‘आज भी अघोषित इमर्जेंसी है।’
‘आज भी बिहार में जंगल राज है।’
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सुरेंद्र किशोर
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आए दिन कुछ खास लोगों की ओर से ऐसा कहा जाता है।
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मैं मान लूंगा कि आज भी अघोषित इमर्जेंसी है यदि मोदी सरकार
अखबारों को यह निदेश जारी कर दे कि वे राहुल गांधी का कोई भी चित्र अपने अखबार न छापंे।
लोकतंत्र का स्विच आॅफ कर दिया जाए ताकि इस आदेश के खिलाफ कोई कोर्ट न जा सके और अखबार को इस आदेश का पालन करना पड़े।
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इमर्जेंसी में स्वास्थ्य कारणों से जब 12 नवंबर 1975 को जयप्रकाश नारायण को पेरोल पर रिहा किया गया तो अखबारों को इंदिरा सरकार ने यह आदेश दे दिया था कि जेपी का फोटो नहीं छापा जाए।उनके बयान न छापे जाएं ।साथ ही,वे कहां से कहां जाते हैं, इसका विवरण भी अखबार न छापंे।अखबारों को इस आदेश का पालन करना पड़ा था।
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आज बिहार में जंगल राज है,यह बात भी मैं मान लूंगा यदि आज के सत्ताधारी दल का कोई सांसद रंगदारी न देने के कारण किसी व्यापारी के बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाले और सत्ताधारी दल उसे अपने दल से नहीं निकाले।
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ये दो उदाहरण सिर्फ नमूने मात्र हैं।ऐसे न जाने कितने अत्याचार आपातकाल और ‘जंगल राज’ में हुए।दोनों काल खंडों का मैं खुद भी गवाह और भुक्तभोगी हूं।भयंकर भुक्तभोगी।अभूतपूर्व अपमान व कष्ट सहने पड़े थे।
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6 जुलाई 25
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पुनश्चः कानून -व्यवस्था के मामले में बिहार में आज कोई आदर्श स्थिति नहीं है जैसा खुद नीतीश कुमार के कार्यकाल के शुरू के कुछ साल रहे।
जब थाने नीलाम होंगे,गवाहों की सुरक्षा नहीं होगी तो हत्यारे बेफिक्र होकर मर्डर करेंगे ही।
पुलिस का चरित्र देश भर में एक ही है।पर,मुख्य मंत्री पर निर्भर करता है कि वे लगाम कसते हैं या ढीला छोड़ देते हैं।
यू.पी.के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ उसी पुलिस से अच्छा काम करवा रहे हैं।हमारे मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को चाहिए कि वे भी योगी आदित्यनाथ की राह पर चलें।
अन्यथा, नीतीश के अच्छे काम भी जनता की नजरों से धीरे- धीरे ओझल हो जाएंगे।
उसे बिहार के बेलगाम अपराधी और निकम्मे पुलिसकर्मी ही याद रहेंगे।वह राजग को महंगा पड़ सकता है।
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