मंगलवार, 29 जुलाई 2025

   डा.नामवर सिंह की याद में 

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  (1926--2019)

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उनके एक प्रेरक वाक्य ने मेरी निजी लाइब्रेरी 

को समृद्धत्तर करने का प्रोत्साहन दे दिया

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सुरेंद्र किशोर

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सुरेंद्र जी,

‘‘आपने हीरो संजो कर रखा है।’’

मेरी निजी लाइब्रेरी में साप्ताहिक ‘‘दिनमान’’ की पूरी फाइल (कुछ अंकों को छोड़कर)देखकर डा.सिंह ने सन 2001 में यह उत्साहबर्धक टिप्पणी की थी।

इस एक वाक्य ने मेरी लाइब्रेरी के विकास में पंख लगा दिये।

तब मेरी लाइब्रेरी में महज 15-16 आलमारियां थीं।अभी -अभी यह पोस्ट लिखने से ठीक पहले मैंने गिना तो पाया कि 33 आलमारियां हो गईं।

मेरे पुत्रों की आलमारियां इनमें शामिल नहीं हैं।

 अब इस लाइब्रेरी सह संदर्भालय को संभालना मेरे लिए कठिन हो रहा है।क्योंकि इसके रख-रखाव और इसे अपडेट करते जाने के लिए मुझे एक सहायक की जरूरत है जिसके लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं।

 खैर,मेरे बाद इसका जो होगा ,सो होगा,वैसे मेरी संतान इसे संभाल लेगी।इस योग्य वह है।

 बड़े लोग कभी अपने किसी  एक वाक्य से भी न जाने कितना अधिक प्रभाव डाल देते हैं।

यह बात तब की है जब पटना में भी डा.नामवर सिंह की 75 वीं जयंती मनाई जा रही थी।प्रभाष जोशी ही आयोजक थे।

प्रभाष जी की शिकायत रहती थी कि मैं न तो किसी को खाने पर बुलाता हूं और न कहीं भोजन पर जाता हूं।

उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि ‘‘बड़े लोगों को घर बुलाने से आपके बच्चों में हीन भावना नहीं आएगी।

आप खाने पर बुलाइए। अब भला प्रभाष जी के आदेश को मैं कैसे टाल सकता था।

मेरे आवास पर डा. नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, चंद्रशेखर धर्माधिकारी तथा कुछ अन्य इसी श्रेणी के गणमान्य लोग आए।

 मेरे निजी पुस्तकालय की सामग्री देख कर नामवर जी ने कहा कि सुरेंद्र जी, आपने तो हीरा संजो कर रखा है।

यह सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था !

मैंने पूछा कि इसका बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकेगा,यह सोच कर कभी बताइएगा।खैर, उसका अवसर उन्हें न मिला।

  उनके पटना आने पर कई बार टुकड़ों में कुछ घंटों की मुलाकातों से मुझे लगा कि वे एक स्नेहिल व्यक्ति हैं।अभिमानी कहीं से नहीं थे।अहंकारी तो बिलकुल नहीं।

 साथ ही, ग्रामीण पृष्ठभूमि के होते हुए भी शहरियों के बीच समान रूप से सहज थे।

 किसी भेंट वात्र्ता में उन्होंने एक बार कहा था कि मैं अपने पुत्र को अपनी गोद में खेलाने को तरस गया।क्योंकि गांव के संयुक्त परिवार में कोई अपने पुत्र को गोद नहीं लेता था।वह दूसरे के पुत्र को लेगा।उसके पुत्र को बच्चे के चचा या दादा खेलाएंगे।

 नामवर जी जैसा अद्भुत वक्ता मैंने

नहीं देखा-सुना।

आलोचक थे, पर किसी साहित्यकार से उनका कद ऊंचा था।

 मुझे यह देखकर और भी अच्छा लगा कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क थे।नाश्ते के साथ एक सेव जरूर लेते थे और भोजन के बाद वज्रासन पर बैठना नहीं भूलते थे।

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लगे हाथ,मैं अपनी लाइब्रेरी के बारे में भी एक बार फिर कुछ बता दूं।

मैं भी शुद्ध किसान पृष्ठभूमि का हूं।मेरे पिता सारण जिले के स्टैंडर्ड के अनुसार मेरे जन्म के समय अच्छे किसान थे। 22 बीघा जमीन थी।अब बेच- बाच कर तीनों भाइयों में करीब 10 बीघा बची है।पर,अच्छी सड़क, बिजली और बाजार विकसित हो जाने के कारण जमीन की कीमत काफी बढ़ गई है। 

बचपन में मेरे दालान में तीन बैल,दो गाय और एक भैंस रहती थी।दो नौकर और जन-मजदूर अलग से।

पर,मेरे घर में रामचरित मानस और आल्हा -ऊदल की कहानी की पुस्तक के अलावा कोई पठनीय सामग्री नहीं थी।

मेरे पिता का नाम जमींदारी की रसीद बही पर छपता था- ‘‘मालिक शिवनन्दन सिंह।’’पिता खुद लघु जमीन्दार थे और एक बड़े जमीन्दार के तहसीलदार थे।

पिता का नाम प्रिंट में देखकर मुझे लगा कि मेरा नाम भी प्रिंट में आना चाहिए।

उसके लिए मैं पटना के अखबारों में संपादक के नाम पत्र लिखने लगा।पत्र लिखते -लिखते मैं पत्रकार बन गया।

  जब गांव में रहता था तो तीव्र इच्छा होती कि काश ,पढ़ने की सामग्री मेरे घर में भी होती।

चांदनी रात में दालान में खाट पर लेट कर आसमान देखा करता था।इस तरह समय काटता था।

तभी तय किया था कि जब भी मेरे पास पैसे होंगे तो एक लाइब्रेरी मेरी भी होगी।

 किताबों की कमी नहीं रहेगी।तिनका -तिनका जोड़कर सन 1965 से अब तक मैंने अनेक आलमारियां किताबों,अखबारों ,पत्रिकाओं और संदर्भ सामग्री के सैकड़ों विषयवार लिफाफों से भर दी है।

    याद रहे कि मैं अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था।

मेरे पिता का शिक्षा पर बहुत जोर रहता था।

इसलिए हम लोग कुछ पढ़ लिख गए।

पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद बिहार विधान परिषद के उप 

सभापति डा.राम वचन राय की सर्वाधिक सटीक टिप्पणी थी--‘‘पद्मश्री का सम्मान आपकी एकांत साधना का सम्मान है।’’

उस समय यदि किसी अखबार ने मुझसे बातचीत की होती तो 

मैं बताता कि मेरी जैसी कृषक पृष्ठभूूमि वालों को भी निराश होने की जरुरत नहीं है।

कोई खाली पैर यानी जूते के बिना भी तपती धूप और जलती मिट्टी वाली सड़क से रोज 4 किलोमीटर जाने -आने वाला 

भी खुश होने लायक उपलब्धि प्राप्त कर सकता है।कैसे ?

डा.रामवचन राय की टिप्पणी वाले वाक्य का पालन करके।

पर,मुझे लगा कि अखबारों को एक ऐसे व्यक्ति से भी बातचीत करने की भी फुर्सत या मानसिकता नहीं थी जिसे बिहार से पहली बार पत्रकारिता में पद्मश्री सम्मान मिला है।

पटना के अखबारों को अनुत्साहित देखकर मैं भी निरुत्साहित हो गया और पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन नहीं गया।

मैं मानता हूं कि यह सम्मान सिर्फ मुझे नहीं मिला ,बल्कि बिहार की पत्रकारिता को भी मिला था।सन 1958 में पद्म सम्मान शुरू हुआ था।बिहार में कार्यरत किसी पत्रकार को इससे पहले कभी नहीं मिला।

यह बिहार के पत्रकारों का भी सम्मान है।

 क्योंकि वर्षों तक बिहार के ही कुछ समर्थ संपादकांे और अनुभवी सहकर्मियों ने तो मेरे जैसे ग्रामीण पृष्ठभूूमि से आए अनगढ़ युवक को पत्रकार के रूप में गढ़ा था। 

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और अंत में

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साप्ताहिक ‘‘दिनमान’’ की प्रशंसा में मैंने सिर्फ पांच ही दिन पहले अपने फेसबुक वाॅल पर एक पोस्ट लिखा था।

उसे करीब 1200 लोगों ने लाइक की।

55 टिप्पणियां आईं।

 82 लोगों ने शेयर किया।मेरे वाॅल पर यह रिकाॅर्ड नंबर रहा।

यानी, जिसे नामवर जी ने हीरा कहा,वह पत्रिका यूं नहीं थी।

नामवर जी वामपंथी विचार के थे।पर,कई अन्य वामपंथियों की तरह वे नहीं थे।

  दिनमान कोई वामपंथी पत्रिका नहीं थी।एक तरह से उसे प्रोफेशनल पत्रकारिता का उत्तम नमूना मान सकते हैं।

हां,कुछ लोग उस पर डा.राम मनोहर लोहिया का असर देखते थे।एक बार दिनमान में एक चिट्ठी छपी जिसमें पाठक ने तंज कसते हुए संपादक को लिखा था--‘‘आप अपनी पत्रिका का नाम दिनमान के बदल लोहियामान रख लीजिए।’’

संपादक ने बचाव करते हुए उस चिट्ठी के साथ अपना यह जवाब भी छापा कि देश की राजनीति में लोहिया के योगदान का बहुत महत्व है।अज्ञेय जी तब संपादक थे।

यह चिट्ठी मिल जाएगी तो उसे फेसबुक पर एक दिन पोस्ट करूंगा। 

  खैर मेरी जानकारी के अनुसार दिनमान पर दो रिसर्च स्काॅलर को पीएच.डी. की उपाधि मिल चुकी है। पहले को नहीं जानता।दूसरे रिसर्चर रहे --दिल्ली विश्व विद्यालय के डा.मनीषचंद्र शुक्ल जिन्होंने मेरी लाइब्रेरी को उनकी सेवा का मौका दिया था।

(मैं तो नहीं जानता ,किंतु दिल्ली के जानकार लोग यह बताते हैं कि दिनमान की हार्ड काॅपी इस देश में सिर्फ मेरे ही पास है।जापान की एक लाइब्रेरी में जरूर है।संभवत‘ इसके प्रकाशक टाइम्स आॅफ इंडिया समूह ने इसकी माइक्रो फिल्मींग करा ली हो।इस संबंध कोई अन्य सूचना हो तो बताइएगा।इस देश में कहीं पूरी फाइल होगी तो मेरे यहां जो कुछ थोड़े अंक नहीं है,उनकी फोटो काॅपी करवाने की कोशिश करूंगा।

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दिनमान जैसी किसी पत्रिका के बाजार से शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त कर लेने की कितनी ललक होती है,वह मैं ही जानता हूं।

साठ के दशक में मैं गांव में रहता था।दिनमान के लिए सप्ताह के एक खास दिन गांव से आकर दिघवारा से ट्रेन से छपरा कचहरी स्टेशन स्थित व्हीलर के पास जाता था।वहां नहीं मिलता था तो ट्रेन से ही छपरा जंक्सन।वहां न मिलने पर सिवान।

सिवान में भी नहीं मिलने पर वापस सोनपुर स्टेशन।यदि वहां भी न मिले तो वापस गांव और फिर रात भर निराशा।हालांकि ऐसा हर सप्ताह नहीं होता था।इस तरह से एक -एक अंक संजो कर मैंने रखा है।सन 1965 से जब तक छपा।

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पुनश्चः

पद्म सम्मान का प्रावधान उनके लिए भी होना चाहिए जो  सुदूर इलाके में समृद्ध लाइब्रेरी की स्थापना करें।  

  

    


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