बुधवार, 30 जुलाई 2025

 


हां, मैंने अपना विचार बदला है-

सिर्फ देश-काल-पात्र की जरूरतों को

 ध्यान में रखकर।

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सुरेंद्र किशोर

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जो लोग आज मुझसे अलग विचार रखते और व्यक्त करते हैं,उन्हें मैं तो कभी नहीं टोकता,अशिष्ट भाषा में उन्हें अपमानित करने का तो मेरा स्वभाव भी नहीं।

क्योंकि मैं उनका गार्जियन नहीं हूं।

पर, मुझे टोकने वाले बहुत से लोग इन दिनों पैदा हो गये हैं।

पता नहीं,यह अधिकार उन्हें कहां से मिल जाता है !

सही तो यह होता कि सभी पक्षों के विचार जनता में जाते।

जनता को जो फैसला करना होता, वह करती।

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डा.राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने भी कभी अपने विचार बदले थे।

उन्होंने भी किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि देशहित मंे बदले थे।मैंने भी किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि देशहित में बदले हैं।

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इन दिनों भारत में भी इस्लामिक जेहाद की आंधी चल रही है।कुछ दिनों में यह आंधी, तूफान बन सकती है।

जेहादी संगठन पी.एफ.आई.(उसका राजनीतिक संगठन है  -एस डी पी आई ) सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देने के लिए कातिलों के दस्ते तैयार कर रहा है।इस के खिलाफ  किसी तथाकथित सेक्युलर दल का 

 कोई बयान कहीं कभी देखा आपने ?

हां,जब कोई गो -तस्कर भीड़ का शिकार होता है तो सारे सेक्युलर चिल्लाने लगते हैं। यह रिश्ता क्या कहलाता है ?

इस देश में इस इस्लामिक आंधी को जो रोक सकता है या रोकने की ईमानदार कोशिश कर रहा है,मैं उनके साथ हूं।हालांकि मैं न तो शरीयत के साथ हूं और न ही हिन्दू राष्ट्र के।

मैं भारतीय संविधान के साथ हूं।

जांे उस आंधी को देखने के बावजूद वोट बैंक के नाराज होने के डर से चुप हंै,मैं उनके साथ नहीं हूं।

कौन कहां -कहां है ,यह विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है।लोगबाग समझ ही रहे हैं।

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इस बीच मुझे पद्मश्री सम्मान मिल गया।मैंने न तो यह सम्मान किसी से मांगा था और न इसकी कोई आकांक्षा की थी।

मुझे इस देश में लोगबाग, कई पद्म सम्मानित लोगों की अपेक्षा अधिक जानते रहे हैं।

यानी, पद्मश्री से न तो मैं ऊपर उठा हूं और न नीचे गया हूं।इसके साथ कोई भौतिक लाभ भी तो नहीं।

सवाल उठेगा कि आपने स्वीकार क्यों किया ?

मैंने अपने परिवार खासकर पत्नी के ‘‘आत्म गौरव’’ के लिए इसे स्वीकार कर किया।उधर जिसने मुझे पद्म सम्मान दिया,उसकी कोई शर्त भी नहीं थी।

मैं कभी भाजपा या संघ की बैठक में जाता भी नहीं ,न कभी गया।

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मैंने कुछ साल पहले अपनी पत्नी से कहा था कि तुम्हें (मिडिल स्कूल के )हेड मास्टर पद पर प्रोन्नति की जो चिट्ठी मिली है,उसे अस्वीकार कर दो।वह मान गई।

ऐसा कोई दूसरा उदाहरण हो तो बताइएगा।

  उसके कहने पर मैंने एक बहुत बड़े  अफसर को फोन किया कि आप ऐसा करवा दीजिए।(वे इस बात की गवाही देने के लिए हमारे बीच अब भी मौजूद है।ं)उन्होंने यह इंतजाम कर दिया कि मेरी पत्नी सहायक शिक्षिका ही रहीं।

पूछिएगा कि मैंने वैसा क्यों किया ?

इसलिए किया कि हेड मास्टर को मिड डे मिल हैंडिल करना होता है।अभी व्यवस्था ऐसी हो गई है कि जो हेड मास्टर उसमें कुछ गडबड़ नहीं करेगा,तो उल्टे उसे सस्पेंड कर दिया जाएगा।क्योंकि ऊपर वाले को रेगुलर नजराना चाहिए। 

 दूसरी ओर , मेरे घर में आज तक दो नंबर का पैसा नहीं आया है।आगे भी न आए,उसका मैंने इंतजाम किया।

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 लालू प्रसाद और नीतीश कुमार युवजन सभा के दिनों से ही मेरे मित्र रहे हैं।

मैं और लालू प्रसाद एक ही साथ सन 1968 में  बिहार समाजवादी युवजन सभा के संयुक्त सचिव चुने गये थे।तीसरी संयुक्त सचिव थीं बेगूसराय की शांति देवी।सचिव शिवानन्द तिवारी चुने गये थे।

इन दोनों शीर्ष सत्ताधारी नेताओं को मेरी ‘‘गरीबी’’ कम करके खुशी होती।

मेरी बात पर भरोसा न हो तो  लालू और नीतीश (दोनों ही उम्र में मुझसे छोटे हैं।)के कान में बतियाने वाले जो भी व्यक्ति हों,वे उनसे मेरा नाम लेकर पूछ सकते हैं कि उन्हें खुशी होती  या नहीं ?

इसके विस्तार में जाना अशिष्टता होगी।बड़ बोलापन होगा।

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मुझे लगता है कि अब मेरा स्टैंड स्प्ष्ट हो चुका होगा।

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पुनश्चः 

डा. लोहिया ने देश की सत्ता पर से कांग्रेस का एकाधिकार तोड़ने के लिए जनसंघ और कम्युनिस्ट सहित लगभग सभी प्रतिपक्षी दलों को 1967 में एक मंच पर लाया।

नतीजतन 1967 में बिहार-उत्तर प्रदेश की गैर कांग्रेसी सरकारों में जनसंघ और सी.पी.आई.के मंत्री एक साथ बैठकर सरकार चला रहे थे।

1972-74 में जब इंदिरा गांधी ने एकाधिकारवादी शासन शुरू किया तो जेपी ने उनके खिलाफ सभी प्रतिपक्षी दलों को एक करने की कोशिश की।जेपी ने कम्युनिस्टों को भी आमंत्रित किया था।पर वे नहीं आये। ए.के.राय- जैसे स्वतंत्र कम्युनिस्ट जेपी से जरूर जुड़े।

 जनसंध और संघ के लोग तो जेपी आंदोलन में शामिल थे ही।

याद रहे कि न तो जेपी को खुद सत्ता में जाना था और न ही लोहिया को।

इसीलिए वे वोट बैंक के लोभ से ऊपर उठकर खुले दिमाग से देशहित में सोच सकते थे।

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देश, काल, पात्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए चीन और रूस की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी कार्य नीतियां बदलीं।इसीलिए वे अब भी ‘‘जीवित’’ हैं।सत्ता में बने हुए हैं

और अपने ढंग से देश की सेवा कर रहे हैं।चीन सरकार का उइगर जेहादियों के खिलाफ जितना कड़ा रुख है,उतना कड़ा रुख भारत के जेहादियों के खिलाफ भाजपा सरकार  का नहीं है।जेहादी लगभग पूरी दुनिया में आज उन्मादी बने हुए हैं।

पर, उससे उलट भारत के कुछ कम्युनिस्ट सन 1917 में जी रहे हैं तो कुछ अन्य सन 1949 में।

  इसीलिए उनका सफाया होता जा रहा है।अगले विधान सभा चुनाव में केरल की सत्ता से भी माकपा साफ हो जाएगी,ऐसा लगता है।गत लोक सभा चुनाव में माकपा को केरल में सिर्फ 1 सीट ही मिली है। काल बाह्य विचारों को बंदरमूठ की तरह पकड़े रहने का यह नतीजा है कि सबसे अधिक त्यागी-तपस्वी काॅडर वाले भारतीय कम्युनिस्ट दल अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।यह स्थिति गरीबों में यह चिंता पैदा करती है।

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कम से कम मेरे वंशज यह तो नहीं कहेंगे कि जब छांगुर जैसा दुर्दांत जेहादी देश में तांडव मचा रहा था, तब भी मेरा पूर्वज मौन था।उसने एक पोस्ट भी नहीं लिखा।

लोगबाग आज जयचंद का नाम अधिक क्यों लेते हैं ?

हालंाकि वह मान सिंह से कम दोषी था।

मान सिंह तो अकबर के साथ मिल कर महाराणा के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था।

पर जयचंद तो आखिरी गोरी-चैहान युद्ध में सिर्फ तटस्थ रह गया था।

आम धारणा है कि यदि जयचंद, चैहान से मिल कर लड़ा होता तो पृथ्वीराज चैहान नहीं हारता।इस देश का इतिहास नहीं बदलता।

इसीलिए जयचंद पर गुस्सा अधिक है।यह बात कम ही लोग जानते हैं कि गोरी की सेना ने चैहान के बाद जयचंद को भी मार डाला था।

आप आज के दौर में नजर दोैडाइए--मुझे उपदेश देने वाले यही चाहते हैं कि छांगुर की दरिंदगी पर मैं आज के सेक्युलर दलों तथा अन्य अनेक लोगों की तरह ही मौन रह जाऊं।

यह मुझसे नहीं होगा,चाहे आप मुझे जितनी गालियां दे लो।

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और अंत में

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क्या नीतीश सरकार और लालू सरकार ने मुझे किसी सरकारी कमेटी का एक मेम्बर तक बनने लायक भी कभी नहीं समझा था ?

या ,कोई और बात थी ?

जरा सोचिएगा ,यह आरोप लगाने से पहले कि मैंने मलाई के लिए इन दिनों अपने विचार बदल लिये हैं।

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24 जुलाई 25

फेसबुक वाॅल से

  


 भारतीय लोकतंत्र की कई बीमारियों  

का निदान साबित होगा जरूरी मतदान

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सुरेंद्र किशोर

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यदि यह काम केंद्र सरकार न करे तो सुप्रीम 

कोर्ट संविधान के अनुच्छेद-142 में मिले विशेष 

अधिकार के तहत केंद्र को निदेशित कर सकता है -------------------

जातिवाद,पैसावाद और संप्रदायवाद आदि 

नामक बीमारियों की दवा है अनिवार्य मतदान

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यदि 90 या 95 प्रतिशत मतदान होने लगे तो 15 -20 प्रतिशत वोट बैंक वाले दल या नेता चुनाव में निर्णायक साबित नहीं हो पाएंगे।जातीय व सांप्रदायिक वोट

बैंक के कुछ सौदागर लोग राजनीति को किस तरह दूषित कर रहे हैं,यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

वोट बैंक की राजनीति ने देश को अब तक बहुत नुकसान पहुंचाया है।अब तो उसके कारण देश की एकता-अखंडता 

पर भी भारी खतरा पैदा हो गया है।

   पिछले लोक सभा चुनाव से पहले कुछ भाजपा नेताओं ने  मतदान को अनिवार्य करने का संकेत दिया है।पर,लगता है कि उनकी प्राथमिकताओं 

में दूसरी बातें अभी अधिक महत्वपूर्ण हैं।

    दुनिया के कई देशों में मतदान अनिवार्य है।जो नागरिक मतदान नहीं करते, उनके लिए कुछ देशों में सजा का भी प्रावधान है।

    कैसा रहेगा यदि एक दिन भारत में यह कानून बने कि जो मतदाता मतदान नहीं करेगा , उसे कुछ खास सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा ?

 और, यदि  इस कानून को कड़ाई से लागू किया जाए तो और कितने प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने को मजबूर हो जाएंगे ?

    फिर भी सब तो नहीं किंतु करीब अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान जरूर करने लगेंगे।95 प्रतिशत भी जा  सकते

हैं।

   पूरे देश को ध्यान में रखें तो  आज तो औसतन 50 से 60 प्रतिशत मतदाता ही मतदान करते हैं । मतों के भारी बंटवारे के कारण 20 -25 प्रतिशत या उससे से भी कम मत पाने वाले लोग भी कई बार चुनाव जीत कर निर्णायक बन जाते  हैं।कई बार तो ऐसा भी होता है कि जिस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है,वह भी चुन लिया जाता है।

    यदि अस्सी -नब्बे -95 प्रतिशत मतदाता मतदान करने लगें तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर अत्यंत कम वोट पाकर भी चुनाव नहीं जीत पाएंगे।भारत में आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी धार्मिक या जातीय समूह  

की आबादी 20-25  प्रतिशत से अधिक नहीं है।अपवादस्वरूप कुछ ही क्षेत्र ऐसे हैं जहां बात इसके विपरीत है।

   यदि कोई जातीय या धार्मिक समूह अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होंगे तो नेतागण भी सिर्फ सांप्रदायिक या जातीय आधार

पर ही अपनी पूरी राजनीति और रणनीति तय नहीं करेंगे।राजनीति में व्यापक दृष्टिकोण विकसित होगा।

इससे देश का भी भला होगा।आज तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की खातिर अनेक नेता इस देश को तोड़ने पर भी अमादा हैं।

लगातार दो या तीन बार मतदान नहीं करने 

वालों का मताधिकार समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

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वोट बैंक की राजनीति की समाप्ति के लिए यह कदम जरूरी है।

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इटली और आॅस्ट्रेलिया में मतदान अनिवार्य है।

कुछ देशों में मतदान न करने वालों पर जुर्माने का प्रावधान है।

पर,अपना देश गरीब लोगों का है,इसलिए यहां जुर्माना ठीक नहीं रहेगा।

हां,कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है।

गुजरात में स्थानीय चुनावों में मतदान अब अनिवार्य है।

पर,उससे पहले ऐसी कोशिश मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बार की थी।

किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने उस विधेयक पर

अपनी सहमति नहीं दी।दोनों बार वापस कर दिया।तब केंद्र में मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे।

पर,नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद गुजरात विधान सभा ने जब तीसरी बार वह विधेयक पास करके भेजा जो राज्यपाल  ओ.पी.कोहली ने उस पर अपनी स्वीकृति दे दी।

यानी, अनिवार्य मतदान नरेंद्र मोदी के दिमाग की उपज थी।

अब जब मोदी जी खुद प्रधान मंत्री हैं तो जब अन्य अधिक जरूरी कामों से उन्हें फुर्सत मिले तो वे संसद से ऐसा कानून पास करवाएं,ऐसी उम्मीद तो उनसे की ही जा सकती है।

  1952 के आम चुनाव में देश में करीब 

45 प्रतिशत मतदान हुए थे।

2019 के लोक सभा चुनाव में औसतन 67 प्रतिशत मतदान हुए।सन 2024 के लोक सभा चुनाव में 65 दशमलव 79 प्रतिशत वोट पड़े।

यदि 90-95 प्रतिशत मतदान होने लगे तो  15 -20 प्रतिशत वोट बैंक वाले दल या नेता चुनाव में निर्णायक नहीं हो पाएंगे।वोट बैंैंक की राजनीति पहले कांग्रेस ने ही शुरू की थी।बाद में अन्य अनेक दलों ने अपनाया।

याद रहे कि इस देश का सुप्रीम कोर्ट भी अनिवार्य मतदान के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कर चुका है।

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30 जुलाई 25



मंगलवार, 29 जुलाई 2025

   डा.नामवर सिंह की याद में 

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  (1926--2019)

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उनके एक प्रेरक वाक्य ने मेरी निजी लाइब्रेरी 

को समृद्धत्तर करने का प्रोत्साहन दे दिया

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सुरेंद्र किशोर

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सुरेंद्र जी,

‘‘आपने हीरो संजो कर रखा है।’’

मेरी निजी लाइब्रेरी में साप्ताहिक ‘‘दिनमान’’ की पूरी फाइल (कुछ अंकों को छोड़कर)देखकर डा.सिंह ने सन 2001 में यह उत्साहबर्धक टिप्पणी की थी।

इस एक वाक्य ने मेरी लाइब्रेरी के विकास में पंख लगा दिये।

तब मेरी लाइब्रेरी में महज 15-16 आलमारियां थीं।अभी -अभी यह पोस्ट लिखने से ठीक पहले मैंने गिना तो पाया कि 33 आलमारियां हो गईं।

मेरे पुत्रों की आलमारियां इनमें शामिल नहीं हैं।

 अब इस लाइब्रेरी सह संदर्भालय को संभालना मेरे लिए कठिन हो रहा है।क्योंकि इसके रख-रखाव और इसे अपडेट करते जाने के लिए मुझे एक सहायक की जरूरत है जिसके लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं।

 खैर,मेरे बाद इसका जो होगा ,सो होगा,वैसे मेरी संतान इसे संभाल लेगी।इस योग्य वह है।

 बड़े लोग कभी अपने किसी  एक वाक्य से भी न जाने कितना अधिक प्रभाव डाल देते हैं।

यह बात तब की है जब पटना में भी डा.नामवर सिंह की 75 वीं जयंती मनाई जा रही थी।प्रभाष जोशी ही आयोजक थे।

प्रभाष जी की शिकायत रहती थी कि मैं न तो किसी को खाने पर बुलाता हूं और न कहीं भोजन पर जाता हूं।

उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि ‘‘बड़े लोगों को घर बुलाने से आपके बच्चों में हीन भावना नहीं आएगी।

आप खाने पर बुलाइए। अब भला प्रभाष जी के आदेश को मैं कैसे टाल सकता था।

मेरे आवास पर डा. नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, चंद्रशेखर धर्माधिकारी तथा कुछ अन्य इसी श्रेणी के गणमान्य लोग आए।

 मेरे निजी पुस्तकालय की सामग्री देख कर नामवर जी ने कहा कि सुरेंद्र जी, आपने तो हीरा संजो कर रखा है।

यह सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था !

मैंने पूछा कि इसका बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकेगा,यह सोच कर कभी बताइएगा।खैर, उसका अवसर उन्हें न मिला।

  उनके पटना आने पर कई बार टुकड़ों में कुछ घंटों की मुलाकातों से मुझे लगा कि वे एक स्नेहिल व्यक्ति हैं।अभिमानी कहीं से नहीं थे।अहंकारी तो बिलकुल नहीं।

 साथ ही, ग्रामीण पृष्ठभूमि के होते हुए भी शहरियों के बीच समान रूप से सहज थे।

 किसी भेंट वात्र्ता में उन्होंने एक बार कहा था कि मैं अपने पुत्र को अपनी गोद में खेलाने को तरस गया।क्योंकि गांव के संयुक्त परिवार में कोई अपने पुत्र को गोद नहीं लेता था।वह दूसरे के पुत्र को लेगा।उसके पुत्र को बच्चे के चचा या दादा खेलाएंगे।

 नामवर जी जैसा अद्भुत वक्ता मैंने

नहीं देखा-सुना।

आलोचक थे, पर किसी साहित्यकार से उनका कद ऊंचा था।

 मुझे यह देखकर और भी अच्छा लगा कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क थे।नाश्ते के साथ एक सेव जरूर लेते थे और भोजन के बाद वज्रासन पर बैठना नहीं भूलते थे।

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लगे हाथ,मैं अपनी लाइब्रेरी के बारे में भी एक बार फिर कुछ बता दूं।

मैं भी शुद्ध किसान पृष्ठभूमि का हूं।मेरे पिता सारण जिले के स्टैंडर्ड के अनुसार मेरे जन्म के समय अच्छे किसान थे। 22 बीघा जमीन थी।अब बेच- बाच कर तीनों भाइयों में करीब 10 बीघा बची है।पर,अच्छी सड़क, बिजली और बाजार विकसित हो जाने के कारण जमीन की कीमत काफी बढ़ गई है। 

बचपन में मेरे दालान में तीन बैल,दो गाय और एक भैंस रहती थी।दो नौकर और जन-मजदूर अलग से।

पर,मेरे घर में रामचरित मानस और आल्हा -ऊदल की कहानी की पुस्तक के अलावा कोई पठनीय सामग्री नहीं थी।

मेरे पिता का नाम जमींदारी की रसीद बही पर छपता था- ‘‘मालिक शिवनन्दन सिंह।’’पिता खुद लघु जमीन्दार थे और एक बड़े जमीन्दार के तहसीलदार थे।

पिता का नाम प्रिंट में देखकर मुझे लगा कि मेरा नाम भी प्रिंट में आना चाहिए।

उसके लिए मैं पटना के अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखने लगा।पत्र लिखते -लिखते मैं पत्रकार बन गया।

  जब गांव में रहता था तो तीव्र इच्छा होती कि काश ,पढ़ने की सामग्री मेरे घर में भी होती।

चांदनी रात में दालान में खाट पर लेट कर आसमान देखा करता था।इस तरह समय काटता था।

तभी तय किया था कि जब भी मेरे पास पैसे होंगे तो एक लाइब्रेरी मेरी भी होगी।

 किताबों की कमी नहीं रहेगी।तिनका -तिनका जोड़कर सन 1965 से अब तक मैंने अनेक आलमारियां किताबों,अखबारों ,पत्रिकाओं और संदर्भ सामग्री के सैकड़ों विषयवार लिफाफों से भर दी है।

    याद रहे कि मैं अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था।

मेरे पिता का शिक्षा पर बहुत जोर रहता था।

इसलिए हम लोग कुछ पढ़ लिख गए।

पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद बिहार विधान परिषद के उप 

सभापति डा.राम वचन राय की सर्वाधिक सटीक टिप्पणी थी--‘‘पद्मश्री का सम्मान आपकी एकांत साधना का सम्मान है।’’

उस समय यदि किसी अखबार ने मुझसे बातचीत की होती तो 

मैं बताता कि मेरी जैसी कृषक पृष्ठभूूमि वालों को भी निराश होने की जरुरत नहीं है।

कोई खाली पैर यानी जूते के बिना भी तपती धूप और जलती मिट्टी वाली सड़क से रोज 4 किलोमीटर जाने -आने वाला 

भी खुश होने लायक उपलब्धि प्राप्त कर सकता है।कैसे ?

डा.रामवचन राय की टिप्पणी वाले वाक्य का पालन करके।

पर,मुझे लगा कि अखबारों को एक ऐसे व्यक्ति से भी बातचीत करने की भी फुर्सत या मानसिकता नहीं थी जिसे बिहार से पहली बार पत्रकारिता में पद्मश्री सम्मान मिला है।

पटना के अखबारों को अनुत्साहित देखकर मैं भी निरुत्साहित हो गया और पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन नहीं गया।

मैं मानता हूं कि यह सम्मान सिर्फ मुझे नहीं मिला ,बल्कि बिहार की पत्रकारिता को भी मिला था।सन 1958 में पद्म सम्मान शुरू हुआ था।बिहार में कार्यरत किसी पत्रकार को इससे पहले कभी नहीं मिला।

यह बिहार के पत्रकारों का भी सम्मान है।

 क्योंकि वर्षों तक बिहार के ही कुछ समर्थ संपादकांे और अनुभवी सहकर्मियों ने तो मेरे जैसे ग्रामीण पृष्ठभूूमि से आए अनगढ़ युवक को पत्रकार के रूप में गढ़ा था। 

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और अंत में

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साप्ताहिक ‘‘दिनमान’’ की प्रशंसा में मैंने सिर्फ पांच ही दिन पहले अपने फेसबुक वाॅल पर एक पोस्ट लिखा था।

उसे करीब 1200 लोगों ने लाइक की।

55 टिप्पणियां आईं।

 82 लोगों ने शेयर किया।मेरे वाॅल पर यह रिकाॅर्ड नंबर रहा।

यानी, जिसे नामवर जी ने हीरा कहा,वह पत्रिका यूं नहीं थी।

नामवर जी वामपंथी विचार के थे।पर,कई अन्य वामपंथियों की तरह वे नहीं थे।

  दिनमान कोई वामपंथी पत्रिका नहीं थी।एक तरह से उसे प्रोफेशनल पत्रकारिता का उत्तम नमूना मान सकते हैं।

हां,कुछ लोग उस पर डा.राम मनोहर लोहिया का असर देखते थे।एक बार दिनमान में एक चिट्ठी छपी जिसमें पाठक ने तंज कसते हुए संपादक को लिखा था--‘‘आप अपनी पत्रिका का नाम दिनमान के बदल लोहियामान रख लीजिए।’’

संपादक ने बचाव करते हुए उस चिट्ठी के साथ अपना यह जवाब भी छापा कि देश की राजनीति में लोहिया के योगदान का बहुत महत्व है।अज्ञेय जी तब संपादक थे।

यह चिट्ठी मिल जाएगी तो उसे फेसबुक पर एक दिन पोस्ट करूंगा। 

  खैर मेरी जानकारी के अनुसार दिनमान पर दो रिसर्च स्काॅलर को पीएच.डी. की उपाधि मिल चुकी है। पहले को नहीं जानता।दूसरे रिसर्चर रहे --दिल्ली विश्व विद्यालय के डा.मनीषचंद्र शुक्ल जिन्होंने मेरी लाइब्रेरी को उनकी सेवा का मौका दिया था।

(मैं तो नहीं जानता ,किंतु दिल्ली के जानकार लोग यह बताते हैं कि दिनमान की हार्ड काॅपी इस देश में सिर्फ मेरे ही पास है।जापान की एक लाइब्रेरी में जरूर है।संभवत‘ इसके प्रकाशक टाइम्स आॅफ इंडिया समूह ने इसकी माइक्रो फिल्मींग करा ली हो।इस संबंध कोई अन्य सूचना हो तो बताइएगा।इस देश में कहीं पूरी फाइल होगी तो मेरे यहां जो कुछ थोड़े अंक नहीं है,उनकी फोटो काॅपी करवाने की कोशिश करूंगा।

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दिनमान जैसी किसी पत्रिका के बाजार से शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त कर लेने की कितनी ललक होती है,वह मैं ही जानता हूं।

साठ के दशक में मैं गांव में रहता था।दिनमान के लिए सप्ताह के एक खास दिन गांव से आकर दिघवारा से ट्रेन से छपरा कचहरी स्टेशन स्थित व्हीलर के पास जाता था।वहां नहीं मिलता था तो ट्रेन से ही छपरा जंक्सन।वहां न मिलने पर सिवान।

सिवान में भी नहीं मिलने पर वापस सोनपुर स्टेशन।यदि वहां भी न मिले तो वापस गांव और फिर रात भर निराशा।हालांकि ऐसा हर सप्ताह नहीं होता था।इस तरह से एक -एक अंक संजो कर मैंने रखा है।सन 1965 से जब तक छपा।

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पुनश्चः

पद्म सम्मान का प्रावधान उनके लिए भी होना चाहिए जो  सुदूर इलाके में समृद्ध लाइब्रेरी की स्थापना करें।  

  

    


          तथ्यपरक या व्यक्तिपरक ??

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        सुरेंद्र किशोर

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  मैंने डा.राम मनोहर लोहिया पर आज एक पोस्ट लिखा था।

उसे मैंने भारी विरोध के कारण अब हटा दिया है।

हालंाकि मैं अपनी बात यानी तथ्य पर अब भी कायम हूं।

मेरी समझ से मेरा सोर्स गलत नहीं हो सकता।

मेरा सोर्स वही थे जिनके यहां पटना आने पर डा.लोहिया रुकते थे।

जब वे गलत होंगे तो सही कौन होगा ?

लोहिया के निधन के बाद उन्होंने दिल्ली से लोहिया जी की चप्पल अपने साथ लाई थी।उसे अपने बैठकखाने में रखा था।तब उस बैठकखाने का एक ‘‘बैठकबाज’’ मैं भी था।

यदि वे गलत थे तो मैं भी गलत हूं।

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कुछ लोगों की शिकायत यह है कि मैंने अपने वाॅल से कमेंट वाला आप्सन जान बूझकर  हटा दिया है।

पता नहीं, यह कैसे हुआ है !

मैं तो तकनीकी तौर पर बहुत कमजोर व्यक्ति हूं।

मुझे कमेंट -शेयर आदि के आप्सन को हटाने या जोड़ने आता भी नहीं।अब इस झूठ का क्या करेंगे कि मैंने आप्सन हटा दिया है ?

दरअसल जब व्यक्ति आब्जेक्टिव न होकर सब्जेक्टिव हो जाए तो यही होता है।

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अब मेरी उम्र नहीं है कि मैं जानबूझ कर किसी असत्य को आगे बढ़ाऊं।

दूसरों को जो कहना-करना हो, करे।उन पर मैं तो असहमत होने के बावजूद कुछ नहीं कहता-लिखता।

मैंने न तो पूरी दुनिया के ज्ञान-जानकारियों का ठेका ले रखा है और न ही मैं किसी का बौद्धिक गार्जियन हूं कि यह फतवा दे दूं कि कौन संघी बन गया और कौन जेहादी ?

(अब यह देश अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर 

संघी और संघ विरोधियों के बीच ध्रुवीकृत होता जा रहा है।

  शीत युद्ध के समय जैसा होता था-

‘‘यदि तुुम कम्युनिस्ट नहीं हो तो सी.आई.ए.के एजेंट हो,’’

उसी तरह आज भी हो रहा है।

यानी, जो हमारे साथ नहीं है ,वह किसी और के साथ है जो हमारा वैचारिक दुश्मन है। 

किसी की बातों पर मैं टिप्पणी नहीं करता जब तक कि वह मुझसे संबंधित न हो।

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कुछ लोगों को अनफें्रड जरूर कर देता हूं क्योंकि उनकी बातों का जवाब देने का मेरे पास समय नहीं होता।और जवाब न दो तो यह माना जाएगा कि उनकी बातों से मैं सहमत हूं।हां,अनफ्रेंड करने मुझे जरूर आता है।

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29 जुलाई 25

 

 




सोमवार, 28 जुलाई 2025

     आखिरी चेतावनी

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  अपनी संतान को बचाना हो तो बचा लो

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‘‘भारत में बसा ‘पाकिस्तान’ सरकता हुआ तुम्हारी तरफ आ रहा है।

 तुम तो जिन्दगी गुजार लोगे ,खून के आंसू रोएगी तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां।’’

           ----एक अज्ञात

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(कश्मीर से शुरू होकर मुर्शिदाबाद होते हुए छांगुर बाबा के साम्राज्य तक पहुंचा है।)


बुधवार, 23 जुलाई 2025

 बाद में यह मत कहना कि 

मैंने पहले क्यों नहीं कहा !!

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ ऐसी खबरें या विश्लेषण कुछ वैसे लोगों को बिना मांगे मैं भेजता रहता हूं 

जो सामग्री उन्हें बिलकुल अच्छी नहीं लगती होंगी।

क्योंकि वे अभी दूसरी दुनिया में हैं।

जान बूझकर किसी मजबूरी वश या अनजाने में अज्ञानतावश दूसरी दुनिया में हैं।

 मैं उन्हें इसलिए नहीं भेजता कि वे खबरें पढ़कर अपने विचार बदल लें।

वे मत बदलें।

बदलेंगे भी नहीं।

  वे वरीय या होशियार लोग हैं।

 बहुत सोच समझ कर अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने अपना विचार कहीं स्थिर किया है।  

मैं तो सिर्फ उन्हें जानकारी भर देना चाहता हूं ताकि संकट आने पर वे 

यह न कहें कि हमें पहले किसी ने क्यों नहीं बताया था ?

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सन 1962 के चीनी हमले से बहुत पहले संसद के बाहर से डाण्राम मनोहर लोहिया और सदन के भीतर से महावीर त्यागी ;कांग्रेस ,नेहरू को चेता रहे थे कि चीन हमारी सीमा की ओर बढ़ता आ रहा है।

संभल जाइए।

अन्यथा, यह देश भारी परेशानी में पड़ जाएगा।नेहरू नहीं चेते।

 नतीजा सब जानते हैं।चीन से शर्मनाक पराजय के बाद प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू इस तरह टूट गए कि उसके बाद अधिक दिनों तक जिन्दा नहीं रह सके।

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22 जुलाई 25




शनिवार, 12 जुलाई 2025

 दैनिक ‘आज’ (फरवरी,1977)में प्रकाशित जेपी के 

इंटरव्यू की फोटोकाॅपी हासिल करने पर मैं 

दस हजार रुपए तक पुरस्कार या पारिश्रमिक दूंगा

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सुरेंद्र किशोर

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दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो प्रमुख पारसनाथ सिंह और मैंने मिलकर 

फरवरी, 1977 में जयप्रकाश नारायण से लंबी भेंट वार्ता की थी।

भेंट वार्ता 13 फरवरी, 1977 को हुई।

  16 या 17 फरवरी, 1977 को आज के वाराणसी और कानपुर संस्करणों में प्रमुखता से वह भेंट वार्ता छपी थी।उसे बी बी सी रेडियो ने भी अपने बुलेटिन में उधृत किया था।

   मेरे पास उस ऐतिहासिक इंटरव्यू की काॅपी नहीं है।मैं पिछले कई साल से इसे प्राप्त करने की कोशिश करता रहा हूं।पर,मैं विफल रहा।

शायद उसके लिए किसी को कुछ अधिक प्रयास करने की जरूरत है।

   यदि कोई महानुभाव इस मामले में मेरी मदद करेंगे तो मैं उन्हें पुरस्कार दूंगा ।साथ ही मेरी इंटरव्यू वाली प्रस्तावित पुस्तक में उनके प्रयास की चर्चा रहेगी जो उस इंटरव्यू की फोटो काॅपी हासिल करने में मुझे मदद करेंगे।

   अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने दर्जनों बड़ी हस्तियों का इंटरव्यू किया है।उनमें जेपी सबसे बड़ी हस्ती थे।

सारी भेंट वार्ताओं को मिलाकर एक पठनीय पुस्तक बन जाएगी।

पर,जेपी के इंटरव्यू के बिना वह पुस्तक अधूरी ही रहेगी।देखता हूं , मेरी इस विनती 

का मान कौन रख पाते हैं !

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8 जुलाई 25    

 


 बिहार में गत साल नवंबर में 4 विधान सभा सीटों पर उप चुनाव हुए थे।

इनमें से तीन सीटें इंडी गठबंधन के पास थीं।

पर उप चुनाव में चारों सीटें राजग जीत गई ।

नवंबर, 24 के बाद कौन सा इतना बड़ा  परिवर्तन हो गया कि अब अगले बिहार विधान सभा चुनाव में राजग को सिर्फ 45-50 सीटें ही मिलने की उम्मीद है ?

कांग्रेस कह रही है कि कम सीटें मिलने जा रही हंै,इसीलिए विशेष सर्वेक्षण करा कर नाम हटाने का षड्यंत्र हो रहा है।

दरअसल किसी सर्वेक्षण से कांग्रेस को यही पता चला है कि 45-50 सीटें ही राजग को बिहार में मिलेगी।कैसा सर्वेक्षण कराती है कांग्रेस ?

   सन 2019 के लोक सभा चुनाव रिजल्ट आने से पहले भी कांग्रेस ने तथाकथित एग्जिट पोल करवाया था।उसके रिजल्ट के अनुसार भाजपा को 200 से भी कम सीटें मिलनी थीं।पर राजग को सन 2019 में मिली 303 सीटें।

23 मई 2019 के अखबार में वह खबर छपी थी।इस पोस्ट के साथ उस खबर की कटिंग दी जा रही है।उसी तरह का पोल कराती है कांग्रेस।

  जबकि यह खबर भी है कि एक पेशेवर जनमत संग्रह कर्ता ने अनुमान लगाया है कि बिहार विधान सभा के आगामी चुनाव में राजग को आसानी से बहुमत मिल जाएगा।

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सुरेंद्र किशोर

जुलाई 25


   क्या मेरी यह आशंका निराधार है ?

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सुरेंद्र किशोर

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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह सलाह दी है कि वह आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को भी भारतीय नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार करने पर विचार करे।

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यदि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की यह सलाह मान ली तो अगले दस-बीस वर्षों  में भारत में सिर्फ उसी की सरकारें बनेंगी जिसे घुसपैठियों के एक मुश्त वोट मिलेंगे।अब भी एक राज्य में बन ही रही है।

उसके बाद तो सेकेंड फेज में कोई बांग्लादेशी या रोहिंग्या ही इस देश के प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री बन सकते हैं !

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क्या मेरी यह आशंका निराधार है ?

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11 जुलाई 25


 मेरा अनुमान है कि संघ नेता मोरोपंत पिंगले यदि आज 

जीवित होते तो कहते कि सार्वजनिक जीवन से

रिटायर होने की उम्र 87 साल होनी चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

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आर.एस.एस. के नेता मोरोपंत पिंगले ने सन 1994 में कहा था कि 75 वर्ष का

हो जाने के बाद रिटायर हो जाना चाहिए।

   यदि मोरोपंत आज जीवित होते तो कहते कि 87 साल की उम्र में रिटायर हो जाना चाहिए।

ऐसा मैं क्यों लिख रहा हूं ?

इसलिए कि जब सन 1994 में पिंगले ने 75 बताया था तो कोई उसका आधार तो रहा होगा।

ठोस या वैज्ञानिक आधार यही हो सकता है--शारीरिक और मानसिक क्षमता।

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1994 में भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 60 साल थी।

1947 में भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 32 साल थी।

आज कितनी है ?

आज भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा 72 साल है।

ऐसे में यदि जिन्दा होते तो खुद मोरोपंत जी कहते कि सक्रिय राजनीति या सार्वजनिक जीवन से रिटायर होने की उम्र 87 होनी चाहिए।

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1947 में यहां के सरकारी सेवकों की अवकाश ग्रहण आयु 55 थी।

पर,जब जीवन प्रत्याशा बढ़ने लगी तो रिटायरमेंट की आयु भी बढ़ती गयी।

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75 साल की चर्चा के बाद मोदी विरोधी खुश हैं।

सबसे अधिक खुश तो पाकिस्तान हो रहा होगा क्योंकि उसके कुछ नेताओं को यह कहते हुए मैंने सुना है कि हमारा विरोध इंडिया से नहीं,हिन्दुओं से भी नहीं,बल्कि सिर्फ मोदी से है।

वे ऐसा इसलिए कहते हैं कि वे समझते हैं कि मोदी रहेगा तो गजवा ए हिन्द किसी भी हालत में नहीं होने देगा।

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12 जुलाई 25

 


गुरुवार, 10 जुलाई 2025

 शहाबुद्दीन जी अमर रहें ’’कह कर तेजस्वी यादव ने समय से पहले ही अपना ‘‘चुनाव घोषणा पत्र’’ जारी कर दिया है।

जिसे समझना है,समझ ले।जो ना समझे,वह अनाड़ी है।

यानी राजद को यदि सत्ता मिली तो फिर वही सब होगा,जो सन 1990 से 2005 तक हुआ था।


बुधवार, 9 जुलाई 2025

 दैनिक ‘आज’ (फरवरी,1977)में प्रकाशित जेपी के 

इंटरव्यू की फोटोकाॅपी हासिल करने पर मैं 

दस हजार रुपए तक पुरस्कार या पारिश्रमिक दूंगा

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सुरेंद्र किशोर

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दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो प्रमुख पारसनाथ सिंह और मैंने मिलकर 

फरवरी, 1977 में जयप्रकाश नारायण से लंबी भेंट वार्ता की थी।

भेंट वार्ता 13 फरवरी, 1977 को हुई।

  16 या 17 फरवरी, 1977 को आज के वाराणसी और कानपुर संस्करणों में प्रमुखता से वह भेंट वार्ता छपी थी।उसे बी बी सी रेडियो ने भी अपने बुलेटिन में उधृत किया था।

   मेरे पास उस ऐतिहासिक इंटरव्यू की काॅपी नहीं है।मैं पिछले कई साल से इसे प्राप्त करने की कोशिश करता रहा हूं।पर,मैं विफल रहा।

शायद उसके लिए किसी को कुछ अधिक प्रयास करने की जरूरत है।

   यदि कोई महानुभाव इस मामले में मेरी मदद करेंगे तो मैं उन्हें पुरस्कार दूंगा ।साथ ही मेरी इंटरव्यू वाली प्रस्तावित पुस्तक में उनके प्रयास की चर्चा रहेगी जो उस इंटरव्यू की फोटो काॅपी हासिल करने में मुझे मदद करेंगे।

   अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने दर्जनों बड़ी हस्तियों का इंटरव्यू किया है।उनमें जेपी सबसे बड़ी हस्ती थे।

सारी भेंट वार्ताओं को मिलाकर एक पठनीय पुस्तक बन जाएगी।

पर,जेपी के इंटरव्यू के बिना वह पुस्तक अधूरी ही रहेगी।देखता हूं , मेरी इस विनती 

का मान कौन रख पाते हैं !

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8 जुलाई 25    

 


मंगलवार, 8 जुलाई 2025

 ‘आज भी अघोषित इमर्जेंसी है।’

‘आज भी बिहार में जंगल राज है।’

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सुरेंद्र किशोर

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आए दिन कुछ खास लोगों की ओर से ऐसा कहा जाता है।

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मैं मान लूंगा कि आज भी अघोषित इमर्जेंसी है यदि मोदी सरकार

अखबारों को यह निदेश जारी कर दे कि वे राहुल गांधी का कोई भी चित्र अपने अखबार न छापंे।

  लोकतंत्र का स्विच आॅफ कर दिया जाए ताकि इस आदेश के खिलाफ कोई कोर्ट न जा सके और अखबार को इस आदेश का पालन करना पड़े।

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इमर्जेंसी में स्वास्थ्य कारणों से जब 12 नवंबर 1975 को जयप्रकाश नारायण को पेरोल पर रिहा किया गया तो अखबारों को इंदिरा सरकार ने यह आदेश दे दिया था कि जेपी का फोटो नहीं छापा जाए।उनके बयान न छापे जाएं ।साथ ही,वे कहां से कहां जाते हैं, इसका विवरण भी अखबार न छापंे।अखबारों को इस आदेश का पालन करना पड़ा था।

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आज बिहार में जंगल राज है,यह बात भी मैं मान लूंगा यदि आज के सत्ताधारी दल का कोई सांसद रंगदारी न देने के कारण किसी व्यापारी के बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाले और सत्ताधारी दल उसे अपने दल से नहीं निकाले।

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ये दो उदाहरण सिर्फ नमूने मात्र हैं।ऐसे न जाने कितने अत्याचार आपातकाल और ‘जंगल राज’ में हुए।दोनों काल खंडों का मैं खुद भी गवाह और भुक्तभोगी हूं।भयंकर भुक्तभोगी।अभूतपूर्व अपमान व कष्ट सहने पड़े थे।

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  6 जुलाई 25

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पुनश्चः कानून -व्यवस्था के मामले में बिहार में आज कोई आदर्श स्थिति नहीं है जैसा खुद नीतीश कुमार के कार्यकाल के शुरू के कुछ साल रहे।

जब थाने नीलाम होंगे,गवाहों की सुरक्षा नहीं होगी तो हत्यारे बेफिक्र होकर मर्डर करेंगे ही।

  पुलिस का चरित्र देश भर में एक ही है।पर,मुख्य मंत्री पर निर्भर करता है कि वे लगाम कसते हैं या ढीला छोड़ देते हैं।

यू.पी.के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ उसी पुलिस से अच्छा काम करवा रहे हैं।हमारे मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चाहिए कि वे भी योगी आदित्यनाथ की राह पर चलें।

अन्यथा, नीतीश के अच्छे काम भी जनता की नजरों से धीरे- धीरे ओझल हो जाएंगे।

उसे बिहार के बेलगाम अपराधी और निकम्मे पुलिसकर्मी ही याद रहेंगे।वह राजग को महंगा पड़ सकता है।

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सोमवार, 7 जुलाई 2025

 देश के एक प्रतिष्ठित चैनल की महिला ऐंकर को मैं समझदार ऐंकर समझता था।

पर,डिबेट आयोजित करने के मामले में उनकी भी समझदारी कहां चली जाती है,समझ में नहीं आता !

जब आप आठ -आठ गेस्ट वक्ताओं को एक साथ जुटा लेंगी तो कोई सार्थक बहस हो सकती है क्या ?

  यह बात उस समझदार ऐंकर क्यों समझ में नहीं आती ?

पहले मैं बड़ी उत्सुकता से इस चैनल का डिबेट सुनता था।

पर, निरंतर टोका टोकी के कारण जब किसी गेस्ट की पूरी बात समझ में ही नहीं आने लगी तो देखना छोड़ दिया।

आठ में से तो कम से कम पांच या छह गेस्ट अपनी बारी से पहले बोलने लगते हैं।

लगता है कि उनके परिवार ने उन्हें कोई संस्कार ही नहीं दिया।

  हां,उनके बाल-बच्चे अपने घर में टी.वी.के पास बैठकर यह शिक्षा जरूर ले रहे होंगे कि यदि मैं भी च्ल्लिाना सीख जाऊंगा तो मुझे भी कोई चैनल वाला मौका दे देगा !!!

कई बार जब एक साथ चार -चार गेस्ट एक दूसरे पर चिल्लाने लगते हैं तो लगता है कि जैसे गली कुत्ते एक दूसरे पर भौंक रहे हैं।

  ऐसा डिबेट सुन लेने के बाद कोई समझदार श्रोता-दर्शक कितनी जानकारी ले

सकेगा ? 

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शनिवार, 5 जुलाई 2025

 अल्पसंख्यक वोट के लिए कितना नीचे गिरोगे ?

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पहले 2019-20 के सी.ए.ए.के विरुद्ध अफवाह और अब

 मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण पर सफेद झूठ ! ?

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ तथाकथित सेक्युलर नेताओं ने सन 2019-20 में दिल्ली के शाहीनबाग धरना स्थल पर जाकर इस अफवाह को पूरा बल पहुंचाया कि सी.ए.ए. लागू होने से मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी।

इस अफवाह के कारण जगह-जगह दंगे हुए जिनमें 69 लोग मारे गये थे।

क्या वैसे अफवाहबाजों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा नहीं चलना चाहिए ?उन सब नेताओं के नाम अखबारों में छपे ही थे।

नहीं चला,इसलिए अब वही तत्व यह अफवाह फैला रहे हैं कि मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सभी मतदाताओं को अपने मात-पिता का जन्म प्रमाण पत्र दिखाना पड़ेगा।

यदि इस अफवाह को लेकर एक बार फिर दंगे होते हैं तो क्या यह झूठ फैलाने के लिए उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलना चाहिए ?नहीं चलता है,इसीलिए वे अपने अगले झूठ के साथ  तैयार रहते हैं।

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मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम शामिल करवाने 

और गलत तरीके से सूची से नाम कटवाने के अपराध 

में भी आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान होना चाहिए।

इस सुझाव के पक्ष में 

कितने राजनीतिक दल होंगे और विरोध में कितने 

दल होंगे ?कल्पना कर लें।

अनेक राजनीतिक दलों का फिलहाल स्वार्थ यह है कि 2003 के

बाद जिन घुसपैठियों के नाम नाजायज तरीके से भारत की मतदाता सूचियों में जोड़ दिए गए हैं,उनके नाम न हटें ताकि, वे इस बार भी उन्हें वोट दे सकें।

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गलत तरीके से नाम चढ़वाने का आशय यह है कि किसी अपात्र का नाम 

रिश्वत देकर या किसी अन्य उपाय से मतदाता सूची में शामिल करवा दिया जाये।

गलत तरीके से नाम कटवाने का मतलब है कि जो व्यक्ति भारत का वास्तविक नागरिक हैं और उसका नाम मतदाता सूची में शामिल है,यानी जो वैध मतदाता है,उसका नाम मतदाता सूची से हटवाया दिया जाये।

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असलियत यह है कि 2003 के बाद लाखों-लाख बांग्ला देशियों और रोहिग्याओं के नाम बिहार सहित भारत की मतदाता सूचियों में शामिल करवा दिए गए हंै।ऐसा इस देश के जेहादियों,मुस्लिम वोट लोलुप दलों और भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों ने मिलकर किया है। 

दूसरी ओर, इस बीच यानी 2003 में और 2003 के बाद जिनका निधन हुआ,उनके नाम नहीं हटे।जो इस बीच 18 साल के हो गये,उनके नाम नहीं जुड़े।

 ऐसे ही काम के लिए विशेष गहन

पुनरीक्षण का काम हो रहा है।

चुनाव आयोग बार-बार यह कह रहा है कि 1 जनवरी 2003 तक की मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं को कोई दस्तावेज देने की जरूरत नहीं है।

इसके बावजूद अफवाह ब्र्रिगेड सक्रिय है--कह रहा है कि हम अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र कहां से ला पाएंगे ?

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ऐसी ही अफवाह मुस्लिम वोट लोलुप नेताओं ने 2019-20 में शाहीन बाग के धरना स्थल पर जाकर फैलाया था।

जेहादी गिरोह अफवाह फैलाते हैं तो उनका उद्देश्य समझ में आता है,पर कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों ने भी सी.ए.ए.विरोधी धरना स्थल पर जाकर कहा कि सी.ए.ए.लागू होने के बाद मुसलमानों की नागरिकता खत्म हो जाएगी।

केंद्र सरकार कहती रही कि यह नागरिकता देने का कानून है ,खत्म करने का नहीं।पर अफवाह ब्रिगेड दंगा करवा कर लोगों की जान लेने में अंततः सफल हो गया था।

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ऐसे अफवाह फैलाने वालों के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान जल्द से जल्द होना चाहिए।

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आज जो अफवाह फैला रहे हैं कि सबको अपने माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र देना पड़ेगा,वे यह अपराध करके दंगा करवाना चाहते हैं ?

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सी.ए.ए. के तहत गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत में नागरिकता इन दिनों दी जा रही है।

इस अभियान के तहत क्या किसी मुस्लिम की नागरिकता छीन ली गई ?

नहीं।

मौजूदा गहन पुनरीक्षण को लेकर यह अफवाह भी फैलाई जा रही है कि यह नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर तैयार करने की पूर्व पीठिका है।

यदि है भी क्या हर्ज है ?

पाकिस्तान सहित दुनिया के अनेक देशों में उनका अपना नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर है।

पर भारत के मुस्लिम वोट लोलुप नेताओं  को ऐसा रजिस्टर नहीं चाहिए।क्योंकि तब फिर वे नये घुसपैठियों को मतदाता कैसे बना पाएंगे ?

ऐसे ही जेहादी मुस्लिम तुष्टिकरण के चक्कर में पश्चिम बंगाल में सी.पी.एम.बर्बाद हुई।

तुष्टिकरण के कारण ही केरल में भी सी.एम.एम.अगली बार विधान सभा चुनाव में सत्ता से बाहर हो जाएगी।गत लोक सभा चुनाव में सी.पी.एम.को सिर्फ एक सीट मिली है।

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4 जुलाई 25 


बुधवार, 2 जुलाई 2025

 महाकवि कालिदास--उच्चैठ या उज्जैन !

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सुरेंद्र किशोर

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जनश्रुति है कि मधुबनी जिले के उज्जैठ गांव की भगवती के मुख पर कालिख पोतने को उद्यत महामूर्ख कालिदास जगन्माता भगवती के प्रसाद से महाकवि कालिदास हो जाते हैं।

यद्यपि यह माना जाता है कि महा कवि कालिदास बिहार के मिथिला क्षेत्र के थे और उज्जैन उनकी कर्मभूमि थी।

  पर, जन्म स्थान को लेकर अनिश्चितता फिर भी रही है।

हाल में मैंने लक्ष्मण झा की पुस्तक पढ़ी जिसमें कालिदास डीह की चर्चा है।

पुस्तक का नाम है ‘‘महाकवि कालिदास कहां और कब ?’’

यह पुस्तक 1998 में प्रकाशित हुई।

  पुस्तक में लक्ष्मण झा लिखते हैं--‘‘यहां मैं एक तथ्य की ओर सबों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।अंग्रेजी सरकार 

 ने सन 1900 में भूमि संबंधी कागज तैयार करने एवं राजस्व सुधार के लिए अपने राज्य बिहार प्रांत में भी परिमाप कराया।

 उज्जैठ (मधुबनी जिला)गांव का भी परिमाप कराया गया।उस गांव के राजस्व रिकार्ड में एक डीह के बारे में लिखा हुआ है कि यह डीह कालिदास डीह के रूप में मशहूर है।

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1 जुलाई 25

  

  


मंगलवार, 1 जुलाई 2025

   अब तेरे हवाले वतन साथियो !!!,

देश की अखंडता पर भारी खतरा

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सुरेंद्र किशोर

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बांग्ला देशियों -रोहिग्याओं को कुछ राजनीतिक दलों और देशविरोधी तत्वों ने 

अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी बुलाकर लाखों की संख्या में  जहां -तहां बसा दिया और उन्हें वोटर भी बनवा दिया सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत देकर।

स्वाभाविक है कि वे राजनीतिक दल नहीं चाहेंगे कि गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के जरिए उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाएं।

इसीलिए वे पुनरीक्षण का जोरदार विरोध कर रहे हैं।अभी तो पश्चिम बंगाल में बांग्ला देशी नागरिक घुसपैठ करके विधायक बन गयी है।बिहार में घुसपैठ जारी रही तो यहां घुसपैठिया कभी मंत्री भी बन सकता हैै।यह सब देश भर में पहले की ही तरह ही होता रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब भारत ,भारत नहीं रहेगा।

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  एक और कहानी वक्फ की।

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‘‘वैसी जमीन भी हमारी ही है जिसका 

कोई कागजी सबूत हमारे पास नहीं’’ 

-----मुस्लिम पक्ष का तर्क

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ऐसे तर्क का समर्थन करने वाले राजनीतिक 

दल अनजाने में भाजपा को चुनावी

लाभ पहुंचा रहे हैं।

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    पिछले दिनों मशहूर मुस्लिम नेता व सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 

‘‘उत्तर प्रदेश में एक लाख 21 हजार वक्फ की संपत्तियां हैं।पर,उनमें से एक लाख 12 हजार संपत्तियों का वक्फ बोर्ड के पास कोई कागजी सबूत नहीं है।’’

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उत्तर प्रदेश सरकार ने इस संबंध में कहा है कि जिस वक्फ जमीन का मालिकाना हक सन 1952 के राजस्व रिकाॅर्ड में दर्ज है,उसी को वक्फ की संपत्ति माना जाएगा।

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पर,जमीयत उलेमा हिन्द कहता है कि मनमोहन सिंह सरकार ने वक्फ बोर्ड को जो ताकत दी है,उसके अनुसार ही हम मालिकाना हक मानते हैं न कि किसी राजस्व रिकाॅर्ड को मानते हैं।

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ऐसे में यही कहा जा कता है--

अब तेरे हवाले वतन साथियो !

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1 जुलाई 25