
रविवार, 18 जनवरी 2009
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गांधी के प्रति जेल में पटेल का मातृवत् स्नेह

महात्मा गांधी की जेल में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जो सेवा की, उससे अभिभूत होकर गांधी जी ने उसे मातृवत् स्नेह करार दिया।
इस संबंध में ़महात्मा गांधी ने 8 मई 1933 को लिखा कि ‘मेरे जीवन के महानतम सुखों में से एक था कि मुझे सरदार के साथ जेल में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं उनके अजेय साहस तथा देश के लिए अद्वितीय प्रेम के बारे में तो जानता था, लेकिन उनके साथ 16 महीने का लंबा समय बिताने का सौभाग्य पहले मुझे प्राप्त नहीं हुआ था। उनके अनुराग और प्रेम से मैं इतना अभिभूत हो गया कि मुझे अपनी प्रिय मां का स्मरण हो आया। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनमें मातृवत् स्नेह जैसे गुण मौजूद हैं। यदि मैं थोड़ा सा भी अस्वस्थ होता तो वे हाजिर हो जाते और मेरी छोटी से छोटी आवश्यकता पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देते। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने अपने बीच निश्चय किया कि वे मुझे कुछ भी कार्य नहीं करने देंगे। मैं आशा करता हूं कि सरकार मेरा विश्वास करेगी कि जब भी हमने राजनीतिक चर्चा की, वह ऐसे व्यक्ति थे जो सरकार की मुश्किलों को महसूस करते थे। बारदोली और कैरा के किसानों की चिंता और कष्टों के प्रति वह कितना चिंतित रहते थे, यह मैं कभी नहीं भूलूंगा।’
सरदार वल्लभ भाई पटेल, जो आजादी के बाद देश के उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बने थे, यह भी चाहते थे कि महात्मा गांधी यदि पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं तो उन्हें अधिक श्रम नहीं करना चाहिए। यहां तक कि अपने हाथ से पत्र भी नहीं लिखना चाहिए।
सरदार पटेल ने 5 जून 1933 को महात्मा गांधी को लिखा, ‘आदरणीय बापू, लगभग एक मास बाद मुझे आपका हस्तलेख देखने का सौभाग्य मिला। हम बहुत प्रसन्न हुए। हम दोनों ठीक हैं। चिंता करने का क्या फायदा, मेरी चिंता का कोई प्रभाव नहीं हो सकता। आपकी फिक्र करने को ईश्वर है।’ सरदार पटेल ने लिखा, ‘अपने हाथ से पत्र लिखने में जल्दीबाजी न करें। शरीर में ताकत आने दें। तब तक आप महादेव को लिखने का आदेश दें और आप केवल पत्रों पर हस्ताक्षर करें, इतना ही काफी है। वल्लभ भाई की शुभकामनाएं और प्रणाम।’
देखिए, सरदार पटेल की रोगग्रस्त नाक की समस्या पर महात्मा गांधी ने जेल से कैसा पत्र लिखा। मेजर भंडारी को 20 मार्च 1933 को गांधी जी ने लिखा,‘ प्रिय मेजर भंडारी, मैंने अनेक बार सरदार वल्लभ भाई पटेल की नाक की समस्या के बारे में आपको बताया। आप जानते हैं कि इस पर बात करने की उनकी अनिच्छा ही रहती है। लेकिन हमलोग जो इसके बारे में जानते हैं, आशंकित हैं। जब तक इसका दौरा समाप्त नहीं होता, वह तड़पते रहते हैं। आपने और मेजर मेहता ने जो इलाज सुझाए, सब नाकाम रहे। दौरे जल्दी -जल्दी पड़ रहे हैं और अधिक कष्टप्रद होते जा रहे हैं। गत शनिवार को सबसे भयंकर दौरा पड़ा। 30 घंटे से अधिक नाक बहती रही। आंखें खून जैसी लाल हो गई थीं। पूरे दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया। सुबह केवल चाय पी और शाम को दूध, फल और उबली हुई सब्जियां खाई। वह अपना सामान्य भोजन नहीं ले पा रहे हैं। मैं महसूस करता हूं कि विशेषज्ञों द्वारा इनकी जांच कराने का समय आ गया है। भवदीय, एम.के.गांधी।’
गांधी जी उम्र जैसे -जैसे बढ़ रही थी,सरदार पटेल चाहने लगे थे कि उन्हें अनावश्यक तनाव व कार्याधिक्य से मुक्त ही रखा जाए। एक अक्तूबर 1935 को सरदार पटेल ने एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि ‘लोग मुझसे पूछते हैं कि गांधी जी कांग्रेस में कब वापस आएंगे, तो मैं उत्तर देता हूं कि महात्मा गांधी 67 वर्ष के हैं।हम उनसे कितनी अपेक्षाएं और रख सकते हैं ? अब हमें उनके अधूरे कार्य को पूरा करना चाहिए।’
निजी दुखों को भुला कर भी सरदार पटेल आजादी के लिए जेल यातना सह रहे थे। अक्तूबर , 1933 में सरदार पटेल के अपने भाई का निधन हो गया। तब सरदार नासिक सेंट्रल जेल में थे। बंबई के बहुत से लोगों की इच्छा थी कि दाह संस्कार में शामिल होने के लिए सरदार पेरोल पर जेल से बाहर आएं। पर, उन लोगों को जवाब देते हुए सरदार ने जेल से लिखा, ‘जेल से बाहर आने की मांग करना न तो मुझे शोभा देता है और न ही राष्ट्र को।सत्याग्रही के लिए यह उचित नहीं है कि वह सरकार पर अनुचित दबाव डाले जिसमें ऐसी स्थिति से फायदा उठाया जाए।’
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सात सौ साल पहले के हमारे फल और अनाज
यह तो पीजा और बर्गर तथा अन्य आधुनिक देसी-विदेशी भोज्य पदार्थों का युग है। पर,इस मौजूदा युग की नई पीढ़ी के लिए यह जान लेना रूचिकर होगा कि करीब सात सौ साल पहले के भारत के प्रमुख फल और अनाज कैसे और कौन -कौन थे। यानी सात सौ साल पहले के हमारे पूर्वज किन- किन अनाजों और फलों पर निर्भर थे।इस संबंध में इतिहास प्रसिद्ध विदेशी यात्री इब्न बतूता ने अपने यात्रा वृतांत में चैदहवीं शताब्दी के भारत के मुख्य अनाजों और फलों का वर्णन किया है। अबू अब्दुला मुहम्मद उर्फ इब्न बतूता ने भारत के तब के आम, कटहल, जामुन,नारंगी, महुआ का वर्णन किया है।इसी तरह अनाजों के बारे में उसने लिखा है कि ‘यहां साल में दो फसलें होती हैं।गर्मी पड़ने पर वर्षा होती है और उस समय खरीफ की फसल बोई जाती है।यह फसल बोने के साठ दिन पीछे काटी जाती है।अन्य अनाजों के अतिरिक्त इसमें निम्नलिखित अनाज भी उत्पन्न होते हैं-कोदो,चीना,शामाख यानी सांवक जो चीना से छोटा होता है और विरक्तों, साधुओं, संन्यासियों तथा निर्धनों के खाने के काम आता है।एक हाथ में सूप और दूसरे हाथ में छोटी छड़ी लेकर पौधे को झाड़ने से सांवक के दाने जो बहुत ही छोटे होते हैं, सूप में गिर पड़ते हैं। धूप में सुखा कर काठ की ओखली में डाल कर कूटने से इनका छिलका पृथक हो जाता है और भीतर का श्वेत दाना निकल आता है।इसकी रोटी भी बनाई जाती है और खीर भी पकाते हैं। भैंस के दूध में इसकी बनी हुई खीर रोटी से कहीं अधिक स्वदिष्ट होती है।मुझे यह खीर बहुत प्रिय थी,और मैं इसको बहुधा पका कर खाया करता था।’ रबी और खरीफ के बारे में बतूता लिखता है कि ‘खरीफ की फसल बोने के साठ दिन पश्चात धरती में रबी की फसल का अनाज - गेहूं, चना, मसरी, जौ इत्यादि बो दिए जाते हैं।यहां की धरती अच्छी है और सदा फूलती -फलती रहती है।धान तो एक वर्ष में तीन बार बोया जाता है।इसकी उपज भी अन्य अनाजों से कहीं अधिक होती है।’ ‘मूग भी मटर की तरह है।परंतु मूंग कुछ लंबी और हरे रंग की होती है।मूंग और चावल की खिचड़ी नामक भोजन विशेष रूप से बनाया जाता है।जिस तरह हमारे देश मोराको में प्रातःकाल निहारमुख हरीरा लेने की प्रथा है,उसी प्रकार यहां के लोग घी मिला कर खिच़ड़ी खाते हैं।मोठ अनाज तो होता है कजरू के समान, परंतु दाना अधिक छोटा होता है। यह अनाज भी घोड़ों और बैलों को दाने के रूप में दिया जाता है।यहां के लोग जौ को इतना बलदायक नहीं समझते इसी कारण चने अथवा मोठ को दल लेते हैं और पानी में भिंगों कर घोड़ों को खिलाते हैं।घोड़ों को मोटा करने के लिए हरे जौ खिलाते हैं।इसके अतिरिक्त तिल और गन्ना भी इसी खरीफ फसल में बोया जाता है।’ फलों में आम का वर्णन इब्न बतूता ने कुछ इस तरह किया है, ‘इस देश में आम नामक एक फल होता है जिसका वृक्ष होता तो नारंगी की भाति है,पर डील में उससे कहीं अधिक बड़ा होता है।पत्ते खूब सघन होते हैं।इस वृक्ष की छाया खूब होती है।परंतु इसके नीचे सोने से लोग आलसी हो जाते हैं।फल अर्थात आम, आलू बोखारे से बड़ा होता है।कच्चे में लोग आम का अचार बनाते हैं।आम के अतिरिक्त इस देश में अदरक और मिर्च का भी अचार बनाया जाता है।कटहल का वृक्ष बड़ा होता है। कटहल के फल पेड़ की जड़ में लगते हैं।यह खूब मीठा और सुस्वादु होता है।प्रत्येक कोये के भीतर बाकले की भांति गुठली होती है। बाकला इस देश में नहीं होता। कटहल की गुठली को भून कर या पका कर खाने से इसका स्वाद भी बाकले सा प्रतीत होता है।लाल रंग की मिट्ठी दबा कर रखने से ये गुठलियां अगले वर्ष तक भी रह सकती हैं।इसकी गणना भारत वर्ष के उत्तम फलों में की जाती हैं।’ ‘जामुन का बड़ा पेड़ होता है।फल जैतून की भांति होता है।नारंगी इस देश में बहुत होती है।नारंगियां अधिकतया खट्टी नहीं होतीं।महुआ का पेड़ बहुत बड़ा होता है।फल छोटे आलू बोखारे की तरह होता है और बहुत मीठा होता है।भारत में अंगूर बहुत ही कम होता है।दिल्ली तथा अन्य कतिपय स्थानों के अतिरिक्त शायद ही कहीं होता हो।महुए के पेड़ साल मेंे दो बार फलते हैं।इसकी गुठली का तेल निकाल कर दीपों में जलाया जाता है।कसेहरा यानी कसेरू धरती से खोद कर निकाला जाता है।यह कसतल की भांति होता है।बहुत मीठा होता है।हमारे देश के फलों में से अनार भी यहां होता है और वर्ष में दो बार फलता है।माल द्वीप समूह में अनार के पेड़ में मैंने बारहों महीने फल देखे।’ प्रभात खबर (12-12-2008)