तथ्यपरक या व्यक्तिपरक ??
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सुरेंद्र किशोर
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मैंने डा.राम मनोहर लोहिया पर आज एक पोस्ट लिखा था।
उसे मैंने भारी विरोध के कारण अब हटा दिया है।
हालंाकि मैं अपनी बात यानी तथ्य पर अब भी कायम हूं।
मेरी समझ से मेरा सोर्स गलत नहीं हो सकता।
मेरा सोर्स वही थे जिनके यहां पटना आने पर डा.लोहिया रुकते थे।
जब वे गलत होंगे तो सही कौन होगा ?
लोहिया के निधन के बाद उन्होंने दिल्ली से लोहिया जी की चप्पल अपने साथ लाई थी।उसे अपने बैठकखाने में रखा था।तब उस बैठकखाने का एक ‘‘बैठकबाज’’ मैं भी था।
यदि वे गलत थे तो मैं भी गलत हूं।
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कुछ लोगों की शिकायत यह है कि मैंने अपने वाॅल से कमेंट वाला आप्सन जान बूझकर हटा दिया है।
पता नहीं, यह कैसे हुआ है !
मैं तो तकनीकी तौर पर बहुत कमजोर व्यक्ति हूं।
मुझे कमेंट -शेयर आदि के आप्सन को हटाने या जोड़ने आता भी नहीं।अब इस झूठ का क्या करेंगे कि मैंने आप्सन हटा दिया है ?
दरअसल जब व्यक्ति आब्जेक्टिव न होकर सब्जेक्टिव हो जाए तो यही होता है।
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अब मेरी उम्र नहीं है कि मैं जानबूझ कर किसी असत्य को आगे बढ़ाऊं।
दूसरों को जो कहना-करना हो, करे।उन पर मैं तो असहमत होने के बावजूद कुछ नहीं कहता-लिखता।
मैंने न तो पूरी दुनिया के ज्ञान-जानकारियों का ठेका ले रखा है और न ही मैं किसी का बौद्धिक गार्जियन हूं कि यह फतवा दे दूं कि कौन संघी बन गया और कौन जेहादी ?
(अब यह देश अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर
संघी और संघ विरोधियों के बीच ध्रुवीकृत होता जा रहा है।
शीत युद्ध के समय जैसा होता था-
‘‘यदि तुुम कम्युनिस्ट नहीं हो तो सी.आई.ए.के एजेंट हो,’’
उसी तरह आज भी हो रहा है।
यानी, जो हमारे साथ नहीं है ,वह किसी और के साथ है जो हमारा वैचारिक दुश्मन है।
किसी की बातों पर मैं टिप्पणी नहीं करता जब तक कि वह मुझसे संबंधित न हो।
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कुछ लोगों को अनफें्रड जरूर कर देता हूं क्योंकि उनकी बातों का जवाब देने का मेरे पास समय नहीं होता।और जवाब न दो तो यह माना जाएगा कि उनकी बातों से मैं सहमत हूं।हां,अनफ्रेंड करने मुझे जरूर आता है।
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29 जुलाई 25
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