बुधवार, 30 जुलाई 2025

 भारतीय लोकतंत्र की कई बीमारियों  

का निदान साबित होगा जरूरी मतदान

------------

सुरेंद्र किशोर

---------------

यदि यह काम केंद्र सरकार न करे तो सुप्रीम 

कोर्ट संविधान के अनुच्छेद-142 में मिले विशेष 

अधिकार के तहत केंद्र को निदेशित कर सकता है -------------------

जातिवाद,पैसावाद और संप्रदायवाद आदि 

नामक बीमारियों की दवा है अनिवार्य मतदान

-------------------

यदि 90 या 95 प्रतिशत मतदान होने लगे तो 15 -20 प्रतिशत वोट बैंक वाले दल या नेता चुनाव में निर्णायक साबित नहीं हो पाएंगे।जातीय व सांप्रदायिक वोट

बैंक के कुछ सौदागर लोग राजनीति को किस तरह दूषित कर रहे हैं,यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

वोट बैंक की राजनीति ने देश को अब तक बहुत नुकसान पहुंचाया है।अब तो उसके कारण देश की एकता-अखंडता 

पर भी भारी खतरा पैदा हो गया है।

   पिछले लोक सभा चुनाव से पहले कुछ भाजपा नेताओं ने  मतदान को अनिवार्य करने का संकेत दिया है।पर,लगता है कि उनकी प्राथमिकताओं 

में दूसरी बातें अभी अधिक महत्वपूर्ण हैं।

    दुनिया के कई देशों में मतदान अनिवार्य है।जो नागरिक मतदान नहीं करते, उनके लिए कुछ देशों में सजा का भी प्रावधान है।

    कैसा रहेगा यदि एक दिन भारत में यह कानून बने कि जो मतदाता मतदान नहीं करेगा , उसे कुछ खास सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा ?

 और, यदि  इस कानून को कड़ाई से लागू किया जाए तो और कितने प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने को मजबूर हो जाएंगे ?

    फिर भी सब तो नहीं किंतु करीब अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान जरूर करने लगेंगे।95 प्रतिशत भी जा  सकते

हैं।

   पूरे देश को ध्यान में रखें तो  आज तो औसतन 50 से 60 प्रतिशत मतदाता ही मतदान करते हैं । मतों के भारी बंटवारे के कारण 20 -25 प्रतिशत या उससे से भी कम मत पाने वाले लोग भी कई बार चुनाव जीत कर निर्णायक बन जाते  हैं।कई बार तो ऐसा भी होता है कि जिस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है,वह भी चुन लिया जाता है।

    यदि अस्सी -नब्बे -95 प्रतिशत मतदाता मतदान करने लगें तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर अत्यंत कम वोट पाकर भी चुनाव नहीं जीत पाएंगे।भारत में आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी धार्मिक या जातीय समूह  

की आबादी 20-25  प्रतिशत से अधिक नहीं है।अपवादस्वरूप कुछ ही क्षेत्र ऐसे हैं जहां बात इसके विपरीत है।

   यदि कोई जातीय या धार्मिक समूह अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होंगे तो नेतागण भी सिर्फ सांप्रदायिक या जातीय आधार

पर ही अपनी पूरी राजनीति और रणनीति तय नहीं करेंगे।राजनीति में व्यापक दृष्टिकोण विकसित होगा।

इससे देश का भी भला होगा।आज तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की खातिर अनेक नेता इस देश को तोड़ने पर भी अमादा हैं।

लगातार दो या तीन बार मतदान नहीं करने 

वालों का मताधिकार समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

...........................

वोट बैंक की राजनीति की समाप्ति के लिए यह कदम जरूरी है।

.....................................

इटली और आॅस्ट्रेलिया में मतदान अनिवार्य है।

कुछ देशों में मतदान न करने वालों पर जुर्माने का प्रावधान है।

पर,अपना देश गरीब लोगों का है,इसलिए यहां जुर्माना ठीक नहीं रहेगा।

हां,कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है।

गुजरात में स्थानीय चुनावों में मतदान अब अनिवार्य है।

पर,उससे पहले ऐसी कोशिश मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बार की थी।

किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने उस विधेयक पर

अपनी सहमति नहीं दी।दोनों बार वापस कर दिया।तब केंद्र में मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे।

पर,नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद गुजरात विधान सभा ने जब तीसरी बार वह विधेयक पास करके भेजा जो राज्यपाल  ओ.पी.कोहली ने उस पर अपनी स्वीकृति दे दी।

यानी, अनिवार्य मतदान नरेंद्र मोदी के दिमाग की उपज थी।

अब जब मोदी जी खुद प्रधान मंत्री हैं तो जब अन्य अधिक जरूरी कामों से उन्हें फुर्सत मिले तो वे संसद से ऐसा कानून पास करवाएं,ऐसी उम्मीद तो उनसे की ही जा सकती है।

  1952 के आम चुनाव में देश में करीब 

45 प्रतिशत मतदान हुए थे।

2019 के लोक सभा चुनाव में औसतन 67 प्रतिशत मतदान हुए।सन 2024 के लोक सभा चुनाव में 65 दशमलव 79 प्रतिशत वोट पड़े।

यदि 90-95 प्रतिशत मतदान होने लगे तो  15 -20 प्रतिशत वोट बैंक वाले दल या नेता चुनाव में निर्णायक नहीं हो पाएंगे।वोट बैंैंक की राजनीति पहले कांग्रेस ने ही शुरू की थी।बाद में अन्य अनेक दलों ने अपनाया।

याद रहे कि इस देश का सुप्रीम कोर्ट भी अनिवार्य मतदान के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कर चुका है।

...............................

30 जुलाई 25



कोई टिप्पणी नहीं: