।

हां, शीर्षस्थ जी को यह जरूर लगता है कि यदि सुरेंद्र रोबिनहुड जी के संपर्क में आएगा तो मेरे काम भी आ सकता है।अभी तो किसी काम का आदमी है नहीं।

यानी, वह न ओढ़ने लायक है और न ही बिछाने लायक।

उधर रोबिनहुड जी भी समझते हैं कि सुरेंद्र मेरे काम का आदमी  हो ही नहीं सकता।

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अब आप रोबिनहुड जी के नाम के बारे में अनुमान मत लगाने लगिएगा।

 मेरे एक से अधिक स्वजातीय रोबिनहुड रहे हैं।वैसे लोग शीर्षस्थों के करीबी हो ही जाते हैं।

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मैं रोबिनहुडों को पूरा दोष नहीं देता।

मेरा मानना है कि रोबिनहुड कानून-व्यवस्था ध्वस्त होने से ही पैदा होते हैं।मजबूत होते हैं।हालांकि ताकतवर हो जाने के बाद वे सिर्फ रोबिनहुड की ही भूमिका में ही नहीं रहते। 

पर, आज क्या योगी आदित्यनाथ के शासन काल में यू.पी. में कोई दूसरा अतीक अहमद या विकास दुबे बनना चाहेगा ?

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बिहार के एक रोबिनहुड के बारे में मैं जानता हूं, जिसके एक फोन काॅल पर सरकारी आॅफिस में बिना घूस का काम हो जाता था।

इस तरह की अन्य बातें भी हैं।

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यानी,बाहुबलियों,रोबिनहुडों आदि से मुक्ति पानी हो तो कानून-व्यवस्था ठीक कीजिए।घूसखोरी कम कीजिए।आपराधिक न्याय व्यवस्था को बेहतर करने पर ध्यान दीजिए।

ध्यान रहे कि सजा से कोई बच न पाए।

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4 मई 23


गुरुवार, 4 मई 2023

 कम्युनिस्ट -इस्लामिस्ट रिश्ता

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सज्जाद जहीर की पाकिस्तान पीड़ा से 

भी कम्युनिस्टों ने शिक्षा नहीं ली

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सुरेंद्र किशोर

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दुनिया में जहां भी कम्युनिस्टों का शासन है,वहां मुसलमानों का जीना मुश्किल है -जैसे चीन में उइगर मुसलमानों पर अभूतपूर्व जुल्म ढाए जा रहे हैं।

दूसरी ओर, जहां मुसलमानों का शासन है जैसे पाकिस्तान वहां कम्युनिस्ट पार्टी को काम करने की इजाजत नहीं है।

लगभग यही हाल अन्य कम्युनिस्ट और मुस्लिम देशों का है।

पर, भारत एक ऐसा देश है जहां कम्युनिस्ट और अतिवादी मुस्लिम एक दूसरे के मददगार रहे हैं।

उसका ताजा उदाहरण केरल है।

वहां की माकपा सरकार पी.एफ.आई.की खुलकर मदद करती रही है।

पी.एफ.आई.का घोषित लक्ष्य है कि हथियारों के बल पर सन 2047 तक पूरे भारत को इस्लामिक देश बना देना है।

पर,पी.एफ.आई.को इस बात का अफसोस है कि उसके साथ यहां के 10 प्रतिशत मुसलमान भी नहीं हैं।

(यह भारत के लिए शुभ संकेत है।

क्योंकि भारत के अधिकतर मुस्लिम शांतिप्रिय हैं।

हालंाकि कोई अन्य तथाकथित सेक्युलर दल भी पी.एफ.आई.के खिलाफ खुलकर नहीं बोलता है।)

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सन 1942 में प्रमख कम्युनिस्ट नेता गंगाधर अधिकारी ने एक सिद्धांत दिया था।

वह यह था कि भारत कोई राष्ट्र नहीं है।

इसलिए यह आने वाले वर्षों में कई भागों में बंट जाएगा।

सन 1947 में तो पाकिस्तान बन गया।

केरल के माकपा के मुख्य मंत्री ने जब वहां के डी.जी.पी.की सिफारिश के बावजूद पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध नहीं लगाया तो केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

पी.एफ.आई.की हिंसा से जब केरल की सरकार ने ईसाइयों को नहीं बचाया तो ईसाई लोग भाजपा से अब जुड़ने लगे हैं।

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 पाक से लौटना पड़ा था सज्जाद जहीर को

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सज्जाद जहीर उत्तर प्रदेश के एक अच्छे खानदान से आते थे।

उनके पिता न्यायाधीश थे।

फिर भी उन्होंने संघर्ष का जीवन अपनाया।

आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

कम्युनिस्ट बने।

उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।

भारत के बंटवारे के बाद सी.पी.आई.ने इस प्रमुख कम्युनिस्ट नेता सज्जाद जहीर को पाकिस्तान भेजा ताकि वे वहां बेहतर ढंग से पार्टी का काम हो सके।

  पर, वहां जाकर जहीर को निराशा हुई।

वहां उनके काम करने का कोई माहौल ही नहीं था।

उन्हें सन् 1951 में धर्म के नाम पर गठित पाक सरकार ने सज्जाद जहीर को वहां की जेल में डाल दिया।

  प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की मदद से किसी तरह जेल से छूटे और सन 1954 में भारत लौट सके।

 सन 1973 में उनका निधन हो गया।

याद रहे कि फिल्म अभिनेता राज बब्बर की पहली शादी सज्जाद जहीर की  बेटी नादिरा से हुई थी।

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दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल का भी यही हाल हुआ था।वे विभाजन के बाद पाक चले गये।वहां मंत्री बन गए।पर,जब उन्होंने देखा कि वहां तो दलितों का भी तेजी से धर्मांतरण हो रहा है और उनका कुछ नहीं चल रहा है तो वे भागे -भागे भारत लौट आए।

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4 मई 23