मंगलवार, 15 सितंबर 2026

 सामान्य नागरिक संहिता 

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बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश जारी

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मुगल काल की पुनरावृति को रोकने की 

चेष्टा  है समान नागरिक संहिता यानी यू.सी.सी.

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 21 प्रदेशों में यू.सी.सी.लागू करके औरंगजेब शैली की मुगल सत्ता की यहां पुनरावृति को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

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दरअसल मुगल काल की वापसी की आशंका को रोकने के लिए भारत में

यथाशीघ्र सामान्य नागरिक संहिता लागू करना अत्यंत अनिवार्य हो गया है।पर, मुझे नहीं मालूम कि आज महाराणा प्रताप-छत्रपति शिवाजी अंततः मजबूत पडं़ेगे या मान सिंह--जयचंद !

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 वोट लोलुप नेता इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि भारतीय  संविधान के अनुच्छेद-44 में सामान्य नागरिक संहिता का प्रावधान है।इस संविधान को संघियों-भाजपाइयों ने नहीं बनाया है,बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों ने बनाया है जिनमें कांगे्रेसियों का बहुमत था।क्या वे भी साम्प्रदायिक थे ?

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पर,आज के जो वोट लोलुप तथाकथित सेक्युलर नेता यू.सी.सी.का विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल बताशे के लिए मंदिर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे जाने-अनजाने जेहादियों की मनोकामना पूरी करने में मददगार बन रहे हैं।

ऐसे में आम गैर मुस्लिम जनता को यह चुनना है कि वे महाराणा प्रताप -छत्रपति शिवाजी बनेंगे या मान सिंह-जयचंद का अनुसरण करेंगे ?

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डा.जाकिर नाइक कहते हैं कि भारत में अब हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 60 प्रतिशत रह गई है।(विश्वास न हो तो यूट्यूब खोल कर देख लीजिए।)

डा.नाइक ने एक बार कहा था कि हम केरल से ‘‘अपना काम’’ शुरू करेंगे।केरलम में आज वही सब हो रहा है।केरलम से आ रही खबरों पर खुले दिमाग से गौर करिए।

डा.नाइक मलेशिया में है।(बोफोर्स दलाल क्वोत्रोचि भी भाग कर मलेशिया ही गया था।)

यह संयोग नहीं कि राहुल-प्रियंका मलेशिया के प्रधान मंत्री से दिल्ली में मिले।

   मौलाना रशीदी कहते हैं कि मुसलमानों की आबादी भारत में अब 40 प्रतिशत हो चुकी है।

 सरकारी आंकड़ा बताता है कि भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या की वृद्धि दर 16 दशमलव 8 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर 24 दशमलव 6 प्रतिशत।(क्योंकि मुसलमानों को चार वीबियों और अनगिनत बच्चों की इस देश में छूट मिली हुई है।जबकि हिन्दू सिर्फ एक ही शादी कर सकते हैं।)

यह इसलिए संभव है क्योंकि मुसलमानों के लिए अलग कानून हैं।(ब्रिटेन सहित यूरोप के कई देश भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहे हैं।)

जेहादी लोग अब जल्दीबाजी में हैं।वे भारत सहित पूरी दुनिया पर कब्जा चाहते हैं।

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आबादी बढ़ाने के अलावा,लव जेहाद,जबरन या लोभ देकर धर्म परिवर्तन या हिन्दू बच्चों के अपहरण व घुसपैठ की घटनाओं की खबरें आती रहती हैं।

उसके साथ ही भारत में प्रतिबंधित जेहादी संगठन पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया ने घोषणा कर रखी है कि वह सन 2047 तक हथियारों के बल पर भारत को मुस्लिम देश बना देगा।इसके लिए वह हथियार जुटा रहा है।

पी.एफ.आई.के राजनीतिक संगठन एस.डी.पी.आई.से कांग्रेस का ठोस

गठबंधन है।इनकी बनवाई हुई केरलम में मिलीजुली सरकार है।

हाल में केरलम से एक वीडियो आया है जिसमें जेहादी मुस्लिमों की भीड़ नारा लगा रही है--हिन्दुओं को मार कर मंदिरों के पास टांग देंगे।

उधर ब्रिटेन में सड़कों पर निकल मुस्लिमों की भीड़ नारा लगाती  है--‘‘ईसाइयों,ब्रिटेन छोड़ो।’’घर तर के बड़ तर, आउर बड़ तर के घर तर ? 

केरलम सहित भारत के जिन- जिन हिस्सों में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है,वहां से गैर मुसलमानों को या तो भगाया जा रहा है या उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है।या हत्या कर दी जा रही है।

असदुद्दीन कहते हैं--जब मोदी पहाड़ पर चले जाएंगे,योगी मठ में चले जाएंगे तो तुम्हें (यानी हिन्दुओं को )कौन बचाएगा ?

उनका छोटा भाई कह चुका है--15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो दिखा देंगे कि तुम कितने हो और हम कितने हैं। 

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ऐसे में मोदी सरकार और उसके गृह मंत्री अमित शाह गैर मुसलमानों के खास कर हिन्दुओं के रक्षक के रूप में सामने आए हैं।मोदी-शाह को मालूम है कि 

‘‘अब नहीं तो कभी नहीं।बाद में काफी देर हो चुकी होगी !!’’

यू.सी.सी.लागू करने में देर करने पर भारत में देर-सबेर वैसा ही शासन कायम हो जाएगा जैसा पाक और बांग्ला देश में है।तब वे भी नहीं बचेंगे जो आज जयचंद और मान सिंह की भूमिका में हैं।पाक में न तो जोगेंद्र मंडल रह सके थे न मशहूर कम्युनिस्ट सज्जाद जहीर।जोगेंद्र मंडल ने पूर्वी पाकिस्तान से जिन दलितों को भारत आने से रोक लिया था,उन्हें पहले पाक व बाद में बंाग्ला देश के जेहादियों ने जबरन धर्म परिवर्तन करा कर या मार -मार कर समाप्त कर दिया।जोगेंद्र मंडल और सज्जाद जहीर भी जान बचा कर पाक से भारत आ गये थे।

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पाकिस्तान में सन 1947 में हिन्दुओं की जनसंख्या 14 प्रतिशत थी जो अब 1 दशमलव 61 प्रतिशत है।

1947 में बांग्ला देश में हिन्दुओं की जनसंख्या 28 प्रतिशत थी जो आज 7 दशमलव 9 प्रतिशत रह गई है।

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यदि भारत में कांग्रेस नीत सरकार फिर से आ गई तो इस देश को पाकिस्तान बनने से कोई रोक नहीं सकता।

भुट्टो का नारा था--हम भारत को हजार घाव देंगे।

1947 में जिन्ना वादियों का नारा था-‘‘हंस के लिया पाकिस्तान,लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान।’’

3 करोड़ मुसलमानों को बंटवारे के समय भारत में ही रोक कर नेहरू ने एक और पाक बनाने का रास्ता साफ कर दिया था।

संघ प्रमुख मोहन भागवत को बयान आया है--‘‘यू.जी.सी.सिर्फ प्रस्ताव है,न कानून बना, न बनेगा।’’

पर,यू.जी.सी.के विरोध के नाम पर बांकी पुर विधान सभा के लोगों ने एक सी.ए.ए.-एन.आर.आर.विरोधी प्रशांत किशोर को चुनाव जितवा दिया।

  क्या आप समझते हैं कि सी.ए.ए.-एन.आर.सी.विरोध का निहितार्थ क्या है ?

निहितार्थ बहुत खतरनाक है।

यह पी.एफ.आई.एजेंडा था शाहीन बाग धरने (2019)में परिलक्षित हुआ।वहां दंगा करवाया गया--53 लोगों की जान गई थीं।

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भारत के कई बड़े- बड़े सेक्युलर नेताओं ने भारत को लूट कर विदेशों में घर-दुकान-माॅल आदि खरीद लिये हैं।वे वहां जाकर बस जाएंगे।पर आम गैर मुस्लिम आबादी खासकर हिन्दुओं का क्या हाल होगा ?

आज बंटोगे तो कल कटोगे !!!कहीं भागने की जगह भी नहीं मिलेगी।

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     15 सितंबर 26


रविवार, 13 सितंबर 2026

 मेरा रोज का नाश्ता है आर्गेनिक सत्तू

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बचपन में हम हलवाहे के भोजन के लिए 

खेत में सत्तू लेकर जाते थे।

रोज सत्तू खाकर भी हलवाले हट्््ठे-कट्ठे रहते थे।

पर,तब का सत्तू मिलावट रहित होता था।

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सुरेंद्र किशोर

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हर दिन की तरह आज भी मैंने नाश्ते में मिलावट रहित आर्गेनिक सत्तू खाया और अखबार पढ़ने बैठा।

दैनिक हिदुस्तान की एक खबर पर नजर टिक गई--

‘‘ब्रिक्स सम्मेलन में बिहार का सत्तू और मखाना परोसा गया।’’

मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने धन्यवाद देते हुए लिखा कि प्रधान मंत्री ने 

लोकल टू ग्लोबल के संकल्प को साकार किया है।

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मेरी एक ही आशंका है--जब सत्तू बड़े पैमाने पर विदेश जाने लगेगा तो उस पर मिलावट खोरों की राक्षसी प्रवृति हावी न हो जाए !

यदि वैसा हुआ तो 

इस देश की उल्टे बदनामी होगी।

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मुझे शुद्ध सत्तू का स्वाद अच्छी तरह याद है जो अपने गांव में मैंने पचास-साठ के दशकों में खाया था।

  इन दिनों मैं यहां जो सत्तू मंगवाता हूं,वह उसी ओरिजनल स्वाद का है।यह मेरा रोज का नश्ता है--हां,उसमें कुछ मूंगफली-किशमिश मिला देता हूं।

महंगा पड़ता है यानी 350 रुपए प्रति किलोग्राम।पर,स्वास्थ्य के लिए सही है।

  सत्तू की कंपनी का नाम मत पूछिएगा अन्यथा मुझे उसका प्रचारक मान लिया जाएगा।हां,जिन्हें इतना अधिक महंगा सत्तू फिर भी खाना है,वे मुझसे फोन पर पूछ सकते हैं।

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12 सितंबर 26

 

    

 


 मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी से एक

 छोटी मुलाकात में बड़ी बातें

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ समय पहले एक सामाजिक समारोह में मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी 

जी से मुलाकात हुई थी।

उन्होंने मुझसे कहा था--‘‘किसी दिन हम लोग साथ चाय पिएं।’’

उनके आमंत्रण की शालीन शैली मुझे पसंद आई।

वह प्रतीक्षित मुलाकात कल अणे मार्ग स्थित उनके आवास में हुई।

मेरे साथ मशहूर पत्रकार कन्हैया भेलाड़ी भी थे।या यूं कहिए कि मैं कन्हैया जी के साथ था।

      सम्राट जी से मेरी यह पहली बातचीत थी।मैं भी उन्हें समझना चाहता था।

इस संक्षिप्त मुलाकात में ही मुझे लग गया कि बिघ्न संतोषियों और राजनीतिक विरोधियों की धारणा के विपरीत नये मुख्य मंत्री को न सिर्फ राज्य की मूल समस्याओं की समझ हैं बल्कि उनके समाधान का रोड मैप भी उनके पास है जिस पर वे काम कर रहे हैं।

  मुलाकात के दौरान ही मैंने पाया मुख्य मंत्री ने सामने आई दो समस्याओं को न सिर्फ  उन्होंने तंुरत समझ लिया बल्कि उनका त्वरित समाधान भी कर दिया।

   बातचीत के दौरान सेटेलाइट टाउनशिप ,नये उद्योगों के लिए

जमीन की उपलब्धता और राज्य के कम से कम पांच बड़े अस्पतालों के कायापलट कोे लेकर मुख्य मंत्री ने सकारात्मक व उत्साह बर्धक बातें बताईं।

  इस तरह की कुछ अन्य बातंे भी हुईं।

 एक मुख्य मंत्री की बड़ी जिम्मेदारियों और अत्यंत व्यस्तताओं को ध्यान में रखते हुए हमने ही बातचीत को अधिक लंबा नहीं किया।

अगली किसी मुलाकात का वादा करके हमने उनसे विदा ली।

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और अंत में

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इस मुलाकात के दौरान मुख्य मंत्री जी ने इस छोटी सी बात का भी ध्यान रखा कि हमारा वाहन बाहर न रहकर अणे मार्ग के परिसर के भीतर रहे ताकि हमें वाहन तक पहुंचने के लिए पैदल न चलना पड़े।  

   

 


बुधवार, 9 सितंबर 2026

 आरक्षण सुधार बनाम आरक्षण बढ़ाओ आंदोलन

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ऐसे संवदेनशील मामलों को लेकर सड़कों पर उतरने 

के बदले इन्हें दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट को सौंप देें

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सुरंेद्र किशोर

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क्योंकि सड़कों पर उतरने से सामाजिक तनाव बढ़ेगा तो उसका नुकसान 

1990 की तरह आरक्षण विरोधियों को ही अधिक होगा।

क्योंकि आरक्षण सुधार को भी आरक्षण समाप्ति की मांग 

के रूप में ही कुछ लोग पेश करेंगे।

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राजनीतिक कार्यपालिका या संसद इन मामलों में कुछ नहीं कर सकती।

पर,सुप्रीम कोर्ट को संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-142 के तहत अपार शक्ति जरूर प्रदान कर दी है।यदि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो न्याय हित में वह कुछ भी निर्णय कर सकता है।

 (सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने का आदेश इसी अनुच्छेद का प्रयोग करते हुए दिया था।)

यदि आरक्षण में सुधार करवाना चाहते हैं,उन्हें ऐसी सामाजिक बनावट वाली संसद का इंतजार करना पड़ेगा जो तत्संबंधी अनुच्छेद-340 में जरूरी संशोधन कर सके। 

देश की जो सामाजिक यानी जातीय बुनावट है,उसमें वैसी संसद बनना लगभग असंभव है।

  याद रहे कि अनुच्छेद-340 में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े का प्रावधान है।आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा वाक्यांश जोड़ने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

 यह फिलहाल लगभग असंभव काम है।

आरक्षण विरोधी या सुधार पक्षी सड़कों पर आंदोलन जारी रखेंगे तो समाज में आपसी जातीय तनाव बढ़ेगा।उससे यह आशंका पैदा होगी कि अगली बार देश में एक ऐसी मिलीजुली सरकार बन जाएगी जिसमें सपा,राजद,तथा इस तरह के कट्टर आरक्षणपक्षियों व विवादास्पद दलों का दबदबा हो जाएगा।वे अपने साथ दूसरी ‘‘कमजोरियां’’ भी उस सरकार में लाएंगे जैसा कि उनका इतिहास रहा है।

फिर तो माना जाएगा कि सवर्णों ने 1990 के मंडल आरक्षण विरोधी अपने आंदोलन से कोई सबक नहीं सीखा।

 सन 1990 में यदि सवर्णों ने सड़कांे पर उतर कर मंडल आरक्षण का  विरोध नहीं किया होता तो लालू प्रसाद राजनीति में बलशाली नहीं बनते।लालू प्रसाद के मजबूत होने से सवर्णों को क्या लाभ मिला ?

कोई समझदार व्यक्ति नहीं चाहेगा राष्ट्रीय स्तर पर 1990 के बिहार की  पुनरावृति।

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दूसरी ओर, पिछड़ा वर्ग, आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की मांग कर रहा है।इस मांग को पूरा करना किसी सरकार के लिए संभव नहीं है।क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकत्तम सीमा तय कर दी है।

  हालांकि कुछ राज्य अपने जनसांख्यिकी आंकड़ों को आधार बना कर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे रहे हैं।पर ऐसे कुछ अन्य राज्यों के ऐसे मामले अदालत मंे अब भी विचाराधीन हंै।

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इसलिए बेहतर यही होगा कि दोनों पक्ष- यानी आरक्षण सुधारपक्षी व आरक्षण बढ़ाओ पक्षी-व्यापक सामाजिक सद्भाव के हित में ऐसे मामलों को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दें।

वहां से जो निर्णय हो उसे, सब मानें।उससे तनाव पैदा नहीं होगा।

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और अंत में

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सन 1990 में जब पिछड़ों के लिए ‘मंडल आरक्षण’ की घोषणा हुई तो सवर्णों के बड़े हिस्से ने खास कर बिहार में उसका जोरदार विरोध किया।उस विरोध का दोगुनी ताकत से प्रतिकार भी हुआ।

उन दिनों मैं सवर्णों से यह कहा करता था-‘‘गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।इसलिए आरक्षण का विरोध मत करो।’’

(पूर्व कांग्रेस विधायक हरखू झा मेरी उस बात के गवाह हैं-वे अब भी यदाकदा कहते हैं कि सुरेंद्र जी आरक्षण  विरोधियांे को चेतावनी दे रहे थे।पर कोई सुनने वाला नहीं था।कोई व्यक्ति अब भी हरखू झा को फोन करके इस बात की पुष्टि कर सकते हैं।)वैसे मेरे परिवार के सदस्य भी तब मुझे पागल कहते थे।मैं उनकी नादानी पर हंसता था।  

लोग नहीं माने।नतीजतन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने संपूर्ण पिछड़ों को जगा कर एकजुट कर दिया।वे राजनीति के महा बलवान बन गये-भले कुछ दिनों के लिए ही सही।

लालू प्रसाद अपनी ही गलतियों के कारण मौजूदा स्थिति को प्राप्त हुए हैं।यदि गलती नहीं करते तो वे अंततः पिछड़ों के मसीहा कहलाते।मैं तब उन्हें लिखकर चेता रहा था।उससे नाराज होकर मुझे नौकरी से निकलवा दिया उन्होंने।पर अब मेरे बारे में लालू जी कहते हैं--‘‘सुरेंदर किशोर संत है,फकीर है, 24 कैरेट का सोना है।’’पर अब पछताए होत का...।

आरक्षण समर्थन से ताकत पाए लालू प्रसाद ने 15 साल तक जैसा शासन चलाया,उससे अधिक नुकसान सवर्णों को ही हुआ।

पर,कुछ लोगों की आदत है कि वे अपनी पिछली गलतियों को दोहराते रहते हैं।आरक्षण समाप्ति या सुधार का आंदोलन उसी गलती का दोहराव है।पर कोई बात नहीं।सुप्रीम कोर्ट का रास्ता उपलब्ध है सबके लिए।

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9 सितंबर 26   


       


मंगलवार, 8 सितंबर 2026

 ‘माही’ नदी से ‘मरीन’ ड्राइव तक-

न सिर्फ नदी का नाम गलत ,बल्कि 

नदी किनारे की सड़क का नाम भी गलत !

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार के सारण जिले की मही नदी के तटबंध इस बार टूटे तो

उस नदी का नाम अखबारों में खूब छपा।

पर,मही नदी नहीं, बल्कि माही नदी छपा।

यह अंग्रेजी का असर है।

(ध्यान रहे कि मही नदी मेरे पुश्तैनी गांव से होकर बहती है।

मेरे गांव की जमीन के नक्शे में मही नदी ही लिखा हुआ है।उसकी फोटो काॅपी प्रस्तुत है।)

इसी तरह जेपी गंगा पथ को हम अखबारों के जरिए मरीन ड्राइव जानने लगे हैं।यह गलत अंग्रेजी का असर है।

क्योंकि मरीन का अर्थ समुद्रीय होता है, नदी शब्द से इसका कोई संबंध नहीं।

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एक समय था जब मैं अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ दैनिक नईदुनिया (इन्दौर)के लिए भी बिहार से लिखता था।

एक बार उसके यशस्वी संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पत्र लिखा।

उन्होंने लिखा कि ‘‘आप बिहार के हर जिला और तहसील शहर के सही नाम लिख कर भेज दें।ज्यादा से ज्यादा चार सौ नाम होंगे।’’

मैंने भेज दिया था।(याद रहे कि नईदुनिया की एक गलती पर पाठकों के औसतन 13 पत्र संपादक को मिलते थे।इसलिए संपादक जागरूक रहते थे।मैं भूल रहा हूं--राजेंद्र यादव या नामवर सिंह--इन्हीं में से किसी ने इन्दौर के इस अखबार को देखकर कहा था कि देश का सबसे अच्छा हिन्दी अखबार इन्दौर से निकलता है।)  

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दरअसल अंग्रेजी न्यूज एजेंसियां जो समाचार नई दुनिया को भेजती थीं,उनमें मुंगेर,कहलगांव और पलामू आदि की अंग्रेजों द्वारा दी गई स्पेलिंग कुछ अजीब होती थीं।उसके देवनागरीकरण में नईदुनिया अक्सर गलती करता था।मैंने उस ओर माथुर साहब उर्फ रज्जू बाबू का ध्यान आकृष्ट किया तो उन्होंने मुझे एक महत्वपूर्ण काम दे दिया था।यह 1981 की बात है।तब मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में काम करता था।

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8 सितंबर 26



 सास याद रखें कि वे भी कभी बहू थीं।

साथ ही, अपनी दुलरुई बेटी को भी ध्यान में रखिए

जो कहीं पतोहू बन कर गई है।


 यदि 90 प्रतिशत गेहूं के आटे में 10 प्रतिशत उजले पत्थर को पीस कर 

मिला दिया जाए और उसकी रोटियां बनाकर रोज खाया जाए तो 

शरीर पर उन रोटियों का कैसा असर पड़ेगा ?

   --- सुरेंद्र किशोर

(इन दिनों इस तरह की भी मिलावट जारी है।) 

7 सितंबर 26



बुधवार, 2 सितंबर 2026

 दोहरा मापदंड

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‘गोदी मीडिया’ के मौजूदा शोर के बीच

नेहरू-इंदिरा दौर की कुछ भूली- बिसरी यादें

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सुरेंद्र किशोर

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प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के एक बड़े अखबार के संपादक दुर्गा दास को उनके पद से हटवा दिया था। नेहरू के निजी सचिव ने अखबार के मालिक का फोन करके हटवा दिया।

दुर्गादास प्रधान मंत्री नेहरू की आलोचना लिख रहे थे।

(नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने यह बात अपनी संस्मरणात्मक किताब में लिखी है।)

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अखबार के संपादक पद से बी.जी.वर्गीज को हटवा दिया था।बाद में वर्गीज को रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सपे्रस का संपादक बना दिया था।  

साठ के दशक में तब के कांग्रेसी मुख्य मंत्री के.बी.सहाय ने पटना के दैनिक सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस. जार्ज को भारत 

रक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया था।नेहरू के साथ 13 साल तक उनके निजी सचिव रहे एम.ओ.मथाई के अनुसार ही टाइम्स आॅफ इंडिया और इलेस्टे्रटेड वीकली आॅफ इंडिया का तीन मूत्र्ति भवन यानी प्रधान मंत्री आवास में प्रवेश वर्जित था। 

ऐसे में उन दिनों के मीडिया को गोदी मीडिया बना देने में तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी।दिक्कत आई भी नहीं।

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अब कोई मुझे बताए कि मोरारजी देसाई,अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में किन-किन संपादकों को उनके पदों से हटवाया ?

सबूत के साथ कोई उदाहरण मिलेगा तो मैं उस पर भी लिखूंगा।

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दूसरी ओर, जब मोरारजी देसाई से किसी ने पूछा कि आर.के करंजिया की अभियानी साप्ताहिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ आपकी इतनी अधिक आलोचना करता रहता है,फिर भी आप उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करते ?

देसाई ने कहा कि मैं तो उसे पढ़ता ही नहीं।

 बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह से जब किसी ने पूछा तो उन्होंने इसी तरह की बात कही थी--‘‘मैं तो सर्चलाइट पढ़ता ही नहीं।किसी अखबार के खिलाफ इससेे बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकती।’’

याद रहे कि उसके संपादक एम.एस.एम.शर्मा अपने काॅलम में श्रीबाबू के खिलाफ किसी सबूत के बिना अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

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दूसरी ओर, आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी छपता रहता है।टी.वी.चैनलों पर बैठकर कोई कुछ भी बोलता रहता है।

आजादी के तत्काल बाद के वर्षों की बात है।

बिहार विधान सभा में साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई थी।

(दरअसल आजादी के तत्काल बाद बेतिया राज की जमीन की बड़े- बड़े सत्ताधारियों ने आपस में बंदरबांट कर ली।केंद्र सरकार को शिकायत गई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने बिहार सरकार को निदेश दिया कि जमीन वापस करो।उस वापसी के लिए साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक बिहार विधान सभा से पारित हुआ।

पर चर्चा के दौरान लाभान्वितों व उनके समर्थकों ने अपने लोभ के स्वर बहस में भी मुखरित कर ही दिये।) 

उस चर्चा के दौरान कांग्रेस के एक प्रमुख नेता ने,जो बाद में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे,कहा था कि ‘‘सन 1857 के विद्रोह को दबाने में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें जमीन जायदाद ,जमीन्दारी ,राय बहादुर -खान बहादुर की पदवी आदि देकर सम्मानित किया था।हमने और हमारे परिजन ने भी आजादी लड़ाई में बहुत कुछ खोया,उसकी क्षतिपूत्र्ति के रूप में यदि हमने साठी की जमीन(बेतिया महाराज की जमीन)की बंदोबस्ती ली तो कौन सा अन्याय किया।’’

मैंने उस रिपोर्ट के लिए पहले स्थानीय अखबारों की फाइलें देखीं।मुझे वह खबर नहीं मिली।फिर मैं विधान सभा लाइब्रेरी में जाकर तब की विधान सभा की कार्यवाही पर तैयार किताब देखी।उसमें यह विवरण मिला।

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 नेहरू के शासन काल के सबसे बड़े घोटाले 80 लाख रुपए के जीप घोटाले,(यानी इस देश के बीज घोटाले )की कोई खोजपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हुई थी जबकि उस घोटाले में शीर्ष सत्ताधारी का सीधा हाथ था।इसीलिए कृष्ण मेनन को सजा देने के बदले उनको प्रमोशन मिला था।यानी हाई कमिश्नर के बाद केंद्रीय मंत्री बने थे।

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1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के कारणों की जांच के लिए हैंडरसन -बु्रक्स-भगत समिति बनी।उसकी रिपोर्ट आई जिसके जरिए भारत सरकार की आपराधिक विफलताएं सामर्ने आइं।

पर उस समिति की रिपोर्ट भारत के तत्कालीन गोदी मीडिया में नहीं छपी।

बल्कि विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने प्रकाशित की।

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सन 1967 के चुनाव के लिए एक दल को छोड़ कर इस देश के सभी प्रमुख दलों ने विदेशों से नाजायज तौर पर पैसे लिये थे।उस शर्मनाक रिश्वतखोरी की रिपोर्ट भारतीय मीडिया में नहीं बल्कि न्यूयार्क टाइम्स में छपी।पूंजीवादी देश ने कम्युनिज्म के विरोध के लिए भारतीय दलों व नेताओं को पैसे दिए और कम्युनिस्ट देशों ने कम्युनिज्म के प्रचार-प्रसार के लिए। 

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इमर्जेंसी में इंदिरा सरकार ने मीडिया का क्या हाल किया था,उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना देखिए।

अस्वस्थता के कारण आपातकाल के बीच में ही जेपी रिहा कर दिए गए थे।

जब जेल से बाहर आए तो सरकार ने मीडिया को निदेश दिया--जेपी कहां जाते हैं,किससे मिलते हैं,इसकी खबर नहीं छपेगी।नहीं छपी।गोदी मीडिया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ?

(ये तो नमूने के तौर पर थोड़े से उदाहरण हैं।ऐसी सारी कहानियों को एकत्र करेंगे तो मोटी किताब बन जाएगी।)

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2 सितंबर 26  



  


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

 सी.ए.ए.और एन.आर.सी.पर प्रशांत किशोर

 की राय अब बदली है या वही है ?

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सुरेंद्र किशोर

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सन 2019 में प्रशांत किशोर को जदयू ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था।

मुददा था-जदयू सी.ए.ए.का समर्थन कर रहा था और प्रशांत 

किशोर उसका विरोध।

प्रशांत किशोर ने तब एन.आर.सी.का भी विरोध किया था।

इस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने कैबिनेट स्तर के पद की सुविधा को भी 

लात मार दी थी।यानी यह मुद्दा उनके लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था।

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 प्रशांत किशोर की इन दो मुद्दों पर अब क्या राय है ? 

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अब आम भाषा में सी.ए.ए. और एन.आर सी.को समझें।

सी.ए.ए.के खिलाफ तब दिल्ली शाहीन बाग में धरना हुआ था।

धरना देने वालों ने यह बात फैलाई कि सी.ए.ए.लागू होने से मुसलमानों की नागरिकता ले ली जाएगी।

जबकि सी.ए.ए. है पड़ोस के देशों से प्रताड़ित होकर भारत आए गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का कानून।

सी.ए.ए. अब लागू है।उन पीड़ित लोगों को नागरिकता दी जा रही है।पर किसी भारतीय मुस्लिम की नागरिकता नहीं ली गई।

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एन.आर.सी.यानी नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स।

पाकिस्तान में भी एन आर सी है।

पर भारत में निहित स्वार्थी लोग इसे नहीं बनने दे रहे हैं।उनको आशंका है कि वे  फिर घुसपैठियों के नाम हम उस रजिस्टर में कैसे शामिल करा पाएंगे ?

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27 अगस्त 26

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 1990 के मंडल आरक्षण का विरोध करने का नुकसान

मंडल विरोधियों की ही भगतना पड़ा था

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मौजूद आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नुकसान भी अंततः 

उन्हें ही होगा जो आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

लाभ सिर्फ उन अराजक तत्वों को मिलेगा जो इस देश 

को तोड़ना चाहते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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क्योंकि ये सब आरक्षण भारत के संविधान के अनुच्छेद-340, 341 और 342 प्रदत्त हैं।इनमें फेरबदल करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

आने वाली भी किसी भारतीय संसद की जातीय बनावट ऐसी नहीं होगी 

जो संसद इस संबंध में आरक्षण विरोधियों के अनुकूल संविधान का संशोधन 

कर सके।

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इसलिए आज के आरक्षण विरोध के नतीजे के परिणामस्वरूप देश में सिर्फ अराजकता फैलेगी।और उस अराजकता का लाभ सिर्फ देशी-विदेशी जेहादियों को मिल सकता है।

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1990 के मंडल आरक्षण के विरोधी सवर्णों से मैं तब कहा करता था कि विरोध करने से अंततः लालू प्रसाद को ही राजनीतिक मजबूती मिलेगी।आपको कुछ नहीं मिलेगा।(मेरी वह बात पूर्व कांग्रेसी विधायक हरखू झा को अब भी याद है।गवाही देने के लिए झा जी अब भी हमारे बीच हैं।)

  वही हुआ भी।लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन काल में मंडल विरोधी समुदायों  की जो दुर्गति हुई ,वह सब वही लोग जानते हैं।

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विवादास्पद यू.जी.सी.निदेशों का मामला भी आप लोग सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दीजिए।उसी को फैसला करने दीजिए।अन्यथा वह भी आपके लिए प्रति उत्पादक साबित हो सकता है।

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27 अगस्त 26


  


बुधवार, 26 अगस्त 2026

 


याद आएंगे ‘‘विचारधारा के सेनापति’’ व आई.बी.के

 पूर्व अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह 

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सुरेंद्र किशोर

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 बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हरेन्द्र प्रताप और भाजपा नेता

सुधीर शर्मा के फेबुक पोस्ट से पता चला कि आई.बी.(भारत सरकार)के पूर्व 

अधिकारी राम नरेश प्रसाद सिंह नहीं रहे।

पिछले दिनों जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत वामपंथी उग्रवाद से अब मुक्त है तो सहसा रामनरेश बाबू याद आ गए।

(अच्छी बात है--अब गृह मंत्री और प्रधान मंत्री को जेहादी उग्रवाद और दिमागी नक्सलियांे से भी देश को मुक्त करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।

एक अच्छा संकेत है ।वह यह कि इस देश के अधिकतर गैर राजग राजनीतिक दल वोट के लिए जब तक हिन्दुओं को गालियां देते रहेंगे और जेहादियों से साठगांठ जारी रखेंगे,तब तक उनके चुनाव जीतने का कोई चांस मुझे नजर नहीं आता--भले अस्थायी उतार-चढ़ाव किसी को नजर आए।)

  अमित शाह की घोषणा के बाद मुझे रामनरेश बाबू के साथ-साथ कभी जहानाबाद में डी.एम.रहे प्रत्यय अमृत की बातें भी याद आ गईं।

  जब बिहार में भी नक्सलियों का बोलबाला था तो मेरी राय हुआ करती थी कि 

विकास की कमी और समाज के कुछ समूहांे के प्रति व्यवस्थागत अन्याय के कारण 

नक्सली पनपे हैं।इन समस्याओं के हल के साथ ही नक्सल समस्या हल हो जाएगी।

इस समस्या पर रामनरेश बाबू से भी चर्चा होती रहती थी।

पर,वे मुझसे सहमत नहीं होते थे।

अंततः रामनरेश बाबू सही साबित हुए --प्रत्यय अमृत भी।

अस्सी के दशक में नक्सलियों द्वारा किए गए एक जन संहार की रिपोर्टिंग करने मैं जहानाबाद गया था।संयोग से घटनास्थल पर ही तत्कालीन जिलाधिकारी प्रत्यय अमृत सेे मुलाकात हो गयी।उनकी राय भी रामनरेश बाबू से मिलती -जुलती थी।हालांकि तब तक मेरा उनसे परिचय नहीं था।

मैं तब भी जिलाधिकारी महोदय से सहमत नहीं हुआ था।पर आज दोनों से सहमत हूं।रामनरेश बाबू ने कई पुस्तकें लिखी हैं ।उनकी अधिकतर पुस्तकें मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में हंै।उन पुस्तकों की एक -एक लाइन शोधपूर्ण व तथ्यपरक है।

   माननीय हरेंद्र प्रताप के अनुसार रामनरेश बाबू सचमुच विचारधारा के सेनापति थे।

आज उनकी कमी खल रही है जब भारत सहित पूरी दुनिया में ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ तेज हो गया है।    

नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन 

की एक किताब आई थी।

उसका नाम है ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष।’’

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी भी है जो भयानक रूप लेता जा रहा है।

हमारे देश की कुछ तथाकथित सेक्युलर और वोट लोलुप शक्तियों को छोड़कर पूरी दुनिया उस भयानकता को अच्छी तरह समझ रही है।

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26 अगस्त 26


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 शराबबंदी पर गांधी और लोहिया

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गांधी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

लोहिया भी थे नशाबंदी के पक्ष मंे

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सुरेंद्र किशोर

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साठ के दशक की बात है।

रांची में डा.राम मनोहर लोहिया के दल 

की बैठक थी।

बैठक में एक ऐसा व्यक्ति शामिल था जिसके भोजनालय में शराब भी परोसी जाती थी।

किसी समाजवादी कार्यकत्र्ता ने डा.लोहिया से शिकायत की कि एक शराब बिक्रेता भी इस बैठक में है।

डा.लोहिया ने उसे पास बुलाया।

पूछा, क्या तुम शराब बेचते हो ?

उसने कहा कि मेरा भोजनालय है जिसमें शराब भी बिकती है।

इस पर डा.लोहिया ने कहा कि हमारा दल नशाबंदी का पक्षधर है।

कोई ऐसा व्यक्ति हमारे दल का सदस्य नहीं हो सकता जो शराब पीता है या फिर शराब के कारोबार में है ।

  वह व्यक्ति बैठक स्थल से चला गया।

पर, कुछ घंटे के बाद लौटा।

उसने डा. लोहिया से कहा कि मैंने अपने भोजनालय में से शराब हटवा दी है।

अब मैं शराब नहीं बेचूंगा।

उसके बाद उसे बैठक में शामिल होने की अनुमति मिल गयी।

   इसे कहते हैं राजनीति का समाज पर असर।

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दरअसल डा.लोहिया मूलतः गांधीवादी थे।

उनका समाजवाद गांधीवाद का ही विस्तार या संशोधित रूप था।

उस जमाने में दूसरे दलों के अच्छी मंशा वाले अग्रसोचू नेतागण भी डा.लोहिया की ही तरह समाज को प्रभावित किया करते थे।

पर अब राजनीति का जमाना बदल गया।

नशाबंदी के कट्टर समर्थक गांधीवादी इस संबंध में एक खास बात कहा करते हैं।

किसी ने गांधी जी से कहा था कि आबकारी टैक्स से मिले पैसों से ही सरकारी स्कूल चलते हैं।

उसके जवाब में गांधी जी ने कहा था कि ‘‘भले पैसे के अभाव में स्कूल बंद कर देने पड़े,पर मैं चाहता हूं  कि देश में फिर भी पूर्ण शराबबंदी लागू हो।’’

यदि आजादी के बाद के हमारे शासकों ने गांधी और डा.लोहिया की बातों को अमली जामा पहनाया होता तो हमारा देश बेहतर होता।

समाज बेहतर होता।

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अब जब शराबखोरी से समाज में विषम पस्थितियां पैदा होने लगीं हैं तो कुछ राज्य बारी-बारी से शराबबंदी करने को बाध्य हो रहे हैं।

या फिर उस पर विचार कर रहे हैं।

(बिहार में शराबबंदी का राज्य पर अच्छा असर पड़ा है ,कोई सर्वेक्षण चाहे जो कुछ कहे।)

  शराबखोरी से पैदा होने वाली सामाजिक बुराइयों से लोगबाग परिचित रहे हैं।

कहां तो राजनीति देश भर में धीरे-धीरे शराबखोरी बंद कराती और कहां शराब के बिक्रेता अब राजनीति में आकर राजनीति को और समाज को खराब कर रहे हैं।

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कई साल पहले की बात है।

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तब सरकार मनमोहन सिंह की थी।

उन दिनों विजय माल्या राज्य सभा के सदस्य थे।

आश्चर्य है कि उन्हें नागरिक विमानन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य भी बना दिया गया था।

जबकि पहले इस बात का ध्यान रखा जाता था कि जिस सांसद का जिस मंत्रालय में व्यावसायिक स्वार्थ हो,उस मंत्रालय की संसदीय समिति में उसे सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

 उस समिति में माल्या ने एक प्रस्ताव रखा।

उनका प्रस्ताव था कि घरेलू उड़ानों में भी शराब परोसने की इजाजत मिलनी चाहिए।

वह प्रस्ताव पास भी हो गया।

मुझे नहीं मालूम कि वह लागू हुआ या नहीं !

क्योंकि मुझे हवाई यात्रा का कोई अनुभव नहीं है।

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  क्या कभी - कभी ही सही, गांधी का नाम लेने वाली कांग्रेस पार्टी से ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए थी ?

यदि गांधी के सपनों की सरकार होती तो ऐसा प्रस्ताव पास होता ?

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले चैप्टर में लिखा हुआ है कि ‘‘सरकार नशाबंदी करने का प्रयास करेगी।’’

उसी को ध्यान में रखते हुए गांधीवादी प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने सन 1977 में नशाबंदी की शुरूआत की थी।

हर साल शराब की एक चैथाई 

दुकानों को बंद करना था।

पर यह काम कई कारणों से पूरा नहीं हो सका।

बाद की केंद्र सरकारों ने नशाबंदी के काम को जरूरी नहीं समझा।

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लोहियावादियों को शराब पीते 

देख मुझे सदमा लगा था।

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आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के बलावे पर मैं बंगलोर गया था।

एक होटल के कमरे में हम तीन लोग टिके थे।कई दिन रहे।

उनमें से एक बाद में मुख्य मंत्री बने।दूसरे राज्य सभा के सदस्य।मैं खुद पत्रकार बन गया।

दिन में हमलोग सिनेमा देखते।अंधेरा हो जाने पर एक खास तरह की टे्रनिंग के लिए हम उस पहाड़ी पर जाते जहां शोले की शूटिंग हुई थी।

रात में भावी मुख्य मंत्री,भावी राज्य सभा सदस्य और एक स्थानीय वकील शराब पीने बैठ जाते थे।मैं टुकुर -टुकुर उन्हें देखता रहता था और कूढ़ता रहता था।

(मैं आज तक शराब का स्वाद नहीं जानता।)

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14 अगस्त 2026

  


    

 सन -1931 की जातीय जन गणना के अनुसार बिहार

-ओडिशा की विभिन्न प्रमुख जातियों की कुल संख्या

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तब के आंकड़े देखकर मोटा-मोटी अनुमान लगा लीजिए।

आज के आंकड़े का अनुमान सटीक तो नहीं ही होगा।

पर,मोटा-मोटी अनुमान लगाने में इससे मदद मिलेगी। 

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   सुरेंद्र किशोर

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 सन 1931 में आखिरी बार जातियों के आधार पर देश में जनगणना हुई थी।

दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में सन 1941 में जनगणना

नहीं हो सकी।

1947 में देश आजाद हुआ तो स्वतंत्र भारत की सरकार ने जातियों के आधार पर गणना बंद कर दी।

कुछ लोगों को आरोप रहा है कि बंद करने के पीछे उस सरकार का निहितस्वार्थ रहा।

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मेरे पास पूरे देश का तो नहीं किंतु सन 1931 की जनगणना के अनुसार बिहार-ओडिशा की प्रमुख जातियों की संयुक्त जनसंख्या का विवरण उपलब्ध है।

1931 में ओड़िशा भी बिहार का ही अंग था।झारखंड तो था ही।

(स्रोत--मुंगेरी लाल नीत पिछड़ा वर्ग आयोग की रपट--

16 फरवरी, 1976)

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बिहार-ओड़िशा--1931 जनगणना

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ग्वाला - 34 55 141

(इसमें अहीर,गोप व यादव शामिल हैं।)

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ब्राह्मण - 21 01 287

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कुर्मी - 14 52 724

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राजपूत --14 12 440

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कोइरी --13 01 988

चमार-- 12 96 001

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दुसाध--12 90 936

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तेली --12 10 496

...............................0

(बाभन)भूमिहार-8 9 5 6 0 2

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कायस्थ --3 83 435 

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धानुक--5 47 308 

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धोबी- 4 14 221 

हजाम - 4 56 779

मल्लाह - 4 59 560

कहार- 5 24 030 

कान्दू- 5 06 384

केवट- 4 71 389

कुम्हार- 5 99 038

तांती - 6 89 791

बनिया- 2 20 071

बढई-3 63 794

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 नोट--ऊपर दी गई सूची पूर्ण नहीं है।

मैंने कुछ ही जातियों की तब की संख्या यहां लिखी है।

मुंगेरी आयोग की रपट में विस्तृत सूची है।

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मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने से ठीक पहले केंद्र के आखिरी कांग्रेसी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जाति वार ब्योरा पढ़ लेना प्रासंगिक होगा।कांग्रेस ने चूंकि मंडल आयोग की रपट के आधार पर लागू आरक्षण का विरोध किया था,इसलिए उसे 

 बाद में कभी लोक सभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।

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सन 1988 के केंद्रीय मंत्रिमंडल में जातिगत स्थिति।

इसे देख कर कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति कह सकता है कि आरक्षण कितना जरूरी है।हालांकि मंत्रिमंडल में आरक्षण नहीं होता है,पर मंत्रिमंडल को बनाने वालों की मानसिकता का इससे पता चल जाता है।अन्य क्षेत्रों में भी लगभग यही होता रहा था तब। 

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जब कांगे्रस की पूर्ण बहुमत वाली सरकारें केंद्र या राज्य में बनती थीं तो 

मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों को कितना -कितना प्रतिनिधित्व मिलता था,देखें ।

कम से कम एक सरकार का तो आंकड़ा मिला है।

राजीव गांधी मंत्रिमंडल का यह आंकड़ा 14 फरवरी, 1988 का है।

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  उस राजीव गांधी मंत्रिमंडल की जातिगत स्थिति

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ब्राह्मण-15

पिछड़ा--5

ईसाई-3

अनुसूचित जाति-9

मुसलमान-4

सिख-1

वनवासी-3

ठाकुर-2

अन्य ऊंची जाति-11

अन्य-6

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1988 से अब तक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में देश में काफी परिवर्तन हुआ है।

काफी कुछ बदल गया है।

मौजूदा नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के सदस्यों का जातीय विवरण इस प्रकार है।इससे कांग्रेस मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल के बीच का फर्क साफ नजर आएगा।

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नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल --जातीय संख्या

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अन्य पिछड़ा वर्ग--27 मंत्री

सामान्य वर्ग--यानी उच्च जाति --28 मंत्री

अनुसूचित जाति--10 मंत्री

अनुसूचित जनजाति--5 मंत्री

अल्पसंख्यक--5 मंत्री

(कोई मुस्लिम नहीं )

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20 अगस्त 26 


 


 मेरे बारे में खुशखबरी,

ईश्वर करे , आपके बारे में भी ऐसी ही 

खुशखबरी मिलती रहे !

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सुरेंद्र किशोर

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मैं हर साल अपनी विस्तृत पैथोलाॅजिकल जांच करवाता हूं।

ताजा जांच रिपोर्ट को देखकर एक बड़े डाक्टर ने अपनी राय दी--

‘‘रिपोर्ट बिल्कुल परफेक्ट है।

सिर्फ विटामिन -डी और बी -12 कम है।’’

डी नाॅर्मल करना मेरे बाएं हाथ का खेल है, 

डी ठीक करना दाएं हाथ का।

इसलिए फिकिर नाॅट !!

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सन 2005 रिपीट 2005 में मैं नियमित सेवा से रिटायर कर गया।

तब से लगातार काम कर रहा हूं।नौकरी के समय से कुछ अधिक ही काम।

थकता नहीं हूं।थोड़ा संयम जरूर रखता हूं।

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आप भी नियमित रूप से विस्तृत जांच कराते रहिए।

कोई रोग पल रहा होगा तो समय से पहले पकड़ में आ जाएगा और उसका इलाज भी हो जाएगा।

उदाहरण--किडनी का 70 प्रतिशत हिस्सा जब नष्ट हो चुका होता है,उसके बाद ही उस रोग का लक्षण प्रकट होता है।

उसके बाद तो जीवन खत्म !!

डायलिसिस पर कितने दिनों तक कोई रहेगा ?!

इसलिए यह मत कहिए कि मेरे शरीर में रोग का कोई लक्षण

 ही नहीं है तो जांच पर खर्च क्यों करूं ?

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18 अगस्त 26 


बुधवार, 19 अगस्त 2026

 18 अगस्त, 2026 के प्रभात खबर (पटना संस्करण) में प्रकाशित

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 12 टाउनशिप के लिए केंद्रीयकृत गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा जरूरी 

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार में प्रस्तावित 12 ग्रीन फील्ड सैटेलाइट टाउनशिप शहरी मेगा प्रोजेक्ट है।

इसके बन कर तैयार हो जाने के बाद यह एक युगांतरकारी योजना साबित होगी।

इसका श्रेय मौजूदा राज्य सरकार को मिलेगा।व्यवस्थित ढंग से बसने वाले इन शहरों में रहना अपने आप में एक सुखद अनुभव होगा।

यह टाउनशिप विकास का इंजन भी साबित होगा।इसी को ध्यान में रखकर इसकी योजना तैयार की जा रही है।

पर,एक समस्या भी है।निर्माण में गुणवत्ता की समस्या।

 12 टाउनशिप का गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए।

गुणवत्ता नियंत्रण का काम तो इन दिनों और भी  कठिन हो गया है ,पर असंभव नहीं।  

 एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के नेतृत्व में गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा की स्थापना होनी चाहिए।

प्रशाखा निरंतर सभी 12 टाउनशिप के गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चत करे।बात साफ है।यदि राज्य सरकार गुणवत्ता बनाए रखेगी तो उसे यश मिलेगा।यदि गुणवत्ता नहीं रहेगी तो अपयश मिल सकता है।

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नक्सल आन्दोलन का चढ़ाव-उतार

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  बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा सन 1982 में राज्य में नक्सल आंदोलन पर तैयार विस्तृत नोट में कहा गया था कि नक्सल  समस्या सिर्फ कानून -व्यवस्था की ही समस्या नहीं है,बल्कि यह सामाजिक -आर्थिक समस्या भी है।

तब तक अविभाजित बिहार के मात्र 13 जिलों के 47 प्रखंडोें में नक्सली सक्रिय हुए थे।

पर, बाद के वर्षों में बिहार और झारखंड मेें नक्सलियों का फैलाव काफी बढ़ा।

इस बीच नक्सल आंदोलन में कई उतार -चढ़ाव भी आये।

 केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल आंदोलन को एक अलग नजर से देखा और तदनुसार उससे मुकाबला किया। 

इसी महीने बिहार सरकार ने यह सूचना दी कि बिहार अब नक्सल मुक्त हो चुका है।हाल तक राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित थे।अब कोई जिला वैसा नहीं है।

आने वाले दिनों में यह बात सामने आएगी कि सचमुच नक्सल समस्या से बिहार मुक्त हुआ है या नहीं।पर इससे अलग नक्सल अभियान को लेकर उस विचारधारा को मानने वालों में भी समय- समय पर मतभेद उभरा है।

 चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने सन 1967 में उनसे मिलने गये नक्सली नेता कानू सान्याल व तीन अन्य से कहा था कि ‘‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार 

वहां काम करें।’’

कभी भूमिगत अभियान में शामिल रहे माले (लिबरेान)के दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह बाद में चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए।तीन बार बगोदर से विधायक बने।जब उन्होंने देखा कि आम जनता घूसखोरी से परेशान है तो उन्होंने सत्याग्रह के जरिए जन दबाव बना कर सरकारी कर्मियों को घूस के पैसे जनता को लौटाने को विवश करना शुरू किया।इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।महंेद्र जी अपने जीवन काल में कभी चुनाव नहीं हारे।यह था देश और जनता की स्थिति के अनुसार काम करना।

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 फुटपाथों पर बेलगाम अतिक्रमण

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सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में कहा कि सीमांकित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

सरकार का कत्र्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग प्रदान करे।

  कुछ साल पहले पटना हाई कोर्ट ने अदालत में मौजूद पटना के एक थानेदार से पूछा-‘‘सड़कों पर अतिक्रमण करा कर रोज कितना कमा लेते हो ?’’

  यानी, अतिक्रमण एक मुनाफे का ध्ंाधा रहा है।इसके बावजूद अदालतें फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश सरकारों को नहीं दे पा रही है ?

यह समस्या देशव्यापी है।

  फिलहाल अदालत सरकार को यह निदेश दे सकती है कि वह राज्य पुलिस के बदले अर्ध सैनिक बल के सहयोग से फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाए।

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भूली-बिसरी यादें

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एक बार लोक सभा में कांग्रेस के भागवत झा आजाद ने कह दिया था कि ‘‘काबुल की सड़कों पर सिर्फ घोड़े ही नहीं होते,गधे भी होते हैं।’’

प्रतिपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी ने इस उक्ति पर एतराज किया और स्पीकर से कहा कि आप इस उक्ति को सदन की कार्यवाही से निकाल दें ।क्योंकि इससे पड़ोसी मित्र देश से संबंध बिगड़ सकते हैं।

 वाजपेयी की इस बात से सदन में हंसी फूट पड़ी।

हस्तक्षेप करते हुए भागवत झा आजाद ने कहा कि ‘‘चलिए आप कहते हैं तो बदल देता हूं।

मैं कह देता हूं कि बंबई की सड़कों पर घोड़े ही नहीं ,गधे भी होते हैं।

इससे पहले आजाद साहब ने अंग्रेजी में कहा था कि ‘‘मुझे अपना मंुह मत दीजिए,अपना कान दीजिए।’’

अटल जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की यह भाषा उचित नहीं है।

इस पर आजाद जी ने कहा कि मेरा मतलब यह है कि ‘‘आप अपना मुंह बंद रखिए और अपने कान खुले रखें।’’   

 ( तब की अपेक्षा सदन में आज की चर्चा का स्तर देखिए और दुखी होइए।)

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और अंत में

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 सन 1962 में डा.राम मनोहर लोहिया ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खिलाफ चुनाव लड़ा।

किसी ने पूछा कि ऐसी जगह से क्यों लड़े जहां से आपकी हार तय थी ?

डा. लोहिया ने कहा कि पार्टी के प्रचार के लिए लड़ा।साथ ही ,चट्टान को मैं तोड़ तो नहीं सका,पर उसमें दरार जरूर डाल दी। फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा चुनाव क्षेत्र पड़ते थे।उनमें से नेहरू तीन क्षेत्रों में और लोहिया दो क्षेत्रों में विजयी हुए।

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(अनियतकालीन काॅलम ‘यदाकदा’ से)



 


रविवार, 16 अगस्त 2026

 कितने लोगों को पसंद हैं राहुल गांधी 

की देह -भाषा और मौखिक भाषा ??

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सुरेंद्र किशोर

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राहुल गांधी की जो मौखिक भाषा है और उनकी जो देह भाषा है,वह 

देश देख रहा है।

संसद के भीतर या बाहर राहुल गांधी जिस तरह अपनी देह भाषा--मौखिक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,यदि किसी शालीन व्यक्ति के ड्राइंग रूम में जाकर वे वही सब करने लगें तो क्या वह शालीन व्यक्ति चाहेगा कि राहुल जी अगले दिन भी  उस व्यक्ति के घर जायें ?(यदि उस व्यक्ति को कांग्रेस का टिकट नहीं लेना हो तो।)

  जो लोग चाहेंगे कि राहुल जी घर के बाहर और भीतर,संसद के बाहर और भीतर  भी वही सब करते रहें,जो कुछ कर रहे हैं,

सिर्फ वैसे ही लोग राहुल को अगला प्रधान मंत्री देखना पसंद करंेेगे।

बाकी जनता ?

बाकी जनता कहेगी कि अपने आचरण से आप अपनी पार्टी को जिस तरह दिन प्रति दिन बर्बाद कर रहे हैं,वह करने का आपको पूरा अधिकार है,पर आपको इस देश के साथ छेड़छाड़ करने नहीं दिया जाएगा।

  इस देश को ‘‘केरल शैली का शासन’’ नहीं चाहिए।

(केरल में आज जो कुछ हो रहा है,वह बहुत चिंताजनक है,सारी बातें बाहर नहीं आ रही हैं।वहां के हिन्दू संगठन उद्वेलित हैं।विश्वास न हो तो गुगल की मदद लीजिए।)दूसरी ओर यू.पी.में तो कुछ मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अंधेरा होने के बाद भी घर से 

निकल कर सुरक्षित घर लौट सकती हैं।सन 2017 से पहले पहले ऐसा नहीं था।

बिहार में भी सन 2005 से पहले कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद सामान्य स्थिति में अपने घर से नहीं निकलता था।

पटना जंक्सन पर जब कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद कहीं बाहर से ट्रेन से पहुंचता था तो पटना स्थित अपने घर भयवश तत्काल नहीं चला जाता था।रात पटना स्टेशन पर ही गुजार देता था।अगली सुबह जाता था।   

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16 अगस्त 26


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

 मैं जानता हूं कि मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।

पर, चेतावनी देना मैं अपना नागरिक कत्र्तव्य समझता हूं।

कल यह तो कोई नहीं कहेगा कि पहले चेताया क्यों नहीं था ! 

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सुरेंद्र किशोर

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घर का ही बनाया खाइए।

अपनी जमीन हो तो घर का ही उपजाया खाइए।

बाकी तो कदम- कदम पर खतरा है--

डेग- डेग पर कैंसर है ।

सरकारें दूसरे कामों में व्यस्त हैं।

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समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकारों को चाहिए कि वे मिलावट को रोकने के लिए एक अलग विभाग बनाए।

जिस तरह बाहर के दुश्मनों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय बनाया गया है।

मिलावट खोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

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12 अगस्त 26 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

 आपातकाल के काले दिन 

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बिशन टंडन की डायरी से

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23 जुलाई 1975

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...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।

शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।

पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।

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हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।

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शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।

उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।

पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।

उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।

  प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।

पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।

(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)

आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।

मावलंकर ने उसका विरोध किया।

पर,होता क्या है इस विरोध से ?

..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।

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आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।

प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।

आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।

उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।

 इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।

बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।

भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।

पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।

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(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।

रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर) 

 


 

 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

 बवानी इमली हत्याकांड

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अंग्रेजों ने सन 1858 में यू.पी. के 52 स्वतंत्रता सेनानियों को 

एक साथ इमली के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी।

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हमारे देश के किस इतिहासकार ने इस घटना का पूरा व्योरा

लिखा है ?

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सुरेंद्र किशोर

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अंग्रेजों ने 28 अप्रैल ,1858 को यू.पी.के फतेहपुर में ठाकुर जोधा सिंह 

सहित बावन स्वतंत्रता सेनानियों को इमली के पेड़ पर लटका कर 

फांसी दे दी थी।

एक महीने तक लाशें पेड़ पर ही लटकी रहीं।अंग्रेजों ने उन्हें 

उतारने नहीं दिया ताकि अंग्रेजों का दबदबा कायम रहे और 

भयवश उसके खिलाफ कोई सिर न उठा सके ।

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क्या इस घटना का जिक्र किसी पाठ्य पुस्तक में हुआ है ?

किस इतिहासकार ने अलग से इस पर विस्तार से लिखा है ?

 ऐसी जघन्य घटना दुनिया के इतिहास में अन्यत्र भी हुई है या

भारत में ही यह अनोखी घटना हुई--

यानी 52 लोगों को एक साथ पेड़ पर लटका कर फांसी देने 

की अनोखी घटना !

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31 जुलाई 26


बुधवार, 29 जुलाई 2026

 एक सामान्य नागरिक की सलाह

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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा कायम रखने 

के लिए संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद हो।

क्योंकि संसदीय कार्य संचालन नियमावली का उलंघन 

करने वाले सदस्यों की संख्या अब काफी बढ़ गई है।

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सुरेंद्र किशोर

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बेहतर यह होगा कि संपादित करने के बाद ही एक दिन

 बाद ही कार्यवाही का टी.वी.पर प्रसारण हो।

या, एक दूसरा उपाय भी है।

संसद में सदस्य जो कुछ बोलते हैं,उसको लेकर कोर्ट में उन 

पर केस नहीं हो सकता।जब संसद में शालीन व नियम पालक

सदस्यों की संख्या अधिक थी,तब यह छूट दी गई थी।

  यदि सीधा प्रसारण जारी रखना हो तो उस छूट को यथाशीघ्र 

समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 26