बुधवार, 10 जनवरी 2024

 यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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देश की विधायिकाओं का एजेंडा प्रतिपक्ष भी तय करे

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क्यों न इस देश में भी विधायिकाओं के हर सत्र के कुछ खास दिनों के एजेंडा प्रतिपक्ष तय करे ?

ब्रिटेन और कनाडा में यह परंपरा जारी है।

यदि यहां भी वैसा हो जाए तो शायद सदन के संचालन में उससे फर्क पड़े।

शोरगुल कम हो !

पता नहीं, हमारे संविधान निर्माताओं ने इस पर सोच-विचार किया था या नहीं।

पर,अब तो इसकी जरूरत लग रही है।

इस देश में संसद सहित विधान सभाओं और विधान परिषदों  में शांति बहाल रखना दिन प्रति दिन मुश्किल होता जा रहा है।

ऐसे में इस फार्मूले को अपनाने में क्या हर्ज है !

शायद उससे प्रतिपक्षी दलों को कुछ संतुष्टि मिले।

याद रहे कि ब्रिटिश संसद के हर सत्र के 20 दिन वहां के प्रतिपक्षी दल सदन की कार्यवाही का एजेंडा तय करते थे।

कनाडा में 22 दिन ऐसा होता है।

यदि एक से अधिक दल प्रतिपक्ष में हैं तो उतना समय उन दलों के बीच उनकी सदस्य संख्या के अनुपात बांट दिया जाता है।

हां,यदि प्रतिपक्ष के किसी मुद्दे पर सदन में मतदान होता है तो उसके नतीजों को स्वीकार करने के लिए सरकार बाध्य नहीं हेाती।

हाल में भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि असली मुद्दों पर सदन में चर्चा नहीं हो रही है।

यदि उन्हें कुछ दिन मिल जाएं तो वे ‘‘असली मुद्दों’’ को एजेंडा बना सकंेगे।

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भाजपा पहल करे

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सांसदों से कहा है कि वे संयम बरतें और लोकतांत्रिक मानदंड के अनुसार व्यवहार करें।

अभी तो उनका इशारा संसद में शालीनता और संयम बरतने को लेकर हैं।

किंतु ऐसे निदेशों को विधान सभाओं और परिषदों में मौजूद भाजपा सदस्यों तक भी पहुंचाया जाना चाहिए।

यदि ऐसे निदेश का पालन हो सका तो देश की विधायिकाओं में अच्छी परंपरा की शुरूआत होगी।

जिन राज्यों में गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं,क्या उन राज्यों की विधायिकाओं में भाजपा सदस्यगण अपने आचरण से आदर्श उपस्थित करेंगे ?

यदि ऐसा हुआ तो संसद के प्रतिपक्षी दलों से भी आदर्श पेश करने के लिए कहने का नैतिक हक भाजपा को हासिल होगा।

चूंकि भाजपा एक अनुशासित दल है,इसलिए वह इसकी शुरूआत कर सकती है।

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कैसे सुधरेगी बिहार की शिक्षा ! 

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बिहार के अतिरिक्त मुख्य सचिव के.के.पाठक राज्य के शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक कार्य कर रहे हैं।

 उसका सकारात्मक असर है।

 आम जनता के.के.पाठक की इस पहल की सराहना कर रही है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का भी संरक्षण श्री पाठक

को हासिल है।  

पर,कुछ खास हलकों में के.के.पाठक की पहल का तीखा विरोध हो रहा है।

ऐसे में क्या पाठक जी अभियान अधिक दिनों तक जारी रख पाएंगे ?

अपवादों को छोड़कर बिहार में शिक्षा-परीक्षा की आज जो दुर्दशा है,उसमें सुधार का काम अगली पीढ़ियों के लिए नहीं टाला जा सकता है।

 इन पंक्तियों का लेखक दशकों से देख रहा है कि किस तरह यहां की अच्छी शिक्षा व्यवस्था को धीरे धीरे बर्बाद कर दिया गया।

 कई तत्व जिम्मेदार रहे हैं।एक उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग   

बने।दुर्दशा के कारणों को चिन्हित करे।सुधार के उपाय सुझाये।सरकार उन उपायों को लागू करे।

अन्यथा, अधिकतर शिक्षण संस्थान सिर्फ सर्टिफिकेट

बांटने के काउंटर भर बनकर रह जाएंगे।     

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तब और अब की कहानी

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साठ के दशक की बात है।

बिहार के औरंगाबाद जिले के एक क्षेत्र से विधायक ब्रजमोहन सिंह राज्यस्तरीय नेता से बातचीत कर रहे थे।

ब्रजमोहन सिंह ने कहा कि मैं इन दिनों क्षेत्र के विकास के काम में लगा था,इसलिए आपसे बीच में मिल नहीं सका था।

दिवंगत ब्रजमोहन बाबू ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि मुझे उम्मीद थी कि नेता जी मेरी तारीफ करेंगे।

पर,उल्टे उन्होंने कहा कि ज्यादा विकास वगैरह के काम में लगोगे तो अगली बार चुनाव नहीं जीत पाओगे।

क्योंकि सरकार से कितने गांवों का विकास करवा पाओगे ?

साधन इतना कम है कि कुछ ही गांव का करा पाओगे।

नतीजतन जिन गावों का नहीं होगा, उन गांवों के लोग तुमको अगली बार वोट नहीं देंगे।

आज यानी सन 2023 में स्थिति बदल चुकी है।

हर तरफ विकास व कल्याण के थोड़ा-बहुत काम हो रहे हैं।केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होड़ है।

अन्य गांवों का भी यही हाल है।पर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं अपने गांव का हाल बताता हूं।

गांव के दक्षिण से उत्तर की ओर पक्की सड़क बन रही है।

पूरब से पश्चिम ओर सीमेंटी सड़क की योजना है।नदी में घाट बन रहा है।

कई साल पहले मेरे प्रयास से वहां कुछ विकासात्मक काम हुए थे।

पर,इन दिनों राज्य के सामान्य विकास के क्रम में मेरे पुश्तैनी गांव का भी विकास हो रहा है।

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और अंत में

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मध्य प्रदेश विधान सभा भवन से जवाहरलाल नेहरू का चि़त्र हटा दिया गया।

कुछ साल पहले जब कमलनाथ ने मुख्य मंत्री पद संभाला तो उन्होंने जेपी सेनानी पेंशन योजना बंद कर दी थी।यह सब चलता रहता है।

बिहार में ,जहां आंदोलन सर्वाधिक सघन था,जेपी सेनानी को अधिकत्तम हर माह 15 हजार रुपए मिलते हैं।मध्य प्रदेश में तब 25 हजार रुपए मिलते थे।

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21 दिसंबर 23


 वेबसाइट मनी कंटा्रेल हिन्दी पर प्रकाशित

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मधु लिमये की पुण्य तिथि (8 जनवरी) पर 

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हंगामे के बिना ही सरकार और संसद को हिला देने वाले मधु लिमये जैसे सांसद का इंतजार है इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को

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सुरेंद्र किशोर

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    बिहार से लोक सभा के सदस्य रहे मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं।

‘‘वन मैन आर्मी’’ लिमये जब लोकसभा में बोलने के लिए

उठते थे तो सरकार सिहर जाती थी।

क्योंकि उनकी बातें तथ्यों से परिपूर्ण होती थीं।

 मुंगेर और बांका से बारी -बारी-बारी से दो-दो बार सांसद रहे मधु लिमये ने सिखाया था कि  

प्रभाव पैदा करने के लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए।

नियमों के इस्तेमाल की सलाहियत भी।

 सन 1964 में मुंगेर से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को यह सब अच्छी तरह आता था।

वे तब एक उप चुनाव में विजयी हुए थे।

  आज यह देखकर लोगबाग दुःखी होते हैं कि जन प्रतिनिधियों को  अपनी बातें  कहने के लिए अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है।

  आज जब संसद व विधान सभाओं  की गरिमा का अवमूल्यन हो रहा है ,मधु लिमये जैसे ‘सभा -चतुर’ नेता अधिक ही याद आते हैं।उन दिनों मधु लिमये जैसे कई अन्य सांसद भी थे।फिर भी मधु सबसे अलग थे।

   बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी -बारी से  गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं  नेताओं की भी कमी नहीं रही।उन बड़े नेताओं व काबिल सांसदों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी।

उनमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी,

अशेाक मेहता,

जार्ज फर्नाडिस,

आई.के.गुजराल,

युनूस सलीम,

कपिल सिब्बल,

रवींद्र वर्मा,

नीतीश भारद्वाज,

मीनू मसानी,

लक्ष्मी मेनन और एम.एस.ओबराय प्रमुख थे।

  मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा।

  वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ  बिहार की मौलिक समस्याओं को भी समान ऊर्जा व मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन व भाषण  चर्चित हुए। 

हंगामे के बिना आज जिन छोटे -बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए ।

 हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता आज जरा दूर ही रहना चाहते हैं।

समाजवादी विचारक व सभा चतुर मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूणे में हुआ था।

  उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ।

वे दो बार मुंगेर(1964 और 1967 )और दो बार बांका(1973 और 1977)से लोक सभा सदस्य चुने गये।

 सांसद के रूप में मधु लिमये ने तत्कालीन केंद्र सरकार को इतना हिला दिया था कि प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने यह सुनिश्चित किया कि वे अगले चुनाव में हार जाएं।

सन 1971 के चुनाव से ठीक पहले तब के एक ताकतवर कांग्रेसी नेता व ‘शेरे बिहार’ के नाम से चर्चित रामलखन सिंह यादव के सामने अपनी आंचल पसार कर इंदिरा जी ने उनसे यह आग्रह किया था कि  ‘‘आप मुंगेर और बाढ़ की  सीटें हमें विशेष तौर पर उपहार में दे दीजिए।’’

यानी, इंदिरा जी मधु लिमये और तारकेश्वरी सिंहा (बाढ़ से सांसद)को किसी भी कीमत पर सदन में नहीं देखना चाहती थीं।

इस काम में यादव जी ने स्वजातीय मतदाताओं के जरिए उनकी मदद कर दी थी। 

लिमये और तारकेश्वरी सिन्हा दोनों हार गए थे।

 वैसे भी तब ‘गरीबी हटाओ’ का नारे का इंदिरा जी के पास बल  था।  

पर दो साल बाद ही यदि मधु लिमये एक उप चुनाव के जरिए बिहार के ही बांका से 

लोक सभा मे ंचले गये थे तो यह उनके प्रति बिहारी कृतज्ञ मानस का उपकार का भाव ही था।

  मधु ने बिहार का नाम ऊंचा ही किया था।मधु लिमये की चर्चा करने पर 

कुछ  विदेशी राजनयिक भी दिल्ली में यह पूछते थे कि वे कहां से चुनाव जीतते हैं ?

 वैसे क्षेत्रों से कैसे जीतते हैं जहां उनकी जाति यानी ब्राह्मणों के वोट अधिक नहीं हैं ? 

  इस सूचना  के बाद कई विदेशी राजनयिकों  के मन में यह बात भी कुलबुलाने लगती थी कि तब क्यों बिहार को जातिवादी राज्य कहा जाता है ? 

    मधु लिमये ने ऐसे समय में लोक सभा में अपनी संसदीय योग्यता की धाक जमाई थी जब के स्पीकर लोहियावादी समाजवादी सांसदों के सदन में खड़ा होने के साथ ही उन्हें  तत्काल बैठा देने की कोशिश करने लगते थे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वे जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गांधी  के खिलाफ कोई सांसद कटु बात बोल दे।

नेहरू 1964 तक प्रधान मंत्री थे।नेहरू के कटु आलोचक व अदमनीय समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया ने 1963 में लोक सभा में प्रवेश करने के साथ ही नेहरू पर ऐसे कठोर प्रहार शुरू कर दिये थे कि स्पीकर सदा सतर्क रहते थे।

    पर, चूंकि मधु के पास संसदीय फोरम के इस्तेमाल की चतुराई थी,इसलिए उन्हें अपनी बातें कहने से 

 स्पीकर रोक भी नहीं पाते थे।

स्पीकर उन दिनों लोकलाज का काफी ध्यान रखने वाले नेता हुआ करते  थे।

संविधान व लोक सभा की कार्य संचालन नियमावली का सहारा लेकर जब मधु लिमये  प्रस्ताव व सूचनाएं देते थे । उन पर चर्चाएं कराने पर स्पीकर मजबूर हो जाते थे।

इस तरह संसदीय प्रक्रियात्मक ज्ञान का उपयोग करके मधु लिमये देश व समाज के लिए काफी कुछ कर पायेे।

   उनसे ‘‘सकारात्मक ईष्र्या’’ रखने वाले एक अन्य समाजवादी चिंतक व पूर्व सांसद किशन

 पटनायक ने मधु लिमये के बारे में उनके निधन के बाद  लिखा था कि ‘‘एक श्रेष्ठ कोटि के सांसद के रूप में मधु की प्रतिष्ठा हुई।मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विरोध में उनका हमला इतना कारगर होने लगा था कि बड़े नेताओं में उनके प्रति भय हुआ।

सन 1964 से 1967 के बीच सांसद के रूप में उनका जो उत्थान हुआ ,उसका मैं सदन के भीतर प्रत्यक्षदर्शी था।

 संसदीय प्रणाली व संविधान के बारे में उनका ज्ञान अद्वितीय था।मधु लिमये शुरू से मेरे लिए आदर, ईष्र्या व असंतोष के पात्र रहे।

मेरे स्वभाव में है कि ईष्र्या उस व्यक्ति के लिए होती है जिसके लिए मेरे मन प्यार होता है।’’

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8 जनवरी 24 को प्रकाशित


 ‘‘ईमानदारी के 90 प्रतिशत पेट्रोल में जब तक बेईमानी के 10 प्रतिशत मोबिल नहीं मिलाओगे,तबतक जीवन की गाड़ी नहीं चलेगी’’

---धर्मेंद्र के नायकत्व में 60 के दशक में बनी 

एक फिल्म में नायक के जोकर साथी का डाॅयलाग।

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सुरेंद्र किशोर

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साठ के दशक में एक फिल्म आई थी जिसके हीरो धर्मेंद्र थे।

हीरो आदर्शवादी था।

उनके जोकर मित्र की भूमिका में

महमूद या जाॅनी वाॅकर थे,ठीक -ठीक मुझे याद नहीं।

धर्मेंद्र संभवतः एक अत्यंत ईमानदार सरकारी सेवक की भूमिका मंे थे।

और भ्रष्टाचार से पूरी तरह अलग थे--यानी 24 कैरेट के सोना।

नीतजतन उन्हें कदम-कदम पर भारी कष्ट हो रहा था।

जोकर साथी ने हीरो धर्मेंद्र से एक दिन कहा--



‘‘अरे भई ,ईमानदारी के 90 प्रतिशत पेटा्रेल में बेईमानी के 10 प्रतिशत मोबिल जब तक नहीं मिलाओगे, तब तक जीवन की गाड़ी नहीं चलेगी।’’

संभवतः तब सरकारी घूस का रेट 10 प्रतिशत ही रहा होगा।

अब तो औसतन 40 प्रतिशत की खबर है।

अंदाज लगा लीजिए कि जीवन की गाड़ी को 

रफ्तार में लाने के लिए कितना मोबिल आज मिलाना पड़ता होगा !!

बिहार के चारा घोटाले की एक कहानी--

 पशुपालन विभाग का पूरे साल का बजट 75 करोड़ रुपए का था।

पर घोटालेबाजों ने जाली बिलों के आधार पर खजाने से उस साल निकाल लिए थे 225 करोड़ रुपए।

अब आप खुद ही इसका प्रतिशत निकाल लीजिए।

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  जो अत्यंत थोड़े से लोग आज भी फिल्मी धर्मेंद्र की भूमिका में हैं,उनके जीवन के साथ क्या-क्या  हो रहा है,कभी सोचा है ?

उसकी कल्पना कर लीजिए।

दो जून की रोटी और तृतीय श्रेणी का जीवन स्तर बनाये रखने के लिए कई बार बुढ़ापे तक भी हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।

क्योंकि सेवा काल में और सेवांत लाभ उठाकर अपनी कमाई तो बाल-बच्चों को स्थापित करने में पहले ही खप चुकी होती है।

 इस ढीले-ढाले लोकतंत्र के हमारे आधुनिक हुक्मरानों ने सामान्य जनता के लिए यही उपहार दिया है--और उनके खुद के लिए ?

थोड़ा कहना, अधिक समझना और सिस्टम पर कंूढ़ना !

हालांकि इसके थोड़े ही हुक्मरान अपवाद भी हैं जिनकी गद्दी और जान पर खतरा बना रहता है।

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 7 जनवरी 24

 

    


 विश्व हिन्दी दिवस पर

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सुरेंद्र किशोर

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1.-रिमबर्स

2.-टर्न आउट

3.-रेंडमाइजेशन

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 हिन्दी अखबारों में ऊपर लिखे शब्दों का इस्तेमाल होते मैंने हाल में देखा।

  इस बात के बावजूद कि हिन्दी अखबारों के पाठक पीएच.डी.से लेकर नन-मैट्रिक तक होते हैं।

अखबार पढ़ते समय कितने लोग शब्दकोश लेकर बैठते हैं ?

कितने नान-मैट्रिक या उससे भी थोड़ा अधिक पढ़े -लिखे लोग ऊपर लिखे तीन शब्दों के अर्थ जानते हैं ?

अब हिन्दी अखबारों में इस तरह के अन्य अनेक अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। 

मैंने तो नमूना के तौर पर सिर्फ तीन शब्दों की चर्चा की।

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कौन कहेगा कि रेलवे स्टेशन के बदले आप ‘लौह पथ गामिनी विराम स्थल’ का इस्तेमाल करें ?

अंग्रेजी के आक्सफोर्ड शब्दकोश में भी भारतीय शब्दों को अंगीकार किया गया है।

जैसे-जुगाड़,

दादागिरी,

नाटक,

सूर्य नमस्कार,

अन्ना,

अब्बा, 

गुलाब जामुंन, 

वाडा आदि आदि। 

हिन्दी अखबारों मेें वैसे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया ही जा सकता है जो यहां आम लोगों की बोलचाल में हैं।

अन्यथा, कम अंग्रेजी जानने वाले वैसे हिन्दी अखबारों को ही पसंद करेंगे जो अंग्रेजी के कठिन शब्दों का इस्तेमाल न करते हांे।

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10 जनवरी 24

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पुनश्चः

सन 1977 से 1983 तक जब मैं दैनिक ‘आज’ में काम कर रहा था तो इस संबंध में बहुत सारी बातें संपादक लोग हमें बताया करते थे। अनुवाद के बारे में भी।

कहते थे कि यह लिखना सही नहीं है कि निर्णय लिया गया।

निर्णय कहीं रखा हुआ नहीं था जो आपने उसे ले लिया।

बल्कि आपने निर्णय किया।

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एक बार एक मझोले कद के नेताजी ‘आज’ आॅफिस में आये।

उन्होंने अपना ‘हैंडआउट’ संपादक पारसनाथ सिंह को दिया।

उनसे परिचित थे।

उसमें उन्होंने किसी बड़े नेता के जन्म दिन पर उन्हें बधाई दी थी।

वे चाहते थे कि छपे। 

पारस बाबू ने उनसे कहा कि यह आपके और नेता जी के बीच का मामला है।

आप उन्हें व्यक्तिगत चिट्ठी भिजवा दें।

आपकी बधाई से हमारे अखबार के आम पठकों का भला क्या लेना -देना !

न्यूज प्रिंट बड़ा महंगा होता है।

उसका हम ऐसी सामग्री के लिए उपयोग नहीं कर सकते।

बेचारे उदास होकर चले गये थे।

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सोमवार, 8 जनवरी 2024

 दूध(चैधरी चरण सिंह और चंद्र शेखर)का जला नेहरू-गांधी परिवार 

ने 10 साल तक मन को मोहने वाला मट्ठा पीकर काम चलाया था।

ऐसे में खास तरह के एक नेता कैसे यह उम्मीद कर बैठे कि उन्हें प्रधान मंत्री बना दिया जाएगा ?

जबकि, उनका यह बयान अक्सर आता रहा है कि

 (अपवादों को छोड़कर )

‘‘मैं न तो किसी को फंसाता हूं और न ही किसी को बचाता हूं।’’

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जब गठबंधन ही इसलिए बना है ताकि ‘‘केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपययोग’’ को रोका जाए तो गठबंधन के मूल उद्देश्य से ही गठबंधनी नेतागण क्यों कभी अलग होंगे ?

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कभी- कभी कुछ चतुर-सुजान नेता लोग भी किसी असंभव की 

उम्मीद में आरत हृदयी होकर अपना राजनीतिक काॅमन सेंस भी भूलकर इधर-उधर नाहक भटकने लगते हैं।

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जहाज का पक्षी उतना ही उड़ता है ताकि पुनि जहाज पर आवे वाली उसकी स्थिति बनी रहे।

पुनि जहाज पर आ जाने के कारण उस पक्षी की कोई आलोचना नहीं करता।

तुलसी दास कहते हैं 

--मंत्री,गुरु,वैद्य,जौं प्रिय बोलहिं भय आस

राजधर्म तन तीनि कर होइ बेगिही नास

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दरअसल दिक्कत यह है कि अधिकतर सत्ताधारियों की, सत्ता संभालते ही, अप्रिय सत्य सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती है।

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27 दिसंबर 23




   


रविवार, 7 जनवरी 2024

 कर्पूरी ठाकुर जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर

( 24 जनवरी 1924--17 फरवरी 1988)

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कर्पूरी ठाकुर को ‘पिछड़ा नेता’ या ‘अति पिछड़ा 

नेता’ बताना उन्हें छोटा करके दिखाना हुआ

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सुरेंद्र किशोर

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‘‘ कर्पूरी जी, आप सभी जातियों का नेता बनने का मोह छोड़िए।

आप सिर्फ पिछड़ों का नेता बनिए।

आपमें उत्तर भारत के कामराज बनने की क्षमता है।

आप हनुमान जी की तरह ही अपनी ताकत का आकलन नहीं कर पा रहे हैं।’’

  यह बात जब प्रमुख समाजवादी नेता भोला प्रसाद सिंह कर्पूरी जी से कह रहे थे,तब मैं वहां मौजूद था।

तब मैं राजनीतिक कार्यकर्ता की हैसियत से कर्पूरी जी का निजी सचिव (1972-73) था।

कर्पूरी जी तब बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।

भोला बाबू की बातों को कर्पूरी जी ने सिर्फ सुना।

उस पर कोई टिप्पणी उन्होंने नहीं की।

हां, उनके चेहरे पर जो भाव थे,उससे मुझे लगा कि भोला बाबू की बात को उन्होंने पसंद नहीं किया। 

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बिहार की सरकारी सेवाओं के सन 1978 में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ।

यह काम मुख्य मंत्री के रूप में कर्पूरी ठाकुर ने किया।

26 में 12 प्रतिशत अति पिछड़ों और 8 प्रतिशत पिछड़ों के लिए आरक्षण हुआ।

 3 प्रतिशत महिलाआं और 3 प्रतिशत सवर्णों  के लिए भी आरक्षण हुआ।

चूंकि पिछड़ों की अपेक्षा अति पिछड़ों को अधिक आरक्षण मिला था,इसलिए कई लोगों ने कर्पूरी जी को अति पिछड़ों का नेता कहना शुरू कर दिया।

पर,पंचायतों में अति पिछड़ों के लिए आरक्षण का काम तो मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने किया।उसके कारण कोई नीतीश कुमार को सिर्फ अति पिछड़ों का नेता तो नहीं कहता।

दरअसल यह समाजवादियों की सोच रही है कि कमजोर वर्ग के लोगों के लिए विशेष प्रावधान किया जाये।

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मैंने 1967 से 1977 तक एक समाजवादी कार्यकर्ता की नजर से कर्पूरी जी को देखा।

1977 से 1988 तक उन्हें एक सक्रिय पत्रकार की नजर से मैंने देखा।

डेढ साल तक मैं पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित उनके सरकारी आवास में रहा।

इतने लंबे समय तक आप यदि किसी व्यक्ति के साथ रात-दिन रहते हैं तो आप उनके गुण-दोष जान जाते हैं।

कुल मिलाकर मेरा आकलन है कि कर्पूरी जी जैसा महान नेता मैंने कोई और नहीं देखा।कुछ अन्य वैसे जरूर होंगे,पर मैंने नहीं देखा।

जातीय पक्षपात की भावना तनिक भी कर्पूरी जी में नहीं थी।हां,किसी कमजोर के साथ अन्याय होता था तो वे जरूर उठ खड़े होते थे।

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कोई नेता अपना निजी सचिव किस जाति के व्यक्ति को रखता है,उससे पूरा तो नहीं लेकिन,एक हद तक उस नेता की पहचान हो जाती है।

कर्पूरी जी जब 1967 में उप मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने बिहार प्रशासनिक सेवा के एक ईमानदार अफसर यू.पी.सिंह को ,जो राजपूत हैं,अपना निजी सचिव बनाया था।तब मैंने अम्बिका दादा से पूछा था कि राजपूत को कैसे बनाया?(तब तक यू.पी.सिंह मेरे रिश्तेदार नहीं बने थे) 

दादा ने कहा कि यह ईमानदार अफसर है।

वे बाद में श्री सिंह आई.ए.एस.भी बने।अब भी हमलोगों के बीच मौजूद हैं।

उनके पुत्र व मशहूर नेत्र चिकित्सक डा.सुनील कुमार सिंह उनके पुत्र हैं।सुनील जी जदयू के प्रवक्ता भी हैं।

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सन 1972 में बिहार सरकार ने कर्पूरी जी के साथ काम करने के लिए टाइपिस्ट रामचंद्र ठाकुर को भेज दिया।

(मैं तब निजी सचिव था)

कर्पूरी जी ने जब यह जाना कि रामचंद्र जी हज्जाम हैं तो उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया--कहा कि यह सड़े हुए दिमाग के अफसरों का काम है।मैंने तो विभाग से किसी खास जाति का टाइपिस्ट नहीं मांगा था।

पर,साथ में काम करने के सिलसिले में मुझे लगा कि रामचंद्र बाबू की शालीनता,ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण उन्हें कर्पूरी जी के यहां भेजा गया था।

संभव है कि जाति वाली बात भी संसदीय कार्य विभाग के अफसरों के दिमाग में हो।

क्योंकि तब भी अधिकतर मंत्री अपनी ही जाति के स्टाफ मांगते रहे थे।

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1978 के पिछड़ा आरक्षण का भी बिहार में भारी विरोध हुआ था।कर्पूरी जी को जमकर गालियां दी गयीं।

पर,अपने शालीन स्वभाव के कारण कर्पूरी जी ने पलट कर जवाब नहीं दिया।

पर,जब 1990 के मंडल आरक्षण के समय लालू प्रसाद ने पलट के जवाब दिया तो पिछड़ों में लालू के पक्ष में अभूतपूर्व एकता आ गयी।

यह और बात है कि लालू प्रसाद उस एकता को कायम नहीं रख सके।

जवाब देने का यह काम यदि कर्पूरी जी ने 1978 में किया होता तो बाद में भी वे सत्ता में आते।पर,वैसी भाषा-शब्दावली कर्पूरी जी के स्वभाव में नहीं थी।

याद रहे कि 1978 के आरक्षण विवाद के बाद भी कर्पूरी जी के एक निजी सचिव सवर्ण रहे।

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7 जनवरी 24


शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

 कहते हैं कि हम धर्म बदल

 सकते हैं,किंतु जाति नहीं

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हालांकि एक पिछड़ी जाति का व्यक्ति सोम यज्ञ 

करके ब्राह्मण बन गया था।

यह कैसे संभव हुआ ? !

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सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा के सदस्य रहे भाजपा नेता

तरुण विजय ने नागपुर के डा.श्रीकांत जिचकर के बारे में पांचजन्य (13 जून 2004)में लिखा था--

‘‘विद्वान शिरोमणि यौवन तेज से भरपूर सुदर्शन चेहरा एवं वाणी मेें नूतन ब्राह्मण का परिमर्जित माधुर्य।’’

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 पिछड़ी जाति में जन्मे डा.जिचकर ने खुद कहा था कि 

‘‘अब मैं दीक्षित हो गया हूं।

 दीक्षा प्राप्त करने के बाद ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठत्तम परंपरा में सम्मिलित हो गया हूं। 

मैं जन्म से ब्राह्मण नहीं था।

 परंतु घर में अग्नि प्रतिष्ठापित कर अग्निहोत्र धर्म का नियमानुसार पालन कर और अब सोम यज्ञ द्वारा दीक्षित होने के बाद मैं स्वयं को दीक्षित कहने का अधिकारी हो गया हूं।’’

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सर्वाधिक शिक्षित होने का विश्व रिकाॅर्ड कायम कर चुके दिवंगत डा.जिचकर के बारे में जान लीजिए।

 जिचकर (1954--2004)न सिर्फ महाराष्ट्र सरकार के  मंत्री थे बल्कि राज्य सभा के सदस्य भी थे।

वह महाराष्ट्र विधान परिषद के भी सदस्य रहे।

उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर एक बार लोक सभा का चुनाव भी लड़ा था।

पर वे विफल रहे।

सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा से  इस्तीफा दे दिया था।

     जिचकर एम.बी.बी.एस. और एम.डी. थे।

 वह एलएल.बी., एलएल.एम. और एम.बी.ए. भी थे।

उन्होंने पत्रकारिता की भी डिग्री ली थी।

दस विषयों में एम.ए. थे।

1973 से 1990 के बीच उन्होंने कुल 20 डिग्रियां लीं।

सारी परीक्षाओं में उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्णता हासिल की।

उन्हें कई स्वर्ण पदक भी मिले।

वह संस्कृत में डि लिट थे।

 1978 में आई.पी.एस.बने।

 इस्तीफा देने के बाद आई.ए.एस.बने।

1980 में महाराष्ट्र विधान सभा के सदस्य बने। 

मंत्री भी बने।

 उनके पास 14 विभाग थे।

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   डा. जिचकर का नाम लिम्का बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में  भारत के सबसे अधिक योग्य और निपुण व्यक्ति के नाते दर्ज है।

 वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने जीरो बजट की अवधारणा को कार्यरूप दिया था। 

डा. जिचकर को समय -समय पर याद करके नागपुर का  अभिभावक अपने बच्चों से कहता है कि ‘बेटा, बड़ा होकर श्रीकांत जिचकर की तरह बनना। ’

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वह आधुनिक राजनीति में एक,संभवतः एकमात्र, ऐसे व्यक्ति थे जिनको कोई पिता दिल्ली में अपनी संतान का स्थानीय अभिभावक बना सकता था।

 आज कितने अभिभावक दिल्ली में अपनी संतान का लोकल र्गािर्जयन किसी सांसद को बनाना पसंद करेंगे ?

   डा. जिचकर ने नागपुर में एक विद्यालय की स्थापना की थी ।

उस स्कूल के बारे में अभिभावकों से अपील करते हुए अखबार में विज्ञापन छपा था, 

‘‘ डा. श्रीकांत जिचकर जिस विद्यालय में अपने बेटे को प्रवेश दिला रहे हैं, क्या आप अपने बच्चों को भी उसी विद्यालय में पढ़ाना चाहेंगे ? ’’

 इस विज्ञापन के छपते ही सैकड़ों अभिभावकों की भीड़ लग गई थी।

यानी, उन्होंने एक ऐसा गुणवत्तापूर्ण स्कूल स्थापित किया था जिसमें उनका बेटा भी पढ़ सके।

   इतनी अधिक पढ़ाई लिखाई करने के साथ -साथ वह छात्र राजनीति में भी रूचि लेते थे।

वह  नागपुर छात्र संघ के अध्यक्ष भी  थे।

 इसके अलावा भी उनके पास डिग्रियां और उपलब्धियां थीं। 

सन् 1983 में दुनिया के दस सर्वाधिक प्रमुख युवा व्यक्तियों की सूची में 

 शामिल होने का सम्मान उन्हें मिला था।

  वह सन 1992 में राज्य सभा के सदस्य चुने गए।

पी.वी.नरसिंह राव उन्हें पसंद करते थे।

राव ने डा. जिचकर को इंदिरा गांधी से मिलवाया था।

डा.जिचकर ने  अधिकतर देशों की यात्राएं की थीं।

उनके निजी पुस्तकालय में 52 हजार पुस्तकें थीं।

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वे छायांकन, चित्र कला, रंगकर्म के भी जानकार थे।

 उन्हें संपूर्ण गीता कंठस्थ थी। 

साथ ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था।

    खेतिहर परिवार के जिचकर के साथ एक सुविधा अवश्य थी कि पैसे की कमी के कारण उनका कोई काम नहीं रुका।

 एक व्यक्ति सिर्फ 50 साल की उम्र में ही यह सब प्राप्त कर ले, यह अकल्पनीय लगता है।

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    उनमें  और भी अनेक गुण थेे।

पर सबसे बड़ी बात यह थी कि वे राजनीति में भी थे।

 यानी ऐसे लोग राजनीति में आ सकते हैं ,यदि उनके लिए सम्मानपूर्ण जगह बनाई जाए।

 हालांकि आज जितने लोग राजनीति मंे हैं, उनमें से भी अनेक लोग योग्य और कत्र्तव्यनिष्ठ हैं।अभी भाजपा के राज्य सभा सदस्य डा.सुधांशु त्रिवेदी श्रेष्ठ हैं।

 पर, वैसे लोगों की संख्या घटती जा रही है।

यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बात है।

   डा. जिचकर जैसी विभूतियों को समय -समय पर याद करके नई पीढ़ी को प्रेरित किया जा सकता है।

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5 जनवरी 23