देश के एक प्रतिष्ठित चैनल की महिला ऐंकर को मैं समझदार ऐंकर समझता था।
पर,डिबेट आयोजित करने के मामले में उनकी भी समझदारी कहां चली जाती है,समझ में नहीं आता !
जब आप आठ -आठ गेस्ट वक्ताओं को एक साथ जुटा लेंगी तो कोई सार्थक बहस हो सकती है क्या ?
यह बात उस समझदार ऐंकर क्यों समझ में नहीं आती ?
पहले मैं बड़ी उत्सुकता से इस चैनल का डिबेट सुनता था।
पर, निरंतर टोका टोकी के कारण जब किसी गेस्ट की पूरी बात समझ में ही नहीं आने लगी तो देखना छोड़ दिया।
आठ में से तो कम से कम पांच या छह गेस्ट अपनी बारी से पहले बोलने लगते हैं।
लगता है कि उनके परिवार ने उन्हें कोई संस्कार ही नहीं दिया।
हां,उनके बाल-बच्चे अपने घर में टी.वी.के पास बैठकर यह शिक्षा जरूर ले रहे होंगे कि यदि मैं भी च्ल्लिाना सीख जाऊंगा तो मुझे भी कोई चैनल वाला मौका दे देगा !!!
कई बार जब एक साथ चार -चार गेस्ट एक दूसरे पर चिल्लाने लगते हैं तो लगता है कि जैसे गली कुत्ते एक दूसरे पर भौंक रहे हैं।
ऐसा डिबेट सुन लेने के बाद कोई समझदार श्रोता-दर्शक कितनी जानकारी ले
सकेगा ?
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