मंगलवार, 9 मार्च 2021

 13 सितंबर, 2008 को इंडियन मुजाहिदीन ने दिल्ली में

कई जगह विस्फोट करके 26 लोगों को मार डाला।

(याद रहे कि सिमी का नया रूप आई.एम.था।सिमी पर 2001 में प्रतिबंध लगा तो उसके लोगों ने नया संगठन आई.एम.बनाया।

अब सिमी के ही लोगों ने पी.एफ.आई.बना लिया है।)

उनमें से कुछ आतंकी बाटला हाउस में छिपे थे।

दिल्ली पुलिस वहां पहुंची।

मुंठभेड़ हुई।दोनों पक्षों के कुछ लोग मारे गए।

  ममता बनर्जी ने अगले महीने उस इलाके में सभा करके उसे फर्जी मुंठभेड़ बताया।

ममता ने कहा कि असली साबित हो जाए तो मैं राजनीति छोड़ दूंगी।

अब सबूतों के आधार पर कोर्ट ने उसे असली साबित कर दिया।

जाहिर है कि ममता राजनीति नहीं छोडं़ेगी।

..........................



उन्हीें दिनों यानी 2008 में ही आई.एम. के जिया उर रहमान ने कहा कि 

‘‘अगर खुदा चाहता है तो मैं उस बाजार को भी बम से उड़ा दूंगा जहां मेरी वालिदा सब्जी खरीदती है।उसे जन्नत नसीब होगी।’’

(इंडिया टूडे -हिन्दी-15 अक्तूबर 2008

.....................................

याद रहे कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में भी इस तरह के आतंकवादी -अतिवादी तत्वों के खिलाफ कभी बयान नहीं देती।कैसे देंगी ? !!

उन्हीं लोगों के बल पर तो एक बार फिर चुनाव जीतने का हौसला बांध रही हैं।

..................................

9 मार्च 21


 


 अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर

..........................................

सास बन चुकी बुजुर्ग महिलाओं से एक अपील

..................................................

आप जिस तरह अपनी बेटियों की सौ गलतियों 

को भी नजरअंदाज कर देती हैं,उसी तरह आप अपनी 

पतोहुओं की कम से कम 50 गलतियों को तो माफ 

कर दिया कीजिए !

............................

यह अपील उन पर लागू नहीं होती जो अपनी 

बहू को भी अपनी बेटी की तरह ही प्यार-सहारा देती हैं।

क्योंकि शायद उन्हें याद रहता है कि 

‘‘सास भी कभी बहू थी।’’

.....................................

--सुरेंद्र किशोर-

   8 मार्च 21


सोमवार, 8 मार्च 2021

    गद्यमय कविता के इस दौर में 

    बच्चन की ‘मधुशाला’ की शैली में 

    कमलाकान्त सिन्हा की ‘मतवाला’ !

  ................................................

       --सुरेंद्र किशोर--

   ....................................

‘‘बच्चन जी की मधुशाला के दूसरे भाग की पांडुलिपि कहां मिल गयी ?’’

    ‘मतवाला’ की पांडुलिपि देखकर प्रो.(डा.)रामवचन राय ने कमलाकान्त प्रसाद सिन्हा से यही सवाल किया था।

जब उन्हें बताया गया कि यह कमलाकान्त जी की कृति है तो 

प्रो.राय ने रचनाकार को बधाई दी।

  अपनी अनुरागानुभूति (प्रस्तावना) में प्रो.राय ने लिखा है कि 

‘‘हिन्दी कविता अपने विकास के इस दौर में अधिक गद्यमयता के कारण आम पाठकों की अभिरुचि और स्मरणीयता के दायरे से अलग होती गयी है।

ऐसे में मतवाला का प्रकाशन न सिर्फ उन पाठकों को आकर्षित करेगा,बल्कि नया पाठक वर्ग भी तैयार करेगा।’’

अब जेपी आंदोलन के नेता और कर्पूरी ठाकुर सरकार (1977)के संसदीय सचिव रहे कवि-शायर कमलाकान्त सिन्हा उर्फ लालू दा की रचना के कुछ नमूने पढ़िए।

...............................

बहुत पुराना है मदिरालय

बहुत पुरानी है हाला,

आदिम मिट्टी से निर्मित है

यह सुन्दर मृण्मय प्याला।

......................... 

पा अनंग से सोम-कलश जब 

साकीबाला थिरक उठी

सृजनहार था पीनेवाला

प्रथम बना वह मतवाला

..............................

तब से गमक रहा मदिरालय

तब से खनक रहा प्याला

तब से होड़ मची रिन्दों में 

गूंज रहा ‘हाला-हाला’

......................

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, दुमका के अध्यक्ष बलभद्र नारायण सिंह बालेन्दु ने लिखा है कि ‘‘लालू दा(कमलाकान्त सिन्हा)को शायरी का शौक बचपन से है।

राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं पर तीखी व्यंग्यात्मक टिप्पणियों से भरी है इनकी शायरी।

स्वभाव से फक्कड़ और मजदूरों का सा सादा जीवन जीने वाला यह कवि शायर खास अंदाज में शेरो -शायरी पेश कर एवं मौजूदा गंदी-बेढंगी राजनीति पर सामाजिक हलचल को समेट कर जनमन को खोलने की सरस चेष्टा करता है।

  लालू दा के व्यक्तित्व का निर्माण देशकाल से प्रभावित होता है।

इस संग्रह में कवि शायर की संघर्ष चेतना को वाणी मिली है।’’ 

.....................................

पुस्तक-‘मतवाला’

लेखक-कमलाकान्त सिन्हा

प्रथम संस्करण - सन 2021

के.एल.हाउस

गिलान पाड़ा

दुमका-814101

झारखंड

मो-9431154576

....................................

5 मार्च 21


गुरुवार, 4 मार्च 2021

   1975-77 का आपातकाल

 मीडिया के लिए बुरे दिन !

  ............................................ 

25 जून, 1975 की रात में इमर्जेंसी लगाने के बाद भारत सरकार के प्रेस इन्फाॅर्मेशन ब्यूरो से अखबारों को निरंतर आदेश -निदेश दिए जाते रहे।

दिए गए कुछ निदेशों का विवरण यहां प्रस्तुत है।

सरकार की ओर से अखबारों को यह निदेश दे दिया गया 

 कि वे जयप्रकाश नारायण का फोटोग्राफ नहीं छापें।

........................

26 जून,1975

.........................

समाचार एजेंसियों के टेलीप्रिंटरों से सभी नेताओं की गिरफ्तारी 

के समाचार हटा दिए जाएं।

.......................

5 जुलाई 1975

...........................

आनंद मार्ग के बारे में अदालती केस की रिपोर्ट नहीं छापें।

............................

19 अगस्त 1975

............................

गुजरात में राष्ट्रपति शासन हटाने और कांग्रेस सरकार के गठन से संबंधित समाचार/टिप्पणी नहीं छापें।

.............................

15 सितंबर 1975

.........................

कुलदीप नैय्यर की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय नहीं छापें।

.....................

(जारी)

.............................

(लेखक-पत्रकार बलबीर दत्त लिखित

‘‘इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर’’ 

पुस्तक से साभार।)

....................................

राहुल गांधी की हाल की एक टिप्पणी के संदर्भ में 1975 के उपर्युक्त निदेशों को देखिए।

क्या लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया के साथ आज की सरकार वैसा ही सलूक कर रही है ?

....................................

इमर्जेंसी में लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों के साथ इंदिरा सरकार ने कैसा सलूक किया था,उसके कई नमूने विभिन्न पुस्तकों में पहले ही आ चुके हैं।

............................

--सुरेंद्र किशोर-

    4 मार्च, 21

..........................




बुधवार, 3 मार्च 2021

 मोरारजी देसाई (29 फरवरी, 1896-10 अप्रैल 1995)

.....................................................

मोरारजी देसाई में खूबियां अधिक थीं।

.................................................


  --सुरेंद्र किशोर--

 ...................................................

  जिस नेता में खूबियां अधिक और कमियां कम हों,उन्हंे

 समय -समय पर याद करना ही चाहिए।

   मोरारजी देसाई वैसे नेताओं में प्रमुख थे।

  ........................................

मोरारजी देसाई अपने कठोर संयम के कारण करीब 

सौ साल जिए।

 आज मैं असमय बीमार होते कुछ करीबी लोगों से यदाकदा पूछता हूं ।

 आप खानपान में संयम क्यों नहीं बरतते ?

  वे तुरंत जवाब दे देते हैं-‘‘क्या करें,मेरा जाॅब ही ऐसा है कि 

संयम नहीं निभ पाता।’’

 दरअसल यह चटपटा खाने -पीने का बहाना है !

  क्या कोई जाॅब प्रधान मंत्री के जाॅब से भी अधिक व्यस्तता वाला हो सकता है ?

मैं नहीं मानता-जानता !

..............................................................    

देसाई का आत्मानुशासन बेजोड़

..................................................

यदि मोरारजी देसाई राजनीति की भागदौड़ वाली जिंदगी में भी करीब सौ साल का जीवन प्राप्त कर सके थे तो यह उनके आत्मानुशासन का ही परिणाम था।

    प्रधान मंत्री रहे मोरारजी भाई जैसा अब कोई नहीं।

आप उनकी राजनीतिक, आर्थिक या किन्हीं अन्य नीतियों से असहमत हो सकते हैं।

 पर, आप उनके निजी जीवन के कठोर अनुशासन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।

      ............................................

     गोधरा दंगे को लेकर देसाई का 

     हुआ था अंग्रेज कलक्टर से मतभेद

       ...............................................

   देसाई अपने जीवन के प्रारंभिक काल में डिप्टी कलक्टर थे।

गुजरात के गोधरा में तैनात थे ।

तब अंग्रेज कलक्टर ने उन पर दबाव डाला कि वे दंगाइयों को निर्दोष बताते हुए रपट दें।

मोरारजी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

उस पर अंग्रेज शासक से उनका मतभेद शुरू हो गया।

    अंततः गांधी जी के आहवान पर देसाई ने 1930 में नौकरी छोड़ दी । 

स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

 राजनीतिक जीवन में भी उनकी अपनी तय की हुई लक्ष्मण रेखाएं थीं।

 उनसे वे आम तौर पर कभी नहीं डिगते थे।

  यह सब राजनीति में अब दुर्लभ है।

मोरारजी देसाई ने अपने लिए कोई मकान तक नहीं बनवाया।

अंतिम दिनों में वे किराए के मकान में थे।

कोई संपत्ति खड़ी नहीं की।

जबकि, वे 1952 में ही बंबई प्रांत के मुख्य मंत्री बन गए थे।

 बाद में वे केंद्र में मंत्री,उप प्रधान मंत्री और अंततः प्रधान मंत्री बने।

    ------------

   मोराजी का रूटीन

    .............................

    मोरार जी प्रातः 4 बजे जग जाते थे।

 रात में नौ बजे सो जाते थे।

पर वे कहते थे कि सोने और तैयार होने के समय को छोड़ कर उनका सारा समय लोगों का था।

  चार बजे प्रातः से लेकर सात बजे सुबह तक का समय उनका अपना होता था।

उस समय  वे किसी तरह का व्यवधान नहीं होने देते थे।

 इस बीच वे नित्य क्रिया से निवृत होकर टहलते थे ।

   मन ही मन गीता का पाठ करते थे।

  वे नौ बजे रात के बाद किसी भी हालत में  जगे नहीं रहते थे।

  वे जब प्रधान मंत्री थे और 1979 में उनकी सरकार गिरने लगी तौभी उन्होंने नौ बजे रात के बाद जगने से मना कर दिया।

  जबकि, सरकार बचाने के उपाय पर विचार करने के लिए रात में उनसे उनके कुछ प्रमुख राजनीतिक सहयोगी विचार विमर्श करना चाहते थे।

  पर सहयोगी  निराश ही हुए।

 यानी मोरारजी एक बार जो कुछ तय कर लेते थे , उस बात पर घाटा उठा कर भी अमल करते थे।

उनकी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा आधार यही था।

    .......................................

     मोरारजी का भोजन

    .......................................... 

    मोरार जी के भोजन में गाय का दूध, मक्खन, फल, नारियल पानी,शहद,अखरोट,उबले आलू,खजूर,गुड़-मक्के की बनी मिठाई शामिल थे।

सब चीज लेने के समय तय थे।

उसमें कोई व्यवधान नहीं हो सकता था।

वे कहते थे कि शाम में फल नहीं लेना चाहिए ।

क्योंकि आयुर्वेद में यह मना किया गया है।

काश ! मोरारजी का कोई जोड़ा राजनीति में आज भी होता।

  ..........................................


रविवार, 28 फ़रवरी 2021

     जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा !

    ........................................

सन 2005 में पश्चिम बंगाल विधान सभा का चुनाव 5 चरणों में हुआ था।

सन 2011 में पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव 6 चरणों में हुआ था।

सन 2016 में वहां 7 चरणों में चुनाव हुआ था।

सन 2021 में आठ चरणों में चुनाव हो रहा है।

............................

मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कल कहा कि सुरक्षा संबंधी कारणों से अधिक चरणों में चुनाव हो रहा है।

.............................

सन 2019 के लोक सभा चुनाव के समय चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक अजय नायक ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की हालत आज वैसी ही है जैसी हालत 15 साल पहले बिहार की थी।

(याद रहे कि तब पटना हाइकोर्ट ने कहा था कि बिहार में जंगल राज है।)

उस पर तृणमूल कांग्रेस ने अजय को आर.एस.एस.का एजेंट बताया था।

अब ममता बनर्जी ने कहा है कि नरेंद्र मोदी के कहने पर आयोग ने आठ चरणों में चुनाव का निर्णय किया है।

................................. 

सत्ताधारी  वाम मोर्चा पर तो तब बूथ जाम करने व साइंटिफिक रिगिंग करने का आरोप लगता था।

सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पर तो आरोप है कि उसने पंचायत चुनाव में हजारों लोगों को नामांकन पत्र तक भरने नहीं दिया था।

.............................

यानी,

जस जस सुरसा (हिंसा व चुनावी धांधली का)बदनु बढ़ावा।

तासु दून कपि (चुनाव आयोग)रूप देखावा।

........................

अंत में

 ..............

कोई भी निष्पक्ष प्रेक्षक कहेगा कि वाम शासन काल की अपेक्षा ममता शासन में हिंसा और अराजकता बढ़ी है।

स्वाभाविक ही है।

केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी है कि बंगाल चुनाव के बाद सी.ए.ए.लागू होगा।

इस घोषणा के कारण तनाव स्वाभाविक है।

.............................

--सुरेंद्र किशोर-

 27 फरवरी 21


     मथाई की पुस्तकों पर से प्रतिबंध 

    हटाने का माकूल समय

      ..........................................................

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कहा है कि चयन में योग्यता को नजरअंदाज करना संविधान का उलंघन है।

  याद रहे कि इस आदेश का आरक्षण से कोई संबंध नहीं है।

चाहे आरक्षित वर्ग में बहाली हो या अनारक्षित में।

चयन में योग्यता को ही ध्यान में रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट की मंशा यही है।

   दरअसल आजादी के तत्काल बाद से ही कई मामलों में योग्यता को नजरअंदाज किया जाता रहा।

उसका खामियाजा देश ने भुगता। 

   इस संबंध में भी प्रथम प्रधान मंत्री के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने कुछ बातें साफ-साफ लिखी हंै।

मथाई ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक में लिखा है कि किस तरह भर्ती संगठन को उच्चत्तम स्तर से कह दिया गया कि कुछ खास लोगों को भर्ती में तरजीह दी जाए।

सत्तर के दशक में मथाई ने दो खंड़ों में अपने सनसनीखेज संस्मरण लिखे।

दोनों को केंद्र सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया।

भर्ती के अलावा भी उनमें अनेक जानने योग्य बातें हैं।

किस तरह आजादी के तत्काल बाद ही हमारे सत्ताधारियों ने कई तरह की बुराइयों के पौधे रोप दिए थे।

बाद में वे फलने -फूलने लगे।

अब तो बरगद के वृक्ष बन चुके हैं।

हालांकि उन वर्षों में कई अच्छे काम भी हुए।

पर, जो खराब काम हुए,वे नहीं हुए होते तो हम आज अधिक सुखी व खुश होते।

  क्या मौजूदा सरकार उन पुस्तकों पर से प्रतिबंध हटाएगी ?

     क्या सिर्फ मध्य युग के इतिहास को ही ठीक किया जाएगा ?

  उसे तो किया ही जाना चाहिए।

जरूर कीजिए।

उस दिशा में कुछ काम तो होना शुरू भी हो गया है।

पर आजादी के तत्काल बाद के दशकों में क्या -क्या हुआ,वह सब बातें भी नई पीढ़ी नहीं जानेगी ?

अगली किसी गलती को करने से बचने के लिए भी यह जरूरी है कि हम पिछली गलतियों को जानें और उनसे सीखें।

...............................

--सुरेंद्र किशोर-

27 फरवरी 21