शनिवार, 4 मई 2024

 


     कैंसर की महामारी को रोकने के लिए

   सरकारें चुनाव बाद युद्ध स्तर पर काम करें

    अन्यथा,शासकों और उनके परिजन की भी बारी 

    आने में अब देर नहीं होगी 

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      --सुरेंद्र किशोर ---

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हाल में यह चिंताजनक जानकारी मिली कि वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कैंसर ग्रस्त हो गये हैं।

ताजा खबर सी.पी.आई.नेता अतुल कुमार अनजान के बारे में आई।

कैंसर से उनका निधन हो गया।

मेरे छोटे सहोदर भाई का गत सात इसी जानलेवा बीमारी से निधन हुआ।

सर्वाधिक दर्दनाक बात यह है कि कैंसर से होने वाले भीषण दर्द के निवारण के लिए किसी दर्दनाशक दवा का अब तक आविष्कार ही नहीं हुआ है।

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कैंसर के कई कारण होते हैं।

पर,खाद्य और भोज्य पदार्थ में मिलावट एक बड़ा कारण है।

खेतों में धुआंधार रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल से स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है।

(हरित क्रांति ने हमें बर्बाद कर दिया।)

मिलावट के खिलाफ सरकारों को चाहिए कि वे चुनाव के बाद सघन अभियान चलाएं।पुलिस की मौजूदगी में नमूने लिये जाएं और उनकी विश्वस्त प्रयोगशाला में जांच कराई जाए।

सिर्फ फूड इंस्पेक्टरों पर सरकार भरोसा न करे।

यदि कोई इस्पेक्टर चाहे भी तो वह रसीद के साथ खाद्य-भोज्य पदार्थ के नमूने नहीं ले सकता।

उन्हें मारकर भगा दिया जाएगा।इसीलिए वे सह अस्तित्व की रणनीति अपनाते हैं।

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स्थिति ऐसी गंभीर हो चुकी है कि आज बाजारों में कौन सा पदार्थ मिलावट रहित है,यह नहीं कहा जा सकता।

मिलावट के खिलाफ जांच के लिए तैनात सरकारी एजेंसियों में भारी भ्रष्टाचार है।

पूरी व्यवस्था ने मिलावटखोरों को हमें तड़पा -तड़पा कर मारने का अघोषित लाइसेंस दे रखा है।

इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इस समस्या की व्यापकता के अनुपात में सजाएं नाम मात्र की ही हो पाती हैं।

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बिहार सहित देश के 10 राज्यों में कैंसर के मरीज अधिक हैं।

2023 में बिहार में एक लाख नये कैंसर मरीजों का पता चला।

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इस तरह हो रहा है मानव शरीर के साथ खिलवाड़ !

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‘‘1.-बिक्रेता गण सब्जियों की ताजगी बरकरार रखने अथवा उनके परिरक्षण के लिए उन्हें कीटनाशकों में डूबोते हैं।

तेलों और मिठाइयों में वर्जित पदार्थों की मिलावट की जाती है।

2.-सब्जियों और दूसरे खाद्य पदार्थ को धोना फायदेमंद है।लेकिन पकाने से विषैले अवशेष बिरले ही खत्म होते हैं।

निगले जाने के बाद छोटी आंत कीटनाशकों को सोख लेती हैं।

3.-शरीर भर में फैले बसायुक्त उत्तक इन कीटनाशकों को जमा कर लेते हैं।इनसे दिल,दिमाग,गुर्दे और जिगर सरीखे अहम अंगों को नुकसान पहुंच सकता है।

(-इंडिया टूडे हिंदी-15 जून, 1989)

(यह खबर पुरानी है।आज तो हालात और भी बिगड़ चुके हैं।

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 अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में सरकार ने संसद में कहा था कि अमेरिका की अपेक्षा हमारे देश में तैयार हो रहे कोल्ड ड्रिंक में 

रासायनिक कीटनाशक दवाओं का प्रतिशत अधिक है।

 केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि यहां कुछ अधिक की अनुमति है।(क्यों भई ?)

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खुद वाजपेयी जी को ,जब वे प्रधान मंत्री थे, पटना हवाई अड्डे पर जो बोतलबंद पानी परोसा जाने वाला था,वह अशुद्ध पाया गया था।

ऐसी ही घटना मनमोहन सिंह के साथ कानपुर में हुई थी जब वे प्रधान मंत्री के रूप में वहां गए थे।

यानी, प्रधान मंत्री तक मिलावटखोरों की पहुंच है।

वे सिर्फ इसलिए बच पा रहे हैं क्योंकि उन्हें परोसने से पहले उसकी जांच का प्रावधान है।

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  एक ताजा खबर के अनुसार, इस देश में बिक रहे 85  प्रतिशत दूध मिलावटी है।

जितने दूध का उत्पादन नहीं है,उससे अधिक की आपूत्र्ति हो रही है।  

सवाल है कि इस देश में अन्य कौन सा खाद्य व भोज्य पदार्थ कितना शुद्ध है ?

यह जानलेवा समस्या बहुत पुरानी है।

बढ़ती ही जा रही है।

विभिन्न सरकारें लोक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए क्या -क्या करती हंै ? 

कितने दोषियों को हर साल सजा हो पाती है ?

राज्यों में कितनी प्रयोगशालाएं हैं ?

मिलावट का यह कारोबार जारी रहा तो कुछ दशकों के बाद हमारे यहां कितने स्वस्थ व कितने अपंग बच्चे पैदा होंगे ?

पीढ़ियों के साथ इस  खिलवाड़ को आप क्या कहेंगे ?

क्या सबके मूल मंे शासकीय भष्टाचार नहीं है ? 

मिलावटखोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए ?  

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4 मई 24



शुक्रवार, 3 मई 2024

 हैदराबाद के पास दैनिक मजदूरी कर रहे 

पद्मश्री से सम्मानित मोगुलैया  

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सुरेंद्र किशोर

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भारत के चैथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित दर्शनम मोगुलैया हाल में हैदराबाद के पास एक निर्माण स्थल पर मजदूरी करते देखे गये।

दो साल पहले राष्ट्रपति ने दुर्लभ संगीत वाद्य यंत्र के आविष्कारक 71 वर्षीय मोगुलैया को पद्मश्री से सम्मानित किया था।

इस सम्मान के कारण लंबे समय तक तो वे मीडिया में छाए रहे।

 पर,परिवार के गुजर- बसर के लिए जब काम खोजने लगे उम्रदराज होने के कारण उन्हें कोई ढंग का काम नहीं मिला।

नतीजतन वे मजदूरी कर रहे हैं।

यह खबर आज के टाइम्स आॅफ इंडिया में भी छपी है।

कल्पना कीजिए कि जब कुछ विदेशियों ने यह खबर नेट पर पढ़ी होगी तो भारत और भारत सरकार के बारे में कैसी धारणा बनी होगी !

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इस बीच मोगुलैया के तीन बच्चे बीमारी से गुजर गये।अब भी बड़े परिवार की देखरेख की उन पर जिम्मेदारी है।

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उम्मीद की जानी चाहिए कि लोक सभा चुनाव की आंधी के गंुजर जाने के बाद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जरूर ऐसी विचित्र व विडंबनापूर्ण समस्या के स्थायी निदान के बारे में जरूर कुछ सोचेंगे। ताकि, विदेश में हमारी छवि खराब न हो।

याद रहे कि मोदी राज में ऐसे ही अनेक गरीब,अनाम व साधनहीन किंतु समाज के लिए उपयोगी लोगों को पद्म सम्मान अधिक मिलने लगे हैं।

पहले भी मिलते थे,पर अब ऐसे लोगों को अधिक मिल रहे हैं।

दूसरी ओर , अपना देश तो ऐसा बनता जा रहा है जहां जो जितना बड़ा तिकड़बाज व टैक्स चोर है,उसके पास उतने ही अधिक पैसे हैं।

वैसे लोगों के सामने खर्च करने की समस्या है।

समाज के अधिकतर लोग ,अपवादों को छोड़कर उन्हें ही सलाम करते हैं।

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3 मई 24

 


गुरुवार, 2 मई 2024

    पटना के आॅटो चालक प्रत्येक फेरे में 

    100 रुपए रंगदारी देने का बाध्य हैं।

     ---आॅटो चालक यूनियन

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    सुरेंद्र किशोर

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   एक आॅटो चालक को बिहार के पटना जिले के दानापुर 

या पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन से बैरिया बस स्टैंड जाने में हर बार करीब 100 रुपए अवैध रूप से असामाजिक तत्वों को देना पड़ता है।सब जानते हैं कि उन असामाजिक तत्वों को पुलिस का संरक्षण मिलता है।

यूनियन की शिकायत है कि इस अतिरिक्त खर्च को उठाने के लिए आॅटो चालकों को ओवर लोडिंग करना पड़ता है।

यात्रियों से खचाखच भारे आॅटो अक्सर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।एक -एक दुर्घटना में एक से अधिक यात्री मर जा रहे हैं।

इस संबंध में 20 अप्रैल 24 को प्रभात खबर ने सचित्र समाचार छापा।

कई दिन बीत जाने के बावजूद पटना की सड़कों पर ट्रैफिक अराजकता मंे कोई फर्क नहीं पड़ा है।

इसका कारण सब जानते हैं।

सिर्फ प्रशासन या राज्य सरकार को असली कारण का पता नहीं है।

पता है भी तो उस कारण को दूर करने में बिहार सरकार असमर्थ है।

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एक पुरानी बात

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नब्बे के दशक में एक रेल पुलिस थाने के थाना प्रभारी

ने मुझे बताया था कि हमारा उच्च अधिकारी कहता है कि चोरों से ट्रेन के पेसेंजर का बक्सा चोरी करवाओ।उसमें से गहना-गुरिया बेच कर हमें अधिक से अधिक पैसे पहुंचाओ।

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2 मई 24 


बुधवार, 1 मई 2024

 मेरे फेसबुक वाॅल से

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   जेहाद का खुलेआम आह्वान

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 प्रतिबंधित जेहादी संगठन ‘सिमी’ के सुप्रीम 

  कोर्ट में वकील थे सलमान खुर्शीद

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सुरेंद्र किशोर

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पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की भतीजी मारिया आलम खान(समाजवादी पार्टी )ने अपनी बिरादरी के लोगों से ‘‘वोट जेहाद’’ करने की सार्वजनिक रूप से अपील की है।

 इसको लेकर चाचा-भतीजी पर केस दायर हुआ है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं।

 उत्तर प्रदेश कांग्रेस के तब के अध्यक्ष 

सलमान खुर्शीद तो प्रतिबंधित जेहादी संगठन सिमी के सुप्रीम कोर्ट में वकील रह चुकेे हैं।  

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1977 में अलीगढ़ में स्थापित सिमी यानी स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया, जमात ए इस्लामी से जुड़ा हुआ था।

पर, जब सन 1986 में सिमी ने ‘‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’’ का नारा दे दिया तो 

जमात ए इस्लामी हिंद ने सिमी 

से अपना संबंध तोड़ लिया।

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सन 2001 में जब ‘सिमी’ पर वाजपेयी  सरकार ने प्रतिबंध लगाया तो प्रतिबंध के खिलाफ सलमान खुर्शीद सिमी के सुप्रीम कोर्ट में वकील बन गये।

सिमी ने प्रतिबंध के खिलाफ अदालत की शरण ली थी।पर,अदालत से उसे कोई राहत नहीं मिली।

कोई कह सकता है कि वकील तो किसी का भी वकील बन सकता है।

  तो क्या यह पूछा जा सकता है कि सलमान खुर्शीद कभी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के वकील बनना पसंद करेंगे ?

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    अटल सरकार ने ही नहीं 

  बल्कि मनमोहन सरकार ने भी 

   सिमी पर प्रतिबंध लगाया था।

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मन मोहन सिंह सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि ‘‘सिमी के लोग जेहाद का प्रचार कर रहे हैं और कश्मीर में आतंकवादियों की पूरी मदद

कर रहे हैं।’’

(.टाइम्स आॅफ इंडिया --21 अगस्त 2008)

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केरल के डी.जी.पी.ने केरल हाईकोर्ट को बताया था कि ‘‘सिमी के लोगों ने ही पी.एफ.आई.यानी पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया बनाया है।’’

याद रहे कि पी.एफ.आई.ने हथियारों के बल पर सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देने का लक्ष्य तय किया है।

जांच एजेंसियों के अनुसार,इस उद्देश्य से पी.एफ.आई. इस देश में हथियारबंद कातिलों दस्ता बना रहा है।

पी.एफ.आई.ने कहा है कि जिस दिन 10 प्रतिशत मुसलमान भी हमारे साथ आ जाएंगे,हम भारत को इस्लामिक देश बना देंगे।

इसका मतलब है कि भारत के 10 प्रतिशत मुस्लिम भी उसके साथ नहीं हैं।यह इस देश के लिए शुभ लक्षण है।जो नहीं हैं,उन्हें धन्यवाद।

किंतु दूसरी ओर लगभग सारे तथाकथित सेक्युलर दल सिमी और पीएफआई के साथ रहे हैं।याद कीजिए कि शाहीन बाग के धरने में एकजुटता दिखाने के लिए इस देश के किन किन दलों के कौन कौन नेता गये थे।

उस धरने को विदेशी पैसे पी एफ आई ने ही आयोजित किया था।

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पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई. से कांग्रेस का पुराना तालमेल चल रहा है।

पी.एफ.आई. की मदद से ही राहुल गांधी नायनाड से चुनाव लड़ रहे हैं।पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई. ने ही पिछले विधान सभा चुनाव में कर्नाटका और तेलांगना में मुसलमानों के अधिकतर वोट सिर्फ कांग्रेस को दिलवाये।

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याद रहे कि सलमान खुर्शीद, हिन्दुत्व की तुलर्ना आइ. एस. आई. एस. और बोको हरम से कर चुके हैं।

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     पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया से 

  हामिद अंसारी का कैसा रिश्ता 

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सितंबर, 2017 में पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी केरल के कोझीकोड में आयोजित महिलाओं के एक सम्मेलन में शामिल हुए थे।

वह महिला संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया से संबद्ध है।

 क्या हामिद साहब को फ्रंट की 2047 वाली योजना का तब पता नहीं था ?

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 क्या इस देश के वे तथाकथित सेक्युलर नेता देश से माफी मांगेंगे जो वर्षों तक आई.एम. और पी.एफ.आई. के पूर्ववर्ती संगठन सिमी  को छात्रों का एक मासूम संगठन बताते रहे ?

 एक तरफ सिमी अखबारों में बयान देेकर यह कहता रहा कि हमारा उद्देश्य 

हथियारों के बल पर इस देश में इस्लामिक शासन कायम करना है।दूसरी ओर अनेक राजनीतिक व बौद्धिक संगठन सिमी का बचाव करते रहे।

सिमी ने कई बार यह घोषणा की कि वह हथियारों के बल पर पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन कायम करना चाहता है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद इस देश के कई बुद्धिजीवी और अनेक नेता सिमी को छात्रों का निर्दोष संगठन बताते रहे।

सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुसाहिल ने 20 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘‘कुरान हमारा संविधान है। यदि भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान से बंधे हुए नहीं हैं। हम भारत सहित पूरी दुनिया में खलीफा का शासन चाहते हैं।’’ 

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 अहमदाबाद धमाकों के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया था कि ‘‘सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है। उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।’’

याद रहे कि 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक साथ 21 बम विस्फोट हुए थे जिनमें 56 लोगों की जानें गयीं थीं। इंडियन मुजाहिदीन ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी। याद रहे कि सिमी के सदस्य ही आई.एम. में सक्रिय हो गये थे। 

सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में एक मीडिया से  बातचीत  में कहा था कि ‘‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के  अखबार में छपा था। उपर्यक्त तथ्य  सिमी-इंडियन-पी एफ आई की कार्य शैली को समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

2012 में पश्चिम बंगाल के डी.जी.पी.एन.मुखर्जी ने कहा था कि सिमी के जरिए आई.एस.आई.ने माओवादियों से तालमेल बना रखा है।

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हरि अनंत हरि कथा अनंता !

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1 मई 24     


मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

 शालीन पत्रकार मोहन बाबू को श्रद्धांजलि

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(1924--2007)

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सुरेंद्र किशोर

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पी.टी.आई.,पटना के ब्यूरो प्रमुख रहे के. मोहन उर्फ मोहन बाबू उन थोड़े से पत्रकारों में थे जिनके पास बैठकर मैंनें पत्रकारिता का क ख ग घ सीखा।

   ऐसे अन्य वरिष्ठ पत्रकारों में यू.एन.आई.,पटना के ब्यूरो प्रमुख डी.एन.झा,दैनिक ‘आज’ के पारसनाथ सिंह  और पी.टी.आई.के ही सुविख्यात ब्यूरो चीफ एस.के. घोष उर्फ मंटू दा शामिल थे।आर्यावर्त के वरिष्ठ पत्रकार रामजी मिश्र मनोहर 

जब-जब पारस बाबू से मिलने ‘आज’ आॅफिस आते थे तो हमें कुछ न कुछ सिखा जाते थे।

मनोहर जी ने एक बार मुझसे कहा था कि एक ही आइटम में आप बार -बार ‘उन्होंने कहा’, ‘उन्होंने कहा’ मत लिखिए।मुझे अच्छी सीख मिल गयी।

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जिम्मेदार व अनुभवी पत्रकारों के पास बैठकर कुछ सीखने का प्रयास मैंने तभी शुरू कर दिया था जब मैं नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का बिहार संवाददाता था।

सन 1977 में जब मैं मुख्य धारा की पत्रकारिता में आया, तब तो ऐसे बड़े पत्रकारों से मिलना-जुलना बढ़ गया।

मैं हमेशा उनसे आदर के साथ बातें करता था।इसलिए भी वे मुझे पसंद करते थे।

  न्यूज एजेंसियों के दफ्तरों में मैं इसलिए बैठता था क्योंकि एजेंसियां ठोक बजा कर खबरें देती हैं।

अफवाहों के आधार नहीं,सुनी-सुनाई बातें और कोई अभियानी पत्रकारिता नहीं।यानी वहां से पेशेवर पत्रकारिता सीखने का अवसर मिलता है।

मोहन बाबू कम बोलने वाले एक गंभीर पत्रकार थे।किसी नेता या दल से उनका कोई लगाव नहीं देखा।पेशेवर पत्रकार थे।

पत्रकारिता को लेकर पेशेवर शब्द सम्मानित शब्द माना जाता है।

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एस.के.घोष को मुख्य मंत्री अब्दुल गफूर ने बिहार विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कराया था,फिर भी मंटू दा मुझे बताते थे कि प्रतिपक्ष के लिए तुम्हें बिहार से क्या-क्या लिखना चाहिए।

प्रतिपक्ष के प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस को मंटू दा पसंद करते थे।  

 वे कहते थे कि यह खबर जार्ज की पत्रिका ही छाप सकती है।

  वैसे सपा नेता जार्ज भले उसके प्रधान संपादक थे,पर प्रतिपक्ष जार्ज की पार्टी का मुखपत्र

नहीं था।

उसे ब्लिट्ज और दिनमान का मिश्रण कहा जाता था।

प्रतिपक्ष में कवि कमलेश शुक्ल,गिरधर राठी,मंगलेश डबराल,एन.के. सिंह जैसे पत्रकार काम करते थे।

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मोहन बाबू के परिजन ने उनकी जन्म सदी के अवसर पर 

उन्हें सार्वजनिक रूप से याद कर उनके गरिमामय व्यक्तित्व को सच्ची श्रद्धांजलि दी है।

उनकी याद के साथ मुझे दो बातें याद आती हैं।

वरीय पत्रकारों को नये पत्रकारों से साथ स्नेहमय व्यवहार करना चाहिए यदि वह उनसे कुछ सीखने की कोशिश करता हो।

साथ ही, नये पत्रकारों को भी चाहिए कि वे अच्छी मंशा वाले वरीय पत्रकारों के पास बैठकर शिष्यवत कुछ सीख लें।

आज की पत्रकारिता में इन दोनों बातों का अब अभाव हो चला है।

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30 अप्रैल 24 


सोमवार, 29 अप्रैल 2024

 


    एक सुखद घटना

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मैं जहां रहता हूं यानी कोरजी गांव (फुलवारीशरीफ अंचल)में, वहां हाल के दिनों में दो बार अगलगी हुई।

एक पड़ोसी ने अग्नि शमन सेवा को 101 नंबर पर काॅल किया।

आग बुझाने वाली गाड़ियां तुरंत आ पहुंचीं।

यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य की बात थी।

अग्नि शमन सेवा को ऐसी तत्परता के लिए धन्यवाद !

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 अतिक्रमणकारियों के खिलाफ 

भी हेल्पलाइन की जरूरत

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त्वरित अग्नि शमन सेवा को देखकर एक विचार आया।

मुख्य पटना की मुख्य सड़कों पर अतिक्रमण करके दुकानें सजाने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भी राज्य शासन  एक हेल्पलाइन नंबर शुरू करे।

जहां कहीं फुटपाथ या सड़क के बीचों- बीच अतिक्रमण दिखाई पड़े,नागरिक उस हेल्प लाइन नंबर पर काॅल करें।

तुरंत हल्ला गाड़ी आए और अतिक्रमणकारियों के साथ यथा -योग्य बर्ताव कर दे।

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दरअसल बडे़-बडे़ अफसर पटना की सड़कों पर निकल कर पूर्वान्ह में तो अतिक्रमण हटवा देते हैं।

पर,उसी दिन अपरान्ह में एक बार फिर वहीं अतिक्रमण करवा दिया जाता है।(कहते हैं कि मारने वालों से बचाने वाला ताकतवर होता हैै !)

 यानी,अतिक्रमणकारियों पर पूरे राज्य शासन की भी कोई धाक नहीं। 

जब ऐसी धारणा बलवती होती है तो समाज के दूसरे कानून -तोड़क लोग भी जहां -तहां बेखौफ होकर तरह -तरह के अपराध करते रहते हैं।

कहीं भी किसी को 

गोली मार देने से लेकर किसी से भी (अधिकतर सरकारी दफ्तरों में) खुलेआम घूस ले लेने का अपराध चलता रहता है।

बिहार में जब बाहुबली काफी अधिक ताकतवर थे तो कई बार वे  अफसरों को हड़का कर अपने लोगों का घूस माफ करवा देते थे।

कई गरीब लोग आज यह महसूस करते हैं कि वह तो (यानी वह रोबिनहुड तो) हमारा सहारा था !

आज तो घूसखोरों पर तभी कार्रवाई होती है जब कोई स्टिंग आॅपरेशन करता है।कोई राजनीतिक दल यदि अपना स्ंिटंग आपरेशन शाखा खोले तो वह बहुत जल्द लोकप्रिय हो जाएगा। 

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29 अप्रैल 24


रविवार, 28 अप्रैल 2024

 आम चुनाव भीषण गर्मी के बदले 

अपेक्षाकृत ठंडे दिनों में ही होने चाहिए

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50 और 60 के दशकों के हमारे नेता

कम से कम इस मामले में होशियार थे

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश में प्रथम आम चुनाव के लिए 25 अक्तूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक विभिन्न तारीखों पर वोट डाले गये थे।

कल्पना कीजिए तब कितना सुहाना मौसम रहा होगा !

हमारे तब के नेताओं ने भीषण गर्मी में चुनाव नहीं कराए।

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दूसरा आम चुनाव भी 24 फरवरी, 1957 से 14 मार्च, 1957 तक हुआ।

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यानी, तब भी भीषण गर्मी का समय नहीं था।

पर आज भीषणत्तम गर्मी में चुनाव हो रहे हैं।

यह बाद की पीढ़ी के नेताओं की अदूरदर्शिता के कारण हो रहा है।

इस बार बेचारे कई वोटर मतदान नंहीं कर पा रहे हैं।  

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पहली गलती प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने की।

उन्होंने लोक सभा चुनाव 1972 की जगह 1971 में ही करा दिए।

यानी समय से पहले ही करा दिए।

इससे लोक सभा और विधान सभा चुनाव अलग -अलग समय पर होने लगे।

1967 तक एक ही साथ हुए थे।

1967 तक के हमारे नेता कम से कम इस मामले में दूरदर्शी थे।

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दूसरी गलती प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सन 2004 में की।

उन्होंने लोक सभा चुनाव की तारीख बदल 

दी।

सन 1999 में लोक सभा चुनाव 5 सितंबर से 10 अक्तूबर तक हुए थे।

2004 में भी कायदे से सितंबर-अक्तूबर में चुनाव होने थे।

पर प्रधान मंत्री वाजपेयी ने फील गुड और इंडिया साइनिंग के नशे में आकर कई महीने पहले ही चुनाव करा दिए।

2004 में भीषण गर्मी के दिनों में चुनाव हुए थे।अब हर बार उसी समय लोस चुनाव हो रहे हैं।

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अगली सरकार किसी न किसी उपाय से गर्मी के महीनों के बदले पहले की ही तरह ठंडे मौसम में चुनाव कराने का प्रबंध करे।

अधिक उम्मीद है कि

मोदी जी ही फिर प्रधान मंत्री बनेंगे।

मोदी है तो यह काम भी मुमकिन है।

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मोदी ने अपने शासन काल में अब तक कई गलतियां सुधारी हैं।

मोदी जी,दो और गलतियों को सबसे पहले सुधारिए, भले इसके लिए संविधान में संशोधन ही क्यों न करना पड़े।

यानी दोनों चुनाव यानी लोस-विधान सभा चुनाव फिर से एक साथ कराइए।साथ ही 1957 में चुनाव की जो तारीखें थीं,उन्हीं तारीखों पर फिर से चुनाव कराइए।

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27 अप्रैल 24